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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

कपड़े जो राह दिखाएंगे और ना गुम होंगे

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मचीना ऐसी जैकेट बना रही हैं जिससे संगीत पैदा किया जा सके
चेन्नई में इंजीनियरिंग छात्राओं ने छेड़खानी करने वालों को क्लिक करेंकरंट मारने वाले अंतर्वस्त्रबनाए तो ज़्यादातर लोगों को पहली बार पता चला कि तकनीक का इस्तेमाल कपड़ों में कितने काम का हो सकता है.
लेकिन दुनिया भर में पहनने योग्य तकनीक को लेकर कई तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं.

कंपनी की सह संस्थापक लिंडा मचीना कहती हैं, “हम एक कार्यक्रम में गए और देखा कि एक व्यक्ति सिर्फ़ कंप्यूटर से संगीत बजा रहा था.”कैलिफ़ोर्निया की एक नई कंपनी मचीना मेक्सिकन कारीगरों का इस्तेमाल कर एक ऐसी जैकेट तैयार कर रही हैं जो संगीत पैदा कर सके.
व कहती हैं, “हमने सोचा कि ऐसी चीज़ बनाई जाए जिससे संगीतकार अपने शरीर का इस्तेमाल कर ही संगीत पैदा कर सके.“

जैकेट से संगीत

उनकी जैकेट में कपड़ों के नीचे चार लचीले सेंसर हैं. एक एक्सलेरोमीटर मीटर है जो आपकी बांह की हरकत को भांप लेता है. एक जॉयस्टिक है और चार दबाने वाले बटन हैं.
पहनने वाले की ज़रूरत के अनुसार सेंसर और बटन जैसे चाहे लगाए जा सकते हैं. यह एक इंटरफ़ेस सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर या मोबाइल फ़ोन से जुड़े होते हैं.
मचीना कहती हैं, “यह शुरुआती स्तर पर है. हम एक किराए का स्टोर भी बना रहे हैं जो यूज़र्स को अपने निजी प्राथमिकताएं और अपने कार्यक्रम अपलोग करने की सुविधा देगा.
मचीना के अनुसार, “अगर आप इसे अपने आईपॉड को नियंत्रित करने, वीडियो मिक्स करने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं तो अतिरिक्त सेंसर जोड़िए या फिर ऐसी ‘हरकत’ को किराए पर ले लीजिए, जिससे आप यह कर पाएं.”
वह यह भी कहती हैं, “हमारे सारे कोड मुफ़्त में उपलब्ध होंगे.”
कंपनी इसमें कुछ और बदलाव करने की सोच रही है. जैकेट के इस साल के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है.

महसूस कीजिए आवाज़

सुनने से लाचार लोगों को मदद करेगी यह जैकेट
संगीत पैदा करने वाली जैकेट शायद ही सुनने से लाचार लोगों को आकर्षित कर पाए. लेकिन उनके लिए एक दूसरा अविष्कार भी है.
फ़्लटर नाम की ड्रेस को कोलोरेडो विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा हैली प्रोफ़िटा ने ईजाद किया है.
वह बताती हैं, “इस ड्रेस में माइक्रोफ़ोन का एक जाल है जो आवाज़ों को सुनता है. ये सूक्ष्म नियंत्रण प्रणाली से जुड़े होते हैं जो यह तय करती हैं कि आवाज़ किस दिशा से आई थी.”
“एक बार यह तय कर लेती है कि आवाज़ किस दिशा से आई थी तो वह कंपन के माध्यम से सूचना दे देती है. अगर आपको पीछे देखना है तो ऐसा लगेगा कि कोई पीछे से आपके कंधे को थपथपा रहा है.”
इसका अहसास वैसा ही होता है जैसा मोबाइल फ़ोन के कंपन का.
वो कहती हैं, “इसके पहले हमने ऐसे उत्पाद बनाए जिन्हें लोग इसलिए पहनना नहीं चाहते क्योंकि वह ख़राब दिखते हैं और वह व्यक्ति की अक्षमता की ओर ध्यान खींचते हैं.”
प्रोफ़िटा पहने जाने योग्य तकनीक को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वो कहते हैं कि यह न सिर्फ़ पहनने वाले का जीवन स्तर बेहतर बनाते हैं बल्कि इन्हें सुंदर भी बनाया जा सकता है.
फ़्लटर अभी शोध के स्तर पर ही है. प्रोफ़िटा को उम्मीद है कि जल्दी ही इसका इंसानों पर प्रयोग किया जा सकेगा.
भविष्य के डिज़ाइनों में इसमें सुनने के उपकरण भी शामिल किए जा सकते हैं.

जैकेट बताएगी अपना पता

एशर लेवाइन अपने महंगे कपड़ों में ब्लूटूथ लगा रहे हैं
और आखिर में चर्चा उस प्रयोग की जिसके ज़रिए कपड़ें ही आपको ढूंढने या संपर्क करने की क्षमता रखेंगे.
एशर लेवाइन न्यूयॉर्क फ़ैशन हाउस के मालिक हैं. वो लेडी गागा, बियोन्स, ब्लैक आइड पीज़ जैसे संगीत स्टारों के कपड़े डिज़ाइन करते हैं.
वो भी अपने काम में तकनीक का समावेश करना पसंद करते हैं. अपने 2012 फ़ॉल/विंटर कलेक्शन में उन्होंने मेकरबोट के साथ मिलकर थ्रीडी-प्रिंटिड ग्लासेस पेश किए थे.
ब्लूटूथ के इस्तेमाल के लिए इस साल, 2013, में उन्होंने एक नई कंपनी फ़ोन हालो से हाथ मिलाया है.
एशर कहते हैं, “मेरे कई दस्ताने खो चुके हैं. इसलिए मैं अपने बेहतरीन उत्पाद में इसे लगाने के पक्ष में हूं. क्योंकि कई बार हमारे उत्पाद इतने महंगे होते हैं कि कपड़ों पर बहुत सा पैसा खर्च करने वालों को भी यह महंगे लगते हैं.”
अगर आप चिप लगी वस्तु से दूर जाते हैं तो एशर का ‘ट्रैकआर ऐप’ अलार्म बजा देता है. अगर आप इसके बाद भी अपने पसंदीदा जैकेट को छोड़ जाते हैं तो यह आपको एक टेक्स्ट मैसेज, ईमेल या फ़ेसबुक मैसेज भेज देता है. इसमें सामान के जीपीएस कॉर्डिनेट्स होते हैं जिनके आधार पर आप गूगल मैप से अपना सामान ढूंढ सकते हैं. sabhar : bbc.co.uk

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पहनने वाली तकनीक से बदलेगी दुनिया?

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गूगल ग्लास से पहले की दुनिया की ऐसी नहीं थी, जैसी अब हो गई है.
इस ग्लास के इस्तेमाल से आप फोटो ले सकते हैं, मैसेज भेज सकते हैं. इससे दिशा का पता चल सकता है और दूसरी तमाम चीजें भी कर सकते हैं.

क्लिक करें
ऐसे में वाकई में गूगल ग्लास अविश्वसनीय चीज है.
गूगल ग्लास उन पहनने वाली तकनीकों में शामिल है जिसके जरिए माना जा रहा है कि आम लोगों का जीवन बदल सकता है.
हालांकि इस मुद्दे पर अभी बहस जारी है कि कंप्यूटर और इंसानों के नजदीकी बढ़ने से किस तरह के सकारात्मक बदलाव होंगे, इन तकनीकों के बाज़ार और कारोबार के बारे में ज़्यादा चर्चा देखने को नहीं मिलती.

'तकनीक से हैप्पी बर्थडे'

"कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है."
वेद सेन, प्रमुख, मोबिलिटी विभाग, कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन
हालांकि अभी वियरेबल टेक्नॉलॉजी (ऐसी तकनीक जिसे पहनना संभव होगा) के शुरुआती दिन हैं लेकिन ढेरों ऐसी कंपनियां हैं जो इसके कारोबार पर ध्यान देने लगी हैं.
अमरीकी क्लाउड टेक्नॉलॉजी कंपनी रैकस्पेस में हुए अनुसंधान से ये पता चला है कि अभी उनके कर्मचारियों के पास इन उपकरणों से महज छह फीसदी का ही कारोबार मिल पाया है.
लेकिन कॉग्निजेंट टेक्नॉलॉजी सोल्यूशन के मोबिलिटी विभाग के मुखिया वेद सेन के मुताबिक स्थिति में बदलाव होने वाला है.
गूगल ग्लास के प्रयोगों के दायरे को देखते हुए वे कहते हैं, “कल्पना कीजिए, एक शख्स बॉयलर को पकड़े हुए है, वह एक भारी उपकरण के नीचे है और उसे अपने हाथों के सहारे से उसे पकड़े रहना है, इसके बावजूद वह कंप्यूटिंग वातावरण में काम कर सकता है.”

कनेक्टिविटी से बदल जाएगी दुनिया

वेद सेन आगे कहते हैं कि एक सेल्स पर्सन के उदाहरण को देखिए, जो अपने किसी उपभोक्ता के दफ्तर में पहुंचता है और वहां उसे सारी सूचनाएं अपनी आंखों के सामने चाहिए. मसलन, कंपनी से अंतिम ऑर्डर क्या दिया था?, क्या वे इससे ख़ुश थे? या फिर उपभोक्ता का अंतिम जन्मदिन कब था?
ऐसी स्मार्ट तकनीकों का प्रयोग केवल चश्मे के तौर पर नहीं होगा.
सेन कहते हैं, “मान लीजिए कि मैं एक बड़े सुविधा केंद्र का मैनेजर हूं. मैं टहल रहा हूं. मेरे जूते में कोई चीज है. मैं एक उपकरण को इस्तेमाल करता हूं जो बता देता है कि वो चीज इस्तेमाल के लायक है या नहीं, या फिर आवाज़ के जरिए मुझे सूचित कर देते हैं.”
दरअसल इन स्मार्ट तकनीकों के सहारे इंसानों के आसपास से संपर्क कहीं ज्यादा मज़बूत हो सकता है. वेद सेन कहते है, “इससे हमारे चीजों को समझने की क्षमता बेहतर होगी.”
डेलॉइट के रिसर्च निदेशक डंकन स्टीवार्ट ने कहा कि वियरेबल टेक्नॉलॉजी से कारोबार की दुनिया पर काफी असर पड़ेगा. ख़ासकर उन क्षेत्रों में जहां दूसरी चीजें का स्तर कमतर है.
वे कहते हैं, “स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा.”
डंकन स्टीवार्ट कहते हैं, “कोई फोर्कलिफ्ट चला रहा हो तो वह पीसी और स्मार्टफोन का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि इससे टक्कर लगने का अंदेशा पैदा हो जाएगा. लेकिन कल्पना कीजिए वह फोर्कलिफ्ट को चलाते हुए ही कोई बॉक्स खोल ले और उससे अपने काम की चीज को बाहर निकाल ले.”

रिटेल कारोबार पर असर

उन्होंने तुलानात्मक तौर पर बताया है कि मोबाइल फोन के जरिए भुगतान से क्रांतिकारी बदलाव अफ़्रीका में देखने को मिल रहा है.
"स्मार्ट फोन और पर्सनल कंप्यूटर को बदलने पर असर नहीं होगा लेकिन जिन लोगों का संपर्क मोबाइल और लैपटॉप से नहीं है, उनके हाथों में इन तकनीकों के आने से काफी असर पड़ेगा."
डंकन स्टीवार्ट, रिसर्च निदेशक, डेलोइट
डंकन के मुताबिक लोगों के चेक और एटीएम तक पहुंच की सुविधा उपलब्ध नहीं लेकिन वे बड़े पैमाने पर ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं में वियरेबल तकनीकों का इस्तेमाल शुरू हो गया है. नाइके का फ्यूलबैंड ऐसी तकनीक है जो लोगों के शारीरिक गतिविधियों को मापती है.
उन गोलियों की बात भी हो रही है जिसको निगलने से ना केवल वह दवा का काम करेगी बल्कि वह शरीर पर होने वाली प्रतिक्रियाओं की निगरानी भी करेगी. रिटेल एनवायरनमेंट एक दूसरा क्षेत्र है जिसमें लाभ होने की उम्मीद की जा रही है.
वियरबेल तकनीक ग्राहकों को वैसा मौका उपलब्ध कराएगी जिससे वो उत्पादों के बीच तुलना कर पाएंगे. ठीक उसी तरह से जिस तरह से ऑनलाइन विशेष ऑफ़रों की पड़ताल होती है, लेकिन उन्हें अपनी आंखों के सामने इन उत्पादों के बारे में जानने को मौका मिलेगा.
डिजिटल कॉमर्स फर्म के वेंदू के निदेशक जेम्स क्रोनिन ने कहा कि कनेक्टेविटी बढ़ने से कारोबारी फायदा बढ़ेगा.
क्रोनिन कहते हैं, “निजीकरण के इस दौर में इससे उपभोक्ताओं और व्यापारियों को काफी फायदा होगा, पिछले कुछ सालों में ऑनलाइन कारोबार का चलन बढ़ा है.”
काग्निजेंट के वेद सेन के मुताबिक उपभोक्ताओं के लिए ये काफी फायदे का सौदा होगा जब वे किसी स्टोर में टीवी खरीदने जाएंगे और उन्हें टीवी की कीमतें, वारंटी और दूसरी तुलनात्मक चीजों के बारे में जानकारी मिल रही हो.
हालांकि वियरेबल टेक्नॉलॉजी के उपभोक्ताओं को टारगेट करने वाली कंपनियों को थोड़ी सावधानी भी बरतनी होगी.

निजता का सवाल

टेक्नॉलॉजी कंसलटेंसी एमेज के टुंडे कॉकशॉट कहते हैं, “वियरेबल उत्पाद अपनी प्रकृति में काफी व्यक्तिगत होते हैं.”
वे चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं, “वे मेरे बारे में सूचना और अनुभव एकत्रित करते हैं, जैसे शरीर, स्थान, वातावरण, गतिविधि, विजन और मेरी दिलचस्पी के बारे में. इस तरह की जानकारी और नितांत व्यक्तिगत अनुभव के दायरे को ब्रांड दखल नहीं दे सकती.”
वे कहते हैं, “उन्हें इस बात पर विचार करना होगा कि वे इस आंकड़े का इस्तेमाल किस तरह से करते हैं ताकि वे प्रासंगिक भी बना रहे और उपभोक्ताओं को सेवा भी दे पाए.”

हैकरों के निशाने पर

हालांकि नई तकनीक के चलते कई ऐसे मुद्दे हैं जिसके बारे में विचार करना होगा. हालांकि शुरुआती तौर पर ये महंगा भी होगा और इसमें मुश्किलें भी सामने आएंगी.
इसके अलावा दूसरी सामान्य मुश्किलें भी सामने आ सकती हैं- मसलन बैटरी का समाप्त हो जाना. इससे उन लोगों को काफी मुश्किल जो ऐसे उपकरणों पर निर्भर हो जाएंगे.
हालांकि इसमें प्राइवेसी और सुरक्षा का मसला जुड़ा है. अगर पहनने वाली तकनीकों के इस्तेमाल से ढेर सारी सूचनाएं प्राप्त हो सकेंगी तो फिर ये तकनीक हैकरों के निशाने पर होंगी.

हैकरों की कंपनी ट्रस्टवेव के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट निकोलस पेरकोको ने कहा, “अगर मैं एक हमलावर हूं तो मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन और उसके बारे में तमाम जानकारी हासिल करना चाहूंगी और इसके लिए मैं वियरेबल तकनीकों में सेंध लगाऊंगा.” sabhar : bbc.co.uk

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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

आखिर अंदर से कैसा होता है मस्तिष्क?

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अमरीका में वैज्ञनिक पहली बार मनुष्य के दिमाग का पूरा नक्शा जारी करने वाले हैं.
इस नक़्शे से इस बात को समझने में मदद मिलेगी कि क्यों कुछ लोग स्वाभाविक रूप से अधिक वैज्ञानिक सोच वाले, संगीत के रसिक या कलाप्रेमी होते हैं.

वैज्ञानिक मैसेच्यूसेट्स के जनरल अस्पताल में मौजूद दुनिया की सबसे ताकतवर ब्रेन स्कैनिंग मशीन से दिमाग का नक्शा तैयार करने में लगे हैं.हाल ही में कुछ चित्रों को अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस की एक बैठक में जारी किया गया.

इस स्कैनर को चलाने के लिए 22 मेगावाट बिजली की दरकार होती है. इतनी बिजली के साथ एक परमाणु पनडुब्बी बड़े ही आराम से चलती हैं.
अभी तक वैज्ञानिकों ने केवल 50 मनुष्यों के गहन स्कैन किए हैं .

दिमाग का स्कैन

"हम दिल का स्कैन कर के अच्छी तरह से बता सकते हैं कि वहां क्या चल रहा है या क्या गलत घट रहा है. कितना अच्छा होगा अगर हम दिमाग की इस तरह की तस्वीरे निकालें और लोगों को सलाह दे पायें कि उन्हें उनकी समस्या के लिए क्या करना है"
प्रोफ़ेसर वैन वीडीन
वैज्ञानिक क्लिक करेंदिमाग की बारीक नसों में मौजूद तरल का पीछा करते करते दिमाग की नसों के नक़्शे तैयार करते हैं.
नतीजे में वैज्ञानिकों के हाथ लगती हैं किसी दिमाग के भीतर मौजूद रास्तों के थ्री-डी नक़्शे.
इस परियोजना से जुड़े मुख्य वैज्ञानिकों में से एक प्रोफ़ेसर वैन वीडीन दिमाग के स्कैन चित्रों को देख कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मनुष्य का दिमाग कैसे काम करता है और तब क्या होता है जब कुछ गड़बड़ हो जाती है.
प्रोफ़ेसर वैन वीडीन कहते हैं, " हमारे सामने इतनी सारी मनोचिकित्सकीय समस्याएं हैं और इन्हें समझने के हमारे तौर तरीके सौ साल से वहीं के वहीं हैं."
प्रोफ़ेसर वीडीन के अनुसार, "हम दिल का स्कैन कर के अच्छी तरह से बता सकते हैं कि वहां क्या चल रहा है या क्या गलत घट रहा है. कितना अच्छा होगा अगर हम दिमाग की इस तरह की तस्वीरें निकालें और लोगों को सलाह दे पाएँ कि उन्हें उनकी समस्या के लिए क्या करना है."

ह्यूमन कनेक्टोम प्रोजेक्ट

अमरीकी नेतृत्व में चल रही इस परियोजना का नाम है " क्लिक करेंह्यूमन कनेक्टोम प्रोजेक्ट."
अपने पूर्ववर्ती ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्ट की तरह ही इस परियोजना के ज़रिए जुटाया गया तमाम डाटा सार्वजनिक कर दिया जाएगा ताकि दुनिया में कहीं भी वैज्ञानिक इसका परीक्षण कर सकें.
इस परियोजना में करीब चार करोड़ अमरीकी डॉलर या करीब 215 करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर खर्च आएगा. इस पूरी परियोजना में करीब 1200 अमरीकी लोगों के दिमागों का स्कैन किए जाने की योजना है.

"इस स्कैन परियोजना से यह भी साफ़ हो जाएगा की क्या वाकई अलग-अलग तरह के मनुष्यों के दिमाग भी अलग-अलग तरह के होते हैं"
डॉक्टर टीम बेन्हंस , ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
वैज्ञानिक पहले चरण के 80 से 100 लोगों के दिमागों का स्कैन जल्द ही जारी करने वाले हैं. इस काम में करीब पांच साल का वक़्त लगेगा.

सोच का नक्शा

इस परियोजना पर काम कर रहे वैज्ञानिक स्कैन किए जाने वाले लोगों के अनुवांशिक और व्यवहार संबंधी डेटा को जमा करेंगे ताकि मनुष्य के अंतस का एक खाका तैयार किया जा सके.
मनुष्य के क्लिक करेंदिमाग की वायरिंग का डायग्राम किसी इलेक्ट्रौनिक यंत्र की वायरिंग से अलग होता है क्योंकि मनुष्य के हर अनुभव के साथ यह बदल जाती है . एक तरह से यह मनुष्य ने क्लिक करेंक्या और कैसे किया है इसका नक्शा भी होता है.
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के डॉक्टर टीम बेन्हंस का कहना है, "इस स्कैन परियोजना से यह भी साफ़ हो जाएगा की क्या वाकई अलग-अलग तरह के मनुष्यों के दिमाग भी अलग-अलग तरह के होते हैं."
डॉक्टर टीम बेन्हंस ने बीबीसी को बताया, "मनुष्य के दिमाग के हिस्सों के आपस में कनेक्शन अलग-अलग तरह के मनुष्यों में अलग-अलग होते हैं. इनको अगर हम समझ सकें तो हम जान लेंगे कि क्यों कुछ लोग अधिक मोल लेते हैं जबकि कुछ अन्य लोग संभल के चलते हैं."
इस परियोजना से जुड़े प्रोफ़ेसर स्टीव पीटरसन ने अपना पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित कर रखा है कि दिमाग के कौन से हिस्से मनुष्य को वैज्ञानिक सोच देते हैं और मनुष्य अपने दिमाग में जानकारी को कैसे संभाल कर रखता है.

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दक्षिण कोरिया ने बनाए पेट्रोल-उत्पादक जीवाणु

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दक्षिण कोरिया ने बनाए पेट्रोल-उत्पादक जीवाणु

दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने संसार में सबसे पहले ऐसे जीवाणु पा लिए हैं जो पेट्रोल बना सकते हैं|

देश के विज्ञान, सूचना-संचार प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक प्राक्कल्पना मंत्रालय ने यह बताया है|
कोरियाई अग्रणी विज्ञान और टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट में विकसित ये जीवाणु ग्लूकोज़ “खाते” हैं और बदले में देते हैं पेट्रोल| प्रयोगों के दौरान ऐसे जीवाणुओं वाले एक लीटर घोल से 580 मिलीग्राम ईंधन प्राप्त हुआ|
यह ईंधन आम पेट्रोल से थोड़ा भिन्न है तो भी इसका व्यापक उपयोग हो सकता है, सूचना में कहा गया है
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_09_30/DKoriya-petrol-jivanu/

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शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

जीने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा

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जीने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा

संयुक्त राष्ट्र संघ का खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि मानवजाति को भुखमरी से बचने के लिए सर्वभक्षी बनना होगा| इस संगठन के विशेषज्ञों का कहना है कि कीट-पतंगे ही भविष्य में मनुष्य का प्रमुख आहार होंगे|

पिछले कई दशकों से संसार खाद्य-पदार्थों की कमी को लेकर चिंतित है| कृषि-उत्पादन में ऐसी “आनुवंशिक-संशोधित” किस्मों के, जिन पर किसी तरह के हानिकारक कीटों और रोगों का कोई प्रभाव नहीं पडता, उपयोग को लेकर बहुत वाद-विवाद होता रहा है| अब हवा के एक नया रुख चला है| एफ.ए.ओ. के विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोटीन का पृथ्वी पर एक प्रचुर स्रोत है जिसकी ओर लोगों ने ध्यान नहीं दिया है – ये हैं कीट-पतंगे| इनका पालन कृषि की एक प्रमुख शाखा बन सकता है| आज तो ऐसी बातें कपोल-कल्पना ही लगती हैं, किंतु ये जीवन का यथार्थ बन सकती हैं, रूसी आयुर्विज्ञान अकादमी के आहार संस्थान के डायरेक्टर विक्टर तुतेल्यान कहते हैं:
“हमें सदा आहार के नए स्रोतों की, नई टेक्नोलोजी की खोज करते रहना चाहिए| आहार की समस्या विकासशील देशों की ही नहीं, सारी मानवजाति की समस्या है| इस समस्या का एक संभव हल है – मनुष्य के आहार में कीट-पतंगों का उपयोग| उनसे भी वही प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट मिलते हैं| एक जैविक प्रजाति के नाते मनुष्य के लिए इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता कि उसे ये पौष्टिक पदार्थ कहाँ से मिलते हैं| अभी तीस साल पहले तक रूस में किसी ने सीप-मांस चखा तक नहीं था, जो फ्रांस में एक लज़ीज़ चीज़ मानी जाती है| और अब यह रूस में काफी लोकप्रिय है|”
विक्टर तुतेल्यान के मत में न केवल पूर्वी एशिया में बल्कि संसार के दूसरे भागों में भी कीट-पतंगों से बना भोजन प्रचलित हो सकता है|
“खाद्य-पदार्थ के, आहार के स्रोत के नाते कीट-पतंगे इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं? एक तो उनकी गिनती बड़ी तेज़ी से बढती है| दूसरे आधुनिक औद्योगिक विधियों से उन्हें बिना किसी स्वाद वाले “गूदे” में बदला जा सकता है और फिर उन्हें ऐसा रूप-रंग दिया जा सकता है जिससे खानेवाले को लगेगा कि वह सामान्य सामिष या मत्स्य भोजन खा रहा है|”
वैसे कुछ विशेषज्ञों का यह मानना है कि कुछ प्रकार के कीटों को बड़े पैमाने पर पालने का काम तो अभी से शुरू कर देना चाहिए| जीवविज्ञानी अलेक्सेई शिपीलोव का कहना है कि बड़े पैमाने पर मधुमक्खियों को पालना बहुत ज़रूरी है:
“एक सिद्धांत यह भी है कि जिस दिन धरती पर मधुमक्खियां नहीं रहेंगी, समझ लेना उसके तीन-चार साल बाद मानव का भी अस्तित्व नहीं रहेगा| क्योंकि पृथ्वी पर कुछ भी पैदा नहीं होगा| आजकल सारी दुनिया में मधुमक्खियों की गिनती तेज़ी से घट रही है| इसका एक कारण मोबाइल फोनों का प्रचलन बढ़ना बताया जा रहा है| बात यह है कि मधुमक्खियां पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों की मदद से अपने छत्तों तक लौटने का रास्ता ढूँढती हैं| मोबाईल फोनों से चुम्बकीय विकिरण होता है जिसके कारण वे अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाती हैं और मारी जाती हैं\”
 अनेक कीटों में प्रोटीन और लाभदायक वसाओं की मात्रा काफी अधिक होती है साथ ही विभिन्न खनिज पदार्थों, जैसे कि कैल्शियम, लौह, जिंक आदि की भी| एफ.ए.ओ. के विशेषज्ञों का कहना है कि मांस में जहां सौ ग्राम सूखे वज़न के पीछे लौह की मात्रा 6 मिलीग्राम होती है, वहीं टिड्डी में 8 से 20 मिलीग्राम तक| ऐसा अनुपात उस सामिष आहार के पक्ष में नहीं है जिसका मनुष्य आदी है| कौन जाने पारंपरिक पालतू जानवरों के सामिष भोजन का स्थान कीट-पतंगों से बना सामिष भोजन ले ले| sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2013_05_19/jiinaa-sarvabhakshi-banna/

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महाकाल को मानव कैसे जीतेगा?

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महाकाल को मानव कैसे जीतेगा?

क़रीब 2 अरब 80 करोड़ साल बाद सूरज बूढ़ा और पुराना हो जाएगा और वह सड़ने लगेगा यानी वह

क़रीब 2 अरब 80 करोड़ साल बाद सूरज बूढ़ा और पुराना हो जाएगा और वह सड़ने लगेगा यानी वह फूलना शुरू हो जाएगा और एक विशाल लाल आग के गोले में बदल जाएगा। सूरज में होने वाले इन बदलावों का पृथ्वी पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा । ज़मीन पर गर्मी इस बुरी तरह से बढ़ जाएगी कि जीवन पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा। एक भी जीव-जन्तु इस धरती पर बाक़ी नहीं रहेगा। वैसे तो एक अरब 80 करोड़ साल बाद ही पृथ्वी पर रहने वाले जीव-जन्तु और मनुष्य ख़त्म हो जाएँगे, लेकिन पानी में रहने वाले तरह-तरह के जीवाणु और कीटाणु तथा ज़मीन के भीतर गहराई में रहने वाले जीव फिर भी बचे रह जाएँगे।
यह भविष्यवाणी उन ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने की है, जो पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के लुप्त होने की प्रक्रिया का क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन कर रहे हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने न सिर्फ़ सूर्य की गरमी बढ़ने से पृथ्वी पर होने वाले बदलावों का अध्ययन किया है, बल्कि उन्होंने यह भी देखा है कि यदि अंतरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में कोई बदलाव होता है तो उसका पृथ्वी के जीवों पर क्या असर पड़ेगा।
नक्षत्रशास्त्री यह जानते हैं कि सूरज की तरह के सितारे आख़िर में विशालकाय लाल गोलों में बदल जाते हैं और उनमें होने वाला बदलाव हमेशा इसी ढंग से होता है। जब हमारा सूरज आग के लाल विशालकाय गोले में बदलेगा तो उसका आकार बीसियों गुना बढ़ जाएगा और उसकी धूप की झलक भी पीली नहीं बल्कि लाल दिखाई देगी। सूरज जब फूलकर बुध और शुक्र ग्रहों को निगलकर पृथ्वी के महासागरों का पानी सुखा देगा, उससे बहुत पहले ही पृथ्वी पर परिस्थितियाँ जीवन के लायक नहीं रह जाएँगी। मास्को विश्वविद्यालय की एक जीव-वैज्ञानिक येलेना वराब्योवा भी इस बात से सहमत हैं कि जीवाणु और कीटाणु ही हमारी पृथ्वी के अन्तिम वासी होंगे क्योंकि वे ही सबसे पहले पृथ्वी पर अवतरित भी हुए थे। सबसे पहले धरती पर उन्हीं का जन्म हुआ था। येलेना वराब्योवा ने कहा :
आज भी इस तरह के जीवाणुओं और कीटाणुओं की कमी नहीं है, जो गर्म पानी के जलाशयों और ख़ूब नमकीन पानी में रहते हैं। वैसे भी जीवाणु ऐसे जीव होते हैं, जो मानव के मुक़ाबले कठिन से कठिन जीवन-परिस्थितियों को भी झेलकर अपने अस्तित्त्व को सुरक्षित रखते हैं। हम आज यह कल्पना कर सकते हैं कि जब पृथ्वी पर जीवाणुओं के रूप में जीवन की शुरूआत हुई थी तो कैसी परिस्थितियाँ रही होंगी। तब न तो पेड़-पौधे ही थे और न ही दूसरी तरह की वनस्पतियाँ या जीव-जन्तु। इन जीवाणुओं से ही पृथ्वी पर जीवन की रचना हुई। इन जीवाणुओं के क्रमिक विकास से ही बाद में वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं और मानव-जीवन का विकास हुआ।
तो जीवाणु ही पृथ्वी पर लम्बे समय तक जिएँगे। लेकिन मानवजाति क्या करे? वह कहाँ जाए? जीव-वैज्ञानिक येलेना वराब्योवा ने कहा -- मंगल-ग्रह पर जाकर रहा जा सकता है... :
मंगल-ग्रह पर उसके ध्रुवीय क्षेत्र में ठोस बर्फ़ के रूप में पानी जमा है। गरमी बढ़ने पर यह पानी तरल रूप ग्रहण कर लेगा और नदियों के रूप में बहने लगेगा, तब मंगल पर भी जीवन फूट पड़ेगा। शायद मंगल ही वह जगह है, जहाँ जाकर, पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा होने पर मानवजाति अपना जीवन बचा सकती है।

लेकिन बाद में मानव को मंगल ग्रह से भी दर-बदर होना पड़ेगा यानी कहीं और जाना होगा। तब तक शायद मानवजाति को अन्तरिक्ष में उपस्थित दूसरे नक्षत्र-मंडलों की भी विस्तृत जानकारी हो जाएगी। कहीं न कहीं तो ऐसी परिस्थितियाँ होंगी ही, जहाँ जाकर आदमी रह सकेगा। बहुत से रूसी वैज्ञानिक भी अपने ब्रिटिश सहयोगियों की बातों से सहमत हैं। हाँ, वे उनके द्वारा बताई गई अवधि को कुछ संदेह की निगाह से देखते हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी जिन प्रक्रियाओं से गुज़रेगी, उन पर न सिर्फ़ सूरज पर बढ़ने वाली गर्मी का असर पड़ेगा या पृथ्वी की कक्षा में होने वाले बदलावों का असर पड़ेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि पृथ्वी की जलवायु और जीवमण्डल में उन प्रक्रियाओं की वज़ह से क्या बदलाव आएँगे। अभी से इसकी भविष्यवाणी करना बेहद कठिन है। हमारा विज्ञान आज, अभी तक इतना ज़्यादा विकसित नहीं हुआ है कि वह जीव-मंडल में आने वाले बदलावों में लगने वाले समय की भविष्यवाणी कर सके। वैसे भी बात सदियों-सहस्त्राब्दियों की नहीं, करोड़ों-अरबों वर्षों की हो रही है। sabhar :http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_11_10/mahakal-suraj/

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गूगल कम्पनी सभी को अमर कर देना चाहती है

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गूगल कम्पनी सभी को अमर कर देना चाहती है

आज आधुनिकतम चिकित्सा व्यवस्था और जैव तक्नोलौजी मानव के जीवन को लम्बा करने की दिशा में अनुसन्धान कर रही हैं।

पिछले दौर में ज़्यादा से ज़्यादा निजी कम्पनियाँ और निजी अनुसन्धान केन्द्र इस दिशा में काम कर रहे हैं। हाल ही में इण्टरनेट महाकम्पनी 'गूगल ने भी इसी दिशा में काम करना शुरू कर दिया है।
पिछले दिनों गूगल ने अपनी नई कम्पनी कैलिको का नाम सार्वजनिक किया है, जो मानव के स्वास्थ्य और सुख से जुड़ी समस्याओं की दिशा में काम करेगी। लेकिन गूगल की इस कम्पनी का मुख्य उद्देश्य जीवन को और लम्बा करने की सम्भावना का अध्ययन करना है।
फिलहाल गूगल कम्पनी ने अपनी अधिकांश योजनाओं को गोपनीय रखा हुआ है। लेकिन पर्यवेक्षकों का ख़याल है कि यह नई कम्पनी बढ़ती उम्र के साथ पैदा होने वाली बीमारियों और कैंसर के क्षेत्र में अनुसन्धान करेगी। गूगल के निकटस्थ सूत्रों के अनुसार शुरू में 'कैलिको' में एक छोटी-सी टीम काम करेगी, जो कैंसर के ख़िलाफ़ संघर्ष करने के लिए नई तक्नोलौजी का विकास करेगी। sabhar : http://hindi.ruvr.ru
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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

भूल जाइए रोबोट, अब आ गया जीबोट

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दुबई में एक कमाल का जीबोट तैयार किया गया है जो उर्जा प्रबंधन के तौर तरीकों में भारी बदलाव लाएगा. यह हकीकी रोबोट तार और बिना तार दोनों नेटवर्कों की सहायता से काम करेगा.

पैसेफिक कंट्रोल्स नाम की कंपनी ने इस जीबोट को बनाया है. यह जीबोट शहर के पारिस्थिकी तंत्र का प्रबंधन करने वाली दुनिया की पहली कोशिश ‘गैलेक्सी’ के विकास का हिस्सा है.

शिकागो में समारोह में कंपनी के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिलीप राहुलान ने इस तकनीक का अनावरण किया  था

उन्होंने बताया, ‘प्रबंधित सेवाओं का नया स्तर है जीबोट. स्वचालित सेवाओं के विभिन्न नेटवर्कों में इन तेज, खुद से सीखने वाले सॉफ्टवेयरों को लगाया जाएगा.’ उन्होंने बताया कि दुनिया भर में गैलेक्सी की सराहना हुई है.

sabhar :.. http://aajtak.intoday.in

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रोबोट को जिंदा मशीन बनाने की तैयारी

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मनुष्य के रोमांच और खेल के लिए बैटरी लगा कर बने रोबोट्स के दिन अब लद गए. रोबोटिक्स विज्ञान और तकनीन में नई क्रांति हो रही है जिसे इवोल्यूशनरी रोबोटिक कहा जाता है. अब रोबोट्स का पालतू जानवर की तरह इस्तेमाल करने का विचार.
बीलेफेल्ड के रोबोटिक्स प्रोफेसर हेल्गे रिटर अपने जापानी सहयोगी मिनोरू असादा के साथ. चाइल्ड रोबोट सीबी2 प्रोजेक्ट के साथ.
सिर्फ पालतू बनाने का विचार ही नहीं बल्कि वे रोबोटों को पैदा करने की भी बात कर रहे हैं. इवोल्यूशनरी रोबोटिक की खासियत है कि इसके तहत रोबोट्स में मनुष्यों वाली विशेषताएं भी होंगी. रोबोट में इस्तेमाल होने वाली मशीनें डायनामिक होंगी, आस पास के वातावरण से खुद को एडजस्ट कर लेंगी, खुद को बदल सकेंगी, नकार कर सकेंगी. साथ ही अपने आप सीख सकेंगी, सहायता करेंगी, विकसित होंगी और जिंदा प्राणी या व्यक्ति की तरह खुद को विकसित कर सकेंगी.
गड़बड़ी के मारे
साल में एक बार रोबोट्स की चैंपियनशिप होती है जिसमें फुटबॉल, राहत ऑपरेशन और घर में काम आने वाले रोबोट्स एक दूसरे से भिड़ते हैं. रोबोटों की क्षमता दिखाने वाली ये प्रतियोगिताएं अक्सर रोबोटों में गड़बड़ी के कारण फेल हो जाती हैं.
एर्लोब नाम का जंगी रोबोट
मुश्किल यह है कि रोबोट के लिए सॉफ्टवेयर बनाने वाला प्रोग्रामर हर उस स्थिति के बारे में नहीं सोच सकता जो एक खेल के दौरान सामने आती हैं. स्टुटगार्ट यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रो टेकनीक और इन्फो टेकनीक के जानकार पॉल लेवी बताते हैं कि फुटबॉल मैच की संभावित स्थितियां तय कर ली जाती हैं. खिलाड़ियों को इन हालात को समझना होगा और इसके हिसाब से प्रतिक्रिया देनी होगी लेकिन यह इवोल्यूशनरी नहीं है.
रोबोट में इवोल्यूशन
इवोल्यूशनरी, यह शब्द रोबोटिक्स विज्ञान में काम करने वाले अलग अलग विभागों के लिए अहम शब्द है. उनका विचार है कि अगर रोबोट तकनीक में विकास का सिद्धांत आ जाए तो रोबोट अपने दम पर हल निकाल सकेंगे, ऐसा हल जो उनके सॉफ्टवेयर में नहीं डला होगा. यह काम कैसे संभव है, इस बारे में पॉल लेवी एक रोबोट का उदाहरण देते हैं जिसे चीज ढूंढनी है. रोबोट को यह अपने आप ढूंढना है. उसमें लगे कैमरे और तापमान मापने वाले यंत्र इसे नहीं ढूंढ सकेंगे. लेकिन रोबोट की सूंघने की ताकत इसमें काम आ सकती है. वह बताते हैं, "अगर यह जीने के लिए सबसे जरूरी है कि वे सूंघें तो हमें इसे शक्तिशाली बनाना होगा. मैं चीज तेजी से कैसे ढूंढू जो मेरे खाने की वस्तु है. ऐसा करने के लिए मुझे दूसरी खूबियां कम करनी होंगी क्योंकि उनकी हमेशा जरूरत नहीं है."
जीवित प्राणियों में प्राकृतिक इवोल्यूशन का आधार म्यूटेशन यानी उत्परिवर्तन है. इसका मतलब है आनुवांशिक धरोहर में गलतियों से भरे हुए बिलकुल छोटे छोटे बदलाव. पीढ़ी दर पीढ़ी यह बदलाव अपने आप आगे जाते हैं. इस तरह के बदलाव उत्तरजीविता या जीवित रहने के लिए लाभदायक अगर हों तो बदले हुए जीन लंबे समय तक रहते हैं.
बीलेफेल्ड यूनिवर्सिटी में रोबोट्स
प्रयोग दर प्रयोग
रोबोटिक्स के वैज्ञानिक इसके लिए एक प्रयोग कर रहे हैं. करीब सौ रोबोटो को चीज ढूंढने का काम मिलेगा. जीव विज्ञान में जो काम जिनोम का है वही रोबोटिक में सॉफ्टवेयर का है. लेकिन चुनौती से भरा काम है कि जीन प्राकृतिक तरीके से खुद को बदल लेता है लेकिन रोबोट में यह सॉफ्टवेयर को करना होता है. इस तरीके से अलग अलग तरीके के सॉफ्टवेयर विकसित होते हैं जो दूसरे से ज्यादा सफल होते हैं. उदाहरण के लिए किसी सॉफ्टवेयर में सूंघने की ताकत ज्यादा है तो किसी के कैमरे को पढ़ने की शक्ति ज्यादा, या कुछ रोबोट जो तेजी से चीज ढूंढ सकते हैं. तो वैज्ञानिक सभी के गुणों को मिला कर एक नया रोबोट बनाते हैं. "ट्यूबिंगन के जेनेटिक्स विशेषज्ञों ने वर्चुअल सेक्स का प्रयोग किया. सेक्स का मतलब हमारे लिए बिलकुल अलग है. लेकिन इस प्रयोग के तहत इन्फोर्मेशन या प्रोग्राम का लेन देन हुआ."
पैदा हुए रोबोटों के गुण
नए पैदा हुए रोबोट बेबी में मां रोबोट और पिता रोबोट के प्रोग्राम्स डाले गए. हर रोबोट के खास गुणों के कारण बेबी रोबोटों में भी अलग अलग गुण (सॉफ्टवेयर की खासियत) आए. लेकिन ये बेबी रोबोट अपने जनक से मिलते जुलते हैं. जैसे कि पर्यावरण की रक्षा के लिए काम करने वाले रोबोट में सूंघने की शक्ति भी काम करने लगी है.
इस मेकेनिज्म के तहत पालकों के गुण नए रोबोटों में मिलाए जाते हैं, जबकि प्राकृतिक उत्प्रेरण में एक और गुण होता है. उसमें बच्चों में ऐसे भी गुण या जीन विकसित होते हैं जो माता या पिता किसी में नहीं हैं. तो नए रोबोटों में सूंघने के सेंसर ताकतवर अगर हो गए हैं तो ऐसे भी रोबोट हो सकते हैं जिनमें सूंघने के अलावा तापमान महसूस करने के सेंसर भी विकसित हो जाएं. गलती से ही, लेकिन ऐसा हुआ है कि जिन रोबोटों में दो अन्य रोबोटों के गुण डाले गए, उनमें ऐसे गुण भी विकसित हो गए जो पेरेंट रोबोट्स में नहीं थे. इस तरह के उत्परिवर्तन अनजाने विकास में तब्दील हो सकते हैं, जिसके बारे में इंजीनियरों ने सोचा ही नहीं था.
सेब को नजाकत से पकड सकने वाले रोबोट
लेवी इस उत्परिवर्तन के बारे में समझाते हैं, "जीव विज्ञान में इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं. उत्परिवर्तन अपने संदेश भेजता और मान कर चलता है कि इनमें से तीस फीसदी वापस आ जाएंगे." इंजीनियरों को यह परेशान करता है. वे कहते हैं, "हम इस तरह से काम नहीं कर सकते है जब हम जानते हों कि हर बार तीस प्रतिशत का नुकसान हो जाएगा. लेकिन इवोल्यूशन में बहुत प्रयोगों और शोध के बाद बदलाव होते हैं जिन बदलावों से सबसे ज्यादा फायदा होता है उन्हें नियमों के तौर पर सेव कर लिया जाता है."
गलती बनाम सॉफ्टवेयर
प्रकृति में उत्परिवर्तन के लिए इंजीनियरों की जरूरत नहीं थी. इंजीनियरों की जगह छोटी छोटी गलतियां थी जिससे उत्परिवर्तन हुआ. प्रकृति में ही नहीं रोबोट की दुनिया में भी यह सिद्धांत काम कर रहा है. रोबोटों की पांच पीढ़ियों में मिश्रण किया गया है और सफल प्रोग्राम्स को आगे की पीढ़ी में डाला गया. इस कारण रोबोटों की क्षमता भी बढ़ गई है.
रिपोर्टः डॉयचे वेले/आभा मोंढे
संपादनः ए कुमार

sabhar :DW.DE

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बुधवार, 25 सितंबर 2013

जल्दी ही खुद के अंग विकसित कर सकेंगे आप

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वैज्ञानिकों के मुताबिक पांच साल के भीतर मानव अपने खुद के अंग जैसे जोड़, रीढ़ की हड्डी और हृदय आदि को विकसित कर सकेगा, जिससे बुजुर्ग लोग अधिक उम्र में भी स्वस्थ रह सकेंगे।लीड्स विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड बायलॉजिकल इंजीनियरिंग का एक दल इस परियोजना पर काम कर रहा है, जिसके तहत बुजुर्ग लोग अपने क्षतिग्रस्त जोड़ों और हृदय को फिर से विकसित कर सकेंगे।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस परियोजना का उद्देश्य शरीर में इच्छानुरूप अंगों को बदल सकना है और अनुसंधान केंद्रों का प्रमुख ध्यान टिश्यू और मेडिकल इंजीनियरिंग की एक प्रणाली के इर्दगिर्द लगाना है।
प्रतिरक्षा विज्ञानी प्रोफेसर ऐलीन इंघम के नेतृत्व में वैज्ञानिक मनुष्य तथा जंतुओं के अंगों से जीवित कोशिकाओं को निकालने की तकनीक पर काम कर रहे हैं। जीवित कोशिकाएं स्नायुओं, जोड़ों और रक्त वाहिकाओं का पांच प्रतिशत से कम विकास करती हैं और इन्हें विशेष एंजाइमों तथा डिटर्जेंटों के साथ हटाया जा सकता है।
द डेली टेलीग्राफ की खबर के अनुसार इन जैविक कोशिकाओं को रोगियों के शरीर में प्रतिरोपित किया जाता है, जिसके बाद शरीर खुद ब खुद कोशिकाओं को बदल देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पांच साल के भीतर उपलब्ध हो सकती है और इसमें शरीर के अंग प्रभावी तरीके से खुद ही विकसित हो सकेंगे तथा एंटी रिजेक्शन ड्रगों की जरूरत खत्म हो जाएगी।
परियोजना को देख रहे प्रोफेसर जॉन फिशर के हवाले से बताया गया है, हम सभी लंबे समय तक जीते हैं लेकिन हमारे शरीर समान दर से थक जाते हैं। हम अब अपनी बुजुर्ग अवस्था में और अधिक सक्रिय जीवनशैली चाहते हैं। sabhar :http://www.livehindustan.com

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जापान के वैज्ञानिक करेंगे सपनों की वीडियों रिकॉर्डिंग

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जापान के वैज्ञानिक करेंगे सपनों की वीडियों रिकॉर्डिंग

आप लिखी गयी कहानियों की फिल्में देखते रहें, टीवी पर अपना मनपसन्द धारावाहिक देखते हैं, लेकिन आपने कभी ये सोचा है कि यदि सोते वक्त आपके द्वारा देखे गये सपनों को स्क्रीन पर देखने का मौका मिले तो कैसा लगेगा? बेशक ये किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। जापानी वैज्ञानिक मानव मसितष्क की अवचेतन अवस्था निद्रा में देखें गये सपनों में घुसपैठ करने और, उनकी यूसबी, फ्लैश ड्राइव या वीडियो डिस्क पर रिकार्डिग करने में जी-जान से जुटें है। कहने-सुनने में में यह काल्पनिक जरूर लग रहा होगा, लेकिन इस समय जापान के नारा नगर के वैज्ञानिक स्वप्नों में घुसपैठ कर उसकी वीडियो रिकार्डिंग की तैयारी में लगे हुए हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल करने में सोये हुये व्यकित को किसी भी प्रकार कोर्इ दिक्कत नहीं होगी।इस विषय पर वहां के तकोलोजी संस्थान के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि मनुष्य के अवचेतन में झांककर यह देखा जा सकता है कि सोया हुआ व्यकित किस तरह के सपने देख रहा है। फिलहाल अब उनका अगला टारगेट है कि मनुष्य द्वारा देखे गये सपनों की वीडियो रिकार्डिंग करना। जापानी वैज्ञानिकों का यह शोध अपने-आप में अदभुत है। वें नींद के अन्य चरणों में सपनों की रिकार्डिंग करके उसका अघ्ययन करना चाहते हैं, ताकि बाद में एक ऐसा उपकरण बनाया जा सके, जिसकी सहायता से अवचेतन में दिखार्इ देने वाले इन सपनों का स्क्रीन पर वीडियो प्रसारण करना भी सम्भव हो जाये। रूस के निंद्रा अध्ययन विशेषज्ञों की एसोसियेशन के अध्यक्ष रमान बुजुनफ मानते हैं कि यदि सपनों की रिकार्डिंग करना, उनका स्क्रीन पर ध्वनियों के साथ पूरी तरह से प्रसारण करना सम्भव हो जायेगा तो हकीकत में वह एक सचमुच की फिल्म की तरह होगा। जो वैज्ञानिक सर्वप्रथम इस तकनीक को सफल बनाने में सफल होगा, उसे नोबल पुरस्कार तो जरूर मिलेगा। कैसे होगी सपनों की रिकार्डिंग? जपानी वैज्ञानिकों ने इस दिशा में अध्ययन करने के लिए उन्होंने तीन पुरूषों को आमत्रित किया। जब वे तीनों व्यकित आराम से सो रहें थे तो उनके अवचेतन मन को एक विशेष उपकरण से जोड़ दिया गया। यह उपकरण मसितष्क की गतिविधियों पर नजर रख रहा था। जब तीनों मनुष्य गहरी निंद्रा में थे तो उनकी पलकों के नीचे छुपी पुतलियां तेजी से गतिमान थीं एंव उनके दिमाग में जीवनन्त प्रक्रिया चल रही थी। कुछ समय बाद प्रयोग में शामिल तीनों व्यकितयों को जगाया गया और उनसे पूछा गया कि वे सपनें में क्या देख रहे थे। तत्पश्चात शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने इन तीनों के द्वारा अपने सपनों की कहानियों को उस विशेष उपकरण में रिकार्ड की गयी उनके अवचेतन की गतिविधियों के रिकार्ड से मिलाकर देखा फिर इसके बाद उसका कम्प्यूटर-प्रोग्राम तैयार कर लिया गया जो व्यकित के अवचेतन में होने वाली गतिविधियों की रिकार्डिंग के अनुसार उसकी तस्वीरें बनाकर सामने रख देता है। मालूम चला है कि यह कम्प्यूटर-प्रोग्राम मनुष्य द्वारा देखे जाने वाले सपनों की 80 प्रतिशत तक सटीक रिकार्डिंग प्रस्तुत कर सकता है। खैर ये तो समय के गर्भ में है कि वो खुशनुमा पल कब आयेगा जब आप अपने सपनों की कहानियों को एक सच्ची फिल्म की तरह देख पायेंगे। किन्तु यदि जपानी वैज्ञानिकों ने इस प्रणाली में कामयाबी हासिल कर ली तो सच में विज्ञान प्रकृति की अनमोल कृति की आन्तरिक क्रियाओं की गतिविधियों को काफी हद-तक जान लेगी।

sabhar :http://hindi.oneindia.in

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