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शुक्रवार, 19 मार्च 2021

मन का विज्ञान

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ध्यानी और शराबी में सिर्फ होश और बेहोशी का ही फर्क होता है - 

Ek dhyani shrab pi le to kya hoga?

ध्यान में प्रवेश करने के बाद ध्यानी के लिए शराब पीना तो दूर की बात है, शराब पीने का विचार करना ही कठिन होगा। ध्यानी शराब पीने के विषय में सोच भी नहीं सकता है। यदि ध्यानी है। यदि सही में साधक है तो उसे शराब पीने की जरूरत ही नहीं रहेगी। क्योंकि शराब में हमारा जिस भावदशा में प्रवेश होता है, ध्यानी उस भावदशा में जी रहा होता है। यानि शराब पीने के बाद हमें थोड़ी देर के लिए जो मस्ती आती है उसी मस्ती में ध्यानी जी रहा होता है। अर्थात ध्यानी चौबिस घंटे नशे वाली मस्ती में रहता है। और होश में जी रहा होता है। इसलिए उसे शराब पीने की जरूरत ही नहीं रहेगी। 

शराब हमारे शरीर में क्या परिवर्तन करती है? 

जब हम शरीर में शराब को डालते हैं तो हमारा शरीर तनाव मुक्त होने लगता है। शिथिल होने लगता है, रिलेक्स होने लगता है। क्योंकि शराब हमारे शरीर को सुलाने का काम करती है। नींद में ले जाने का काम करती है। शराब पीने के बाद हमारी श्वास गहरी होकर नाभि तक जाने लगती है और शरीर नींद की भावदशा में आ जाता है। 
और जैसे ही शरीर नींद की भावदशा में आता है हमारा चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। यानि शराब में हमारा अचेतन मन में प्रवेश होता है। 

शराब में हमारा अचेतन मन काम करता है तभी तो शराब में वह वे सारी बातें भी बता देता है जो नहीं बतानी चाहिए थीं! शराब में हम उस स्थिति में होते हैं जिस स्थिति में सम्मोहन वाली नींद में होते हैं। शराब में हम उस स्थिति में होते हैं जिस स्थिति में हम सपने वाली नींद में होते हैं। शरीर नींद में सोया हुआ है तो हमारा अचेतन सपना बनाकर दिखाता है। और सम्मोहन और शराब में शरीर जागा हुआ होता है तो सामने से सीधे तौर पर कह देता है।

शराब में हमारा अचेतन मन के तल पर प्रवेश होता है। शराब में जो आनंद है वह अचेतन मन में प्रवेश करने का आनंद है। यानि चेतन मन के सोने और अचेतन मन के जागने का आनंद है। शराब हमारे शरीर को जागते हुए उस तल पर ले जाती है जिस तल पर हम नींद में होते हैं और सपने देख रहे होते हैं। शराब में जैसे ही हमारा शरीर नींद में प्रवेश करता है उसके साथ ही हमारा चेतन मन भी सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। अतः शराब जागते हुए अचेतन मन में प्रवेश करवाती है।

ध्यान में हमारे शरीर में क्या परिवर्तन होते हैं?

ध्यान में हम शरीर को शिथिल कर विश्राम में ले जाते हैं जिससे हमारा शरीर गहरी श्वास लेते हुए नींद वाली भावदशा में आ जाता है। और ज्यों ही शरीर गहरी श्वास लेता है शरीर से तनाव हटने लगते हैं और शरीर से तनाव के हटते ही हमारे मन से भी तनाव हटने लगते हैं, जिससे चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। और हम साक्षी हो अचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं। 

ध्यान में हमारी श्वास सतत नाभि तक चलती है, जैसी नींद में चलती है, गहरी नाभि तक जाती हुई। और गहरी श्वास से शरीर तनाव मुक्त हो विश्राम में होता है। शरीर शिथिल हो कर विश्राम में होता है तो मन भी शिथिल होकर विश्राम में जाने लगता है, सोने लगता है। और जैसे ही चेतन मन सोने लगता है अचेतन मन जागने लगता है। और ध्यानी हमेशा के लिए उस भावदशा में प्रवेश करता है जिस भावदशा में शराब पीने के बाद हमारा थोड़ी देर के लिए प्रवेश होता है। 

शरीर के शांत और शिथिल होने पर हमारा अचेतन मन के तल पर प्रवेश हो जाता है। अचेतन मन में प्रवेश करने पर हम निर्विचार हो जाते हैं और आनंद से भर उठते हैं। 

शरीर को शिथिल और शांत करने के लिए हम शरीर में शराब डालते हैं ताकि हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो और हम आनंदित हो सकें। और ध्यानी श्वास को गहरी कर नाभि तक ले जाकर शरीर को शिथिल करके अचेतन मन में प्रवेश करता है। शराब में हम हम सोए हुए होते हैं और ध्यानी ध्यान में जागा हुआ होता है। यदि शराब में हम जाग जाते हैं, होश से भर जाते हैं तो हमें फिर शराब की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि हमें पता चल जाएगा कि शराब शरीर को नींद की भावदशा में लाती है तो क्यों न हम श्वास को गहरी करके शरीर को नींद वाली भावदशा में ले जाएं और हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो और हम ध्यान को उपलब्ध हो सकें! 

ध्यानी शराब पी ले तो क्या होगा? 

ध्यानी पहले से ही उस तल पर खड़ा हुआ है जिस तल पर हमारा शराब पीने के बाद प्रवेश होता है। अचेतन मन के तल पर। और यदि ध्यानी शराब पी लेगा तो उसका शरीर और भी शिथिल होगा। वह और भी सजग हो जाएगा। और भी होश से भर जाएगा। उसका शरीर तो बेहोशी में होगा लेकिन वह भीतर पूरी तरह से जागा हुआ होगा। वह क्या कह रहा है और किससे कह रहा है इस बात का उसे पूरा बोध होगा। नशा उतरने के बाद भी उसे पता होगा कि उसने कब किससे क्या बात कही है। जबकि हम नशे में बेहोश होते हैं। हमने किससे क्या बात कही है हमें इस बात का कोई पता नहीं होता है। अतः ध्यानी और शराबी में सिर्फ होश और बेहोशी का ही फर्क होता है। 

ध्यानी के लिए शराब बाधा है क्योंकि शराब शरीर को बेहोश करके जिस तल पर ले जाती है, उस तल पर वह जागा हुआ पहले से ही खड़ा हुआ होता है। शराब अचेतन मन के तल पर प्रवेश करवाती है जबकि ध्यानी पहले से ही अचेतन मन के तल पर खड़ा हुआ होता है। अतः ध्यानी के लिए शराब पीना ठीक वैसा ही है जैसे हमने एक जोड़ी कपड़े पहने हुए हैं और उपर से एक जोड़ी कपड़े और पहन लिये हों! 

स्वामी ध्यान उत्सव

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आज के भौतिक विज्ञानऔर शिव संप्रदाय

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                                                                #शाक्त_संप्रदाय

आज के भौतिक विज्ञान की विकास परंपरा का भी यदि शैली से में इतिहास लिखा जाए तो अनेक अविष्कार को के नाम ऋषि की श्रेणी में आ जाए अंतर यह रहे कि इनके सूत्रों को ने वेद मंत्रों की तरह गाया जा सकता है ना व्यवहार का विषय बनाया जा सकता है यह उस युग की विशेषता हुई रही है कि वह ज्ञान के गूढ़ रहस्यों को सजीव रखने के लिए प्राण करने की परंपरा पर आ चुका है aइतना अवश्य ताकि इस स्थल को प्राप्त करने वाले के लिए तपस्या एक सती प्रथा का पालन करने वाला ही ऋषि कहलाता था
हमारे यहां ज्ञान विज्ञान का इतिहास वेदों से प्रारंभ हुआ या शैवकाल ज्ञान की उत्कण्ठापूर्ण  ऑकुलता की अवस्था है जिसमें मानव अपने इतस्तत व्याप्त प्राकृतिक क्रियाओं को देखकर चमत्कृत होता था संभव है कि देव शब्द इसी युग का सामना सर्वमान्य स्तर रहा हो जो व्यक्ति की क्षमताओं से अधिक अथवा लोकप्रकृति के व्यवहार को चक्षु विस्फारण के साथ देखता रहा था और उसमें विलास से विभोर  होता रहा था।
इन प्राकृतिक स्थितियों से वह भयभीत नहीं होता था सागर के दृष्टिविहीन विस्तार बादलों में चमकती हुई बिजलियां अग्नि की वन विनाशक लपटों को देखकर वह भयभीत नहीं वह प्रयुक्त आनंदित होकर उसकी स्तुति करने लगा इन व्यवहारों की उग्रता को उसने विरुद्ध प्रस्थितियों का विनाश करने वाला माना इसी तरह समाज प्रकृति के निकट रहा प्रकृति के प्रकोप से वह परिचित अवश्य था किंतु प्रार्थना से उसे अपने अनुकूल करने के लिए प्रयोग भी कर चुका था।
वेदों की ऋचाओं को अधिक मुखर करने के लिए उस युग में  वेदी को अपना परीक्षण स्थल बनाया वेद के साथ वेदी का संबंध संवत जुड़ना भी चाहिए क्योंकि उन विचारों का परीक्षण वेदी पर ही संभव था उपयोग का श्रेष्ठ अविष्कार अग्नि था सूर्य के रूप में ब्रह्मांड को ताप प्रकाश देने वाले विराट पिंड से उसके छोटे-मोटे काम संभव नहीं थे इसलिए उसने तेजस को लघुत्तम रूप में प्रकट करके वैश्वानर रूप दिया वेद में सर्वप्रथम अग्नि की ही स्तुति है #अग्निमीले_पुरोहितमं_देवानाम्_ऋत्विजं यह ऋग्वेद की प्रथम रिचा है रसायन शास्त्र की दृष्टि में रासायनिक परिवर्तन करने वाला सबसे विश्वस्त अर्जेंट अग्नि ही है अग्नि के अविष्कार से मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
वेद पौरूषय है अथवा अपौरूषय परन्तु ज्ञान अपनी शाश्वत अवस्था मे स्थिर एव अव्यय है अर्थात प्रकृति में जो कुछ घट रहा है अथवा घट सकता है उसकी एक व्यवस्था है एक शैली है इस शैली को समझना ही ज्ञान है यह शैली स्टूल भाव और अध्यात्मिक स्त्रोत पर अनंत विद हो जाती है प्रकृति की परिसीमा में होने वाला प्रत्येक कार्य व्यापार प्रकृति है फिर चाहे वह वैज्ञानिक हो साहित्यिक हो सामाजिक हो अथवा राजनैतिक हो उसमें सूक्ष्म रूप से प्रकृति सहज रूप में प्रवहित है।
इस दृष्टि से ज्ञान का यह स्वरूप वेद वेद शब्द का अर्थ विज्ञान ही होता है अपौरूषय होता है किंतु इस रहस्य को जब व्यक्ति अपने ढंग से अपनी आवश्यकता आग्रहो से प्रेरित होकर अविषकृत करता हैs तू यह रूप पौरूषय हो जाता है वेद भले ही ब्रह्मा के हाथ में रहे हो पर उनको सर्वश्रव्य बनाने वाला मनुष्य ही रहा है वेद मंत्रों के अविष्कर्ता अनेक ऋषि रहे हैं इसलिए यह ऋचायें सूक्ष्म रूप मैं अपने मूल स्तर पर अपौरूषय रही किंतु इनको अभी वक्त करने का श्रेय मनुष्य को ही दिया जा सकता है इस पूरे युग में अनेक चिंतक विज्ञान वादी रहे जो अपनी तरह से प्रकृति के रहस्य को समझाते समझते रहे उनका यह अनुसंधान चिंतन के स्तर पर अधिक प्रखर था और चिंतन को अथवा अविष्कार के सूत्रों को वे शब्द के माध्यम से प्रकट कर सकते थे इसलिए प्रत्येक ऋचा के साथ छंद अनिवार्य रूप में जुड़ता चला गया उसी अविष्कार का जो लक्ष्य था उसे देवता का नाम दे दिया गया आज के भौतिक विज्ञान की विकास परंपरा का भी यदि इस शैली में इतिहास लिखा जाए तो अनेक इस अविष्कारको के नाम ऋषि की श्रेणी में आ जाए।
घी अग्नि को तर्पण करने वाले वैदिक संप्रदाय ने जागतिक द्वंदो और चंचलता से उठकर ज्ञान को भौतिक लक्ष्यों से जोड़ दिया वेदी पर उसके परीक्षण चलते रहे सामाजिक व्यवस्था और राष्ट्रीय समृद्धि के लिए वह गहन अनुसंधान करता रहा किंतु अपने लिए वह मुक्ति को ही श्रेयस्कर मानता रहा संभव है hइसीलिए वेद को उसने ब्रह्मा के हाथ में थमा दिया और विद्या का लक्ष्य उसने विमुक्ति मान लिया इसी दृष्टि से वेद आत्मज्ञान और वेदी सामाजिक भौतिक उत्थान का आधार बन गए वेदी पर घी और वनस्पति का होम ही नहीं किया गया गोमेध अश्वमेघ जैसे प्रयोग भी किए गए।
इस युग में अकल्पित उत्कर्ष प्राप्त किया आने वाले लोगों का मार्गदर्शन भी किया किंतु सारे प्राकृत प्रतीकों को पुरुष के रूप में ही स्थापित किया सूर्य चंद्रमा इंद्र वरुण ब्रह्मा विष्णु रूद्र आदि देव पुरुष प्रकृति ही थे इस परंपरा का व्यक्ति के सोच और शैली पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर पुरुष को प्रधानता दी और स्त्री को  उपेक्षित मान लिया इसी तरह से स्त्री को पुरुष की अनुवर्तिनी आज्ञाकारिणी घोषित करके उसको घर गृहस्थ की सीमा में बांध दिया चिंतन अथवा अविष्कार के क्षेत्र में उसका प्रवेश वर्जित कर दिया गया अपने अहंकार से पीड़ित होकर उसने स्त्रियों को वेदाभ्यास से वंचित कर दिया इसी का परिणाम था कि स्मृति युग में ने बड़े गर्व से घोषणा कर दी #न_स्त्री_स्वातन्त्र्यमर्हति
यह स्वाभाविक है कि ज्ञान विज्ञान की सदस्यता के फल स्वरुप व्यक्ति में अहंकार का उदय ही हो जाता है उस युग में भी इस ज्ञान का अर्जन कर रहे वर्ग में अहंकार का बीज अंकुरित होने लगा था शासकवर्ग के बाहुबल उसे आवश्यकता थी तथा उनमें से कई एक इस क्षेत्र में भी आ रहे थे इसलिए क्षत्रिय के रूप में मान्यता देकर अपने समकक्ष बिठा लिया ।क्षत्रिय का अर्थ होता है  जो क्षति से बचाए  oइस वर्णोपाधि को क्षत्रियवर्ण ने बड़े उत्साह और अभिमान से लिया  वह समाज को हर प्रकार की क्षति से बचाने के लिए अपने आप को नैतिक रूप से उत्तरदाई समझ बैठा ।
विचारक और बाहुबली से ही समाज का काम नहीं चलता इसलिए तीसरा वर्ग जो व्यावसायिक बुद्धि का था और उसे इस पंक्ति में  बिठा लिया गया आर्थिक गणित अर्थ च व्यापार वृत्ति इस वर्ग का विषय बना राजा की अधीनता और ब्राह्मण की श्रेष्ठता को इस वर्ग ने सहज भाव से स्वीकार कर लिया इसे अपने लाभ से मतलब था राजा की आज्ञा को स्वीकारने की और ब्राह्मण के पैर धोने से इसे क्या अंतर पड़ता था इस तरह यह तीनों परस्पर पूर्वक बनकर समाज में अधिष्ठत हो गए इनसे भिन्न को उन्होंने शूद्र कह दिया
यूरोप के इतिहास में जो स्थिति देशों की थी वैसी ही इस शूद्र वर्ग की भी रही है अंतर यह रहा कि इनको सामाजिक एवं परिवारिक अंग की तरह मानते हुए अपने क्षेत्र तक सीमित रहने की मर्यादा बांधी गई होना यह चाहिए था कि कर्म का विभाजन करने के बाद उनको भी समानता का स्तर दिया जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ ब्राह्मण के घर में जन्म लेने मात्र से व्यक्ति को पूजनीय मान लेने की परंपरा ने इन वर्गों को अनपेक्षित अहंकार से भर दिया और यह कर्म की महत्वता के स्थान पर जाति को ही महत्व देने लगे।
 मनुष्य की जाति मनुष्य है प्रकृति उसे मनुष्य की संज्ञा देती है उसे अपने कर्म और व्यवहार से अपने को सिद्ध करना पड़ता है किंतु इस मूल सिद्धांत को भूलकर जाति का  प्रमाण मान लेने से कई तरह के विकार पनपने लगे परिणाम यह रहा कि शताब्दियों अथवा सहस्त्राब्दियों तक एक भी शुद्ध अपनी तरफ से कोई अविष्कार नहीं कर सका अन्यथा बुद्धि तो सभी को मिलती है इस वर्ग से भी कोई प्रतिभा संपन्न व्यक्ति होता तो उसको अवसर अवश्य मिलना चाहिए था पर यह तिगड़ा अपने भय से आहत ही रहा और तो और यदि शूद्र वेद वचनों को सुन ले तो उसको कठोरतम दंड दिया जाए इस प्रकार की व्यवस्था को सामाजिक आचरण में डाल दिया गया समाज में ही इस तरह का विभाजन करके अलंध्य खाई बना दी गई कर्म के कारण और वर्ण विभाग किया गया उस जाति तक सीमित कर दिया गया त्रेता युग में राम राज्य में शंबूक वध किस तरह की सामाजिक व्यवस्था का उद्धरण प्रस्तुत करता है यह विचारणीय हैk
यह पोस्ट श्री गोविंद शास्त्री चौंमू के विचारों से प्रभावित होकर यहां प्रस्तुत की गई है आगे की पोस्ट में  शाक्तदर्शन वह दुर्गा सप्तशती पाठ का विवरण भी इन्हीं के द्वारा लिखी गई पुस्तक से ही होगा। sabhar sakti upasak Facebook wall

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ध्यान का रहस्य” – ओशो

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ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।

व्यक्ति की इस समग्र खिलावट को ठीक से समझ लेना चाहिए। अन्यथा कोई अपने साथ खेल, खेल सकता है, वह अपने ही मन की तरकीबों में उलझ सकता है। और बहुत सी तरकीबें है। उनके द्वारा न केवल तुम मूर्ख बनोगे, उनके द्वारा न केवल तुम कुछ नहीं पाओगे, बल्कि वास्तविक अर्थ में तुम्हें उनसे नुकसान ही होगा। यह मान लेना कि ध्यान की कोई तरकीब है- ध्यान की एक विधि के रूप में कल्पना करना- आधारभूत रूप से गलत है। और जब कोई व्यक्ति मन की चालाकियों में रस लेने लगता है तब मन की गुणवत्ता नष्ट होने लगती है।

जैसे कि मन है, यह गैर-ध्यान पूर्ण है। ध्यान के घटित होने से पूर्व संपूर्ण मन का रूपांतरण होना चाहिए। मन सदा व्याख्या करता है। तुम शब्दों को जान सकते हो, तुम भाषा को जान सकते हो, तुम विचार की प्रक्रिया को, उसकी संरचना को जान सकते हो, लेकिन यह विचारणा नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यह विचारणा से पलायन है। तुम एक फूल देखते हो, और तुम इसकी व्याख्या करते हो। मन प्रत्येक आकार को, वस्तु को शब्दों में रूपांतरित कर सकता है। तब शब्द एक कारागृह, एक अवरोध बन जाते हैं। वस्तुओं का शब्दों में, उनके होने का; उनके अस्तित्व का, शब्दों में निरंतर बंध जाना ध्यान पूर्ण चित्त के लिए बाधा है।

इसलिये ध्यान पूर्ण चित्त के लिए प्रथम आवश्यकता है, चिजों की व्याख्या करने की इस आदत के प्रति सतत जागरुकता और इसको रोक सकने की योग्यता। वस्तुओं को मात्र देखो, उनकी व्याख्या मत करो। उनकी उपस्थिति के प्रति बोध पूर्ण रहो; किंतु उनको शब्दों में मत बदलो। वस्तुओं को होने दो, भाषा के बिना, व्यक्तियों को होने दो, भाषा के बिना, परिस्थितियों को होने दो, भाषा के बिना। यह असंभव नहीं है, यह स्वाभाविक है। अभी जो स्थिति है कृत्रिम तो वह है, लेकिन हमारी ऐसी आदत पड़ गई है, यह सब इतना यांत्रिक हो गया है, कि हमें इसका बोध भी नहीं रहता कि हम निरंतर अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर रहे हैं।

सूर्योदय है, तुम कभी इसको ‘देखने’ और ‘इसकी व्याख्या करने’ के अंतराल के प्रति जागरुक नहीं होते। तुम सूर्य को देखते हो, तुम इसे अनुभव करते हो और तुरंत ही तुम इसकी व्याख्या कर देते हो। देखने और व्याख्या के बीच का अंतराल खो जाता है। यह तथ्य; एक उपस्थिति है। मन स्वतः ही अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर लेता है। तब ये शब्द, तुम्हारे और अनुभव के मध्य में आ जाते हैं।

ध्यान का अर्थ है- शब्दों के बिना जीना, भाषा रहित होकर जीना। कभी-कभी यह सहज स्फूर्त रूप से घटित हो जाता है। जब तुम प्रेम में होते हो, उपस्थिति अनुभव होती है, भाषा नहीं। जब दो प्रेमी एक दूसरे के प्रति आत्मीयता से भरे होते हैं, तो मौन हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां अभिव्यक्त करने को कुछ नहीं है। इसके विपरीत इस समय अभिव्यक्ति के लिए बहुत कुछ उद्वेलित होता है। किंतु शब्द वहां कभी नहीं होते, वे हो भी नहीं सकते। वे सिर्फ तब आते हैं, जब प्रेम जा चुकता है।

यदि दो प्रेमी कभी मौन न हों, तो यह एक संकेत है कि प्रेम मर चुका है। अब वे उस अंतराल को शब्दों से भर रहे हैं। जब प्रेम जीवित होता है, शब्द वहां नहीं होते, क्योंकि प्रेम की उपस्थिति इतनी उद्वेलित करने वाली, इतनी पैनी होती है कि भाषा और शब्दों का अवरोध पार हो जाता है। और सामान्यतः यह सिर्फ प्रेम में ही पार होता है।

ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है। यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है। जिस पल तुम व्याख्या की, अस्तित्त्व को शब्दों में बदलने की, अपनी यांत्रिक आदत को समझते हो, एक अंतराल उत्पन्न हो जाता है। यह सहज स्फूर्त आता है। यह समझ का एक छाया की भांति अनुगमन करता है।

वास्तविक समस्या यह नहीं है, कि ध्यान में कैसे हों, बल्कि यह जानना है कि ध्यान में तुम क्यों नहीं हो। ध्यान की पूरी प्रक्रिया निषेधात्मक है। यह तुममें कुछ जोड़ना नहीं है, यह कुछ घटाता है जो पहले से ही जोड़ दिया गया है।

समाज भाषा के बिना नहीं रह सकता, इसे भाषा चाहिए ही। किंतु अस्तित्त्व को इसकी जरूरत नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें भाषा के बिना रहना चाहिए। तुम्हें इसका प्रयोग तो करना ही पड़ेगा। किंतु तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि व्याख्या करने की यांत्रिक आदत को रोक सको और जीना शुरू कर सको। जब तुम एक सामाजिक प्राणी के रूप में होते हो, तो भाषा की यांत्रिक आदत आवश्यक है; किंतु जब तुम अस्तित्त्व के साथ अकेले हो तो तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि इसे रोक सको। यदि तुम इसे बंद नहीं कर सकते तो यह लगातार चलती चली जाती है, और तुम इसे रोकने में असमर्थ हो, तब तुम इसके गुलाम बन गये हो।

मन को एक उपकरण होना चाहिए, मालिक नहीं। जब मन मालिक होता है, यह एक गैर ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। जब तुम मालिक होते हो, तुम्हारी चेतना मालिक होती है, तब यह एक ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। इसलिये ध्यान का अर्थ है, मन की यांत्रिक आदत का मालिक हो जाना। मन और मन की भाषा संसार में उपयोगी है लेकिन परम सत्य को जानने में बाधा है। तुम इसके पार हो, अस्तित्त्व इसके पार है। चेतना भाषा से परे है, अस्तित्त्व भाषा से परे है। जब चेतना और अस्तित्त्व एक हों, वे संवाद में होते हैं। यह संवाद ही ध्यान है।

भाषा को छोड़ना पड़ेगा। मेरा अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें इसे दमित या फेंक देना पड़ेगा। मेरा अर्थ सिर्फ इतना है कि यह तुम्हारे लिए दिन के चौबीसो घंटो की आदत न बनी रहे। जब तुम चलते हो तो तुम अपने पांवो को गतिमान करते हो। किंतु यदि तुम बैठे हो और तब भी वे गतिमान रहें तो तुम पागल हो। तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि उन्हें रोक सको। ठीक इसी तरह जब तुम किसी से बातचीत नहीं कर रहे हो भाषा को वहां नहीं होना चाहिए। यह तो संवाद का माध्यम है। जब तुम किसी के साथ संवाद नहीं कर रहे हो, तो यह वहां नहीं होनी चाहिए।

यदि तुम ऐसा करने में समर्थ हो तो तुम ध्यान में विकसित हो सकते हो। ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।

भाषा आवश्यक है, किंतु तुम्हें सदा इसमें नहीं रहना चाहिए। कुछ पल ऐसे होने चाहिए, जब कोई व्याख्या न हो, बस तुम हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम मात्र पौधों की तरह हो। चेतना तो वहां है ही और यह अधिक पैनी, अधिक जीवंत होती है, क्योंकि भाषा इसे मंद कर देती है। भाषा पुनरूक्त होने के लिए बाध्य है, इसलिये यह ऊब पैदा करती है। तुम्हारे लिए भाषा जितनी अधिक महत्त्व पूर्ण होगी, उतना ही तुम अधिक ऊबोगे।


इसलिये मेरे लिए ध्यान कोई विधि नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है; ध्यान कोई विधि नहीं , बल्कि एक समझ है। यह सिखाया नहीं जा सकता, इसका मात्र संकेत दिया जा सकता है। तुम्हें इसके बारे में सूचित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई सूचना, वास्तविक रूप से सूचना नहीं है। क्योंकि यह बाहर से है, और ध्यान तुम्हारी अपनी भीतरी गहराइयों से आता है।

इसलिये खोजो, खोजी हो जाओ, और शिष्य मत बनो। तब तुम किसी एक गुरु के शिष्य नहीं होगे बल्कि समस्त जीवन के शिष्य होगे। तब तुम मात्र शब्दों को नहीं सीख रहे होगे। आध्यात्मिक सीख शब्दों से नहीं आ सकती, बल्कि अंतरालों से, उस मौन से जो तुम्हें सदा घेरे हुए है, आती है। वे भीड़ में, हाट में, बाजार में भी हैं। मौन को खोजो, अंदर और बाहर अंतरालों को खोजो और एक दिन तुम पाओगे कि तुम ध्यान में हो।

ध्यान तुम तक आता है। यह सदा आता है, तुम इसे ला नहीं सकते। किंतु तुम्हें इसकी खोज में होना पड़ेगा, क्योंकि जब तुम खोज में होते होगे, तभी तुम इसके प्रति खुल जाआगे, उपलब्ध होओगे, अब तुम इसके मेजबान हो। ध्यान अतिथि है। तुम इसे निमंत्रित कर सकते हो और इसकी प्रतीक्षा कर सकते हो। यह बुद्ध के पास आता है, जीसस के पास आता है, यह हर उस व्यक्ति के पास आता है, जो तैयार है, जो खुला है और खोज रहा है।

किंतु इसे कहीं और से मत सीखो; अन्यथा तुम धोखा खा जाओगे। मन सदा किसी सुगमतर को खोजता है। यह शोषण का कारण बन जाता है। तब गुरु हैं और गुरु परंपरायें हैं, और आध्यात्मिक जीवन विषाक्त हो जाता है। सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति वह है जो किसी की आध्यात्मिक मांग का शोषण करता है। यदि कोई तुम्हारी संपदा पर डाका डाले, तो यह इतना खतरनाक नहीं है, यदि कोई तुम्हें असफल करता है, तो यह इतनी गंभीर बात नहीं है, किंतु यदि कोई तुम्हें मूर्ख बनाकर और तुम्हें तुम्हारी ध्यान की, दिव्यता की, समाधि की ओर जो प्यास है उसको मिटाता है या स्थगित भी करता है, तो यह पाप बहुत बड़ा और अक्षम्य है।

किंतु ऐसा किया जा रहा है। इसलिये इसके प्रति सावधान रहो और किसी से मत पूछो, ध्यान क्या है? मैं ध्यान कैसे करूं? इसके स्थान पर पूछो, बाधायें क्या हैं? रुकावटें क्या हैं? पूछो, हम सदा ध्यान में क्यों नहीं होतेः विकास कहां रुक गया हैः हम कहां पंगु हो गये हैं? और गुरु मत खोजो क्योंकि गुरु पंगु बना रहे हैं। कोई भी जो तुम्हें पूर्व निर्मित सूत्र देता है, मित्र नहीं अपितु शत्रु है।

अंधःकार में टटोलो क्योंकि और कुछ भी नहीं किया जा सकता। यह टटोलना ही समझ बनेगा जो तुम्हें अंधकार से मुक्त करेगा। जीसस ने कहा है, ‘सत्य स्वतंत्रता है।’ इस स्वतंत्रता को समझो। सत्य सदा समझ के माध्यम से आता है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि तुम इससे मिलो और साक्षात्कार करो, यह कुछ ऐसा है जिसमें तुम विकसित होते हो। इसलिये समझ की खोज में रहो, क्योंकि जितना अधिक समझपूर्ण तुम होगे, उतना ही तुम सत्य के निकटतर होगे। और किसी अज्ञात, अनपेक्षित, अ-पूर्व कल्पनीय पल में, जब समझ अपनी चरमावस्था पर आती है, तुम खाई मे होते हो। अब तुम नहीं रहते और ध्यान घटित हो जाता है।

जब तुम नहीं होते, तब तुम ध्यान में हो। ध्यान तुम्हारा न होना है, यह सदा तुमसे पार है। जब तुम खाई में होते हो, ध्यान वहां होता है। तब अहंकार नहीं होता; तब तुम नहीं होते। तब अस्तित्त्व होता है। यही है, जो धर्मों का परमात्मा से, परम अस्तित्त्व से अर्थ है। यह सार है, सारे धर्मों का, सारी खोजों का किंतु यह तुम्हें कहीं भी पूव-निर्मित नहीं मिलेगा। इसलिये उनसे सावधान रहो, जो इसके बारे में दावा करते हैं।

टटोलते रहो और असफलता से मत डरो। असफलता को स्वीकार करो, किंतु वे ही असफलतायें फिर-फिर मत दोहराओ। एक बार पर्याप्त है, यही काफी है।

– ओशो
Rajesh Saini

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बुधवार, 17 मार्च 2021

मच्छर भगाने का तरीका खोजा गया

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मच्छर भगाने का तरीका
मंथनहब पर जारी एक वीडियो में घर में मच्छर को घुसने ही न देने के लिए तरीके का इजाद किया गया है  इसमें कमरे में जालीदार ट्यूब लगा कर उसमें उसमें कीटनाशक का प्रयोग किया गया है ताकि मच्छर घर में घुस ही ना सके

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मंगलवार, 16 मार्च 2021

सूक्ष्म शरीर

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-----:पृथ्वी के कक्ष के बाहर एक 'प्रभा मण्डल' है जो बुद्धिजीवी आत्माओं का केंद्र है:-----
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

       पूर्व सोवियत संघ के एक इलेक्ट्रॉनिक विशेषज्ञ वैज्ञानिक #समायोन #कर्लीयान ने फोटोग्राफी की एक विशेष विधि का अविष्कार कर प्राणियों और पौधों के सान्निध्य में होने वाले सूक्ष्म विद्युत् सम्बन्धी कार्य-कलापों का सफल छायांकन किया है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि प्रत्येक प्राणी के दो शरीर होते हैं। पहला--
भौतिक शरीर जो आँखों से दिखलायी देता है और दूसरा--सूक्ष्म शरीर जिसकी सारी विशेषतायें प्राकृतिक शरीर जैसी ही होती हैं, पर वह आँखों से नहीं दिखलायी देता। वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म शरीर किसी ऐसे सूक्ष्मीकृत पदार्थ से बना होता है जिसके इलेक्ट्रोन्स ठोस शरीर के इलेक्ट्रोन्स की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से चलायमान होते हैं। उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर अस्थायी तौर पर भौतिक शरीर से अलग होकर कहीं भी विचरण कर सकता है।
       भूत-प्रेत का मतलब है--सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि भूत-प्रेत के बारे में जिन नयी-नयी बातों का पता वैज्ञानिकों को नए सिरे से लग रहा है, वे हमारे पूर्वजों को हज़ारों साल पहले ही ज्ञात थीं।
       जीवित मनुष्य और मृत मनुष्य में सिर्फ शरीर की दृष्टि से अन्तर होता है। पहला स्थूल शरीरधारी है, दूसरा है सूक्ष्म शरीरधारी। जीवित और मृत व्यक्ति में बुनियादी तौर पर कोई अन्तर नहीं होता। खोज से एक बात सामने आई कि पृथ्वी के कक्ष के बाहर एक 'प्रभा मण्डल' है जिसकी रचना सूक्ष्मतम विद्युत् चुम्बकीय कणों से हुई है।
       वह 'प्रभा मण्डल' बुद्धिजीवी आत्माओं का केंद्र है। वे अपने विचारों, भावों और सिद्धांतों को अनुरूप माध्यमों से भूलोक में प्रकट किया करती हैं। कभी-कभी तो माध्यमों के द्वारा वे लेखन कार्य भी कराती हैं।
       अंग्रेजी कथा साहित्य में #टेल्का नामक एक ऐतिहासिक उपन्यास काफी प्रसिद्ध है। उस उपन्यास की लेखिका हैं--'श्रीमती कूरन'। उन्होंने अपने उपन्यास को भूतों के निर्देशानुसार लिखा है। श्रीनगर निवासी 'पंडित गोपीकृष्ण' 'कुण्डलिनी योग' के विशिष्ट विद्वान् हैं। इस गम्भीर विषय पर उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, वह अशरीरी आत्माओं की प्रेरणाओं से लिखा है। काशी की प्रसिद्ध #माँ #आनंदमयी भी किसी अशरीरी आत्मा की प्रेरणा से अरबी तथा अन्य भाषाओँ में लिखे गए ग्रन्थों के उद्धरण श्रोताओं को सुनाया करती थीं। वे स्वयं इन भाषाओँ से अपरिचित थीं। इस शताब्दी की सर्वाधिक विख्यात् माध्यम हैं--#श्रीमती #रूट #मांट #गुमरी जिन्होंने अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों #रूज़वेल्ट और #केनेडी के अन्त की भविष्यवाणी 'भूत जगत' से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर काफी पहले कर दी थी। #श्रीमती #रूथ ने #स्व. #आर्थर #फोर्ड के भूत द्वारा लिखाई गयी एक पुस्तक 'ए वर्ल्ड बियॉन्ड' का संपादन किया है।
       ब्रह्मलीन गुरुदेव पंडित #अरुण #कुमार #शर्मा (वाराणसी) का कहना है --मेरे पास दर्जनों ऐसे उदहारण हैं जिनका उल्लेख मैं अन्य किसी कथा में करूँगा। मेरी कथा जिस आत्मा के सम्बन्ध में होती है मैं उसीकी प्रेरणा से रात ग्यारह बजे से दो बजे के बीच उस कथा को लिखता हूँ। तीन घण्टे तक बराबर अबाध गति से
मेरी कलम चलती रहती है। यदि उस समय कोई मेरे अध्ययन-कक्ष में आ जाता है तो उसे बिजली का आघात जैसा अनुभव होता है।
       आधुनिक परलोकवाद का जन्म उन्नीसवीं सदी के मध्य में अमेरिका में हुआ था। आज विश्व के सैकड़ों केंद्रों में परलोक विद्या का अध्ययन होता है और परलोक आत्माओं से संपर्क किया जाता है। इसमें सबसे विख्यात और विशाल केंद्र है--अमेरिकी परलोक समिति का #लिलिडेल स्थित केंद्र जहाँ विशेष विधि से प्रेतात्माओं के छायाचित्र भी खींचे जाते हैं। sabhar  shivram Tiwari Facebook wall

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रविवार, 14 मार्च 2021

निमोनिया के विरुद्ध भारत का पहला स्वदेशी टीका

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भारत ने निमोनिया पर नियंत्रण करने के लिए पहला स्वदेशी टीका लॉन्च किया है न्यू मोसिल नामक इस टीके का निर्माण सिरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया तथा बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ मिलकर किया गया है दुनिया भर में प्रतिवर्ष 5 साल से कम उम्र के लगभग 1000000 बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण निमोनिया है भारत में प्रति वर्ष 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत में लगभग 14% मौतों का कारण निमोनिया है निमोनिया के कारण कारण होने वाली कुल मौतों में लगभग आधी मौतें निम्नलिखित 5 देशों में होती है जिसमें डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो इथोपिया भारत नाइजीरिया पाकिस्तान सम्मिलित है निमोनिया फेफड़ों का संक्रमण है तथा खांसी सांस लेने में परेशानी और बुखार इसके सबसे आम लक्षण है या एक संक्रामक रोग है जो खांसी  के माध्यम से हो सकता है  निमोनिया से होने वाली मौतों के कारण में कुपोषण टीका तक पहुंच में कमी वायु प्रदूषण आदि सम्मिलित है यदि हम उसे सही हाथ धोया जाए तो  खतरे को 50% तक कम किया जा सकता है

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बुधवार, 10 मार्च 2021

3D प्रिंटर के द्वारा घर बनाया जा रहा है

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आने वाले समय में घरों का निर्माण 3D प्रिंटर से बहुतायत यह जाने की संभावना है इसमें लागत मूल्य कम और शीघ्र तैयार होता है मैं कंप्यूटर के प्रयोग से डिजाइनिंग की जाती है उसके बाद 3D प्रिंटर के द्वारा तैयार कर दिया जाता है

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ऑनलाइन गेमिंग

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इस समय ऑनलाइन गेमिंग की शुरुआत हो गई है आने वाले समय में यह और भी बढ़ेगा ऑनलाइन गेमिंग भारत में फ्री फायर फौजी गेम ऑनलाइन खेले जा रहे हैं भविष्य में ऑनलाइन और ऑफलाइन दुनिया एक हो जाएगी

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डिजिटल मार्केटिंग

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आज का जमाना डिजिटल मार्केटिंग का है आप अपने प्रोडक्ट को ऑनलाइन सेल कर सकते हैं इसके लिए बहुत प्लेटफार्म है जैसे अमेजॉन फ्लिपकार्ट इसके अलावा आप E कॉमर्स वेबसाइट बनाकर कम लागत मूल्य में मार्केटिंग कर सकते हैं आने वाला समय इस तरह के मार्केटिंग को बढ़ाने वाला है यह सरल और सुविधाजनक है आप अपने सामान को विश्व में किसी भी जगह भी बेच सकतेे हैं इसमें ऑनलाइन ऑर्डर बुक करने के सामान को कुरियर ,अन्य ट्रांसपोर्ट एजेंसी के द्वारा भेजा जा सकता है

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रविवार, 7 मार्च 2021

गुड़ का औषधीय महत्व

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’’पानी में गुड़ डालिए, बीत जाए जब रात,सुबह छानकर पीजिए, अच्छे हों हालात’’
   प्राकृतिक पदार्थो में गुड़ सबसे अधिक मीठा पदार्थ माना जाता है जो कि गन्ने के रस को एक निश्चित तापक्रम पर उबालकर सुखाने के पश्चात बनाया जाता है। इसका रंग हल्के पीले से लेकर गाढे भूरे तक होता है। गुण में सुक्रोज 59.7 %, ग्लूकोज 21.8%, खनिजतरल 26% तथा जलअंश 8.86% होता है। यह स्वाद का ही नहीं बल्कि सेहत का भी खजाना है। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण ही यह आयुर्वेद की असंख्य औषधियों जैसे आसव, आरिष्ट, अवलेह, पाक आदि के निर्माण में सबसे प्रमुख द्रव्य है। आयुर्वेद संहिता के अनुसार यह शीघ्र पचने वाला, खून बढाने वाला एवं भूख बढाने वाला होता है। यह एक ऐसा सुपरफूड है जिसके गुणों के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। । गुड़ हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही फायदेमन्द है, हमें अपने दैनिक भोजन में इसे जरुर रखना chaiye

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शनिवार, 6 मार्च 2021

Bluetooth Technical Operations

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Bluetooth is a high speed, low powered wireless linktechnology that’s designed to connect phones or otherportable equipment together with little to no workrequired by the user. Unlike infrared, Bluetooth doesn’t require line of site positioning to work.Current prototype circuits are contained on a board that is 0.9 cm square, with a much smaller circuit board being developed.When one Bluetooth device comes in contact with another, they will automatically exchange addresse and details of capability. Then, they can establish a 1 MB link with security that they will use asrequired. The protocols involved with handle both data and voice, with a very flexible topography.The technology achieves its goal by embedding tiny,non expensive short range tranceivers into the devices available today. The radio operates on the 2.45 GHz frequency band, and supports up to 72 KBps, along with three voice channels.Each devices offers a unique 48 bit address from the IEEE 802 standard, with the connections being point to point or multipoint. The max range is 10 meters, although it can be extended to 100 meters by increasing the power. The devices are also protected from radio interference by changing their frequencies, also known as frequency hopping.What’s important, is the fact that Bluetooth devices won’t drain battery life. The specificationtargets power consumption of the device, limiting the drain on the battery. The radio chip willconsume only 0.3mA in stand by mode, which is less than 5% of the power that standard phones use.Bluetooth will also guarantee security at the bit level. The authentification is controlled by the user via a 128 bit key. The radio signals can be coded with anything up to 128 bit. With the frequency hopping, Bluetooth is already very hard to listen into.The baseband protocol is a combination of both circuit and packet switches. Slots can be reserved for synchronous packets as well. Each packet will be transmitted in a different hop frequency. Normally, a packet covers a single slot although it can be extended to cover up to five slots Bluetooth can also support data channels of up to three simultaneous voice channels. Therefore,it’s possible to transfer the data while you talk at the same time. Each individual voice channel will support 64 KB.From a technical standpoint, Bluetooth is very different indeed. It’s the best wireless method in the world, surpassing even infrared. For communication on the go, Bluetooth is indeed very hard to compete with.

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