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लोच नेस मॉन्सटर पानी में रहने वाला एक विशाल जीव है जो अब तक रहस्य्मय ही बना हुआ है इससे संबंधित किद्वन्तियाँ भी प्रचलित है माना जाता है कि यह स्कॉटिश हाई लाइट्स पर रहता है हमने कई समुद्री जीव देखे हैं जिसमें से कुछ अति सुंदर तो कुछ अत्यंत भयंकर होते हैं इन्हीं भयानक जीवो में से एक लोच नेस मॉन्सटर है स्कॉटलैंड की झील लोच नेस पाया गया है वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर एली विलियम्स ने इस अजीब अजीबोगरीब जीव की तस्वीर ली है बाद में जब उन्होंने इन तस्वीरों को देखा तो अली का ध्यान इस मॉन्स्टर की ओर गया हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पानी में रहने वाला यह जीव सबकी नजरों में आया है सबसे पहली बार यह इसी झील में 2006 में देखा गया था जिसके बाद से वह वहां आने वाले लोगों को सचेत कर दिया गया था फोटोग्राफर अली ने कहा कि शुरुआत में मुझे लगा वह कोई सांप की प्रजाति है फिर कैटफिश की तरह लगा मगर मुझे नहीं पता वह है क्या मैं यहां विशेष लोगों के ऊपर छोड़ता हूं आपको बता दें लोच नेस मॉन्सटर पानी में रहने वाला एक विशाल जीव है जिस कारण अभी तक बरकरार है कुछ लोग उसके अस्तित्व पर शक भी करते हैं मगर इससे संबंधित कई किस्से भी सामने आए हैं माना जाता है
आने वाले समय में सोचते ही संदेश टेलीपैथी के द्वारा पहुंच जाएंगे यह प्रयोग पहले ही भारत में किया जा चुका है जिसने तिरुवंतपुरम में बैठा व्यक्ति का संदेश 5000 किलोमीटर दूर बैठे फ्रांस में एक व्यक्ति को बिना बताए जो संदेश उसे भेजा गया वह उन्हें डिकोट करके पढ़ लिया जिसमें शोधकर्ता ने इलेक्ट्रोन्सेफेलोग्राफी हेडसेट का प्रयोग करके दिमाग में होला और सिआओ कहने पर न्यू डांस की गतिविधियों की में उनकी इलेक्ट्रिक इक्विटी को रिकॉर्ड किया मैं बायनरी कोर्ट में बदलकर दूसरे व्यक्ति के ब्रेन तक भेज दिया जिससे मात्र महसूस कर डिकोट कर लिया इसमें इलेक्ट्रिक करंट को तमाम तरह के विचारों से जोड़ा जाता है और उसे कंप्यूटर इंटरफेस में डाल दिया जाता है कंप्यूटर इन सिग्नल का विशेषण कर क्रिया को नियंत्रित करता है कंप्यूटर इंटरफेस की जगह आउटपुट के लिए दूसरे व्यक्ति के दिमाग को आईजी से जोड़ दिया जाता है रिसीवर एंड पर बैठे व्यक्ति के पास जब मैसेज पहुंचा पहुंचा तो उसे चमक सी महसूस हुई जब उसने इसे डिकोड किया तो वही संदेश निकला जो संदेश भेजने वालों ने लिखा था इस प्रकार वेदों पुराणों में देवताओं आध्यात्मिक रूप से उन्नत महात्माओं को टेलीपैथी द्वारा संदेश भेज आने का जिक्र मिलता है वह आज इस तरह साबित हो रही है
नियंडरथल होमो सेपियंस की एक विलुप्त प्रजाति है जो आधुनिक मानव से कड़ी से संबंध से संबंधित है नियंडरथल और आधुनिक मानव के डीएनए के अध्ययन से यह साफ़ होता है की 300000 से 400000 वर्ष पूर्व एक ही पूर्व से अलग हुए थे हालांकि अभी भी यह रहस्य है कि नियनथंडल कब और क्यों विलुप्त हुए थे यह जीवाश्मों के अध्ययन से यह जाहिर होता है कि नियंडरथल का मस्तिष्क का आकार लगभग आधुनिक मानव के बराबर था उन्नत प्रकार के औजार बनाते थे उनकी अपनी भाषा थी अभी तक यह ज्ञात नहीं था कि वे आधुनिक मानव की तरह बोल सकते थे या नहीं अभी तक यह सिद्धांत प्रचलित था कि भाषा का विकास आधुनिक मानव के उद्गम वह विकास के साथ ही हुआ है लेकिन अब नवीन अनुसंधान यान इशारा करते हैं कि उनकी अपनी भाषा थी और हो सकता है उनके शब्दों में हमारे प्रजाति की भाषा में भी अपना योगदान दिया हो नीदरलैंड के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर साइकोलिंगगुइस्टिक निज़मेगेन के शोधकर्ता डान यू तथा स्टीफन सी लेविंसन ने मानव जीवन का अध्ययन करके बताया कि आधुनिक भाषा और वाणी का उद्गम लगभग 500000 वर्ष पूर्व कि हमारे और नियंडरथल के उभयनिष्ठ पूर्वजो तक खोजा जा सकता है
पूरे विश्व में लगभग तीन करोड़ 40 लाख 98 हज़ार पैदा करने वाले एचआईवी के संक्रमण से पीड़ित है उनमें से एक बड़ी जनसंख्या निर्धन और विकासशील देशों में है एक व्यक्ति में क्रमिक रूप से प्रभाव होते होते प्रतिरोधी तंत्र के कारण जीवन के लिए जोखिम पैदा करने वाले संक्रमण जैसे जीवाणु जाने विसर्जन कवक तथा प्रोटोजोआ अन्य सरकार पूरी तरह से हावी हो जाते हैं और अंत में रोगी की मौत हो जाती है अभी तक कोई प्रभाव की खोज नहीं की जा सकती है उसके लिए दवा का प्रयोग किया जाता है इसका उपयोग की समस्या उत्पन्न हो सकती है अब मानव जीन से एचआईवी का संक्रमण का इलाज संभव है
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने न केवल लैब में किडनी विकसित करने में सफलता प्राप्त की है बल्कि उसे सफलतापूर्वक एक चूहे में प्रत्यारोपित कर दिया है इस किडनी ने मूत्र बनाना आरंभ कर दिया है और गौरतलब है कि सभी के कई ऐसे हैं जिन्हें लैब में विकसित करके मरीजों को लगाया जा चुका है लेकिन अब तक बनाए गए अंगो में गुर्दा सबसे अधिक शरीर का एक महत्वपूर्णअंग है खून की सफाई करके इसमें फालतू पानी बेकार के तत्वों को निकालता है या रोपण के लिए इसकी मांग भी सबसे ज्यादा है कैसे बनाया जाता है गुर्दा अमेरिका के एक हॉस्पिटल में तैयार किया गया है इसके लिए डाक्टरों ने चूहे की एक किडनी ली और डिटर्जेंट से उसकी सभी पुरानी कोशिकाओं को धो डाला बचे हुए प्रोटीन का जाल हो जो बिलकुल गुर्दे जैसा लग रहा था इसके अंदर खून की कोशिकाओं और निकासी का जटिल भाषा भी मौजूद था प्रोटीन के इस ढांचे को गुर्दे के सभी भाग में सही कोशिका को भेजने के लिए इस्तेमाल किया गया जहां भी पुनर्निर्माण के लिए ढांचे के साथ मिल गए इसके बाद एक खास तरह से रखा गया और तापमान को पैदा किया गया रखा गया जब देखी गई प्राकृतिककिडनी के मुकाबले का ३० प्रतिशत मूत्र का निर्माण किया यह बड़ी सफलता है आने वाले वक्त में मनुस्य में प्रत्यारोपित करने में सफलता मिल सकती है
वह प्रतिरक्षा विकार एक ऐसी शारीरिक अवस्था है जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ ऊतकों पर हमला करके उसे उन्हें नष्ट करने लगती है स्व प्रतिरक्षा विकारों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस मायस्थेनिया ग्रेविस ग्रेप्स रोग रूमेटाइड अर्थराइटिस सिस्टमिक लुपस एरिदमेटोसस टाइप 1 डायबिटीज इतिहास शामिल है हाल के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध से इस बात के संकेत मिलते हैं कि बढ़ती स्व प्रति रक्षित रोग दर के पीछे नमक का अधिक उपयोग करना हो सकता है यह खोज शोधकर्ता के विभिन्न दलों द्वारा एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं पर किए गए कार्य पर आधारित है जिसे th17 कोशिकाएं कहते हैं यह कोशिकाएं विभिन्न स्व प्रति रक्षित रोगों में लिप्त पाई गई हैं जब हमारा शरीर किसी विशिष्ट रोगाणुओं से संक्रमित होता है तो केवल उसको पहचानने वाली थी वह भी कोशिकाएं ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती हैं यह को शिकायत तेजी से बढ़ती हैं और संक्रमण से लड़ने के लिए अपने जैसी कोशिकाओं की एक फौज तैयार कर लेती है विशेष प्रकार की एटी एवं बी कोशिकाएं आक्रमणकारी रोगाणु की स्मृति बनाए रखती हैं और हमें उनके हक दूसरे हमले से प्रशिक्षित कर देते हैं शोधकर्ताओं के अनुसार जिन लोगों ने यह स्वीकार किया है कि वे फास्ट फूड खाते हैं उसमें th17 कोशिकाओं की संख्या अधिक थी जैसा की सर्वविदित है कि फास्ट फूड में नमक की मात्रा अधिक होती है यह जानने के लिए क्या नमक ही th17 कोशिकाओं की अधिकता का कारण है शोधकर्ताओं में कोशिकाओं के संवर्धन में सोडियम क्लोराइड डाला उन्होंने पाया कि नमक में मध्यम दर्जे की विधि से अधिक नमक खाने वाले प्राणियों को ही की तरह कोशिकाओं की संख्या 10 गुना तक बढ़ गई इंटेक्स पर कोशिकाओं ने ऐसे और बनाने शुरू कर दिए जो इस बात का सूचक था कि वे हानिकारक कोशिकाएं हो गए थे यह परीक्षण चूहों पर किया गया
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस- इसके क्षेत्र में कई सफल परीक्षण हो चुकी हैं कुछ क्षेत्रों में इसकी सफलता भी प्राप्त की जा चुकी है आने वाले समय में मानव निर्णय और विश्लेषण के आधार पर इसका प्रयोग किए जाने की संभावना हैमशीन विजन इसमें काफी छोड़कर चल रहा है अभी तक निकालने के बाद बहुत बदलाव देखने को मिलेगा जिसमें ड्राइवरलेस कार और अपने से चलने वाले अन्य उपकरण
सोमेटिक वेब - आंसरिंग मशीन मीटिंग बेबी आंसरिंग मशीन पर काफी शोध कार्य चल रहा है हालांकि इसको बनाने में सफलता हासिल नहीं हो पाई है आने वाले समय आने वाले इसके आने से सर्च इंजन की जरूरत समाप्त हो जाएगी
सॉलि़ड स्टेट ड्राइव -इसे का प्रयास किया जा रहा है सॉलि़ड स्टेट ड्राइव बन जाने के बाद हार्ड ड्राइव की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी इस तकनीक की वजह से हटके लैपटॉप कंप्यूटर और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निर्माण संभव हो सकेगा साथ ही तेज और ऊर्जा के के फायदे स्टोरेज सिस्टम भी बनाए जा सकते हैं
3D ऑप्टिकल डाटा स्टोरेज- इस तकनीक के क्षेत्र में काफी कार्य चल रहा है इस तकनीक के आ जाने से मैग्नेटिक टेप स्टोरेज और अन्य मास स्टोरेज उपकरणों की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी इस तकनीक के द्वारा डाटा का भंडारण बड़े स्तर पर करना संभव हो जाएगा
स स्पिंट्रॉनिक्स तकनीक- इसका वर्किंग पूर्व प्रोटोटाइप तैयार हो चुके हैं इस तकनीकी आ जाने से मैकेनिकल मैग्नेटिक हार्ड डिस्क ड्राइव की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी इस तकनीक से भारी डाटा भंडारण किया जा सकेगा वायरलेस कम्युनिकेशन इस तकनीक से सभी जगह नेटवर्क कनेक्टिविटी उपलब्ध होगी स्क्रीन लिस्ट डिस्प्ले वर्चुअल रियलिटी का सपना साकार हो सकेगा
3D डिस्प्ले -यह तकनीक बाजार में काफी सुधार हो जाएगा
वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि क्या कृत्रिम बुद्धि से बने एंड्रॉयड्स (रोबो) भी धार्मिक हो सकते हैं। उनका कहना है कि संभव है कि एक दिन रोबो की कोई धर्म अपना लें और इसका अर्थ है कि वे मानवता की सेवा कर सकते हैं और इसे नष्ट करने की कोशिश नहीं करेंगे। लेकिन इसका उल्टा भी सच हो सकता है और संभव है कि धार्मिक होने से उनकी ताकत में बढ़ोतरी हो जाए।मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के मर्विन मिंस्की का कहना है कि किसी दिन कम्प्यूटर्स भी नीति शास्त्र को विकसित कर सकते हैं, लेकिन इस बात को लेकर चिंताएं हैं कि इन मशीनों को लेकर सारी दुनिया में धार्मिक संघर्ष भी पैदा हो सकता है। डेलीमेल डॉटकॉम के लिए एल्ली जोल्फागारीफार्ड का कहना है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस) दशकों की अपेक्षा वर्षों में एक वास्तविकता हो सकती है। हाल ही में एलन मस्क ने चेतावनी दी है कि आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस मनुष्यता के लिए परमाणु हथियारों की तरह से घातक हो सकती है।डेलीमेल डॉटकॉम में डिलन लव ने हाल ही में एक सारगर्भित रिपोर्ट पेश की थी जिसमें ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई थी। लेकिन मॉर्मन ट्रांसह्यूमनिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष, लिंकन कैनन ने लव से कहा कि कम्प्यूटर साइंस में ऐसे कोई नियम नहीं हैं कि सॉफ्टवेयर के लिए धार्मिक विश्वास रखना संभव होगा।उनका कहना था कि धर्म विरोधियों के मध्य कुछ ऐसी भोलीभाली आवाजें हैं जो कि एक मशीनी बुद्धि और धार्मिक विश्वासों के बीच तकनीकी असंगति की कल्पना करते हैं। इंस्टीट्यूट फॉर एथिक्स एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज से जुड़े एक स्कॉलर, जॉन मेसरली, का कहना है कि ' मैं मानता हूं कि आप कृत्रिम बुद्धि को लगभग किसी भी चीज पर विश्वास करने के लिए प्रोग्राम कर सकते हैं। वहीं कैनन का कहना है कि धार्मिक सुपरइंटेलीजेंस या तो सबसे अच्छी या सबसे खराब सिद्ध हो सकती है। उनका मानना है कि धर्म मात्र एक ताकत है और इसका उपयोग अच्छे या बुरे के लिए किया जा सकता है।पर जानकारों का कहना है कि धर्म पहले से ही अपने आप में सहिष्णु नहीं है और जिस धर्म के पास सुपरइंटेलीजेंस होगी, वह तो और भी कम सहिष्णु होगा। इन सवालों के बीच एक और प्रश्न उठा है कि क्या कृत्रिम बुद्धि की भी कोई आत्मा (सोल) हो सकती है? जबकि स्वीडिश दार्शनिक निक बॉस्ट्रम का कहना है कि 'सबसे बड़ा डर इस बात का है कि जैसे-जैसे रोबो अधिक स्मार्ट होते जाएंगे, वे एक ऐसा रास्ता चुनेंगे जोकि उनके अस्तित्व को निरंतर बने रहने को सुनिश्चित करता हो और इसका अर्थ मनुष्यता का विनाश हो सकता है।' पर प्रसिद्ध कॉमेडियन ड्रंकन ट्रसेल और रेवरेंड क्रिस्टोफर बेनेक मानते हैं कि धर्म के कारण रोबो मनुष्यता के साथ-साथ रह सकते हैं।पिछले महीने ही एलन मस्क ने एक हजार रोबोटिक्स विशेषज्ञों को चेताया कि स्वचालित हथियार कल के कलाश्निकोव साबित होंगे। इससे पहले प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग भी कह चुके हैं कि जो हथियार सार्थक मानवीय नियंत्रण से बाहर हो सकते हों, उन पर तत्काल प्रतिबंध लगा देना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु हथियारों की तरह सभी रोबो हथियार सहज, सुलभ तरीकों से उपलब्ध हो सकते हैं और इनका कच्चा माल हासिल करना भी मुश्किल नहीं होगा। और अंतत: यह तकनीक वैश्विक हथियारों की दौड़ को बढ़ावा दे सकती है तथा ऐसे हथियार हत्याओं जैसे काम के लिए आदर्श साबित होंगे
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वैज्ञानिकों की मानें, तो आने वाले दिनों में किसी भी मरीज के इलाज में खून की कमी नहीं होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि जल्द ही वे इलाज में जरूरत पड़ने वाले खून की बेशुमार मात्रा सप्लाइ कर पाएंगे। मौजूदा समय में लोगों को चिकित्सा कारणों से जब खून की जरूरत पड़ती है, तो ब्लड की किल्लत के कारण उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ती है। ब्लड डिसऑर्डर्स और कई अन्य बीमारियों में लोगों को बड़ी मात्रा में खून चढ़ाना पड़ता है। लंबे शोध के बाद वैज्ञानिक वयस्क कोशिकाओं को मूल कोशिकाओं में बदलने में कामयाब हुए हैं। ये मूल कोशिकाएं की भी तरह की रक्त कोशिकाएं बनाने में सक्षम होंगी।पिछले करीब 20 साल से वैज्ञानिक यह पता करने की कोशिश कर रहे थे कि क्या इंसान के खून में कृत्रिम तौर पर मूल कोशिकाओं का निर्माण किया जा सकता है। मूल कोशिकाएं शरीर में किसी भी तरह की कोशिकाएं बना सकती हैं। अब शोधकर्ताओं की एक टीम को अलग-अलग तरह की कोशिकाओं को मिलाने में सफलता मिली है। इनमें रक्त की मूल कोशिकाएं भी शामिल हैं। जब इन कोशिकाओं को चूहे के शरीर में डाला गया, तो उन्होंने अलग-अलग तरह की इंसानी रक्त कोशिकाओं का निर्माण किया।अमेरिका के बॉस्टन चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता डॉक्टर योइचि सुगिमुरा ने बताया, 'इस शोध की मदद से हम खून की वंशानुगत बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की कोशिकाएं ले सकते हैं और जीन एडिटिंग की मदद से उनके डिसऑर्डर को ठीक करके स्वस्थ रक्त कोशिकाएं तैयार कर सकते हैं। साथ ही, इसके कारण रक्त की मूल कोशिकाओं की अबाध आपूर्ति भी संभव हो सकती है।' हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रमुख और सुगिमुरा के साथी शोधकर्ता डॉक्टर जॉर्ड डेली ने कहा, 'हम शायद जल्द ही स्वस्थ और प्रामाणिक इंसानी रक्त तैयार करने में कामयाब हो जाएंगे। 20 सालों की मेहनत के बाद हम इस मकाम तक पहुंचे हैं।sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com
पोलैंड की वर्सा यूनिवर्सिटी ;के प्रोफ़ेसर स्टेनिलो कार पिंस्की और उनके ;साथी वैज्ञानिको का दावा है है की;पौधे प्रकाश में कैद जानकारिया समझ कर प्रतिक्रिया देते है । एक प्रयोग में जब पौधे के ऊपरी भाग में रोशनी डाली गयी ;तो उसका असर पूरे;पौधे पे सामान रूप से हुआ । शोधकर्ता बताते है की पौधेां का भी नर्वस सिस्टम होता है । साथ ही उनकी याददाश्त भी कमालकी होती है;। इसी कारण ;पौधे अपने ऊपर आये वातावरण मेंबदलाव के मुताबिक खुद को ढाल लेते है।
बेहद गोपनीय अमेरिकी सैन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले कुछ महीनों में वे मस्तिष्क प्रत्यारोपण के विकास से जुड़ी नई प्रगति के बारे में जानकारी पेश करने वाले हैं. मस्तिष्क प्रत्यारोपण की मदद से याददाश्त बहाल की जा सकेगीअमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) प्रबुद्ध स्मृति उत्तेजक को बनाने की योजना के कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही है. यह इंसानी दिमाग को बेहतर तरीके से समझने के लिए बनाई गई योजना का हिस्सा है. इस योजना में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दस करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता दी थी.विज्ञान ने पहले ऐसा काम नहीं किया है. और इस पर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं कि जख्मी सैनिक की याददाश्त को बहाल करने और बूढ़े होते मस्तिष्क के प्रबंधन के नाम पर क्या इंसानी दिमाग के साथ छेड़छाड़ जायज है.कुछ लोगों का कहना है कि जिन लोगों को इससे लाभ पहुंचेगा उनमें पचास लाख अमेरिकी हैं जो अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित हैं और करीब तीन लाख अमेरिकी फौजी हैं जिनमें महिलाएं और पुरुष शामिल हैं. ये वो सैनिक हैं जो इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान घायल हुए और उनके मस्तिष्क में चोटें आई.डीएआरपीए के प्रोग्राम मैनेजर जस्टिन साचेंज ने इसी हफ्ते अमेरिकी राजधानी में हुई एक कॉन्फ्रेंस में कहा, "अगर आप ड्यूटी के दौरान घायल हो जाते हैं और आप अपने परिवार को याद नहीं रख पाते हैं, ऐसे में हम चाहते हैं कि हम इस तरह के कामों को बहाल कर सकें. हमें लगता है कि हम न्यूरो कृत्रिम उपकरण का विकास कर सकते हैं जो सीधे हिप्पोकैंपस से इंटरफेस कर सकें और पहली प्रकार की यादें बहाल कर सकें. हम यहां एक्सप्लिसिट मेमरी के बारे में बात कर रहे हैं."एक्सप्लिसिट मेमरी यानि स्पष्ट यादें, ये लोगों, घटना, तथ्य और आंकड़ों के बारे में स्मरणशक्ति है और किसी भी शोध ने यह साबित नहीं किया है कि इन्हें दोबारा बहाल किया जा सकता है. अब तक शोधकर्ता पार्किंसन बीमारी से पीड़ित लोगों में झटके कम करने में मदद कर पाए हैं और अल्जाइमर के पीड़ितों में डीप ब्रेन सिमुलेशन प्रक्रिया की मदद से याददाश्त मजबूत करने में सफल हुए हैं.इस तरह के उपकरण हृदय पेसमेकर से प्रोत्साहित हैं और दिमाग में बिजली को पहुंचाते हैं लेकिन यह हर किसी के लिए काम नहीं करता है. जानकारों का कहना है कि स्मृति बहाली के लिए और अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण की जरूरत होगी. वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर रॉबर्ट हैंपसन कहते हैं, "स्मृति, पैटर्न और कनेक्शन की तरह है." डीएआरपीए की योजना पर टिप्पणी से इनकार करते हुए वे कहते हैं, "हमारे लिए स्मृति कृत्रिम बनाना वास्तव में ऐसा कुछ बनाने जैसा है जो विशिष्ट पैटर्न देता हो.चूहों और बंदरों पर हैंपसन के शोध से पता चलता है कि हिप्पोकैंपस में न्यूरॉन्स तब अलग तरह से प्रक्रिया देते हैं, जब वे लाल या नीला रंग या फिर चेहरे की तस्वीर या भोजन के प्रकार को देखते हैं. हैंपसन का कहना है कि मानव की विशिष्ट स्मृति को बहाल करने के लिए वैज्ञानिकों को उस स्मृति के लिए सटीक पैटर्न जानना होगा. सिंथेटिक जीव विज्ञान पर डीएआरपीए को सलाह देने वाले न्यूयॉर्क के लैंगोनी मेडिकल सेंटर में चिकित्सा विज्ञान में नैतिकता पर काम करने वाले आर्थर कैपलान कहते हैं, "जब आप दिमाग से छेड़छाड़ करते हैं तो आप व्यक्तिगत पहचान से भी छेड़छाड़ करते हैं. दिमाग में फेरबदल की कीमत आप स्वयं की भावना को खोने की जोखिम से करते हैं. इस तरह का जोखिम नई तरह का है, जिसका हमने कभी सामना नहीं किया है."
साभार dw.de