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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है

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शरीर के भीतर के 28 प्राणों को जानकर रह जाएंगे हैरान         हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है। जैसा ऊपर, वैसा नीचे। जैसा बाहर, वैसा भीतर। संपूर्ण ब्रह्मांड को समझने के बजाय यदि आप खुद के शरीर की संवरचना को समझ लेंगे तो ब्राह्मांड और उसके संचालित होने की प्रक्रिया को भी समझ जाएंगे। यहां प्रस्तुत है शरीर में स्थित प्राण की स्थिति के बारे में।

प्राण के निकल जाने से व्यक्ति को मृत घोषित किया जाता है। यदि प्राणायाम द्वारा प्राण को शुद्ध और दीर्घ किया जा सके तो व्यक्ति की आयु भी दीर्घ हो जाती है। प्राण के विज्ञान को जरूर समझें। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं उसी आयाम में चले जाते हैं। हाथी, व्हेल और कछुए की आयु इसलिए अधिक है क्योंकि उनके श्वास प्रश्वास की गति धीमी और दीर्घ है।

वैदिक विज्ञान के अनुसार :
जिस तरह हमारे शरीर के बाहर कई तरह की वायु विचरण कर रही है उसी तरह हमारे शरीर में भी कई तरह की वायु विचरण कर रही है। वायु है तो ही प्राण है। अत: वायु को प्राण भी कहा जाता है। वैदिक ऋषि विज्ञान के अनुसार कुल 28 तरह के प्राण होते हैं। प्रत्येक लोक में 7-7 प्राण होते हैं।
जिस तरह ब्राह्माण में कई लोकों की स्थिति है जैसे स्वर्ग लोक (सूर्य या आदित्य लोक), अं‍तरिक्ष लोक (चंद्र या वायु लोक), पृथिवि (अग्नि लोक) लोक आदि, उसी तरह शरीर में भी कई लोकों की स्थिति है।

शरीर में कंठ से दृदय तक सूर्य लोक, दृदय से नाभि तक अंतरिक्ष लोक, नाभि से गुदा तक पृथिवि लोक की स्थिति बताई गई है। अर्थात हमारे शरीर की स्थिति भी बाहरी लोकों की तरह है। यही हम पृथिति लोक की बात करें तो इस अग्नि लोक भी कहते हैं। नाभि से गुदा तक अग्नि ही जलती है। उसके उपर दृदय से नाभि तक वायु का अधिकार है और उससे भी उपर कंठ से हृदय तक सूर्य लोक की स्थिति है। कंठ से उपर ब्रह्म लोक है।

कंठ से गुदा तक शरीर के तीन हिस्से हैं। उक्त तीन हिस्सों या लोकों में निम्नानुसार 7,7 प्राण हैँ। कंठ से गुदा तक शरीर के तीन हिस्से हैं। उक्त तीन हिस्सों या लोकों में निम्नानुसार 7,7 प्राण है। ये तीन हिस्से हैं- कंठ से हृदय तक, हृदय से नाभि तक और नाभि से गुदा तक। पृथिवि लोक को बस्ती गुहा, वायुलोक को उदरगुहा व सूर्यलोक को उरोगुहा कहा है। इन तीनोँ लोको मेँ हुए 21 प्राण है।

पांव के पंजे से गुदा तक तथा कंठ तक शरीर प्रज्ञान आत्मा ही है, किंतु इस आत्मा को संचालन करने वाला एक और है- वह है विज्ञान आत्मा। इसको परमेष्ठी मंडल कहते हैं। कंठ से ऊपर विज्ञान आत्मा में भी 7 प्राण हैँ- नेत्र, कान, नाक छिद्र 2, 2, 2 तथा वाक (मुंह)। यह 7 प्राण विज्ञान आत्मा परमेष्ठी में हैँ।

अब परमेष्ठी से ऊपर मुख्य है स्वयंभू मंडल जिसमें चेतना रहती है यही चेतना, शरीर का संचालन कर रही है अग्नि और वायु सदैव सक्रिय रहते हैं। आप सो रहे है कितु शरीर मेँ अग्नि और वायु (श्वांस) निरंतर सक्रिय रहते हैं। चेतना, विज्ञान आत्मा ही शरीर आत्मा का संचालन करती है। परमेष्ठी में ठोस, जल और वायु है। यही तीनों, पवमान सोम और वायव्यात्मक जल हैं। इन्हीं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन कहते हैं जल और वायु की अवस्था 3 प्रकार की है अत:जीव भी तीन प्रकार अस्मिता, वायव्य और जलज होते हैं। चेतना को भी लोक कहा है। इसे ही ब्रह्मलोक, शिवलोक या स्वयंभूलोक कहते हैं। ब्रह्मांड भी ऐसा ही है।

योग विज्ञान के अनुसार :
'प्राण' का अर्थ योग अनुसार उस वायु से है जो हमारे शरीर को जीवित रखती है। शरीरांतर्गत इस वायु को ही कुछ लोग प्राण कहने से जीवात्मा मानते हैं। इस वायु का मुख्‍य स्थान हृदय में है। इस वायु के आवागमन को अच्छे से समझकर जो इसे साध लेता है वह लंबे काल तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है। क्योंकि वायु ही शरीर के भीतर के पदार्थ को अमृत या जहर में बदलने की क्षमता रखती है।

हम जब श्वास लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु मुख्यत: पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थित रहकर भी गतिशिल रहती है।

ये पंचक निम्न हैं- (1) व्यान, (2) समान, (3) अपान, (4) उदान और (5) प्राण।

वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति की चेतना में जागरण रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह होता रहता है। इनके कारण ही मन के विचार बदलते रहते या स्थिर रहते हैं। उक्त में से एक भी जगह दिक्कत है तो सभी जगहें उससे प्रभावित होती है और इसी से शरीर, मन तथा चेतना भी रोग और शोक से घिर जाते हैं। मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी प्राणायाम से शुद्ध और पुष्ट रहते हैं। इसके काबू में रहने से मन और शरीर काबू में रहता है।

1.व्यान:- व्यान का अर्थ जो चरबी तथा मांस का कार्य करती है।
2.समान:- समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
3.अपान:- अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
4.उदान:- उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में होती है।
5.प्राण:- प्राण वायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है। यह वायु मूलत: खून में होती है।

प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएं करते हैं- 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। उक्त तीन तरह की क्रियाओं को ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्भक कहते हैं।

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जीव शरीर में कहां रहता है

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जीव शरीर में कहां रहता है ?   कहाँ उत्पन्न होता है ?  मृत्यु के अनन्तर कहाँ रहता है ?  जाकर कहाँ ठहरता है ?

"शिव-गीता"  में श्रीराम जी के इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान् शंकर कहते हैं ------

"राम !  मैं सत्य-ज्ञानस्वरूप ,  अनन्त-परमानन्दस्वरूप हूँ ।

व्यक्त - अव्यक्त का कारण ,  नित्य - विशुद्ध - सर्वात्मा - निर्लेप - सर्वधर्म रहित -  मन से अग्राह्य हूँ ,  किन्तु ऐसा होने पर भी अविद्या अथवा अन्तःकरण से मिलकर शरीर में रहता हूँ ।

५ कर्मेन्द्रियां ,  ५ ज्ञानेन्द्रियां  तथा अन्तःकरण चतुष्टय से मिलकर मैं जीव-भाव को प्राप्त हुआ हूँ  ।

मैं अत्यन्त निर्मल होने पर भी मलिन रूप से प्रतीत होता हूं ,  जिस प्रकार दर्पण मलिन होने पर मुख भी मलिन दिखता है ,  उसी प्रकार अन्तःकरण रूपी दर्पण में मलिनता के कारण आत्मा मलिन प्रतीत होता है ।

वह शरीर में कहां रहती है ?  इसको कहता हूं ---

सुनो !  हृदयरूपी कमल में एक अधोमुखी सूक्ष्म छिद्र है , उसके दहराकाश में ,  यानी ह्रदय में स्थित आकाश में ।

अब सगुण - ब्रह्म  के उपासकों के क्रममुक्ति तथा नाड़ियों के विस्तार को बताते हुए शंकर जी कहते हैं ----

कदम्ब - पुष्प में विद्यमान केसर के समान नाड़ियां हृदय से निकल कर सारे शरीर में फैली है ,  इन नाड़ियों में से अत्यन्त सूक्ष्मतम हिता नाम की नाड़ी है ।

योगियों ने बहत्तर हजार नाड़ियां बताई है , वे सब नाड़ियां हृदय - कमल से निकल कर वैसे ही फैलता है ,  जैसे सूर्यमण्डल से निकली सूर्य की किरणें फैलती है ।

इनमें १०१ मुख्य नाड़ियां हैं ।

जैसे नदियों में जल भरा रहता है , वैसे ही इन नाड़ियों में कर्मफल रूपी जल भरा रहता है , इनमें से एक नाड़ी सीधी ब्रह्मरन्ध्र तक गई है ।

प्रत्येक इन्द्रिय से १० - १०  नाड़ियां  निकल कर विषयोन्मुखी होती हैं ,  ये नाड़ियां आनन्द-प्राप्ति का कारण है तथा स्वप्न आदि का फल भोगने के लिए है ।

उनमें से एक सुषुम्ना नाम की नाड़ी है , उसमें चित्तवृत्ति को समाहित करने वाला योगी मुक्ति प्राप्त करता है ,  दोनों की उपाधि से युक्त चैतन्य को विद्वान् जीव कहते हैं ।

अब यहां शंका होती है कि  यदि सुषुम्ना के निर्गमन से ही मोक्ष होता है तो ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुतियां तथा स्मृतियां निरर्थक हो जाएंगी ,  क्योंकि  "ज्ञानादेव कैवल्यम् प्राप्यते येन मुच्यते"  अर्थात् ज्ञान से ही कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है , जिससे जीव का जन्म - मरण का बन्धन टूट जाता है ।

तो इसका उत्तर देते हुए कहा है कि कामादि दोष से रहित अन्तःकरण ही ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ है ।

जीव - दशा में मुक्ति नहीं होती , किन्तु सुषुम्ना के ब्रह्मरन्ध्र में कुण्डलिनी के जाग्रत होने से जीव को ब्रह्मादि लोकों की प्राप्ति  (गौण-मुक्ति)  होती है , मुख्य कैवल्य मुक्ति नहीं ,  अतः ज्ञान से मुक्ति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति-स्मृति से विरोध नहीं है ।

जैसे अदृश्य होने पर भी सूर्य-चन्द्र-ग्रहण पर राहु का दर्शन होता है , प्रथम नहीं ;   वैसे सवव्यापी आत्मा होने पर भी सूक्ष्म-शरीर में दिखता है ।

जैसे घट-दर्शन से घटाकाश का दर्शन होता है तथा घट को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से घटाकाश जाता हुआ प्रतीत होता है ,  वैसे ही सूक्ष्म शरीर के चले जाने पर आत्मा जाता हुआ प्रतीत होता है ।

इस विषय को समझने के लिए वेदान्त की प्रक्रिया समझ लेनी चाहिए ,  एक चैतन्य के होने पर भी उपाधि भेद से चैतन्य अनेक है ,  किन्तु प्रधान रूप से तीन प्रकार का है ------

१ -- प्रमाता-चैतन्य  ==  "प्रकर्षेण ज्ञाता इति प्रमाता" -- अर्थात् अन्तःकरण से मिला चैतन्य , जानने वाला चैतन्य प्रमाता-चैतन्य है ।

२ --  प्रमाण-चैतन्य  ==  अन्तःकरण की वृत्ति में विद्यमान चैतन्य प्रमाण-चैतन्य है ।

३ -- विषय-चैतन्य  ==  अन्तःकरण से निकल कर आंखादि इन्द्रियों से मिलकर जब चैतन्य जिस इन्द्रिय से सबन्धित होकर देखता है ,  सुनता है --- इन्द्रियों से निकल कर विषयों तक पहुँचने वाली अन्तःकरण की वृत्ति विषय-चैतन्य है ।

जब समान देश-काल में वृत्यवछिन्न चैतन्येन्द्रियों द्वारा विषय के पास जाकर विषय को व्याप्त करके चैतन्याकार होते हैं , तब घटादि पदार्थों का ज्ञान होता है --- इस प्रकार वेदान्त की प्रक्रिया  है ।

प्रमाण अनेकों है ==  प्रत्यक्ष - अनुमान - अर्थापत्ति आदि 

इनमें अनुमान प्रमाण से जैसे पर्वत पर धुआं देखकर अनुमान होता है कि वहाँ अग्नि है ।

"धूमत्वात्" -- धूम-युक्त होने से ,  जहां-जहां धुआं है , वहां-वहां आग है ।

जैसे स्वप्न का जगत् मिथ्या होने पर भी प्रतीत होता है , ऐसे ही जाग्रत भी तुरीया में मिथ्या प्रतीत होता है , स्वप्न का जगत् स्वप्न व स्वप्न के साक्षी तैजस का वासना मात्र है ।

जिस प्रकार दिन का थका हुआ पक्षी रात्रि में अपने पंखों को समेट कर विश्राम करता है , उसी प्रकार जाग्रत में तथा स्वप्न में थका हुआ जीव-रूपी पक्षी भी अपनी वृत्ति रूपी पंखों को समेट कर सुषुप्ति में विश्राम करता है ।

गाढ़ - सुषुप्ति  अविद्या की वृत्ति से होती है , उसमें अनुभव करता है ---- "मैं सुख से सोया था , कुछ भी नही जाना ।"

राम !   स्वयंप्रकाश देहातीत आत्मा का स्वरूप मैंने तुम्हारे सामने कहा , वह तीन गुण , तीनों शरीरों से परे , शुद्ध सच्चिदानंद स्वरूप है ,  वही हम दोनों में अभेद रूप से है ।

श्री शंकराचार्य वेद वेदांत विज्ञान sabhar satsang Facebook wall

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शिवलिंग के वैज्ञानिक तथ्य

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अगर आप गौर से #भाभा_एटॉमिक_रिसर्च_सेंटर (मुंबई) के #न्यूक्लियर_रिएक्टर की संरचना को देखें तो आप पाएंगे की #शिवलिंग_और_न्यूक्लियर_रिएक्टर में काफी समानताएं हैं।

दोनों की संरचनाएं भी एक सी हैं दोनों ही कहीं न कहीं उर्जा से संबंधित हैं। शिवलिंग पर लगातार जल प्रवाहित करने का नियम है। 

देश में, ज्यादातर शिवलिंग वहीं पाए जाते हैं जहां जल का भंडार हो, जैसे नदी, तालाब, झील इत्यादि। विश्व के सारे न्यूक्लियर प्लांट भी पानी (समुद्र) के पास ही हैं।

शिवलिंग की संरचना बेलनाकार होती है और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (मुंबई) की रिएक्टर की संरचना भी बेलनाकार ही है। न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखने के लिये जो जल का इस्तेमाल किया जाता है उस जल को किसी और प्रयोग में नहीं लाया जाता। उसी तरह शिवलिंग पर जो जल चढ़ाया जाता है उसको भी प्रसाद के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता है।

शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है। जहां से जल निष्कासित हो रहा है, उसको लांघा भी नहीं जाता है। 

ऐसी मान्यता है की वह जल आवेशित (चार्ज) होता है। उसी तरह से जिस तरह से न्यूक्लियर रिएक्टर से निकले हुए जल को भी दूर ऱखा जाता है।

भारत का #रेडियोएक्टिविटी_मैप उठा कीजिये तो आप हैरान हो जाओगे की भारत सरकार के नुक्लिएर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है | 

शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। 

महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं | 

क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता | भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है | शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है |

ऐसी मान्यता है कि वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की ही आकृति है। जिस तरीके से लगातार उर्जा देते रहने से न्यूक्लियर रिएक्टर गर्म हो जाता हैतथा उसको ठंडा रखने के लिये जल की जरूरत है उसी तरह शिवलिंग को भी जल की जरूरत होती है। 🔱🔱

ऐसा माना जाता है की शिवलिंग (ब्रह्मांड) भी एक उर्जा का स्रोत है जिससे लगातार उर्जा निकलती रहती है। लोग श्रद्धा से बेल का पत्ता शिवलिंग पर चढ़ाते हैं| 🔱🔱

वैज्ञानिक शोध से ये ज्ञात हुआ है की बेल के पत्तों में रेडियो विकिरण रोकने की क्षमता है।

प्राचीन कल में लोगशिवलिंग को उर्जा अथवा विकिरण का स्रोतमानकर उस पर जल एवं बेल पत्तों को चढ़ाते थे।

ऐसा भी माना जाता है की सोमनाथ के मंदिर के शिवलिंग में “स्यामन्तक” नामक एक पत्थर को हमारे पूर्वजों ने छुपा के रखा था।इसके बारे में धारणा है की ये रेडियोएक्टिव भी था। 

यह भी माना जाता हैं गजनी ने इस पत्थर को प्राप्त करने के लिये सोमनाथ के मंदिर पर कई बार हमला किया था।

एक कथा यह भी प्रचलित थी कि इस पत्थर से किसी भी धातु को सोना में बदला जा सकता था। शायद इसी कारण से लोग सोमनाथ के शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाते थे ताकि विकिरण का प्रभाव कम हो सके।प्रथा आज भी प्रचलित है।

हम अपने दैनिक जीवन में भी देख सकते है की जब भी किसी स्थान पर अकस्मात उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एकवृताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दसों दिशाओं मेंफैलता है।

फलस्वरूप एक क्षणिक शिवलिंग आकृति की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट सेप्राप्त उर्जा का प्रतिरूप, शांत जल में कंकड़ फेंकने पर प्राप्त तरंग (उर्जा) काप्रतिरूप आदि।

सृष्टि के आरंभ में महाविस्फोट (बिग बैंग) के पश्चात उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ, फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ।

जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है कि आरंभ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल (अनंत) था कि देवता आदि मिल करभी उस लिंग के आदि और अंत का छोर या शाश्वत अंत न पा सके ।

पुराणों में कहा गया है कि प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंगमें समाहित (लय) होता है तथा इसी से पुन: सृजन होता है।

#बिग_बैंग (महाविस्फोट) का सिद्धांत सर्वप्रथम Georges Lemaître ने 1920 में दिया। 

यह सिद्धांत कहता है कि कैसे आज से लगभग 13.7 खरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक बिंदु से हुई थी जिसकी ऊर्जा अनंत थी।

उस समय मानव, समय और स्थान जैसी कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं थी अर्थात कुछ नही था ! 

इस धमाके में अत्यधिक ऊर्जा का उत्सजर्न हुआ।यह ऊर्जा इतनी अधिक थी कि इसके प्रभाव से आज तक ब्रह्मांड फैलता ही जारहा है।

सारी भौतिक मान्यताएं इस एक ही घटना से परिभाषित होती हैं जिसे महाविस्फोट सिद्धांत कहा जाता है। महाविस्फोट नामक इस धमाके के मात्र 1.43 सेकेंड अंतराल के बाद समय,अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आ चुकी थीं।

भौतिकी के नियम लागू होने लग गये थे।1.34वें सेकेंड में ब्रह्मांड 1030 गुणा फैल चुका था हाइड्रोजन, हीलियम आदि के अस्तित्त्व का आरंभ होने लगा था और अन्य भौतिक तत्व (आकाश,वायु,अग्नि,जल,पृथ्वी) बनने लगे थे।

शिवलिंग के महत्ता पीछे कई धार्मिक कहानियां भी हैं, जो प्रतीकात्मक तरीके से यही बातें कहती हैं। आधुनिक विज्ञान कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद आज एक ऐसे बिंदु पर पहुँचा है जहाँ वे यह सिद्ध कर रहे हैं कि हर चीज जिसे आप जीवन के रूप में जानते हैं। वह सिर्फ ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों करोड़ों रूप में व्यक्त करती है।

दरअसल शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। 

इसलिए महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

 क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है। 🔱🔱

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्।।

केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।
सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये।।

द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलो भवेत्।।

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,,
जयतिपुण्य भूमि भारत,,
कष्ट हरो,,,काल हरो,,,दुःख हरो,,,दारिद्र्यहरो,

🚩🚩🚩🔱🔱 हर हर महादेव 🔱🔱🚩🚩🚩

श्रेय - The Power
दिनांक - २६.०७.२०२१
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रविवार, 25 जुलाई 2021

प्राणशक्ति क्या है

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरूण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

       (आजकल सोशल मीडिया, व्हाट्स एप  और फेसबुक पर ध्यान, तंत्र, मंत्र, और यंत्र, कुण्डलिनी-जागरण, धन-प्राप्ति की लालसा के लिए तंत्र में उपाय, भूत-बाधा आदि भगाने के लिए तंत्र-मंत्र के अनुष्ठान कर् समाधान किये जाने के लिए बाढ़-सी आयी हुई है। अक्सर व्यक्ति का ध्यान नहीं लग पाता है, कैसे लगेगा ध्यान--यही जिज्ञासा लेकर सवाल करते रहते है और खास तौर से बॉक्स में आकर जरूर 'हाय हेलो' कहते हैं। वे ध्यान करने के चक्कर में  प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए प्राणायाम की बिलकुल ही उपेक्षा कर देते हैं। अनेक बार बॉक्स में सार्वजानिक हित चिन्तन के विषय पर प्रश्न करने के लिए मैंने साफ मना किया हुआ है, फिर भी लोग अपनी प्रकृति और आदत के अनुसार ध्यान नहीं देते हैं। मैंने लोगों को अपनी कोई व्यक्तिगत समस्या रखने और उसका समाधान प्राप्त करने के लिए स्पष्ट मना कर् रखा है। इस पोस्ट में ध्यान-साधना या योग-साधना के लिए प्राण-शक्ति की महत्ता और उसकी उपयोगिता पर चर्चा करना उपयुक्त समझा है क्योंकि कोई भी व्यक्ति सीधे साधना की अन्तिम सीढ़ी 'ध्यान और समाधि' को उपलब्ध् नही हो सकता।
       मानव शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व के सूक्ष्म अणुओं से निर्मित है और साथ ही यह जगत् भी। तो ध्यान साधना करने के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए पहले हमें अपने भौतिक शरीर को स्वस्थ रखने की परम आवश्यकता है जिसके अस्वस्थ होने की दशा में कोई भी साधना सम्भव नहीं है। इसीलिए पातंजल योगसूत्र के अष्टांग योग में सर्वप्रथम यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और फिर उसके बाद ही धारणा, ध्यान समाधि का वर्णन आया है।
        पहले पांच बहिरंग उपाय हैं जिनसे हमारी स्थूल काया निरीगी होने के साथ-साथ निर्मल भी रहे। इन उपायों से हमारा 'अन्नमय कोश' शुद्ध और ऊर्जावान बन जाता है। उसके बाद आते हैं अंतरंग उपाय पर जो धारणा, ध्यान के द्वारा फलीभूत होते हैं। अन्त में आती है समाधि जो गहनतम ध्यान की स्थिति में घटित होती है। यह साधना जन्म-जन्मान्तर में जाकर कहीं पूर्णता को प्राप्त होती है। 
       यम, नियम, आसन से जहाँ अन्नमय कोश ऊर्जावान बनता है, वहीँ प्राणायाम के माध्यम से हमारा प्राणमय कोश ऊर्जस्वित् होता है। प्राण शरीर प्राणमय कोश से निर्मित होने के कारण अन्नमय शरीर की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है। इस पोस्ट में हम प्राणशक्ति क्या है--इस विषय पर चर्चा करेंगे)

       जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के मूल में विद्युत-शक्ति है, उसी प्रकार योग-विज्ञान के मूल में है-- प्राण-शक्ति। प्राण और श्वास का अपना विज्ञान है जो योग-शास्त्र पर आधारित है। प्राण का विषय अत्यन्त रहस्यमय और जटिल भी है।
       वैदिक विज्ञान के अनुसार गहरा श्वास लेने पर शरीर के भीतर ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में परिवर्तन हो जाता है, उसके अनुपात में परिवर्तन हो जाता है। अनुपात के इस परिवर्तन का साधना में क्या प्रभाव पड़ता है ?--यह जानना-समझना अति आवश्यक है।
       प्रकृति के ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड ये दो मूल तत्व हैं और इन्हीं दोनों तत्वों के बीच जीवन और मृत्यु का खेल चलता है। एक का परिणाम 'जीवन' है और दूसरे का परिणाम है--'मृत्यु'। जब शरीर के भीतर ऑक्सीजन की मात्रा धीरे-धीरे कम हो जाती है तो अन्त में शेष रह जाता है--कार्बन डाई ऑक्साइड जिसका अर्थ है--मृत्यु। sabhar siyaram sharam Facebookwal
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मल्टीप्ल यूनिवर्स

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हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है |उन्होने अपनी पिछली पुस्तक "द एम्पर्स न्यू माएंड " मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब " साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स " मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक 'एओन ' या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो केया वैज्ञान कही ना कही इस्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे | by akhilesh pal

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शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

बिटकॉइन

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बिटकॉइन एक Virtual Currency है इसका अविष्कार Santoshi Nakamoto ने 2009 में किया था ये बाकी करेंसी की तरह ही एक Digital Currency है। बस हम इसे बाकी करेंसी की तरह छुके नही सकते । लेकिन हम इसका उपयोग online कर सकते है क्योंकि यह एक Digital Currency है।Bitcoin एक Virtual मुद्रा है या फिर हम इसे डिजिटल मुद्रा भी कह सकते है। आप इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। जैसे कि आपके बैंक खाते में जब पैसे होते है तो आप अपने बैंक खाते से net-banking या फिर debit या credit card की मदद से online shopping कर सकते है या बिलों का भुगतान कर सकते है। ठीक इसी तरह bitcoin भी आपके बैंक के खाते के पैसों की तरह होता है जिसका इस्तमाल आप बाकी सभी करेंसी की तरह कर सकते है। sorce https://currencyinbox.com

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