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मंगलवार, 3 अगस्त 2021

16 सिद्धियाँ विवरण

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1. वाक् सिद्धि : - 👇

जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं.

 2. दिव्य दृष्टि सिद्धि:-👇

 दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं.

3. प्रज्ञा सिद्धि : -👇

प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें.

 4. दूरश्रवण सिद्धि :-👇

 इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता.

 5. जलगमन सिद्धि:-👇

 यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो.

 6. वायुगमन  सिद्धि :-👇

इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं.

 7. अदृश्यकरण सिद्धि:-👇

 अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं.

 8. विषोका सिद्धि :-👇

 इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं.

 9. देवक्रियानुदर्शन सिद्धि :-👇

 इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं.

10. कायाकल्प सिद्धि:-👇

 कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं.

11. सम्मोहन सिद्धि :-👇

 सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं.

 12. गुरुत्व सिद्धि:-👇

 गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं.

 13. पूर्ण पुरुषत्व सिद्धि:-👇

 इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की.

 14. सर्वगुण संपन्न सिद्धि:-👇

  जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं.

 15. इच्छा मृत्यु सिद्धि :-👇

 इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं.

16. अनुर्मि सिद्धि:-👇

 अनुर्मि का अर्थ हैं. जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो.sabhar dev sharma Facebook wall
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सोमवार, 2 अगस्त 2021

विज्ञानमय कोष की साधना

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{{{ॐ}}}

                                              #

अन्नादि कोष को पार करके जब साधक विज्ञानमय कोष मे पहुँचता है । 
तब जीव आत्मा एवं ब्रह्म का भेद समझ जाता है ।a गीता मे श्री कृष्ण ने कहा कि जीव जब सोते है तब योगी जागता है जब जीव जागते है तब योगी सोता है अर्थात योगी की भूमिका जगत क्रिया एवं मोहादि से परे है। वरूण ने भृगु को उद्दालक को श्वेतकेतु ने ब्रह्मा ने इन्द्र को अंगिरा ने विस्वान को तप( कर्म= क्रिया) करने को कहा है ।
इच्छा कि परिणति क्रिया क्रिया की परिणति ज्ञान होता है अतः तप करने से ही ज्ञान कि प्राप्ति होती है।
 आत्मसाक्षात्कार के लिए चार सुलभ साधना सें

१, #सोहं_साधना      २, #आत्ममानुभूति  ३, #स्वर_साधना 

४, #ग्रंन्थिभेद
                                                  १, #सोहंसाधना

सोहं साधना मे तीनो महाकारण शरीर एक हो जाते है:--
प्रात काल पूर्व कि ओर मुह करके, मेरूदण्ड को सीधा रखकर दोनों हाथों को समेट कर अपनी गोद मे रखे एवं नेत्र बन्द करे। अब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे तब सुक्ष्म कर्णेन्द्रिय सजग करके ध्यान पूर्वक अवलोकन करे कि वायु के साथ साथ "सो" की सुक्ष्म ध्वनि हो रही है ।s सांस जब रूके तक "अ" तथा वायु निकलते वक्त "हं" कि ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करे।
इसके साथ ही  ह्रदय स्थित सुर्यचक्र ये प्रकाश बिन्दु मे आत्मा के तेजामय स्फुलिंग की भावना करे ।
जब सांस भीतर hजायें तब "सो" की ध्वनि कि अनुभव करे  यह तेज बिन्दू परमात्मा का प्रकाश है सांस रूकने पर"अ" की भावना करे ओर बहार सांस निकलते समय "हं"  कि ध्वनि अर्थात मै हुआ की भावना करे।
"सो" ब्रह्म या प्रतिबिंब है "अ" प्रकृति का और "हं" जीव का प्रतीक है।
इस "सोहं" का प्रत्येक सांस को आवागमन  पर ध्यान करने से जीव मुक्त हो जाता है ।
 
सोहं लोम विलोम साधना-- सोहं का विलोम "हंस" है "हंसः" विशुद्ध परमात्व तत्त्व है।
सांस लेते समय " सोहं" एवं छोड़े समय "हंस" की भावना करने से परमात्मा तत्त्व शीघ्र प्राप्त होता है ।
                                                        #आत्मानुभूति

आसन लगा कर बैठे अंदर की हवा को बाहर निकाले फिर पूरी हवा फेफड़ों मे भरे।३-४ लम्बे सांस लेवें एवं अपने हाथ पांव शरीर को शिथिल करे मन को विचार शुन्य करे भावना करे कि शरीर को अंदर नीला आकाश व्याप्त हो रहा है । 
शरीर शिथिल होने जाने पर ह्रदय स्थल मे अंगुठे ये बराबर ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करेo। मै अजर अमर ईश्वरीय अंश इसी रूप मे शुद्ध आत्मा हुं।उस ज्योति की कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुवे मन मे भावना बनाये रखें । अखिल आकाश मे नीलवर्ण  के आकाश  मे बहुत ऊपर सुर्य को समान ज्योतिस्वरूप आत्मा अवस्थित करें। kअपने निष्पन्द शरीर को देखिये एवं भावना करे कि शरीर के अंग प्रत्यंग के कार्य भाव विचार मेरे मन के आधीन है एवं मन पर विजय मैंने प्राप्त करती है ।
अपने आपको आकाश नें सुर्यमण्डल मे अवस्थितमाने एवं भावना करे कि मै समस्त संसार भूमण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेक रहा हुँ

अशोक वशिष्ठ जी

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रविवार, 1 अगस्त 2021

What is stem cell therapy

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An excerpt of the video created for one of our clients. This 3D medical animation features a dermatological reconstructive procedure in which stem cells are implanted in the extracellular matrix to repair skin defects. This process is called stem cell therapy. For more Info - http://www.scientificanimations.com/p... 11 Comm

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वैज्ञानिकों का दावा है हमारा दिमाग उससे कहीं अधिक ताकतवर है जितना हम सोचते हैं.

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24 CRAZY SCIENCE EXPERIMENTS YOU`VE NEVER SEEN BEFORE

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शनिवार, 31 जुलाई 2021

मनोमय कोष की साधना

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{{{ॐ}}}

                                                # 

मन मे एक गुप्त शक्ति छिपी होती है यदि वह शक्ति मनोविकार,छल,छिद्र, लोभ, मोह, वश अनैतिक कार्य पाप कर्म की ओर प्रवृत्ति होती है तोअधोगति कारक है अत: उसे आध्यात्म की ओर मोडने से ही परमात्मा सी प्राप्ति होती है ।
गीता मे कहा गया है कि मन ही बंधन व मोक्ष का कारक है पतञ्जलि ऋषि ने कहा कि चित्त की वृत्तियों का निरोध  करना एकाग्र करना ही योग है ।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को मन वश मे करने के लिए दो उपाय बताये है:- १:- अभ्यास २:- वैराग्य ।
इनके द्वारा ऐषणा प्रकृति को रोककर ऋतम्भरा बुद्धि को अन्तरात्मा के आधीन किया जा सकता है। जिसे मनोयोग कहते है इसके अनन्तर:--
१, ध्यानयोग २, त्राटक ३, जप ४, तन्मात्रा साधन
                                                              #ध्यानयोग
ध्यान चुम्बक की तरह मन खीचकर एकाग्र करता है ध्यान के लिए आदर्शों को दिव्यरूप धारी देवताओं के रूप मानकर उनमे तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है ।
ऐसा भी हो सकता है। कि एक ही ईष्ट देव को आवश्यकतानुसार विभिन्न गुणो वाला मान लिया जाये।
ईष्टदेव का मन क्षेत्र मे ध्यान करे। ध्यान के पांच अंग है:-
१. स्थिति:-उपासक को यह ज्ञान होना चाहिए कि कौन सी दिशा मे मुँह करके किस स्थान मे किस आसन द्वारा साधना करे।
२.संस्थिति:- ईष्ट की छवि रंग रूप अंग आभूषणों वाहन आदि स्थिति निश्चित करे।
३.विगति:- ईष्ट के गुण ,पराक्रम, आदि या संस्मरण करे।
४. प्रगति:- माता ,पिता, सखा, मित्र, गुरू, दास, किस रूप नें ईष्ट की साधना करनी है ।
५.संस्मिति:-यह व्यवस्था है जिसमे साधक और साध्य, उपासक,और उपास्य एक हो जाते है ।
                                                    #साधना_की_सहायक_विधियाँ 
१. इष्ट की सकाम व विविध उपचारों से पूजा करें।
२. भावना करे देवता को दिव्य तेज मय शरीर माने उस तेज से देह पुष्ट करे
३, भावना करें कि मेरे चारो ओर प्रचण्ड तेज है ओर मै परि पुष्ट हो रहा हूँ
४,ह्रदय के निकट सुर्य चक्र मे सुर्य का प्रकाश फैल रहा है 
५,भावना करे कि गायत्री सी स्वर्णिम किरणों मेरे शरीर मे प्रविष्ट हो रही है ।
                                                               #त्राटक
त्राटक दो तरह के है:-
 १,अन्तर त्राटक २,बाह्य त्राटक

अन्तरत्राटक:---
योगी प्रकाश बिन्दु पर ध्यान कर आंतरिक त्राटक करते है तो मैस्मरेजम वाले आन्तरिक त्राटक लाभ व बाह्य प्रयोग के लिये करते है वे उस उपासना का लाभ नही उठा पाते।
बाह्यत्राटक:-
बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्यसाधनाों के आधार पर मन को वश मे कर चित्तवृत्तियो का एकीकरण करना है
अपनी दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर अत न्याय ता पूर्वक ध्यान करे इससे हमारे नेत्रों मे चुम्बकीय शक्ति बढ जाती है। इसे दृष्टि बंधक भी कहते है । बंधक दृष्टि से किसी को वशीभूत या बेहोश  किया जा सकता है । इस त्राटक से रोग निवारण व अन्त करण का भेद मालुम किया जा सकता है
                                                              #जप
महर्षि भारद्वाज ने गायत्री व्याख्या मे कहा है समस्त यज्ञों मे जपयज्ञ अधिक श्रेष्ठ है यह मन को वश मे करने कि रामबाण है इसके लिए निम्न बातो का ध्यान रखे।
जप प्रातकाल ब्रह्म मुहुर्त्त मे ही करना चाहिए जप के लिए  एकान्त व शुद्ध स्थान होना चाहिए जप समय शुद्ध वस्त्र वआसन का प्रयोग करे।
 प्रात काल पूर्व मुखी सांय काल पश्चिम मुखी हो साधना करे
माला गोमुखी मे ही रखे या कपडे से ढककर करे।
यात्रा या रोगी होने से मानसिक जप करे।
Sabhar Facebook wall sakti upasak agyani
मस्तिष्क ये मध्य मे इष्ट कि स्मरण करे

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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

maha avatar baba ji sangrila ghati in himalaya

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“Babaji was living in a little home in Banaras, when Shankaracharaya visited that city. Shankara at that time was a famous astrologer. Babaji’s manservant went therefore to see him. He received from Shankara the shocking news that, that very night, it was his destiny to die! In fear and trembling, on his return, he approached Babaji with the news.”

“Go back,” said Babaji, ‘and say to him that you will not die tonight.’

“The servant carried this reply back to Swami Shankara, who affirmed. ‘This karma is so fixed that, should you survive it, I shall go to your master and ask him to accept me as his disciple.’

“That night, a terrible thunderstorm lashed the city. Lightening struck everywhere. It felled trees all around the house where Babaji lived. The great master stretched himself out over the servant’s body, to protect him. When morning came, the servant was still alive. He then went and presented himself to Shankara. The Swami was amazed. Realizing that he had encountered a power much greater than his own, he went to Babaji and took initiation into Kriya Yoga.”

Om Kriya Babaji Namaha Aum!

-Conversations with Yogananda

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गूगल एक परिचय

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यह कम्पनी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी॰एच॰डी॰ के दो छात्र लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन द्वारा स्थापित की गयी थी। इन्हें प्रायः "गूगल गाइस"[7][8][9] के नाम से सम्बोधित किया जाता है। सितम्बर 4, 1998 को इसे एक निजि-आयोजित कम्पनी में निगमित किया गया। इसका पहला सार्वजनिक कार्य/सेवा 19 अगस्त 2004 को प्रारम्भ हुआ। इसी दिन लैरी पेज, सर्गेई ब्रिन और एरिक स्ख्मिड्ट ने गूगल में अगले बीस वर्षों (2024) तक एक साथ कार्य करने की रजामंदी की। कम्पनी का शुरूआत से ही "विश्व में ज्ञान को व्यवस्थित तथा सर्वत्र उपलब्ध और लाभप्रद करना" कथित मिशन रहा है। कम्पनी का गैर-कार्यालयीन नारा, जोकि गूगल इन्जीनियर पौल बुखीट ने निकाला था— "डोन्ट बी इवल (बुरा न बनें)"। सन् 2006 से कम्पनी का मुख्यालय माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया में है।

गूगल विश्वभर में फैले अपने डाटा-केन्द्रों से दस लाख से ज़्यादा सर्वर चलाता है और दस अरब से ज़्यादा खोज-अनुरोध तथा चौबीस पेटाबाईट उपभोक्ता-सम्बन्धी जानकारी (डाटा) संसाधित करता है। गूगल की सन्युक्ति के पश्चात् इसका विकास काफ़ी तेज़ी से हुआ है, जिसके कारण कम्पनी की मूलभूत सेवा वेब-सर्च-इंजन के अलावा, गूगल ने कई नये उत्पादों का उत्पादन, अधिग्रहण और भागीदारी की है। कम्पनी ऑनलाइन उत्पादक सौफ़्ट्वेयर, जैसे कि जीमेल ईमेल सेवा और सामाजिक नेटवर्क साधन, ऑर्कुट और हाल ही का, गूगल बज़ प्रदान करती है। गूगल डेस्कटॉप कम्प्युटर के उत्पादक सोफ़्ट्वेयर का भी उत्पादन करती है, जैसे— वेब ब्राउज़र गूगल क्रोम, फोटो व्यवस्थापन और सम्पादन सोफ़्ट्वेयर पिकासा और शीघ्र संदेशन ऍप्लिकेशन गूगल टॉक। विशेषतः गूगल, नेक्सस वन तथा मोटोरोला ऍन्ड्रोइड जैसे फोनों में डाले जाने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम ऍन्ड्रोइड, साथ-ही-साथ गूगल क्रोम ओएस, जो फिलहाल भारी विकास के अन्तर्गत है, पर सीआर-48 के मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में प्रसिद्ध है, के विकास में अग्रणी है। एलेक्सा google.com को इंटरनेट की सबसे ज़्यादा दर्शित वेबसाइट बताती है। इसके अलावा गूगल की अन्य वेबसाइटें (google.co.in, google.co.uk, आदि) शीर्ष की सौ वेबासाइटों में आती हैं। यही स्थिती गूगल की साइट यूट्यूब और ब्लॉगर की है। ब्रैंडज़ी के अनुसार गूगल विश्व का सबसे ताकतवर (नामी) ब्राण्ड है। बाज़ार में गूगल की सेवाओं का प्रमुख होने के कारण, गूगल की आलोचना कई समस्याओं, जिनमें व्यक्तिगतता, कॉपीराइट और सेंसरशिप शामिल हैं, से हुई है। अगर भारत में गूगल के CEO की बात की जाए तो भारत में गूगल के CEO सुंदर पिचाई जी है जिनकी सालाना कमाई लगभग 1300 से 1500 करोड़ रूपये है।sabhar :vikipidia

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अनाज से बनाया जाएगा एथेनाल

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गोरखपुर, उमेश पाठक। गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) में 100 करोड़ रुपये के निवेश से  एथेनाल बनाया जाएगा। इंडिया ग्लाइकाल्स लिमिटेड (आइजीएल) इसके लिए प्लांट स्थापित कर रहा है और अगले कुछ महीनों में उत्पादन शुरू हो जाने की उम्मीद है। इस प्लांट में गेहूं, चावल के साथ स्टार्च वाले अन्य अनाजों से एथेनाल तैयार किया जाएगा, जिससे किसानों को सीधा फायदा होगा।


आइजीएल के इस प्लांट में हर वर्ष तीन करोड़ लीटर एथेनाल तैयार होगा। इतना एथेनाल बनाने में हर वर्ष करीब 90 हजार टन अनाज की जरूरत होगी। आइजीएल पूर्वांचल के किसानों से सीधे भी अनाज का क्रय कर सकता है। इस प्रक्रिया में खराब अनाज, चावल के टूटन का भी उपयोग किया जा सकता है।

प्लांट में अनाज को पीसकर पानी मिलाया जाएगा। उसके बाद फर्मंटेंशन के जरिए एल्कोहल अलग किया जाएगा।

किसानों से गेहूं खरीद के बाद गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं होती। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में गोरखपुर मंडल में करीब 2.75 लाख टन अनाज रखने की जगह है। मंडल में औसतन तीन लाख टन गेहूं जबकि 5.50 लाख टन धान की खरीद की जाती है। हर बार अनाज के भंडारण की समस्या होती है। उद्यमियों की मानें तो इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार की भी मंशा है कि अनाज से एथेनाल बनाया जाए। जिससे किसानों के पास एक और विकल्प होगा 

आइजीएल किसानों से बाजार मूल्य के हिसाब से अनाज खरीदेगा। एथेनाल प्लांट स्थापित होने के बाद व्यापारी एवं क्रय केंद्रों के अलावा किसानों को तीसरा विकल्प भी मिल जाएगा। किसानों का खराब अनाज भी एथेनाल बनाने के लिए प्रयोग किया जाएगा। इसलिए उन्हें खराब अनाज की ङ्क्षचता करने की भी जरूरत नहीं होगी। एक तरह से कृषि के क्षेत्र में इससे बड़ा बदलाव 

style="font-family: "Noto Sans"; margin-left: 0px; margin-right: 0px; overflow-wrap: break-word;">एथेनाल एक प्रकार का एल्कोहल होता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर गाडिय़ों में ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। आइजीएल के प्लांट में तैयार होने वाला एथेनाल पेट्रोलियम कंपनियों को बेचा जाएगा।

अनाज से एथेनाल बनाने के लिए गोरखपुर इकाई में 100 करोड़ रुपये की लागत से प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इसमें हर साल करीब तीन करोड़ लीटर एथेनाल बनेगा और 90 हजार टन अनाज का इस्तेमाल हो सकेगा। प्लांट शुरू होने के बाद किसानों के पास अनाज बेचने के लिए एक और विकल्प मिल सकेगा। इससे बड़ा बदलाव आएगा। - एसके शुक्ला, बिजनेस हेड, आइजीएल।


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गुरुवार, 29 जुलाई 2021

क्या महत्व है मृत संजीवनी मंत्र का

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मृत संजीवनी मंत्र का महत्व ;-

06 FACTS;-

1-हमारे शास्त्रों और पुराणों में गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र का सबसे अधिक महत्व है, इन दोनों मंत्र को बहुत बड़े मंत्रो में से एक माना जाता है क्यूंकि यह दोनों मंत्र से आपको सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिल जाती है।हमारे शास्त्रों में ऐसे कई सारे उल्लेख मिलते है जिनमे यही दो मंत्र सबसे प्रमुख स्थान में आते है क्यूंकि इनसे अधिक शक्तिशाली और कोई मंत्र नहीं है।माना जाता है की कोई सच्चे दिल से निरंतर इस मंत्र का जाप करता है तो कई सारे बड़े-बड़े संकटों से आसानी से मुक्ति पायी जा सकती है।वैसे तो भगवान शिव के कई सारे मंत्र है पर अपनी सभी तरह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र है "महामृत्युंजय मंत्र"।शिवजी के मृत संजीवनी मंत्र में काल को भी रोकने की शक्ति है;जिसका जाप रावण करता था।मृत्युंजय मंत्र  पांच प्रकार के हैं- जो उपरोक्त चित्र में दिए है।पांचवा  संजीवनी मंत्र  का निम्न  महत्व है। 
2-पांचवा  संजीवनी मंत्र (महामृत्युंजय गायत्री ) का महत्व...

 महा मृत्युंजय मंत्र ... गायत्री मंत्र और महा मृत्युंजय मंत्र दोनों से मिलकर बना है।माना जाता है की इसी मंत्र से किसी मृत व्यक्ति को भी दुबारा जीवित किया जा सकता है, यानि कि  इसी मंत्र से कई सारे बड़े-बड़े रोगों और संकटों से मुक्ति मिल जाती है, इसे ही शुक्राचार्य द्वारा आराधित महामृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है।इस मंत्र के जप से असाध्य रोग कैंसर, क्षय, टाइफाइड, हैपेटाइटिस बी, गुर्दे, पक्षाघात, ब्रेन ट्यूमर जैसी बीमारियों को दूर करने में भी मदद मिलती है। इस मंत्र का प्रतिदिन विशेषकर सोमवार को 101 जप करने से सामान्य व्याधियों के साथ ही मानसिक रोग, डिप्रैशन व तनाव आदि दूर किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं मृत्युंजय जप व हवन से शनि की साढ़ेसाती, वैधव्य दोष, नाड़ी दोष, राजदंड, अवसादग्रस्त मानसिक स्थिति, चिंता व चिंता से उपजी व्यथा को कम किया जा सकता है।

3-यह शाश्वत सत्य है कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। किंतु हमें वेद, पुराण तथा अन्य शास्त्रों में मृत्यु के पश्चात पुनः जीवित होने के वृत्तांत मिलते हैं। गणेश का सिर काट कर हाथी का सिर लगा कर शिव ने गणेश को पुनः जीवित कर दिया।
भगवान शंकर ने ही दक्ष प्रजापति का शिरोच्छेदन कर वध कर दिया था और पुनः अज (बकरे) का सिर लगा कर उन्हें जीवन दान दे दिया। सगर राजा के साठ हजार पुत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए राजा भगीरथ सैकड़ों वर्ष तपस्या करके गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए और सागर पुत्रों को जीवन प्राप्त हुआ।ऐसे अनगिनत वृत्तांत शास्त्रों में मिलते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि भगवान शिव, जो महामृत्युंजय भगवन भी कहलाते हैं, रोग, संकट, दारिद्र्य, शत्रु आदि का शमन तो करते ही हैं, जीवन तक प्रदान कर देते हैं। 

4-महर्षि वशिष्ठ, मार्कंडेय और शुक्राचार्य महामृत्युंजय मंत्र के साधक और प्रयोगकर्ता हुए हैं। ऋषि मार्कंडेय ने महामृत्युंजय मंत्र के बल पर अपनी मृत्यु को टाल दिया था, यमराज को खाली हाथ वापस यमलोक जाना पड़ा था। लंकापति रावण भी महामृत्युंजय मंत्र का साधक था। इसी मंत्र के प्रभाव से उसने दस बार अपने नौ सिर काट कर उन्हें अर्पित कर दिए थे।शुक्राचार्य के पास दिव्य महामृत्युंजय मंत्र था जिसके प्रभाव से वह युद्ध में आहत सैनिकों को स्वस्थ कर देते थे और मृतकों को तुरंत पुनर्जीवित कर देते थे।शुक्राचार्य ने रक्तबीज नामक राक्षस को महामृत्युंजय सिद्धि प्रदान कर युद्धभूमि में रक्त की बूंद से संपूर्ण देह की उत्पत्ति कराई थी।महामृत्युंजय मंत्र के प्रभाव से गुरु द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी, जिसके बारे में धारणा है कि वह आज भी जीवित है तथा उसे उसी देह में नर्मदा नदी के किनारे घूमते कई लोगों ने देखा है।माना जाता है की कोई सच्चे मन से निरंतर इस मंत्र का जाप करता है तो कई सारे बड़े-बड़े संकटों से आसानी से मुक्ति पायी जा सकती है।
5-इस मंत्र का नाम मृत संजीवनी मंत्र है,....

“ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ ˜त्र्यंबकंयजामहे ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम

ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात

ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ”.......इस मंत्र का अर्थ है..'' हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं... उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए... जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं।  

 6-मृत संजीवनी मंत्र की पूजा और जप कैसे करना है?-

07 POINTS;-

1-सबसे पहले तो आपको की सुबह भगवान शिव की पूजा-अर्चना करनी है और फिर इस मंत्र का 108 बार जाप करना है।वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्री मृत संजीवनी पूजा का प्रयोग आसमयिक आने वाली मृत्यु को टालने के लिए, लंबी आयु के लिए, स्वास्थ्य के लिए तथा गंभीर कष्टों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है तथा इस पूजा को विधिवत करने वाले अनेक जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त कर पाने में सफल होते हैं। श्री मृत संजीवनी पूजा का आरंभ शुक्ल पक्ष में किसी भी सोमवार या सामान्यतया सोमवार वाले दिन किया जाता है तथा उससे अगले सोमवार को इस पूजा का समापन कर दिया जाता है। इस पूजा को पूरा करने के लिए सामान्यता 7 दिन लगते हैं किन्तु कुछ स्थितियों में यह पूजा 7 से 10 दिन तक भी ले सकती है जिसके चलते सामान्यतया इस पूजा के आरंभ के दिन को बदल दिया जाता है तथा इसके समापन का दिन सामान्यतया सोमवार ही रखा जाता है।
2-किसी भी प्रकार की पूजा को विधिवत करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है उस पूजा के लिए निश्चित किये गए मंत्र का एक निश्चित संख्या में जाप करना तथा यह संख्या अधिकतर पूजाओं के लिए 125,000 मंत्र होती है तथा श्री मृतसंजीवनी पूजा में भी श्री मृतसंजीवनी मंत्र का 125,000 बार जाप करना अनिवार्य होता है। इस संकल्प के पश्चात सभी पंडित अपने यजमान अर्थात जातक के लिए श्री मृत संजीवनी मंत्र का जाप करना शुरू कर देते हैं तथा प्रत्येक पंडित इस मंत्र के जाप को प्रतिदिन लगभग 8 से 10 घंटे तक करता है जिससे वे इस मंत्र की 125,000 संख्या के जाप को संकल्प के दिन निश्चित की गई अवधि में पूर्ण कर सकें।भयंकर बीमारियों के लिए मृत्युंजय मंत्र के सवा लाख जप व उसका दशमांश का हवन करवाना उत्तम रहता है। प्राय: हवन के समय अग्निवास, ब्रह्मचर्य पालन, सात्विक भोजन व विचार, शिव पर पूर्ण श्रद्धा व भक्तिभाव पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। जप के बाद बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ व इस दौरान घी का दीपक प्रज्ज्वलित रखना चाहिए। जप के साथ हवन व तर्पण और मार्जन के साथ ही साथ हवन की समाप्ति में ब्राह्मणों को भोजन करवा कर दान देना उत्तम माना गया है।जप व हवन का कार्य चैत्र मास में किसी पवित्र तीर्थ स्थल, शिवालय, नदी, सरोवर, पर्वतादि के पास शिवलिंग बनाकर करना चाहिए। महामृत्युमञ्जय मंत्र/ "मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र" की भक्ति में अविश्वास की कोई जगह नहीं होती।  
 3-यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि श्री मृत संजीवनी पूजा जातक की अनुपस्थिति में भी की जा सकती है तथा जातक के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की स्थिति में इस पूजा में जातक की तस्वीर अर्थात फोटो का प्रयोग किया जाता है जिसके साथ साथ जातक के नाम, उसके पिता के नाम तथा उसके गोत्र आदि का प्रयोग करके जातक के लिए इस पूजा का संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में यह कहा जाता है कि जातक किसी कारणवश इस पूजा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने में सक्षम नहीं है जिसके चलते पूजा करने वाले पंडितों में से ही एक पंडित जातक के लिए जातक के द्वारा की जाने वाली सभी प्रक्रियाओं पूरा करने का संकल्प लेता है तथा उसके पश्चात पूजा के समाप्त होने तक वह पंडित ही जातक की ओर से की जाने वाली सारी क्रियाएं करता है जिसका पूरा फल संकल्प के माध्यम से जातक को प्रदान किया जाता है। 
4-महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं।वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है।यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिद्धिया, नवनिधिया मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।वैसे तो भगवान शिव के कई सारे मंत्र है पर अपनी सभी तरह की इच्छाओं को पूरी करने के लिए सबसे शक्तिशाली मंत्र है "महामृत्युंजय मंत्र"  ।महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय स्थित एक मंत्र है, यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है ।इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' माना जाता है। यह मंत्र सर्वाधिक फल देने वाला माना गया है।
5-संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें
(1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को  काम ,मांस तथा शराबअन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।
6-क्यों नहीं करना चाहिए... महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप?-
 आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता, परिणामत: आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। 

7-कितनी बार महामृत्युञ्जय मंत्र बोलने पर क्या हो जाता है?-

शिव पुराण के मुताबिक महामृत्युञ्जय मंत्र के एक लाख जप करने पर शरीर हर तरह से पवित्र हो जाता है। यानी सारे दर्द, रोग या कलह दूर हो जाते हैं। दो लाख मंत्र जप पूरे होने पर पूर्वजन्म की बातें याद आ जाती हैं। तीन लाख मंत्र जप पूरे होने पर सभी मनचाही सुख-सुविधा और वस्तुएं मिल जाती है। चार लाख मंत्र जप पूरे होने पर भगवान शिव सपनों में दर्शन देते हैं। पांच लाख महामृत्युञ्जय मंत्र पूरे होते ही भगवान शिव तुरंत ही भक्त के सामने प्रकट हो जाते हैं। 

 मृत संजीवनी मंत्र साधना का विज्ञान;-

इस साधना से मूलाधार, मणिपुर, अनाहत और आज्ञा चक्रों की सक्रियता बढ़ती है। कुंडलिनी का जागरण होता है तथा पंचतत्वों के साथ शिवतत्व का जागरण होता है। इसकी सफलता के लिये जरूरी है कि साधक का सूक्ष्म शरीर सकारात्मक ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ सीधे जुड़ जाये और वहां से दिव्य संजीवनी शक्ति को ग्रहण करके अपने भीतर धारण करे ।इसके लिये साधक अपनी साधना शक्तियों का उपयोग करे ।सुबह 7 बजे से 10 मिनट पहले साधना हेतु बैठें। साधना से पहले नमक के पानी से स्नान कर लें।आपकी सारी नकारात्मक ऊर्जा का विनाश हो जाएगा और पॉजिटिविटी का संचार होगा। इसके अतिरिक्त साधना के बाद दो घंटे तक स्नान भी नही करना चाहिये। 7 बजे तक 10 मिनट का कोई योग या एक्सरसाइज करें... यह अनिवार्य है। किसी कारण कोई योग या एक्सरसाइज न कर सकें तो 5 मिनट ताली बजायें, और 5 मिनट खड़े होकर दोनों हाथों को ऊपर ऊठाते हुए हर हर महादेव बोलें। योग या एक्सरसाइज के बाद आराम से बैठ जायें। नीचे बैठने में दिक्कत हो तो कुर्सी आदि पर बैठें। मगर जिस पलंग पर सोते हैं उस पर न बैठें। 7 बजे साधना आरम्भ करें। 

साधना के स्टेप;-

05  POINTS;-

1-भगवान शिव को साक्षी बनायें. कहें- हे शिव आप मेरे गुरू हैं मै आपका/ आपकी शिष्य हूं, मुझ शिष्य पर दया करें। आपको साक्षी बनाकर मै  अमृत संजीवनी साधना सम्पन्न कर रहा/रही हूं। इसकी सफलता हेतु मुझे दैवीय सहायता और सुरक्षा प्रदान करें। 

2-भगवान शिव  का फोटो सामने रखें... फोटो को एकटक देखते रहें। उनके माथे के बीच तीसरे नेत्र का प्रतीक हल्का बिंदु दिखेगा। उसी पर अपनी नजरें टिकाये रखें।  

3-दोनों हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनायें। मुद्रा में हाथ की तर्जनी (इंडेक्स फिंगर) को मोड़कर अंगूठे की जड़ में दबा लेना है।  तर्जनी उंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगाकर और मध्यम और अनामिका अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाएं। सबसे छोटी अंगुली को सीधा रखें ऐसे मृत संजीवनी मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में दो मुद्राएं बनती हैं—वायु मुद्रा और अपान मुद्रा। इसलिए इस मुद्रा को अपान वायु मुद्रा भी कहते हैं।  

 4- ऊं ह्रौं जूं सः मंत्र के साथ 10 संजीवनी प्राणायाम करें। इसके लिये ऊं ह्रौं का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे भीतर खींचें  और जूं सः का जप करते हुए सांस को धीरे धीरे बाहर निकालें। सांस को अंदर लेने और बाहर निकालने के बीच कुछ क्षण रुकें। इसी तरह सांस निकालने और दोबारा खींचने के बीच भी कुछ क्षण रुकें। संजीवनी प्राणायाम से उर्जा चक्रों और पंच तत्वों का जागरण होता है। आभामंडल  सकारात्मक उर्जाओं से भर जाता है। जर्जर शरीर भी कायाकल्प की तरफ बढ़ जाते हैं। 

5- संजीवनी प्राणायाम के बाद आंखें बंद कर लें. हाथों में मृत संजीवनी मुद्रा बनाये रखें। रिलैक्स होकर बैठें और  अविचलित रूप से मृत संजीवनी मंत्र जप करते रहें। शिव धनदा मंत्र जीवन में लक्ष्मी सुख व्याप्त करने में सक्षम है..'' ऊं शं शंकराय धनम् देहि देहि ऊं ''का जप भी कर  सकते हैं।संजीवनी प्राणायाम के बाद इन मंत्र का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।  इससे मान-सम्मान प्रतिष्ठा और व्यक्तित्व का आकर्षण भी बढ़ता है। मंत्र जप पूरा होने पर आंखें खोल लें। तन,मन,धन के सुखों के लिये भगवान शिव को धन्यवाद दें। धरती मां को  ,दिव्य संजीवनी शक्ति को धन्यवाद दें। फिर ऊं इंद्राय नमः कहकर उठ जायें। जो लोग किसी कारण वश सुबह 7 बजे की साधना नही कर सकते; वे  रुद्राक्ष धारण करके साधना करें। जिससे दिन -रात में किसी भी टाइम साधना की जा सकती है।उसमें समय का बंधन नही। 

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विद्युत Electricity

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विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है।अर्थात् इसे न तो देखा जा सकता है व न ही छुआ जा सकता है केवल इसके प्रभाव के माध्यम से महसुस किया जा सकता है| विद्युत से जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है?


वायुमण्डलीय विद्युत
विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है।[1] विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉन हल्के होने के कारण ही आसानी से स्थानांतरित हो पाते हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति की दर विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि।

जब विद्युत और चुम्बकत्व का एक साथ अध्ययन किया जाता है तो इसे विद्युत चुम्बकत्व कहते हैं। मात्र जिसके अनुप्रयोगों पर दुनिया की इकोनामी टिकी हुई है।विद्युत को अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है किन्तु सरल शब्दों में कहा जाये तो विद्युत आवेश की उपस्थिति तथा बहाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न उस सामान्य अवस्था को विद्युत कहते हैं जिसमें अनेकों कार्यों को सम्पन्न करने की क्षमता होती है। विद्युत चल अथवा अचल इलेक्ट्रान या प्रोटान से सम्बद्ध एक भौतिक घटना है। किसी चालक में विद्युत आवेशों के बहाव से उत्पन्न उर्जा को विद्युत कहते हैं।

विद्युत-आवेश के प्रवाह अर्थात विद्युत-आवेशित कणों के किसी निश्चित दिशा मे गति करने को 'विद्युत-धारा' कहते हैं vikipidia

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