बुधवार, 4 अगस्त 2021
मंगलवार, 3 अगस्त 2021
मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक
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अगस्त 03, 2021 in मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक
मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक
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मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3.
अधो गति। व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है।
सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में
अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।
आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में
वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है
तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम
शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में
स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है।
उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।
पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग- 1. पहली विज्ञान आत्मा, 2. दूसरी महान
आत्मा और 3. तीसरी भूत आत्मा।
1. विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न
करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील
दूर है।
2. महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28
अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद
चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह
आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।
3. भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड
में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल
होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के
अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।
वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित
कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म
भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है। और जिन्होंने
वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त
होती है।
अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे
आदि योनि में पहुंच जाता है। स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच
जाता है लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक
पहुंच जाता है।
जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर
सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन
यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले
लेता है।
लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और
देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यही मोक्ष है।
-संदर्भ वेद-पुराण।
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sabhar dev sharma Facebook wallमेरी सेक्स के पार की यात्रा- मार्ग की अनुभूतियां
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अगस्त 03, 2021 in ओशो
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जीवन में जो भी हम आज पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है। पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में उसकी तादम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है। मनुष्य के मन के सात प्रकार है, वहीं से उसे अपनी यात्रा शुरू करनी होती है परंतु ये कार्य तो केवल गुरु ही देख सकता है। सेक्स, कृपणता, क्रोध, धूर्तता, मूढ़ता.... परंतु इस समय पूरी पृथ्वी मानसिक रूप से मनुष्य के मन पर सेक्स एक रोग बन गया है। सेक्स जो शरीर की जरूरत है, वो हमारे सभ्य होने के साथ-साथ मन पर आ गया। जो बहुत खतरनाक है। सबसे पहले तो साधक को ये समझ लेना चाहिए की सेक्स शरीर पर कैसे आये जैसे भोजन अगर हम मन से करे तो हम अस्वास्थ हो जायेगे। बाकी पृथ्वी का कोई प्राणी प्रकृति से जुड़ा है केवल मनुष्य टूट गया है। तब हम उसके पास हो सकते है, कृपणता तो पहला द्वार है कृपण आदमी न तो प्रेम कर सकता है, वह तो केवल धन का गुलाम होता है, वह कमाता तो है परंतु उसका उपयोग भी नहीं कर पता। सद्उपयोग की बात तो छोडिये, इसलिए सभी धर्मों ने दान का बहुत महत्व दिया है, दान पहला द्वार खोने के लिए अति जरूर है।
परंतु जब साधक ध्यान साधना शुरू करता है तो वही द्वारा जो खुला है उर्जा वहीं से रिसना शुरू कर देती है, क्रोधी अधिक क्रोधी, सेक्सी अधिक सेक्सी, कंजूस अधिक कंजूस, चालाक-कपटी अधिक लंपट होना शुरू हो जाता है। क्यों ऐसा होता है, क्योंकि आपके उसी द्वार से जीवन की अधिकतम उर्जा बहती है। तब हम घबरा जाते है, क्रोध और सेक्स सकारात्मक है, ज्यादा तर साधक जो इस द्वारा पर जो खड़े होते है वही ध्यान में उतर सकते है, कंजूस, मूढ़़, चालाक....का ध्यान में गहरे उतरना अति कठिन है। जीवन एक उर्जा है सेक्स-क्रोध एक कुदरत की देन है। एक से हम प्रकृति की उत्पति करते है दूसरे से जीवन की रक्षा।
ओशो से जुड़े हजारों संन्यासियों को मैं देखता हूं केवल-केवल तंत्र की बात करते है। जबकि तंत्र जितना सरल है उतना कठिन भी है। आपको यह जान कर अति दूःख होगा की ओशो जैसे महान गुरु को जो सब आयामों अति पूर्ण है, तंत्र के काम में हार गए। पूर्ण आजादी के बद भी ओशो को पूरी उम्र में एक भी जोड़ा नहीं मिल सका जिस पर वह तंत्र के प्रयोग कर सकते। एक दो जोड़े उन्होंने चुने थे उनमें एक स्वामी योग चिन्मय जी थे। परंतु सब बेकार रहा एक दिन स्वामी और उनकी महिला मित्र ने अचानक सारे सर के बाल मुंडाकर और आश्रम मैं घोषणा कर दि की आज से हम प्रेमी प्रेमिका न रह कर एक भाई बहन की तरह रहेंगे। किसी को कुछ समझ नहीं आया।
जब मैंने ध्यान शुरू किया तो मैं पूरी ताकत झोंक दी थी। पीछे कुछ भी बचा कर नहीं रखना चाहता था उसमें डूब जाता था। ध्यान के कई प्रयोगों में से एक प्रयोग हम ‘’नाद ब्रह्मा’’ ध्यान का करते थे। ये ध्यान ओशो ने खास जोड़े के लिए बनाया था। आप चाहे तो इसे एकल में या युगल में भी कर सकते है। युगल में यह साधारण सा दिखने वाला ध्यान तंत्र प्रयोग है। मैं और मोहनी रात को इस ध्यान प्रयोग को करने लगें। रात कि शांति, एकांत और उसके साथ अंधकार। क्योंकि इस ध्यान प्रयोग के बाद आपको नींद जरूर आती है। इसलिए इसे रात को करो तो बेहतर होगा। हम दोनों पति-पत्नी निर्वस्त्र हो कर एक महीन चद्दर को ओढ़ कर ये ध्यान प्रयोग करते। कुछ ही दिनों में ये ध्यान अपना चमत्कार दिखाने लगा। वैसे भी हम पति-पत्नी प्रेम विवाह करने पर भी हमारे जीवन में सेक्स कोई महत्व नहीं रखता था। पर इतने पास घंटों निर्वस्त्र रहने के बाद भी हमारे पर सेक्स तो चढ़ता परंतु मदहोश मात्र करता बेहोश उत्तेजित नहीं करता था। हमें अच्छा भी बहुत लगाता लगता हम दोनों सहयोगी कहीं चल रहे हे। मील के पत्थर हमें बता रहे थे की हमारा सफर जारी है। परंतु कुछ जीवन में लगातार कुछ गहराता चला जा रहा था। एक नया आयाम, इस ध्यान में जब दो साधक अपने को एक दूसरे में विलय करता है, तो एक उर्जा का विलय होता है। शरीर पर ही नहीं मन और भाव की उर्जा एक दूसरे में विलय हो रही थी। एक अनूठा प्रेम हमारे जीवन में उतर रहा था। जिसकी हमें कोई अनुभूति नहीं थी। एक अनजाना सा रहस्य का द्वारा हमारे बीच खुल रहा था। हमारा प्रेम तो अति शुद्ध तो पहले से ही था। परंतु इस प्रेम को हमने पहले कभी नहीं जाना था। आप इस बात को गांठ बाँध लो की अधिक सेक्स या अधिक क्रोध करने से कभी मुक्त नहीं हो सकते। मोहनी की उर्जा से मेरी में उर्जा के साथ-साथ सेक्स का तूफान भी अधिक था। मोहनी और हमारा विवाह एक कुदरत का खेल है, न उसे प्रेम कहेंगे न संबंध। बस कुदरत ने हमें मिला दिया। और हम एक हो गए तब शायद हम नहीं जानते थे की हम क्यों मिले। परंतु ध्यान के बाद पता चला की हम क्यों एक दूसरे से मिले। भौतिक सुख और शारीरिक सुख की हम कल्पना जीवन में करते है। परमात्मा में हम उसके पार ला कर खड़ा कर दिया। हम एक दूसरे के लिए पूर्ण थे। जबकि मन की माने तो हम बिलकुल भिन्न थे। एक दूसरे की रूचि...आदि में कोई तालमेल नहीं था। मोहनी मुझे बताती है कि मेरी आंखों से सेक्स की उर्जा ऐसे बहती थी जैसे जलती
चिंगारियां। चटाक-चटाक, शायद वह ठीक ही कहती हो। मेरे अंदर सेक्स का तूफान बहुत तेज था। पर मैं अपने पर कंट्रोल बहुत करता था। एक दम चरित्र का पक्का। या मुझे होश था एक अनजाने तोर पर। मुझे अपने पर बहुत भरोसा था। और आज तो मैं उस पहाड़ी पर चढ़ के उतंग आसमान में उड़ सकता हूं। मैंने सेक्स के पार के पंख देख लिये हे। जान गया हूं उस उड़ान को।
धीरे-धीरे काफी लोग ध्यान करने आने लगे। ध्यान का एक माहौल एक उर्जा संग में बहुत सरलता से सजग हो उठती है। परंतु शर्त एक ही है बीच में कोई विराम न करे। ये सब चलता रहा। आप जैसे-जैसे अपने अंदर जाते है, तब बहार की उर्जा आपसे बह नहीं रही होती है, तब अचानक बहार की उर्जा आप में प्रवेश करने लग जाती है। जैसे साधक के जीवन में अचानक अंजान औरतें या पुरूष एक खिंचाव महसूस कर रहे होते है। जो द्वारा आप के लिए भाग्यशाली हो सकता है वही आपको डूबो भी सकता है। जैसे सेक्स हो या कृपणता।
फिर इसके बाद गहराई मिली जब हम पति-पत्नी ने पूना से सन्यास लिया। संन्यास के बाद साधना की गति और आयाम दोनों ही बदल गए। हालांकि देखो तो कुछ भी नहीं बदला था। तब भी गुरु के प्रति प्रेम था, समर्पण था, परंतु शायद अकेले थे, गुरु के हाथ में हमने हाथ नहीं दिया होता। ध्यान के बाद सब लोग तो चले गये परंतु वो दूर से आये थे इस लिए शायद रूक गए। वैसे वो स्वामी जी तो कई-कई दिन रूक कर यहां कार्य ध्यान करते थे।
एक मित्र जो पहले से ही हमारे यहां ध्यान करने आते थे। एक दिन जो की काफी दिनों बाद आये वह अपनी पत्नी को साथ ले कर आये। पत्नी को ध्यान का आ बा सा का पता नहीं था। हां धार्मिक थी। सरल थी। उसने भी उस दिन हम सब के साथ ध्यान किया परंतु घर जाने के बाद अपने पति को मना कर दिया की मैं उस घर अब कभी नहीं जाऊंगी। उसके पति को समझ नहीं आया की क्या हो गया। शायद अचानक ध्यान की गहराई पाकर वह भयभीत हो उठी हो। अकसर साधक को पहले ध्यान में बहुत विस्मयकारी अनुभूति होती है तो वह डर जाता है। कि ये क्या हो गया....वो लोग कुछ दिन हमारे यहां नहीं आये। करीब एक दो महीने। तब शायद ओशो जन्म दिन का उत्सव था। उन दिनों हम ओशो के चार उत्सव बड़ी धूम-धाम से ध्यान करते हुए मनाते थे। उस दिन काफी मित्र इकट्ठे हो जाते, उस दिन सार दिन ध्यान..भोजन सब वहीं होता था। रात वाईट रोब तक सब साथ ध्यान करते थे। जैसे आप आश्रम में जाते हो या घर पर ध्यान करते हो उस में यही तो भेद है की उस दिन आप एक उर्जा का स्तंभ बन जाता है। आप एक ऊंचे आसमान पर चले जाते हो।
मेरा उन दिनों एकांत वास चल रहा मैं पिरामिंड में अकेला सोता था हालांकि वह अभी बना नहीं था। परंतु एक ढांचे का आकार उसने ले लिया था। न उसमें टाइल ही लगी थी और न ही फर्श ही हुआ था, नीचे एक पतली सी चटाई बिछा कर। अति साधारण तरह से बस एक पंखा लगा लिया था ताकि गर्मी न लगे। परंतु अपूर्ण बने पिरामिंड की उर्जा भी चमत्कारी ढंग से कार्य कर रही थी। ध्यान के बाद उन दिनों मुझ पर बांसुरी बजाने और सीखने का भूत सवार था। रात जब तक नींद न आ जाये, बंसरी बजाने की कोशिश करता रहता था। लेकिन उसमें एक आनंद था। संगीत कितना कम क्यों न आये व कम नहीं होती, और कितना ही अधिक आपको आ जाये वह अधिक नहीं होता। परमात्मा से थोड़े कम सूक्ष्म केवल सुर ही है। इसीलिए संगीत परमात्मा के अधिक से अधिक नजदीक है। मोहनी नीचे बच्चों के साथ सोती थी। पिरामिंड से जुड़े एक कमरे में उन पति-पत्नी के सोने का इंतजाम कर दिया था।
उस रात भी ऐसा ही हुआ। कब बांसुरी मेरे हाथ से छुट गई और मैं सो गया। मैं रात चार घंटे की नींद ही लेता था। चार बजे उठ जाना होता था। क्योंकि हमारी दूध की दूकान थी जिस के लिए मुझे दूध लेने जाता होता था। अचानक रात को अंधेरे में मुझे लगा की कोई मेरे पास आकर अचानक खड़ा हो गया। वैसे पिरामिंड में अँधेरा बहुत गहरा होता है। परंतु अभी उसके दरवाजा नहीं लगा था इस लिए रोशनी छन-छन कर आ रही थी। मैंने अचरज से पूछा कि कौन हो? उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। कि मैं हूं स्वामी जी। क्या में आपके पास सो सकती हूं। कुछ देर के लिए तो मुझे समझ में नहीं आया की ये सत्य है या मेरी वासना मुझे स्वप्न दिखा रही है। क्योंकि उसकी उम्र की तो मेरी लड़की के बराबर है। अभी तक मैं उसके बारे में कुछ जानता भी नहीं था। मात्र दो बार वह ध्यान के लिए यहां आई है। इतना साहस कोई कैसे कर सकता है कोई। ठीक दरवाजा खोलते ही उनके पति सो रहे है। ऐसा काम तो कोई चरित्र हीन भी नहीं कर सकती। और शायद चरित्र हीन तो कर ही नहीं सकती। क्योंकि उसने तो अपने शुभ्र को दिखलाना है। इस लिए अपने अंधेरे के ऊपर एक श्वेत परत ओढ़े रखना चाहता है। परंतु सच तो यह था की वह अपनी पति से आज्ञा लेकर मेरे पास आई थी।
मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे अंदर एक उथल पुथल शुरू हो गई। खुशी और भय एक साथ मेरे सामने आ जा रहा था। पर मैंने उसे मना नहीं किया और अपनी बगल में बिस्तरे को खाली कर थोडा सरक गया। वह बिस्तरे में अकार मेरे सीने से चिपट कर लेट गई। एक जवान लड़की, और रात का अँधेरा। और वह खुद तुम्हें समर्पण कर रही है। मेरे अंदर वासना का एक झंझावात शुरू हो गया। मेरा पूरा तन मन सेक्स के उत्ताप से जलने लगा। सेक्स की उठती लहरों को में अपनी और आते देख रहा था, महसूस कर रहा था। मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर रख लिए और उसके सर और पीठ को धीरे-धीरे सहलाने लगा। वह और सिकुड़ कर मुझ में समा गई। लहरे धीरे-धीरे तूफान का रूप लेने लगी। मन नाना प्रकार के ताने-बाने बूनने लगा। पर मैं उस सब को उठते हुए देखता रहा। अपने पर काबू भी नहीं कर रहा था। और नहीं उसे मैंने रोका ही चाहा। मेरा पूरा शरीर आग का शोला होता जा रहा था। जैसे किसी अँगीठी में डली लोहे की छड़। मेरा तन ज्वर से जलने लगा। परंतु एक बात जो बचपन से मेरे संग थी बचपन से ही मेरा खेल-कूद लडकियां अधिक था। उन दिनों लड़के लडकियां अलग खेलते थे। परंतु लड़कियां मेरे साथ खेलना पसंद करती है। सच कृष्ण की बाल लीलाए उनकी साधाना का अंग रही होंगी। जिसने उनके मार्ग को अति सरल बना दिया।
मैं उस में बह रहा था पर जब मैं उस ज्वाला को देख भी रहा था। अचानक उसमें एक मधुर शीतलता की पतली परत भी साथ दिखाई दी। इसी पतली सी किरण ने ही मेरे नये और अंजान मार्ग को खोल दिया। एक अजीब सी जलन जो गर्मी के साथ ठंडक भी अपने साथ लिए थी। हां उसमें जलन कहीं ज्यादा थी और शांति का झोंका कुछ क्षण कि लिए तब आती जब में उसे केवल अपने उपर होते देखता रहा होता। जैसे-जैसे वह तूफान मेरे उपर आता गया, साथ ही साथ मैं उसे आपने उपर आते किसी अंजान से भार महसूस कर रहा था। जब आपका होश बढ़ता है तो उसके कारण आपकी शरीर से आपकी दूरी बनानी शुरू हो जाती है। मैंने कर किनारे खड़ा होकर उसे देखता रहा। वह उत्ताप लगातार बढ़ रहा था। वह उर्जा अब मेरे सेक्स केंद्र पर न ठहर कर पूरे शरीर पर फैलती जा रह है। मानों मेरा पूरा शरीर ही सेक्स केंद्र हो गया हो। मेरा पूरा शरीर ही जननेंद्री बनता जा था। ये एक अजीब सा अनुभव है जिसे हम जीवन में कभी नहीं देख सकते क्योंकि उस किनारे तक हम कभी जाते ही नहीं। हम उस स्थिति में कभी नहीं आने देते है, जब हमारे उपर सेक्स चढ़ता है, तो उसे धूल की भांति एक बोझ समझ कर जल्दी से जल्दी गिरा देना चाहते है। परंतु अगर इसके पार जाना है। तो इस अपने शरीर पर चढ़ने एक घंटा दो घंटा अपने सहयोगी....को प्रेम से छुओ, उसे महसूस करो। एक दूसरे में बहो....जितना अधिक ...लम्बे समय तक आप इस प्रयोग में रहेंगे। उतनी ही उर्जा आपके काम केंद्र पर एकत्रित होती रहेगी। जैसे एक गुब्बारे में हवा भरी जा रही हे। फिर आप अगर हो सके तो बिना सेक्स किये प्रेम से एक दूसरे का सान्निध्य प्राप्त कर के सो जाये। आप जानते है जो उर्जा आपने जगा दि अब कहां जायेगी। वह उपर के केंद्रों पर। यह केवल पुरूष या स्त्री साधक दोनों के लिए ही समान है। सेक्स न उठना महान्ता नहीं है। आपने किसी हिजड़े को कभी बुद्ध होते देखा है वहां काम उर्जा है ही नहीं। वह अमृत भी है जहर भी है। यहीं उस दिन मेरे साथ हुआ।
शायद प्रकृति का कोई नियोजित कार्य क्रम था। जो मेरा सहयोग कर रही था। उस स्थिति को बनाने में मेरा अपना कोई हाथ या मन नहीं था। और न ही मैं इस के लिए तैयार ही था। पर थी कोई शक्ति जो मुझे सहयोग दे रही थी। काम केंद्र पूरे तनाव पर था। पर न जाने कौन सी शक्ति थी जो मुझे बहाए लिए जा रहा था मुझे संप्रेषित कर रहा था कि इस में मत डुबो इसे केवल देखो । ये विचार मेरे मन में कही और से आ रहा था। ये मुझे साफ दिखाई रहा था। ये मेरी कामना नहीं थी। मुझे कोई शक्ति मार्ग दिखा कर रही थी। मैं एक सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। लगता था। अभी जला की तभी जला। मेरे पूरे जीवन में ऐसा उत्ताप्त कभी नहीं देखा था। वो एक सैलाब था।
मेरी मां मेरे बारे में बड़े गर्व से एक बात कहां करती थी। कि मेरे बेटे को तुम बो भी दोगे तो उगेगा नहीं। अब वो अपने कौन से अनुभव के आधार पर कहती थी। इस के बारे में मुझे उस रात पता चला। उसने जरूर मुझमें मेरे दूसरे भाई बहन से कुछ तो अलग देखा या जाना होगा। शायद एक मां अपने प्रत्येक बच्चे के चरित्र और उसकी गहराई को जरूर जानती है। और ठीक वही हुआ। मेरी तेज साँसे धीरे-धीरे शांत होने लगी। मेरी गुप्त इन्द्रियों पर तनाव तो उतना ही रहा। पर मेरे होश से लगा तर देखने के कारण। उस पर फैली जलन छोटी होने लगा। और अंदर की तरफ सुड़कने लगी। जलन जो पूरे अंग पर फैली थी। वह केन्द्रीय और घनीभूत हो रही थी। और गुप्त अंग पर ही नहीं उसे आस पास एक शीतला फेल रही थी।
धीरे-धीरे स्वास इतनी मध्यम हो गई की कभी तो ऐसा लगता की मैं मर गया हूं। शरीर से मेरी दूरी बहुत दूर हो गई। शरीर का हिलना डुलना बंद हो गया। मेरे हाथ पैर जैसे और जिस जगह रह पर थे मैं उन्हें हिला नहीं पा रहा था। मैं कई बार उन्हें हिलाने की कोशिश की। पर मैं कामयाब नहीं हुआ। में कहीं गहरे में डूबता चला जा रहा था। कभी-कभी मुझे भय भी लगता था। की कहीं मैं मर तो नहीं रहा हूं। परंतु मैं डरा नहीं अपने को खुला छोड़ दिया। मेरी स्वास कहीं दूर चलती हुई महसूस हो रही थी। मुझे पहली बार शरीर की निर्भरता का एहसास हुआ। हमारी चेतना का शरीर से चिपकने के कारण कितना भारी पन लगता। एक हल्के पन का एहसास हो रहा था। लगता था मुझे पंख लग गये। मैं उड़ सकता हूं। मैं डूबता चला गया। पर मैंने एक अनुभव और पाया। जैसे ही मेरी सांस मंद होती है या कभी-कभी बंद होती है। तो विचार भी उसी गति में कम या बंद हो जाते है। मन पर सदा चलते विचारों का एक रेला ही जाना था जीवन में। पर आज में उस मन की सड़क को कभी-कभार भी सुनसान दिखाई दे रही थी। कैसा लग रहा था, मुंह में एक मधुरता फैल गई। एक अजीब सी सुगंध जो इस लोक की नहीं थी। वो मेरे शरीर से फूटने लगी। जिसे में महसूस कर पर रहा था। ये मेरा भ्रम नहीं था। एक हकीकत थी। उसी अवस्था में कितनी देर रहा कह नहीं सकता। शायद शांति और मधुरता में डूब कर मैं सो गया।
ठीक चार बजे मेरी आँख खुली तब मुझ पता चला की मेरे साथ कोई सो रहा था, वह गहरी नींद में सो रही थी। उस कुछ भी भान नहीं था। न ही उसने कुछ सहयोग किया था। केवल उसने अपने को छोड़ दिया था...यहां आकर....उसके चेहरे पर एक मधुरता-एक सौम्यता फैली हुई थी। मैंने झूक कर उसके चरणों में अपने सर को रख दिया। और अपने को धन्य समझा। मुझे जीवन में एक ऐसी अनुभूति हुई है। जो जीवन की सबसे कीमती है।
बस उस दिन के बाद से मुझ किमिया मिल गई। कि मैं कितने बड़े ओर गहरे सागर में भी डूब नहीं सकता तैरना आ गया। फिर ये प्रयोग हम पति-पत्नी ने भी किये...लगाता। एक दूसरे का सहयोग किया। कम प्रकाश में मधुर संगीत में घंटों नृत्य करते। तेज नृत्य आप में एक उत्तेजना पैदा करता है। कल्ब में यहीं तो होता है, ध्यान के सुरमई मधुर संगीत चाहिए...ओशो की एक कैसट है, इनटुयुशन। वह एक जापानी लड़की की बजाई बांसुरी है। हमें किरण मिल गई थी मार्ग दिखने लगता था सो आसान और आसान होता चला जा रहा है। ओशो के ध्यान संगीत बहुत कीमती है। और ओशो के सन्यास के तो क्या कहने।
‘’उतरो कामवासना में, लेकिन ऐसी श्रद्धा से स्त्री का संग करो कि स्त्री देवी जैसी ही हो; यह कामुकता नहीं होती। और उस आदमी को जो की स्त्री के संग होता है, उसकी पूजा करनी होती है, उसके पाँव छूने होते है। और यदि हल्की सी भी कामवासना उठने लगती है। तो वह अयोग्य हो जाता है; तो वह अभी इसके लिए तैयार नहीं है।
यह एक बड़ी तैयारी थी—कठिन परीक्षा थी जो कि कभी निर्मित की गई मनुष्य के लिए। कोई आकांक्षा नहीं कोई वासना नहीं,उसे स्त्री के प्रति ऐसी भाव दशा रखनी पड़ती जैसे कि वह उसकी मां हो।
(ओशो......पतंजलि: योग-सूत्र—3)
मनसा-मोहनी दसघरा
ओशोबा हाऊस नई दिल्ली
16 सिद्धियाँ विवरण
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अगस्त 03, 2021 in 16 सिद्धियाँ, विवरण
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1. वाक् सिद्धि : - 👇
जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं.
2. दिव्य दृष्टि सिद्धि:-👇
दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं.
3. प्रज्ञा सिद्धि : -👇
प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें.
4. दूरश्रवण सिद्धि :-👇
इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता.
5. जलगमन सिद्धि:-👇
यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो.
6. वायुगमन सिद्धि :-👇
इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं.
7. अदृश्यकरण सिद्धि:-👇
अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं.
8. विषोका सिद्धि :-👇
इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं.
9. देवक्रियानुदर्शन सिद्धि :-👇
इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं.
10. कायाकल्प सिद्धि:-👇
कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं.
11. सम्मोहन सिद्धि :-👇
सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं.
12. गुरुत्व सिद्धि:-👇
गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं.
13. पूर्ण पुरुषत्व सिद्धि:-👇
इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की.
14. सर्वगुण संपन्न सिद्धि:-👇
जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं.
15. इच्छा मृत्यु सिद्धि :-👇
इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं.
16. अनुर्मि सिद्धि:-👇
अनुर्मि का अर्थ हैं. जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो.sabhar dev sharma Facebook wall
सोमवार, 2 अगस्त 2021
विज्ञानमय कोष की साधना
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अगस्त 02, 2021 in विज्ञानमय कोष की साधना
{{{ॐ}}}
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अन्नादि कोष को पार करके जब साधक विज्ञानमय कोष मे पहुँचता है ।
तब जीव आत्मा एवं ब्रह्म का भेद समझ जाता है ।a गीता मे श्री कृष्ण ने कहा कि जीव जब सोते है तब योगी जागता है जब जीव जागते है तब योगी सोता है अर्थात योगी की भूमिका जगत क्रिया एवं मोहादि से परे है। वरूण ने भृगु को उद्दालक को श्वेतकेतु ने ब्रह्मा ने इन्द्र को अंगिरा ने विस्वान को तप( कर्म= क्रिया) करने को कहा है ।
इच्छा कि परिणति क्रिया क्रिया की परिणति ज्ञान होता है अतः तप करने से ही ज्ञान कि प्राप्ति होती है।
आत्मसाक्षात्कार के लिए चार सुलभ साधना सें
१, #सोहं_साधना २, #आत्ममानुभूति ३, #स्वर_साधना
४, #ग्रंन्थिभेद
१, #सोहंसाधना
सोहं साधना मे तीनो महाकारण शरीर एक हो जाते है:--
प्रात काल पूर्व कि ओर मुह करके, मेरूदण्ड को सीधा रखकर दोनों हाथों को समेट कर अपनी गोद मे रखे एवं नेत्र बन्द करे। अब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे तब सुक्ष्म कर्णेन्द्रिय सजग करके ध्यान पूर्वक अवलोकन करे कि वायु के साथ साथ "सो" की सुक्ष्म ध्वनि हो रही है ।s सांस जब रूके तक "अ" तथा वायु निकलते वक्त "हं" कि ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करे।
इसके साथ ही ह्रदय स्थित सुर्यचक्र ये प्रकाश बिन्दु मे आत्मा के तेजामय स्फुलिंग की भावना करे ।
जब सांस भीतर hजायें तब "सो" की ध्वनि कि अनुभव करे यह तेज बिन्दू परमात्मा का प्रकाश है सांस रूकने पर"अ" की भावना करे ओर बहार सांस निकलते समय "हं" कि ध्वनि अर्थात मै हुआ की भावना करे।
"सो" ब्रह्म या प्रतिबिंब है
"अ" प्रकृति का और "हं" जीव का प्रतीक है।
इस "सोहं" का प्रत्येक सांस को आवागमन पर ध्यान करने से जीव मुक्त हो जाता है ।
सोहं लोम विलोम साधना-- सोहं का विलोम "हंस" है "हंसः" विशुद्ध परमात्व तत्त्व है।
सांस लेते समय " सोहं" एवं छोड़े समय "हंस" की भावना करने से परमात्मा तत्त्व शीघ्र प्राप्त होता है ।
#आत्मानुभूति
आसन लगा कर बैठे अंदर की हवा को बाहर निकाले फिर पूरी हवा फेफड़ों मे भरे।३-४ लम्बे सांस लेवें एवं अपने हाथ पांव शरीर को शिथिल करे मन को विचार शुन्य करे भावना करे कि शरीर को अंदर नीला आकाश व्याप्त हो रहा है ।
शरीर शिथिल होने जाने पर ह्रदय स्थल मे अंगुठे ये बराबर ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करेo। मै अजर अमर ईश्वरीय अंश इसी रूप मे शुद्ध आत्मा हुं।उस ज्योति की कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुवे मन मे भावना बनाये रखें । अखिल आकाश मे नीलवर्ण के आकाश मे बहुत ऊपर सुर्य को समान ज्योतिस्वरूप आत्मा अवस्थित करें। kअपने निष्पन्द शरीर को देखिये एवं भावना करे कि शरीर के अंग प्रत्यंग के कार्य भाव विचार मेरे मन के आधीन है एवं मन पर विजय मैंने प्राप्त करती है ।
अपने आपको आकाश नें सुर्यमण्डल मे अवस्थितमाने एवं भावना करे कि मै समस्त संसार भूमण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेक रहा हुँ
अशोक वशिष्ठ जी
रविवार, 1 अगस्त 2021
What is stem cell therapy
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अगस्त 01, 2021 in cell, stem
An excerpt of the video created for one of our clients. This 3D medical animation features a dermatological reconstructive procedure in which stem cells are implanted in the extracellular matrix to repair skin defects. This process is called stem cell therapy.
For more Info - http://www.scientificanimations.com/p...
11 Comm
शनिवार, 31 जुलाई 2021
मनोमय कोष की साधना
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जुलाई 31, 2021 in
{{{ॐ}}}
#
मन मे एक गुप्त शक्ति छिपी होती है यदि वह शक्ति मनोविकार,छल,छिद्र, लोभ, मोह, वश अनैतिक कार्य पाप कर्म की ओर प्रवृत्ति होती है तोअधोगति कारक है अत: उसे आध्यात्म की ओर मोडने से ही परमात्मा सी प्राप्ति होती है ।
गीता मे कहा गया है कि मन ही बंधन व मोक्ष का कारक है पतञ्जलि ऋषि ने कहा कि चित्त की वृत्तियों का निरोध करना एकाग्र करना ही योग है ।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को मन वश मे करने के लिए दो उपाय बताये है:- १:- अभ्यास २:- वैराग्य ।
इनके द्वारा ऐषणा प्रकृति को रोककर ऋतम्भरा बुद्धि को अन्तरात्मा के आधीन किया जा सकता है। जिसे मनोयोग कहते है इसके अनन्तर:--
१, ध्यानयोग २, त्राटक ३, जप ४, तन्मात्रा साधन
#ध्यानयोग
ध्यान चुम्बक की तरह मन खीचकर एकाग्र करता है ध्यान के लिए आदर्शों को दिव्यरूप धारी देवताओं के रूप मानकर उनमे तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है ।
ऐसा भी हो सकता है। कि एक ही ईष्ट देव को आवश्यकतानुसार विभिन्न गुणो वाला मान लिया जाये।
ईष्टदेव का मन क्षेत्र मे ध्यान करे। ध्यान के पांच अंग है:-
१. स्थिति:-उपासक को यह ज्ञान होना चाहिए कि कौन सी दिशा मे मुँह करके किस स्थान मे किस आसन द्वारा साधना करे।
२.संस्थिति:- ईष्ट की छवि रंग रूप अंग आभूषणों वाहन आदि स्थिति निश्चित करे।
३.विगति:- ईष्ट के गुण ,पराक्रम, आदि या संस्मरण करे।
४. प्रगति:- माता ,पिता, सखा, मित्र, गुरू, दास, किस रूप नें ईष्ट की साधना करनी है ।
५.संस्मिति:-यह व्यवस्था है जिसमे साधक और साध्य, उपासक,और उपास्य एक हो जाते है ।
#साधना_की_सहायक_विधियाँ
१. इष्ट की सकाम व विविध उपचारों से पूजा करें।
२. भावना करे देवता को दिव्य तेज मय शरीर माने उस तेज से देह पुष्ट करे
३, भावना करें कि मेरे चारो ओर प्रचण्ड तेज है ओर मै परि पुष्ट हो रहा हूँ
४,ह्रदय के निकट सुर्य चक्र मे सुर्य का प्रकाश फैल रहा है
५,भावना करे कि गायत्री सी स्वर्णिम किरणों मेरे शरीर मे प्रविष्ट हो रही है ।
#त्राटक
त्राटक दो तरह के है:-
१,अन्तर त्राटक २,बाह्य त्राटक
अन्तरत्राटक:---
योगी प्रकाश बिन्दु पर ध्यान कर आंतरिक त्राटक करते है तो मैस्मरेजम वाले आन्तरिक त्राटक लाभ व बाह्य प्रयोग के लिये करते है वे उस उपासना का लाभ नही उठा पाते।
बाह्यत्राटक:-
बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्यसाधनाों के आधार पर मन को वश मे कर चित्तवृत्तियो का एकीकरण करना है
अपनी दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर अत न्याय ता पूर्वक ध्यान करे इससे हमारे नेत्रों मे चुम्बकीय शक्ति बढ जाती है। इसे दृष्टि बंधक भी कहते है । बंधक दृष्टि से किसी को वशीभूत या बेहोश किया जा सकता है । इस त्राटक से रोग निवारण व अन्त करण का भेद मालुम किया जा सकता है
#जप
महर्षि भारद्वाज ने गायत्री व्याख्या मे कहा है समस्त यज्ञों मे जपयज्ञ अधिक श्रेष्ठ है यह मन को वश मे करने कि रामबाण है इसके लिए निम्न बातो का ध्यान रखे।
जप प्रातकाल ब्रह्म मुहुर्त्त मे ही करना चाहिए जप के लिए एकान्त व शुद्ध स्थान होना चाहिए जप समय शुद्ध वस्त्र वआसन का प्रयोग करे।
प्रात काल पूर्व मुखी सांय काल पश्चिम मुखी हो साधना करे
माला गोमुखी मे ही रखे या कपडे से ढककर करे।
यात्रा या रोगी होने से मानसिक जप करे।
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मस्तिष्क ये मध्य मे इष्ट कि स्मरण करे
शुक्रवार, 30 जुलाई 2021
maha avatar baba ji sangrila ghati in himalaya
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जुलाई 30, 2021 in
“Babaji was living in a little home in Banaras, when Shankaracharaya visited that city. Shankara at that time was a famous astrologer. Babaji’s manservant went therefore to see him. He received from Shankara the shocking news that, that very night, it was his destiny to die! In fear and trembling, on his return, he approached Babaji with the news.”
“Go back,” said Babaji, ‘and say to him that you will not die tonight.’
“The servant carried this reply back to Swami Shankara, who affirmed. ‘This karma is so fixed that, should you survive it, I shall go to your master and ask him to accept me as his disciple.’
“That night, a terrible thunderstorm lashed the city. Lightening struck everywhere. It felled trees all around the house where Babaji lived. The great master stretched himself out over the servant’s body, to protect him. When morning came, the servant was still alive. He then went and presented himself to Shankara. The Swami was amazed. Realizing that he had encountered a power much greater than his own, he went to Babaji and took initiation into Kriya Yoga.”
Om Kriya Babaji Namaha Aum!
गूगल एक परिचय
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जुलाई 30, 2021 in गूगल
यह कम्पनी स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से पी॰एच॰डी॰ के दो छात्र लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन द्वारा स्थापित की गयी थी। इन्हें प्रायः "गूगल गाइस"[7][8][9] के नाम से सम्बोधित किया जाता है। सितम्बर 4, 1998 को इसे एक निजि-आयोजित कम्पनी में निगमित किया गया। इसका पहला सार्वजनिक कार्य/सेवा 19 अगस्त 2004 को प्रारम्भ हुआ। इसी दिन लैरी पेज, सर्गेई ब्रिन और एरिक स्ख्मिड्ट ने गूगल में अगले बीस वर्षों (2024) तक एक साथ कार्य करने की रजामंदी की। कम्पनी का शुरूआत से ही "विश्व में ज्ञान को व्यवस्थित तथा सर्वत्र उपलब्ध और लाभप्रद करना" कथित मिशन रहा है। कम्पनी का गैर-कार्यालयीन नारा, जोकि गूगल इन्जीनियर पौल बुखीट ने निकाला था— "डोन्ट बी इवल (बुरा न बनें)"। सन् 2006 से कम्पनी का मुख्यालय माउंटेन व्यू, कैलिफोर्निया में है।
गूगल विश्वभर में फैले अपने डाटा-केन्द्रों से दस लाख से ज़्यादा सर्वर चलाता है और दस अरब से ज़्यादा खोज-अनुरोध तथा चौबीस पेटाबाईट उपभोक्ता-सम्बन्धी जानकारी (डाटा) संसाधित करता है। गूगल की सन्युक्ति के पश्चात् इसका विकास काफ़ी तेज़ी से हुआ है, जिसके कारण कम्पनी की मूलभूत सेवा वेब-सर्च-इंजन के अलावा, गूगल ने कई नये उत्पादों का उत्पादन, अधिग्रहण और भागीदारी की है। कम्पनी ऑनलाइन उत्पादक सौफ़्ट्वेयर, जैसे कि जीमेल ईमेल सेवा और सामाजिक नेटवर्क साधन, ऑर्कुट और हाल ही का, गूगल बज़ प्रदान करती है। गूगल डेस्कटॉप कम्प्युटर के उत्पादक सोफ़्ट्वेयर का भी उत्पादन करती है, जैसे— वेब ब्राउज़र गूगल क्रोम, फोटो व्यवस्थापन और सम्पादन सोफ़्ट्वेयर पिकासा और शीघ्र संदेशन ऍप्लिकेशन गूगल टॉक। विशेषतः गूगल, नेक्सस वन तथा मोटोरोला ऍन्ड्रोइड जैसे फोनों में डाले जाने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम ऍन्ड्रोइड, साथ-ही-साथ गूगल क्रोम ओएस, जो फिलहाल भारी विकास के अन्तर्गत है, पर सीआर-48 के मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम के रूप में प्रसिद्ध है, के विकास में अग्रणी है। एलेक्सा google.com को इंटरनेट की सबसे ज़्यादा दर्शित वेबसाइट बताती है। इसके अलावा गूगल की अन्य वेबसाइटें (google.co.in, google.co.uk, आदि) शीर्ष की सौ वेबासाइटों में आती हैं। यही स्थिती गूगल की साइट यूट्यूब और ब्लॉगर की है। ब्रैंडज़ी के अनुसार गूगल विश्व का सबसे ताकतवर (नामी) ब्राण्ड है। बाज़ार में गूगल की सेवाओं का प्रमुख होने के कारण, गूगल की आलोचना कई समस्याओं, जिनमें व्यक्तिगतता, कॉपीराइट और सेंसरशिप शामिल हैं, से हुई है। अगर भारत में गूगल के CEO की बात की जाए तो भारत में गूगल के CEO सुंदर पिचाई जी है जिनकी सालाना कमाई लगभग 1300 से 1500 करोड़ रूपये है।sabhar :vikipidia
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