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रविवार, 28 मार्च 2021

आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?

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हमारी पंचतत्व श्रृंखला में आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?
आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?

आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?

आधुनिक विज्ञान यह स्वीकार करने लगा है कि आकाशीय बुद्धि या ज्ञान जैसी कोई चीज होती है। इसका मतलब है कि आकाश में एक खास तरह की बुद्धि होती है।

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, फिर दिन में एक बार और सूर्य के अस्त होने के बाद एक बार आकाश की ओर देखें और शीश झुकाएं - वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए।
यह आकाशीय बुद्धि आपके साथ कैसा व्यवहार करती है - वह आपके हित में काम करती है या आपके खिलाफ, इससे तय होगा कि आपका जीवन कैसा होगा। आप एक खुशकिस्मत प्राणी हैं या आप अपना बाकी का जीवन धक्के खाते हुए बिताएंगे, यह आपकी इस योग्यता पर निर्भर करता है कि जाने या अनजाने में आप इस व्यापक बुद्धि से कितना सहयोग ले पाते हैं।
आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं। हम सौर मंडल के एक गोल, घूमते ग्रह पर बैठे हुए हैं। यह अपनी जगह पर बना हुआ है तो सिर्फ आकाश की वजह से। आप अपनी जगह पर अपनी काबिलियत के दम पर नहीं बैठे हैं, बल्कि इसलिए बैठे हैं क्योंकि आकाश आपको उस स्थान पर थामे हुए है। आकाश ही इस पृथ्वी, इस सौर मंडल, इस आकाश गंगा और पूरे ब्रह्मांड को अपनी जगह पर थामे हुए है।

अगर आप जानते हैं कि अपने जीवन में आकाश का सहयोग कैसे लेना है, तो यह जीवन धन्य हो जाएगा। इसके लिए आप एक आसान सा काम कर सकते हैं।

 

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, एक बार आकाश की ओर देखें और आकाश के सामने नत-मस्तक हो जाएं कि आज उसने आपको थामे रखा।
सूर्य के तीस डिग्री का कोण पार करने के बाद, दिन में कभी भी ऊपर देखें और शीश नवाएं।
सूर्य के अस्त होने के बाद, एक बार फिर ऊपर देखकर शीश झुकाएं, वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए जिसने आपको आज थामे रखा।
 

सिर्फ इतना करें और देखें कि आपके जीवन में कैसे नाटकीय ढंग से बदलाव आता है।

क्या आपने ध्यान दिया है, तेंदुलकर भी ऊपर देखते हैं? सिर्फ वही नहीं, प्राचीन काल से ही, कोई व्यक्ति जब कोई कामयाबी हासिल करता था तो कामयाबी के उन पलों में वह ऊपर की ओर देखता था क्योंकि अनजाने में ही उसमें यह बोध होता था।

आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं।
कुछ लोग भले ही ऊपरवाले के लिए ऊपर देखते हों, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब आपको कोई गहरा अनुभव होता है, तो अनजाने में ही आपका शरीर कृतज्ञता के भाव में ऊपर की ओर देखता है? कहीं न कहीं एक स्वीकृति है, वहां पर एक बुद्धि है जो उसे स्वीकार करती है।
इस प्रक्रिया को सचेतन दिन में तीन बार करें। अगर आपको आकाश से मदद मिलती है, तो जीवन चमत्कारी ढंग से चलने लगेगा। आपने जिस ज्ञान या बुद्धि की संभावना की उम्मीद नहीं की होगी वह आपकी हो जाएगी।

Isha Foundation

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जन्म और मृत्यु

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 जीवितो यस्य कैवल्यम् विदेहो$पि स केवलः। 
समाधि निष्ठितामेत्य निर्विकल्पो भवानघ:।।

      अर्थात्--जिसको जीवन काल में ही कैवल्य उपलब्ध् हो गया है, वह शरीरसहित होने पर भी ब्रह्मरूप रहेगा। इसीलिये समाधिष्ठ होकर सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाना चाहिए।
      उपनिषद के इस श्लोक में कितना गूढ़ अर्थ छिपा हुआ है। वास्तव में मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान है ? लौकिक और पारलौकिक  दृष्टि से जो कुछ मनुष्य को पाने योग्य वस्तु है, उसे जीवन के रहते ही पाया जा सकता है। लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्ति भी हैं जो मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा करते हैं। उनका कहना है कि इस संसार में, इस शरीर में रहते हुए मुक्ति को, ब्रह्म को नहीं प्राप्त किया जा सकता। यह सब मृत्यु के बाद ही सम्भव है।
       जो लोग ऐसा सोचते हैं, वास्तव में वे भारी भ्रम में हैं। सच बात तो यह है कि जो जीवन के रहते नहीं पाया जा सकता, वह मृत्यु के बाद भी नहीं पाया जा सकता।
        मनुष्य का जीवन एक अवसर है--एक स्वर्णिम अवसर, शीघ्र फिर न प्राप्त होने वाला अवसर। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि इस अवसर को चाहे जैसे गँवा दें। नौकरी-व्यापार करके, धन-दौलत इकठ्ठा करके, मान-प्रतिष्ठा अर्जित करके गँवा दें, चाहे चोरी-डकैती, व्यभिचार करके गँवा दें अथवा चाहें तो पूजा-पाठ, ध्यान-धारणा तथा सत्य की खोज में बिता दें। जीवन एक 'तटस्थ' अवसर है। हमें क्या करना है, क्या पाना है, क्या बनना है ?--इन सबसे जीवन का कोई मतलब नहीं। हम कुछ भी करें, जीवन हमें रोकेगा नहीं। जो लोग यह सोचते हैं कि जीवन संसार के लिए है, भोग के लिए है तो वे अपने को धोखा देते हैं।
       मृत्यु अवसर नहीं है। मृत्यु तो है अवसर की समाप्ति। मृत्यु का मतलब है कि अब कोई अवसर नहीं बचा। अवसर समाप्त हो गया। मृत्यु से कुछ पाया नहीं जा सकता। कुछ पाने के लिए अवसर चाहिए और वह अवसर है--एकमात्र 'जीवन'।
       प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति  मर रहा होता है तो लोग उसके कान में गायत्री मन्त्र पढ़ते हैं, गीता-रामायण सुनाते हैं, राम-नारायण का नाम फूंकते हैं। यह कितनी ना-समझी की बात है। वे गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, राम नाम फूंकते हैं मगर उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता होता। मृत्यु के समय सारी इन्द्रियां जवाब दे रही होती हैं, आँखें देखना बन्द कर् देती हैं, कान सुनना बन्द कर् देते है, मुंह बोलना बन्द कर् देता है, वाणी अवरुद्ध हो जाती है, प्राण धीरे-धीरे लीन होने लगते हैं अपने मूल बीज में। उस स्थिति में मरने वाला व्यक्ति क्या गायत्री मंत्र सुन सकेगा ? राम-नाम का उच्चारण समझ जायेगा ? लेकिन लोग हैं कि सुनाए चले जाते हैं, गीता-पाठ किये चले जाते हैं।


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मुक्ति कैसे प्राप्त हो?

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----------: आणवमल ही जन्म-जन्मान्तर के सुख-दुःख, क्लेश- चिंता का कारण हैं :-----------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

             मुक्ति कैसे प्राप्त हो?
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      चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करने के बाद कहीं जाकर मानव योनि प्राप्त होती है। अन्य योनियों में सब कुछ रहता है पर 'मन' नहीं रहता। 'मन' की उपलब्धि होती है केवल मनुष्य को। इसीलिए उसे 'मनुष्य' कहते हैं। मन से मनुष्य बना। मनुष्य मानव इसलिए कहलाता है क्योंकि वह मनु की सन्तान है। जब पहली बार जीव मानव-तन को उपलब्ध होता है ,तो उस अवस्था में उससे लिप्त पिछले चौरासी लाख योनियों के पशुत्व भरे न जाने कौन-कौन से संस्कार रहते हैं। इन्हें तंत्र कहता है--'आणव मल'--

"मिथ्याज्ञानमधर्मश्चासक्तिहेतुश्च्युतिस्तथा।
पशुत्वमूलं पंचैते तन्त्रे हेयाधिकारितः।।

अर्थात्--असत्य, अज्ञान, अधर्म, आसक्ति और पशुता--ये पांच ऐसे प्रमुख हेय और त्याज्य दुर्गुण आणव मल के रूप में  हैं जो मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के पतन के कारण बनते रहते हैं।

      'आणव मल' बराबर जीवात्मा का पीछा करता रहता है, हर जन्म में, हर जीवन में। यही मनुष्य के सभी प्रकार के मानसिक, शारीरिक कष्ट, पीड़ा, दुःख, क्लेश, चिता आदि का एक मात्र कारण है। मनुष्य कितना भी अपना विकास करता जाय लेकिन आणव मल से मुक्त नहीं हो सकता। उसके फल का सामना बराबर करना पड़ेगा। भले ही हम योगी हों, साधक हों, संत हों, महात्मा हों, साधू हों, सन्यासी हों या हों विरक्त --आणव मल से उत्पन्न सुख-दुःख, क्लेश, चिन्ता  आदि को भोगना ही पड़ेगा हर अवस्था में। योगी, साधक, संत, भक्त इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अनेक महापुरुषों ने भी आणव मल के परिणामस्वरुप जीवनभर कष्ट भोगा। आणव मल का अस्तित्व जब तक है, तब तक न मुक्ति है, न मोक्ष, न कैवल्य और न है निर्वाण।
       प्रश्न यह है कि आणव मल के इस अभेद्य आवरण को किस प्रकार से भेदा जाय ?
       इस सम्बन्ध में तंत्र-मन्त्र का कहना है कि आणव मल का सर्वथा के लिए नाश न ज्ञान द्वारा संभव है और न तो कार्य के ही द्वारा, यदि संभव है तो मात्र  'क्रिया' द्वारा। क्रिया के माध्यम से ही उसके अस्तित्व का नाश संभव है। मानव शरीर में चौरासी लाख योनियों का आणव मल एकत्र होकर धीरे-धीरे परपक्व होता रहता है। जब तक वह पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक उसका नाश नहीं होता। कंस, रावण, हिरण्य कश्यपु आदि इसके ज्वलंत उदहारण हैं।
    आणव मल को पूर्ण परिपक्व होना ही चाहिए। इसके लिए जीवन में निरपेक्ष और विरक्त भाव चाहिए। कर्म करते रहना चाहिए। उसका परिणाम क्या होगा ?--इस पर सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
      आणव मल एक 'सत्तात्मक द्रव्य' है। जिस प्रकार नेत्र में मोतिया बिन्द हो जाने पर उसे उचित समय पर ही ऑपरेशन द्वारा हटाया जाता है, ठीक ऐसी ही स्थिति आणव मल की भी है। परिपक्वता दोनों में आवश्यक है। स्वयं जीवात्मा में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जिससे आणव मल का नाश हो सके। आध्यात्मिक ज्ञान, योग, तप, तपस्या, साधना इस दिशा में पूर्ण असमर्थ हैं। तलवार की धार कितनी ही तेज क्यों न हो, वह स्वयं को नहीं काट सकती।
"असिधारा सुतीक्षणा च स्वात्मानमच्छेदिका।"

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अष्टांग योग आसन और प्राणायाम

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शरीर धर्म को साधने का सबसे पहला साधन है यह सुत्र अपने आप मे अति महत्वपुर्ण है लेकिन इस परम वचन को बिना उसका मर्म समझे उन लोगो ने अपना लिया है जो केवल शरीर को महत्व देते है शरीर कोस्वस्थ और मजबुत बनाने के प्रयास मे रहते है जो कसरत करते व्यायाम करते है और करते है पहलवानी धर्म साधना के प्रथम चरण की तरह नही 
ध्यान व योग के प्रचलित रूप भी शरीर की उपेक्षा करना सिखाते है अष्टांग योग केवल आसन और प्राणायाम की कुछ क्रियाओं मे ही सिमट कर रह गया है योगासनों का उपयोग लोग स्वास्थ्य का लाभ के लिये ही करते है देह के रहस्य को जानने समझने  के लिए नही वेशरीर मन का गुलाम बनाकर प्रसन्न होते है उनके लिये  योग का अर्थ है इन्द्रियो का दमन कर शरीर को अपने वश मे करना योग का लोकप्रिय रूप त्याग पर आधारित है योग पर नही 
एकमात्र तंत्र ही एक एसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञानकी दृष्टि से देखता है
मनऔर तन के संघर्ष में तन को जीतने दे तन को मन पर हावी होने दे तन बहुत अनुभवी है उसकी प्रज्ञा लाखो वर्ष पुरानी है तन सीधे प्रकृति से जुडा है इस विश्व को चलाने वाला जो नियम है उसी को धाराएं शरीर के भीतर भी स्पन्दित होती रहती है इतना भर जान ले कि जहाँ शरीर है वहाँ जीवन है और कहीं नही और कहीं है भी तो वह भोग जीवन है                      
ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे
१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश  फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है

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शनिवार, 27 मार्च 2021

तंत्र साधना के मार्ग

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{{{ॐ}}}
        
                                                             #_रहस्य_

तंत्र के मुख्य दो ही मार्ग  है इन्हीं विभिन्न सम्प्रदायों का उदय हुआ है १ ,वैदिकमार्ग २, शैवमार्ग। इनमे से वैदिकमार्ग को दक्षिणमार्ग  और शैवमार्ग को भी वाममार्ग  कहते है । गोरखनाथ जी के द्वारा शाबर मंत्र, जैनमार्ग, बौद्धमार्ग, मे भी साधनाए की जाती है पर वे सब वाममार्ग से ही प्रभावित है। आज ये दोनो मार्ग आपस मे मिलकर खिचड़ी बन गये है। अपितु ये आज से नही मिले आज से हजारो वर्ष पहले प्रजापति दक्ष के यज्ञ मे हुए युद्ध के समय मिल गये थे।
अतः आज बडे बडे तंत्रमार्गी एवं विद्वान भी इनमे भेद कर पाने स्थित नें नही है विशेषकर दक्षिणमार्गी ! वे आज वाममार्ग के  देवी देवताओं को पूजा अर्चन कर रहे है इनमें भगवती (आधाशक्ति), दुर्गा, महालक्ष्मी, आदि है और गणेशजी भी वाममार्ग के ही देवता है, क्योंकि ये शिवकुल के देवता है , विष्णुकूल के नहीं।
इसी प्रकार महालक्ष्मी को विष्णुकुल ने समुद्र मथंन(सामाजिक- धार्मिक-आध्यात्मिक- मथंन जो दक्ष के युद्ध के बाद हुआ) के पश्चात विष्णु से जोड दिया(स्मरण करें पौराणिक रूपक) आज ये सभी दक्षिणमार्ग एवं वाममार्ग दोनो मे पूजे जाते है।
वैदिक देवता तीन सौ से अधिक है पर उनमे मुख्य अग्नि, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, रूद्र ,अश्विनी ही है । वैदिक रूद्र ,शिव  नही है। जैसा कुछ लोग अर्थ लगाते है । ये तेज की उग्र भावना के प्रतीक है । शिव आदि परमात्मा के। ये विष्णु के पर्याय समझे जा सकते है। तथापि सांस्कृतिक भावना के अन्तर के कारण इनके वर्णन मे भावान्तर  है रूद्र की आराधना शिव के प्रधान गुण शक्ति के रूप मे वाममार्ग मे भी की जाती है ।
राम,कृष्ण, हनुमान, आदि अवतार रूप साकार ईश्वर की मान्यता के पश्चात दक्षिणमार्ग की पूजा पद्धति से जुडे है। वैदिक ऋषिओं की दृष्टि मे किसी मनुष्य या जीवधारी का ईश्वररूप असम्भव था। महान व्यक्तित्व देव रूप तो हो सकते है, किन्तु उन्हें निराकार, सच्चिदानंद परमात्मा मानने की वे कल्पना भी नही कर सकते थे। आज इन सभी रूपों, की आराधना को दक्षिण पंथ मे विष्णु रूप मे की जाती है।
सभी वैदिक देवताओं की साधना का वर्णन छोटी सी पोस्ट मे नही हो सकता है ।जो लोग इनमे से किसी देवता की साधना करनी चाहते है उन्हें वेद पढने चाहिए।ऋग्वेद मे अनुष्ठान विधि नही है । यह अथर्ववेद मे है । और यह सुत्र स्मरण रखें कि अग्नि, रूद्र, आदि उग्र देवा की साधना आग्नेय कोण मे रक्तिम आसन व फूलों से की जाती है वायु ,वरूण, (जल)आदि देवताओं की वायव्य कोण में और विष्णु, सूर्य, ऊषा आदि देवताओं की साधना आराधना ईशान कोण मे की जाती है ।
शास्त्रीय तंत्र साधना की विधियाँ अत्यन्त जटिल है। वे यहाँ उपलब्ध नही की जा सकती है

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ISRO makes breakthrough demonstration of free-space Quantum Key Distribution (QKD) over 300 m

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For the first time in the country, Indian Space Research Organisation (ISRO) has successfully demonstrated free-space Quantum Communication over a distance of 300 m. A number of key technologies were developed indigenously to accomplish this major feat, which included the use of indigenously developed NAVIC receiver for time synchronization between the transmitter and receiver modules, and gimbal mechanism systems instead of bulky large-aperture telescopes for optical alignment.

The demonstration has included live videoconferencing using quantum-key-encrypted signals. This is a major milestone achievement for unconditionally secured satellite data communication using quantum technologies.

The Quantum Key Distribution (QKD) technology underpins Quantum Communication technology that ensures unconditional data security by virtue of the principles of quantum mechanics, which is not possible with the conventional encryption systems. The conventional cryptosystems used for data-encryption rely on the complexity of mathematical algorithms, whereas the security offered by quantum communication is based on the laws of Physics. Therefore, quantum cryptography is considered as ‘future-proof’, since no future advancements in the computational power can break quantum-cryptosystem.

The free-space QKD was demonstrated at Space Applications Centre (SAC), Ahmedabad, between two line-of-sight buildings within the campus. The experiment was performed at night, in order to ensure that there is no interference of the direct sunlight.

The experiment is a major breakthrough towards ISRO’s goal of demonstrating Satellite Based Quantum Communication (SBQC), where ISRO is gearing up to demonstrate the technology between two Indian ground stations. Sorce :isro.govt.in

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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

तत्त्वासार

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{{{ॐ}}}

                                                            # 

वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
             यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता है। 
 

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शंकर पर आरूढ़ जगज्जननी महाकाली की छवि रहस्य

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      पाश्चात्य अनुसन्धान कर्ता जो इस समय योग और तंत्र पर खोज कर रहे हैं, उनका कहना है कि योग-तंत्र-विज्ञान विशाल, अनन्त गहराइयों वाला समुद्र है जिसके जल की एक बूंद ही भौतिक विज्ञान है।
      यह सत्य है कि स्थूल और सूक्ष्म वायु में होने वाली ध्वनि- तरंगें एक समय नष्ट हो जाती हैं, परंतु सूक्ष्मतम वायु (ईथर) जो अखिल ब्रह्माण्ड में सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, में पहुँचने वाली ध्वनि-तरंगें कभी किसी काल में नष्ट नहीं होतीं।
     आधुनिक उपकरणों द्वारा ध्वनि को विद्युत्-प्रवाह में बदल कर उसको सूक्ष्मतम अल्ट्रासॉनिक रूप दिया जाता है। इसलिए इसी वैज्ञानिक विधि से रेडियो, वायरलैस, आदि का निर्माण हुआ था। बाद में उसका और विकसित रूप टेलीविजन का निर्माण हुआ जिसमें ध्वनि- तरंगों को प्रकाश-तरंगों में बदल दिया गया और जिन्हें चित्र-दर्शन के रूप में हम देखते है। ईथर में होने वाले कम्पन, आवृत्ति, फ्रीक्वेंसी की संख्या एक सेकेण्ड में 1048576 से 34359738368 तक होती है। जब कम्पन की संख्या अपनी निश्चित सीमा के बाहर बढ़ती है तो उन कम्पनों से एक विचित्र और आश्चर्यजनक अखण्ड प्रकाश का आविर्भाव होता है। जिसे वैज्ञानिक लोग X-Rays कहते हैं। ईथर में एक सेकेण्ड में इतने अधिक कम्पनों के उत्पन्न होने के कारण उनकी गति विलक्षण होती है। हम-आप उसकी इस विलक्षण गति का अनुमान इसी से लगा सकते हैं  कि रेडियो स्टेशन या दूर दर्शन- केंद्र के प्रसारण कक्ष में हो रहे संगीत के कार्यक्रमों को हम उसी समय सुन और देख लेते हैं जिस समय वहां कार्यक्रम हो रहा होता है। एक सेकेण्ड के हजारवें हिस्से जितना समय भी नहीं लगता है। ईथर के कम्पनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जहाँ अपने समान कम्पन पाते हैं, वहीँ आकर्षित हो जाते हैं। ईथर में पहुंचे हुए शब्दों के विशाल भंडार का कोई ओर-छोर नहीं है, वह अभी भी है और भविष्य में भी रहेगा। लेकिन ईथर के समुद्र में केवल सूक्ष्मतम ध्वनि ही प्रवेश कर सकती है, अन्य प्रकार की ध्वनियां वहां पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाती हैं।
      मानव सभ्यता के ही साथ-साथ तन्त्र-मन्त्र का प्रादुर्भाव हुआ। उनकी प्राचीनता उतनी ही है, जितनी कि मानव-संस्कृति की। इस विशाल विश्वब्रह्माण्ड में ईश्वर् की अद्भुत शक्तियां क्रियाशील हैं। भिन्न-भिन्न देवता तो उसकी शक्ति के प्रतीक मात्र हैं। इन्हीं देवताओं की कृपा प्राप्त करने के लिए मन्त्र का उपयोग नाना प्रकार से होता है। जिस फल की उपलब्धि के लिए घोर-कठोर श्रम करना पड़ता है, वही फल दैवीय कृपा से थोड़े प्रयास से ही सुलभ हो जाता है। मनुष्य सदा ही सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी सरल मार्ग की खोज में लगा रहता है। उसे पता है और विश्वास है कि कुछ ऐसे सरल उपाय हैं जिनकी सहायता से दैवीय शक्तियों को अपने वश में रखकर अपना भैतिक कल्याण और पारलौकिक सुख प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे ही सरल मार्ग हैं--मन्त्रों, यंत्रों के मार्ग जिनका संपूर्ण ज्ञान तंत्र-विज्ञान में उपलब्ध् है।
      यह विषय नितान्त रहस्यपूर्ण है। तंत्र-मंत्र की शिक्षा योग्य गुरु के द्वारा उपयुक्त शिष्य को ही दी जा सकती है। इस विद्या को गुप्त रखने का मुख्य उद्देश्य यही है कि सर्वसाधारण जो इसके रहस्य से अनजान है, अनभिज्ञ है, इसका दुरुपयोग न कर सके। लाभ होने की अपेक्षा हानि होने की ही आशंका अधिक रहती है।
      बल, शक्ति और क्रिया--इन तीनों को तंत्र में अति सूक्ष्मता से लिया गया है। इन तीनों को ही एक ही मूलतत्व-रूप परब्रह्म का रूप बतलाया गया है--

'परास्य शक्तिर्विविधेव श्रूयते 
       स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च्।'

       अर्थात्--पराशक्ति विविध प्रकार की बलशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति आदि के रूप में जानी जाती है जो अपने स्वाभाविक गुण-धर्म में विद्यमान रहती है।
       शक्ति जब सुप्त स्थिति में रहे तो वह 'बल' कहलाती है और बल जब कोई कार्य करने को तत्पर होता है तो वही 'शक्ति' बन जाती है। अन्त में वह क्रिया-रूप में बदल कर शान्त हो जाती है।शक्ति की ये तीन अवस्थाएं हैं। फिर नया बल जागृत होता है लेकिन याद रखना चाहिए कि बल, शक्ति और क्रिया अपने आश्रय-स्थल से अलग होकर प्रत्यक्ष नहीं हो सकती। बल और शक्ति अर्थात् स्थिर और अस्थिर शक्ति का संघर्ष तीसरे रूप 'क्रिया'  का जनक है। ऋण की ओर धन का प्रवाह स्वाभाविक है। इसी प्रकार *पौरुष पर आक्रमण करना शक्ति का सहज रूप है, सहज भाव है। अपने इसी भाव के फलस्वरूप पौरुष को हमेशा पराजित करना शक्ति का सहज धर्म माना गया है। शंकर पर आरूढ़ महाकाली की छवि कुछ इसी रहस्य की ओर संकेत करती है।*
     जब तक यह क्रिया के रूप में शान्त होती रहती है, तब तक पौरुष जागृत रहता है और जहाँ उपशान्ति का क्रम बन्द हुआ कि शक्ति तुरन्त पौरुष को पराजित कर उसे बलहीन बना देती है।
      प्रायः देखा गया है कि अत्यन्त बलवान मनुष्य की अजेयता को पराजित करने के लिए नारी-शक्ति का आश्रय लिया जाता है। *नारी में शक्ति है और पुरुष में बल।* पहली चंचला है और दूसरा है स्थिर। नारी से साक्षात्कार होते ही पुरुष में विक्षोभ होता है। यह विक्षोभ ही उसके निर्माण और नाश का कारण बनता है। महान् पुरुषों के जीवन के उत्थान में यदि नारी का सहयोग है तो दूसरी ओर उसके पतन का भी वही मुख्य कारण है। इसीलिये नारी को 'माया' कहा गया है। युद्ध और शान्ति--दोनों में नारी का हाथ है। युद्ध के बिगुल में यदि नारी का अट्टहास मिलेगा तो काव्य के शान्त छन्द में नारी के आंसू मिलेंगे। मतलब यह है कि शक्ति अपराजिता है, अजेया है और पौरुष के प्रति उसकी हर क्षण ललकार है-- 

      गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहम्।
     मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिष्यंत्याशु देवता।।
                    ---दुर्गा सप्तशती

     अर्थात्--रणांगण में रक्त की नदियां बहाती हुई महाकाली 'मधु' दानव पर हुंकार भरती हुई ललकारती हैं और कहती हैं 'हे मूर्ख मधु ! अभी गरज ले जितना गरजना हो, फिर अवसर नहीं मिलेगा। तब तक मैं मधु-पान करती हूँ। अभी इसी रणांगण में शीघ्र ही सभी देवता तेरी मृत्यु पर अपनी विजय-गर्जना करेंगे, अपना विजयोल्लास मनाएंगे।

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चेतन मन और आत्मा के बीच अचेतन मन है।

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पांच ज्ञानेंद्रयों की जो शक्ति है, वह मन की ही शक्ति है। 

मन की शक्ति से ही ये इन्द्रियां कार्य करती हैं। पर यह भी जानना ज़रूरी है कि मनःशक्ति द्वारा एक समय में एक ही इन्द्रिय कार्य करती है, दूसरी नहीं। 

गहरी सुप्त अवस्था में इन्द्रयों से मन का सम्बन्ध नहीं रहता है। स्वयं मन ही सभी इन्द्रियों का कार्य करता है उस समय। 

मन का एक रूप और है जिसे हम 'अचेतन मन' कहते हैं।

चेतन मन और आत्मा के बीच अचेतन मन है। 

चेतन मन और अचेतन मन आत्मा के ही अंग हैं। 

आत्मा परमात्मा का ही एक रूप है और उस रूप में समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति विद्यमान है। आत्मा कालातीत है। सभी अवस्थाओं में वह समान है। 

अचेतन मन एक विशेष सीमा तक आत्मशक्ति को क्रियान्वित करता है। 

यही कारण है कि वैज्ञानिक अचेतन मन को अलौकिक शक्ति का भंडार कहते हैं। 

जब हम कभी ऐसी स्थिति में होते हैं तो उस समय हमारे चेतन मन से आत्मा का सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप भावी घटनाओं का संकेत और पूर्वाभास होता है।

चेतन मन का सम्बन्ध लौकिक जगत से है और अचेतन मन का सम्बन्ध पारलौकिक जगतों से है। 

योगिगण ध्यानयोग के द्वारा चेतन मन की शक्ति को क्षीण कर देते हैं जिसके फलस्वरूप अचेतन और उसके बाद आत्मा से उनका सीधा संपर्क स्थापित हो जाता है। 

योग का जो चमत्कार है उसका सम्बन्ध योगी के अचेतन मन का कौतुक होता है। आत्मा से सम्बन्ध स्थापित होने के कारण योगिगण लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करते हैं और पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

Vaidic Vigyaan

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स्वयं की खोज

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समाधि में साधक  ध्यान से ही जाएगा। ध्यान है परम संकल्प। ध्यान का अर्थ समझ लो। ध्यान का अर्थ है, अकेले हो जाने की क्षमता। दूसरे पर कोई निर्भरता न रह जाए, दूसरे का खयाल भी विस्मृत हो जाए। सभी खयाल दूसरे के हैं। खयाल मात्र पर का है। जब पर का कोई विचार न रह जाए, तो स्व शेष रह जाता है। और उस स्व के शेष रह जाने में स्व भी मिट जाता है, क्योंकि स्व अकेला नहीं रह सकता, वह पर के साथ ही रह सकता है। जिस नदी का एक किनारा खो गया, उसका दूसरा भी खो जाएगा। दोनों किनारे साथ-साथ हैं। अगर सिक्के का एक पहलू खो गया, तो दूसरा पहलू अपने आप नष्ट हो जाएगा। दोनों पहलू साथ-साथ हैं। जिस दिन अंधकार खो जाएगा, उसी दिन प्रकाश भी खो जाएगा।

ऐसा मत सोचना कि जिस दिन अंधकार खो जाएगा, उस दिन प्रकाश ही प्रकाश बचेगा। इस भूल में मत पड़ना, क्योंकि वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस दिन मौत समाप्त हो जाएगी, उसी दिन जीवन भी समाप्त हो जाएगा। ऐसा मत सोचना कि जब मौत समाप्त हो जाएगी तो जीवन अमर हो जाएगा। इस भूल में पड़ना ही मत। मौत और जीवन एक ही घटना के दो हिस्से हैं, अन्योन्याश्रित हैं, एक-दूसरे पर निर्भर हैं। तो जब पर बिलकुल छूट जाता है, तो स्वयं की उस निजता में अंततः स्वयं का होना भी मिट जाता है, शून्य रह जाता है। ध्यान की यही अवस्था है, उसको हमने समाधि कहा है।

ध्यान साधना:______
                          ध्यान साधना करते हुए अपने योग केअस्तित्व को महसूस करने के लिए मन से लड़ना बंद कर देना चाहिए।शरीर और मन की क्रियाओं को साक्षी भाव से देखने की कोशिश करते रहें। आपके अन्दर अपने-आप एक दैवीय घटना घटने लगेगी। और किसी भी समय अचानक से आपके अन्दर उर्जा का तेज तेज प्रवाह मूलाधार से सहस्रार तक महसूस होने लगेगा।इस प्रवाह से अपने अलौकिक अनुभव से अपने भीतर तक अंनत शान्ति और स्थिरता में डूब जाने जैसी स्थिति बनेगी। ध्वनि  प्रकाश  और कम्पन इतना गहन होता जाएगा।कि उस समय लगेगा की उनका शरीर छूट जा रहा है।वह एक मृत्यु के समान अनुभव होता है। जिसमें परम आनंद का अनुभव भी किया जाता है।उसी क्षण से सतत् स्थिरता की अनुभूति होती है।आगे चलकर प्रकाश ,ध्वनि,सब बदल जाएगा पर एक स्थिरता सतत् बनी रहती है।वह कहीं आती जाती नहीं।उस समय भी थी अब भी है हमारा आत्मस्वरुप, जो कभी बदलता नहीं वहां बस एक ही एक है।उसकी हर समय अनुभूति बनी रहेगी।

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नींबू अदरक युक्त गन्ने का रस

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ये नींबू, अदरक युक्त गन्ने का रस है, जो यूपी के दारोला मेरठ से कई देशों को निर्यात किया जा रहा है। पर हमारे यहां लोग कोकाकोला, पेप्सी और थम्सअप जैसे हानिकारक पेय पदार्थ पीकर गर्व का अनुभव करते हैं। हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली इन विदेशी कंपनियों का बाय बाय कहकर गन्ने का रस और शिकंजी पीना चाहिए। इससे ना सिर्फ हमारा करोड़ो रुपया पेय पदार्थ के नाम पर विदेश जाने से बच जाएगा, वही दुसरी और हमारे देश के ही गरीब भाईयों को रोजगार भी मिलेगा। 

एक भारत - श्रेष्ठ भारत

नोट- इस पोस्ट का मतलब केवल यह बताना है के हमारे पास ताजा गन्ने का रस आदि आसानी से उपलब्ध है हमे उसका सेवन करना चाहिए , विदेशों मे ऐसी सुविधा नही इसलिए उन्हे बोतलबंद मंगवाना पडता है।

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