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बुधवार, 12 जुलाई 2023

कैसे बनेगा हवा से शुद्ध पानी

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 वाटरजेन' नामक कंपनी ने हाल ही में हवा से जल बनाने की तकनीक को विकसित किया है। जिसमें अधिक नमी वाली हवा के तापमान को कम किया जाता है और इसके फलस्‍वरूप हवा में मौजूद जल के अणु नीचे गिरने लगते हैं और इन्‍हें एकत्रित कर लिया जाता है।


कंपनी के सहायक सीईओ ए कोहावी के अनुसार ''हवा के इस तंत्र में से गुजारने के पर सिस्‍टम हवा में की आर्द्रता को कम करने का काम करता है और एकत्रित जल को एक विशेष टैंक में एकत्रित कर लिया जाता है।''


आगे उन्‍होंने बताया कि ''इस जल को एक बड़े फिल्‍टरेशन तंत्र से गुजारा जाता है, जिसके कारण इसमें होने वाली संभावित सूक्ष्‍मजैव या रसायन संबंधी अशुद्धियां अलग हो जाती हैं। इसके बाद जल को एक विशाल टैंक में रखा जाता है, जहां जल की शुद्धता के सारे पैमानों का ध्‍यान रखा जाता है।

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हालांकि इस तरह के यंत्र अन्‍य कंपनियों द्वारा भी बनाए जा चुके हैं, जिनका उपयोग औद्योगिक और घरेलू कार्यों में किया जाता है। लेकिन 'वाटरजेन' का दावा है कि उनके द्वारा विकसित किए गए इस यंत्र में कम से कम ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा।


आगे कोहावी ने बताया कि ''हालांकि कुछ अन्‍य कंपनियां भी इसका दावा करती हैं और यह इतना मुश्‍किल कार्य नहीं है कि हवा से जल के अणु एकत्रित कर लिए जाएं। लेकिन मुद्दा यह है कि कम से कम ऊर्जा की खपत में इस कार्य को अंजाम दिया जाए।''


आगे उन्‍होंने बताया कि जब हम इस कार्य को और अधिक कुशलता से कर पाऐंगे तो वास्‍तव में पीने के जल की समस्‍या का इससे अच्‍छा निवारण कोई दूसरा नहीं हो सकता कि वायु से ही जल बना लिया जाए।


यह यंत्र एक दिन में 250-800 लीटर जल निर्मित कर सकता है जिसकी मात्रा तापमान और आर्द्रता के आधार पर भिन्‍न हो सकती है।


कंपनी ने प्रारंभ में इस तकनीक का उपयोग आईडीए या 'इजराइल डिफेंस फोर्स' के लिए किया। और वर्तमान में 'वाटरजेन' कंपनी सात देशों की रक्षा सेनाओं को लिए सेवा प्रदान कर रही है। लेकिन अब कंपनी इस आम लोगों के लिए भी बाजार में उपलब्‍ध कराना चाहती है।


कोहावी ने आगे बताया कि कंपनी इस प्रोडक्‍ट को कई देशों जैसे भारत के बाज़ार में उतारना चाहता है, जहां पीने के शुद्ध जल की समस्‍या है। इससे वहां के लोगों को शुद्ध जल के लिए वाटर सप्‍लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। आगे कोहावी बताते हैं कि ''यह सिस्‍टम मात्र 1.5 रुपए में एक लीटर शुद्ध जल निर्मित करेगा जबकि वाटर बॉटल खरीदने पर आप एक लीटर शुद्ध जल के लिए 15 रुपए चुकाते हैं। (एजेंसियां) sabhar webdunia.com


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मंगलवार, 11 जुलाई 2023

प्रोटीन शेक पीना कितना फ़ायदेमंद, कितना नुक़सानदेह

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प्रोटीन शेक पीना कितना फ़ायदेमंद, कितना नुक़सानदेह

ब्रिटेन में प्रोटीन शेक पीने के कारण एक भारतीय मूल के किशोर की मौत की वजह को लेकर आई एक ख़बर ने नई बहस छेड़ दी है.


सवाल उठ रहे हैं कि प्रोटीन सप्लिमेंट्स पर लगे लेबल पर चेतावनी लिखी होनी चाहिए या नहीं.

दरअसल, लंदन में रहने वाले 16 साल के रोहन की तबीयत 15 अगस्त 2020 को अचानक बिगड़ गई थी और उसके तीन दिन बाद उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया था.

क़रीब पौने तीन साल तक चली गहन पड़ताल के बाद जांचकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि रोहन की मौत उस प्रोटीन शेक के कारण हुई थी, जो उनके पिता ने वज़न बढ़ाने के लिए दिया था.


जांचकर्ताओं के मुताबिक़, रोहन को ऑर्निथीन ट्रांसकार्बामिलेज़ (OTC) डेफ़िशिएंसी नाम की एक आनुवांशिक समस्या थी, जिसकी वजह से प्रोटीन शेक लेने के बाद उनके शरीर में अमोनिया जानलेवा स्तर पर पहुंच गया था.


जांचकर्ता ने अदालत में कहा कि उनकी राय में प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर ये चेतावनी छापनी चाहिए.


उनके अनुसार, ''भले ही OTC डेफ़िशिएंसी आम समस्या नहीं है लेकिन जिन्हें यह डिसऑर्डर है उनके लिए अतिरिक्त प्रोटीन लेना ख़तरनाक हो सकता है.''


इस ख़बर के बाद ब्रिटेन ही नहीं पूरी दुनिया में प्रोटीन सप्लिमेंट्स को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं और कहा जा रहा है कि प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर इस तरह की चेतावनी हो क्योंकि युवाओं, ख़ासकर जिम जाने वालों में प्रोटीन शेक ख़ासा लोकप्रिय है.

प्रोटीन ज़रूरी क्यों है?

प्रोटीन एक ज़रूरी पोषक तत्व है. मांसपेशियां बनाने और उनकी रिपेयर में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है.


प्रोटीन हड्डियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाता है साथ ही दिल, दिमाग़ और त्वचा को स्वस्थ रखता है.


इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रीसर्च (ICMR) के अनुसार, भारतीयों के लिए रोज़ अपने वज़न के हिसाब से 0.8 से 1 ग्राम प्रति किलो प्रोटीन काफ़ी है और आपके भोजन का एक चौथाई हिस्सा प्रोटीन होना चाहिए.


यह शरीर के लिए ज़रूरी प्रोटीन की मानक मात्रा है. उम्र, सेहत, शारीरिक श्रम और व्यायाम के स्तर के आधार पर हर किसी की प्रोटीन की ज़रूरत अलग होती है लेकिन अधिकतर लोगों को सही मात्रा का पता ही नहीं होता.


अंडे, दूध, दही, मछली, दाल, मीट, सोया वगैरह प्रोटीन से भरपूर होते हैं और संपन्न देशों के ज्यादातर युवाओं को इसकी ज़रूरी मात्रा अपने खाने से ही मिल जाती है.


डाइट से न मिल पाने वाले प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए प्रोटीन सप्लिमेंट्स इस्तेमाल किए जाते हैं.


ज्यादातर प्रोटीन सप्लिमेंट पाउडर के रूप में उपलब्ध होते हैं जिनका मुख्यत: शेक बनाकर सेवन किया जाता है.


प्रोटीन पाउडर अलग-अलग स्रोतों से लिए गए प्रोटीन का पाउडर होता है. यह प्रोटीन पाउडर, आलू, सोयाबीन, चावल और मटर जैसे पौधों से भी लिया जाता है और अंडों या दूध से भी.

कितना ख़तरनाक है प्रोटीन सप्लिमेंट लेना?

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉक्टर समीर जम्वाल जीव रसायन विभाग में एमडी हैं. वह बताते हैं, “अगर आप 50 किलो के हैं तो 50 ग्राम प्रोटीन रोज़ लेने में कोई समस्या नहीं है.''


वह बताते हैं कि प्रोटीन को पचाने के बाद बनने वाले अतिरिक्त अमोनिया को शरीर यूरिया में बदल देता है जो पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाता है.


मगर कई लोगों के शरीर में अमोनिया को यूरिया में बदलने वाले एंज़ाइम नहीं होते यानी उन्हें यूरिया साइकल डिसऑर्डर होता है.


डॉक्टर समीर बताते हैं कि इसका नुक़सान ये होता है कि शरीर में अमोनिया का स्तर बढ़ जाता है जो दिमाग़ के लिए बहुत हानिकारक होता है.


वे बताते हैं कि ये यूरिया डिसऑर्डर अलग-अलग तरह के होते हैं और जिन लोगों में इस तरह की समस्या होती है उनके लिए अधिक प्रोटीन लेना ख़तरनाक हो सकता है.

डॉक्टर मनीष बताते हैं कि बहुत से लोग ऐसे हैं जो नफ़ा-नुक़सान जाने बिना सप्लिमेंट लेना शुरू कर देते हैं, जबकि उन्हें ज़रूरत ही नहीं होती.


वे कहते हैं, “बॉडी बिल्डिंग का तब क्या फ़ायदा जब आप स्वस्थ न हों. आपने देखा होगा कि जिम जाने वाले कई लोगों को कार्डिएक अरेस्ट हुए हैं. अच्छी डील-डौल ही अच्छे स्वास्थ्य का पैमाना नहीं होती. सबसे ज़रूरी है संतुलित आहार.”


वहीं डॉक्टर समीर जम्वाल प्रोटीन सप्लिमेंट से जुड़े एक बड़े ख़तरे के बारे में आगाह करते हैं. यह ख़तरा है- प्रोटीन सप्लिमेंट में हेवी मेटल्स की अशुद्धियां.


डॉक्टर जम्वाल बताते हैं, “आमतौर पर जिम जाने वाले लोग दूध से बनने वाले वे प्रोटीन (Whey Protein) को इस्तेमाल करते हैं. अगर फ़ैक्ट्री में सावधानी न बरती जाए तो स्रोत से प्रोटीन को अलग करने प्रक्रिया में लेड, आर्सेनिक और मर्क्युरी जैसे हेवी मेटल्स मिलने का ख़तरा रहता है. इन हेवी मेटल्स को शरीर बाहर नहीं निकाल पाता और किडनी और लीवर जैसे अंगों को नुक़सान पहुंचता 

प्रोटीन सप्लिमेंट का बाज़ार

भारत में प्रोटीन और अन्य सप्लिमेंट्स की मांग तेज़ी से बढ़ रही है.


आईएमएआरसी (IMARC) के अनुसार, 2022 में भारत में डायटरी सप्लिमेंट्स का बाजार लगभग 436 अरब रुपये का था जो 2028 तक क़रीब 958 अरब रुपये का हो जाएगा.


इसमें बड़ा हिस्सा प्रोटीन सप्लिमेंट्स का है. ऐसे में मुनाफ़े के लिए नकली और मिलावटी प्रोटीन सप्लिमेंट का कारोबार भी चल निकला है.


पश्चिमी दिल्ली में सप्लिमेंट्स और हेल्थ केयर उत्पादों का शोरूम चलाने वाले अमन चौहान बताते हैं कि मिलावटी और नकली उत्पादों से बचना ज़रूरी है.


वे कहते हैं, “स्थापित कंपनियों द्वारा अधिकृत स्टोर से ही सप्लिमेंट खरीदने चाहिए. प्रॉडक्ट के पैकेज पर हॉलमार्क स्टैम्प, इंपोर्टर का टैग चेक करें और जीएसटी बिल ज़रूर लें.”

चेतावनी लगाने से कुछ बदलेगा?

अभी ब्रिटेन में इस बात को लेकर फ़ैसला नहीं हुआ है कि वहां प्रोटीन सप्लिमेंट के लेबल पर कोई चेतावनी देनी है या नहीं.


लेकिन क्या केवल चेतावनी देना काफ़ी होगा?


क्योंकि इससे जुड़ा एक सवाल ये भी है कि भारत में अभी जेनेटिक मैपिंग करवाने का चलन नहीं है जिससे यह पता चल सके कि किसी को कौन सा जेनेटिक डिसऑर्डर है और उसे किन चीज़ों के सेवन से समस्या हो सकती है.


ऐसे में डॉक्टरों के पास अधिकतर मामले तभी आते हैं, जब किसी को उस डिसऑर्डर के कारण गंभीर समस्या हो जाए.


फिर लेबल पर चेतावनी देना शायद उतना कारगर साबित न हो.


डॉक्टर बताते हैं कि सप्लिमेंट्स लेने की बजाए लोगों को अपनी खुराक का ख़्याल रखना चाहिए और संतुलित आहार लेना चाहिए sabhar BBC.com https://www.bbc.com

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सोलर सेल काम कर गए, तो जगह-जगह सौर ऊर्जा इकट्ठा होगी

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 सोलर टेक्नोलॉजी लगातार बेहतर हो रही है. ज्यादा समय तक चलने वाले ये लचीले सोलर सेल इंसान के बाल से भी पतले हैं और किसी भी सतह पर लगाए जा सकते हैं. देखिए ये कैसे काम करते हैं और कहां-कहां इस्तेमाल हो सकते हैं.

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ये सोलर सेल काम कर गए, तो जगह-जगह सौर ऊर्जा इकट्ठा होगी

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सोलर टेक्नोलॉजी लगातार बेहतर हो रही है. ज्यादा समय तक चलने वाले ये लचीले सोलर सेल इंसान के बाल से भी पतले हैं और किसी भी सतह पर लगाए जा सकते हैं. देखिए ये कैसे काम करते हैं और कहां-कहां इस्तेमाल हो सकते हैं. 


 इंजीनियर्स ने एक ऐसा सोलर सेल बनाया है जो बालों से भी पतला है और ये कपड़ों से बिजली पैदा कर सकता है. जी हां, अब आपके कपड़े भी आपको बिजली देंगे. समय के साथ टेक्नोलॉजी में बदलाव हो रहा है. पहले जिन कामों को करने में घंटो या कई दिनों का समय लगता था वो अब महज कुछ सेकंड या मिनट में पूरा हो रहा है. टेक्नोलॉजी ने हम सभी की जिंदगी सरल बना दी है. इस बीच टेक्नोलॉजी के क्षेत्र से जुड़ी एक अच्छी खबर सामने आ रही है. दरअसल, एमआईटी के रिसचर्स ने एक अल्ट्राथिन और अल्ट्रालाइट सोलर सेल तैयार किया है. यानी इंजीनियर्स ने बेहद हल्का और बालों से भी पतला सोलर सेल खोज निकाला है. इस सोलर सेल का इस्तेमाल किसी भी सतह पर किया जा सकता है. जिस सतह पर सोलर सेल को लगाया जाएगा वो पावर सोर्स में बदल जाएगा. यानी अगर आप इस सोलर सेल को कपड़ों में लगाते हैं तो आपके कपड़े बिजली पैदा करने लगेंग. ऐसे डेवलप की गई टेक्नोलॉजी बाल से भी पतले इस सोलर सेल को डेवलप करने के लिए रिसर्चर्स ने नैनोमेटेरियल का इस्तेमाल प्रिंटेबल इलेक्ट्रॉनिक इंक में किया है जिससे नोवल सोलर सेल डिवाइस बनाया जा सके. रिसर्च पेपर के लीड ऑथर Vladimir Bulović ने बताया की हमारा लाइटवेट फोटोवोल्टिक (PV) का मौजूदा वर्जन उतना बेहतर नहीं है जितना सिलिकॉन पीवीएस होते हैं. मगर इनका वजन बहुत कम है. उन्होंने कहा कि इन पावर सेल्स का इस्तेमाल कन्वेंशनल सिलिकॉन पीवीएस को रिप्लेस करने के लिए नहीं बल्कि जहां ये काम नहीं आएंगे वहां लाइटवेट फोटोवॉल्टिक सेल का इस्तेमाल किया जाएगा. बता दें इस प्रिंटेड मॉड्यूल (सोलर सेल) की थिकनेस सिर्फ 15 माइक्रोन है जबकि इंसान के बालों की थिकनेस 70 माइक्रोन तक होती है. यानी ये सोलर सेल इतना पतला है इसे कहीं भी आसानी से लगाया जा सकता है. Sabhar:abplive.com

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सोमवार, 10 जुलाई 2023

ट्विटर के मुक़ाबले ज़करबर्ग के थ्रेड्स में क्या है अलग और ख़ास

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फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम की मालिक कंपनी मेटा ने अपने नए ऐप को लॉन्च कर दिया है, जिसे ट्विटर का प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है. मेटा के नए ऐप का नाम है थ्रेड्स जिसे कंपनी एक टेक्स्ट बेस्ड कन्वरसेशन ऐप कहती है. ये ऐप सौ से ज़्यादा देशों में उपलब्ध है. इसका इस्तेमाल कर बीबीसी संवाददाता जेम्स क्लेटन ने क्या पाया. देखिए इस रिपोर्ट में.sabhar BBC.com

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रविवार, 9 जुलाई 2023

अनुवादिका नामक ट्रान्स लेटर छात्रों को हिन्दी में

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सी०एस से एम ५० में शिक्षा मंथन में हिस्सा लेने आये पद्‌मश्री डा० दामू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि अनुवादिनी अलोबल वाइस एन्ड् डाक्युमेन्ट ए आई ट्रॉन्स लेसन कम्पुटर tool है जिसे ऍ आई सी टी ईट ने कि विकसित किया  है अनुवादिका   ट्रान्स लेटर छात्रों को हिन्दी में  पढाई करायेगा यह 80 प्रतिशत शुद्ध है गुगल की दिक्कते नहीं आयेगी गुगल से टाइप  करने पर अनेर दिक्कतें आती है २२ भाषाओं में अनुवाद करेगा 13 सेकेन्ड में 500 पेज काअनुवाद होगा ऑन  लाइन  ट्रांसलेशन टेक्स्ट ट्रांसलेशन image translation  speech translation video vice translation table translation होगा यह इन्टर नेट की दुनिआ में क्रन्तिकारी कदम होगा जो कमियाँ गूगल में है वो दूर की गयी है 


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शनिवार, 8 जुलाई 2023

लैब में बने गोश्त को क्यों नहीं पसंद कर रहे लोग, देखिए यह रिपोर्ट

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क्या लैब में बने मीट खाने के लिए तैयार हैं आप. क़रीब तीन साल पहले सिंगापुर लैब में तैयार मीट की बिक्री को मंज़ूरी देने वाला पहला देश बना था. तब कहा गया था कि यह तकनीक गेम चेंजर साबित होगी. निवेशकों ने इस बिज़नेस में क़रीब तीन अरब डॉलर भी लगा दिए. लेकिन अब लैब में तैयार मीट के कारोबार में वो तेज़ी नहीं देखी जा रही है, जिसका अंदाज़ा लगाया जा रहा था. पर ऐसा क्यों? देखिए बीबीसी संवादादाता निक मार्श की रिपोर्ट. sabhar BBC.com

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28 हज़ार साल तक चलेगी 'कचरे' से बनी ये बैट्री, मानव जीवन को बदल देगी, 2023 से मिलेगी ये बैट्री

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NDB एक नया तकनीक है, जो न्यूक्लियर जेनरेटर की तरह काम करता है इसमें. परमाणु कचरे से रेडियोधर्मी क्षय ऊर्जा को ऊर्जा में परिवर्तित करके इसके दीर्घकालिक गुणों और दीर्घायु को सुनिश्चित किया जाता है. यह बैट्री खुद को चार्ज कर लेता है. सोचिए, हमारी ज़िंदगी बिजली पर आश्रित हो चुकी है. पंखा से लेकर टीवी तक, मोबाइल से लेकर घड़ी तक, एयरोप्लेन से लेकर अंतरीक्षयान तक, सबकुछ बिजली पर ही आश्रित है. बिजली के कारण हमारी ज़िंदगी आसान हो चुकी है. बिजली कई तरीकों से बनाई जाती हैं. हवा की मदद से, पानी की मदद से, कोयले की मदद से बिजली बनाते हैं. बिजली को संरक्षित रखने के लिए विज्ञान ने बैट्रियों का निर्माण किया है. बैट्रियों को हमें बार-बार चार्ज करना पड़ता है. अगर चार्ज नहीं करेंगे तो फिर हमारा डिवाइस काम करना बंद कर देगा. देखा जाए तो हमारी जिंदगी की बैटरी पर निर्भरता काफी बढ़ गई है. अगर आज मैं आपको एक ऐसी बैट्री के बारे में बताऊं तो 28 हज़ार साल तक चलेगी, तो कैसा लगेगा? जी हां, ये पूरी तरह से सच है. अमेरिका के कैलिफॉर्निया स्थित ( NDB has made a self-charging battery) एक कंपनी का दावा है कि वो एक बैट्री बनाने जा रही है जो 28 हज़ार साल तक चलेगी. इस बैट्री का नाम डायमंड बैट्री है, जो परमाणु कचरे से बनती है. NDB की वेबसाइट के अनुसार भविष्य में बैटरी अब नैनो डायमंड बैटरी (NDP) पर काम करेगी. द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, ये हाई पॉवर, डायमंड-आधारित अल्फा, बीटा और न्यूट्रॉन वोल्टाइक बैटरी होती है. जो अपने पूरे लाइफ स्पैन में इस्तेमाल होने के दौरान परंपरागत केमिकल बैटरी से अलग ग्रीन एनर्जी देगा. NDB क्या है? NDB एक नया तकनीक है, जो न्यूक्लियर जेनरेटर की तरह काम करता है इसमें. परमाणु कचरे से रेडियोधर्मी क्षय ऊर्जा को ऊर्जा में परिवर्तित करके इसके दीर्घकालिक गुणों और दीर्घायु को सुनिश्चित किया जाता है. यह बैट्री खुद को चार्ज कर लेता है. सेल्फ-चार्जिंग प्रोसेस के कारण ये बैटरी 28,000 साल तक चल सकती है, इस सेल्फ चार्जिंग प्रोसेस के लिए बैटरी को सिर्फ प्राकृतिक हवा की जरूरत होती है sabhar https://ndtv.in

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गुरुवार, 6 जुलाई 2023

कर्पूर के पौधे के वास्तु एवं ज्योतिषीय लाभ

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〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हम सभी अपने घर की पूजा में कपूर जलाते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि कपूर कहां से आता है? कैसा होता है इसका पौधा? क्या इस पौधे को घर में लगा सकते हैं, लगा लिया तो क्या फायदे होंगे?* आजकल जो प्रचलित कपूर हम लाते हैं वह केमिकल्स के बने होते हैं। कपूर एक विशालकाय पेड़ से प्राप्त होते हैं जिनका चिकित्सकीय लाभ कमाल का होता है। केमिकल्स वाले कपूर में मेडिसिनल वैल्यू बहुत कम होती है। कपूर का पेड़ लंबे समय तक चलने वाला सदाबहार वृक्ष है। इसका वृक्ष भारत, श्रीलंका, चीन, जापान, मलेशिया, कोरिया, ताइवान, इन्डोनेशिया आदि देशों में पाया जाता है। कपूर के पेड़ की लम्बाई 50 से 100 फीट तक होती है। इसके फूल, फल तथा पत्तियां सभी आकर्षक होते हैं। इसे सजावटी पेड़ के रुप में भी लोग अपनाते हैं। इसकी पत्तियां बड़ी, सुन्दर और लालिमा व हरापन लिए होती हैं। वसन्त ऋतु में इसमें छोटे-छोटे खुशबूदार फूल लगते हैं। इसके फल भी बड़े मोहक होते हैं। कपूर के पेड़ की लकड़ियां फर्नीचर के काम में भी लाई जाती हैं। यह काफी मजबूत और टिकाऊ होती है। इसके पेड़ से प्राप्त लकड़ियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, तेज आंच पर उबाला जाता है फिर भाप और शीतलीकरण विधि से कपूर का निर्माण होता है। इससे अर्क और तेल भी बनाया जाता है, जिसका प्रयोग प्रसाधन एवं औषधि कार्यों में होता है। आयुर्वेद, एलोपैथी और होमियोपैथी दवाइयों में भी कपूर का प्रयोग होता है। इसकी तासीर ठंडी है। कपूर और गाय के घी से काजल भी बनाया जाता है। यह आंखों के लिए बड़ा गुणकारी होता है। कपूर के पौधे को हम अपने घर, बाहर, बगिया, गमले आदि कहीं भी किसी भी जगह पर लगा सकते हैं। कपूर का पौधा अच्छी सेहत का भंडार और वरदान है। कपूर के पौधे के संपर्क में जो रहता है तो वह हमेशा स्वस्थ रहता है। कपूर का पौधा पर्यावरण को शुद्ध करने में बहुत बड़ी मदद करता है। कपूर का पौधा हमें प्राण वायु प्रदान करता है। वास्तु और ज्योतिषीय फायदे 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कपूर का पौधा लगाने से घर से बीमारियां दूर हो जाती हैं। कपूर का पौधा घर में लगाने से आसपास की सभी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती हैं। कपूर का पौधा अपनी सुगंध से चारों ओर के वातावरण को खुशबूदार बना देता है। कपूर का पौधा धन की आवक को आकर्षित करता है। कपूर का पौधा रिश्तों में मिठास लाता है। कपूर का पौधा घर में रखने से खुशियों का आगमन होता है। कपूर का पौधा घर और घर के सदस्यों को नजर से बचाता है। कपूर का पौधा घर में रखने से बुरी आत्माएं घर से दूर रहती हैं। कपूर का पौधा घर के किसी भी कोने में रख सकते हैं यह पूरे घर के वास्तु दोष को हर लेता है। घर के बाहर रख रहे हैं तो इसे प्रवेश की तरफ से द्वार के दाएं तरफ रखें। कपूर का पौधा घर के मंदिर के आसपास भी रख सकते हैं। इससे पूजा का फल दो गुना हो जाता है। कपूर का पौधा तरक्की लाता है सदस्यों के बीच की तकरार को खत्म करता है। कपूर का पौधा सेहत के लिए तो अत्यंत फायदेमंद है ही मन और आध्यात्मिक शांति के लिए भी आश्चर्यजनक रूप से लाभकारी है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️. sabhar Facebook wall aryuved&pusp

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बुधवार, 5 जुलाई 2023

ए आई का विकास कैसे हुआ इस वीडियो में आप देखेंगे

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ए आई क्या नौकरिया खा जायेंगे हमें किस तरह ए आई का मुकाबला करना चाहिए ए आई का विकास कैसे हुआ इस वीडियो में आप देखेंगे

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मंगलवार, 4 जुलाई 2023

कुण्डलिनी जागरण के बाद क्या होता है

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आत्मजागृत व्यक्ति अपनी कुंडलिनी के द्वारा धीरे-धीरे और सहज रूप से आकर्षित किया जाने लगता है। यदि कुण्डलिनी का ध्यान जारी रखा जाता है, तो वह आकर्षण और भी मजबूत और तेज होता जाता है। 1-3 साल के भीतर, मनुष्य की बुद्धि हमेशा कुंडलिनी से भरी रहने लगती है। वह कुंडलिनी-चेतना के रूप में सदैव अभिव्यक्त है। वह अपने व्यक्तिगत अहंकार को खो देता है, और कुंडलिनी-अहंकार के रूप में मौजूद रहता है। कुंडलिनी छवि हमेशा उसके अपने दिमाग में रहती है, चाहे वह काम कर रहा हो या न कर रहा हो। उसके लिए सब कुछ वास्तविक दिखने वाला जागृतकाल का जगत अपनी चमकती कुंडलिनी के सामने सपनों की तरह आभासी या अवास्तविक जैसा होता है, वैसे ही जैसे मोमबत्ती सूर्य के सामने महत्त्वहीन प्रतीत होती है। वह सम्प्रज्ञात समाधि है। उसके मस्तिष्क में कुंडलिनी के रूप में जमा मानसिक ऊर्जा उसे थका हुआ या अस्थिर बनाती है, और वह लंबे समय तक उसके साथ रहने के बाद उससे ऊब जैसा जाता है। इसलिए फिर सहजता से वह उससे छुटकारा पाना चाहता है। इसके लिए समाधान केवल आत्मज्ञान ही है, क्योंकि वह कुंडलिनी से अधिक ऊर्जावान / प्रकाशमान / असली होता है, और उसमें कोई भी एक विशेष छवि विद्यमान नहीं होती है, कुंडलिनीज्ञान के विपरीत। उसके अंदर सब कुछ सामान रूप से होता है, इसलिए वही कुंडलिनी-ऊर्जा के लिए असली सिंक / अवशोषक होता है। यदि सूर्य के रूप में कुंडलिनी पर विचार करें, तो आत्मज्ञान अरबों सूर्यों को समावेशित करने वाली आकाशगंगा है। सहजता से वह गुरु या किसी दयालु / आध्यात्मिक व्यक्ति को खोजकर, उसे अपनी हालत के प्रति सहानुभूति प्रदान करने वाला बना देता है, जो तब उसकी कुंडलिनीलेस / कुण्डलिनीरहित स्थिति को प्राप्त करने और उसे नियंत्रित करने / प्रबंधित करने में मदद करता है। यह कुंडलिनीरहित हालत ही असम्प्रज्ञात समाधि है। क्योंकि उसका सभी कुछ, यहां तक कि उसका अपना रूप/अहंकार भी कुण्डलिनी के साथ जुड़ चुका होता है, इसलिए कुण्डलिनी के नष्ट होने के साथ उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है। वह पूर्ण रूप से अहंकार-रहित अर्थात शून्य बन जाता है। इस बीच, झलकरूप में आत्मज्ञान भी उसकी सहायता करने के लिए नीचे उतर कर उसके मानसपटल पर छा जाता है, और उसे कुंडलिनीरहित मिशन / अभियान को सहजता से और लंबे समय तक आगे ले जाने में सहायता देता है। वास्तव में पूर्ण शून्यता ही तो आत्मज्ञान है। वास्तव में वह कुण्डलिनी रहित नहीं होता, पर कुण्डलिनी के प्रति पूर्णतः अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी के माध्यम से ही तो आत्मज्ञान मन में अभिव्यक्त होता है। इसलिए कुण्डलिनी तो बनी ही रहती है। इस बीच, बाद में उसकी दूसरी बार भी कुंडलिनी-जागृति हो सकती है। कुंडलिनी-पानी ध्यान-साधना की आग से धीरे-धीरे गर्म होता रहता है, जागरण के उबाल तक, और फिर एकदम से ठंडा हो जाता है। इसके बाद, वह फिर से गर्म होना शुरू हो जाता है, और इसी तरह का कोर्स लेता है, हालांकि यह पहले की तुलना में कम समय-अवधि का हो सकता है। मेरे साथ सबकुछ मेरे पिछले अच्छे कर्मों के कारण सहजता से हुआ। आध्यात्मिक मास्टर मेरे घर में ही था। वे आध्यात्मिक शास्त्रों को, मुख्य रूप से पुराणों को पढ़ा करते थे। वे कभी भी मेरी तांत्रिक कुंडलिनी के बारे में नहीं जान पाए, और न ही उन्होंने उसके लिए कोई स्वैच्छिक प्रयास ही किया। मैं केवलमात्र उनकी कंपनी / संगति के कारण ही सहजता से उनकी सहायता प्राप्त कर पाया, अर्थात उनसे कभी सहायता नहीं माँगी। यही सद्संगति की महान महिमा है। मैं उपरोक्त उत्तर को और अधिक स्पष्ट करता हूँ. वास्तव में आत्मज्ञान और कुण्डलिनी जागरण का एक जैसा प्रभाव है. दोनों एक ही चीज है. दोनों के बाद कुण्डलिनी सर्वाधिक मजबूती के साथ मन में स्थिर हो जाती है. आत्मज्ञान के बाद थोड़ा ज्यादा मजबूत होती है, पर केवल प्रथम ३ साल के लिए ही. उसके बाद दोनों में कुण्डलिनी का स्तर समान रहता है. जब आदमी आत्मज्ञान को याद करने का प्रयत्न करता है, तो वह तो ढंग से याद नहीं आता, पर उसके बदले कुण्डलिनी मन में छा जाती है, जो अद्वैत और आनंद को पैदा करती है. इसका मतलब है कि यदि कोई रोज के कुण्डलिनी योग अभ्यास से अपने मन में कुण्डलिनी को हमेशा ज़िंदा रखे, तो वह आत्मज्ञानी माना जाएगा. ऐसा भी माना जाएगा कि उसकी कुण्डलिनी जागृत हो चुकी है. सीधे तौर पर इन्हें प्राप्त करने की जरूरत नहीं. यही कुण्डलिनी योग का महत्त्व है. बस इतनी सी बात है. sabhar : Bhism Sharma qwera.com

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