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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

AIIMS Hospital New Delhi | AIIMS Delhi Vlog | AIIMS New OPD Building RAK OPD | ICMR Kaha hai

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The All India Institutes of Medical Sciences (AIIMS) are a group of autonomous government public medical colleges of higher education. These institutes have been declared by an Act of Parliament as Institutes of National Importance. AIIMS New Delhi, the fore-runner institute, was established in 1956. Since then, 22 more institutes were announced. As of January 2020, fifteen institutes are operating and eight more are expected to become operational until 2025. Proposals were made for six more AIIMS. namaskaar dosto, is video me aapko AIIMS ka full view dekhne ko mila hai jo ki aaj tk aapko kisi video me dekhne ko nhi mia hoga,,,to bina der kiye video ko poora dekhe AIIMS Newdelhi New RAK OPD complex It's @aiims_newdelhi New OPD complex. Developing World class infrastructure. Hopefully things will be better soon for patients. We need to adopt more Patients friendly measures in Govt hospitals. Hats off to leadership @narendramodi @MoHFW_INDIA @drharshvardhan @richaanirudh #Namaskar sabhar urokt

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Quantum computers

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Quantum computers aren’t the next generation of supercomputers—they’re something else entirely. Before we can even begin to talk about their potential applications, we need to understand the fundamental physics that drives the theory of quantum computing. (Featuring Scott Aaronson, John Preskill, and Dorit Aharonov.) For more, read "Why Quantum Computers Are So Hard to Explain": https://www.quantamagazine.org/why-is.. sabhar.

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हमारा आंख कैसे काम करता है

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नमस्कार दोस्तों.......

स्वागत है आपका The Science News चैनल में। दोस्तों आज की इस वीडियो मे मैंने आपको हमारे आंख के बारे में बताया है कि हमारा आंख कैसे काम करता है। कम समय में मैंने आपको सही जानकारी देने की कोशिश की है इसलिए इस वीडियो को पूरा देखें।


वीडियो अच्छा लगे तो please इसे LIKE कर दे और इस वीडियो से रिलेटेड आपका कोई सुझाव, समस्या या जानकारी के लिए हमें COMMENT करके बताएं। इस विडियो को SHERE करे ताकि और भी लोग इसके बारे में जान सके और हमारे चैनल को SUBSCRIBE कर ले ताकि आगे भी मैं आपके लिए इससे भी अच्छी वीडियो ला सकू.......धन्यवाद। sbhar the science news chhanel

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जैव प्रौद्योगिकी विभाग

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) पिछले 30 वर्षों में आधुनिक जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी में विकास के लिए एक नई गति प्रदान की है.. विभाग ने निरंतर इस क्षेत्र से उद्योग को और समृद्ध करने की दिशा में काम किया है। एक तरह से कहा जाए तो विभाग ने उद्योग के विकास को सुविधाजनक बनाने के लिए निरंतर सहायता प्रदान की है.. यही वजह है कि कृषि, स्वास्थ्य देखभाल, पशु विज्ञान, पर्यावरण और उद्योग के क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के विकास और आवेदन में महत्वपूर्ण उपलब्धियां रही हैं।आज भारत दुनिया के शीर्ष 12 बायोटेक स्थलों में से एक है और एशिया प्रशांत क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) अनुमोदित पौधों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में है। यूएसए के बाद भारत का ही नंबर आता है। भारत रिकांबिनैट हेपेटाइटिस बी टीके का भी सबसे बड़ा उत्पादक है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय (डीबीटी )की दृष्टि और रणनीति "जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करना, भविष्य की प्रमुख सटीक उपकरण की बदौलत जैव प्रौद्योगिकी को नया आकार देना और गरीबों के कल्याण के लिए विशेष रूप से सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने या कहें गरीबों के कल्याण की दिशा में काम करना है"

अधिक जानकारी के लिए कृपया http://www.dbtindia.nic.in/ पर जाएं। ।

माईगोव पर डीबीटी , लोगों को विभाग के साथ जुड़ने और जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर योगदान करने के लिए भी अवसर दे रहा है ताकि इससे विभाग और सशक्त बन सके sabhar my gov.in

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गुरुवार, 5 अगस्त 2021

मंत्र-विधियाँ क्यों नहीं करते हैं काम

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आपने अक्सर सत्संग में सुना होगा, रामायण, महाभारत या वेदों आदि में पढ़ा होगा कि प्राचीन काल में तपस्वी लोग मंत्रों की शक्ति से जो चाहे हासिल कर लेते थे। वे जिस चीज का आह्वान करते थे, उसे तुरंत पा लेते थे।

आज भी आप जब शारीरिक या आर्थिक रूप से परेशान होते हैं, और किसी ज्योतिषी के पास जाते हैं, तो वह क्या करता है। जन्म पत्रिका देखने के बाद पीड़ित ग्रह की शांति के लिए कुछ उपाय बता देता है और कुछ मंत्रों का जाप करने के लिए कहता है।

ऐसे में कई बार लोग सवाल करते हैं कि उन्होंने मंत्रों का जाप तो किया, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली। आखिर ऐसा क्यों होता है कि जो मंत्र प्राचीन काल में सिद्ध थे, उनका प्रभाव आज कम दिखता है या नहीं दिखता है। मंत्रों की शक्ति प्रभावी क्यों नहीं होती है।

आज हम आपको इसका सबसे बड़ा राज बताने जा रहे हैं कि मंत्रों की शक्ति आखिर काम कैसे करती है। दरअसल, आज लोग मंत्रों को जाप करते समय सिर्फ मुंह से बोलते रहते हैं। उसमें उनका मन और आत्मा नहीं शामिल होती है।

मंत्र पढ़ते या जपते समय आधा ध्यान घर के काम में लगा होता है और कई बार तो लोग मंत्रों का जाप करते हुए घर की साफ सफाई भी कर देते हैं, गाड़ी भी चला लेते हैं। उन्हें लगता है कि पंडित ने जपने के लिए कहा था और यह किसी काम को करते हुए भी तो किया जा सकता है।
मगर, यह गलत तरीका है। मान लीजिए आपके घर में अंधेरा है और आप जीरो वॉट का बल्ब लगाते हैं, तो कितनी रोशनी मिलेगी? फिर आप कहेंगे बल्ब तो जला दिया है, लेकिन रोशनी तो आ ही नहीं रही है। यही तो आप मंत्रों को जपते हुए कर रहे हैं। जीरो वॉट के बल्ब की तरह सिर्फ मुंह से मंत्र का उच्चारण करते जा रहे हैं। खुद ही सोचिए क्या वह फलीभूत होंगे।

दूसरा तरीका है, मन से जाप करने का। एक जगह ध्यान लगाकर बैठ जाएं। आपको विचलित करने वाली कोई चीज मोबाइल, किसी तरह का शोर नहीं हो। मंत्र को पूरे मनोयोग से ध्यान केंद्रित करते हुए जपें। जब मन की शक्ति शामिल होगी, तो यह 10 वाट के बल्ब की तरह रोशनी देगी। आपको इसका फायदा होता दिखेगा।

तीसरा तरीका है आत्मा से मंत्रों का जप करना। यह 100 वॉट का बल्ब है, जो पूरे कमरे को रोशनी से भर देगा। क्योंकि इसमें आपका शरीर यानी मुंह से मंत्रों का उच्चारण हो रहा होगा, मन यानी ध्यान में भी आपके मंत्र होंगे और आत्मा यानी आपके शरीर के सातों चक्र, रोम-रोम उसका उच्चारण कर रहा होगा, जैसे प्राचीन काल में लोग करते थे। अब बताइए 100 वॉट का बल्ब जलेगा, तो क्या मंत्रों की शक्ति आपके जीवन के अंधकार को दूर नहीं कर देगी।

मंत्र तो वही थे, वही रहेंगे, लेकिन उन्हें जपने और सिद्ध करने में आप कितनी ऊर्जा लगाते हैं। इससे तय होता है कि आपको उसका फायदा कितना मिल रहा है। पहले तरीके से मंत्र जपने से तो बेहतर है कि आप न ही करें क्योंकि इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा।

यह बिल्कुल टेप रिकॉर्डर की तरह है, जिसमें आपके मन ने मंत्र बोलने की फीडिंग कर ली है और जैसे आप बाइक या कार चलाते हुए ध्यान नहीं देते हैं और कार चलती रहती है, वैसे ही मंत्रों की शक्ति को बढ़ाते नहीं है। दिमाग की प्रोग्रामिक के चलते मंत्र मुंह से निकलते रहते हैं।

विधियां काम क्यों नहीं करती ?
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विधियां जीवंत है, विधियां सदगुरू बनाते हैं, बुद्ध बनाते हैं। और उन्होंने प्रयोग करके बनाई है। उन्होंने जिस विधि से यात्रा की है, और पहुँचे हैं, वे उसी विधि की वे चर्चा करते हैं। 

फिर हमेशा प्रश्न उठता है कि विधियां काम क्यों नहीं करतीं ? सारा जीवन विधि प्रयोग में ही निकल जाता है !  लोगों को हमने सारा जीवन साधना करते हुए देखा है, ध्यान करते हुए देखा है, और वे वहीं के वहीं हैं, कहीं नहीं पहुँचे है, उल्टे और कलह से भर गए हैं। उनमें पाखंड पैदा हो गया है, उन्हें क्रोध भी आता है और बाद में वे बहुत पश्चाताप में जलते भी हैं कि मैं संन्यासी या साधक होते हुए भी क्रोध से मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ !

विधि काम न करने के पीछे बहुत से कारण संभव है। पहला और सबसे बड़ा कारण है अपने साधक होने का अहंकार, कि मैं साधक या ध्यानी! इसमें दूसरे के प्रति, जो धार्मिक नहीं हैं, उनके प्रति निंदा का भाव भी आ जाता है कि कुछ नहीं कर रहे हैं, नर्क में जाएंगे। हम दिन रात अध्यात्म और ज्ञान की चर्चा करते रहते हैं, अपनी साधना की चर्चा करते रहते हैं, यानी बीज को बोकर रोज - रोज खोदकर देखते हैं कि उगा या कि नहीं! और ध्यान का बीज जीवन भर नहीं उग पाता। 

अपनी प्रेमिका के विषय में हम किसी को बताते नहीं हैं और भगवान् से प्रेम है यह बात हम ढोल पीटकर कहना चाहते हैं। ओशो कहते हैं कि दांया हाथ जो काम करे, वह बांए हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए। साधना की चर्चा करने से जिन अनुभवों से हम गुजरते हैं वे अनुभव दोबारा घटित नहीं होते, उन्हें कहना नहीं है, सिर्फ स्मरण में रखना है, ताकि वे गहरे जा सके।  इसलिए सधना में गोपनीयता बहुत आवश्यक है। 

दूसरा कारण है झूंठ जीवन जीना। हम सुबह से शाम तक सिर्फ झूंठ बोलते हैं। दूसरों से भी और अपनों से भी। एक झूंठ को छुपाने के लिए दूसरा झूंठ और तीसरा झूंठ, इस तरह हम अपने ही बनाए झूंठ के जाल में उलझ कर मुसीबत में पड़ते हुए तनाव से भर जाते हैं। और तनाव के कारण हम विधि प्रयोग में असमर्थ हो जाते हैं। 

तीसरा कारण है संकल्प की कमी। हममें संकल्प बिल्कुल भी नहीं है। हमारी छोटी-छोटी आदतें ही हम नहीं बदल पाते! हर गलती को बार - बार दोहराते रहते हैं। आज जिस बुरी आदत को छोड़ने का संकल्प लेते हैं, कल तक उस पर टिकना मुश्किल हो जाता है, कल और अगले कल पर टाल देते हैं कि अभी कहां जीवन निकला जा रहा, कल देख लेंगे ! 

चौथा है धैर्य की कमी। हममें धैर्य तो है ही नहीं! हमारा जीवन इतना तेजी से भागा जा रहा है कि हमें आज और अभी ही परिणाम चाहिए ! यदि हमारा शरीर अस्वस्थ हो, हमें बुखार हो, तो हमें पूरी तरह से स्वास्थ्य होने में एक से दो सप्ताह लगते हैं जबकि ध्यान तो शरीर के साथ ही चेतना का भी स्वास्थ्य होना है ! और शरीर तो अभी बिमार हुआ है, चेतना तो जन्मों से बिमार है ! उसके लिए तो हमें प्रतिक्षा करनी पड़ेगी और धैर्य होगा तो ही हम प्रतिक्षा कर पाएंगे। 

यह प्रतिक्षा पूरी हो इसके लिए हमें धैर्य रखना होगा। कहने सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है कि "धैर्य" रखना चाहिए... लेकिन हम धैर्य रख नहीं पाते ? कैसे रखें धैर्य?

धैर्य हमारे जीवन में उतर सके इसके लिए हमें स्वीकार भाव बढ़ाना होगा। छोटी-छोटी बातें हम स्वीकार नहीं कर पाते हैं, जो हमें तनाव देकर हमारे स्वभाव में चिड़चिड़ापन घोलती है। जिस चीज की जरूरत हमें थी ही नहीं, वह चीज हम मंहगे दामों में बाजार से खरीद लाते हैं, लेकिन दो से पाँच रूपयों के लिए सब्जी वाले से, फेरी वाले से या फिर बस कंडक्टर से झिक - झिक करते हैं। 

यदि हमें धैर्य को अपने जीवन में प्रवेश देना है तो स्वीकार भाव बढ़ाना होगा। जितना स्वीकार भाव बढ़ेगा उतना ही हममें धैर्य का अवतरण होना शुरू हो जाएगा। स्वीकार भाव होगा तो मन में नये तनाव, नयी ग्रंथियां इकठ्ठा नहीं होगी और पुरानी ग्रंथियों को हम रेचन करके से बाहर निकाल देंगे। अतः जैसे - जैसे निर्ग्रंथ होते जाएंगे, वैसे - वैसे धैर्य के साथ ध्यान का प्रवेश हममें होता जाएगा।

पांचवां है विधि में सत्यता का अभाव। कोई भी विधि निरंतरता की मांग करती है। ताकि आगे की विधि में पहुंचा जा सके। बीच में यदि हम विधि से हटते हैं तो निश्चय ही गत्यात्मकता का बना रहना मुश्किल है, हम फिर - फिर पीछे लौट आते हैं यानी चार कदम बढ़ते हैं और दो कदम फिर पीछे हट जाते हैं। इस तरह हम चलते भी जाते हैं और रूकते भी जाते हैं। 

छठा है विधि के चरणों को पूरा नहीं करना यानी अपने को पूरा नहीं देना, कुछ बचा लेना। हम विधि प्रयोग करते हैं लेकिन सारे चरणों को पूरी शक्ति और संकल्प से पूरा नहीं करते। और जब तक हम अपना पूरा सौ प्रतिशत नहीं देंगे तब तक विधि काम नहीं करेगी। हममें इतनी त्वरा, इतना संकल्प हो कि हम स्वयं को विधि के हवाले कर सकें, पूरी ताकत, पूरी शक्ति लगा सकें जैसे कोई छुरा लेकर पीछे दौड़ रहा है और हम अपने को बचाने के लिए पूरी शक्ति लगाकर भाग रहे हैं। 

इस तरह धीरे-धीरे विधि से हमारा भरोसा ही उठने लगता है है, हमारी संकल्प शक्ति और भी क्षीण होने लगती है और ध्यान साधना, कुंडलिनी, तीसरी आँख , अचेतन में जाना यह सब बातें कपोल कल्पना लगने लगती है।

सातवां कारण है अपनी विधि न चुन पाना। यदि हम मोटे तौर पर विधियों को बांटें तो दो तरह की ध्यान विधियां हैं, पहली है सक्रिय विधि और दूसरी है निष्क्रिय विधि। सक्रिय विधि वह है जिसमें हमें कुछ करना होता है मसलन श्रम, व्यायाम, प्राणायाम और निष्क्रिय विधि वह है जिसमें कुछ भी नहीं करना है, शरीर को पूरी तरह से विश्राम में ले जाना है। सक्रिय विधि प्राथमिक है, पहले करनी होती है और निष्क्रिय विधि बाद में यानी सक्रिय विधि से गुजरकर ही निष्क्रिय विधि में प्रवेश किया जा सकता है।

शरीर जब तक श्रम नहीं करेगा, पसीना नहीं निकालेगा, अपने को थकाएगा नहीं तब तक विश्राम को उपलब्ध नहीं हो सकेगा। क्योंकि निष्क्रिय विधि के लिए शरीर का विश्राम में जाना बहुत जरूरी है। शरीर पूरी तरह से विश्राम में होगा यानी कोई हलचल नहीं, पूरी शांति। शरीर के तल पर कोई तनाव नहीं और मन के तल पर भी कोई तनाव नहीं। तभी शरीर विश्राम में जाएगा और निष्क्रिय विधि में प्रवेश कर पाएगा। 

परेशानी यहीं से शुरू होती है। सक्रिय विधि हम करते नहीं हैं और सीधे निष्क्रिय विधि प्रयोग करना शुरू कर देते हैं। जब तक हम सक्रिय विधि में श्रम नहीं करेंगे तब तक हम निष्क्रिय विधि में विश्राम को उपलब्ध नहीं हो सकते।

हम सीधे निष्क्रिय विधि प्रयोग करते हैं और उसमें सफल हो नहीं पाते, हम शरीर और मन दोनों तलों पर अशांत होते हैं । शरीर विरोध करता है, कहीं खुजली चलती है, कहीं चींटी काटती है, भाव उठते हैं, विचार घेरे रहते हैं। जबकि निष्क्रिय विधि में पैंतालिस मिनट से एक घंटे तक हमें शांत रहना है, कोई भाव नहीं, कोई विचार नहीं, तभी ध्यान में प्रवेश होगा। 

अतः निष्क्रिय विधि से पहले हमें सक्रिय विधि से गुजरना होगा, क्योंकि सक्रिय विधि ध्यान का पहला चरण है यानी सक्रिय विधि हमें निष्क्रिय विधि में प्रवेश करने के लिए तैयार करती है। sabhar dev sharma Facebook wall
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बुधवार, 4 अगस्त 2021

आविष्कारों के लिए पेटेंट low

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 पेटेंट आविष्कारों के लिए दिया जाता है। ‘आविष्कार’ का अर्थ उस प्रक्रिया या उत्पाद से है, जो कि औद्योगिक उपयोजन (Industrial application) के योग्य है। अविष्कार नवीन एवं उपयोगी होना चाहिये तथा इसको उस समय की तकनीक की जानकारी में अगला कदम होना चाहिए। यह आविष्कार उस कला में कुशल व्यक्ति के लिए स्पष्ट (Obvious) भी नहीं होना चाहिये।

आविष्कार को भारत के पेटेंट अधिनियम की धारा 3 के प्रकाश में भी देखा जाना चाहिये। यह धारा परिभाषित करती है कि क्या आविष्कार नहीं होते हैं। किसी बात को आविष्कार तब तक नहीं कहा जा सकता है जब तक वह नवीन न हो। यदि किसी बात का पूर्वानुमान किसी प्रकाशित दस्तावेज के द्वारा किया जा सकता था या पेटेंट आवेदन के प्रस्तुत करने के पूर्व विश्व में और कहीं प्रयोग किया जा सकता था तो इसे नवीन नहीं कहा जा सकता। यदि कोई बात सार्वजनिक क्षेत्र में है या पूर्व कला के भाग की तरह उपलब्ध है तो उसे भी आविष्कार नहीं कहा जा सकता। भारत देश में परमाणु उर्जा से सम्बन्धित आविष्कारों का पेटें‍ट नहीं कराया जा सकता है।sabhar vikipidia

Ssabhar

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Live Basic Arthroscopic Rotator cuff repair Surgery by Dr Prathmesh

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This video focuses on ABC of rotator cuff repair. Learn how to do a subacromial arthroscopy and rotator cuff repair of small rotator cuff tear. This video has been made keeping into consideration the needs and requirements of a patient who plans to start doing arthroscopic rotator cuff repairs.

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मंगलवार, 3 अगस्त 2021

मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

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मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक
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मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3.
अधो गति। व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है।
सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में
अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।
आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं- जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में
वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है
तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम
शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में
स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है।
उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।
पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग- 1. पहली विज्ञान आत्मा, 2. दूसरी महान
आत्मा और 3. तीसरी भूत आत्मा।
1. विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न
करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील
दूर है।
2. महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28
अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद
चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह
आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।
3. भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड
में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल
होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के
अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।

वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित
कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म
भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है। और जिन्होंने
वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त
होती है।
अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे
आदि योनि में पहुंच जाता है। स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच
जाता है लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक
पहुंच जाता है।
जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर
सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन
यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले
लेता है।
लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और
देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यही मोक्ष है।

-संदर्भ वेद-पुराण।
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मेरी सेक्‍स के पार की यात्रा- मार्ग की अनुभूतियां

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) जीवन में जो भी हम आज पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है। पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में उसकी तादम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है। मनुष्य के मन के सात प्रकार है, वहीं से उसे अपनी यात्रा शुरू करनी होती है परंतु ये कार्य तो केवल गुरु ही देख सकता है। सेक्स, कृपणता, क्रोध, धूर्तता, मूढ़ता.... परंतु इस समय पूरी पृथ्वी मानसिक रूप से मनुष्य के मन पर सेक्स एक रोग बन गया है। सेक्स जो शरीर की जरूरत है, वो हमारे सभ्य होने के साथ-साथ मन पर आ गया। जो बहुत खतरनाक है। सबसे पहले तो साधक को ये समझ लेना चाहिए की सेक्स शरीर पर कैसे आये जैसे भोजन अगर हम मन से करे तो हम अस्वास्थ हो जायेगे। बाकी पृथ्वी का कोई प्राणी प्रकृति से जुड़ा है केवल मनुष्य टूट गया है। तब हम उसके पास हो सकते है, कृपणता तो पहला द्वार है कृपण आदमी न तो प्रेम कर सकता है, वह तो केवल धन का गुलाम होता है, वह कमाता तो है परंतु उसका उपयोग भी नहीं कर पता। सद्उपयोग की बात तो छोडिये, इसलिए सभी धर्मों ने दान का बहुत महत्व दिया है, दान पहला द्वार खोने के लिए अति जरूर है। परंतु जब साधक ध्यान साधना शुरू करता है तो वही द्वारा जो खुला है उर्जा वहीं से रिसना शुरू कर देती है, क्रोधी अधिक क्रोधी, सेक्सी अधिक सेक्सी, कंजूस अधिक कंजूस, चालाक-कपटी अधिक लंपट होना शुरू हो जाता है। क्यों ऐसा होता है, क्योंकि आपके उसी द्वार से जीवन की अधिकतम उर्जा बहती है। तब हम घबरा जाते है, क्रोध और सेक्स सकारात्मक है, ज्यादा तर साधक जो इस द्वारा पर जो खड़े होते है वही ध्यान में उतर सकते है, कंजूस, मूढ़़, चालाक....का ध्यान में गहरे उतरना अति कठिन है। जीवन एक उर्जा है सेक्स-क्रोध एक कुदरत की देन है। एक से हम प्रकृति की उत्पति करते है दूसरे से जीवन की रक्षा। ओशो से जुड़े हजारों संन्यासियों को मैं देखता हूं केवल-केवल तंत्र की बात करते है। जबकि तंत्र जितना सरल है उतना कठिन भी है। आपको यह जान कर अति दूःख होगा की ओशो जैसे महान गुरु को जो सब आयामों अति पूर्ण है, तंत्र के काम में हार गए। पूर्ण आजादी के बद भी ओशो को पूरी उम्र में एक भी जोड़ा नहीं मिल सका जिस पर वह तंत्र के प्रयोग कर सकते। एक दो जोड़े उन्होंने चुने थे उनमें एक स्वामी योग चिन्मय जी थे। परंतु सब बेकार रहा एक दिन स्वामी और उनकी महिला मित्र ने अचानक सारे सर के बाल मुंडाकर और आश्रम मैं घोषणा कर दि की आज से हम प्रेमी प्रेमिका न रह कर एक भाई बहन की तरह रहेंगे। किसी को कुछ समझ नहीं आया। जब मैंने ध्‍यान शुरू किया तो मैं पूरी ताकत झोंक दी थी। पीछे कुछ भी बचा कर नहीं रखना चाहता था उसमें डूब जाता था। ध्‍यान के कई प्रयोगों में से एक प्रयोग हम ‘’नाद ब्रह्मा’’ ध्‍यान का करते थे। ये ध्‍यान ओशो ने खास जोड़े के लिए बनाया था। आप चाहे तो इसे एकल में या युगल में भी कर सकते है। युगल में यह साधारण सा दिखने वाला ध्‍यान तंत्र प्रयोग है। मैं और मोहनी रात को इस ध्‍यान प्रयोग को करने लगें। रात कि शांति, एकांत और उसके साथ अंधकार। क्‍योंकि इस ध्‍यान प्रयोग के बाद आपको नींद जरूर आती है। इसलिए इसे रात को करो तो बेहतर होगा। हम दोनों पति-पत्‍नी निर्वस्त्र हो कर एक महीन चद्दर को ओढ़ कर ये ध्‍यान प्रयोग करते। कुछ ही दिनों में ये ध्‍यान अपना चमत्‍कार दिखाने लगा। वैसे भी हम पति-पत्‍नी प्रेम विवाह करने पर भी हमारे जीवन में सेक्‍स कोई महत्व नहीं रखता था। पर इतने पास घंटों निर्वस्त्र रहने के बाद भी हमारे पर सेक्‍स तो चढ़ता परंतु मदहोश मात्र करता बेहोश उत्तेजित नहीं करता था। हमें अच्‍छा भी बहुत लगाता लगता हम दोनों सहयोगी कहीं चल रहे हे। मील के पत्‍थर हमें बता रहे थे की हमारा सफर जारी है। परंतु कुछ जीवन में लगातार कुछ गहराता चला जा रहा था। एक नया आयाम, इस ध्यान में जब दो साधक अपने को एक दूसरे में विलय करता है, तो एक उर्जा का विलय होता है। शरीर पर ही नहीं मन और भाव की उर्जा एक दूसरे में विलय हो रही थी। एक अनूठा प्रेम हमारे जीवन में उतर रहा था। जिसकी हमें कोई अनुभूति नहीं थी। एक अनजाना सा रहस्य का द्वारा हमारे बीच खुल रहा था। हमारा प्रेम तो अति शुद्ध तो पहले से ही था। परंतु इस प्रेम को हमने पहले कभी नहीं जाना था। आप इस बात को गांठ बाँध लो की अधिक सेक्स या अधिक क्रोध करने से कभी मुक्त नहीं हो सकते। मोहनी की उर्जा से मेरी में उर्जा के साथ-साथ सेक्स का तूफान भी अधिक था। मोहनी और हमारा विवाह एक कुदरत का खेल है, न उसे प्रेम कहेंगे न संबंध। बस कुदरत ने हमें मिला दिया। और हम एक हो गए तब शायद हम नहीं जानते थे की हम क्यों मिले। परंतु ध्यान के बाद पता चला की हम क्यों एक दूसरे से मिले। भौतिक सुख और शारीरिक सुख की हम कल्पना जीवन में करते है। परमात्मा में हम उसके पार ला कर खड़ा कर दिया। हम एक दूसरे के लिए पूर्ण थे। जबकि मन की माने तो हम बिलकुल भिन्न थे। एक दूसरे की रूचि...आदि में कोई तालमेल नहीं था। मोहनी मुझे बताती है कि मेरी आंखों से सेक्‍स की उर्जा ऐसे बहती थी जैसे जलती चिंगारियां। चटाक-चटाक, शायद वह ठीक ही कहती हो। मेरे अंदर सेक्‍स का तूफान बहुत तेज था। पर मैं अपने पर कंट्रोल बहुत करता था। एक दम चरित्र का पक्का। या मुझे होश था एक अनजाने तोर पर। मुझे अपने पर बहुत भरोसा था। और आज तो मैं उस पहाड़ी पर चढ़ के उतंग आसमान में उड़ सकता हूं। मैंने सेक्‍स के पार के पंख देख लिये हे। जान गया हूं उस उड़ान को। धीरे-धीरे काफी लोग ध्यान करने आने लगे। ध्यान का एक माहौल एक उर्जा संग में बहुत सरलता से सजग हो उठती है। परंतु शर्त एक ही है बीच में कोई विराम न करे। ये सब चलता रहा। आप जैसे-जैसे अपने अंदर जाते है, तब बहार की उर्जा आपसे बह नहीं रही होती है, तब अचानक बहार की उर्जा आप में प्रवेश करने लग जाती है। जैसे साधक के जीवन में अचानक अंजान औरतें या पुरूष एक खिंचाव महसूस कर रहे होते है। जो द्वारा आप के लिए भाग्यशाली हो सकता है वही आपको डूबो भी सकता है। जैसे सेक्स हो या कृपणता। फिर इसके बाद गहराई मिली जब हम पति-पत्नी ने पूना से सन्यास लिया। संन्यास के बाद साधना की गति और आयाम दोनों ही बदल गए। हालांकि देखो तो कुछ भी नहीं बदला था। तब भी गुरु के प्रति प्रेम था, समर्पण था, परंतु शायद अकेले थे, गुरु के हाथ में हमने हाथ नहीं दिया होता। ध्यान के बाद सब लोग तो चले गये परंतु वो दूर से आये थे इस लिए शायद रूक गए। वैसे वो स्वामी जी तो कई-कई दिन रूक कर यहां कार्य ध्यान करते थे। एक मित्र जो पहले से ही हमारे यहां ध्यान करने आते थे। एक दिन जो की काफी दिनों बाद आये वह अपनी पत्नी को साथ ले कर आये। पत्नी को ध्यान का आ बा सा का पता नहीं था। हां धार्मिक थी। सरल थी। उसने भी उस दिन हम सब के साथ ध्यान किया परंतु घर जाने के बाद अपने पति को मना कर दिया की मैं उस घर अब कभी नहीं जाऊंगी। उसके पति को समझ नहीं आया की क्या हो गया। शायद अचानक ध्यान की गहराई पाकर वह भयभीत हो उठी हो। अकसर साधक को पहले ध्यान में बहुत विस्मयकारी अनुभूति होती है तो वह डर जाता है। कि ये क्या हो गया....वो लोग कुछ दिन हमारे यहां नहीं आये। करीब एक दो महीने। तब शायद ओशो जन्म दिन का उत्सव था। उन दिनों हम ओशो के चार उत्सव बड़ी धूम-धाम से ध्यान करते हुए मनाते थे। उस दिन काफी मित्र इकट्ठे हो जाते, उस दिन सार दिन ध्यान..भोजन सब वहीं होता था। रात वाईट रोब तक सब साथ ध्यान करते थे। जैसे आप आश्रम में जाते हो या घर पर ध्यान करते हो उस में यही तो भेद है की उस दिन आप एक उर्जा का स्तंभ बन जाता है। आप एक ऊंचे आसमान पर चले जाते हो। मेरा उन दिनों एकांत वास चल रहा मैं पिरामिंड में अकेला सोता था हालांकि वह अभी बना नहीं था। परंतु एक ढांचे का आकार उसने ले लिया था। न उसमें टाइल ही लगी थी और न ही फर्श ही हुआ था, नीचे एक पतली सी चटाई बिछा कर। अति साधारण तरह से बस एक पंखा लगा लिया था ताकि गर्मी न लगे। परंतु अपूर्ण बने पिरामिंड की उर्जा भी चमत्कारी ढंग से कार्य कर रही थी। ध्यान के बाद उन दिनों मुझ पर बांसुरी बजाने और सीखने का भूत सवार था। रात जब तक नींद न आ जाये, बंसरी बजाने की कोशिश करता रहता था। लेकिन उसमें एक आनंद था। संगीत कितना कम क्यों न आये व कम नहीं होती, और कितना ही अधिक आपको आ जाये वह अधिक नहीं होता। परमात्मा से थोड़े कम सूक्ष्म केवल सुर ही है। इसीलिए संगीत परमात्मा के अधिक से अधिक नजदीक है। मोहनी नीचे बच्‍चों के साथ सोती थी। पिरामिंड से जुड़े एक कमरे में उन पति-पत्‍नी के सोने का इंतजाम कर दिया था। उस रात भी ऐसा ही हुआ। कब बांसुरी मेरे हाथ से छुट गई और मैं सो गया। मैं रात चार घंटे की नींद ही लेता था। चार बजे उठ जाना होता था। क्योंकि हमारी दूध की दूकान थी जिस के लिए मुझे दूध लेने जाता होता था। अचानक रात को अंधेरे में मुझे लगा की कोई मेरे पास आकर अचानक खड़ा हो गया। वैसे पिरामिंड में अँधेरा बहुत गहरा होता है। परंतु अभी उसके दरवाजा नहीं लगा था इस लिए रोशनी छन-छन कर आ रही थी। मैंने अचरज से पूछा कि कौन हो? उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया। कि मैं हूं स्‍वामी जी। क्‍या में आपके पास सो सकती हूं। कुछ देर के लिए तो मुझे समझ में नहीं आया की ये सत्य है या मेरी वासना मुझे स्वप्न दिखा रही है। क्‍योंकि उसकी उम्र की तो मेरी लड़की के बराबर है। अभी तक मैं उसके बारे में कुछ जानता भी नहीं था। मात्र दो बार वह ध्यान के लिए यहां आई है। इतना साहस कोई कैसे कर सकता है कोई। ठीक दरवाजा खोलते ही उनके पति सो रहे है। ऐसा काम तो कोई चरित्र हीन भी नहीं कर सकती। और शायद चरित्र हीन तो कर ही नहीं सकती। क्‍योंकि उसने तो अपने शुभ्र को दिखलाना है। इस लिए अपने अंधेरे के ऊपर एक श्वेत परत ओढ़े रखना चाहता है। परंतु सच तो यह था की वह अपनी पति से आज्ञा लेकर मेरे पास आई थी। मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे अंदर एक उथल पुथल शुरू हो गई। खुशी और भय एक साथ मेरे सामने आ जा रहा था। पर मैंने उसे मना नहीं किया और अपनी बगल में बिस्तरे को खाली कर थोडा सरक गया। वह बिस्तरे में अकार मेरे सीने से चिपट कर लेट गई। एक जवान लड़की, और रात का अँधेरा। और वह खुद तुम्हें समर्पण कर रही है। मेरे अंदर वासना का एक झंझावात शुरू हो गया। मेरा पूरा तन मन सेक्‍स के उत्ताप से जलने लगा। सेक्‍स की उठती लहरों को में अपनी और आते देख रहा था, महसूस कर रहा था। मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर रख लिए और उसके सर और पीठ को धीरे-धीरे सहलाने लगा। वह और सिकुड़ कर मुझ में समा गई। लहरे धीरे-धीरे तूफान का रूप लेने लगी। मन नाना प्रकार के ताने-बाने बूनने लगा। पर मैं उस सब को उठते हुए देखता रहा। अपने पर काबू भी नहीं कर रहा था। और नहीं उसे मैंने रोका ही चाहा। मेरा पूरा शरीर आग का शोला होता जा रहा था। जैसे किसी अँगीठी में डली लोहे की छड़। मेरा तन ज्वर से जलने लगा। परंतु एक बात जो बचपन से मेरे संग थी बचपन से ही मेरा खेल-कूद लडकियां अधिक था। उन दिनों लड़के लडकियां अलग खेलते थे। परंतु लड़कियां मेरे साथ खेलना पसंद करती है। सच कृष्ण की बाल लीलाए उनकी साधाना का अंग रही होंगी। जिसने उनके मार्ग को अति सरल बना दिया। मैं उस में बह रहा था पर जब मैं उस ज्वाला को देख भी रहा था। अचानक उसमें एक मधुर शीतलता की पतली परत भी साथ दिखाई दी। इसी पतली सी किरण ने ही मेरे नये और अंजान मार्ग को खोल दिया। एक अजीब सी जलन जो गर्मी के साथ ठंडक भी अपने साथ लिए थी। हां उसमें जलन कहीं ज्‍यादा थी और शांति का झोंका कुछ क्षण कि लिए तब आती जब में उसे केवल अपने उपर होते देखता रहा होता। जैसे-जैसे वह तूफान मेरे उपर आता गया, साथ ही साथ मैं उसे आपने उपर आते किसी अंजान से भार महसूस कर रहा था। जब आपका होश बढ़ता है तो उसके कारण आपकी शरीर से आपकी दूरी बनानी शुरू हो जाती है। मैंने कर किनारे खड़ा होकर उसे देखता रहा। वह उत्ताप लगातार बढ़ रहा था। वह उर्जा अब मेरे सेक्स केंद्र पर न ठहर कर पूरे शरीर पर फैलती जा रह है। मानों मेरा पूरा शरीर ही सेक्स केंद्र हो गया हो। मेरा पूरा शरीर ही जननेंद्री बनता जा था। ये एक अजीब सा अनुभव है जिसे हम जीवन में कभी नहीं देख सकते क्योंकि उस किनारे तक हम कभी जाते ही नहीं। हम उस स्थिति में कभी नहीं आने देते है, जब हमारे उपर सेक्स चढ़ता है, तो उसे धूल की भांति एक बोझ समझ कर जल्दी से जल्दी गिरा देना चाहते है। परंतु अगर इसके पार जाना है। तो इस अपने शरीर पर चढ़ने एक घंटा दो घंटा अपने सहयोगी....को प्रेम से छुओ, उसे महसूस करो। एक दूसरे में बहो....जितना अधिक ...लम्बे समय तक आप इस प्रयोग में रहेंगे। उतनी ही उर्जा आपके काम केंद्र पर एकत्रित होती रहेगी। जैसे एक गुब्बारे में हवा भरी जा रही हे। फिर आप अगर हो सके तो बिना सेक्स किये प्रेम से एक दूसरे का सान्निध्य प्राप्त कर के सो जाये। आप जानते है जो उर्जा आपने जगा दि अब कहां जायेगी। वह उपर के केंद्रों पर। यह केवल पुरूष या स्त्री साधक दोनों के लिए ही समान है। सेक्स न उठना महान्ता नहीं है। आपने किसी हिजड़े को कभी बुद्ध होते देखा है वहां काम उर्जा है ही नहीं। वह अमृत भी है जहर भी है। यहीं उस दिन मेरे साथ हुआ। शायद प्रकृति का कोई नियोजित कार्य क्रम था। जो मेरा सहयोग कर रही था। उस स्थिति को बनाने में मेरा अपना कोई हाथ या मन नहीं था। और न ही मैं इस के लिए तैयार ही था। पर थी कोई शक्ति जो मुझे सहयोग दे रही थी। काम केंद्र पूरे तनाव पर था। पर न जाने कौन सी शक्ति थी जो मुझे बहाए लिए जा रहा था मुझे संप्रेषित कर रहा था कि इस में मत डुबो इसे केवल देखो । ये विचार मेरे मन में कही और से आ रहा था। ये मुझे साफ दिखाई रहा था। ये मेरी कामना नहीं थी। मुझे कोई शक्ति मार्ग दिखा कर रही थी। मैं एक सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। लगता था। अभी जला की तभी जला। मेरे पूरे जीवन में ऐसा उत्ताप्त कभी नहीं देखा था। वो एक सैलाब था। मेरी मां मेरे बारे में बड़े गर्व से एक बात कहां करती थी। कि मेरे बेटे को तुम बो भी दोगे तो उगेगा नहीं। अब वो अपने कौन से अनुभव के आधार पर कहती थी। इस के बारे में मुझे उस रात पता चला। उसने जरूर मुझमें मेरे दूसरे भाई बहन से कुछ तो अलग देखा या जाना होगा। शायद एक मां अपने प्रत्‍येक बच्चे के चरित्र और उसकी गहराई को जरूर जानती है। और ठीक वही हुआ। मेरी तेज साँसे धीरे-धीरे शांत होने लगी। मेरी गुप्त इन्द्रियों पर तनाव तो उतना ही रहा। पर मेरे होश से लगा तर देखने के कारण। उस पर फैली जलन छोटी होने लगा। और अंदर की तरफ सुड़कने लगी। जलन जो पूरे अंग पर फैली थी। वह केन्द्रीय और घनीभूत हो रही थी। और गुप्त अंग पर ही नहीं उसे आस पास एक शीतला फेल रही थी। धीरे-धीरे स्वास इतनी मध्यम हो गई की कभी तो ऐसा लगता की मैं मर गया हूं। शरीर से मेरी दूरी बहुत दूर हो गई। शरीर का हिलना डुलना बंद हो गया। मेरे हाथ पैर जैसे और जिस जगह रह पर थे मैं उन्हें हिला नहीं पा रहा था। मैं कई बार उन्‍हें हिलाने की कोशिश की। पर मैं कामयाब नहीं हुआ। में कहीं गहरे में डूबता चला जा रहा था। कभी-कभी मुझे भय भी लगता था। की कहीं मैं मर तो नहीं रहा हूं। परंतु मैं डरा नहीं अपने को खुला छोड़ दिया। मेरी स्वास कहीं दूर चलती हुई महसूस हो रही थी। मुझे पहली बार शरीर की निर्भरता का एहसास हुआ। हमारी चेतना का शरीर से चिपकने के कारण कितना भारी पन लगता। एक हल्के पन का एहसास हो रहा था। लगता था मुझे पंख लग गये। मैं उड़ सकता हूं। मैं डूबता चला गया। पर मैंने एक अनुभव और पाया। जैसे ही मेरी सांस मंद होती है या कभी-कभी बंद होती है। तो विचार भी उसी गति में कम या बंद हो जाते है। मन पर सदा चलते विचारों का एक रेला ही जाना था जीवन में। पर आज में उस मन की सड़क को कभी-कभार भी सुनसान दिखाई दे रही थी। कैसा लग रहा था, मुंह में एक मधुरता फैल गई। एक अजीब सी सुगंध जो इस लोक की नहीं थी। वो मेरे शरीर से फूटने लगी। जिसे में महसूस कर पर रहा था। ये मेरा भ्रम नहीं था। एक हकीकत थी। उसी अवस्था में कितनी देर रहा कह नहीं सकता। शायद शांति और मधुरता में डूब कर मैं सो गया। ठीक चार बजे मेरी आँख खुली तब मुझ पता चला की मेरे साथ कोई सो रहा था, वह गहरी नींद में सो रही थी। उस कुछ भी भान नहीं था। न ही उसने कुछ सहयोग किया था। केवल उसने अपने को छोड़ दिया था...यहां आकर....उसके चेहरे पर एक मधुरता-एक सौम्यता फैली हुई थी। मैंने झूक कर उसके चरणों में अपने सर को रख दिया। और अपने को धन्य समझा। मुझे जीवन में एक ऐसी अनुभूति हुई है। जो जीवन की सबसे कीमती है। बस उस दिन के बाद से मुझ किमिया मिल गई। कि मैं कितने बड़े ओर गहरे सागर में भी डूब नहीं सकता तैरना आ गया। फिर ये प्रयोग हम पति-पत्नी ने भी किये...लगाता। एक दूसरे का सहयोग किया। कम प्रकाश में मधुर संगीत में घंटों नृत्य करते। तेज नृत्य आप में एक उत्तेजना पैदा करता है। कल्ब में यहीं तो होता है, ध्यान के सुरमई मधुर संगीत चाहिए...ओशो की एक कैसट है, इनटुयुशन। वह एक जापानी लड़की की बजाई बांसुरी है। हमें किरण मिल गई थी मार्ग दिखने लगता था सो आसान और आसान होता चला जा रहा है। ओशो के ध्यान संगीत बहुत कीमती है। और ओशो के सन्यास के तो क्या कहने। ‘’उतरो कामवासना में, लेकिन ऐसी श्रद्धा से स्‍त्री का संग करो कि स्‍त्री देवी जैसी ही हो; यह कामुकता नहीं होती। और उस आदमी को जो की स्‍त्री के संग होता है, उसकी पूजा करनी होती है, उसके पाँव छूने होते है। और यदि हल्की सी भी कामवासना उठने लगती है। तो वह अयोग्य हो जाता है; तो वह अभी इसके लिए तैयार नहीं है। यह एक बड़ी तैयारी थी—कठिन परीक्षा थी जो कि कभी निर्मित की गई मनुष्‍य के लिए। कोई आकांक्षा नहीं कोई वासना नहीं,उसे स्‍त्री के प्रति ऐसी भाव दशा रखनी पड़ती जैसे कि वह उसकी मां हो। (ओशो......पतंजलि: योग-सूत्र—3) मनसा-मोहनी दसघरा ओशोबा हाऊस नई दिल्ली

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16 सिद्धियाँ विवरण

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1. वाक् सिद्धि : - 👇

जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप अरु वरदान देने की क्षमता होती हैं.

 2. दिव्य दृष्टि सिद्धि:-👇

 दिव्यदृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये, आगे क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्यदृष्टियुक्त महापुरुष बन जाता हैं.

3. प्रज्ञा सिद्धि : -👇

प्रज्ञा का तात्पर्य यह हें की मेधा अर्थात स्मरणशक्ति, बुद्धि, ज्ञान इत्यादि! ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेता हें वह प्रज्ञावान कहलाता हें! जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ भीतर एक चेतनापुंज जाग्रत रहता हें.

 4. दूरश्रवण सिद्धि :-👇

 इसका तात्पर्य यह हैं की भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता.

 5. जलगमन सिद्धि:-👇

 यह सिद्धि निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं, इस सिद्धि को प्राप्त योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो.

 6. वायुगमन  सिद्धि :-👇

इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल जा सकता हैं.

 7. अदृश्यकरण सिद्धि:-👇

 अपने स्थूलशरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित कर अपने आप को अदृश्य कर देना! जिससे स्वयं की इच्छा बिना दूसरा उसे देख ही नहीं पाता हैं.

 8. विषोका सिद्धि :-👇

 इसका तात्पर्य हैं कि अनेक रूपों में अपने आपको परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैं, दूसरे स्थान पर अलग रूप हैं.

 9. देवक्रियानुदर्शन सिद्धि :-👇

 इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं! उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता हैं.

10. कायाकल्प सिद्धि:-👇

 कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन! समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती हैं, लेकिन कायाकल्प कला से युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और यौवनवान ही बना रहता हैं.

11. सम्मोहन सिद्धि :-👇

 सम्मोहन का तात्पर्य हैं कि सभी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया! इस कला को पूर्ण व्यक्ति मनुष्य तो क्या, पशु-पक्षी, प्रकृति को भी अपने अनुकूल बना लेता हैं.

 12. गुरुत्व सिद्धि:-👇

 गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान! जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता हैं! और भगवन कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया हैं.

 13. पूर्ण पुरुषत्व सिद्धि:-👇

 इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना! श्रीकृष्ण में यह गुण बाल्यकाल से ही विद्यमान था! जिस के कारन से उन्होंने ब्रजभूमि में राक्षसों का संहार किया! तदनंतर कंस का संहार करते हुए पुरे जीवन शत्रुओं का संहार कर आर्यभूमि में पुनः धर्म की स्थापना की.

 14. सर्वगुण संपन्न सिद्धि:-👇

  जितने भी संसार में उदात्त गुण होते हैं, सभी कुछ उस व्यक्ति में समाहित होते हैं, जैसे – दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि! इन्हीं गुणों के कारण वह सारे विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता हैं, और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता हैं.

 15. इच्छा मृत्यु सिद्धि :-👇

 इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति कालजयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता हैं.

16. अनुर्मि सिद्धि:-👇

 अनुर्मि का अर्थ हैं. जिस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावना का कोई प्रभाव न हो.sabhar dev sharma Facebook wall
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सोमवार, 2 अगस्त 2021

विज्ञानमय कोष की साधना

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{{{ॐ}}}

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अन्नादि कोष को पार करके जब साधक विज्ञानमय कोष मे पहुँचता है । 
तब जीव आत्मा एवं ब्रह्म का भेद समझ जाता है ।a गीता मे श्री कृष्ण ने कहा कि जीव जब सोते है तब योगी जागता है जब जीव जागते है तब योगी सोता है अर्थात योगी की भूमिका जगत क्रिया एवं मोहादि से परे है। वरूण ने भृगु को उद्दालक को श्वेतकेतु ने ब्रह्मा ने इन्द्र को अंगिरा ने विस्वान को तप( कर्म= क्रिया) करने को कहा है ।
इच्छा कि परिणति क्रिया क्रिया की परिणति ज्ञान होता है अतः तप करने से ही ज्ञान कि प्राप्ति होती है।
 आत्मसाक्षात्कार के लिए चार सुलभ साधना सें

१, #सोहं_साधना      २, #आत्ममानुभूति  ३, #स्वर_साधना 

४, #ग्रंन्थिभेद
                                                  १, #सोहंसाधना

सोहं साधना मे तीनो महाकारण शरीर एक हो जाते है:--
प्रात काल पूर्व कि ओर मुह करके, मेरूदण्ड को सीधा रखकर दोनों हाथों को समेट कर अपनी गोद मे रखे एवं नेत्र बन्द करे। अब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे तब सुक्ष्म कर्णेन्द्रिय सजग करके ध्यान पूर्वक अवलोकन करे कि वायु के साथ साथ "सो" की सुक्ष्म ध्वनि हो रही है ।s सांस जब रूके तक "अ" तथा वायु निकलते वक्त "हं" कि ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित करे।
इसके साथ ही  ह्रदय स्थित सुर्यचक्र ये प्रकाश बिन्दु मे आत्मा के तेजामय स्फुलिंग की भावना करे ।
जब सांस भीतर hजायें तब "सो" की ध्वनि कि अनुभव करे  यह तेज बिन्दू परमात्मा का प्रकाश है सांस रूकने पर"अ" की भावना करे ओर बहार सांस निकलते समय "हं"  कि ध्वनि अर्थात मै हुआ की भावना करे।
"सो" ब्रह्म या प्रतिबिंब है "अ" प्रकृति का और "हं" जीव का प्रतीक है।
इस "सोहं" का प्रत्येक सांस को आवागमन  पर ध्यान करने से जीव मुक्त हो जाता है ।
 
सोहं लोम विलोम साधना-- सोहं का विलोम "हंस" है "हंसः" विशुद्ध परमात्व तत्त्व है।
सांस लेते समय " सोहं" एवं छोड़े समय "हंस" की भावना करने से परमात्मा तत्त्व शीघ्र प्राप्त होता है ।
                                                        #आत्मानुभूति

आसन लगा कर बैठे अंदर की हवा को बाहर निकाले फिर पूरी हवा फेफड़ों मे भरे।३-४ लम्बे सांस लेवें एवं अपने हाथ पांव शरीर को शिथिल करे मन को विचार शुन्य करे भावना करे कि शरीर को अंदर नीला आकाश व्याप्त हो रहा है । 
शरीर शिथिल होने जाने पर ह्रदय स्थल मे अंगुठे ये बराबर ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करेo। मै अजर अमर ईश्वरीय अंश इसी रूप मे शुद्ध आत्मा हुं।उस ज्योति की कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुवे मन मे भावना बनाये रखें । अखिल आकाश मे नीलवर्ण  के आकाश  मे बहुत ऊपर सुर्य को समान ज्योतिस्वरूप आत्मा अवस्थित करें। kअपने निष्पन्द शरीर को देखिये एवं भावना करे कि शरीर के अंग प्रत्यंग के कार्य भाव विचार मेरे मन के आधीन है एवं मन पर विजय मैंने प्राप्त करती है ।
अपने आपको आकाश नें सुर्यमण्डल मे अवस्थितमाने एवं भावना करे कि मै समस्त संसार भूमण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेक रहा हुँ

अशोक वशिष्ठ जी

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