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सोमवार, 11 नवंबर 2013

कॉम्बिनेशन थेरेपी से खत्म होंगे कैंसर सेल्स

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वॉशिंगटन. वैज्ञानिकों ने एक नयी ड्रग कॉम्बिनेशन थेरेपी (दवा संयोजन चिकित्सा) तैयार की है, जो कोलोन, लिवर, फेफड़ा, गुर्दा, स्तन और ब्रेन कैंसर सेल्स को असरदार तरीके से खत्म कर देती है और ऐसा करते हुए वह शरीर के स्वस्थ सेल्स को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाती है.
सबसे अहम यह है कि इस थेरपी में कैंसर सेल्स के जिंदा रहने के सभी रास्तों को खत्म किया जाता है और ऐसे में उनके पास दूसरे कैंसर सेल्स को खाकर जिंदा रहने का विकल्प ही बचता है. ऐसे में एक कैंसर सेल जिंदा रहने के लिए दूसरे को आहार बनाती है और इस तरह खुद ब खुद शरीर से कैंसर का खात्मा हो जाता है. इस तरह की स्थिति को ऑटोफेगी कहते हैं, जब सेल्स जिंदा रहने के लिए खुद को ही खाने लगते हैं.
वर्जिनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी मेसी कैंसर सेंटर की ओर से करायी गयी एक हालिया प्री-क्लिनिकल स्टडी में इस थेरेपी को ईजाद किया गया और अब इसका पहली बार इनसानों पर ट्रायल किया जायेगा.
वीसीयू स्कूल ऑफ मेडिसिन में असिस्टेंट प्रोफेसर ऐंड्रयू पोकलेपोविक के मुताबिक, क्लिनिकल ट्रायल कब शुरू होगा यह कहना अभी जल्दबाजी होगी मगर नतीजों से हम उत्साहित हैं और इसकी प्लैनिंग कर रहे हैं. पहले इनसानों के छोटे समूह पर इसका ट्रायल किया जायेगा. पॉल डेंट की अगुआई में की किये गये इस शोध में देखा गया कि सोराफेनिब और रेगोराफेनिब पीआइ 3के/एकेटी नाम की दवाओं के साथ मिलकर कई तरह के कैंसरों को खत्म कर सकती है. sabhar : palpalindia.com


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अब अंतरिक्ष में सब्जियां उगाना संभव होगा

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अब अंतरिक्ष में सब्जियां उगाना संभव होगा

© फ़ोटो: www.imbp.ru

रूसी विज्ञान अकादमी के मेडिको-बायोलॉजिकल इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए ग्रीनहाउस तैयार किया है और मंगल ग्रह को भेजे जानेवाले अंतरिक्ष यान में सब्जियां उगाने के लिए ग्रीनहाउस का डिज़ाइन-आइडिया तैयार किया है|

लगभग तीन घन मीटर आयतन के ग्रीनहाउस में चार हिस्से होंगे जिनमें से प्रत्येक में सलाद, टमाटर, गाजर और मिर्च उगाई जा सकेगी,” इस इंस्टीट्यूट की पचासवीं वर्षगाँठ के अवसर पर तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है| इंजीनियरों के मत में ऐसा ग्रीनहाउस छह सदस्यों के कर्मीदल के लिए प्रति दिन दो किलो ताज़ी सब्जी मुहैया करवा सकता है| sabhar :http://hindi.ruvr.ru/
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_11_04/248859824/

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चिकित्सा विज्ञान ने पूरी की युवती की शादी की चाहत

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चिकित्सा विज्ञान ने पूरी की युवती की शादी की चाहत

© फ़ोटो: Flickr.com/SarahMcD ॐ/cc-by

राधिका (परिवर्तित नाम) गुड़गांव की एक कंपनी की सीइओ हैं। तमाम सुख सुविधाएं होने के बावजूद उन्हें मलाल था कि वह शादी नहीं रचा सकती थी।

क्योंकि भगवान ने बचपन से जननांग नहीं दिया, किन्तु चिकित्सा विज्ञान ने उसकी जिंदगी की चाहत पूरी कर दी। दिल्ली स्थित एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टरों ने लेप्रोस्कोपी से दो घंटे के आपरेशन में जननांग बनाकर उसका नारित्व लौटा दिया। अब वह शादी की तैयारी में हैं। इसी महीने शहनाई भी बजने वाली है।
सनराइज अस्पताल का दावा है कि लेप्रोस्कोपी से जननांग बनाने का यह देश में पहला सफल ऑपरेशन है। अस्पताल की गायनेकोलॉजिस्ट व लेप्रोस्कोपी सर्जन डॉ. निकिता त्रेहान ने कहा कि 25 नवम्बर को उसकी शादी होने वाली है। गुड़गांव के ही एक साफ्टवेयर इंजीनियर से शादी कर रही है और वह बहुत खुश है। जब वह अस्पताल पहुंची थी तो हीन भावना से ग्रस्त थी। इसलिए दो महीने तक उसकी काउंसलिंग की गई। उसके होने वाले पति ने भी बहुत साथ दिया।
राधिका सोचती थी कि शादी के बाद पत्नी होने का फर्ज नहीं निभा पाएगी। इसके चलते मां बनने का सुख भी नहीं उठा पाएगी। पहले उसे अपने नारीत्व नहीं होने की कमी महसूस नहीं होती थी। होने वाले पति से दिल का रिश्ता जुड़ने पर एहसास हुआ कि उसके पास संपूर्ण नारित्व नहीं है। अपनी चाहत को शादी का रूप देने के लिए उसने सर्जरी कराने की ठानी।
अस्पताल के गायनेकोलॉजिस्ट व लेप्रोस्कोपी सर्जन डॉ. निकिता त्रेहान ने कहा कि उसे मायर रोकिटांस्की कुस्टर हौसेर सिंड्रोम नामक बीमारी थी। 5000 में एक महिलाओं को यह बीमारी (विकार) होती है। इसके चलते उसका गर्भाशय व जननांग नहीं था। जांच करने पर पता चला कि ओवरी सामान्य है व अंडाणु भी हेल्दी हैं। इसलिए उसे लेप्रोस्कोपी से जननांग बनाने की सलाह दी। बाद में सरोगेसी से वह मां भी बन सकती है। पिछले महीना अक्टूबर में लेप्रोस्कोपी से सर्जरी कर जननांग बनाया गया। आपरेशन के 23 घंटे बाद वह अपने घर चली गई।
ओपन सर्जरी से जननांग बनाए जाते रहे हैं, यह मरीज के लिए पीड़ादायक होती है और प्रक्रिया भी जटिल होती है। देश में लेप्रोस्कोपी से जननांग निर्माण की यह पहली सर्जरी है। sabhar http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_11_10/249646039/

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ओफियूशस नामक तारामंडल में मिला एक ब्लैक होल

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ओफियूशस नामक तारामंडल में मिला एक ब्लैक होल

वाशिंगटन : इसे एक अप्रत्याशित खोज ही कहा जा सकता है कि वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से करीब 22,000 प्रकाश वर्ष दूर, ओफियूशस नामक तारामंडल में एक ब्लैक होल देखा है।

पिछले साल जब मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर की अगुवाई में खगोलविदों ने ग्लोबुलर क्लस्टर नामक तारों के समूह में दो ब्लैक होल की खोज की थी तब दल को यह अनुमान नहीं थी कि ब्लैक होल की मौजूदगी सामान्य है या फिर एक दुर्लभ प्रक्रिया है।

अनुसंधानकर्ताओं ने ग्लोबुलर क्लस्टर में एक और ब्लैक होल ‘एम 62’ के सबूत खोजे हैं। एमएसयू में भौतिकी और खगोल विज्ञान की सहायक प्रोफेसर और टीम की सदस्य लॉरा चौकियुक ने बताया ‘सचमुच, ग्लोबुलर क्लस्टर्स में ब्लैक होल सामान्य बात हो सकती है।’ ब्लैक होल वास्तव में तारे होते हैं जो खत्म हो जाते हैं, विघटित हो जाते हैं और उनका गुरूत्व क्षेत्र बहुत मजबूत होता है। (एजेंसी) sabhar http://zeenews.india.com/

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स्विच बदलते हैं चेहरे की बनावट

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इंसान चेहरा बनावट

वैज्ञानिकों ने अलग-अलग लोगों के चेहरों में अंतर पाए जाने के कारणों को समझने में आरंभिक सफलता प्राप्त कर ली है.
चूहों पर हुए अध्ययन में वैज्ञानिकों को डीएनए में मौजूद हज़ारों ऐसे छोटे-छोटे हिस्सों का पता चला है जो चेहरे की बनावट के विकास में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

शोधपत्रिका साइंस में छपे इस शोध से चेहरे में आने वाली जन्मजात विकृतियों का कारण समझने में भी मदद मिल सकती है.इस शोध में यह भी पता चला कि आनुवांशिक सामग्री में परिवर्तन चेहरे की बनावट में बहुत बारीक़ अंतर ला सकते हैं.
शोधकर्ताओं ने कहा कि यह प्रयोग जानवरों पर किया गया है, लेकिन पूरी संभावना है कि मनुष्य के चेहरे का विकास भी इसी तरह होता है.
कैलीफोर्निया स्थित लॉरेंस बर्कले नेशनल लैबोरेटरी के ज्वाइंट जीनोम इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर एक्सेल वाइसेल ने बीबीसी से कहा, "हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि चेहरे की बनावट के निर्माण के निर्देश मनुष्यों के डीएनए में कैसे मौजूद होते हैं. इन डीएनए में ही कहीं न कहीं हमारे चेहरे की बनावट का राज़ छिपा है."

जीन स्विच

"इससे हमें पता चलता है कि इन ख़ास स्विच की खोपड़ी के विकास में भूमिका है और ये खोपड़ी की बनावट को प्रभावित करते हैं."
प्रोफ़ेसर एक्सेल वाइसेल, लॉरेंस बर्कले नेशनल लैबोरेटरी
शोधकर्ताओं की इस अंतरराष्ट्रीय टीम को चूहे के जीनोम में 4000 ऐसे "इनहैंसर्स" मिले, जिनकी चेहरे की बनावट में भूमिका प्रतीत होती है.
डीएनए पर बने ये छोटे "इनहैंसर्स" स्विच की तरह काम करते हैं. ये जीन को ऑन और ऑफ करते हैं. वैज्ञानिकों ने इनमें से 200 का अध्ययन किया.
वैज्ञानिकों देखा कि एक विकसित होते हुए चूहे में ये कैसे और क्या काम करते हैं.
प्रोफेसर वाइसेल कहते हैं, "चूहे के भ्रूण में हम भलीभांति देख सकते हैं कि जब चेहरे का विकास हो रहा होता है तब इसे नियंत्रित करने वाला स्विच कब ऑन होता है."
वैज्ञानिकों ने तीन जेनेटिक स्विच निकाल देने से चूहों के चेहरे की बनावट पर पड़ने वाले असर का भी अध्ययन किया.
मानव चेहरा
चूहों पर अपने प्रयोगों के ज़रिए वैज्ञानिकों ने मानव चेहरे के रहस्य से पर्दा उठाने की कोशिश की है.
प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं, "ये चूहे काफी सामान्य दिखते हैं लेकिन मनुष्यों के लिए चूहों के चेहरे में फ़र्क पहचानना भी मुश्किल है."
प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं, "जिन चूहों के जीन में परिवर्तन किया गया, उनके चेहरे से उन चूहों के चेहरों से तुलना करने पर जिनके जीन में परिवर्तन नहीं किया गया, हमें पता चला कि चेहरे में आने वाला अंतर बहुत मामूली है. हालाँकि कुछ चूहों की खोपड़ी लंबी या ठिगनी हो गई थी. वहीं कुछ चौड़ी या पतली हो गई थीं."
प्रोफ़ेसर वाइसेल के मुताबिक़, "इससे हमें पता चलता है कि इन ख़ास स्विचों की खोपड़ी के विकास में भूमिका है और ये खोपड़ी की बनावट को प्रभावित करते हैं."

डिज़ाइनर बच्चे

इस शोध से यह समझने में भी सहायता मिल सकती है कि कुछ बच्चों के चेहरों में जन्मजात विकृति क्यों और कैसे आ जाती है.
प्रोफ़ेसर वाइसेल कहते हैं, "हमने अभी चेहरे की बनावट के कारण समझने शुरू ही किए हैं. इससे पता चला है कि यह एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है."

हालाँकि प्रोफ़ेसर वाइसेल नहीं मानते कि भविष्य में किसी के चेहरे-मोहरे का अनुमान लगाने या माँ-बाप की आनुवंशिक सामग्री में बदलाव लाकर बच्चे का चेहरा बदलने के लिए डीएनए का प्रयोग हो सकता है sabhar : bbc.co.uk

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हाथ लग सकता है ताउम्र जवां रहने का नुस्खा

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हम हमेशा जवान रहना चाहते हैं। यही वजह है कि जवान रहने के लिए हम नए-नए तरीके ढूंढते रहते हैं। कभी किसी टॉनिक में, तो कभी किसी क्रीम या फिर कॉस्मेटिक सर्जरी में। हालांकि सारी कोशिशें बेकार हो जाती हैं, क्योंकि बाहर से हम कितने भी जवां दिखें, लेकिन अंदर से शरीर कमजोर और बूढ़ा होता जाता है। लेकिन अगर अमेरिकी वैज्ञानिकों की कोशिश सफल रहती है, तो सदा जवान बने रहने का नुस्खा हमारे हाथ लग सकता है। दरअसल वैज्ञानिकों को पता चल गया है कि असल में जवानी का राज बाहर नहीं, बल्कि शरीर के डीएनए में छिपा है। वैज्ञानिकों ने इसे समझने के लिए डीएनए से जुड़ी ह्यूमन बॉडी क्लॉक (जैविक घड़ी) को खोज लिया है। यह घड़ी शरीर में मौजूद कोशिकाओं, टिश्यू और अंगों के उम्र की गणना करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इस घड़ी से किसी तरह बढ़ती उम्र के प्रोसेस को उल्टा किया जा सके, तो ताउम्र जवान रहने का सपना हकीकत में बदल सकता है। 
सदा जवान बने रहने का राज : हालांकि अब भी वैज्ञानिकों के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या यह जैविक घड़ी सदा जवान बने रहने के राज को खोल पाएगी। क्या यही घड़ी उन फैक्टर्स को कंट्रोल करती है, जिससे उम्र बढती है। वैसे थियरी के तौर पर यह संभव है कि अगर हम समझ जाएं कि उम्र कैसे बढ़ रही है तो हम उस प्रोसेस को उल्टा भी कर सकते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने इस घड़ी के बारे में और समझने की कोशिश जारी रखी है। इससे जवान बने रहने के राज का पता लगाया जा सकता है। 
हर अंग की अलग उम्र : यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के स्टीव होवर्थ के अनुसार, शरीर के हर अंग की उम्र अलग-अलग होती है। कोई जल्दी बढ़ता है और कोई धीमी गति से। वहीं कोई बीमार अंग किसी सामान्य अंग की तुलना में ज्यादा उम्र का होता है। इसी रिसर्च से पता चला कि महिलाओं के स्तन उनके शरीर के मुकाबले तेजी से बढ़ते हैं। इसी वजह से जब स्तन कैंसर होता है, तो स्वस्थ टिश्यू के मुकाबले ट्यूमर वाले टिश्यू 36 साल बड़े और उनके आस-पास के टिश्यू 12 साल बड़े होते हैं। यही वजह है कि कैंसर में उम्र बहुत बड़ा रिस्क फैक्टर है। 
कैसे काम करती है घड़ी : वैसे ऐसी जैविक घड़ी को तैयार करने की कोशिश पहले भी हुई। शरीर की लार और हार्मोन के सहारे जैविक घड़ी बनाने की कोशिश की। हालांकि यह पहली बार है जब किसी घड़ी की मदद से हम यह जान पाए हैं कि शरीर के अंग अलग-अलग तेजी से बढ़ते हैं। होवर्थ ने घड़ी बनाने के लिए मिथायलेशन प्रक्रिया पर फोकस किया। मिथायलेशन प्रक्रिया की वजह से ही डीएनए में रसायनिक बदलाव होते हैं। होवर्थ पुराने आंकड़ों और 51 तरह के टिश्यू और कोशिकाओं के 8 हजार नमूनों की मदद से जन्म के समय से लेकर 101 साल की उम्र तक डीएनए के मिथायलेशन प्रोसेस के विभिन्न लेवल को चार्ट पर उतारने में सफल रहे। इसके बाद इस चार्ट के डेटा की मदद से उन्होंने इस घड़ी को तैयार किया। घड़ी कितनी प्रभावी है यह जानने के लिए होवर्थ ने टिश्यू के बायलॉजिकल उम्र का मिलान उनके क्रोनोलॉजिकल उम्र से किया। कई बार के टेस्ट से यह बात निकलकर आई कि घड़ी सही काम कर रही है। उनकी रिसर्च से यह बात भी निकल कर आई कि हर स्टेम सेल नई पैदा हुई कोशिकाओं जैसे है। अगर किसी इंसान में सेल को स्टेम सेल से बदला जाए तो घड़ी के अनुसार उसकी उम्र जीरो हो जाएगी। होवर्थ की खोज से यह भी पता चला कि उम्र बढ़ने के साथ जैविक घड़ी की गति भी कम ज्यादा होती है। शुरुआत में घड़ी काफी तेजी से चलती हैं, किशोरावस्था के बाद घड़ी में ठहराव आ जाता है और 20 साल के बाद घड़ी एक नियमित गति से चलती है। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

अब 'इलेक्ट्रॉनिक रक्त' से चलेगा कंप्यूटर

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आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी आईबीएम ने एक ऐसे नए कंप्यूटर का नमूना पेश किया है जो मनुष्य के मस्तिष्क की संरचना से प्रेरित है. इस कंप्यूटर की ख़ास बात यह है कि यह 'इलेक्ट्रॉनिक रक्त' से संचालित होगा.
क्लिक करेंआईबीएम का कहना है कि कंपनी ने प्रकृति से प्रेरणा लेते हुए इंसान के दिमाग़ जैसा ही क्लिक करेंकंप्यूटर बनाने की कोशिश की है जो तरल पदार्थ से ऊर्जा पाकर संचालित होता है.
मनुष्य के क्लिक करेंदिमाग़ में बिल्कुल छोटी-सी जगह में असाधारण गणना की ताक़त होती है और इसमें केवल 20 वॉट की ऊर्जा का इस्तेमाल होता है. आईबीएम की कोशिश है कि उसके नए कंप्यूटर में भी ऐसी ही क्षमता हो.
इस कंप्यूटर के नए रिडॉक्स फ्लो तंत्र (यह एक रासायनिक प्रतिक्रिया है जिसमें एक बार ऑक्सीकरण हुआ तो इसकी उल्टी प्रतिक्रिया में इसमें कमी आती है) के जरिए कंप्यूटर में इलेक्ट्रोलाइट 'रक्त' का प्रवाह होता है और जिससे इस कंप्यूटर को बिजली मिलती है.

इलेक्ट्रॉनिक रक्त

यह इलेक्ट्रोलाइट 'रक्त' दरअसल ऐसा द्रव है जिससे बिजली का प्रवाह होता है.
तकनीकी क्षेत्र की इस दिग्गज कंपनी की ज्यूरिख प्रयोगशाला में इस हफ़्ते डॉ. पैट्रिक रुश और डॉ. ब्रूनो मिशेल ने इस क्लिक करेंकंप्यूटर के एक छोटे मॉडल को पेश किया.
उनके मुताबिक़ एक पेटाफ्लॉप क्लिक करेंकंप्यूटर जो आज एक फुटबॉल के मैदान को भर सकता है वह वर्ष 2060 तक किसी डेस्कटॉप में फिट होने लायक बन जाएगा. 
मिशेल कहते हैं, "हम एक शुगरक्यूब के अंदर एक सुपर कंप्यूटर फिट करना चाहते हैं. ऐसा करने के लिए हमें इलेक्ट्रॉनिक्स में एक बदलाव की जरूरत है, साथ ही हमें अपने दिमाग से प्रेरित होने की भी जरूरत है."
डॉ. ब्रूनो मिशेल
डॉ. ब्रूनो मिशेल एक सर्वर के साथ
मानव मस्तिष्क किसी कंप्यूटर के मुकाबले 10,000 गुना ज़्यादा जटिल और सक्षम है.
उनका कहना है, "यह संभव भी है क्योंकि दिमाग एक ही समय में गर्मी और ऊर्जा के प्रवाह के लिए अत्यंत सूक्ष्म नलिकाओं के जाल और रक्त वाहिकाओं का उपयोग करता है."
आईबीएम का इंसान की दिमागी क्षमता वाला कंप्यूटर अब तक 'वॉटसन' ही रहा है जिसने अमेरिका के मशहूर टीवी क्विज शो 'जियोपार्डी' के दो चैंपियनों को हरा दिया था.
इस जीत को ज्ञान आधारित कंप्यूटिंग के क्षेत्र में एक मील के पत्थर के रूप में देखा गया था जिसमें मशीन ने मनुष्य को पीछे छोड़ दिया था.
हालांकि मिशेल कहते हैं कि यह प्रतियोगिता अनुचित थी. केन जेनिंग्स और ब्रैड रटर का दिमाग केवल 20 वॉट ऊर्जा पर ही चल रहा था जबकि वॉटसन के लिए 85,000 वॉट की जरूरत थी.
आईबीएम का मानना है कि अगली पीढ़ी के कंप्यूटर चिप के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत ऊर्जा दक्षता ही होगा.
मूर की विधि के जरिए आधी सदी में मौजूदा 2D सिलिकॉन चिप की ताकत दोगुनी हो गई है और वे एक ऐसी भौतिक सीमा के पास पहुंच रहे हैं जहां वे ज़्यादा गर्म हुए बिना सिकुड़ नहीं सकते.

बायोनिक नजरिया

तरल शीतक
इस तरह के विशेष कंप्यूटर में तरल शीतकों का इस्तेमाल किया जाता है
मिशेल का कहना है, "कंप्यूटर उद्योग 30 अरब डॉलर ऊर्जा का इस्तेमाल करता है जिसे बाहर निकाल दिया जाता है. हम 30 अरब डॉलर तक की गर्म हवा तैयार कर रहे हैं . एक कंप्यूटर का 99 फीसदी हिस्सा केवल शीतक और ऊर्जा देने में लगा होता है और केवल 1 फीसदी हिस्से से ही जानकारी वाली प्रक्रिया संचालित होती है. इसके बाद हम सोचते हैं कि हमने एक अच्छे कंप्यूटर का निर्माण किया है? वहीं मनुष्य का मस्तिष्क कार्यात्मक प्रदर्शन के लिए इसकी 40 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल करता है जबकि ऊर्जा और शीतक के लिए केवल 10 फीसदी मात्रा का इस्तेमाल किया जाता है."
मिशेल का मानना है कि जैविक सिद्धांतों का इस्तेमाल कर इलेक्ट्रॉनिक तंत्र को डिजाइन कर तैयार हुआ नया बायोनिक कंप्यूटर प्रकृति के ही एक नियम एलोमेट्रिक स्केलिंग से प्रेरित है जिसमें एक जानवर की पाचन शक्ति उसके अपने शरीर के आकार के साथ बढ़ जाती है.
मिसाल के तौर पर 10 लाख चूहों से भी ज्यादा एक हाथी का वजन होता है. लेकिन यह 30 गुना कम ऊर्जा की खपत है और यहा ऐसा काम करने में सक्षम है जो 10 लाख चूहे भी मिलकर पूरा नहीं कर सकते हैं.
मिशेल का कहना है कि यही सिद्धांत कंप्यूटिंग के लिए भी सच है जिसमें तीन खास मूल डिजाइन हैं.
पहला 3डी आर्किटेक्चर है जिसमें चिप ऊंचे हैं और मेमोरी स्टोर की इकाई प्रोसेसर से ही जुड़ी हुई है.

द्रव का कमाल

कंप्यूटर मस्तिष्क की तरह काम करे इसके लिए आईबीएम को तीसरे विकासवादी क़दम को हासिल करना होगा मसलन तरल ऊर्जा और शीतक वाली प्रक्रिया एक साथ संचालित हो सके.
रिडॉक्स प्रवाह तंत्र
रिडॉक्स प्रवाह तंत्र में अलग-अलग रंगों के तरल पदार्थों की ऑक्सीकरण की प्रक्रिया भी अलग होती है
यह कुछ ऐसा ही है कि रक्त एक ओर चीनी देता है और दूसरी ओर गर्मी लेता है. ठीक इसी तरह आईबीएम भी एक ऐसे तरल पदार्थ की खोज में जुटा है जो एक साथ कई काम निबटा सके.
प्रयोगशाला के परीक्षण तंत्र में वैनेडियम का प्रदर्शन सबसे अच्छा है जो 'रिडॉक्स फ्लो यूनिट' की किस्म की तरह ही है और यह एक साधारण बैटरी की तरह का होता है.
सबसे पहले इस तरल पदार्थ इलेक्ट्रोलाइट को चार्ज किया जाता है फिर इसे कंप्यूटर में डाला जाता है जहां यह अपनी ऊर्जा चिप में प्रवाहित कर देता है.
आईबीएम पहली ऐसी कंपनी है जो अपने चिप को इस इलेक्ट्रॉनिक रक्त के लिए दांव पर लगा रही है और इसे भविष्य के कंप्यूटर के खुराक के तौर पर देख रही है ताकि आने वाले दशकों में यह जेटास्केल कंप्यूटिंग के लक्ष्य को भी हासिल कर ले.

मिशेल का कहना है कि जेटास्केल कंप्यूटर के लिए दुनिया में उत्पादित बिजली के मुकाबले ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ेगी.sabhar : http://www.bbc.co.uk

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समुद्र में ब्लैक होल्स

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     समुद्र में ब्लैक होल्स


ब्रह्मांड की तरह समुद्र में भी ब्लैक होल्स हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार अंतरिक्ष और समुद्र में पाए जाने वाले ब्लैक होल्स की गणितीय गणना एक जैसी है.
(भंवर) शहरों से भी बड़े हैं. इनकी चपेट में आने पर कुछ भी नहीं बच पाता है. इस खोज से समुद्र के कचरे से निपटने, हिमखंडों के पिघलने, समुद्र के तापमान में परिवर्तन आने आदि से संबंधित शोध में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी. अंतरिक्ष में पाए जाने वाले ब्लैक होल्स के करीब जो भी वस्तु आती है, उसे वे अपने में खींच लेते हैं.
इन ब्लैक होल्स के केंद्र में इतना अधिक गुरुत्वाकर्षण होता है कि अपने आसपास की रोशनी, आकाशीय पिंड आदि तक को अपने में खींच लेते हैं और फिर इनका अस्तित्व हमेशा के लिए खत्म हो जाता है.
ईटीएच ज्यूरिक के वैज्ञानिकों को अपने नवीनतम खोज में पता चला है कि दक्षिणी अटलांटिक महासागर में भी ब्लैक होल्स (भंवर) हैं. समुद्र की इन ब्लैक होल्स की गणितीय गणना आकाशीय ब्लैक होल्स की तरह की जा सकती है.
समुद्र के ब्लैक होल्स के केंद्र में गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक होता है कि इनके करीब का पानी भी इनमें समा जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र के इन ब्लैक होल्स की चपेट में आने वाली कोई भी चीज अपने को बचा नहीं पाती है. शोधकर्ताओं के अनुसार दक्षिणी अटलांटिक महासागर में ब्लैक होल्स की संख्या बढ़ती जा रही है.
वैज्ञानिकों को अपने शोध में पता चला है कि दक्षिणी अटलांटिक महासागर के ब्लैक होल्स की बाहर की पानी की परतों और अंतरिक्ष के ब्लैक होल्स की बाहरी परतों के गुण एक जैसे हैं. वैज्ञानिकों ने समुद्र के ब्लैक होल्स में सात एगुल्हस रिंग्स पाए हैं.
इन रिंग्स में कोई भी वस्तु आने पर ब्रह्मांड में पाए जाने वाले ब्लैक होल्स के रिंग की तरह गति करती है.
दक्षिणी अटलां टिक महासागर में पाए गए ब्रह्मांड और समुद्र में पाए जाने वाले ब्लैक होल्स के गुण व गणितीय गणना एक जैसी है समुद्र के ब्लैक होल्स में भी जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण, करीब का पानी भी समा जाता है.sabhar :http://www.samaylive.com

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रविवार, 27 अक्टूबर 2013

पेड़ों में छिपे सोने के छोटे-छोटे कणों का पता चला

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पेड़ों में छिपे सोने के छोटे-छोटे कणों का पता चला

मेलबर्न : केवल परिकथाओं में ही सोने के पेड़ उगते थे लेकिन अब यह परिकल्पना हकीकत में बदल गई है। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने पेड़ों में सोने जैसी कीमती धातु की तलाश कर ली है। 

पर्थ के शोधकर्ताओं ने यूकेलिप्टस के पेड़ों में छिपे सोने के छोटे-छोटे कणों का पता लगाया है। यह एक ऐसी खोज है जो भविष्य में इस कीमती धातु के भंडार खोजने में मददगार हो सकती है। 

एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉमनवेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के शोधकर्ताओं ने कहा कि उनका मानना है कि जो पेड़ स्वर्ण भंडारों वाली भूमि के ऊपर उगे हैं, उनकी जड़ें काफी गहराई में हैं। सूखे के दौरान ये जड़ें नमी की तलाश में गहराई में छिपे सोने को चूस लेती हैं। सीएसआईआरओ के भूरसायन वैज्ञानिक मेल्वन लिंटर्न ने कहा कि हम इसकी उम्मीद नहीं कर रहे थे। पत्तियों में सोने के कण मिलना हमारे लिए वाकई एक अद्भुत अवसर था। sabhar :http://zeenews.india.com

उन्होंने कहा कि हमने जिन पेड़ों पर शोध किया, उन्होंने यह सोना लगभग 30 मीटर की गहराई से लिया था। यह गहराई किसी दस मंजिला इमारत की उंचाई के बराबर होगी। (एजेंसी)

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जापान में बना पहला एंफ़िबियस रोबोट

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जापान में बना पहला एंफ़िबियस रोबोट

जापानी वैज्ञानिकों ने पहला एंफ़िबियस रोबोट (जलस्थलचर रोबोट) का निर्माण किया है जो मानव के नियंत्रण में रहकर परमाणु बिजलीघर "फुकुशिमा-1" में उच्च विकिरण की स्थितियों में काम करने में सक्षम होगा।

 तिबा प्रौद्योगिकी संस्थान के विशेषज्ञों ने इस रोबोट का प्रदर्शन किया है। इस राहतकर्ता-रोबोट का नाम "सकुरा" है जो सीढ़ियों पर चढ़ तथा उतर सकता है और जल के नीचे भी काम कर सकता है।
परमाणु बिजलीघर "फुकुशिमा-1" के कई तहख़ानों और नालियों में रेडियोधर्मी जल भरा हुआ है। आम मनुष्य वहाँ राहत-कार्य नहीं कर सकता है। इससे पहले भी जापान के विभिन्न वैज्ञानिक संगठनों में भी ऐसे रोबोटों का निर्माण किया जाता रहा है लेकिन वे रोबोट ज़्यादा देर तक काम नहीं कर पाते थे। sabhar : http://hindi.ruvr.ru
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/news/2013_09_27/244333221/

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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

एंड्रॉयड की ऐसी रंगीन दुनिया, क्या आपने देखी है

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स्मार्ट डिजिटल कैमरा
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एंड्रॉयड का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। स्मार्टफोन और टैबलेट से बाहर निकल कर एंड्रॉयड अब कैमरों में भी पहुंच चुका है। कुछ साल पहले तक डिजिटल कैमरे से फोटो खींचना बड़ी कामयाबी माना जाता था, लेकिन बदलते वक्त के साथ कैमरों की जगह स्मार्टकैमरों ने ले ली। सैमसंग और निकॉन ने स्मार्टकैमरे लॉन्च करके दुनियाभर में तहलका मचा दिया था।
निकॉन का कूलपिक्स एस800सी 16 मेगापिक्सल वाला कैमरा है, जिसमें 10 एक्स ऑप्टिकल जूम के अलावा वे सभी फीचर हैं, जो किसी स्मार्टकैमरा में होते हैं। यह कैमरा एंड्रॉयड 2.3 वर्जन को सपोर्ट करता है। इसके अलावा इसमें गूगल प्ले स्टोर से फोटो एडिटिंग एप्स भी डाउनलोड कर सकते हैं। वहीं, सैमसंग के गैलेक्सी कैमरा में 16 मेगापिक्सल का कैमरा है, जिसमें 1.4 गीगाह‌र्ट्ज क्वैडकोर प्रोसेसर है और एंड्रॉयड के 4.1 जैलीबीन ओएस को सपोर्ट करता है। इन कैमरों से यूजर फोटोग्राफ्स को सीधे सोशल नेटवर्किंग पर भी शेयर कर सकते हैं।
स्मार्ट माइक्रोवेव
कभी आपने सोचा है कि क्या एंड्रॉयड माइक्रोवेव ओवन में भी इंटीग्रेट हो सकेगा। जी हां, आपका फेवरेट ऑपरेटिंग सिस्टम एंड्रॉयड माइक्रोवेव भी चला सकता है। केरल की सेक्टरक्यूब टेक्नोलैब्स कंपनी ने एंड्रॉयड ओएस की मदद से मैड (माइक्रोवेव एंड्रॉयड इंटीग्रेटेड डिवाइस) नाम से ऐसा माइक्रोवेव डेवलप किया है, जो आपकी कुकिंग स्किल्स को इंप्रूव करने में काफी मदद कर सकता है। इस माइक्रोवेव की खासियत है कि इसे यूजर इंटरनेट से कनेक्ट कर सकता है, साथ ही रेसिपीज भी डाउनलोड कर सकता है। इसके अलावा यह स्मार्ट माइक्रोवेव डाउनलोड रेसिपीज के इनग्रेडिएंट्स को पढ़ कर वॉयस असिस्टेंट फीचर की मदद से आपको पढ़ कर सुना कर सकता है और खाना बन जाने पर यह इनफॉर्म भी कर सकता है। इस तरह यह कुकिंग प्रोसेस में हेल्प कर सकता है। इसके अलावा यूजर चाहें, तो अपने एग्जिस्टिंग माइक्रोवेव को मैड कंसोल लगा कर अपग्रेड भी कर सकते हैं। साथ ही, इस माइक्रोवेव में वीडियो रेसिपीज भी डाउनलोड कर सकते हैं।
स्मार्ट रेफ्रिजरेटर
बाजार में एंड्रॉयड से चलने वाला रेफ्रिजरेटर भी लॉन्च हो चुका है। अब किचन में खड़े-खड़े ही पूरी दुनिया से कनेक्ट हो सकते हैं। सैमसंग के एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाले चार डोर के रेफ्रिजरेटर में 8 इंच की एलसीडी स्क्रीन लगी है और यह वाई-फाई अनेबल्ड है। इसमें वेदर फोरकास्ट, न्यूज, कैलेंडर, नोट्स, ट्विटर, पैंडोरा, एपीक्यूरियस, पिकासा फोटो जैसी एप्स प्री-लोडेड हैं।
स्मार्टवॉच
कुछ साल पहले तक यह सोचना भी नामुमिकन था कि कलाई में पहनी घड़ी से भी कॉलिंग या मैसेजिंग कर सकेंगे, लेकिन बदलते वक्त के साथ यह भी पॉसिबल हो गया। सोनी ने सबसे पहले लाइवव्यू के नाम से एंड्रॉयड ओएस स्मार्टवॉच लॉन्च की थी। वहीं, हाल ही में सैमसंग ने भी गैलेक्सी गियर के नाम से स्मार्टवॉच लॉन्च की है, जिसे यूजर अपने एंड्रॉयड स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं। यह उन यूजर्स के लिए फायदेमंद है, जो फोन को बार-बार पॉकेट से बाहर नहीं निकालना चाहते। सैमसंग की इस स्मार्टवॉच में 1.63 इंच की सुपर अमोलेड डिस्प्ले, 800 मेगाह‌र्ट्ज का एग्जिनोस प्रोसेसर, 4 जीबी का स्टोरेज और 1.3 मेगापिक्सल का कैमरा दिया गया है, जो फोटोग्राफी करने के अलावा 10 सेकेंड का वीडियो भी शूट कर सकता है। इसे एंड्रॉयड 4.3 पर चलने वाले सैमसंग स्मार्टफोन्स से ही कनेक्ट किया जा सकता है। इसमें बिल्ट-इन स्पीकर भी दिया गया है। इसकी बैट्री लाइफ 25 घंटे की है। उम्मीद है कि आने वाले सालों में आम घड़ियों की जगह स्मार्टवॉच ले लेंगी।
स्मार्टमीडिया प्लेयर
भले ही मीडिया प्लेयर्स की जगह स्मार्टफोंस ने ले ली है, लेकिन प्योर म्यूजिक के शौकीन अभी भी मीडिया प्लेयर पर ही अपनी फेवरेट ट्यूंस या क्लिप्स सुनना पसंद करते हैं। एंड्रॉयड का दमखम यहां भी दिखाई देता है। एपल के आईपॉड टच में भी आईओएस ओएस होता है, ठीक उसी की तर्ज पर कई कंपनीज एंड्रॉयड पोर्टेबल म्यूजिक प्लेयर डिवाइसेज डेवलप कर रही हैं, जिसमें हाई-एंड ऑडियो के साथ वीडियो कैपेबिलिटीज भी हों। फिलिप्स का गो-गियर कनेक्ट और सैमसंग गैलेक्सी प्लेयर 5.0 ऐसे ही हाई-एंड पोर्टेबल म्यूजिक प्लेयर हैं, जो एंड्रॉयड ओएस को सपोर्ट करते हैं। गो-गियर में एंड्रॉयड 2.3 जिंजरब्रेड ओएस और 3.2 इंच का डिस्प्ले, माइक्रोएसडी के साथ एक्सपेंडेबल स्टोरेज और वाई-फाई जैसे ऑप्शंस हैं, वहीं गैलेक्सी प्लेयर कैमरा, पॉवरफुल प्रोसेसर के साथ वाई-फाई जैसे फीचर हैं। इसके अलावा पीएमपी में गूगल प्ले स्टोर से म्यूजिक एप्स भी डाउनलोड की जा सकती हैं।
स्मार्ट रोबोट्स
जल्द ही ऐसे रोबोट्स भी आने वाले हैं, जो एंड्रॉयड ओएस पर चलेंगे। गूगल बग ड्रॉयड से इंस्पायर होकर डेवलपर्स ने बेरो नाम से एंड्रॉयड सिस्टम पर चलने वाला ऐसा रोबोट डेवलप किया है, जिसे एंड्रॉयड स्मार्टफोन या टैबलेट पर इंस्टॉल एप की मदद से कंट्रोल किया जा सकता है। यह ओपन सोर्स रोबोट है, जो 5 इंच दूर से ही रास्ते में आने वाली रुकावटों को पहचान लेता है। बेरो में नेविगेशन के लिए 2 इंफ्रारेड ट्रांसमीटर लगे हैं, साथ ही बेरो यूजर्स के साथ इंटरैक्ट भी कर सकता है।
फोनसैट
सुनकर आश्चर्य होगा कि एंड्रॉयड स्पेस में अपना मैजिक दिखा सकता है। हाल ही में नासा ने स्पेस में 3 स्मार्टफोन भेजे हैं, जिन्हें नासा ने फोनसैट प्रोजेक्ट नाम दिया है। ये नैनोसैटेलाइट कंज्यूमर ग्रेड के स्मार्टफोन्स हैं, जिनमें से एक एचटीसी का नेक्सस वन और दूसरा सैमसंग का नेक्सस एस है। ये दोनों ही गूगल के एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम करते हैं। हर स्मार्टफोन 4 वर्ग इंच साइज के बॉक्स में फिट किए गए, जो सैटेलाइट से जुड़े कंप्यूटर के तौर पर काम करते हैं। इसमें लगे सेंसर्स का यूज ऊंचाई मापने में और कैमरों का यूज पृथ्वी की तस्वीरें खींचने में किया गया। इन फोन्स को भेजने से पहले इनमें बड़े साइज की ढेर सारी लीथियम आयन बैटरीज और एक पावरफुल रेडियो लगाया गया और कॉलिंग या मेसेज सर्विस हटा दिया गया।
स्मार्ट सेट-टॉप बॉक्स
स्मार्ट टीवी के बाद एंटरटेनव‌र्ल्ड में अब स्मार्ट सेट-टॉप बॉक्सेज की एक नई ब्रीड आ रही है। सैमसंग जल्द ही ये डिवाइस लॉन्च करने वाला है, जिसे यूजर अपने टीवी सेट से कनेक्ट करके मोबाइल या टैबलेट में सेव मूवीज या फोटोग्राफ्स को प्ले कर सकेंगे। वहीं, पोर्टोनिक्स लाइमबॉक्स 1.2 गीगाह‌र्ट्ज का प्रोसेसर, 512 एमबी की रैम और 4जीबी की फ्लैश मेमोरी है। यह डिवाइस एंड्रॉयड 2.3 को सपोर्ट करती है। इसे टीवी मॉनिटर के साथ भी कनेक्ट किया जा सकता है। साथ ही, यूजर एंड्रॉयड प्ले स्टोर से भी एप्स डाउनलोड कर सकते हैं।
स्मार्टस्टिक
अगर आपके पास पुराना एलसीडी टीवी है, जिसमें यूएसबी का ऑप्शन नहीं हैं, तो आप उसे स्मार्ट टीवी में कनवर्ट कर सकते हैं। माइक्रोमैक्स ने आइसक्रीम सैंडविच पर चलने वाली ऐसी डिवाइस लॉन्च की है, जो आपके पुराने एलईडी सेट को एंड्रॉयड टीवी में कनवर्ट कर सकती है। इस डिवाइस में 1.2 गीगाह‌र्ट्ज का डुअल कोर प्रोसेसर, 1 जीबी डीडीआर3 रैम, एचडीएमआई आउटपुट और 4जीबी की इंटरनल मेमोरी के साथ वाई-फाई कनेक्ट का भी फीचर है।
- हरेंद्र चौधरी sabhar ; jagaran.com

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