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शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

जब शरीर का कोई अंग घिस जाए, उसे बदल डालिए

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जब शरीर का कोई अंग घिस जाए, उसे बदल डालिए

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दस-पन्द्रह साल के बाद मनुष्य ख़ुद अपने शरीर पर 'थिगलियाँ' लगाना शुरू

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दस-पन्द्रह साल के बाद मनुष्य ख़ुद अपने शरीर पर 'थिगलियाँ' लगाना शुरू कर देगा। वह अपने पुराने और घिस चुके अंगों को और अपनी माँसपेशियों के संयोजी ऊतकों को, जब मन होगा, ख़ुद ही बदल लिया करेगा। जापान में एक क्लीनिकल अनुसंधान के दौरान कोशिका-चिकित्सा (या सेल-थैरेपी) की सहायता से मानव-हृदय के ऊतकों को नया जीवन दिया जाता है। रूस में विशेष जैविक-रिएक्टरों में न सिर्फ़ संयोजी ऊतकों का विकास किया जाता है, बल्कि नए मानव-अंगों को भी विकसित किया जाता है। फ़िलहाल चिकित्सक इस तक्नोलौजी का सिर्फ़ परीक्षण कर रहे हैं। लेकिन जल्दी ही चिकित्सक इस तक्नोलौजी का व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल शुरू कर देंगे।
आज से दस साल पहले अगर कोई इस तरह की बात कहता तो लोग उसे कपोल-कल्पना ही मानते और उसकी हँसी उड़ाने लगते। लेकिन आज मानव अंगों को कृत्रिम रूप से विकसित करने वाली इस तरह की तक्नोलौजी एक वास्तविकता यानी एक सच्चाई बन चुकी है। आज वैज्ञानिक पुनर्योजी चिकित्सा विधियों की सहायता से कोशिकाओं से एक पूरे मानव अंग का कृत्रिम रूप से विकास कर सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि डॉक्टर जल्दी ही त्वचा सम्बन्धी बीमारियों से लेकर कैंसर तक ज़्यादातर बीमारियों का इलाज कर सकेंगे। जापान में तो डॉक्टर आज भी कृत्रिम तौर पर उगाई गई कोशिकाओं या संवर्धित कोशिकाओं की सहायता से हृदय-रोगों का इलाज करने की कोशिश कर रहे हैं।
सेल-टैक्नालौजी या कोशिका-तक्नोलौजी का इस्तेमाल मानव-शरीर पर चोट लगने के बाद उस चोट के कुप्रभाव को कम करने के लिए किया जा सकता है। जापान के डॉक्टर इन कृत्रिम या संवर्धित कोशिकाओं की मदद से आँख के क्षतिग्रस्त कॉर्निया (या आँख की पुतली के परदे) को फिर से विकसित कर लेते हैं। रूस के राजकीय चिकित्सा विश्वविद्यालय में भी मानव-शरीर पर चोट लगने से और जलने से हुए घावों का इलाज करने के लिए संयोजी ऊतक कोशिकाओं का इस्तेमाल करने की संभावना का अध्ययन किया जा रहा है। और दक्षिणी रूस में स्थित क्रास्नादार नगर का एक पुनर्योजी चिकित्सा केन्द्र अपने वक्ष शल्य-चिकित्सा विभाग में आने वाले मरीज़ों के इलाज के लिए कृत्रिम श्वास-नली उगाने या कृत्रिम रूप से साँस की नली का संवर्धन करने की कोशिश कर रहा है।
मास्को की अधुनातन जैव-चिकित्सा तक्नोलौजी प्रयोगशाला के प्रमुख अलेक्सेय कवाल्योव ने मीडिया को एक इंटरव्यू देते हुए बताया कि कोशिकाओं से ऊतकों का संवर्धन करने की तक्नोलौजी जल्दी ही डॉक्टरों द्वारा व्यापक तौर पर इस्तेमाल की जाने लगेगी और वह एक आम बात हो जाएगी। अलेक्सेय कवाल्योव ने कहा :
आज प्रयोग करते हुए या परीक्षण करते हुए हम एक विशेष जैव-रिएक्टर में या बायो-रिएक्टर में बड़े स्तर पर मानव-त्वचा का कृत्रिम रूप से संवर्धन या विकास कर सकते हैं। आज भी हम बच्चों की दबी-कुचली उँगलियों का इलाज करते हुए उनकी उँगलियों के सिरों को फिर से विकसित कर लेते हैं। इसी तक्नोलौजी को हमने थोड़ा और अधुनातन बना लिया है और अब हम इस तक्नोलौजी का इस्तेमाल वयस्क लोगों के उँगलियों के सिरे को फिर से नया जीवन देने के लिए भी करते हैं।
आप शायद यह सोच रहे होंगे कि ये जैव-रिएक्टर या बायो-रिएक्टर क्या चीज़ है? जैव-रिएक्टर या बायो-रिएक्टर दर‍असल एक ऐसा उपकरण है, जिसमें पूरी तरह से नियंत्रित तरल द्रव में ऊतकों के विकास की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। इस तक्नोलौजी का इस्तेमाल करके उन ऊतकों का विकास करना भी संभव है जो आम तौर पर ख़ुद प्राकृतिक रूप से विकसित नहीं हो पाते। यह रूसी बायो-मेडिसन का नो-हाऊ या कहना चाहिए कि रूसी जैव-चिकित्सा का अपना आविष्कार, अपनी अधुनातन जानकारी है। यह विचार क़रीब पचास-साठ साल पहले उन सोवियत वैज्ञानिकों के मन में आया था जो मानव-अंगों के पुनर्विकास से सम्बन्धित अनुसंधान और शोध का काम कर रहे थे। आज रूसी चिकित्सक इस तक्नोलौजी का बड़ी सफलता के साथ दिन-प्रतिदिन उपयोग कर रहे हैं। अलेक्सेय कवाल्योव ने बताया :
हम मानव-शरीर के किसी अंग को कृत्रिम रूप से बायो-रिएक्टर में विकसित करते हैं और फिर उसका मानव के शरीर में प्रत्यारोपण कर देते हैं। आजकल हम एक नई दिशा में प्रयोग कर रहे हैं, जैसे हम शरीर का क्षतिग्रस्त मूल अंग को ही जैव-रिएक्टर में या बायो-रिएक्टर में रख देते हैं और फिर इसी बायो-रिएक्टर में उस अंग के क्षतिग्रस्त सिरे पर ऊतकों का विकास करते हैं।
ऐसा हो सकता है कि आने वाले 10-15 वर्षों के बाद रूस में इस तरह की जैव-फ़ैक्ट्रियाँ खुल जाएँ और इस तरह के बैंक काम करने लगें जहाँ मानव शरीर के अंग और ऊतक बनाए जाएँगे और वे बैंक में तैयार रखे होंगे। जब भी किसी रोगी को या मरीज़ को उनकी ज़रूरत पड़ेगी, वे तुरन्त मंगाए जा सकेंगे।

किसी भी मानव-शरीर की अपनी ही निजी कोशिकाओं से ऊतकों का विकास करने की विधि शरीर में कृत्रिम अंगों के प्रत्यारोपण की समस्याओं को भी हल कर देगी, क्योंकि मानव-शरीर की निजी कोशिकाओं से विकसित हुए ऊतक किसी दूसरे शरीर से ग्रहण किए जाने वाले मानव-अंगों के ऊतकों के मुक़ाबले शरीर के लिए एकदम फ़िट होंगे और उनकी कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया भी नहीं होगी। तब मानव-अंगों के दानदाताओं की कमी और उन अंगों की कमी की समस्या भी पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगी।sabhar : http://hindi.ruvr.ru








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जॉन लेनन के दाँत से उनका क्लोन बनाने की घोषणा

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Джон Ленон


कनाडा के उस दाँतों के डॉक्टर माइकेल झूक ने, जिसने दो साल पहले विश्वप्रसिद्ध संगीत मण्डली दी बीटल्स के प्रमुख जॉन लेनन का दाँत ख़रीदा था, यह घोषणा कि है कि वह उस दाँत से जॉन लेनन का डी०एन०ए० निकलवा कर जॉन लेनन का क्लोन बनवाएँगे। माइकेल झूक का कहना है -- यदि वैज्ञानिक मैमथ का क्लोन बना सकते हैं तो जॉन लेनन का क्लोन भी बना सकते हैं।

माइकेल झूक का कहना है कि जल्दी ही आनुवंशिक्विज्ञानी लेनन के सभी आनुवंशिकी कोड पता लगा लेंगे और हज़ारों लोगों के प्रिय गायक को फिर से पौनर्जीवित करने की कोशिश करेंगे।
माइकेल झूक ने वर्ष 2011 में जॉन लेनन का दाँत क़रीब 31 हज़ार डॉलर में ख़रीदा था। दाँत ख़रीदने के बाद उन्होंने सारी दुनिया के दाँतों के क्लीनिकों और कालेजों की यात्रा की और उअस यात्रा से वापिस लौटकर लेनन का यह दाँत अपने केबिन में सुरक्षित रख लिया। इससे पहले झूक प्रसिद्ध लोगों के दाँतों के बारे में एक क़िताब भी लिख चुके हैं।
जॉन लेनन ने अपना यह दाँत उखाड़कर अपनी नौकरानी डॉट जेरलेट को 1960 में दिया था और उससे कहा था कि वह अपनी बेटी को उनका यह दाँत उपहार में दे दे। लेकिन बाद में उनका यह दाँत क्रिएशन रिकार्ड्स नामक म्यूजिकल लेबल के संस्थापक अलान मकगी के संग्रह में पहुँच गया। जब उन्होंने अपना संग्रह नीलाम किया तो यह दाँत माइकेल झूक ने ख़रीद लिया। sabhar :http://hindi.ruvr.ru

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"अंतरिक्ष टैक्सी" के पहले परीक्षण

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"अंतरिक्ष टैक्सी" के पहले परीक्षण


नासा की मदद से विकसित की जा रही "अंतरिक्ष टैक्सी" के पहले परीक्षण सन् 2012 की गर्मियों में सम्पन्न

नासा की मदद से विकसित की जा रही "अंतरिक्ष टैक्सी" के पहले परीक्षण सन् 2012 की गर्मियों में सम्पन्न किए जाएंगे। यहाँ पर "ड्रीम चेज़र" नामक मिनी शटल की चर्चा है। यह उन चार वाहनों में से एक है, जिन पर "अंतरिक्ष टैक्सी" बनाने के नासा के प्रोग्राम के अंतर्गत निजी कम्पनियाँ काम कर रही हैं। नासा के विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना के सफल कार्यान्वन से सन् 2016 तक, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक लोगों को भेजना और पृथ्वी पर वापस लाना काफी किफ़ायती हो जाएगा। आशा है कि आगामी दो वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक लोगों और माल को पहुँचाने के लिए रॉकेट, अंतरिक्ष यान, लांच पैड और बाकि सारा बुनियादी ढांचा तैयार हो जाएगा। sabhar : http://hindi.ruvr.ru/
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2011/10/12/58579820/

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जापानी एक अंतरिक्ष लिफ्ट बनाएंगे

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जापानी एक अंतरिक्ष लिफ्ट बनाएंगे


जापानी कंपनी ओबयाशी का वर्ष 2050 तक एक अंतरिक्ष लिफ्ट बनाने का इरादा है। यह लिफ्ट माल और यात्रियों

जापानी कंपनी ओबयाशी का वर्ष 2050 तक एक अंतरिक्ष लिफ्ट बनाने का इरादा है। यह लिफ्ट माल और यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने और वहाँ से पृथ्वी पर लौटने के काम में सहायता करेगी। इस नए वाहन की गति 200 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। इसमें बैठकर एक सप्ताह तक अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकेगी। लिफ्ट के लिए ऊर्जा सौर पैनलों की सहायता से जुटाई जाएगी।
अंतरिक्ष लिफ्ट बनाने का विचार सबसे पहले सन् 1895 में सामने आया था जब एक रूसी वैज्ञानिक कॉन्स्तांतिन त्सियॉलकोवस्की ने एक ऐसा टावर बनाने का विचार पेश किया था जिसकी सहायता से पृथ्वी की सतह से इसकी कक्षा तक पहुँचा जा सके। तब से आज तक यह विचार वैज्ञानिकों के ध्यान का केंद्र बना रहा है और हाल के वर्षों में नासा में इस विचार को अमली शकल देने के विषय पर कई सम्मेलन आयोजित किए जाते रहे हैं sabhar  : 
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_03_03/67373343/
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खगोलविदों ने सौर प्रणाली जैसी एक नई ग्रह प्रणाली खोजी

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खगोलविदों ने सौर प्रणाली जैसी एक नई ग्रह प्रणाली खोजी

तारिका प्रणाली एच.डी. जी.जे. 676ए , जो पृथ्वी से 16.4 पारसेक्स या 53.46 प्रकाश वर्ष दूर
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_07_10/nai-sour-pranali/


तारिका प्रणाली एच.डी. जी.जे. 676ए, जो पृथ्वी से 16.4 पारसेक्स या 53.46 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है, देखने में हमारी सौर प्रणाली जैसी ही लगती है। इसमें पृथ्वी जैसे ग्रह एक तारे की परिक्रमा करते हैं और गैस के विशालकाय बादल इस तारे से बहुत दूर हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह हमारी ग्रह प्रणाली जैसी एक दुर्लभ सौर प्रणाली है जो वर्तमान में गायब हो रही है।
जर्मनी में गौटिंगेन विश्वविद्यालय के अंतर्गत एक खगोल भौतिकी संस्थान के शोधकर्ता डॉ. गिलेम आंगलाड एस्कुडेस के नेतृत्व में खगोलविदों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल ने बोने लाल ग्रहों के बारे में विभिन्न दूरबीनों की मदद से प्राप्त जानकारियों का एक काफ़ी लंबे समय में विश्लेषण किया है।
 वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी से अपेक्षाकृत कम दूरी पर स्थित अन्य प्रणालियों की भी खोज की गई है लेकिन वहाँ अभी तक पृथ्वी जैसे ग्रह दिखाई नहीं दिए हैं। अगर वहाँ पृथ्वी जैसे कई ग्रह मिल जाएंगे तो यह कहना संभव हो सकता है कि हमारी सौर प्रणाली जैसी कई अन्य प्रणालियाँ भी मौजूद हैं। इसका मतलब यह होगा कि एक तारे के चारों ओर कई ग्रहों द्वारा परिक्रमा करना एक आम बात है।

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मंगल पर मानव मिशन अगले 5 से 15 साल में`

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`मंगल पर मानव मिशन अगले 5 से 15 साल में`

चेन्नई : नासा की एक वैज्ञानिक का कहना है कि मंगल पर मानव मिशन अगले पांच से 15 साल में साकार होने की संभावना है। 

अनीता सेनगुप्ता ने पत्रकारों से कहा कि ‘मंगल पर मानव मिशन संभव है और यह सिर्फ कुछ समय की बात रह गई है। मेरे हिसाब से अगर बजट और प्रौद्योगिकी समस्या नहीं रही तो यह पांच से 15 साल में संभव हो सकेगा। 

अनीता की नासा के उस दल में अहम भूमिका थी जिसने ‘क्यूरियासिटी’ रोवर को भेजा था। (एजेंसी) sabhar : http://zeenews.india.com

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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

'प्रतिरोधक तंत्र' से ही होगा कैंसर का इलाज :जेम्स गैलाघर

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अमरीकी शोधकर्ताओं ने कैंसर से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली में बदलाव करने का तरीका खोज लिया है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली बेहद संवेदनशील होने के साथ संतुलित होती है, जो शरीर में घुसपैठ करने वाले विषाणुओं और रोगाणुओं से लड़ती है, लेकिन वह शरीर के अपने उत्तकों यानी टिशूज़ से नहीं लड़ती.

शोध का यह नतीजा ‘नेचर मेडिसिन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.फिलाडेल्फिया के बाल अस्पताल के शोधकर्ताओं को जानवरों पर किए गए अध्ययन से पता चला है कि प्रतिरोधक प्रणाली के संतुलन में बदलाव करने से कैंसर का एक नया इलाज ढूंढ़ा जा सकता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक जब रोग प्रतिरोधक प्रणाली शरीर के ही उत्तकों पर असर करने लगती है तो कई गंभीर बीमारियां जैसे टाइप 1 डायबिटीज हो जाती है.

ट्रेग सेल्स शोध का एक नया क्षेत्र

दरअसल, ट्रेग सेल्स कैंसर और ऑटोइम्यून डिजीज में शोध का एक नया और चर्चित क्षेत्र है. ऑटोइम्यून डिजीज का संबंध उन बीमारियों से है, जो रोग प्रतिरोधक प्रणाली से ही शरीर के अंदर के ऊतकों के नष्ट होने के कारण होती हैं.
यह रोग प्रतिरोधक प्रणाली का हिस्सा है. प्रतिरोधी प्रणाली सामान्य तौर पर शरीर को बाहरी हमलों से बचाती है.
शोधकर्ताओं ने प्रतिरोधी प्रणाली को प्रभावी तरीके से नियंत्रित कर ट्रेग फंक्शन को तितर-बितर करने की कोशिश की.
इस अध्ययन के हिस्सा रहे शोधकर्ता डॉ. वायने हैंकॉक ने कहा, ‘हमें ट्रेग फंक्शन को इस तरह से तितर-बितर करने की जरूरत थी जिससे कि वह ऑटोइम्यून रिएक्शन किए बिना एंटी ट्यूमर एक्टीविटी करे.’

दो स्थितियों में किया गया शोध

शोधकर्ताओं ने दो स्थितियों में शोध किए. पहली स्थिति में उन्होंने उन चूहों पर शोध किया जिनमें ट्रेग के लिए ज़रूरी रसायन नहीं था, जबकि दूसरी स्थिति में उन्होंने एक ऐसी दवा का इस्तेमाल किया जो एक सामान्य चूहे में सामान प्रभाव डालता था.
इन दोनों शोध में प्रतिरोधी प्रणाली में बदलाव के कारण फेफड़े के कैंसर में वृद्धि को रोकने में सफलता मिली.
डॉ. हैंकॉक ने कहा, "इससे सही मायने में एक ऐसे नए क्षेत्र ‘कैंसर इम्यूनोथेरेपी’ की ओर बढ़ा जा सकता है जिसमें काफी संभावनाए हैं."
हालांकि, कैंसर के मरीजों के इलाज में इस प्रणाली के इस्तेमाल में अभी काफी समय लगेगा. 

sabhar :जेम्स गैलाघर
स्वास्थ्य और विज्ञान संवाददाता, बीबीसी न्यूज  http://www.bbc.co.uk

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सोमवार, 5 अगस्त 2013

अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

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अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

क्‍या अंतरि‍क्ष में रहना संभव है। वहां न तो सांस लेने के लि‍ए हवा है और न ही पीने के लि‍ए पानी। इसके बावजूद वैज्ञानि‍कों का मानना है कि एक दि‍न वह ऐसा संभव कर दि‍खाएंगे। इसके लि‍ए आज से नहीं बल्‍कि तकरीबन चार दशक पहले से ही शोधकार्य चल रहा है। कई सारे वैज्ञानि‍कों ने इसका ब्‍लूप्रिंट भी तैयार कि‍या है। इन ब्‍लूप्रिंट के सहारे वह सोचने पर मजबूर करते हैं कि एक दि‍न अंतरि‍क्ष में जीवन संभव होगा। ये जीवन मशीनों के सहारे संभव होगा। नासा 1975 से इस बारे में शोध कर रहा है। इसके अलावा स्‍टैनफोर्ड वि‍श्‍ववि‍द्यालय में इस बारे में रि‍सर्च चल रही है। बताया जा रहा है कि यह रि‍सर्च अगर कामयाब हो गई तो अंतरि‍क्ष में 10 से 14 हजार लोग एक ही मशीनी कालोनी में रह सकेंगे। 
 अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें
अंतरि‍क्ष में गुरुत्‍वाकर्षण की भी समस्‍या है। अंतरि‍क्ष यानों में अक्‍सर व्‍यक्‍ति हवा में तैरते हुए देखे जाते हैं क्‍योंकि वहां पहुंचने पर गुरुत्‍वाकर्षण न होने की वजह से उनके पैर टि‍क नहीं पाते हैं। इस समस्‍या का भी इलाज खोजा गया। 

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अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें
इस कालोनी में पृथ्‍वी की तरह गुरुत्‍वाकर्षण होगा। इसके लि‍ए यह कालोनी एक मि‍नट में एक बार घूमेगी जि‍ससे कि आर्टीफीशि‍यल गुरुत्‍वाकर्षण पैदा होगा। इससे उसमें रहने वाले लोगों के पैर टि‍के रहेंगे और वह जि‍स सामान्‍य तरीके से पृथ्‍वी पर चलते फि‍रते हैं, उसी तरह से वहां भी चलेंगे फि‍रेंगे। 



अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

जीवन के लि‍ए जि‍तनी जरूरी हवा और पानी है, उतना ही जरूरी सूर्य का प्रकाश भी है। इस समस्‍या का भी समाधान स्‍टैनफोर्ड वि‍श्‍ववि‍द्यालय और नासा में चल रही रि‍सर्च में खोजने की कोशि‍श की गई है। इसके लि‍ए इसमें खास तरह के शीशे लगाए जाएंगे। यह शीशे एक खास एंगल पर लगेंगे जो सूर्य के प्रकाश को प्राकृति‍क तरीके से इस मशीन में लेकर आएंगे। 

अंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें


कोशि‍श की जा रही है कि इस मशीनी कालोनी के अंदर रहने वालों को पूरी तरह से पृथ्‍वी जैसा प्राकृति‍क माहौल मि‍ले। वहां पेड़ पौधे तो होंगे ही, छोटे मोटे झरने जैसे भी डि‍जाइन कि‍ए गए हैं। 

Iअंतरि‍क्ष की इस कालोनी में रहेंगे 10 हजार लोग, देखि‍ए तस्‍वीरें

sabhar : www.bhaskar.com 





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रविवार, 4 अगस्त 2013

नई रोशनी लाएंगे स्टेम सेल

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स्टेम कोशिकाओं की मदद से आने वाले दिनों में इंसान में दृष्टिहीनता पूरी तरह ठीक किए जाने की संभावना है. ब्रिटिश वैज्ञानिकों को चूहों में ऐसा करने में सफलता मिली है.
एक नए शोध में कहा गया है कि यह रेटिना की बीमारियों के इलाज में एक अहम कदम है. वैज्ञानिकों ने इसके लिए चूहे के भ्रूण से मूल कोशिकाएं ली. शुरुआती स्टेज वाली इन कोशिकाओं को फिर प्रयोगशाला में इस तरह से कल्चर किया ताकि वे अपरिपक्व फोटोरिसेप्टरों में तब्दील हो जाएं. फोटोरिसेप्टर रेटिना में रोशनी पकड़ने वाले सेल्स होते हैं.
इसके बाद इस तरह की करीब दो लाख कोशिकाओं को चूहे के रेटिना में डाला गया. इनमें से कुछ आंखों की कोशिकाओं में ढल गए और दृष्टि लाने में सफल रहे. आंखों की रोशनी में कितना फर्क पड़ा है, इसे वॉटर मेज परीक्षण से देखा गया. साथ ही ऑप्टोमैट्री की मदद भी ली गई.   
फोटोरिसेप्टरों के खत्म होने से रेटिनाइटिस पिगमेंटोजा और उम्र बढ़ने के साथ आंखों की मांसपेशियों के खराब होने की बीमारी एएमडी होती है. ब्रिटेन के मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने एक प्रेस रिलीज में कहा, "भ्रूण की मूल कोशिकाओं से आने वाले दिनों में अनगिनत फोटोरिसेप्टर बनाए जा सकेंगे जिन्हें दृष्टिहीन लोगों के रेटिना में प्रत्यारोपित किया जा सकेगा."
स्टेम सेल ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और कंपनियों में भारी रुचि जगाई है क्योंकि उम्मीद बढ़ी है कि इनसे टिशू बनाए जा सकते हैं. कुछ समस्याएं भी हैं, जैसे इन कोशिकाओं को सुरक्षित तरीके से विशेष कोशिकाओं में ढालना ताकि वह कैंसर वाली कोशिकाएं न बन जाएं. यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थेल्मोलॉजी के रॉबिन अली की टीम ने पता लगाया है कि अंधे चूहों की दृष्टि तब लौट सकती है जब उनमें स्वस्थ चूहों से लिए गए रॉड सेल प्रत्यारोपित किए जाएं.
ताजा रिसर्च इसलिए और अहम हो जाती है क्योंकि प्रत्यारोपित कोशिकाओं में दृष्टि के लिए जरूरी अलग अलग नर्व सेल्स हैं और उन्हें दूसरे जानवरों से नहीं लिया गया है. उन्हें लैब में बड़ा किया गया और नई तकनीक के जरिए उन्हें सही कोशिकाओं में तब्दील किया गया. जापानी तकनीक से बनी ये कोशिकाएं इसके बाद रेटिना के आकार में ढल गई.
रॉबिन अली ने बताया, "हाल के सालों में वैज्ञानिक बहुत सहजता के साथ स्टेम सेल पर काम कर रहे हैं और उन्हें अलग अलग तरह की वयस्क कोशिकाओं और ऊतकों में बदल पा रहे हैं. लेकिन काफी लंबे समय तक रेटिना की जटिल संरचना को प्रयोगशाला में बना पाना मुश्किल था. बनाई गई कोशिकाएं विकास की प्रक्रिया में खुद को सही तरीके से नहीं ढाल पा रही थी जो कि सामान्य भ्रूण में हो जाता है. अब अगला कदम होगा कि इस प्रक्रिया को मानवीय कोशिकाओं के साथ किया जाए और इसके क्लीनिकल ट्रायल शुरू हों."
पिछले महीने ही जापान में मानवीय स्टेम सेल के इस्तेमाल की सहमति दी गई थी. इस नए शोध का उद्देश्य है आंखों की एएमडी के लिए प्लरिपोटेंट स्टेम सेल या आईपीएस का इस्तेमाल कर इलाज विकसित करना.
एएम/एमजे (डीपीए)

 sabhar : DW.DE





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अंतरिक्ष में अकेलेपन का साथी बनेगा बोलने वाला रोबोट

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जापान ने दुनिया का पहला बोलने वाला रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा है. इस रॉकेट को अंतरिक्षयात्री कोचि वकाटा के साथी के रूप में अंतरिक्ष में भेजा गया है. वकाटा का अंतरिक्ष अभियान नवंबर से शुरू होगा.
किरोबो नाम के इस रोबोट को अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) में काम कर रहे अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सामान लेकर जा रहे एक अनाम रॉकेट से अंतरिक्ष भेजा गया.

13 इंच के किरोबो ने जापान के तानेगाशिमा द्वीप से उड़ान भरी. वह 9 अगस्त को आईएसएस पहुंच जाएगा.
किरोबो एक शोध का हिस्सा है जिसके तहत यह देखा जाना है कि लंबे समय तक अकेले रहने वाले लोगों को मशीनें किस तरह से भावनात्मक सहारा दे सकती हैं.
एच-2बी रॉकेट के लॉंच का जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेन्सी (जाक्सा) द्वारा सीधा प्रसारण किया गया.
यह अनाम रॉकेट आईएसएस पर काम कर रहे छह स्थाई कर्मचारियों के लिए पीने का पानी, खाना, कपड़े और काम के उपकरण लेकर गया है.
किरोबो नाम “क्लिक करेंउम्मीद” और “रोबोट” के लिए जापानी शब्दों से बनाया गया है.

बड़ी छलांग

इस छोटे से क्लिक करेंमानवरूपी रोबोट का वज़न करीब एक किलो है और यह कई तरह की शारीरिक हरकतें कर सकता है. इसके डिज़ाइन की प्रेरणा मशहूर एनिमेटेड कैरेक्टर एस्ट्रो बॉय से ली गई है.
किरोबो को जापानी में बात करने के लिए तैयार किया गया है. वह वटाका के साथ होने वाली अपनी बातचीत का रिकॉर्ड भी रखेगा.
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किरोबो मशीन और आदमी के बीच मध्यस्थ के रूप में काम करेगा और कंट्रोल रूम से मिलने वाले संदेश अंतरिक्षयात्री को देगा
वटाका इस साल आईएसएस के कमांडर का पदभार संभालेंगे.
इसके अलावा किरोबो कंट्रोल रूम से मिलने वाले संदेश भी अंतरिक्षयात्री को देगा.
इस रोबोट को बनाने वाले टोमोटाका टाकाहाशी के अनुसार, “किरोबो वटाका के चेहरे को याद रखेगा ताकि जब वह अंतरिक्ष में मिलें तो वह उन्हें पहचान सके.”
वह कहते हैं, “मैं उम्मीद करता हूं कि यह रोबोट एकक्लिक करेंआदमी और मशीन के बीच मध्यस्थ का काम करेगा. या फिर एक आदमी और इंटरनेट के बीच और कभी-कभी आदमियों के बीच भी.”
टाकाहाशी कहते हैं कि सबसे मुश्किल काम रोबोट को अंतरिक्ष में काम करने योग्य बनाना था.
नौ महीने से ज़्यादा समय तक किरोबो की विश्वसनीयता को परखने के लिए उस पर दर्जनों परीक्षण किए गए.
किरोबो का एक जुड़वा रोबोट मिराटा धरती पर है. वह अपने जोड़ीदार में अंतरिक्ष में होने वाली किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गड़बड़ी
पर नज़र रखेगा.
पिछले महीने अभियान के दौरान मिराटा ने कहा था, “मेरे लिए यह एक छोटा कदम है लेकिन रोबोटों के लिए यह एक बड़ी छलांग है.”
यह रोबोट टाकाहाशी, कार निर्माता टोयोटा और विज्ञापन कंपनी डेन्ट्सू का एक संयुक्त क्लिक करेंउद्यम है. sabhar : www.bbc.co.uk

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इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

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इंजीनियरों ने शुरू किया मोबाइल आधारित टीवी चैनल

तिरअनंतपुरम : इंजीनियरिंग स्नातकों के एक समूह ने यहां एक ऐसा टीवी चैनल शुरू किया है जिसे मोबाइल फोन के जरिए देखा जा सकता है। यह चैनल स्थानीय समाचारों एवं घटनाओं को प्रोत्साहित करेगा।

समूह के संस्थापकों में से एक अरविंद जीएस ने यहां संवाददाताओं को बताया कि ‘वी 4 यू’ नाम का यह चैनल राजधानी शहर से पहला 2जी, 3जी मोबाइल टीवी चैनल है।

उन्होंने कहा कि दर्शक इस अनूठे चैनल को अपने मोबाइल फोन से दुनिया में कहीं भी देख सकते हैं। चौबीस घंटे का यह चैनल जावा और एंड्रायड जैसे सभी प्लेटफार्मों पर काम करेगा। दर्शक मामूली शुल्क देकर इस चैनल का लाभ उठा सकते हैं। (एजेंसी) sabhar :http://zeenews.india.com

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