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शनिवार, 21 मई 2022

ओशो विचार

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 ओशो विचार (45)


(1) 0sh0 - नर्क एक दुख का सपना है और स्वर्ग एक सुख का सपना है लेकिन दोनों ही सपना मात्र हैं। 

(2) 0sh0 - शान्ति और अशान्ति हमारे लिए द्वन्द है लेकिन सिद्ध पुरुष के लिए मुक्ति है। 

(3) 0sh0 - जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता, जिसका आचरण ब्रह्म जैसा हो जाए वही ब्राह्मण है। 

(4) 0sh0 - सिद्ध के लिए सिद्धावस्था का प्रारंभ तो है पर अन्त नहीं है, सिद्धावस्था में समय नहीं 

(5) 0sh0 - प्रशनों का उत्तर नहीं खोजना है लेकिन सारे प्रशन गिर जाएं ऐसी चित्त की दशा खोजनी है। 

(6) 0sh0 - मृत्यु शरीर मोह का परिणाम है, अमरत्व का बोध शरीर मुक्ति का परिणाम है। 

(7) 0sh0 - पहले अपने भीतर के सोने को खोज लो फिर उसे साधना की अग्नि में शुद्ध करो। 

(8)0sh0 - जब तक जीवन है तब तक दुख रहेगा, यदि दुख से मुक्ति पानी हो तो दुख को स्वीकार कर लो। .                                                         (9) 0sh0 - जिस आदत को बदलना हो उसे स्वीकार कर लो, ध्यान ना देने से आदतें छूट जाती हैं।                                                         (10) 0sh0 - पाप और पुन्य कृत्य में नही होते, पाप और पुन्य कृत्य के पीछे के हेतु में होते हैं। 

Collected by Sw.Ramesh Bharti (45)

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गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

होलोग्राफिक तकनीक द्वारा अंतरिक्ष की यात्रा

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  लंदन: यह फिल्म स्टार ट्रेक के एक दृश्य की तरह लग सकता है, लेकिन नासा के एक डॉक्टर और उनकी टीम पृथ्वी से अंतरिक्ष में 'होलोपोर्टेड' होने वाले पहले इंसान बन गए हैं. फ्लाइट सर्जन डॉ जोसेफ श्मिड ने अचानक खुद को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) के बीच में बीमित पाया, जहां वह दो-तरफा बातचीत का आनंद लेने में सक्षम थे और यहां तक ​​​​कि फ्रांसीसी अंतरिक्ष यात्री थॉमस पेस्केट के साथ हाथ मिलाने में भी सक्षम थे.

      नासा ने खुलासा किया है कि कैसे होलोग्राफिक डॉक्टर नेअंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन' का दौरा किया. फ्लाइट सर्जन जोसेफ श्मिड पृथ्वी से अंतरिक्ष में पहुंचने वाले पहले मानव 'होलोपोर्टेड' थे. डॉ श्मिड ने बताया कि होलोपोर्टेशन एक प्रकार की तकनीक है जो लोगों के उच्च-गुणवत्ता वाले 3D मॉडल को वास्तविक समय में कहीं भी फिर से संगठित, संपीड़ित और प्रसारित करने की अनुमति देती है. इस प्रयोग के लिए नासा ने कस्टम सॉफ़्टवेयर के साथ Microsoft Hololens Kinect कैमरा और कंप्यूटर का उपयोग किया. 

 पहली बार इस तकनीक का इतनी दूरी पर प्रयोग

माइक्रोसाफ्ट के होलोलेंस जैसे मिश्रित रियलिटी डिस्प्ले के साथ संयुक्त होने पर, यह उपयोगकर्ताओं को 3D में दूरस्थ प्रतिभागियों को देखने, सुनने और बातचीत करने की अनुमति देता है जैसे कि वे वास्तव में एक ही भौतिक स्थान में मौजूद हों. माइक्रोसाफ्ट की ओर से 2016 से होलोपोर्टेशन का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन यह पहली बार है जब प्रौद्योगिकी को अंतरिक्ष जैसे चरम और दूरस्थ वातावरण में तैनात किया गया है.

मानव संचार का नया तरीका

डॉ श्मिड ने कहा, 'यह विशाल दूरी पर मानव संचार का पूरी तरह से नया तरीका है. 'इसके अलावा, यह मानव अन्वेषण का एक नया तरीका है, जहां हमारी मानव इकाई ग्रह से यात्रा करने में सक्षम है. हमारा भौतिक शरीर वहां नहीं है, लेकिन हमारा मानव अस्तित्व बिल्कुल है. 'इससे ​​कोई फर्क नहीं पड़ता कि अंतरिक्ष स्टेशन 17,500 मील प्रति घंटे की यात्रा कर रहा है और पृथ्वी से 250 मील ऊपर कक्षा में निरंतर गति में है. नासा ने कहा कि कोविड महामारी के लगभग दो वर्षों के दौरान, 'टेलीमेडिसिन का विकास और लोगों तक पहुंचने के नए तरीके बदल गए और विकसित हुए'.sabhar znews. Com

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मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

आत्मा की यात्रा

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 आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो मनुष्य को पहले ही पता चल जाता है,,ऐसे में वह स्वयं भी हथियार डाल देता है अन्यथा उसने आत्मा को शरीर में बनाए रखने का भरसक प्रयत्न किया होता है और इस चक्कर में कष्ट झेला होता है ।


अब उसके सामने उसके सारे जीवन की यात्रा चल-चित्र की तरह चल रही होती है । उधर आत्मा शरीर से निकलने की तैयारी कर रही होती है इसलिए शरीर के पांच प्राण  एक धनंजय प्राण को छोड़कर शरीर से बाहर निकलना आरंभ कर देते है।


यह प्राण आत्मा से पहले बाहर निकलकर आत्मा के लिए सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जो कि शरीर छोड़ने के बाद आत्मा का वाहन होता है ।धनंजय प्राण पर सवार होकर आत्मा शरीर से निकलकर इसी सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है ।


बहरहाल अभी आत्मा शरीर में ही होती है और दूसरे प्राण धीरे-धीरे शरीर से बाहर निकल रहे होते हैं कि व्यक्ति को पता चल जाता है ।


उसे बेचैनी होने लगती है,, घबराहट होने लगती है सारा शरीर फटने लगता है,,खून की गति धीमी होने लगती है सांस उखड़ने लगती है बाहर के द्वार बंद होने लगते हैं ।


अर्थात अब चेतना लुप्त होने लगती है और मूर्छा आने लगती है चेतन ही आत्मा के होने का संकेत है और जब आत्मा ही शरीर छोड़ने को तैयार है - तो चेतना को तो जाना ही है और वह मूर्छित होने लगता है ।


बुद्धि समाप्त हो जाती है और किसी अनजाने लोक में प्रवेश की अनुभूति होने लगती है यह चौथा आयाम होता है 


फिर मूर्छा आ जाती है और आत्मा एक झटके से किसी भी खुली हुई इंद्रिय से बाहर निकल जाती है इसी समय चेहरा विकृत हो जाता है यही आत्मा के शरीर छोड़ देने का मुख्य चिन्ह होता है ।


 शरीर छोड़ने से पहले केवल कुछ पलों के लिए आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत-प्रतिशत प्रतिशत सजीव करती है ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध ना रहे और फिर उसी समय आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत प्रतिशत सजीव करती है ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध ना रहे और फिर उसी समय आत्मा निकल जाती है और शरीर खाली मकान की तरह निर्जीव रह जाता है ।

इससे पहले घर के आसपास कुत्ते बिल्ली के रोने की आवाज आती हैं इन पशुओं की आंखें अत्यधिक चमकीली होती है जिससे यह रात के अंधेरे में तो क्या सूक्ष्म शरीर धारी आत्मा को भी देख लेते हैं।


जब किसी व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार होती है तो उसके अपने सगे-संबंधी जो मृत आत्माओं के रूप में होते हैं उसे लेने आते हैं और व्यक्ति उन्हें यमदूत समझता है और कुत्ते बिल्ली उन्हें साधारण जीवित मनुष्य ही समझते हैं । और अनजान होने की वजह से उन्हें देख कर रोते हैं और कभी-कभी भोंकते भी हैं ।


शरीर के पांच प्रकार के प्राण बाहर निकल कर उसी तरह सूक्ष्म शरीर का निर्माण करते हैं जैसे गर्भ में स्थूल शरीर का निर्माण क्रम से होता है।


सूक्ष्म शरीर का निर्माण होते ही आत्मा अपने मूल वाहक धनंजय प्राण के द्वारा बड़े वेग से निकलकर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाती है ।आत्मा शरीर के जिस अंग से निकलती है उसे खोलती व तोड़ती हुई निकलती है ।जो लोग भयंकर पापी होते हैं उनकी आत्मा मूत्र या मल मार्ग से निकलती है,,जो पापी भी हैं और पुण्यात्मा भी हैं उनकी आत्मा मुख से निकलती है,,जो पापी कम और पुण्यात्मा अधिक हैं उनकी आत्मा नेत्रों से निकलती है,, और जो पूर्ण धर्मनिष्ठ हैं पुण्यात्मा और योगी पुरुष हैं उनकी आत्मा ब्रह्मरंध्र से निकलती है 


अब तक शरीर से बाहर सूक्ष्म शरीर का निर्माण हुआ रहता है लेकिन यह सभी का नहीं हुआ रहता जो लोग अपने जीवन में ही मोह-माया से मुक्त हो चुके योगी पुरुष हैं उन्हीं के लिए तुरंत सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है। अन्यथा जो लोग मोह माया से ग्रस्त हैं परंतु बुद्धिमान हैं ज्ञान विज्ञान से अथवा पांडित्य से युक्त हैं ऐसे लोगों के लिए 13दिनों में सूक्ष्म शरीर का निर्माण हो पाता है।


हिंदू धर्म में शास्त्रों में 10 गात्र का श्राद्ध और अंतिम दिन मृतक का श्राद्ध करने का विधान इसलिए है कि 10 दिनों में शरीर के 10 अंगो का निर्माण इस विधान से पूर्ण हो जाए और आत्मा को सूक्ष्म शरीर मिल जाय ।

ऐसे में जब तक दसगत्र का श्राद्ध पूर्ण नहीं होता और सूक्ष्म शरीर तैयार नहीं हो जाता आत्मा प्रेत शरीर में निवास करती है।

अगर किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाता है तो आत्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है ।

एक और बात, आत्मा के शरीर छोड़ते समय व्यक्ति को पानी की बहुत प्यास लगती है । शरीर से प्राण निकलते समय कंठ सूखने लगता है ह्रदय सूखता जाता है और इसे नाभि जलने लगती है । लेकिन कंठ अवरुद्ध होने से पानी पिया नहीं जाता और ऐसी स्थिति में आत्मा शरीर छोड़ देती है ।प्यास अधूरी रह जाती है इसलिए अंतिम समय में मुख्य में गंगा जल डालने का विधान है।


इसके बाद आत्मा का अगला पड़ाव होता है "शमशान का पीपल"यहां आत्मा के लिए 'यमघंट' बंधा होता है जिसमें पानी होता है यहां प्यासी आत्मा यमघंट से पानी पीती हैं,,जो उसके लिए अमृ-त्तुल्य होता है । इस पानी से आत्मा तृप्ति का अनुभव करती है ।


 हिंदू धर्म शास्त्रों में विधान है कि मृतक के लिए यह सब करना होता है ताकि उसकी आत्मा को शांति मिले अगर किसी कारणवश मृतक का दस गात्र का श्राद्ध ना हो सके और उसके लिए!! पीपल पर यमघंट भी ना बांधा जा सके तो उसकी आत्मा प्रेत योनि में चली जाएगी और फिर कब वहां से उसकी मुक्ति होगी कहना कठिन होगा ।

सदगुरुदेव भगवान के चरणों में दण्डवत  नमन....


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शुक्रवार, 11 मार्च 2022

बायोइंजीनियरिंग के क्षेत्र में भारत लाया है क्रांति, दुनिया को उपहार स्वरूप दिया ‘Liquid Cornea’

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 लिक्विड कॉर्निया आविष्कार : भारत आविष्कारों और विविध नवाचारों का देश है। अपने दक्ष युवा शक्ति और कुशल कर्मचारियों एवं वैज्ञानिकों के बल पर भारत तकनीक प्रौद्योगिकी और विज्ञान के क्षेत्र में नित नए प्रयोग करते रहता है। इन प्रयोगों में मिलने वाले सफलताओं और असफलताओं की खुशियों और झंझावातों को झेलते हुए एक कर्मयोगी की भांति भारत अनवरत रूप से विश्व निर्माण की प्रक्रिया में लीन रहता है। इसी क्रम में भारत ने पुनः एक नया आविष्कार कर पूरे विश्व को उपकृत किया है।

आंखें इंसान को मिली ईश्वर की अनुपम भेंट है। सभी ज्ञानेंद्रियों में आपकी आंखें सर्वोत्तम हैं, इसके बिना सब सूना-सूना है, देव दर्शन भी अधूरा है। विश्व में हर साल लाखों लोगों को अपनी दृष्टि संबंधी समस्या के निवारण हेतु कॉर्निया की आवश्यकता होती है। इन जरूरतमंदों में भारत के भी दो से तीन लाख लोग निरंतर अस्पतालों के चक्कर काटते रहते हैं। चक्षु दृष्टि रहित हो और ऐसी स्थिति में अस्पतालों का चक्कर काटना काफी पीड़ादायी है, लेकिन उससे भी भयावह है रोशनी मिलने की उम्मीद का टूटना।

पूर्व में आंखों की रोशनी प्राप्त करने का एकमात्र उपाय पूर्ण रूप से नेत्र प्रत्यारोपण था। आप सभी जानते हैं कि अंगदान को लेकर भारत में प्रचलन बहुत कम है और इस कारण से किसी भी सामान्य व्यक्ति को नेत्रदान के माध्यम से नेत्र प्रत्यारोपण कराना काफी असंभव सा कार्य था। ऊपर से इस पूरी प्रक्रिया में इतना खर्च व्यय होता था कि उसका वहन करना एक सामान्य आदमी के लिए दुष्कर था। तब भारत ने पूरे विश्व के नेत्र को प्रकाशित कर तमस रहित बनाने का बीड़ा उठाया और अपने इस दुर्धुष प्रयास में भारत सफल भी हुआ है।

तैयार हो गया है कॉर्निया का ब्लू प्रिंट

Organovo, Tissium,  Carmat,  Syncardia, जैसे पूरे देश-विदेश में कई ऐसे नवाचार है, जो रिजेनरेटिव तकनीक पर काम कर रहे हैं। इन  सभी नवाचारों का मूल उद्देश्य तकनीक के माध्यम से क्षतिग्रस्त  अंगों में पुनः प्राकृतिक कोशिकाओं के निर्माण प्रक्रिया को प्रारंभ करना है। उदाहरण हेतु हमारा लिवर कुछ परिस्थितियों जैसे- कर्क  रोग में स्वयं से कोशिकाओं का निर्माण करने में सक्षम होता है। भारतीय स्टार्टअप “The Pandorum” के सीईओ अरुण चन्द्र भी अपने इस नवाचार का आधार इसी प्रक्रिया को बताते है। डॉक्टर सांगवान भी “The Pandorum” से जुड़े हुए हैं, उनकी कोशिश ऐसी ही बायो इंजीनियरिंग के माध्यम से कॉर्निया का निर्माण करना है जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के स्वानिर्माण में सक्षम हो। बायो प्रिंटिंग तकनीक के माध्यम से ऐसे कॉर्निया का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया गया है।

इस महान उद्देश्य में दिल्ली के दरियागंज स्थित ‘Dr Shroff charity eye hospital’ ने सांगवान और “The Pandorum”  का साथ दिया है। दोनों संस्थानों ने मिलकर लिक्विड कॉर्निया (Liquid Cornea) के प्रोटोटाइप का निर्माण कर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया है। Dr shroff charity eye hospital का  निर्माण 1917 में किया गया था और “The Pandorum” ने इसी संस्थान से चिकित्सीय आधारभूत संरचना और शोध में मदद मांगी थी। डॉक्टर सांगवान के नेतृत्व में Shroff-Pandorum cornea regeneration टीम का गठन किया गया, जिसने लिक्विड कॉर्निया (Liquid Cornea) बनाने में अशातीत सफलता हासिल की। यह Gel और पॉलीमर के बेहतरीन संयोग से बनी है और कॉर्नियल कोशिका के विकास में अप्रत्याशित मदद करती है, जिसके कारण पूरे नेत्र और कॉर्निया प्रत्यारोपण की जगह मात्र क्षतिग्रस्त कोशिका के प्रत्यारोपण से काम बन जाता है। जानवरों पर इसका प्रयोग सफल रहा है और अब 2022 तक इसका परीक्षण इंसानों पर किया जाएगा।

देश में 11 लाख लोग दृष्टि बाधित हैं

नेत्रदान और नेत्र प्रत्यारोपण दोनों की प्रक्रिया काफी जटिल और कठिन है। मृत्यु पश्चात अगर नेत्रदान त्वरित और एक समय सीमा के अंदर ना हो तो वह व्यर्थ हो जाता है। नेत्रदान में चिकित्सक आपकी आंखों के ऊपरी परत को ही निकालते हैं, जिसे हम कॉर्निया कहते हैं। आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया (EBAI) के अनुसार हमारे देश में 11 लाख लोग दृष्टि बाधित हैं।

1,00,000 लोगों को हर साल नेत्र प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ती है, जबकि हमारी स्वास्थ्य और चिकित्सीय व्यवस्था सिर्फ 25,000 लोगों की जरूरतों को ही पूरा कर पाती है। महामारी ने परिस्थितियों को और भी बदतर कर दिया है। अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के एक साल के दौरान पूरे देश में 12,998 प्रत्यारोपण ही संभव हो सकें, जो कि औसतन 52 प्रतिशत कम है लेकिन अब इस बड़ी खोज से हालात पहले से बेहतर होंगे, इसकी उम्मीद लगाई जा रही है।

चाहे कोरोना हो या फिर कोई और आपदा हिंदुस्तान मानवता के लिए सर्वदा खड़ा रहा है। यह आविष्कार भारत के प्रयासों का सूचक है और भारत के गौरव का विषय है। धन्य है ‘सांगवान’ और ‘धरती के भगवान’ जो इस पुनीत कार्य के संवाहक है।

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गुरुवार, 10 मार्च 2022

कुण्डलिनी शक्ति एक खोज अंतर यात्रा की भाग

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सहजबोध को मेघा बुद्धि ( तर्क-वितर्क) के साथ नही जोडना चाहिए क्योंकि मेधा का अवलोकन कभी सही और कभी गलत हो सकता है। मगर सहजबोध का अवलोकन सर्वदा सही ही होंगा।

    

प्रत्येक व्यक्ति को कार्य शक्ति प्राप्त करने के लिए चालीस हजार प्रोटींस की आवश्यकता होती है। नित्य सुबह-शाम क्रियायोग कर हम इन प्रोटींस मे वृद्धि कर सकते है एवम वृद्धावस्था और व्याधियों का भी निवारण कर सकते है।


फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दो इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलन ही वृद्धावस्था और व्याधियों का प्रमुख कारण है। जेनेस ही व्याधिग्रस्थ कोशिकाओ(सेल्सो) को आरोग्यवंत करा सकते है।


हम क्रियायोग द्वारा इन जेनेस को जो आवश्यक प्रेरणा है वह देकर फेफडों, कालेय(जिगर), गुर्दा इत्यादि अंगों के बीच मे असंतुलित को दूर कर सकते है।शरीर के भीतर की प्रत्येक कोशिका उस आदमी का प्रतिरूप होती है।


हर जीवित कोशिका मे जेने विध्यमान रहता है।जेने का अंदर क्रोमोजोम होते है और इन क्रोमोजोम के अंदर डी.एन.ए होते है! जीवित सेल के अंदर डी.एन.ए मालिक्यूल अति मुख्य साझेदारी रखता है।


प्रोटीन, जेने और ऐंजाईम्स का उत्पादन करने मे प्रत्येक कोशिका शक्तिशाली होती है।हम जेने से वंशपरंपराणुगत गुण निर्धारित कर सकते है। हार्मोंस इस जेनेस को आवश्यक उत्प्रेरणा देते है ।


जिसकी वजह से यह जेनेस आरोग्यता बनाए रखते है हजारों जेनेस मे से शास्त्रज्ञो ने व्याधिकारक जेनेस को पहचाना है। यदि हम नियम से चक्रों मे ध्यान, क्रियायोग इत्यादि करे तो जो 40 से 50 हजार प्रोटींस है ।


वह अपने-अपने शरीरिक स्वास्थ्य के लिये स्वयं ही तैयारी कर सकते है जिससे हम समस्त जीवन सुख और शांति से आराम से रह सकते है। इंद्रियों मे ज्यादा लालच या चंचलता होने पर हम ।


जीवकणो का सुधारस न पी सकते है और न ही अनुभव कर सकते है।हर एक जीवकण मे डियोक्सी अडेनिलिक, गुआनिलिक, रिबोसी, सिटेडिलिक, थैमिडिलिक और फास्फारिक नाम के छः अम्ल और मिठापन होता है! 


साधक खेचरी मुद्रा मेंॐ का ध्यान करते हुवे सहस्रार चक्र मे पहुंच कर स्थिर हो जाता है तब ये मिठा-सा अमृत जैसे सोमरस का आस्वादन अवश्य मिलता है। पहले कारण शरीर मे फिर सूक्ष्मशरीर मे स्थूल शरीर मे प्रवेश करता है।


कुण्डलिनी शक्ति को व्यष्टि मे कुंडलिनी और समिष्ठि मे माया कहते हैकुंडलिनी शक्ती चर(चलनेवाली चीजो मे) और अचर (नही चलनेवाली चीजों मे) प्रपंच मे उपस्थित है।सृष्टि, स्थिति और लय कारक है यह कुंडलिनी शक्ति।


प्रत्येक प्राण कण मे प्राणशक्ति उपस्तिथ रहती है।यह प्राणशक्ति जेनेस के रूप मे होती है, ये जेने क्रोमोजोम मे उपस्थित रहते है।जेनेस वंशानुगत गुणों के वाहक होते है। जेनेस मे डी.एन.ए मालिक्यूल्स रहते है।


ये डी.एन.ए मालिक्यूल्स बहुत ही मुख्य एवम आवश्यक होते है, इन डी.एन.ए मालिक्यूल्स मे छः अम्ल होते।अगर हम इन छः अम्लों को संतुलित कर पाए तो हम वृद्धावस्था और व्याधियों का निवारण कर सकते है।


इस संसार मे प्रत्येक व्यक्ति का जेनेस 99.9 फिसदी मिलता-जुलता है । बाकी 0.01 फिसदी की भिन्नता से ही एक व्यक्ति और दुसरे व्यक्ती के रंग, गुण और प्रकृती मे परख होती है। 


विस्तार इतना है कई बार कलम स्वयं बढ़ती जाती हमे वापस लौटना पड़ता । यह विषय पेढ की शाखाओं की तरह है और आगे से आगे अंनत विस्तृत है न लोटे तो मुख्य विषय ही छूट जाता। 


इडा नाडी गंगा, पिंगला नाडी यमुना और शुषुम्ना नाडी सरस्वती नदी है। ये तीनों सूक्ष्म नाडिया जब कूटस्थ यानि आज्ञाचक्र मे मिल जाती है तब इसी मिलन को गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का त्रिवेणीसंग़म कहते है।


अधिक साधना से प्राणशक्ति कूटस्थ से आगे बढकर केवल शुषुम्ना नाडी द्वारा ही सहस्रारचक्र मे पहुंचती है, इडा और पिंगला नाडियाँ केवल कूटस्थ तक ही शुषुम्ना के साथ रहती है।


स्वास अंदर खींचने और कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भरने को पूरक कहते है, कूटस्थ को इस प्राणशक्ति से भर के थोडा देर रखने को यानि कुंम्भक करने को अंतः कुंभक कहते है बाहर निकालने को रेचक कहते है ।


प्राणशक्ति को बाहर थोडी देर रोकने को बाह्य कुंभक कहते है। पूरक करके प्राणशक्ति को कूटस्थ मे अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार रोककर फिर इस प्राणशक्ति को रेचक करके मूलाधारचक्र द्वारा छोडने से विद्युत अयस्कांत शक्ति का उत्पादन होता है! 

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रविवार, 30 जनवरी 2022

निद्रा को योगसूत्र

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 निद्रा को योगसूत्र में पाँच कठिन दोषों में से एक माना गया है | गहरी नीन्द वालों की स्मृति कमजोर हो जाती है | इसलिए ब्रह्मचर्य आश्रम वालों को श्वाननिद्रा का आदेश दिया जाता था | 


इन्द्रियाँ सो जाए किन्तु मन जागता रहे उसे स्वप्न कहते हैं | मन की सात्विकता के अनुसार स्वप्न की सत्यता होती है | सात्विक संस्कारों वाला मन स्वप्न में सु+अप्न अर्थात समस्याओं का अच्छा समाधान प्राप्त करता है | इसकी विधि लोमश संहिता में वर्णित है |


स्वप्न से निकलते समय जो अन्तिम स्वप्न होता है वही याद रहता है | सात घण्टे बारह मिनट की औसत निद्रा में वास्तविक सुषुप्ति अत्यल्प काल की होती है जिसके बाद स्वप्न का दीर्घकाल होता है, पुनः सुषुप्ति आती है | इस प्रकार इन्द्रियों की जागृति के स्तर का उतार-चढ़ाव होता रहता है, एक सीमा से अधिक ऊपर चढ़ने पर जागृति होती है |


मन भी सो जाय उसे सुषुप्ति कहते हैं, जिसमे सभी प्राणी ब्रह्मलोक में रहते हैं और शारीरिक एवं मानसिक थकान दूर करके नयी ऊर्जा प्राप्त करते हैं | अज्ञानी जीव सुषुप्ति में चित्त की निद्रावृत्ति को देखकर स्वयं को निद्रा में अनुभव करता है, सोचता है कि कुछ नहीं है, न तो मैं हूँ और न ही विश्व है | सुषुप्ति में भी जीव को आत्मज्ञान रहे तो अवस्था को समाधि कहते हैं | चित्त की ये चार अवस्थाएं हैं जिनका वर्णन योगवासिष्ठ में है |


आत्मा से संसर्ग के कारण जड़ चित्त में एक आभासीय मिथ्या चेतना होती है जो अज्ञानी जीव को वास्तविक चेतना प्रतीत होती है | असली चेतना तो आत्मा है, चित्त तो पूर्णतः जड़ है, अभ्यास की गुलाम है, जबतक बाह्य बल न लगे तबतक बदल नहीं सकती |


किन्तु अनन्त जन्मों के अभ्यास के कारण चित्त की जड़ आदतों से पिण्ड छुड़ाना जीव के लिए बड़ा ही कठिन है | विरले ही ऐसे भाग्यवान होते हैं जो पिछले जन्मों के पुण्य के कारण बिना कठिन क्रियायोग के समाधि तक पँहुच सकते हैं, अधिकाँश मनुष्य बिना कठोर क्रियायोग के ऐसा नहीं कर सकते |


पिछले जन्मों के कर्मों का क्रियमाण फल ही वर्तमान जीवन में प्रारब्ध बनता है | उदाहरणार्थ, यदि बलवान धनयोग हो तो वास्तविक जीवन में धन मिलेगा, कमजोर धनयोग है तो स्वप्न में धन मिलेगा और जागने पर गरीबी


आज बस इतना ही....


अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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शनिवार, 29 जनवरी 2022

ध्यान की ताकत

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जब 100 लोग एक साथ साधना करते हैं तो उत्पन्न लहरें 5 कि.मी. तक फैलती हैं और नकारात्मकता नष्ट कर सकारात्मकता का निर्माण करती हैं।

आइंस्टाईन नें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कहा था कि एक अणु के विघटन से लाखों अणुओं का विघटन होता है, इसीको हम अणु विस्फोट कहते है। यही सूत्र हमारे ऋषि, मुनियों ने हमें हजारो साल पहले दिया था।

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आज पृथ्वी पर केवल 4% लोग ही ध्यान करते है लेकिन बचे 96% लोगों को इसका पॉजिटिव इफेक्ट होता है।

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अगर हम लगातार 90 दिनों तक ध्यान करे तो इसका सकारात्मक प्रभाव हमारे और हमारे परिवार पर दिखाई देगा।

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अगर पृथ्वी पर 10% लोग ध्यान करने लगें तो पृथ्वी पर विद्यमान लगभग सभी समस्याओं को नष्ट करने की ताकत ध्यान में है।

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उदाहरण के लिए हम बात करें तो महर्षि महेश योगी जी ने सन् 1993 में वैज्ञानिकों के समक्ष यह सिद्ध किया था।।

हुआ यूं कि उन्होने वॉशिंगटन डी सी में 4000 अध्यापको को बुलाकर एक साथ ध्यान (मेडिटेशन) करने को कहा और चमत्कारिक परिणाम यह था कि शहर का क्राईम रिपोर्ट 50% तक कम हुआ पाया गया।

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वैज्ञानिकों को कारण समझ नहीं आया और उन्होनें इसे`महर्षि इफेक्ट" नाम दिया।

 

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शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है का शेष भाग

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हम दो चीजों से बहुत भयभीत हैं–काम और मृत्यु।लेकिन ये दोनों ही बुनियादी हैं।वास्तविक अर्थों में सत्यान्वेष इन दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम-वृत्ति को समझने के लिए इसमें प्रवृत्त होगा ।


क्योंकि काम-वृत्ति को समझना जीवन को समझना है। और वह यह भी जानना चाहेगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जब तक तुम यह न जानोगे कि मृत्यु क्या है? तुम शाश्वत जीवन को नहीं जान सकते।


सत्यान्वेष के लिए काम और मृत्यु दोनों बुनियादी हैं लेकिन साधारण मनुष्यता के लिए ये दोनों वर्जनाएं हैं–उनकी चर्चा ही मत करो। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों एक -दूसरे से जुड़ी हैं। 


उनका परस्पर संबंध इतना घनिष्ठ है कि काम में प्रवेश करते समय तुम एक प्रकार की मृत्यु में ही प्रविष्ट होते हो; क्योंकि तुम मर रहे हो। अहंकार मिट रहा है समय विलीन हो रहा है तुम मर रहे हो। काम भी एक सूक्ष्म मृत्यु है।


अगर तुम यह जान सको कि काम एक सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु एक महान काम-कृत्य, बन जाएगा। कोई सुकरात मृत्यु में प्रवेश करते समय भयभीत नहीं होता। उलटे वह मौत को जानने के लिए अत्यधिक उत्साहित है।


;रोमांचित है ,उतावला है। उसके हृदय में मौत के लिए स्वागत का एक गहरा भाव है। क्योंकि अगर तुम ने काम में घटित होने वाली छोटी मृत्यु को जान लिया है और इसके पीछे-पीछे आने वाले आनंद को जान लिया है।


तो तुम उस महान मृत्यु को जानना चाहोगे–उसके पीछे एक महा-आनंद छिपा है। लेकिन हमारे लिए तो ये दोनों ही वर्जनाएं हैं। तंत्र के लिए ये दोनों ही खोज के मूलभूत आयाम है। इसमें से गुजरना अनिवार्य है।


साथी के प्रगाढ़ आलिंगन में बद्ध तुम यह भूल सकते हो कि दूसरा है। वास्तव में तुम केवल तभी दूसरे को भुला पाते हो। केवल प्रगाढ़ आलिंगन में ही दूसरा नहीं बचता तब तम्हारी ऊर्जा सरलता से प्रवाहित हो सकती है।


नहीं तो दूसरा उसे नीचे की ओर खींचता रहता है।इसलिए योग विधियां विपरीत यौन से पलायन है। उन्हें बचना ही पड़ेगा सावधान रहना पड़ेगा, निरंतर संघर्ष और दमन करना पड़ेगा। 


लेकिन अगर तुम काम-विरोधी हो तो यह विरोध ही तुम्हारे लिए निरंतर तनाव बना रहता है और निरंतर तुम्हें नीचे की ओर खींचता रहता है। तंत्र कहता है ”किसी तनाव की जरूरत नहीं। 


दूसरे के साथ तनाव शून्य विश्राम में रहो। उस शिथिलता के क्षण में दूसरा विलीन हो जाता है और तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की ओर बह सकती है। लेकिन वह तभी ऊर्ध्वगमन करती है जब तुम घाटी में हो। 


वह तभी नीचे की ओर बहती है जब तुम शिखर पर होते हो। तंत्र कहता है, जब तुम प्रात: भ्रमण के लिए निकलते हो तुम्हें कोई जल्दी नहीं; क्योंकि तुम्हें कहीं पहुंचना नहीं है। तुम सिर्फ जा रहे हो।


तुम कहीं से भी लौट सकते हो।यह जल्दी का न होना ही घाटी बनाता है नहीं तो शिखर निर्मित हो जाएगा। और जब ऐसा कहा जाता इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें  अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण नहीं रखना है ।


कयोंकि वे परस्पर विरोधी है। तुम उत्तेजना को नियंत्रित नहीं कर सकते। अगर तुम उस पर अकुंश लगाते हो तो  तुम दुगुनी उत्तेजना उत्पन्न कर रहे हो। बस सब ढीला छोड़ दो, इसे खेल की भांति लो।


आरंभ में ऐसा करना कठिन-सा लगेगा, पुरानी आदत है इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। बस, शिथिल शिथिल और शिथिल होते जाओ।और ऐसा भी मत सोचो कि तुम कुछ चूक गए हो। तुमने कुछ भी नहीं खोया है।


शुरू-शुरू में कुछ कमी सी महसूस होगी क्योंकि उत्तेजना और शिखर वहां न होंगे। और इससे पहले कि घाटी आए तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा जैसे कि कुछ कमी है तुम कुछ खो रहे हो लेकिन यह सिर्फ पुरानी आदत है। 


कुछ समय के भीतर घाटी प्रकट होने लगेगी। और जब घाटी दिखाई देने लगेगी तब तुम अपने शिखरों को भूल जाओगे। लेकिन तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और उसके साथ जबदरस्ती मत करना।


शिथिलता रिलैक्सेशन एक समस्या है- क्योंकि जब हम कहते हैं शिथिल हो जाओ बुद्धि इसका यही अर्थ करती है कि कुछ प्रयत्न करना होगा। ऐसा हमारी भाषा के कारण प्रतीत होता है। भाषा एक समस्या है। 


कुछ चीजों को भाषा हमेशा गलत ढंग से व्यक्त करती है। अगर तुम पूछते हो, ”कैसे शिथिल हों?” कैसे पूछते

ही तुम असली बात से चूक जाते हो। तुम विधि पूछ रहे हो। विधि चेष्टा को जन्म देगी चेष्टा तनाव पैदा करेगी।


इसलिए कुछ भी मत करो। बस, सब ढीला छोड़ दो केवल शिथिल हो जाओ। एक दूसरे के साथ रहो। एक दूसरे की उपस्थिति में प्रसन्नता अनुभव करो। जब तुम काम-कृत्य को समाप्त बारे सोच रहे होते कि कैसे इसे खत्म करे। 


तब क्रीडा झूठी है; तुम वहां नहीं हो ;तुम्हारा मन कहीं भविष्य में है। यह हमेशा तुम से आगे निकल जाना चाहता है। इसे ऐसा मत करने दो। केवल क्रीडा-रत रहो,  इसे घटित होने दो। तब शिथिल होना आसान हो जाएगा।  


जब तुम उत्तेजित होने लगते हो तुम्हारी सांस तेजी से चलने लगती है।शिथिलता के लिए अच्छा है कि तुम धीमी गति से.. गहरी सांस लो या सांस सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक लो।


केवल यह महसूस करने के लिए कि क्या घट रहा अपने मन का उपयोग करो। जो ऊष्मा प्रवाहित हो रही है जो प्रेम प्रवाहित हो रहा है जिस ऊर्जा से मिलन हो रहा है सिर्फ इसके साथ बहना-अचेष्टित।


तब केवल तब घाटी प्रकट होती है। और एक बार घाटी दिख जाए तुम इसके पार हो गए।एक बार उस घाटी को ,शिथिल काम-संवेग को अनुभव कर लेना ,पहचान लेना ही अतिक्रमण है। वह काम नहीं ध्यान बन गया है।


'ओंम मणि पद्ये हुम् फट् ''। अगर इस पूरे मंत्र को आप दोहराएं , तो आप पाएंगे कि इसमें शरीर के शरीर के अलग -अलग हिस्से तक इसका प्रवेश है। ओंम जैसे गले ओर ऊपर ही घूम कर रह जाता है। 


मणि हृदय तक चला जाता है। पद्ये नाभि तक चला जाता है। हुम् काम -सेंटर तक चला जाता है।  अब ''ओंम मणि पद्ये हुम् फट् '' अगर इस हुम् का बहुत प्रयोग किया जाए, तो काम- सेंटर जो है।


वह बाहर की तरफ प्रवाहित होना बंद हो जाता है। इतनी बड़ी चोट लगती है हुम् की। अगर इस हुम् का बार -बार उपयोग किया जाए, तो आदमी की कामुकता विदा हो जाती है। ओर ऊर्जा उर्घ्व बहने लगती । sabhar kundalni shadhana Facebook wall

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गुरुवार, 27 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है

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साधारण काम-कृत्य में दो उत्तेजित प्राणी मिलते है जो तनाव से भरे हैं ;उत्तेजित है ,स्वयं को भार मुक्त करने में प्रयत्न शील हैं। साधारण काम-कृत्य  पागलपन लगता है। तांत्रिक काम-कृत्य एक गहरा तनावशून्य ध्यान है।


इसमें कोई शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि शक्ति प्राप्त होती है। तुम्हें इस बात का ख्याल भी नहीं होगा लेकिन यह एक जैविक जीव-ऊर्जा का एक तथ्य है कि स्त्री और पुरुष दो विपरीत शक्तियां हैं।


धन और ऋण; यिन और यैग, या जो कुछ भी तुम उन्हें नाम दो। वे दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती हैं और जब वे दोनों गहन शिथिलता में मिलते हैं तो एक दूसरे को पुन: जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं। 


वे दोनों एक दूसरे में जीवन संचार करते हैं वे दोनों और युवा हो जाते हैं वे दोनों और अधिक सजीवता अनुभव करते हैं वे दोनों नव-शक्ति से कांतिमय हो जाते हैं। और नष्ट कुछ भी नहीं होता।


दो विपरीत ध्रुवों के मिलन से नव शक्ति का संचार होने लगता है। तांत्रिक काम कृत्य उतना किया जा सकता है जितना तुम करना चाहते हो। साधारण काम कृत्य उतना नहीं किया जा सकता जितना तुम करना चाहते हो।


क्योंकि उसमें तुम्हारी ऊर्जा नष्ट हो रही है और तुम्हारे शरीर को उसे पुन: प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और जब फिर प्राप्त होगी तभी तुम उसे फिर गंवा सकते हो।


यह बात अजीब-सी लगती है सारा जीवन इसे खर्च करने और फिर प्राप्त करने में ही व्यतीत हो जाता है। यहकेवल ग्रस्तता/ आब्सेशन है। दूसरी बात जो स्मरण रखने योग्य है। तुमने इस बात पर गौर नहीं किया होगा।


कि अगर तुम पशु-पक्षियों को देखो तो तुम उन्हें काम- कृत्य का आनंद लेते कभी न पाओगे। बंदरों, कुत्तों या किसी भी पशु को देखो–तुम ऐसा कभी नहीं देखोगे कि वे काम-कृत्य करते हुए हर्षित हो रहे हैं ,आनंदित हो रहे हैं।


उनके लिए यह एक यांत्रिक कृत्य है.. कोई प्राकृतिक शक्ति उन्हें इस कर्म में धकेल रही है। उनके चेहरे देखो। वहां कोई आनंद की झलक नहीं–जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा विवश करती है।


जब ऊर्जा अतिशय हो जाती है वे बाहर फेंक देते हैं। पशु कभी इसका आनंद नहीं उठा सकते–केवल मनुष्य ही इसका आनंद ले सकता है। और जितनी गहराई से आनंद उठा सकते हो उतनी ही तुममें मानवता का जन्म होता है।


और अगर कहीं काम कृत्य ध्यान बन जाए तो तुम उच्चतम शिखर को छूने में समर्थ हो जाते हो। लेकिन याद रखो, तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है। यह शिखर का अनुभव नहीं है यह घाटी का अनुभव है।


तुम उत्तेजना में शिखर की ओर बढ़ते हो और फिर धड़ाम से नीचे गिर जाते हो और फिर हाथ आती है खिन्नता। तुम ऊंचे शिखर से गिर पड़ते हो। तंत्र-काम कृत्य में तुम ऐसा कभी अनुभव नहीं करते।


तुम नीचे नहीं गिर रहे। तुम और इसके आगे नीचे नहीं गिर सकते–तुम घाटी में ही थे। बल्कि तुम ऊपर उठ रहे हो। तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम ऊर्जा से भर गए हो ।तुम और सजीव, ओजस्वी, कांतिमय हो गए हो। 


और वह आनंद कई घंटों तक यहां तक कि कई दिनों तक बना रहेगा। यह सब इस बात पर आश्रित है कि तुम इस कृत्य में कितना गहरे जा पाए थे।और अगर तुम देर-अबेर इसमें गति कर सको तो तुम जान सकोगे।


वीर्य-स्खलन से ऊर्जा नष्ट होती है। इसकी आवश्यकता ही नहीं है–जब तक तुम्हें बच्चों की आवश्यकता नहीं है। और सारा दिन तुम एक गहन शिथिलता, एक गहन विश्रांति महसूस करोगे।


और कई दिनों तक तुम्हें एक ऐसे सुख का अनुभव होगा जैसे तुम घर पहुंच गए हो तुम्हें अहिंसा, अविरोध, अखिन्नता की मीठी प्रतीति होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बन सकता। 


अगर संभव होगा तो वह दूसरों को प्रसन्न रखने मेंसहायक होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकेगा तो कम से कम किसी को दुख न देगा। केवल तंत्र ही नये मनुष्य का निर्माण कर सकता है।


एक ऐसा मनुष्य जिसने समय -शून्यता, निरहंकारिता का जान लिया है और अब अस्तित्व के साथ गहरा अद्वैत विकसित होगा। एक दूसरा आयाम खुल गया है। अब वह घड़ी दूर नहीं जब काम-वासना तिरोहित हो जाएगी। 


जब काम वासना अनजाने ही विलीन हो जाती है तब अचानक एक दिन तुम्हें ज्ञात होता है कि काम-वासना तिरोहित हो गई है और तब ब्रह्मचर्य का जन्म होता है।


लेकिन गलत शिक्षा के कारण कठिन और दुःसाध्य लगती है। और तुम भयभीत भी हो अपने मन के संस्कारों के कारण।


                                              

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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

पांचवां शिवसूत्र-"उद्यमो भैरव:''

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1-भगवान   शिव कहते है "उद्यमो भैरव:''-उद्यम ही भैरव है।उद्यम का अर्थ है प्रगाढ़ श्रम। उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस  संसार रूपी कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो।जो चेष्टा /Effort करता है, वही भैरव है। भैरव शब्द पारिभाषिक है।’भ' का अर्थ है 'भरण';'र' का अर्थ है रवण;और  'व' का अर्थ है वमन। भरण का अर्थ है Maintenance , रवण का अर्थ है संहार, और वमन का अर्थ है फैलाना।मूल अस्तित्व का नाम भैरव है।हिंदू देवताओं में भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है।भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करनेवाला। भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा विष्णु  और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव  के  गण और पार्वती के अनुचर माने जातेहैं।भैरव  नाम में दार्शनिक गुण हैं और   स्पष्ट जागरूकता और सावधान रवैया के कारण स्पष्ट अंतर्ज्ञान है। 


2-जिस दिन भी तुमने आध्यात्मिक जीवन की चेष्टा शुरू की, तुम भैरव होने लगे;अथार्त तुम परमात्‍मा के साथ एक होने लगे। तुम्हारे भीतर मुक्त होने का पहला खयाल तुम्हारी चेष्टा की पहली किरण है ,और तुमने यात्रा शुरू कर दी।मंजिल  भी ज्यादा दूर नहीं है क्योंकि पहला कदम ही करीब-करीब आधी यात्रा है।तुम्हारे भीतर जैसे ही यह भाव सघन होना शुरू हुआ कि अब मैं मूर्च्छा से बाहर  निकलूं और चैतन्य बनूं वैसे ही तुम भैरव होने लगते हो...अथार्त ब्रह्म के साथ एक होने लगे।तुम उसी सागर के झरने हो, उसी सूरज की किरण हो,  उसी महा आकाश के एक छोटे से खंड हो..मूलत: तो तुम एक हो ही।वास्तव में ,तुम एक हो ही, लेकिन सिर्फ यह स्मरण आ जाए तो तुम्हारी यात्रा प्रारभ्म हो गयी।मंजिल पहुंचने में तो समय लगेगा;लेकिन तुमने चेष्टा शुरू कर दी ।


3-चेष्टा से तुम्हारे भीतर बीज आरोपित हो जाता  हैं कि मैं  इस कारागृह रूपी संसार  से बाहर आ जाऊं, शरीर से,जन्मों की आकांक्षा ,वासना से मुक्त हो जाऊं और अब इस संसार में फंसाव के बीज न बोऊं। तुम्हें यह स्मरण आना शुरू हो जाये और दीवालें विसर्जित होने लगें, तो तुम इस महा आकाश के साथ एक हो जाओगे।बड़ी जबरदस्त चेष्टा करना जरूरी है क्योंकि गहरी नींद  है; जब तोड़ने का  सतत प्रयास   करोगे, तो ही टूट पायेगी ,आलस्य से संभव नहीं होगा।उद्यम का अर्थ है..तुम्हारी पूरी चेष्टा संलग्र हो जाये।आज तोड़ोगे, और कल फिर बना लोगे तो फिर भटकते रहोगे।लोग शिकायत करते हैं 'हम करते हैं, लेकिन कुछ हो नहीं रहा।इसका अर्थ है कि  उनके करने में कोई प्राण नहीं हैं ...इसलिए नहीं होता।शिकायत का अर्थ है कि कहीं कुछ अन्याय हो रहा है कि दूसरों को हो रहा है, हमें नहीं हो रहा है।वास्तव में ,इस जगत में अन्याय होता ही नहीं।जो भी होता है, वह न्याय ही है। क्योंकि न्याय-अन्याय करने को यहां कोई मनुष्य नहीं बैठा है।जगत में तो तटस्थ नियम हैं, उन्हीं तटस्थ नियमों का नाम धर्म है। 


4-गुरुत्वाकर्षण  के नियम न तुम्हें गिराने को उत्सुक है, न तुम्हें सम्हालने में उत्सुक है।जब तुम सीधे चलते हो, तो वही तुम्हें संभालता है  और जब तिरछे चलते हो, तो वही तुम्हें गिराता है।न उसकी कोई गिराने कीआकांक्षा है, न सम्हालने की।वह परम नियम है... तटस्थ है और तुम्हारी तरह पक्षपात नहीं करता कि किसी को गिरा दे, किसी को उठा दे। तुम जैसे ही ठीक चलने लगते हो, वह तुम्हें संभालता है।तुम गिरना चाहते हो तो ही वह तुम्हें गिराता है।वह हर हालत में उपलब्ध है ;उसके द्वार बंद नहीं है।तुम दरवाजा खोलकर भीतर जाना चाहते हो,तो भीतर चले जाओ या दरवाजे से सिर ठोकना चाहते हो,तो सिर ठोक लो।उद्यम भैरव है और इसके लिए महान श्रम चाहिए।श्रम में तुम्हारी समग्रता लग जाये...तब तुम्हारे भैरव हो जाने में देर न लगेगी।भैरव का प्रतीकात्मक अर्थ है.... ब्रह्म जो धारण किये है, जो सम्हाले है, जिसमें हम पैदा होंगे, और जिसमें हम मिटेंगे।जो सृष्टि का Origin  है और जिसमें प्रलय भी होगा। 


...SHIVOHAM..... sabhar chidananda Facebook wall

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कुण्डलिनी जागरण का दुसरा उपाय

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 {{{ॐ}}}


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कुण्डलिनी जागरणका दुसरा उपाय है नियमित मंत्र जप। यह एक बहुत ही शक्तिशाली , सरल एवं निरापद मार्ग है परन्तु निस्संदेह यह एक साधना है जिसमें अपेक्षा कृत अधिक समय तथा धैर्य की आवश्यकता होती है ।

पहलेतो मंत्र और योग के किसी ऐसे योग्य गुरू से अनुकूल मंत्र लेना होता है जो साधना मार्ग  में पथ प्रदर्शन कर सके।

जब आप मंत्र का निरन्तर अभ्यास करते रहते है तो आंतरिक शक्ति में वृद्धि होती है इससे जीवन मे तटस्थ रहने के दृष्टिकोण का विकास होता है।

जिस प्रकार किसी शांत झील मे कंकड  फेंकने पर उसमे तरंगे उत्पन्न होती है उसी प्रकार  मंत्र को बार बार दोहराने से मन रूपी समुद्र मे भी तरंगें उत्पन्न होती है लाखों करोडों बार उसी मंत्र को दोहराने से मस्तिक का कोना कोना उससे झंकृत हो जाता है । इससे आपके शारीरिक , मानसिक एवं  आध्यात्मिक तीनो स्तरो का शुद्धिकरण हो जाता है।

मंत्र का उच्चारण मानसिक और मनोविज्ञानिक स्तरो पर ध्वनि मे मंद गति से किया जाना चाहिए ।। इन चारो स्थितियों मे मंत्र का अभ्यास करने से कुण्डलिनी जागरण  बिना परेशानी  के सही ढगं से होता है मंत्र को श्वास के साथ मानसिक रूप से दोहराया जा सकता है  और कीर्तन  भी जा सकता है उससे मुलाधार पर भी काफी प्रभाव पडता है जहॉ से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है।

स्वर अथवा संगीत के द्वारा कुण्डलिनी जागरण  भी लगभग मंत्रयोग की तरह  ही है जिसे नादयोग कहते है इससे ध्वनियां बीच मंत्रो की तरह कार्य करती है क्यो कि संगीत मे राग अथवा सुर  चक्र विशेष से संबधित है। जागरण का यह सबसे सौम्य ढगं है। sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

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