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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

चतुर्थ क्रिया पीनियल ग्रंथि

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चतुर्थ क्रिया का अभ्यास करने से आप ललाट, पोन्स, थैलेमस, हाइपोथैलेमस, पीनियल ग्रंथि के अंदर, पिट्यूटरी के सामने और मध्य मस्तिष्क में कुछ विशेष आत्मिक गति को अनुभव करते हैं। आपको लगता है कि प्रकाश  उर्ध्वलोकों से  भूलोक की ओर घूमते हुए आ रहा है । इस चौथे स्तर को असंशक्ति समाधि कहा जाता है, इसका अर्थ है कि आप स्वतंत्र रूप से परमचेतना में विचरण कर रहे हैं और अपने पूरे शरीर में भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करते हैं। आप स्वयं को एक दिव्य प्रकाश एवं भगवत अनुभूति का अनुभव करने वाले  देवता के रूप में देखते हैं। आप हजारों ज्योतियों और उनके प्रकाश को देख सकते हैं, यहां तक ​​कि खुली आंखों से, जो आपकी आंतरिक जगत को प्रकाशित करती हैं। आप वास्तव में सहस्रार के ऊपर एक परम प्रकाश को पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशमान करते हुए देख सकते हैं । आपके शरीर में आप सात प्रकार के प्रकाश देख सकते हैं,  सात केंद्रों में से प्रत्येक में दो अग्नि, एक आरोही और दूसरा अवरोही । आप इन ज्योतियों को अपने शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह देख सकते हैं। गुरु का शरीर अंधकार जैसा दिखाई देगा, जिसके चारों तरफ प्रकाश होगा।

~ परमहंस हरिहरानंद जी के लेख के अंश

*Fourth  Kriya* 

By practicing  the  fourth  Kriya  you  feel  some  special  movement  of  the  soul  inside  the  forehead, pons,  thalamus,  hypothalamus,  pineal  gland,  in  front  of  the  pituitary  and  in  the  mid  brain.  You feel  that  the  light  is  rotating  around  from  the  high  heavens  to  the  earth.  This  fourth  level  is  called asamshakti  samadhi,  it  means  you  are  roaming  freely  in  superconsciousness  and  perceive  the living  presence  of  God  in  your  whole  body. You  see  the  Self  as  a  deity  experiencing  divine  illumination  and  the  sensation  of  God.  You  may see  thousands  of  sparks  and  flashes,  even  with  your  eyes  open,  that  light  up  your  inner  world. You  can  also  literally  see  a  super  light  above  the  crown,  lighting  up  the  whole  universe.  In  your body  you  can  see  seven  types  of  light,  two  fires  in  each  of  your  seven  centers,  one  ascending  and the  other  descending.  You  can  see  these  lights  both  inside  and  outside  your  body.  The  body  of the  guru  will  appear  dark,  with  illumination  all  around  it. 

~ Excerpts from writings of Paramahamsa Hariharananda ji

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मृत्यु और जीवन

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{{{ॐ}}}

                                                        # 

मृत्यु इस पृथ्वी की सबसे बडी माया है इसे भ्रम भी कह सकते है ,और इसी कारण इस लोक को मृत्युलोक भी कहते है । विज्ञान कहता है  कि #क्रोमोजोम्स की मृत्यु ही मनुष्य की मृत्यु है । ये क्रोमोजोम्स एक निश्चित अवधि तक ही सक्रिय रहते है । परन्तु अध्यात्म कहता है कि मनुष्य एक भौतिक ईकाई मात्र नही है ।बल्कि एक अभौतिक पदार्थ है जो मृत्यु के समय शरीर से मिलकर शुन्य मे चला जाता है, एवं समय पाकर पुनः नया शरीर ग्रहण करता है । kक्रोमोजोम्स भी उसी चेतना शक्ति जीवित एवं मृत होते है।
अभी मैने विडियो पर एक संत को यह कहते सुना था कि मृतक को चौदह दिनो तक आराम से मरने दिजिये ।क्या ये लोग ज्ञान बांट रहे है या हलवा बना रहे है आराम से मरो ओर चौदह दिन मरो हमारे यहां मृतक का दाह संस्कार कुछ घण्टे मै हो जाता है चौदह दिन मे तो मृतक मे कीड़े पड जायेगे , यह उन लोगों के ज्ञान की पराकाष्ठा है ,और उनके अनुयायी के तो क्या कहने।
 वास्तव मे सच क्या है सोने से पुर्व जिस प्रकार स्वप्न की छाया पडने लगती है । उसी प्रकार मृत्यु के छ: महिने पुर्व   उसकी छाया पडने लगती है, उस समय जागरूक व्यक्ति मृत्यु की भविष्यवाणी कर सकता है । oपांच छ: घण्टे पहले या एक दो दिन पहले तो इसके स्पष्ट संकेत दिखाई देने लगते है ।जिससे कई व्यक्ति अपनी मृत्यु की पूर्व सुचना दे देते है। जो नित्य सोते या उठते समय प्रार्थना का प्रयोग करते है, या ध्यान करते है, उन्हें भी अपने मृत्यु के समय का पता चल जाता है । निर्मल चित्त वालों को भी यह पता चल जाता है ।
आत्मा से निकलने पर भी शरीर की ऊर्जा तीन दिन तक उसमे से निकलती रहती है ।जैसे वृक्ष काटने पर भी उसे सुखने मे कई दिन लग जाते है  ह्रदय की धड़कन बन्द होने पर डाक्टर लोग  hमनुष्य को मृत घोषित कर देते है जिससे क्लीनिकलडैथ (शारीरिक मृत्यु) कहा जाता है, किन्तु जब शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा बाहर निकल जाती है तो उसे बायोलोजिकल डेथ ( जैविक मृत्यु )कहा जाता है।
इसमे लगभग तीन दिन लग जाते है। जैविक मृत्यु से पूर्व यदि विशेष विधियों द्वारा आत्मा को शरीर मे पुनः प्रवेश कराया जा सके तो वह पुनः जीवित हो सकता है ,जैसे पौधा जमीन से उखाड देने पर भी थोडे समय बाद पुनः लगाने पर जीवित हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि जीवात्मा शरीर को छोड देती है, किन्तु शरीर यदि बेकार नही हुआ तो अन्य कोई आत्मा प्रवेश कर जाती है । sजिससे वह मृत शरीर पुनः जीवित हो उठता है ।
कोई जीव जब मृत्यु को प्राप्त करता है तो उसकी चेतना के कारण आत्मा वातावरण मे चली जाती है और वह अपने अनुरूप प्रवृत्ति वाले ऊर्जा शरीर मे कुर्म की पुछ से सम्पर्क करके वहाँ अवतरित हो जाती है।
इस समय आत्मा बीजरूप परमबिन्दू  होती है । उसमे केवल कर्मों के संस्कार होते है, उसका कोई प्रकट अस्तित्व किसी भी रूप मे नही होता ।संस्कार जहां एकत्रित होता है , वह विरल तत्त्व बिन्दू है यही जीवात्मा है। वह सुक्ष्मत्म होता है तो वहां कुछ नही होता ।प्रत्यक्ष भौतिक जगत का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है ।उससे आगे कुछ नही है क्योकि जो नही है वह वास्तव मे है ।
किन्तु वह भौतिक तत्त्व नही है उसकी कोई आकृति कोई स्वरूप नही है वह एक भौतिक तत्त्वों से शुन्य बिन्दू मात्र है। वहा केवल संस्कार हैa और यह संस्कार ही फिर से शरीर धारण करता है ,जब संस्कार ही शुन्य हो जाते है फिर पुनर्जन्म नही हो सकता है

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शिव शक्तिएवं चेतन परमात्मा

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वह परमात्मा चैतन्य है जो ज्ञान स्वरूप अथवा बोधस्वरूप है। वह तत्व अति सूक्ष्म होने से किसी भी प्रकार से दृश्य नही है

 वह स्वयं कोई क्रिया नही करता किन्तु क्रिया का माध्यम उसकी शक्ति है जो सभी प्रकार की क्रिया का कारण है। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत उसी की शक्ति का विलास है।

 बिना शक्ति के शिव भी शव रूप ही है शिव को सीधा नही जाना जा सकता है शक्ति की सहायता से ही शिव की पहिचान होती है जिस प्रकार से अग्नि की पहिचान उसकी दाहिक शक्ति (जलाने की शक्ति) से होती है। यदि उसमे जलाने की शक्ति ही नही है तो उसे अग्नि कैसे कहा जा सकता है? 

जिस प्रकार अग्नि से उसकी दाहशक्ति भिन्न नही है, जिस प्रकार सूर्य से उसका प्रकाश भिन्न नही है जिस प्रकार चंद्रमा से उसकी चांदनी भिन्न नही जिस प्रकार चीनी से उसकी मिठास भिन्न नही है उसी प्रकार शिव से उसकी शक्ति भिन्न नही है।
 शक्ति के बिना अकेला शिव सृष्टि की रचना नही कर सकता है।

अकेली शक्ति भी बिना चेतन (शिव ) सृष्टि की  रचना नही कर सकती अतःयह शक्ति उसका उपकरण है जिसकी सहायता से वह सृष्टि की रचना करता है।

जहा चेतना है वह शक्ति विद्यमान रहती है तथा जहा शक्ति है वह चेतना है ही दोनों अभिन्न है ।

आज विज्ञान केवल शक्ति पर ही अपना ध्यान केंद्रित किये हुवे है तथा इस चेतनतत्व से अनभिज्ञ है जिससे विज्ञान के अपेक्षित परिणाम नही आ रहे चेतन का ज्ञान ही अध्यात्म का विषय है इसके बिना विज्ञान अधूरा है। अधूरा ज्ञान कभी जीवन का आधार नही बन सकता है
ओउम

Virat Yog Sagar

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सोमवार, 5 अप्रैल 2021

पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों

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                        भाग--02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      शुक्रबिन्दु और रजोबिन्दु में 'प्रोटोन' और 'इलेक्ट्रॉन' की सम्भावना समझनी चाहिए। दोनों की ऊर्जा बराबर एक दूसरे की ओर आकर्षित होती रहती है और जब उनका आकर्षण एक विशेष् सीमा पर जाकर घनीभूत होता है तब उस स्थिति में वहां 'न्यूट्रॉन' की सम्भावना पैदा हो जाती है। फलस्वरूप दोनों प्रकार की ऊर्जाएं और उनमें निहित दोनों प्रकार की विद्युत् चुम्बकीय तरंगें एक दूसरे में मिलकर एक ऐसे विलक्षण 'अणु'  का निर्माण करती हैं जिसे हम 'आणुविक शरीर' या 'एटॉमिक बॉडी' कहते हैं।
      इस आणुविक शरीर में हमारा सारा व्यक्तित्व और संपूर्ण जीवन की घटनाएं व संपूर्ण जीवन का इतिहास छिपा हुआ होता है। यह वह अणुविक शरीर है जिसके निर्माण का आधार पहले ही दिन गर्भ में हो जाता है और जिसमें निर्माण-कार्य पूर्ण होने पर आत्मा प्रवेश करती है। इस अणुविक शरीर की जैसी संरचना है, जैसी स्थिति है, उसी के अनुकूल आत्मा उसमें प्रवेश करती है।
       मनुष्य जाति का जीवन और चेतना आज हर क्षण पतन की ओर अग्रसर होती जा रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि संसार के दम्पति श्रेष्ठ व उच्चकोटि की आत्माओं को उत्पन्न होने का अवसर ही नहीं दे रहे हैं। वे जो अवसर दे रहे हैं, वह निम्नकोटि की आत्माओं के पैदा होने के लिए है। यही कारण है कि अच्छी और उच्चकोटि की आत्माओं का संसार में अभाव हो गया है और दूसरी ओर निम्नकोटि की आत्माओं की संख्या आकाश छूने लगी है।
      यह जरुरी नहीं कि मनुष्य के मर जाने के बाद उसकी आत्मा को तुरन्त जन्म लेने या शरीर पाने का अवसर मिल जाये। साधारण आत्माएं तो 13 दिन के भीतर अपने शरीर को खोज लेती हैं लेकिन जो आत्माएं अत्यन्त निकृष्ट कोटि की होती हैं, वे रुक जाती हैं क्योंकि उनकी निकृष्टता के अनुकूल निकृष्ट गर्भ और अवसर मिलना कठिन होता है। ऐसी ही निकृष्ट आत्माओं को हम 'भूत-प्रेत' कहते हैं। इसी प्रकार बहुत उच्च और श्रेष्ठ कोटि की आत्माएं भी रुक जाती हैं क्योंकि उनके अनुकूल श्रेष्ठ व उच्चकोटि का अवसर उन्हें नहीं मिल पाता। ऐसी ही उत्कृष्ट आत्माओं को हम 'देवता' कहते हैं। यही प्रमुख कारण है अवतार ग्रहण करने योग्य उच्च लोकों की उच्च आत्मा को भूलोक में शीघ्र अवतरित न हो पाने का। पूरा का पूरा कालखंड बीत जाता है, युग परिवर्तन हो जाते हैं, तब कहीं जाकर अवतार होता है।
      पूर्व के समय में मनुष्य रूपी भूत-प्रेत कम थे और देव पुरुष अधिक थे। लेकिन आज भूत-प्रेत मनुष्य के रूप में बहुत अधिक आ गए हैं तथा देव पुरुष कम। श्रेष्ठ आत्माओं के जन्म के लिए आवश्यक बात है प्रेमपूर्ण विवाह का होना। लेकिन आज प्रेमपूर्ण विवाह का सर्वथा अभाव है। सच्चा प्रेम ही आध्यात्मिक जीवन का आधार है। अतः श्रेष्ठ आत्माओं के अवतरण के लिए प्रेममय आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता है।
       स्त्री अखिल विश्वब्रह्माण्ड में चैतन्य और क्रियाशील महाशक्ति का एक विशिष्ट केंद्र है। मगर इस रहस्य से बहुत कम लोग परिचित होंगे कि पुरुष की अपेक्षा स्त्री अधिक सुन्दर, सुडौल और आकर्षक क्यों दिखलाई पड़ती है ? उसके व्यक्तित्व के भीतर आखिर ऐसा कौन-सा तत्व है जो आनंद के लिए पुरुष को आकर्षित करता है ? इसका एक कारण है जो बिलकुल साधारण है और जिसकी हम-आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
      जिसे हमने 'अणुविक शरीर' अथवा 'एटॉमिक बॉडी' कहा है, उसमें 24 जीवाणु पुरुष के और 24 जीवाणु स्त्री के होते हैं। इन 48 परमाणुओं के मिलन से पहला 'सेल' निर्मित होता है और इस प्रथम सेल से जो प्राण पैदा होता है, उससे स्त्री का शरीर बनता है। 24+24 :48 का यह सन्तुलित सेल होता है। पुरुष का जो सेल होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, वह 47 जीवाणुओं का होता है। उसके सन्तुलन में एक ओर 23 और दूसरी ओर 24 (23+24:47) जीवाणु होते हैं। बस, यहीं से पुरुष के व्यक्तित्व का सन्तुलन टूट जाता है। इसके विपरीत स्त्री का व्यक्तित्व सन्तुलन की दृष्टि से बराबर(24+24:48) है। उसी के परिणाम स्वरूप स्त्री का सौंदर्य, सुडौलता, आकर्षण, सम्मोहन, कला और रस उसके व्यक्तित्व में पैदा हो जाता है।
      पुरुष के व्यक्तित्व में एक ओर 24 जीवाणु हैं और एक ओर 23 जीवाणु हैं, अतः वह असन्तुलित है। उसमें एक जीवाणु की कमी है। उसे माँ से जो जीवाणु मिला, वह 24 का बना हुआ है और पिता से जो मिला, वह 23 का बना हुआ है। बस, इसी असन्तुलन से पुरुषों में जीवनभर बेचैनी बनी रहती है। एक आन्तरिक अभाव खटकता रहता है। क्या करूं, क्या न करूं ? यह कर् लूँ, वह कर लूँ। इस प्रकार की चिन्ता और उधेड़-बिन बराबर बनी रहती है। तात्पर्य यह कि यह एक छोटी-सी घटना अर्थात् एक अणु का अभाव स्त्री-पुरुष के संपूर्ण जीवन में इतना भारी अन्तर ला देता है।
      मगर यह अन्तर स्त्री में सौंदर्य, आकर्षण, सुडौलता, सम्मोहन, कला और रस तो पैदा कर देता है, पर उसको विकसित नहीं कर पाता। क्योंकि जिस व्यक्तित्व में समता होती है, उसके विकास के अवसर कम ही होते हैं। वह जहाँ है, वहीँ रुक जाता है। यही नियम सर्वत्र लागू होता है। सम्भवतया यही एकमात्र ऐसा जैविक कारण है कि हमारे विद्वान् मनीषियों ने समगोत्री कुल और परिवार में स्त्री-पुरुष के विवाह का स्पष्ट निषेध किया है। क्योंकि उनकी जो सन्तान होगी, उसके विकास और गुणवत्ता की विविधता में कमी होगी। इसी विविधता की कमी के कारण ही उसके व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके विपरीत पुरुष का व्यक्तित्व सम नहीं, विषम है और इसी विषमता के कारण उसका बहुआयामी विकास स्वाभाविक रूप से हो जाता है। इसके कारण पुरुष जो कार्य करता है, वह स्त्री कभी नहीं कर पाती। यदि वह कोशिश भी कर ले तो भी पुरुष की तरह वह सफल नहीं हो पाती।
       स्त्री और पुरुष के चार भिन्न-भिन्न विद्युतीय शरीर हैं और उन्हीं चार शरीरों तक दोनों में भेद पाया जाता है। स्त्री-पुरुष के चारों शरीर स्त्री-पुरुष के मिश्रित होते हैं। सभी को भली भाँति ज्ञात होना चाहिए कि शरीर संरचना में माँ से प्राप्त एक्स जीवाणु और पिता से प्राप्त एक्स और वाई जीवाणु के संयोग से माँ के गर्भ में प्रथम दिन जो सेल निर्मित होता है और उससे जो प्राण पैदा होता है, उसी से आने वाले शिशु का शरीर विकसित होता है। माँ के डिम्बाशय से जो डिम्ब निकलता है, उसमें केवल एक्स(X) जीवाणु होते हैं और पिता के शुक्र से जो स्पर्म आते हैं, उनमें एक्स और वाई(Xऔर Y) दो प्रकार के जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु एक साथ एक समय में करोड़ों की संख्या में निकलते हैं। मगर माँ के डिम्बाशय के जीवाणु से पिता से प्राप्त केवल एक ही जीवाणु संयोग कर पाता है। शेष नष्ट हो जाते हैं। अब यदि माँ से प्राप्त एक्स 
(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु से हो गया तो दोनों X+X = - अर्थात् माइनस (ऋणात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। इसी प्रकार यदि माँ से प्राप्त एक्स(X) जीवाणु का संयोग पिता से प्राप्त वाई  जीवाणु से हो गया तो X+Y = + प्लस (धनात्मक) विद्युत् आवेशयुक्त रहता है। दो X X मिलकर र्ऋणात्मक और X और Y मिलकर धनात्मक सेल की रचना करते हैं। 
      ऋणात्मक सेल से स्त्रैण शरीर की और धनात्मक सेल से पुरुष शरीर की रचना प्रक्रिया आरम्भ होती है। मगर यहाँ एक दूसरा तथ्य भी कार्य करता है। पुरुष शरीर में एक साथ चार शरीर और स्त्री शरीर में भी एक साथ चार शरीर मिश्रित होते हैं। ये चार शरीर निम्न लिखित हैं। पहला शरीर जैसा कि दिखाई देता है--स्थूल या भौतिक या पार्थिव शरीर कहलाता है, दूसरा शरीर जो इसके भीतर होता है, उसे भाव या वासना या आकाशीय या विद्युतीय शरीर कहते हैं। तीसरा शरीर जो भाव शरीर के भीतर छिपा होता है, उसे सूक्ष्म शरीर की संज्ञा दी गयी है और चौथा शरीर जो सूक्ष्म शरीर के भी भीतर होता है, उसे मनोमय शरीर कहते हैं। इस तरह ये चारों शरीर स्त्री और पुरुष के शरीर में मिश्रित रूप से इस तरह रहते हैं जैसे दूध और पानी मिश्रित रहते हैं।
       यदि कोई व्यक्ति पुरुष है तो उसका पहला भौतिक् शरीर जैसा कि दिखलाई पड़ता है, पुरुष शरीर होता है। लेकिन जो उसका दूसरा भाव शरीर है, वह स्त्रैण शरीर(स्त्री का शरीर) है। इसका कारण यह है कि पुरुष शरीर धनात्मक और स्त्री शरीर ऋमात्मक विद्युत् अवेशयुक्त हैं। विज्ञान के नियमानुसार कोई धनात्मक ध्रुव या ऋणात्मक ध्रुव अकेला नहीं रह सकता। यदि अकेला है भी तो कौन जानता है क्योंकि उसकी उपस्थिति का आभास नहीं हो सकता। उसकी उपस्थिति दूसरे ध्रुव के मेल से पता चल पाती है जब दोनों के संयोग से विद्युत् धारा का प्रवाह आरम्भ हो जाता है। विद्युत् एक प्रकार की ऊर्जा है, शक्ति है, एक प्रवाह है और उसकी क्रियाशीलता से ही उसका आभास मिल पाता है। अन्यथा तो शक्ति विहीन वस्तु उस प्रकार निष्क्रिय होती है जैसे प्राणविहीन शव। 
      स्त्री का पहला भैतिक शरीर ऋणात्मक है, यही कारण है कि स्त्री अधिकांश मामलों में(अपवाद को छोड़कर) कामवासना के सन्दर्भ में आक्रामक नहीं हो सकती। वह कभी पुरुष पर बलात्कार नहीं कर सकती। वह बलात्कार झेल सकती है, व्यथा सहन कर सकती है। कामवासना के क्षेत्र में बिना पुरुष की इच्छा या  आवाहन के स्त्री कुछ भी नहीं कर सकती। स्त्री का दूसरा भाव शरीर धनात्मक, तीसरा शरीर फिर ऋणात्मक और चौथा शरीर धनात्मक होता है। 
      ऋणात्मक का मतलब शून्य नहीं समझना चाहिए। विद्युत् विज्ञान की भाषा में इसका अर्थ होता है--संग्राहक(ग्रहण करने वाली)। स्त्री के पास एक ऐसा शरीर है जिसमें असीम शक्ति संग्रहीत है। मगर वह असीम शक्ति क्रियाशील नहीं, निष्क्रिय रहती है। हमारे पुराणों ने इस महत्वपूर्ण सिद्धान्त को बहुत ही रोचक और अर्थवान रूपक के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। देवासुर संग्राम में जब समस्त देवगण अपने सभी प्रयत्नों के बावजूद भी असुरों को परास्त करने में असमर्थ हो गए तो वे सब मिलकर महामाया पराशक्ति के आश्रय में पहुंचे और फिर उन देवों के समवेत अंश से जो एक विलक्षण तेज उत्पन्न हुआ और उससे जो विध्वंसात्मक ऊर्जा पैदा हुई, वह वही महाकाली, कराली, कंकाली, दुर्गा का स्वरुप थी। फिर उस ऊर्जस्वित तेजपुंज के आवेग को रोक पाना किसी देव के वश में भी नहीं था। इसी स्वरुप का सचित्र चित्रण पुराणों और तंत्रग्रंथ 'दुर्गा सप्तशती' में किया गया है। उत्तेजित, आक्रोशित दुर्गा का तेज जब किसी देव के रोके न रुका तो फिर देवों के देव 'महादेव' महाकाली को रोकने के लिए सामने आ गए। फिर भी महादेवी का वेग शीघ्र शान्त नहीं हो पाया और उनके पैर महादेव के ऊपर आ पड़े। महादेव के ऊपर आक्रोशित महाकाली का वह विग्रह इस तथ्य की ओर संकेत है कि जब तक स्त्री की ऋणात्मक शक्ति शान्त है, तबतक वह शान्त है, निष्क्रिय है, लेकिन जैसे ही वह धनात्मक शक्ति के माध्यम से  जबर्दस्ती जाग्रत की जाती है, वैसे ही वह अशान्त, उत्तेजित, आक्रोशित और क्रियाशील हो जाती है। फिर उसकी क्रियाशीलता, उत्तेजना, क्रोध या आवेश शीघ्र शान्त नहीं हो पाता।
       यही कारण है कि स्थूल शरीर की दृष्टि से पुरुष स्त्री की अपेक्षा अधिक ताकतवर है, लेकिन वह कुछ ही क्षणों के लिए है क्योंकि पुरुष का दूसरा शरीर जो स्त्रैण शरीर है, वह नकारात्मक है। यदि उसको स्त्री से लम्बे समय तक संघर्ष करना पड़े तो वह पराजित हो जायेगा। इसका एकमात्र कारण यही है कि स्त्री का दूसरा शरीर जो पुरुष शरीर है, उसमें धनात्मक आवेश विद्यमान है। इसीलिए स्त्री में पुरुष की तुलना में सहनशक्ति अधिक होती है।
      पुरुष और स्त्री में इन चार शरीरों तक भेद रहता है। पांचवां शरीर लिंगभेद से परे है। इसीलिए इसे अलिंग शरीर कहते हैं। क्योंकि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता। वह कभी पुरुष शरीर में तो कभी स्त्री शरीर में प्रवेश कर जन्म ग्रहण करती है। कब वह पुरुष शरीर में और कब स्त्री शरीर में प्रवेश करेगी, यह परिस्थितयों, कर्म और प्रारब्ध के ऊपर निर्भर है। यह विषय एक अलग विषय है, इस सम्बन्ध में कभी किसी दूसरी जगह चर्चा अपेक्षित है। यहाँ विषयांतर करने की आवश्यकता नहीं है।
      सफल दाम्पत्य जीवन के लिए आवश्यक है कि स्त्री को ऐसा पति मिले जो उसके भीतर विद्यमान पुरुष शरीर से सामंजस्य रख सके।  उसी प्रकार पुरुष को ऐसी पत्नी मिले जो  पुरुष के भीतर विद्यमान स्त्री शरीर से उचित तालमेल बैठा सके। इसके लिए स्त्री-पुरुष दोनों को अपने-अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों को जानना-समझना-पहचानना जरुरी है। और यह तभी संभव है जब वे कुण्डलिनी जागरण के उपाय के रूप में 'बिन्दुसाधना' करते हैं। बिन्दुसाधना वह साधना है जिसमें स्त्री या पुरुष अपने भीतर के विद्युतीय शरीरों से साक्षात्कार करते हैं। उसे जानने-समझने का कार्य करते हैं और उससे सामंजस्य बैठाते हैं।(हमारी प्राचीन भारतीय सनातन संस्कृति में चार आश्रमों की जो व्यवस्था की गयी थी--ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानवप्रस्थ और सन्यास आश्रमों की, उनमें ब्रह्मचर्य आश्रम में 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य शक्ति का संचय करने का विधान किया गया था और गृहस्थ आश्रम को उसके प्रयोग और परीक्षण के लिए व्यवस्थित किया गया था जिसके परिणाम स्वरुप ही 'परिणय' या 'विवाह' की नैतिक और भावनामय परंपरा का सफल निर्वहन करना होता है। परिणय या विवाह का उद्देश्य मात्र कामवासना की तृप्ति ही नहीं है, बल्कि यह एक उच्च गुरुतर उत्तरदायित्व के निर्वाह का परीक्षण काल है। 20-25 वर्षों तक जिस ब्रह्मचर्य तत्व की शक्ति का जो संचय किया गया होगा, उसीका कुण्डलिनी जागरण के क्रम में बिन्दुसाधना की प्रक्रिया का प्रयोग और परीक्षण है, न कि कामवासना की तृप्ति। इस प्रयोजन में यह प्रक्रिया शुद्ध मन, प्राण और भाव से की जाती है, तभी बिन्दुसाधना की सफलता है। साथ ही पितृ ऋण से मुक्ति के लिए उच्चकोटि की आत्मा को स्त्री-पुरुष-समागम के माध्यम से आकर्षित किया जाता है ताकि सृष्टि प्रक्रिया की मर्यादा का पालन  हो सके। उच्च और विशुद्ध भाव से यह ईश्वरीय क्रिया मानकर करने से उच्च आत्माएं आकृष्ट होती हैं और केवल कामवासना के वेग को शान्त करने के लिए स्त्री-पुरुष संसर्ग में  वासनाप्रधान निम्न कोटि की आत्माएं आकृष्ट होती हैं)।
       इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखकर भारतीय सनातन समाज में एक विशिष्ट जीवन शैली निर्धारित की गई जिसे 'हिन्दू संस्कृति' या 'सनातन संस्कृति' की संज्ञा दी गयी। इस संस्कृति में सर्वप्रथम स्थूल शरीर को साधन और ब्रह्मचर्य को साध्य बनाया गया था।
       यहाँ मानव शरीर की रचना,  उनसे सम्बंधित तत्वों,  लोकों तथा चक्रों का विवरण नीचे दिया जा रहा है--

1-स्थूल शरीर(physical body): स्थूल जगत् :पृथ्वी तत्व : मूलाधार चक्र।
 2-भाव या वासना शरीर(etheric body): वासना जगत् या प्रेत जगत् या स्वप्न जगत् या भाव जगत्: जल तत्व: स्वाधिष्ठान चक्र।
3-सूक्ष्म शरीर या प्राण शरीर(astral body): सूक्ष्म जगत् : अग्नि तत्व: मणिपूरक चक्र।
4-मनोमय शरीर या मनः शरीर(mental body): मनोमय जगत्: वायुतत्व: अनाहत चक्र।
5-आत्म शरीर(spiritual body) : आत्म- जगत्: आकाश तत्व : विशुद्ध चक्र।
6-ब्रह्म या ब्रह्मांडीय शरीर(cosmic body) : ब्रह्म जगत् या ब्रह्माण्ड जगत् पंचतत्व रहित अवस्था : आज्ञाचक्र।
7-निर्वाण शरीर(bodiless existence): निर्वाण जगत् :शून्यावस्था: सहस्रार चक्र।

                            समाप्त

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शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

अनादिनाथ की माया

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{{{ॐ}}}

                                                  #

अनादिनाथ सदाशिव की लीला बडी ही विचित्र है ,विचित्र मायानगरी का निर्माण करती है और यही मायानगरी, महामाया,प्रकृति यह ब्रह्माण्ड है। पौराणिक रूपक कथाएं मूर्त होकर ज्ञानी महात्माओं के मन मे भी घर कर गयी है भारतीय आध्यात्म जगत् मे एक भारी कमी विधमान हैa, यह कर्मकाण्ड और मुक्ति पूजा एवं उनकी विधियों का भण्डार बन गया है । और उन्हें विश्वास हुए है। कि वे सभी तैतींस करेंट देवी- देवतागण इस विशाल ब्रह्माण्ड के भिन्न भिन्न लोको मे रहते है ।a
साधक की तपस्या से प्रसन्न होकर वे आते है और वर देकर चले जाते है। किसी को यह भी विश्वास है ,कि कहीं पर क्षीर सागर है, जिसमे एक विशालकाय शेषनाग की कुड़ली पर विष्णु भगवान शयन करते है और लक्ष्मी जी उनके पैर कराती रहती है।s और वे भक्तों की पुकार सुनकर वे नंगे पांव दौडे चले आते है। इसी प्रकार शिव और देवताओं के बारे मे विश्वास है ।और यह विश्वास इतना प्रबल है, कि इन पर किसी प्रकार की चोट बर्दाश्त नही कर पाते है।
अनेक अन्धीआस्था मे डुबे  हुए अज्ञानता के अन्धकार मे विलोपित स्त्री पुरूषों को इससे चोट पहुंचती है! परन्तु यह वास्तविक सत्य यही हैs कि वे भारी भ्रम मे पडे हुए है यह सब वह नही है, जो वह समझ रहे है।  हमारे देवालयों परमात्मा नही होता मंदिर तो केवल यन्त्र मात्र है ,hजिससे ऊर्जा प्राप्त करके हम ऐश्वर्य वान बनते है ।जब हम किसी देवी देवता की साधना कर रहे होते है।
तो कण कण मे व्याप्त उसकी सुक्ष्म शक्तियों को अपने अन्दर एकत्र कर रहे है। यह हमारी शक्ति को बढाकर हमे दिव्य शक्तियों से सुसज्जित कर देती है ।और इसी का मानसिक प्रतिरूप हमारे सामने प्रकट होता है। इस मायानगरी की माया इतनी सबल हैo कि ज्ञानी महात्माओं के भी ज्ञान को हरण कर लेती हैh और उन्हें भ्रम के माया जाल मे भटकाती है। यह श्रीराम को भी विलाप करने पर विवश कर देती है और पराशर जैसे ऋषि को भी पशु बना देती है। 
 यह वह आधाशक्ति हुए, जिसकी धारा मे सभी बँधे है और इस बात से बेखबर होकर इस जादूनगरी मे भटक रहे है। कि मृत्यु का भयानक जबडा़ उन्हें अपने अन्दर खींचे जा रहा है । इसे समझये  कि जो सत्य को प्रकाशित करता है ,ज्ञान के रूप मे , सुत्रों एवं नियमो के रूप मे आपको प्राप्त होता है o। यह सभी कहते है कि तंत्र की उत्पत्ति सदाशिव से हुई है , लेकिन कोई नही जानना चाहता कि तंत्र क्या है। विधियाँ तंत्र नही है क्योंकि वे अनेक है, मंत्र भी तंत्र नही है क्योंकि वह भी अनेक है । फिर तंत्र क्या है?
सदाशिव से प्रकृति यानि आधाशक्ति की उत्पत्ति होती है , जिसकी माया से यह ब्रह्माण्ड का मायाजाल बनता है । इस मायाजाल मे ही सारे दैवी देवता विशेष बिन्दुओं मे निवास करते है , किन्तु यह मानवाकृति नही है। यहाँ लिंग और योनि का समागमन हो रहा है ।इससे ऊर्जा निकल रही है और यही ऊर्जा शक्ति है जिससे हमारा अस्तित्व है या इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है यह एक व्यवस्थित ऊर्जा संरचना है। एक दूसरे से जुडा, खोल पर खोल चढाये यह पूरा ऊर्जा परिपथ जलती बुझती धाराओं  मे ऊर्जा का उत्पादन कर रहा है ।
यह नजारा अदभुत है ,तब यह और भी विस्मयकारी लगता है, जब इसकी धाराओ मे सदाशिव की ही लहरें दौडती दृष्टि गत होती है। यह सम्पूर्ण व्यवस्था कैसे उत्पन्न होती है कैसे विकसित होती है यह स्मरण रखिये वह परमात्मा, सदाशिव सब मे विधमान है ,उनसे उत्पन्न होने वाली शक्तियां सबमे व्याप्त रही। उनमें भी जो इनके बारे में जानते नही या निन्दा करने वाले है। kये केवल किसी समुदाय के ही परमात्मा नही है ,ये मच्छर और मछली के भी परमात्मा है।
पृथ्वी, सूर्य, और इस ब्रह्माण्ड सहित सभी ईकाईयों के भी परमात्मा है, यह एक विचित्र तत्त्व है और समस्त लीला इसी से इसी मे इसी के कारण इसी की इच्छा से चलती है उपनिषदों मे भी कहा गया है कि हम क्या बताये वह कैसा है। वैसा कुछ इस संसार मे नही है। वह निर्गुण है निराकार है अदभूत है उसमे चेतना नही है, क्योंकि चेतना भौतिक उत्पत्ति है ।उसकी लीला क्यो है, यह वही जानता है, अर्थात ब्रह्माण्ड और इसकी लीला की उत्पत्ति क्यो होती है, यह वही जानता है । वह सबका जीवनदाता है, सबका भाग्यविधाता है ।
वह अपनी तेज धाराओं से एक ऊर्जा वृक्ष बना रहा है और उस ऊर्जा वृक्ष मे विचित्र लीला चल रही है । सभी इकाइयाँ अपनी अलग अलग अनुभूतियों के मायाजाल मे भटक रही है । यह माया जो कुछ भी नही है ।केवल अनुभूतियों का संसार है, सभी को मोहक लगती है कि वे उसी मे लिप्त होकर संसार को भोगने मे लगे हुए है

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हवन का महत्व

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       फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला कि हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर ही किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है, तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है। जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शु्द्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।

गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया कि यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो, तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की। क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणु नाश होता है ? अथवा नही ? 

उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये हवन विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी एक किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए। पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया।

यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजूद जीवाणुओं का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।

अपने स्वजनों परिजनों को इस जानकारी से अवगत कराएँ । हवन करने से न सिर्फ भगवान ही खुश होते हैं, बल्कि घर की शुद्धि भी हो जाती है। भगवान सभी परिजनों को सुरक्षा एवं समृद्धि प्रदान करे। 

ॐ स्वस्ति: 🚩🚩🚩

दिनांक :- ३०.०३.२०२१
---#राज_सिंह---

Vedic science

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शरीर मे प्राण और अपान

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की गति निरन्तर बनी रहती है। ह्रदय से बाहर की ओर जाने वाली श्वाश को प्राण कहा जाता है।तथा बाहर से भीतर आने वाली श्वास को अपान कहा जाता है।

प्राण के निकल जाने पर मृत्यु होती है। तथा अपान के आने से जीवन मिलता है। इसलिए इस अपान को ही जीव कहा जाता है।

जब अपना अपानवायु भीतर प्रवेश करती है। तो ('ह' ) की ध्वनि होती है। तथा श्वास छोड़ते समय (स) की ध्वनि होती है। इस प्रकार ह और स का उच्चारण निरंतर होता रहता है। जिसे हम हंस गायत्री कहते है।

अपान से ही वोध होता है। कि शरीर मे जीवात्मा विद्यमान है। अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव हो जाता है। जब तक शरीर जीवित है। तब तक अपान और प्राण का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है।

यह कब तक चलता राहेगा तथा यह क्रम कब टूट जाएगा इसके विषय मे कुछ नही कहा जा सकता।

जिस प्रकार हकार में ह की आकृति टेढ़ी मेढ़ी होती है। उसी प्रकार यह जीव भी अपनी इच्छा से ही कुटिल घुमावदार आकृति धारण कर लेता है यह वक्रता परमेस्वर की स्वतंत्रत इच्छा शक्ति के कारण होती है।

यह वक्रता प्राणों में आती है। जीव में नही यह जीव प्राण शक्ति के भीतर सूक्ष्म रूप में रहता है। प्राण और अपान की समानता के कारण ही जीव को हंस कहा जाता है। अर्थात हंस की भांति उसमे नीर क्षीर का विवेक प्राप्त होता है।

ह्रदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संबित शक्ति इन सबको उत्तपन करने वाली है। इसी को परादेवी कहा गया है। यही दीर्धात्मा तथा परापरा उसी का स्वरूप है। यही श्रेष्ट तीर्थभूमि है। हंस मन्त्र को इसी कारण अजपा गायत्री कहा जाता है। जिनका निरंतर जप चलता है।

इस ह्रदय रूपी भूमि में जहाँ सकार और हकार का सम्लित होता है। अर्थात प्राण और अपान का मिलन हित है। उससे जो आनंद उत्तपन होता है। वह महानंद के नाम से प्रसिद्ध है। इस महानंद का अनुश्ठान करने से ही साधक को वह (शिव ) में ही हु इस प्रकार का ज्ञान हो जाता है।

इसी विचार में निमग्न रहने वाला साधक उस शिव उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त कर लेता हैं उसमें समाविष्ट हो जाता है। जिससे जीव व शिव का भेद ही मिट जाता है दोनों एक रूप हो जाते है।

ओउम

पंडित महावीर प्रसाद

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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

चेरी की खेती

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चेरी सबसे मनमोहक फल हैं।खट्टा- मिठा स्वाद , गहरा लाल रंग और बेहद आकर्षक दिखने वाला चेरी  मानसून और गर्मियों का फल है। ये खट्टा-मीठा फल खाने में जितना टेस्टी होता है। सेहत के लिए उतना ही फायदेमंद होता है। इसमें पाए जाने वाले कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, बी और सी, बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, लोहा, पोटेशियम, फॉस्फोरस शरीर को स्वस्थ रखने का काम करते हैं। इन पोषक तत्वों की वजह से चेरी को सूपरफूड की श्रेणी में रखा जाता है। यही पोषक कई प्रॉबल्म को दूर करने में मददगार होता है। अगर रोज 10 चेरी खाई जाए तो आप कई बीमारियों से बच सकते हैं।
आंखों के लिए फायदेमंद

चेरी में विटामिन ए की भरपूर मात्रा पाई जाती है। इसको खाने से आंखों से संवंधित समस्याएं नहीं होती। जिन लोगों को मोतियाबिंद की समस्या हो उनको रोजाना चेरी खानी चाहिए।

याद्दाशत बढाएं
चेरी में याद्दाशत बढ़ाने वाले गुण पाए जाते हैं। जिन लोगों को बातें या चीजें भूलने लगती हैं। उनके लिए चेरी खाना बहुत फायदेमंद होता है। 

अनिद्रा की समस्या से छुटकारा
चेरी में मेलाटोनिन की बहुत मात्रा होती है, जो अनिद्रा की समस्या से छुटकारा दिलाता है। रोजाना सुबह-शाम 1 गिलास चेरी का जूस पीने से अच्छी नींद आने लगेगी। 

 हड्डियां मजबूत
आजकल बहुत से लोगों को हाथों-पैरों की हड्डियों में दर्द होने या हड्डियां संबंधी कई प्रॉबल्मस होने लगती है। हड्डियों की समस्याओं से राहत पाने के लिए रोजाना चेरी खाएं। 

 दिल को रखे हैल्दी
चेरी में आयरन, मैगनीज, जिंक, पोटेशियम आदि कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसके साथ ही इसमें बिटा कैरोटीन तत्व भी होता है जो दिल की बीमारी को दूर करने में मदद करता है।

कैंसर
चेरी में मौजूद एंटीआक्सीडेंट्स शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति देते हैं। इसके साथ ही चेरी में फिनॉनिक एसिड और फ्लेवोनॉयड भी होता है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के ऊतकों को बढ़ने से रोकते है। 

 वजन करें कंट्रोल
जो लोग वजन कम करना चाहते हैं उनके लिए चेरी किसी औषधि से कम नहीं है। चेरी में वसा की मात्रा बहुत कम पाई जाती है। इसके साथ 70 % पानी होता है जो घुलनशील फाइबर के लिए अच्छा होता है। रोजाना चेरी खाने वजन कंट्रोल में रहने के साथ ही पाचन तंत्र मजबूत होता। 

 ब्लड प्रैशर रखे ठीक
चेरी में पोटैशियम की मात्रा होती है जो शरीर में स्थित सोडियम की मात्रा कम कर देता है।  इस वजह से शरीर का रक्तचाप स्तर सामान्य हो जाता है। इसी के साथ कोलेस्ट्रोल का स्तर भी कंट्रोल में रहता है। 

डायबिटीज में सहायक
रोजाना चेरी खाने से डायबिटीज की समस्या से राहत पाई जा सकती है। चेरी में पाए जाे वाले गुण चेहरे की रंगत को साफ करने से साथ ही शरीर में इन्सुलिन की मात्रा को कम करके डायबिटीज के स्तर को कम करता है।

त्वचा में लाएं निखार
त्वचा को सॉफ्ट बनाने और रंगत निखारने के लिए चेरी का फल खाएं। आप चाहे तो चेरी का पेस्ट बनाकर भी चेहरे पर लगा सकते हैं। चेरी के पेस्ट को नियमित रूप से चेहरे पर लगाने से मृत कोशिकाएं हट जाती है। डैड सैल्स हटने से चेहरे पर निखार आने लगता है।

चेरी की खेती विश्व में सबसे अधिक यूरोप और एशिया, अमेरिका, तुर्की आदि देशों में की जाती है| जबकि भारत में इसकी खेती उत्तर पूर्वी राज्यो और हिमाचल प्रदेश, कश्मीर, उत्तराखंड आदि राज्यों में कि जाती है| चेरी स्वास्थ्य के लिये अच्छा फल माना जाता है| यह एक खट्टा-मीठा गुठलीदार फल है| इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते है, जैसे- विटामिन 6, विटामिन ए, नायसिन, थायमिन, राइबोफ्लैविन पोटेशियम, मैगनिज, काॅपर, आयरन तथा फस्फोरस प्रचूर मात्रा में पाए जाते है| इसके फल में एंटीआॅक्सीडेट अधिक मात्रा में होता है, जो स्वास्थ के लिये अधिक अच्छा माना जाता है|

इसको तीन वर्गो में विभाजित किया जाता है, जैसे-

 
1. मीठी चेरी जिसे प्रूनस एवियम कहते है, इसकी मूल क्रोमोजोम संख्या एन- 8 है, इसमें दो वर्ग की चेरी शामिल है एक हार्ट और दूसरी बिगारो|

2. खट्टी चेरी जिसका वैज्ञानिक नाम प्रूनस सीरैसस है, इसमें भी दो वर्ग की चेरी शामिल है, जैसे- एक अमरैलो तथा दूसरी मोरैलो|

3. ड्यूक चेरी जो पहले व दूसरे के संकरण से निकली है, यह एक पालीप्लायड चेरी है, जिसकी मूल क्रामोजोम संख्या 2एन- 32 है, सभी चेरी रोजेसी कुल की सदस्य हैं|

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उपयुक्त जलवायु
चेरी की खेती समुद्रतल से 2,100 मीटर की ऊँचाई के नीचे सफलतापूर्वक पैदा नहीं की जा सकती|परन्तु कश्मीर और कुल्लू की घाटियों में इसे 1500 मीटर की ऊँचाई पर भी सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है| गर्मी में वातावरण ठंडा और शुष्क होना चाहिए| इसे लगभग 120 से 150 दिन तक अच्छी ठंडक यानि 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान की आवश्यकता होती है| अतः जिन स्थानों में उक्त दिनो तक 7 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान मिलता है वहीं इसे सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है|

भूमि का चुनाव

 
चेरी की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है| परन्तु इसके लिये रेतीली-टोमट मिट्टी को अच्छा माना जाता है| रेतीले टोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6.0 से 7.5 होना चाहिए| इस मिट्टी में नमी के साथ साथ साथ उपजाऊ होना भी आवश्यक है| चेरी की खेती के फूलों व फलों को पाले से बचाना जरूरी है|

उन्नत किस्में
चेरी की खेती के लिए अनेक किस्में उपलब्ध है, लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से उगाई जाने वाली कुछ किस्में इस प्रकार है, जैसे-

जल्दी तैयार होने वाली किस्में- फ्रोगमोर अर्ली, ब्लेक हार्ट, अर्ली राईवरर्स, एल्टन|

मध्य समय में तैयार होने वाली किस्में- बेडफोर्ड प्रोलोफिक, वाटरलू|

देर से तैयार होने वाली किस्में- इम्परर, फ्रैंसिस, गर्वरनर उड|

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चेरी की किस्में जिन्हें बिगररेउ और हार्ट समूहों में बांटा गया है, जैसे-

बिगररेउ समूह- इस समूह का चेरी सामान्यतः इसका आकार गोलाकार तथा आमतौर पर फल का रंग अंधेरे से हल्के लाल भिन्न होता है, इसमें संकर किस्में जैसे- लैपिंस, सिखर सम्मेलन, सनबर्ट, सैम और स्टेला आदि है|

 
हार्ट समूह- इस समूह के तहत चेरी फल दिल का आकार का होता है, और फल का रंग हल्का लाल तथा रेडिस रंग का होता है|

भारत में चेरी की क्षेत्र के आधार पर किस्में इस प्रकार है, जैसे-

हिमाचल प्रदेश- वाइट हार्ट, स्टैला, लैम्बर्ट, पींक अर्ली, तरतरियन, अर्ली रिवर और ब्लैंक रिबलन आदि|

जम्मू कश्मीर- बिगरेयस नायर ग्रास, अर्ली परर्पिल, गुनेपोर, ब्लैक हार्ट आदि|

उत्तर प्रदेश- गर्वेनश वुड, बेडफोर्ड, ब्लैक हार्ट आदि|

पौधे तैयार करना
पौधे तैयार बीज के माध्यम से या जड़ कटाई द्वारा किए जाते है| मुख्य रूप से ग्राफ्टिंग पद्धति के माध्यम से चेरी पौधों को लगाया जा सकता है| आमतौर पर बीज अंकुरण के लिए शीतल उपचार की आवश्यकता होती है| आमतौर पर इसके बीज पूरी तरह से पके फल से निकाले जाते हैं| इन बीज को सूखे और ठंडे स्थान पर संग्रहीत किया जाना चाहिए| लगभग एक दिन के लिए इसके बीज को विशेष विधि से भिगोया जाता है|

पौधे ऊपर उठी क्यारियों में लगाए जाते हैं, इन क्यारियों की चैड़ाई 105 से 110 सेंटीमीटर व ऊँचाई लगभग 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, दो क्यारियों के बीच में 45 सेंटीमीटर का अन्तर रखा जाना चाहिए| क्यारियों में पौधों को चार पंक्तियों के बीच में 15 से 25 सेंटीमीटर की दूरी व पौधे की आपसी दूरी सेंटीमीटर रखना आवश्यक है| पौधों की रोपाई दिन के ठंडे समय में की जानी चाहिए|

प्रवर्धन और मूलवृन्त
चेरी की खेती या बागवानी हेतु कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में चेरी का अलेंगिक प्रवर्धक रोपण द्वारा तथा चश्मा चढ़ाकर किया जाता है| रोपण फरवरी में करते है और रिंग चश्मा जून और सितम्बर में चढ़ाते हैं| कश्मीर में चेरी का रोपण मैजर्ड प्रकंद से जो सकर्स निकलते है, उन पर किया जाता है| हिमाचल प्रदेश में इसका पाजा के बीजू पौधों पर रोपण करते है| पाजा के पेड़ जंगली पैमाने पर हिमाचल प्रदेश में उगते हैं, इनके पत्ते गिरते नहीं, अभी हाल ही में प्रूनस कारन्यूटा का भी प्रकंद इस्तेमाल किया गया है|

नर्सरी पैमाने पर यह सफल साबित हुआ है, कारन्यूटा का प्रकंद ओजस्वी और ठंड और वैक्टरीनियल गमोसिस के प्रति सहिष्णु है|अन्य देशों में माजार्ड और माहले के प्रंकद अधिक इस्तेमाल किये जाते हैं| फ्रांस और जर्मनी में स्टाक्टन मोरेलो का प्रकंद भी इस्तेमाल किया जाता हैं, खट्टी चेरी के लिए यह एक अच्छा प्रकंद है| सेब की तरह चेरी में अभी कोई बामन किस्म का प्रकन्द विकसित नहीं किया गया है|

पौधरोपण

चेरी में रेखांकन एवं पौध रोपण अन्य अष्ठिफलों जैसे आडू, प्लम आदि की तरह किया जाता है| पेड़ लगभग 10 मीटर की दूरी पर लगाये जाते हैं| लगाने के बाद लकड़ी गाढ़कर पौधो को आरम्भ में सहारा देना चाहिये| सूरज की तेज रोशनी से पौधे के तने पर बूरा प्रभाव पड़ता है| अतः इससे बचने के लिए तने पर चूने का लेप कर दें या इसे किसी कार्ड बोर्ड की पट्टी से ढ़क देना चाहिए| चेरी की खेती के लिए खेत की तैयारी और रोपण की अधिक जानकारी के लिए आडू की खेती कैसे करें लेख पढ़ें- आड़ू की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

परागण
चेरी की लगभग सभी किस्मों में स्वअनिषेच्यता पायी जाती है| अतः इनमें पर-परागण आवश्यक होता है| कुछ किस्मों में जैसे बिंग, लैम्बर्ट और नेपोलियन आदि में पर अनिषेच्यता भी मिलती है, इन किस्मों के लिए डूय्‌क किस्म परागण का काम करती है| अधिकांश मीठी किस्मों के परागण के लिए फ्रागमोर किस्म सबसे अच्छी पाई गयी है और खट्टी किस्मों में स्व-परागण से फल बनते हैं| अतः इनमें परागकारी किस्म लगाने की आवश्यकता नहीं पडती हैं|

सिंचाई और खरपतवार

मीठी चेरी को अन्य फलों की अपेक्षा बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है| इसका कारण यह है, कि इसके फल बहुत जल्दी पककर तैयार हो जाते हैं| जिससे इन्हें अधिक गर्मी का सामना नहीं करना पड़ता| परन्तु यदि ऐसी सूखी जलवायु में इसके पेड़ हों जहां उत्स्वेदन की क्रिया अधिक हो तो ऐसे स्थान में पेडों को पानी की आवश्यकता पडेगी| नमी बनाये रखने के लिए इसके उद्यान में मल्चिंग (पलवार बिछाना) अधिक लाभप्रद सिद्व हुई है| खट्टी चेरी में उत्स्वेदन अधिक होता है| अतः इसे अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है| चेरी के बाग में खरपतवार नहीं होने चाहिए|

खाद और उर्वरक
स्वीट चेरी के पेड़ आडू की अपेक्षा अधिक नाइट्रोजन लेने की क्षमता रखते हैं| पोटाश की कमी के लक्षण भी पेड़ों पर नहीं मिलते क्योंकि मिट्टी से पोटाश लेने की क्षमता इसके पेड़ों में अधिक होती है| खाद की जो मात्रा सेब के लिए बतायी गयी है, वही मात्रा स्वीट चेरी को भी दी जानी चाहिए| खट्टी चेरी को नाइट्रोजन की अधिक मात्रा दी जानी चाहिए| इसके लिए आप सेब की खेती कैसे करें पढ़ें- सेब की खेती कैसे करें, जानिए उपयुक्त जलवायु, किस्में, रोग रोकथाम, पैदावार

सघाई और कटाई-छटाई

चेरी के पेड़ बिना अधिक काट छांट के ही उचित आकार ग्रहण कर लेते हैं, फिर भी पेड़ों की ट्रेनिंग परिवर्तित अग्र प्ररोह विधि द्वारा की जाती है| मीठी चेरी में फूल दीर्घकालीन स्पर पर लगते हैं| ये स्पर 10 से 12 साल तक फूल-फल देते रहते हैं| इसलिए अन्य पर्ण पाती फल वृक्षों की अपेक्षा इसमें नयी लकड़ी के लिए बहुत कम काट-छांट की आवश्यकता होती है| यदि पेड़ की ट्रेनिंग ठीक ढंग से की गई तो फलत में आये पेड़ को उत्पादन में रखने के लिए किसी विशेष काट-छाट की आवश्यकता नहीं होती|

काट-छांट इस प्रकार करनी चाहिए कि प्रत्येक वर्ष लगभग 10 प्रतिशत पुराने स्पर निकाल दिये जायें जिससे नये स्पर का निकास हो सके| कहने का तात्पर्य यह है कि इसमें बहुत हल्की काट-छांट की जरुरत पड़ती है| हल्की काट-छांट के अतिरिक्त बाग की मिट्टी सही हालत में रखना आवश्यक है| जिससे इसका अच्छा उत्पादन दीर्घ काल तक मिलता रहता है|

रोग और कीट रोकथाम
बैक्टीरियल गमोसिस- बैक्टीरियल गमोसिस चेरी का प्रमुख रोग है|

रोकथाम- रोगजनित भाग को छीलकर अगल कर लें और चौबटिया पेस्ट लगाये| पतछड़ और बसंत ऋतु में एक एक छिड़काव बोर्डोमिश्रण का करें|

लीफ स्पाट- ग्रसित पत्तियों में बैंगनी धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में बढ़कर लाल-भूरे क्षेत्र के अन्दर भूरे रंग के दिखते हैं| जब धब्बों के सूखे हुए क्षेत्र झड़ जाते हैं, तोपत्तियों में छेद दीखने लगते हैं, बाद में पूरीपत्ती का हरपन समाप्त हो जाता है, और पत्तियाँ गिर जाती है|

रोकथाम- पत्तों के गिरने या कलियों के सूखने के समय ज़ीरम या थीरम 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें|

भुरी व्याधि- फल तोड़ते समय वातावरण की अर्द्रता के कारण यह रोग फैलता है| मीठी और ड्यूक किस्मों में इसका प्रकोप अधिक होता है| सडे़ हुए हिस्सों में पाउडर की तरह भूरे रंग के स्पोर बन जाते हैं|

रोकथाम- कैप्टान का छिड़काव दो बार करें 15 दिन के अन्तराल से|

ब्लेक फ्लाई- चेरी की खेती का यह मुख्य हानिकारक कीट है, नये साखाओं व पत्तियों को इसके झुंड कुंचित कर देते हैं और शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं| जो फलों को बाजार के अयोग्य बना देते हैं|

रोकथाम- उपचार के लिए नीम का काढ़ा कीटनाशी या रोगोर का प्रयोग करें|

फल तुडाई और पैदावार 
चेरी के पेड़ लगाने के पांचवें साल बाद फल देना आरम्भ कर देते हैं और दस साल तक अच्छी तरह फलने लगते हैं| इसके पेड़ काफी दीर्द्यजीवी होते है और अच्छी देखभाल से 50 साल तक फल देते रहते हैं| फल मई के मध्य में पकना आरम्भ हो जाते हैं, इसमें कभी-कभी फल फटने की समस्या गम्भीर हो जाती है| परन्तु बिंग और ब्लैक हार्ट किस्मों के फल अधिक नहीं फटते| चेरी में फल विरलन करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उपज प्रायः कम होती है|

एक पेड़ से लगभग 15 से 25 किलोग्राम फल पैदा होते हैं| फल पकने के पहले तोड़ना ठीक रहता है, क्योंकि पूरा पकने पर वे जल्द खराब होने लगते है| फलों को छोटी छोटी टोकरियों या लकड़ी के बक्सों में पैक किया जाता है| मीठी चेरी ताजी ही खायी जाती है| खट्टी को शाक के रुप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है| इसका मुरब्बा भी अच्छा बनता है, डिब्बाबन्दी के लिए भी इसका इस्तेमाल होता हैं|
#एक_पहल
#आजाद_मन 
अनील शाह 
#जन_सेवा_समाज_सेवा
#किसान_की_जीत_देश_का_हीत

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श्रीचक्र साधना

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                                                                     #श्रीचक्र

षोडशी विधा मे श्री चक्र का प्रयोग साधना मे किया जाता है । इस चक्र का उद्भव  तो प्रकृति करती है, किन्तु इसके ज्ञान का उद्भव शिवलिंग (मातृशक्ति) के पूजको के समुदाय मे हुआ था । aऔर इसे भैरवीचक्र,शक्तिचक्र,आधाचक्र,सृष्टिचक्र, आदि कहा जाता है ।s श्रीचक्र इसका वैदिक संस्करण है। लोग ताँबे आदि के पत्र पर इसे खुदवाकर  पूजाघरों  मे स्थापित कर लेते है। और धूप दीप दिखाकर पूजा करके समझते है , कि उन्होंने श्रीचक्र  की स्थापना कर ली है परन्तु यह बहुत भारी भ्रम है।h श्रीचक्र की घर मे स्थापना का वास्तविक अर्थ -- घर को इस स्वरूप मे व्यवस्थित करना ।o यह चक्र भूमि चयन से लेकर घर बनाने और उसकी व्यवस्थाओं ( कमरे ,सजावट आदि) को श्रीचक्र के अनुसार व्यवस्थित करने , उसका चिन्तन करने और उसमे देवी स्वरूप की छवि देखने सम्बन्धित है ।
इसका यह भी अर्थ है कि घर की व्यवस्था एवं नियन्त्रण किसी शक्ति (नारी) के हाथ मे हो और समस्त परिवार उससे शक्ति प्राप्त करके उन्नत हो । इस चक्र को घर मे स्थापित करने के बाद नारी का सम्मान करना उसे शक्ति रूपा समझना और उसका अपमान न करना अनिवार्य हो जाता है।k
षोडशी विधा के समस्त स्वरूपों यथा - कुलमार्ग, शाक्त मार्ग,बौद्ध मार्ग ,कापरूपमार्ग, राधाकृष्ण मार्ग, पुष्टिमार्ग, मधु मार्ग,साधना मार्ग ,आदि घर मे श्रीचक्र की स्थापना का अर्थ है अपने गृह मे एक कालक्रम मे इन साधनाओं  मे से अपने द्वारा चयनित साधनाओं का गुरू निर्देश मे आयोजन करवाना। इसके वैदिक संस्करण भी अनेक मार्गों मे व्याप्त है । k
जैसे कुमारी पूजा विधान भी इस प्रकार का संस्कारित विधान है। शाक्तमार्ग मे यह केवल पशुभाव  के साधक के लिए अनुमेय है। वीर साधक एवं दिव्यभाव  के साधकों के लिए कुमारी पूजा की वर्जना है। कुछ रूढ़गत संस्कारों से युक्त लोग यह सोच सकते है कि यह अनाचार है । परन्तु विचार किजिये  कि जिन पाप पुण्य के संस्कारों मे बँधे आप जी रहै है, वह सुख दो रहा है , या आप उससे आध्यात्मिक या भौतिक लाभ पा रहे , क्या जिन सामाजिक, धार्मिक रूप नैतिक संस्कारों के आदर्शों पर आज के परिवार, समाज, राष्ट्र, संस्कृति या विभिन्न धर्मों के नियम का जाल आप पर लदा हुआ है।u
वह आपके लिए सुखमय ,संतोषप्रद है क्या नारी पुरूष के रिश्ते को समाज ने जिस धर्म के नियमो से बाँध कर सबको भयभीत कर रखा है, उसके आदर्शों को कभी भी कहीं भी प्राप्त नही किया जा सका। इसकी विकृतियों से त्राहिमाम् करते हुए नारी और पुरूष आधुनिक विश्व के लिए समस्या बने हुए है।m 
नैतिकता, भावुकता, मर्यादा, कानुन का पाठ पढाये जा रहे है, किन्तु नतीजा क्या स्मरण रखे !आपने स्वयं ही प्रकृति विरूद्ध नियमों को बनाकर स्वयं को जकड लिया है और यह सोचते है कि देवी शक्तियाँ नियमों के पालन से प्रसन्न हो जायेगी ओर परलोक मे स्वर्ग मिलेगा वरना दुःख भोगना पडेगा।m
शाक्तसाधकों की दृष्टि मे यही पशुभाव है, क्यो

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लघु दुर्गा सप्तशती

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{{{ॐ}}}   

                                                      #लघु_दुर्गा_सप्तशती

ॐ वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता,
स्वानंदेमंदरुपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् ।
हंसः सोहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते ।। १ ।।

ॐ ह्रीं-कारं चोच्चरंती ममहरतु भयं चर्ममुंडे प्रचंडे,
खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररुपे स्वरुपे ।
हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुवि तथा व्यापिनी व्योमरुपे,
हंहंहं-कारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्रि ।। २ ।।

ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरुपे नमस्ते,
घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे ।
निर्मांसे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेत्रे त्रिनेत्रे,
हस्ताब्जे शूलमुंडे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते ।। ३ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले,
मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारि गुह्ये ।
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने,
ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते ।। ४ ।।

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरुपेण चक्रे,
त्रिःशक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे ।
ह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे
स्वच्छंदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते ।। ५ ।।

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंडे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे,
ह्रीं क्रीं द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने ।
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुंडे,
सर्वांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदंडे नमस्ते ।। ६ ।।

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगडे गुह्ययोन्याहिमुंडे,
वज्रांगे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातंगरुढे ।
सूतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले,
कुंडल्याकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंद्रि मातर्नमस्ते ।। ७ ।।

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते,
सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढः सर्वभक्षी प्रचंडी ।
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे,
देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते ।। ८ ।।

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरुपे,
त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेंद्री ।
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे,
पाताले शैलभृंगे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते ।। ९ ।।

हंसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नांतकार्ये,
गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ।
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले,
ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते ।। १० ।।

इसमें दस श्लोक लघु दुर्गा सप्तशती में परमेश्वरी के वीरभद्रा व्यापिनी महेशी अन्नता गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं भद्रकाली सिद्धचंण्डी गणेशी रुपों का वर्णन और प्रणति निवेदन किया गयाa कांता  गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं यह चार रूप अत्यंत उग्र हैं। इनका रहस्य स्वरूप ज्ञान वाममार्ग में होता है ज्ञानमार्ग में व्यापिनी की परिधि में इन रूपों का विराट दर्शन होता हैs सप्तशती में भी यह रूप पर कथा विस्तार में वे अन्तर्हित से हो गए हैं यहां कथा नहीं है वस्तुत यह स्वरूप की दुर्गति का कारण बनते हैं और परमेश्वरी के शरणागत होने पर यह दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की कृपाकटाक्ष हो जाते हैं।
जब वह निग्रहकारिणी होती हैं तो यह स्वरूप व्यक्ति को मोह ग्रस्त करके अज्ञान के तामिस्र लोकों में धकेल देते हैं मोहग्रस्त व्यक्ति त्रिपुरा को भूलकर इनमें भूल जाता है जैसे बालक क्रीडा से मुक्त होकर मां को भूल जाता है पर क्रीडनक के टूटने पर अथवा परमा की अकाण्ड करुणा से जब उसको मातृस्मरण हो जाता है hऔर वह आर्तभाव से उसे पुकारता है तो वहीं निग्रहकारिणी करूणार्द्र होकर अनुग्रहकारिणी के रूप में आती है।
उसके बंधन पास भी बनते है तो ग्रन्थि भी मोह के पेशल संबंध भी बांधते हैं तो मद के घर्षक दोषरज्जु भी व्यक्ति को लपेटती लथेडती है वह यह चाहती है oकि यह कल्मष उसे छू भी ना सके वह इतना शुभ्र हो जाए कि यह उसे कुलुषित कर ही न सके उसकी कृपा का आनंद लेने के लिए साधक के संपूर्ण में उसका श्रद्धारूप चमकने लगे लधुसप्तशती ने ज्ञान की तटस्थ वृत्ति भक्ति की अरुणिमा से रंजित होकर प्रकट हुई है
 परमा को उसके चरित्रों के माध्यम से नहीं शुद्ध मूल रूप में भजा गया है इसके गान की अवस्था में ज्ञान के निर्बंन्ध "में भाषा और भाषा का व्याकरण गौण हो गया है सप्तशती का जो फल है वहीं इसका है पर इसमें बीजों की प्रधानता है इसलिए जिस साधक में इतनी योग्यता आ गई हो उसके लिए यह भी उतनी ही फलप्रद है और जो भी इतना योग्य नहीं हुआ है उसे इसके अधिक पाठ करने पर वह योग्यता प्राप्त होती है।
इसकी फलश्रुति नहीं दी गई है नहीं कोई विस्तृत वर्णन विधि समझाने की बात है यह है कि इसमें जिन दस रूपों की स्तुति की गई है उन रूपों में जो गुण प्रभाव निहित हैंk वहीं इस पाठ के फल स्वरुप प्राप्त होता है इन सबका संघनित रूप दुर्गा है अतः इसकी अधिष्ठातृ दुर्गा चंण्डी होगी।sabhar sakti upasak Facebook wall

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