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शनिवार, 3 जनवरी 2015

2014 में साइंस' के टॉप 10 आविष्कार

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साइंस पत्रिका ने साल 2014 में सामने आईं ढेरों नई खोजों और आविष्कारों में से चुनी हैं ये 10 खास चीजें. इसमें चूहों में मिले चिरयौवन के राज से लेकर डायनासोर से जुड़े खुलासे शामिल हैं.

Orbiter Philae on the comet 67P/Churyumov-Gerasimenko
चांद पर पहला कदम रखने जैसा बड़ा कदम
साल 2014 की सबसे बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि रही यूरोपीय स्पेस एजेंसी के रोजेटा मिशन के नाम. 12 नवंबर को रोजेटा मिशन में ऑर्बिटर फिले को कॉमेट 67पी/चूरियूमोव-गेरासिमेंको पर सफलतापूर्वक लैंड कराया गया. फिले पर कुल 20 वैज्ञानिक उपकरण लगे हैं जो वहां धरती पर जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड की रचना से जुड़े सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं.

Indonesien cave painting in Sulawesi

इंसानों की बनाई सबसे पहली पेंटिंग
अक्टूबर 2014 में साइंस में छपी रिपोर्ट में बताया गया कि इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप में चूना पत्थर की गुफा में करीब 40,000 साल पुरानी पेंटिंग मिली है. इसे मानव इतिहास की सबसे पुरानी पेंटिंग माना जा रहा है. इससे पहले तक सबसे पुरानी पेंटिंग यूरोप में मिली मानी जाती थी.
DNA

पहला सेमी-सिंथेटिक जीव
कैलिफोर्निया के स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक बैक्टीरिया ई. कोलाई के डीएनए को बढ़ाने में सफलता पाई. उन्होंने एक सूक्ष्मजीव के डीएनए में दो सिंथेटिक बेस पेयर जोड़ने में कामयाबी पाई. यह बेस पेयर जेनेटिक्स की दुनिया के अक्षर जैसे हैं जिनके क्रम से ही किसी जीव के लक्षण बनते हैं. इस प्रयोग के माध्यम से उन्होंने एक जीते जागते जीव के जीनोटाइप में परिवर्तन ला दिया.

Reconstruction of Archaeopteryx
डायनासोर से चिड़िया
कई रिसर्चरों ने चिड़ियों और डायनासोरों के बीच संबंधों पर काम किया. ऐसी एक खोज में पाया गया कि जैसे जैसे डायनासोरों में हल्की हड्डियां विकसित होने लगीं, वे खाना और आश्रय ढूंढने में बेहतर होने लगे. विकास के क्रम में आगे चलकर पंख विकसित हुए और वे उड़ कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने लगे और इस तरह पक्षी बने.
An insulin injection.

डायबिटीज का इलाज
रिसर्चरों ने ऐसी थेरेपी विकसित की जिसमें इंसुलिन पैदा कर सकने वाली बीटा कोशिकाओं का पुनर्निर्माण किया जा सके. बीटा कोशिकाएं ही इंसान के पैंक्रियाज य अग्नाशय में पर्याप्त इंसुलिन पैदा करवाती हैं जिससे ब्लड शुगर का स्तर सामान्य बना रहे. टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में बीटा कोशिकाएं नहीं पाई जातीं और इसीलिए उन्हें इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं. इस खोज से डायबिटीज का इलाज मिलने की उम्मीद जगी है.
lab mouse

चिरयौवन का स्रोत
रिसर्चरों ने एक युवा चूहों के रक्त से जीडीएफ11 नाम का एक प्रोटीन अलग किया और उसे बूढ़े चूहों में इंजेक्ट कर दिया. नतीजे चौंकाने वाले थे. बूढ़े चूहों में मांसपेशियों और मस्तिष्क का फिर से विकास होने लगा. इस तरह रक्त और प्लाज्मा की मदद से वैज्ञानिक चूहों में याददाश्त को सुधारने में सफल रहे. अब इस तरह के परीक्षण किए जा रहे हैं जिससे रक्त प्लाज्मा ट्रीटमेंट कर अल्जाइमर्स जैसी बीमारियां रोकी जा सके.
Synapses

मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग
2014 में ऑप्टोजेनेटिक्स के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई. रिसर्चरों ने अनुवांशिक रूप से बदले गए खास चूहों के दिमाग में लेजर लाइटों की बीम फेंक कर उनकी बुरी यादों को अच्छी यादों में बदल दिया. अब स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिक इस तरीके का इस्तेमाल कर कई तरह की दिमागी परेशानियों को दूर करने के उपाय खोज रहे हैं.
16 TrueNorth Chips

कंप्यूटर चिप में इंसानी दिमाग के गुण
आईबीएम के इंजीनियरों ने न्यूरोमॉर्फिक चिप्स बनाने में कामयाबी पाई, जो इंसानी दिमाग की नकल कर सकने वाली एक सेमीकंडक्टर डिवाइस होती है. ट्रूनॉर्थ नाम की एक नई तरह की चिप पैटर्नस् को पहचानने और अलग तरह की चीजों के बीच भेद कर पाने में बहुत अच्छी साबित हुई है.

Science intelligent mini-robots
रेंगने वाले रोबोट
कई कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने रोबोटों में 'स्वॉर्म इंटेलिजेंस' को बेहतर बनाने पर काम किया है. इसका अर्थ है बिना इंसानी मदद के कई सारे रोबोटों के बीच एक दूसरे के साथ मिलकर कुछ बना पाने की क्षमता.

Science mini-Satellites Archive 2009
छात्रों के सैटेलाइट
इस तस्वीर में छात्र अपने खुद बनाई मिनी-सैटेलाइट पर काम पूरा कर रहे हैं. साल 2014 में ही करीब 75 ऐसी सैटेलाइटों को धरती के पास वाले ऑर्बिट में भेजा गया. इनमें से हर सैटेलाइट किसी खास शोध को करने में बहुत अच्छी रही लेकिन इनमें बहुत सारे उपकरणों को लगाने की संभावना नहीं.

sabhar : http://www.dw.de/



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पहला मेंढक जो अंडे नहीं बच्चे देता है

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वैज्ञानिकों को इंडोनेशियाई वर्षावन के अंदरूनी हिस्सों में एक ऐसा मेंढक मिला है जो अंडे देने के बजाय सीधे बच्चे को जन्म देता है.

Der Israelische Scheibenzüngler

एशिया में मेंढकों की एक खास प्रजाति 'लिम्नोनेक्टेस लार्वीपार्टस' की खोज कुछ दशक पहले इंडोनेशियाई रिसर्चर जोको इस्कांदर ने की थी. वैज्ञानिकों को लगता था कि यह मेंढक अंडों की जगह सीधे टैडपोल पैदा कर सकता है, लेकिन किसी ने भी इनमें प्रजनन की प्रक्रिया को देखा नहीं था. पहली बार रिसर्चरों को एक ऐसा मेंढक मिला है जिसमें मादा ने अंडे नहीं बल्कि सीधे टैडपोल को जन्म दिया. मेंढक के जीवन चक्र में सबसे पहले अंडों के निषेचित होने के बाद उससे टैडपोल निकलते हैं जो कि एक पूर्ण विकसित मेंढक बनने तक की प्रक्रिया में पहली अवस्था है. टैडपोल का शरीर अर्धविकसित दिखाई देता है.
इसके सबूत तब मिले जब बर्कले की कैलिफोर्निया यूनीवर्सिटी के रिसर्चर जिम मैकग्वायर इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप के वर्षावन में मेंढकों के प्रजनन संबंधी व्यवहार पर रिसर्च कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें यह खास मेंढक मिला जिसे पहले वह नर समझ रहे थे. गौर से देखने पर पता चला कि वह एक मादा मेंढक है, जिसके साथ करीब एक दर्जन लिसलिसे से बच्चे हैं.मैकग्वायर की यह रिसर्च साइंस पत्रिका 'प्लोस वन' में छपी है. वह बताते हैं, "दुनिया भर लगभग सभी मेंढकों में यानि करीब 6,000 से ज्यादा प्रजातियों में बाहरी निषेचन ही होता है. लेकिन यह मेंढक उन 10 या 12 प्रजातियों में से है जिनमें आंतरिक निषेचन होता है. उनमें से भी यह एकलौता ऐसा है जो बच्चे को जन्म देता है. जबकि बाकी मेंढक निषेचित अंडे देते हैं."
अफ्रीकी देशों में पाए जाने वाले कुछ मेंढकों में भी आंतरिक निषेचन होता है और वे फ्रॉगलेट को जन्म देते हैं जो कभी टैडपोल अवस्था से नहीं गुजरते. यूनीवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से जारी बयान के मुताबिक कुछ मेंढक अंडों को पीछे की थैली में या मुंह के अंदर थैली में रखते हैं. पहले मेंढकों की दो ऐसी प्रजातियां भी मिली हैं जो बच्चे निकलने तक अंडों को खुद अपने ही पेट में रखते थे. अब खत्म हो चुकी मेंढक की इस किस्म में वे अपने निषेचित अंडों को खुद ही निगल जाते और तैयार हो जाने पर उन्हें मुंह से ही फ्रॉगलेट के रूप में बाहर निकालते थे. sabhar :http://www.dw.de/


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गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

1600 किमी प्रति घंटे रफ़्तार वाली कार

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ब्लडहाउंड एसएससी


ये थोड़ा अंतरिक्ष यान है, कुछ कार जैसा है और कुछ जेट फाइटर जैसा.
इन सबका मिला-जुला रूप है ब्लडहाउंड सुपरसोनिक कार, जिसकी रफ़्तार के बारे में आप सुनेंगे तो आपको यक़ीन नहीं होगा.
दुनिया के सबसे तेज़ विमान कॉनकॉर्ड की रफ़्तार से बस कुछ ही कम है इसकी स्पीड.
अगर सब कुछ इंजीनियरों की योजना के अनुसार चला तो नई पीढ़ी की इस 'कॉनकॉर्ड कार' की स्पीड होगी 1000 मील यानी क़रीब 1600 किलोमीटर प्रति घंटा.

ब्लडहाउंड एसएससी

ब्लडहाउंड (एसएससी) आख़िर कैसे हासिल करेगी ये रफ़्तार?
ब्लडहाउंड एसएससी
ब्लडहाउंड प्रॉजेक्ट के चीफ़ इंजीनियर मार्क चैपमैन कहते हैं कि पहला थ्रस्ट एसएससी इंजन कार को 763 मील प्रति घंटे की रफ़्तार देने में ही सक्षम था.
ब्लडहाउंड एसएससी में एक-दो नहीं बल्कि तीन इंजन हैं. पहले दो इंजन कंबाइंड हैं, तीसरा इंजन रेसिंग कार की तरह का है. जो कार को रॉकेट जैसी गति देता है.
ये इंजन 20 टन की ताक़त से सुपरसोनिक कार को रफ़्तार देगा.
ब्लडहाउंड एसएससी
चैपमैन कहते हैं कि ब्लडहाउंड एसएससी 1600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार पाने के लक्ष्य से तैयार किया जा रहा है.

अनूठी खूबियां

ब्लडहाउंड एसएससी को 2015 तक ट्रैक पर उतारने का लक्ष्य है.
ब्लडहाउंड एसएससी
अगर कार की खूबियों की बात करें तो कार में ड्राइवर के बैठने की जगह अंतरिक्ष, एरोनॉटिकल और फॉर्मूला वन इंजीनियरिंग के कॉम्बिनेशन से तैयार की गई है.
अब तक की तेज़ रफ़्तार कारों में तरल प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है, जबकि ब्लडहाउंड में ठोस रबर ईंधन का इस्तेमाल होगा.
कार की चेसिस पर ख़ास ध्यान दिया गया है. सभी मशीनों को बनाने के लिए कार्बन फाइबर्स का इस्तेमाल किया गया है.
चेसिस में टाइटेनियम की छड़ों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. साथ ही एल्यूमीनियम का भी. एल्यूमीनियम के ऑक्साइड की परत इतनी मोटी होगी कि इसमें किसी तरह की जंग नहीं लगेगी.

कॉकपिट का ख़याल

मार्क चैंपमैन
इंजन की थरथराहट कॉकपिट तक न पहुंचे, इसके लिए ख़ास तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.
अंदर बैठे ड्राइवर को अहसास ही नहीं होगा कि कार का जेट इंजन कितना शोर कर रहा है. हाँ, शुरुआत में इंजन के शोर को लेकर कुछ परेशानी आ सकती है.
इसके लिए ड्राइवर ख़ास तरह के हेडफोन का इस्तेमाल करेंगे.
रेसिंग इंजन कार को अतिरिक्त ताक़त देता है. इससे यह कार इतनी तेज़ी से भागने लगती है कि अपनी ही पैदा की गई ध्वनि तरंगों तक को पीछे छोड़ देती है.
sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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रविवार, 21 दिसंबर 2014

क्लिनिकली डेड इंसान को भी रहता है होश

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मेडिकल लिहाज से डेड करार दिए जा चुके इंसान को भी होश रह सकता है...


लंदन

किसी का दिल और दिमाग काम करना बंद कर दे तो उसे मरा हुआ ही समझा जाएगा ना, पर क्या कोई यह उम्मीद भी कर सकता है कि वह इंसान अपने आसपास की हलचल महसूस कर रहा होगा। यकीन करना मुश्किल है मगर साइंटिस्ट्स ने 2000 लोगों पर स्टडी के बाद यही पता लगाया है। डॉक्टरों के मुताबिक, मेडिकल लिहाज से डेड करार दिए जा चुके इंसान को भी होश रह सकता है।

साउथैंप्टन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने मौत के बाद कैसा लगता है इस बात को जानने के लिए यूके, यूएस और ऑस्ट्रिया के 15 अस्पतालों से मरीजों को चुना। ये वो लोग थे जिन्हें दिल का दौरा पड़ा था। साइंटिस्ट्स ने चार साल तक तहकीकात की और पाया कि इनमें से करीब 40 पर्सेंट लोगों को उस वक्त भी होश था, जबकि क्लिनिकल तौर पर वह डेड करार दिए जा चुके थे।

हालांकि बाद में उनके दिल ने दोबारा काम करना शुरू कर दिया। रिसर्चरों के मुताबिक, इनमें से एक शख्स को तो यहां तक याद है कि वह अपने शरीर से किस तरह बाहर आया और कमरे के एक कोने से अपने शरीर के साथ सबकुछ होता हुआ देख रहा था।

'द टेलिग्राफ' के मुताबिक, साउथैंप्टन के 57 साल के एक सोशल वर्कर का कहना था कि बेहोशी और तीन मिनट तक डेड पड़े रहने के बाद भी मुझे अच्छी तरह याद है कि नर्सिंग स्टाफ मेरे आसपास क्या-क्या कर रहा था। इस शख्स को मशीनों की आवाज तक याद थी।

स्टडी को लीड करने वाले यूनिवर्सिटी के ही एक पूर्व रिसर्च फेलो डॉ. सैम पर्निया के मुताबिक दिल एक बार धड़कना बंद कर दे तो दिमाग काम करना बंद कर देता है। पर इस शख्स के मामले में देखा गया कि दिल का धड़कना बंद होने के 3 मिनट बाद तक व्यक्ति को होश था जबकि होता यह है कि धड़कन बंद होने के 20 से 30 सेकेंड बाद ही दिमाग आमतौर पर काम करना बंद कर देता है।

कमाल की बात तो यह है कि उस शख्स ने अपने आसपास हो रही हलचल के बारे में जो-जो भी बताया वो सब सही निकला। यहां तक कि पास रखी मशीन हर तीन मिनट पर एक आवाज निकालती थी और उस मरीज ने उस मशीन से दो आवाजें सुनी थीं। इस तरह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस शख्स को कितनी देर तक होश रहा होगा। पर्निया के मुताबिक, उस शख्स की बात पर भरोसा करना ही होगा क्योंकि जो भी उसने बताया वह असल में उसके इर्द-गिर्द हो रहा था।

गौरतलब है कि इस स्टडी के लिए जिन 2060 मरीजों को चुना गया था उनमें से 330 लोग बच गए थे और 140 का कहना था कि उन्हें धड़कन वापस आने तक किसी न किसी तरह के एक्सपीरियंस हुए थे। पांच में से एक का कहना था कि उन चंद मिनटों में एक अजीब सी शांति का अहसास हुआ था। वहीं एक तिहाई का कहना था कि वे धीमे पड़ गए थे या उनकी स्पीड तेज हो गई थी।

कुछ ने कहा कि हमने चमकीली रोशनी देखी, किसी ने तेज सुनहरी रोशनी या चमकता सूरज देखा। वहीं कुछ को डर या डूबने का अहसास हुआ था। डॉ. पर्निया मानते हैं कि कई और लोगों को भी मौत के करीब पहुंचने पर ऐसे अनुभव हुए होंगे मगर दवाओं या बेहोशी की दवाओं के कारण शायद वे याद न रख पाएं हों। यह स्टडी जर्नल रिससिटेशन में छपी है।

मौत के करीब होने का अहसास करने वाले कई लोग दुनिया में हैं। गैलप के एक पोल के मुताबिक अमेरिका में आबादी का 3 पर्सेंट हिस्सा मानता है कि उसने ऐसा अहसास किया है। वैसे हर ऐसा अनुभव सच होगा ही ऐसी भी कोई गारंटी नहीं। 58 पेशंट्स पर की गई एक स्टडी से पता लगा था कि 30 मरीज तो मौत के करीब पहुंचे भी नहीं थे जबकि उन्हें लगा था कि वे मौत के करीब थे। हाल की कई स्टडी इस तरह के अनुभवों का तरह-तरह से आकलन करती रही हैं।

काश... मैं कभी न जागूं!

टेक्सस के रहने वाले 18 साल के बेन ब्रीडलव को दिल की बीमारी है। यूट्यूब में उन्होंने मौत के करीब पहुंचने के अहसास को बयां किया है। ऐसे ही एक वाकये के बारे में उन्होंने बताया कि जब मैं बेहोश था, मैंने खुद को एक सफेद कमरे में पाया, जिसकी दीवारें नहीं थीं। वहां कोई शोर नहीं था और उसी शांति का अहसास हो रहा था जो चार साल की उम्र में भी मुझे हुई थी। मैंने एक सुंदर सूट पहना था। मैंने आइने में खुद को देखा और गर्व महसूस किया। मैं वहां से जाना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि फिर कभी जागूं।
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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रविवार, 30 नवंबर 2014

इंटरनेट के जरिए दूसरे का दिमाग होगा काबू में

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brainवॉशिंगटन।। वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक शख्स एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे शख्स की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। खास बात यह है कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन में प्रोफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रेकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है, 'जिस तरह से इंटरनेट कंप्यूटरों को आपस में जोड़ने का काम करता है, ठीक वैसे ही इंटरनेट दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है। हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक शख्स से दूसरे में ट्रांसफर करना चाहते हैं।'

गौरतलब है कि ड्यूक यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच ब्रेन-टु-ब्रेन कम्यूनिकेशन होने से जुड़ा प्रयोग किया था। हावर्ड ने भी इंसान और चूहे के बीच ऐसा प्रयोग किया है। राव का मानना है कि उनका यह प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्यूनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है। 
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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

चूहे में इंसानी दिमाग

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मस्तिष्क के प्रत्यारोपण की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक अहम कदम आगे बढ़ाया है. मानव दिमाग का अहम जीन जब उन्होंने चूहे में प्रत्यारोपित किया तो पाया कि चूहे का दिमाग सामान्य से ज्यादा तेज चलने लगा.



रिसर्चरों के मुताबिक इस रिसर्च का लक्ष्य यह देखना था कि अन्य प्रजातियों में मानव दिमाग का कुछ हिस्सा लगाने पर उनकी प्रक्रिया पर कैसा असर पड़ता है. उन्होंने बताया कि इस तरह के प्रत्यारोपण के बाद चूहा अन्य चूहों के मुकाबले अपना खाना ढूंढने में ज्यादा चालाक पाया गया. उसके पास नए तरीकों की समझ देखी गई.
एक जीन के प्रभाव को अलग करके देखने पर क्रमिक विकास के बारे में भी काफी कुछ पता चलता है कि इंसान में कुछ बेहद अनूठी खूबियां कैसे आईं. जिस जीन को प्रत्यारोपित किया गया वह बोलचाल और भाषा से संबंधित है, इसे फॉक्सपी2 कहते हैं. जिस चूहे में ये जीन डाला गया उसमें जटिल न्यूरॉन पैदा हुए और ज्यादा क्षमतावान दिमाग पाया गया. इसके बाद मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट के रिसर्चरों ने चूहे को एक भूलभुलैया वाले रास्ते से चॉकलेट ढूंढने की ट्रेनिंग दी. इंसानी जीन वाले चूहे ने इस काम को 8 दिनों में सीख लिया जबकि आम चूहे को इसमें 11 दिन लग गए.
इसके बाद वैज्ञानिकों ने कमरे से उन तमाम चीजों को निकाल दिया जिनसे रास्ते की पहचान होती हो. अब चूहे रास्ता समझने के लिए सिर्फ फर्श की संरचना पर ही निर्भर थे. इसके विपरीत एक टेस्ट यूं भी किया गया कि कमरे की चीजें वहीं रहीं लेकिन टाइल्स निकाल दी गई. इन दोनों प्रयोगों में आम चूहों को मानव जीन वाले चूहों जितना ही सक्षम पाया गया. यानि नतीजा यह निकला कि उनको सिखाने में जो तकनीक इस्तेमाल की गई है वे सिर्फ उसी के इस्तेमाल होने पर ज्यादा सक्षम दिखाई देते हैं.
मानव दिमाग का यह जीन ज्ञान संबंधी क्षमता को बढ़ाता है. यह जीन सीखी हुई चीजों को याद दिलाने में मदद करता है. जबकि बगैर टाइल या बगैर सामान के फर्श पर खाना ढूंढना उसे नहीं सिखाया गया था इसलिए उसे वह याद भी नहीं था. लेकिन दिमाग सीखी हुई चीजों को याददाश्त से दोबारा करने और बेख्याली में कोई काम करने के बीच अदला बदली करता रहता है. जैसे कोई छोटा बच्चा जब कोई नए शब्द सुनता है तो उन्हें दोहराता है लेकिन इसी बीच वह बेख्याली में अन्य पहले से याद शब्द भी बोलने लगता है. इस रिसर्च का यह भी अहम हिस्सा है कि दिमाग में ऐसा कैसे होता है.
एसएफ/एएम (रॉयटर्स)
sabhar :http://www.dw.de/

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विज्ञान का हिंदी में प्रसार हेतु विशेषज्ञों ने अपने विचार ब्यक्त किये

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जीएफ  कॉलेज शाहजहाँपुर  के बायो टेक्नोलॉजी  बिभाग ने हिंदी दिवस के अवसर विज्ञान का हिंदी में प्रसार हेतु एक संगोष्टी का आयोजन किया  जिसमे विज्ञान का हिंदी में प्रसार हेतु  विशेषज्ञों  ने अपने विचार ब्यक्त किये इस अवसर पर विशेषज्ञों  नयी तकनीको  का हिंदी में सरल भाषा में प्रसार हेतु तकनीको की क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग न करके उसी शब्दों को अंग्रेजी को हिंदी भाषा में लिखे तो ज्यादे अच्छा होगा इस अवसर पे बायो टेक्नोलॉजी बिभाग के छात्रों और बायो टेक्नोलॉजी  के हेड डॉ  स्वप्निल यादव जो एक वैज्ञानिक भी है छात्रों के साथ सलतम वैज्ञानिक भाषा के माद्यम से छात्रों को विज्ञानं के बारे जागरूकता प्रदान करते हुए विज्ञानं और हिंदी एक साथ चलने पे बल दिया  इस अवसर पे जीएफ  कॉलेज के प्रधानाचार्य ने भी विचार ब्यक्त किये जो निम्न लोगो ने जो योगदान दिया वो निम्न है
 डॉ. टी.बी. यादव (वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केन्द्र) 2: श्री अखिलेश पाल (गन्ना वैज्ञानिक) 3 श्री अमित त्यागी (सुप्रसिद्ध लेखक और पत्रकार) डॉ AQUIL अहमद (प्रिंसिपल): की अध्यक्षता आयोजक: डॉ. AMREEN इकबाल धन्यवाद प्रस्ताव: डॉ. FAIYAZ अहमद लंगर: डॉ. SWAPANIL यादव श्री विवेक कुमार, Asmat जहान, डॉ: के लिए विशेष धन्यवाद. पुनीत MANISHI, डॉ. बरखा सक्सेना

   

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सोमवार, 15 सितंबर 2014

अब चलेगा दिमाग से कंप्यूटर

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फोटो : samaylive.com


अब कंप्यूटर चलने के लिए की-बोर्ड और माउस की आवश्यकता नहीं होगी । आप जैसे ही सोचेंगे की कंप्यूटर पे कोई बेबसाइट खुल जाए  वह अपने आप खुल जायेगी ।  यह अब हकीकत में होने वाला है , वैज्ञानिको ने एक ऐसे कंप्यूटर को बनाने का दावा  किया है जो आदमी के दिमाग को पढ़ सकेगा । 
इंटेल कार्पोरेसन का एक समूह  ऐसी ही इंटेलिजेंट टेक्नोलॉजी पर काम कर रहा है ।  इस तकनीक प्रयोग अभी ब्रमांड वैज्ञानिक प्रो स्टेफन हाकिंस के ऊपर भी होने वाला है , जो मोटर न्यूरॉन नामक रोग से पीड़ित है जिसमे वो दिमाग से ही सोच कर ऐसे कंप्यूटर के माध्यम से लोगो तक अपनी बात पंहुचा सकेंगे ।  ये कंप्यूटर उसी तरह कार्य करेंगे  जैसे अस्पतालों में  प्रयोग  किया जाने वाला मैग्नेटिक रेजोनेंस स्कैनर करता है , जो दिमाग की  गतिविधियों  को ग्रहण कर सकने की छमता रखता है । 


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शनिवार, 13 सितंबर 2014

इंसानों में सिर्फ 8.2% DNA ही ऐक्टिव

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Only 8.2 per cent of human DNA is 'functional'

लंदन
इंसानों में डीएनए का सिर्फ 8.2 पर्सेंट हिस्सा ही ऐक्टिव और फंक्शनल होता है। ह्यूमन डीएनए से रिलेटेड यह चौंकाने वाली जानकारी ऑक्सफर्ड युनिवर्सिटी के एक रिसर्च के बाद सामने आई है।

2012 में साइंटिस्टों के बताए आंकड़े से यह पूरी तरह डिफरेंट है। पहले बताया गया था कि ह्यूमन बॉडी में 80 पर्सेंट डीएनए ऐक्टिव और फंक्शनल होता है।

आंकड़ों को साबित करने के लिए ऑक्सफर्ड की टीम ने टेस्ट किया कि मैमल्स के 100 मिलियन से भी ज्यादा सालों के जांच के दौरान ऐसे कितने डीएनए हैं, जिनमें बदलाव देखने को नहीं मिला। इसका मतलब यह है कि ऐसे डीएनए महत्वपूर्ण हैं और इनका कोई न कोई रोल जरूर होगा। 



डीएनए क्या है? डीएनए यानी डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड। मानव समेत सभी जीव में अनुवांशिक (जेनेटिक) गुण इसी के जरिए आता है। मनुष्य के शरीर की लगभग हर कोशिका (सेल) में समान डीएनए मौजूद होते हैं।

ज्यादातर डीएनए कोशिका के न्यूक्लियस में उपस्थित होते हैं जिन्हें न्यूक्लियर डीएनए कहा जाता है। कुछ डीएनए माइटोकॉन्ड्रिया में भी होते हैं जिन्हें माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए कहते हैं।

डीएनए में इन्फर्मेशन 4 केमिकल्स (बेस) के कोड मैप के रूप में होती हैं - एडेनिन, गुआनिन, साइटोसिन और थायमिन। मानव डीएनए करीब 3 बिलियन बेस से बना होता है। इनमें से 99 पर्सेंट बेस सभी लोगों में समान होते हैं। किसी क्रिएचर का रूप क्या होगा यह इन बेस या केमिकल्स की सीक्वेंस पर निर्भर करता है।

sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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एटम भी बातें करते हैं, आपने सुना!

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पीटीआई, लंदन 
वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी एटम यानी पदार्थ के मूलभूत कण की आवाज को 'सुनने' में कामयाबी हासिल करने का दावा किया है। 
दरअसल स्वीडन की शार्मस यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलजी के वैज्ञानिकों ने एक आर्टिफिशल एटम को सुनने के लिए जब लाइट और साउंड की जुगलबंदी का इस्तेमाल किया तो क्वांटम फिजिक्स से जुड़ी कई अवधारणाएं और स्पष्ट हुईं। हालांकि क्वांटम फिजिक्स में लाइट और साउंड के प्रयोग पहली बार नहीं हो रहे थे, लेकिन इस बार खासियत यह थी कि वैज्ञानिकों ने एटम से 'इंटरैक्शन' वाली साउंड वेव्ज को कैप्चर करने में कामयाबी हासिल की, जो अपने आप में अनूठी थी। दरअसल ये ध्वनि तरंगे उस आर्टिफिशल एटम से इस तरह निकल रही थीं, मानो यह उसी एटम की आवाज हों। वैज्ञानिकों की इस टीम के मुखिया पेर डेल्सिंग कहते हैं कि इस प्रयोग से हम क्वांटम वर्ल्ड में एटम को सुनने और उससे बातचीत करने के नए दरवाजे खोल चुके हैं। हमारा मकसद क्वांटम फिजिक्स को इतना परिष्कृत कर देना है, जिससे कि इसके नियमों से हम सबसे तेज कंप्यूटर बनाने, क्वांटम लॉज को मानने वाले इलेक्ट्रिकल सर्किट ईजाद करने जैसे उपयोगी फायदे उठा सकें। 
यह आर्टिफिशल सर्किट भी किसी क्वांटम इलेक्ट्रिकल सर्किट की तरह है, जिसे चार्ज करें तो उससे एनर्जी का निरंतर उत्सर्जन देखा जा सकता है। वैसे यह आर्टिफिशल एटम सिर्फ प्रकाश का एक पार्टिकल है, लेकिन शार्मस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इसे किसी साउंड पार्टिकल की तरह एनर्जी सोखने और उत्सर्जित करने जैसा डिजाइन किया था। सैद्धांतिक रूप से देखें तो एटम की इस साउंड को क्वांटम पार्टिकल्स में डिवाइड किया जा सकता है। लेकिन इस रिसर्च आर्टिकल के पहले लेखक मार्टिन गुस्ताफसन कहते हैं कि ऐसे पार्टिकल्स से निकली साउंड सबसे धीमे होगी। 
गुस्ताफसन बताते हैं कि आखिर कैसे एटम की आवाज को डिटेक्ट किया जा सका। वह कहते हैं कि साउंड की धीमी स्पीड के कारण हमारे पास इसके क्वांटम पार्टिकल्स को कंट्रोल करने का वक्त होगा, लेकिन ऐसा प्रकाश कणों के क्वांटम पार्टिकल्स के साथ मुमकिन नहीं है, क्योंकि वे साउंड पार्टिकल्स की तुलना में 1 लाख गुना कहीं तेजी से ट्रैवल करते हैं। ऐसे में उनकी साउंड को डिटेक्ट करना मुमकिन नहीं। साथ ही, ध्वनि तरंगों की वेवलेंथ भी प्रकाश तरंगों की तुलना में छोटी होती है। इसलिए जो परमाणु प्रकाश तरंगों के साथ इंटरैक्ट करते हैं वे हमेशा प्रकाश तरंगों से छोटी वेवलेंथ वाले होंगे। लेकिन ध्वनि तरंगों से वे कहीं ज्यादा बड़े होंगे। 
इस प्रयोग का फायदा यह भी हुआ कि कोई साइंटिस्ट अब किसी आर्टिफिशल एटम को कुछ निश्चित तरंगों केसाथ डिजाइन कर सकता है जिससे कि वे ज्यादा तेज आवाज के साथ इंटरैक्ट कर सकें। वैसे इस प्रयोग में 4.8गीगा हर्त्ज की फ्रीक्वेंसी इस्तेमाल की गई। यह उतनी ही है जितनी आम वायरलेस नेटवर्क्स में इस्तेमाल होत ी है। 

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विटामिन बी1 की कमी ब्रेन को कर देती है फेल

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नई खोज से पता चला है कि विटामिन बी1 की कमी से ब्रेन की घातक बीमारी वैनिक इंसेफैलॉपथी हो सकती है। ऐल्कॉहॉल और एड्स के 75-80 पर्सेंट केसों में इस बीमारी के होने की आशंका रहती है। यह ब्रेन की ऐसी बीमारी है, जिसमें समय पर इलाज नहीं होने पर मरीज इंसेफैलॉपथी का शिकार हो जाता है।

मेटाबॉलिक संतुलन बिगड़ने और नशीले पदार्थ का सेवन करने से यह बीमारी होती है। लायोला यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के न्यूरॉलजिस्ट के मुताबिक, वैनिक इंसेफैलॉपथी से पीड़ित में कन्फ्यूजन, भ्रम, कोमा, मांसपेशियों की कमजोरी और दृष्टि दोष जैसी दिक्कतें होती हैं। यही बाद में स्थायी तौर पर ब्रेन डैमेज का कारण बनती हैं और मरीज की मौत भी हो जाती है। साइंस अमेरिकन मेडिसिन जर्नल में इस नई खोज को प्रकाशित किया गया है।
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