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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

हृदय का राजा अर्जुन छाल

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 हृदय  का राजा अर्जुन छाल ।।


अर्जुन एक शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जो विशेष रूप से हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद मानी जाती है। आयुर्वेद में अर्जुन की छाल को दिल की मांसपेशियों को मजबूत करने, उन्हें टोन करने और हृदय को ऊर्जा देने के लिए एक प्रमुख औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। अर्जुन की छाल का सेवन हृदय के सभी पहलुओं का समर्थन करने और इसके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है।

शरीर में आई सूजन को घटाने के लिए भी अर्जुन की छाल अच्छी मानी गई है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो सूजन घटाते हैं


अर्जुन की छाल के मुख्य फायदे:


1. हृदय को मजबूत बनाती है – अर्जुन छाल रक्त संचार को सही रखती है और हृदय की धमनियों को स्वस्थ बनाए रखती है।


2. ब्लड प्रेशर कंट्रोल करती है – हाई ब्लड प्रेशर और लो ब्लड प्रेशर दोनों को संतुलित करने में मददगार है।


3. कोलेस्ट्रॉल कम करती है – खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने में सहायक है।


4. दिल की धड़कन को नियंत्रित करती है – अनियमित धड़कनों (Arrhythmia) को सही करने में मदद करती है।


5. ब्लड शुगर को नियंत्रित करती है – मधुमेह के मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद है।


6. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर – शरीर में फ्री रेडिकल्स को कम करके एंटी-एजिंग प्रभाव डालती है।


7. लिवर और किडनी के लिए लाभकारी – यह लिवर को डिटॉक्स करने और किडनी को स्वस्थ रखने में मदद करती है।


8. तनाव और चिंता को कम करती है – यह एक प्राकृतिक एडेप्टोजेन है, जो मानसिक शांति देती है।


9. पाचन में सुधार – अपच, गैस और एसिडिटी जैसी समस्याओं में फायदेमंद होती है।


10. घाव भरने में मदद करती है – त्वचा के घावों को जल्दी भरने में उपयोगी है।


अर्जुन की छाल का उपयोग कैसे करें?

आयुर्वेदिक चिकित्सक के अनुसार, अर्जुन की छाल का सबसे प्रभावी उपयोग अर्जुन की छाल की चाय के रूप में होता है। 


1. अर्जुन चाय – 1 चम्मच अर्जुन की छाल पाउडर को 1 कप पानी में उबालकर दिन में 1-2 बार पिएं।


2. अर्जुन दूध – आधा चम्मच अर्जुन छाल पाउडर को 1 गिलास दूध में उबालकर सेवन करें।


3. कैप्सूल या टैबलेट – आयुर्वेदिक स्टोर्स में उपलब्ध अर्जुन कैप्सूल का सेवन कर सकते हैं।


सावधानियाँ:


गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।


किसी भी दवा के साथ लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।


अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट दर्द या एसिडिटी हो सकती है।


अगर आप इसे अपने डेली रूटीन में शामिल करना चाहते हैं, तो डॉक्टर की सलाह जरूर लें।।।


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कच्ची इमली खाने के है इतने फायदे लेकिन इन बातों का रखें ध्यान

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 इमली में उच्च मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रहता है. यह शरीर के लिए टॉनिक की तरह काम करती है. इसके रोजाना सेवन से शरीर साफ रहता है, पेट और अन्य अंगों 

कच्ची इमली खाने के है इतने फायदे लेकिन इन बातों का रखें ध्यान

पाचन- इमली में प्राकृतिक फाइबर होता है जो पाचन को सुधारने में मदद करता है. ...

इम्यूनिटी- इमली में विटामिन सी और एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं, जो इम्यूनिटी को बढ़ाने में मददगार हैं. ...

दिल- हार्ट के मरीजों के लिए फायदेमंद है इमली का सेवन. ...

मोटापा- ...

सूजन- ...

स्किन-

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इमली में उच्च मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रहता है. यह शरीर के लिए टॉनिक की तरह काम करती है. इसके रोजाना सेवन से शरीर साफ रहता है, पेट और अन्य अंगों की गंदगी दूर होती है 


रोजाना इमली खाने से शरीर में आता है ये बड़ा बदलाव, दूर होती हैं खतरनाक बीमारियां


इमली पुरुषों के लिए कई तरह से फ़ायदेमंद होती है. यह पुरुषों की यौन समस्याओं को दूर करने में मदद करती है. साथ ही, यह इम्यूनिटी को भी बढ़ाती है. 

इमली के फ़ायदे:

इमली में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होता है. यह पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद करता है. 

इमली के चूर्ण का सेवन करने से लो-स्पर्म काउंट की समस्या दूर होती है. 

इमली का सेवन करने से इनफ़र्टिलिटी से बचा जा सकता है. 

इमली का सेवन करने से लिबिडो हार्मोन बढ़ता है. 

इमली का सेवन करने से फैटी लीवर की समस्या नहीं होती. 

इमली का सेवन करने से इम्यूनिटी बढ़ती है. 

इमली में कई ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिनका अच्‍छा असर स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है. 

इमली में प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीड साभार Facebook 

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वंशलोचन स्त्री प्रजाति के बाँस पेड़ों से प्राप्त एक प्रकार की हर्बल सिलिका है

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 वंशलोचन स्त्री प्रजाति के बाँस पेड़ों से प्राप्त एक प्रकार की हर्बल सिलिका है,बांस सिलिका (FOLIUM BAMBUSEA) में अन्य सिलिका स्रोतों की तुलना में अधिक सिलिकॉन डाइऑक्साइड होता है। इसमें लगभग 70 से 90% सिलिका होती है। इसमें मुख्य तौर पर सिलिका (सिलिकॉन डाइऑक्साइड) होती है, जो हड्डियों, स्नायुबंधन, tendons और त्वचा के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है।


👉इसमें शरीर के लिए आवश्यक अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व होते हैं। यह समग्र स्वास्थ्य में सुधार करता है l वंशलोचन का शरीर के ऊतकों पर पुनर्स्थापनात्मक प्रभाव होता है।


वंशलोचन में कई औषधि गुण होते है।👇👇


👉आयुर्वेद के अनुसार, यह प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, इसलिए यह सितोपलादि चूर्ण का एक मुख्य घटक है जिसका उपयोग इम्युनो-मॉड्यूलेटर के रूप में किया जाता है।


👉यह सर्दी और बहती नाक के लिए बहुत प्रभावी दवा है।


👉वंशलोचन में अल्सर से बचाव करनेवाले गुण हैं। प्रवाल पिष्टी, मुक्ता पिष्टी, और यशद भस्म के साथ, यह पेप्टिक अल्सर और आंत्र सूजन के रोगों जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस और Crohn's disease में उत्कृष्ट परिणाम देता है।


👉बालों के विकास को प्रोत्साहित कर बालों को मजबूत बनाता है। यह प्रभाव उसमें स्थित प्राकृतिक सिलिका के कारण है। इसमें मौजूद सिलिका बालों को पतला होने से और बाल झड़ने से रोकता है।


👉वंशलोचन के गुण-लाभ और प्रयोग- वंशलोचन उत्तेजक, ज्वरहर, कफनि:सारक, बल्य, वृष्य, प्यासशमन करने वाला, उद्वेष्ठननिरोधि एवं माही होता है।


👉वंशलोचन से वसनसंस्थान की श्लेष्मलकला को पुष्टि मिलती है तथा कफ की मात्रा कम होती है।


👉वंशलोचन से बने हुए सितोपलादि चूर्ण का व्यवहार जीर्णज्वर, श्वास, कास, क्षय, मन्दाग्नि, कमजोरी, कफ में खून जाना, दाह, पूयमेह, मूत्रदाह तथा वातविकार एवं सर्पदंश में किया जाता है।


👉इसकी कोमल गांठ तथा पत्रों का क्वाय गर्भाशय संकोचक होता है। इसका उपयोग प्रसूता में आतंवशुद्धि के लिए एवं अन्य आर्तव विकारों में किया जाता है।


👉वंशलोचन के कोमलपत्र का उपयोग कफ से खून जाना, कुष्ठ, ज्वर तथा बच्चों के सूत्रकृमि में किया जाता है।


👉वंशलोचन के प्रांकुर (Shoots) का रस निकालकर कृमियुक्त थावों पर डाला जाता है तथा बाद में उसका पुल्टिस उन पर बाँध दिया जाता है।


👉जिन लोगों का पाचन ठीक नहीं होता उनको इसके कोमल प्रांकुरों से बने सिरके का उपयोग मांस-मछली के साथ देना उपयोगी होता है। इससे भूख बढ़ती है तथा पाचन भी ठीक होता है।


👉वंशलोचन की गाँठों को पीसकर जोड़ों के दर्द पर उसका बन्धन उपयोगी है।


👉वंशलोचन के बीज को गरीब लोग चावल के रूप में खाते हैं।


👉वंशलोचन का मूल विस्फोटक व्याधियों (Eruptive affections) में बहुत उपयोगी है तथा दाद पर लाभदायक है।

वंशलोचन के पुष्परस का उपयोग कर्णबिन्दु के रूप में कर्णशूल एवं बाधिर्य आदि में किया जाता है।


👉सेवन विधि एवं मात्रा- वंशलोचन चूर्ण 1 ग्राम सादे जल या गुनगुने दूध से लेना हितकारी रहता है।


👉अमृतम द्वारा निर्मित लोजेन्ज माल्ट में वंशलोचन का विशेष पध्दति द्वारा मिश्रण किया जाता है।


👉सावधानियां : आयुर्वेद के अनुसार, वंशलोचन ज्यादा मात्रा में लेना प्रोस्टेट ग्रंथि और फेफड़ों के लिए अच्छा नहीं है I पथरी होनेपर और स्तनपान के दौरान इसका प्रयोग ना करे l

पोस्ट fb sabhar 🙏

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रविवार, 23 फ़रवरी 2025

मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

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 मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक  ?


मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं

( १ ) : - उर्ध्व गति


( २ ) : - स्थिर गति और


( ३ ) : - अधो गति।


व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न- भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।


आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं


१ ) : - जीवात्मा,


( २ ) : - प्रेतात्मा और


( ३ ) : - सूक्ष्मात्मा


जो भौतिक शरीर में वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।


कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है। उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।


पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग


( १) : -  पहली विज्ञान आत्मा,


( २ ) : - दूसरी महान आत्मा और


( ३ ) : - तीसरी भूत आत्मा।


( १ ) : - विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील दूर है।


( २ ) : - महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28 अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।


( ३ ) : - भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।


वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित कर्म में लगे रहे हैं मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने थोड़ा-बहुत धर्म भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है।


और जिन्होंने वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त होती है।


अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे आदि योनि में पहुंच जाता है।


स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच जाता है, लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक पहुंच जाता है।


जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले लेता है।


लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।


यही मोक्ष है.......

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

तंत्र साधना में असम को स्त्री प्रदेश भी कहा जाता हैं

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 #कामरू_कामाख्या

असम को स्त्री प्रदेश भी कहा जाता हैं। वहां प्राचीन काल से ही तंत्र साधना के क्षेत्र में स्त्री शक्तियों का विशेष प्रभाव मौजूद रहा है। आज भी असम के कामाख्या क्षेत्र में तंत्र साधिकाओ का बहुत बड़ा वर्ग मौजूद है। जो अद्भुत तांत्रिक शक्तियों में  निपुण हैं।असम एक ऐसा क्षेत्र है जहां कामाख्या नामक शक्तिपीठ मौजूद है। शक्तिपीठ के विषय में आप सभी को जानकारी होगी। इसीलिए थोड़ा संक्षेप में विवरण दे रहा हूं। यहां भगवती का गुप्तांग गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां पर कामाख्या मंदिर में उसी की पूजा होती है। वहां कोई भी विग्रह नहीं है बल्कि योनि मंडल बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि जून के महीने में 3 दिनों के लिए योनि में रजस्त्राव होता है। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं और उस क्षेत्र में पूजा-पाठ का कार्यक्रम रोक दिया जाता है। 

उस दौरान यह भी देखा गया कि ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल रंग का हो जाता है।उस समय विशेष में, मंदिर में योनि मंडल के ऊपर वस्त्र  बिछा दिये जाते है।इन वस्त्रों को प्रसाद के रूप में दर्शनार्थियों में बांट दिया जाता है। इसे कामाख्या तार कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस वस्त्र का एक भी तार अगर किसी के शरीर पर ताबीज के रूप में या किसी अन्य रुप में मौजूद हैं तो उसके ऊपर किसी भी प्रकार का तांत्रिक प्रयोग कोई प्रभाव नहीं डालेगा। 

इसे मूल शक्तिपीठ माना जाता है। सभी प्रकार के जीवो के जन्म लेने का कारण योनि ही होता है। संभवतः इसीलिए इस पीठ को सबसे ज्यादा मान्यता दी गई हैं। तांत्रिक क्षेत्र में जितने भी सिद्ध पुरुष हुए हैं उन्होंने इस तांत्रिक क्षेत्र में आकर कोई ना कोई साधना सिद्धि अवश्य प्राप्त की है।शाबर मंत्र साधना के अधिकांश विशेषज्ञ या सिद्ध पुरुष कामाख्या को ही अपनी शक्तियों का केंद्र मानते हैं वे यथासंभव वहां जाकर दर्शन करने या वहां साधना करने की कोशिश अवश्य करते हैं।इससे उनकी शक्तियां और उनकी साधनात्मक  क्षमता दोनों और बढ़ती है।कामाख्या को कामरूप, कौरु नगर जैसे नामों से भी जाना जाता है। इन स्थानों पर रहने वाली स्त्रियों को तंत्र विद्या में निपुण माना जाता है। यही नहीं यह भी मान्यता है कि पहले किसी भी जानवर जैसे पक्षी पशुओं में परिवर्तित करके अपने पास बंदी बना लेते हैं फिर उनसे मनचाहा काम भी करवाते हैं आवश्यकता अनुसार आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती रहती हैं।

कामाख्या पीठ का लोगों का निजी अनुभव है कोई भी ऐसा काम जो नहीं हो पा रहा हो तो एक बार भगवती कामाख्या के दरवाजे पर पहुंचकर उनसे निवेदन करके जरूर देखें। साल भर के अंदर वह कार्य जरूर पूर्ण हो जाता है। 

हां! इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि वह कार्य किसी को कष्ट पहुंचाने वाला या सामाजिक मान्यता को नष्ट करने वाला न हो। 

आप अपने विकास के लिए कोई भी इच्छा  रखें और भगवती कामाख्या के दर्शन को जाऐ तो 90% संभावना है कि आपका काम हो जाएगा


इस संबंध में मुझे एक कहीं पड़ी हुई घटना की याद आ रही है। जिसे मैं आप लोगों के साथ शेयर करना चाहता हूं। जो कामाख्या से संबंधित है और संभवत किसी विदेशी जिज्ञासु ने लिखी है। 

वह विदेशी भारत में  कामाख्या के तंत्र साधिकाओ के विषय में सुनकर आया था। बहुत मेहनत करने के बाद वह एक ऐसी ही तंत्र साधिका के सम्पर्क में आया जिसने उसे प्रत्यक्ष में तंत्र साधना का प्रयोग करके दिखाने पर सहमति व्यक्त कर दी।

साधिका के निर्देश पर वह व्यक्ति एक काला मुर्गा अपने साथ लाया। एक लगभग 8 फीट गहरा गड्ढा खुदवाया गया, मुर्गे को उस गड्ढे में डाल दिया गया और उसे चटाई से ढक दिया गया।


इसके पश्चात साधिका उस गड्ढे से लगभग चार फीट दूर बैठ गयी। विदेशी भी वहीं पर बैठा रहा ताकि देखता रहे कोई गड़बड़ी तो नहीं हो रही हैं।

उस साधिका ने कुछ मंत्रों का उच्चारण किया और काली मिर्च के दाने उस चटाई पर फेंक दिये। उनके चटाई पर गिरने तक की हल्की आवाज तक उस विदेशी पर्यटक को सुनाई दी! 

उसके बाद मुर्गे की चीख  एक बार सुनाई थी। उसके बाद सब कुछ शांत हो गया।

कुछ समय बाद साधिका ने अपनी आंखे खोली और उस विदेशी पर्यटक को चटाई हटाकर देखने के लिए कहा।

उसे लगा कुछ खास तो घटित हुआ नहीं होगा जैसा मुर्गा है वैसा ही होना चाहिए।

लेकिन.... 

जैसे ही उसने चटाई हटाई वह मुर्गा मृत पड़ा हुआ था। वह तुरंत गढ्ढे में कूदा और उस मुर्गे को बाहर लेकर निकला।

उस मुर्गे के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। 

मंत्र शक्ति का प्रभाव उस पर्यटक को पता चल गया था।

उस साधिका ने बताया है यह तो तुम्हें दिखाने के लिए इस गढ्ढे में मुर्गे को रखा गया है। अगर मुर्गा यहां से 100 किलोमीटर दूर भी होता तो भी इसकी यही हालत होनी थी। 


इतना कह कर वह तंत्र साधिका वहां से लुप्त हो गई।

इस घटना से आप कामाख्या तंत्र क्षेत्र की साधिकाओं की क्षमता के बारे में समझ सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके द्वारा की गई तंत्र की काट बहुत मुश्किल होती है!लगभग असंभव।


गुरु गोरखनाथ तंत्र के अद्भुत विद्वान माने जाते हैं। और शाबर तंत्र साधना में उनका स्थान बेहद प्रतिष्ठित और सिद्ध पुरुषों में लिया जाता है। 

उनके गुरु मछेंद्रनाथ थे! जो इस क्षेत्र से गुजर रहे थे! तभी यहां की रानी ने उन्हें महल में बुलवा लिया और उस के बाद ऐसा प्रयोग सम्पन्न किया कि गुरुदेव मच्छिंन्द्रनाथ सारी दुनियादारी भूलकर राजकाज संभालकर रानी के साथ रास विलास में लीन  हो गये। 

जब काफी समय बीत गया और गुरुदेव मच्छिंन्द्रनाथ का कोई अता पता नहीं चला... 

तो गोरखनाथ अपने गुरु की तलाश में निकले! और किसी प्रकार से अपने गुरु को उस रानी के चंगुल से छुड़ा कर ले जाने में सफल हुए। 

तो कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह हैं कि कामाख्या एक रहस्यमई जगह है और वहां रहने वाली महिला साधिकाओ का रहस्य उस से भी गहरा हैं। दिखने में उनमें कोई भी विशिष्टता दिखाई नहीं देगी! वह सामान्य महिलाओ की तरह ही दिखेगी लेकिन जब वह अपनी औकात पर आ जाये तो अच्छे अच्छे तांत्रिको को अपनी पांव की जूती की नोक पर रख लेती है और अपनी अंगुलियो पर नचाती हैं। एक प्रकार से वे महामाया का ही अंश है जो इस सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती है।

जय माँ कामरूप कामाख्या  🙏🙏🙏

#अनूप साभार  Facebook wall

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अमरूद खाने से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है

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 अमरूद खाने से कई तरह की बीमारियों से बचाव होता है


 अमरूद के फ़ायदेः 

ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।

वज़न घटाने में मदद करता है।

आंखों की रोशनी बढ़ाने में मदद करता है।

पाचन को ठीक रखता है।

इम्यून सिस्टम को मज़बूत करता है।

डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद होता है।

गर्भवती महिलाओं के लिए फ़ायदेमंद होता है।

कब्ज़ से राहत देता है।

शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को सही रखता है।

थायराइड के मरीज़ों के लिए फ़ायदेमंद होता है।

अमरूद में मौजूद पोषक तत्वः 

विटामिन-सी, लाइकोपीन, एंटीऑक्सीडेंट, पोटैशियम, मैग्नीशियम, फ़ाइबर, आयरन, फ़ोलिक एसिड, नियासिन (Vitamin B3), कॉपर.

अमरूद के कुछ और फ़ायदेः कैंसर के जोखिम को कम करता है, एनीमिया से राहत दिलाता है, ब्रेन फ़ंक्शनिंग में सुधार करता है, प्रजनन क्षमता को बढ़ावा देता है। साभार विनोद कुमार facebook wall

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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

जिन खोजा तिन पाईंयां--प्रवचन

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 कभी आपने खयाल किया, आपने किसी आदमी को मरते देखा? आप कहेंगे, बहुत लोगों को देखा। पर मैं कहता हूं, नहीं देखा। आज तक किसी व्यक्ति ने किसी को मरते नहीं देखा। मरने की प्रक्रिया आज तक देखी नहीं गई। जो हम देखते हैं, वह केवल जीवन के विदा हो जाने की प्रक्रिया है, मरने की नहीं।


बटन दबाई हमने, बिजली का बल्ब बुझ गया। जो नहीं जानता, वह कहेगा, बिजली मर गई। जो जानता है, वह कहेगा, बिजली अभिव्यक्त थी, अब अप्रकट हो गई। प्रकट थी, अप्रकट हो गई। मर नहीं गई। फिर बटन दबेगा, बिजली फिर वापस लौट आएगी। फिर बटन दबाएंगे, बिजली फिर भीतर तिरोहित हो जाएगी।


जीवन समाप्त नहीं होता, केवल शरीर से विदा होता है। लेकिन विदाई हमें मृत्यु मालूम पड़ती है। क्यों मालूम पड़ती है? क्योंकि हमने कभी अपने भीतर शरीर से अलग किसी अस्तित्व का अनुभव नहीं किया है। हमारा अनुभव यही है कि मैं शरीर हूं, इसलिए जब शरीर समाप्त होगा, जलाने के योग्य हो जाएगा, तब स्वभावतः निष्कर्ष होगा कि मर गए।


शरीर से अलग जिसने अपने भीतर किसी तत्व को नहीं जाना, वह अज्ञानी है। अज्ञानी का मतलब यह नहीं कि जिसे यूनिवर्सिटी की डिग्री नहीं है, विश्वविद्यालय का कोई सर्टिफिकेट नहीं है। सच तो यह है कि विश्वविद्यालय ने जितने सर्टिफिकेट दिए, अज्ञान उतना बढ़ा है, कम नहीं हुआ। कारण है। कारण यह है कि विश्वविद्यालय के सर्टिफिकेट को लोग ज्ञान समझने लगे। इसलिए असली ज्ञान की खोज की कोई जरूरत नहीं मालूम पड़ती। अज्ञानी आदमी के पास सर्टिफिकेट नहीं होता; वह ज्ञान की खोज करता है। तथाकथित ज्ञानी के पास सर्टिफिकेट होता है; वह मान लेता है कि मैं ज्ञानी हूं। मेरे पास यूनिवर्सिटी की डिग्री है। और क्या चाहिए?


ज्ञान तो सिर्फ एक है, स्वयं का ज्ञान। बाकी सब सूचनाएं हैं, इनफर्मेशनस हैं, नालेज नहीं। बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं।


बर्ट्रेंड रसेल ने ज्ञान के दो हिस्से किए हैं, नालेज और एक्वेनटेंस–ज्ञान और परिचय। ज्ञान तो सिर्फ एक ही चीज का हो सकता है, जो मैं हूं; बाकी सब परिचय है, ज्ञान नहीं है। अपने से पृथक जिसे भी मैं जानता हूं, वह सिर्फ एक्वेनटेंस, परिचय है। जान तो सिर्फ अपने को सकता हूं; क्योंकि अपने से जो भिन्न है, उसके भीतर मेरा प्रवेश नहीं हो सकता, सिर्फ बाहर घूम सकता हूं। परिचय ही कर सकता हूं, ऊपर-ऊपर से जान सकता हूं, भीतर तो नहीं जा सकता। भीतर तो सिर्फ एक ही जगह जा सकता हूं, जहां मैं हूं।


यह बहुत मजे की बात है, अपना परिचय नहीं होता और दूसरे का ज्ञान नहीं होता। दूसरे का परिचय होता है, अपना ज्ञान होता है। अपना परिचय नहीं होता; क्योंकि अपने बाहर घूमने का उपाय नहीं है। दूसरे का ज्ञान नहीं होता; क्योंकि दूसरे के भीतर प्रवेश नहीं है।


लेकिन हम बड़े अजीब लोग हैं! हम दूसरे का ज्ञान ले लेते हैं और अपना परिचय कर लेते हैं। हम अपना परिचय कर लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। और हम दूसरे के ज्ञान को ज्ञान समझ लेते हैं, जो कि हो नहीं सकता। यह अज्ञान की स्थिति है। अज्ञान में मृत्यु है।


जब आप एक व्यक्ति को बुझते देखते हैं–बुझते, मरते नहीं। इसलिए बुद्ध ने ठीक शब्द का उपयोग किया है। वह शब्द है, निर्वाण। निर्वाण का अर्थ है, दीए का बुझना। बस, दीया बुझ जाता है; कोई मरता नहीं। दिखाई पड़ती थी ज्योति, अब नहीं दिखाई पड़ती। देखने के क्षेत्र से विदा हो जाती है, अदृश्य में लीन हो जाती है। फिर प्रकट हो सकती है, फिर लीन हो सकती है। यह प्रकट-अप्रकट होने का क्रम अनंत चल सकता है। जब तक कि ज्योति पहचान न ले कि प्रकट में भी मैं वही हूं, अप्रकट में भी मैं वही हूं; न मैं प्रकट होती, न मैं अप्रकट होती, सिर्फ रूप प्रकट होता और अप्रकट होता। वह जो रूप के भीतर छिपा हुआ सत्व है, वह न प्रकट में प्रकट होता, न अप्रकट में अप्रकट होता; न जीवन में जीवित होता, न मृत्यु में मरता। तब अमृत का अनुभव है।


हम दूसरों को मरते देखकर, बुझते देखकर, हिसाब लगा लेते हैं कि सब मरते हैं, तो मैं भी मरूंगा। लेकिन कभी किसी मरने वाले से पूछा कि मर गए? लेकिन वह उत्तर नहीं देता। इसलिए मान लेते हैं कि हां में उत्तर देता होगा। मौन को सम्मति का लक्षण समझने की बात सभी जगह ठीक नहीं है। मरे हुए आदमी से पूछो, मर गए? अगर वह उत्तर दे, तो समझना मरा नहीं; और अगर मौन रह जाए, तो हम समझ लेते हैं कि मर गया!


लेकिन मौन सम्मति का लक्षण नहीं है। नहीं बोल पा रहा है, इसलिए मर गया, ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है।


जिन खोजा तिन पाईंयां--प्रवचन--19

ओशो

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   OMM ADI ANADI ARIHANT NAMO NAMAH

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