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सोमवार, 16 जनवरी 2012

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पृथ्वी के बाहर जीवन की चाह फिर से परवान चढ़ रही है. दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था नासा ने बिलकुल पृथ्वी जैसा ग्रह खोज निकाला है. वह अपने सूर्य का चक्कर लगाता है. न बहुत ठंडा, न बहुत गर्म और पानी की पूरी संभावना.

 
कोई तीन साल पहले अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने नए ग्रहों की तलाश में केपलर नाम का टेलीस्कोप पृथ्वी से बाहर अनजान दुनिया की खोज में भेजा था. दो साल की मेहनत के बाद वैज्ञानिकों को वे तस्वीरें मिल गईं, जो अब तक की सबसे उत्साहित करने वाली बताई जा रही हैं. ऐसे ग्रह का पता चल रहा है, जो पृथ्वी से ढाई गुना बड़ा होगा. तापमान 22 डिग्री के आस पास यानी पानी न तो जमेगा और न ही खौलेगा. दिन वसंत ऋतु के किसी दिन की तरह खुशगवार होगा. उसकी स्थिति ऐसी जगह है, जहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है यानी उस ग्रह में वह सारे गुण हैं, जो पृथ्वी में हैं और जिसके आधार पर जीवन की कल्पना की जा सकती है. केपलर को सम्मान देते हुए ग्रह का नाम रखा गया है, केपलर-22बी.
घर के बाहर घर
नए ग्रहों की तलाश के मामले में बड़ा योगदान देने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के ज्यॉफ मार्सी का कहना है, "यह मानव इतिहास की महान खोज मानी जाएगी. यह खोज बताती है हम होमोसेपियन (मनुष्य का बायोलॉजिकल नाम) पृथ्वी के बाहर घर की तलाश कर रहे हैं और ऐसी जगह पहुंच चुके हैं, जो हमें अपने घर की याद दिला रहा है."
नया ग्रह अपने प्रमुख सितारे की उसी तरह परिक्रमा कर रहा है, जैसा पृथ्वी सूर्य की करता है. उसका तारा सूर्य जितना ही बड़ा लग रहा है. केपलर-22बी को इसकी परिक्रमा करने में पृथ्वी से करीब 10 महीने कम लगभग 290 दिन का वक्त लगा है. बस इस ग्रह का आकार थोड़ा बड़ा है. यह पृथ्वी से करीब 2.4 गुना बड़ा है. फिर भी हमारे सौरमंडल के बाहर मिले दूसरे ग्रहों से इसका आकार छोटा है और यहां पानी होने की पूरी संभावना दिख रही है. ग्रह पानी और पत्थरों से बना हो सकता है और इसकी बनावट पृथ्वी और गैस तथा द्रव से बने नेप्च्यून ग्रहों के बीच की बताई जा रही है.
कैसे कहूं, क्या है
इस खोज से उत्साहित सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी की अंतरिक्ष विज्ञानी और नासा के केपलर अभियान की उप प्रमुख नताली बतालहा का कहना है, "हम पृथ्वी और नेप्च्यून ग्रहों के बीच के किसी ग्रह के बारे में ज्यादा नहीं बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे सौरमंडल में ऐसा कोई ग्रह नहीं है. हम नहीं कह सकते हैं कि किस हिस्से में पानी होगा, कहां पत्थर होगा और किन इलाकों में बर्फ जमा होगी. हम जब तक इस बारे में जानकारी इकट्ठी नहीं कर लेते, तब तक कुछ नहीं बता पाएंगे."
लेकिन जानकारी इकट्ठी करना इतना आसान नहीं होगा. यह ग्रह हमारे सौरमंडल से कोई 600 प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष की दूरी तय करने में अनुमानित 10,000 अरब साल का वक्त लग जाता है. यानी मौजूदा वक्त की सबसे तेज उड़ान भरने वाला अंतरिक्ष यान केपलर-बी22 तक पहुंचने में कोई सवा दो करोड़ साल लगाएगा. मौजूदा वक्त में भले ही यह नामुमकिन लग रहा हो लेकिन विज्ञान अद्भुत आविष्कारों का गवाह रहा है और कब कौन सा आविष्कार कौन से दरवाजे खोल दे, कोई नहीं कह सकता.
मुश्किल से मिलता ग्रह
केपलर को बेहद जटिल प्रक्रिया के बाद गोल्डीलॉक्स जोन में इस ग्रह के बारे में पता चला. यह टेलीस्कोप सिर्फ उन्हीं ग्रहों की निशानदेही करता है, जो अपने तारों का चक्कर लगा रहे हों. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने से पहले उस ग्रह के तीन चक्कर पूरे होने जरूरी हैं यानी तीन मौका ऐसा आना चाहिए, जब वह अपने मुख्य ग्रह के सामने से गुजरे. इस खोज को अलग अलग तीन जगहों की सहमति मिलनी चाहिए. केपलर की रिसर्च में 2326 ग्रहों की स्टडी की गई, जिसमें 10 ग्रह ऐसे निकले, जो पृथ्वी के आकार के हैं और अपने तारों का चक्कर लगाते दिखे.
केपलर की एक उड़ान ने वैज्ञानिकों को पृथ्वी के जुड़वां ग्रह तक तो पहुंचा दिया. अब कल्पना की दूसरी उड़ान उन्हें उस धरातल पर उतार भी सकती है.
रिपोर्टः रॉयटर्स, एपी/ए जमाल
संपादनः महेश झा
 
 

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शनिवार, 7 जनवरी 2012

गॉड पार्टिकल के बहुत पास पहुंचा मानव

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दशकों की मशक्कत के बाद मानव सभ्यता का दावा है कि वह उस कण के बहुत पास पहुंच गई है, जिसने इस सृष्टि की उत्पत्ति की है. हिग्स बोसोन यानी गॉड पार्टिकल की तलाश लगभग पूरी हो गई और वैज्ञानिकों का दावा है कि इसका अस्तित्व है.




दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला स्विट्जरलैंड के सर्न में चल रहे बरसों के प्रयोग के बाद मंगलवार को दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने दावा किया कि हिग्स बोसोन कण अब पहुंच से दूर नहीं रहा. इस कण के बारे में करीब चार दशक पहले चर्चा शुरू हुई और विज्ञान का दावा है कि इसकी वजह से ही बिग बैंग विस्फोट हुआ, जिसके बाद यह पूरी कायनात बनी. हालांकि वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा कि अभी यह खोज पूरी नहीं हुई है.
इंग्लैंड में लीवरपूल यूनिवर्सिटी के थेमिस बोकॉक ने कहा, "अगर हिग्स की बात सही साबित हो जाती है, तो निश्चित तौर पर यह इस सदी की सबसे बड़ी खोजों में होगा. भौतिक विज्ञानियों ने धरती की रचना के बारे में अहम कड़ी को सुलझा लिया है, जिसका असर हमारे रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है."सर्न की महाप्रयोगशालासर्न की महाप्रयोगशाला
अद्भुत नजारा
कई मीटर लंबे हाइड्रॉन कोलाइडर में प्रयोग के बाद सर्न ने सनसनीखेज खुलासा किया. उनकी प्रेस कांफ्रेंस खचाखच भरी थी. सर्न के वैज्ञानिक ओलिवर बुखम्यूलर ने बताया कि दो अलग अलग प्रयोग के नतीजे एक ही दिशा में जा रहे हैं. हालांकि यहीं की महिला वैज्ञानिक फाबियोला जियानोटी ने सतर्कता भरे अंदाज में कहा, "मुझे लगता है कि हिग्स बोसोन यहीं है. लेकिन अभी इस बारे में आखिरी बयान देना थोड़ी जल्दबाजी होगी. अभी और ज्यादा रिसर्च की जरूरत है. अगले कुछ महीने बेहद दिलचस्प होने वाले हैं. मुझे नहीं मालूम कि क्या आने वाला है."
विज्ञान की धारणा है कि ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स के नाम पर रखा गया बोसोन कण ही 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग विस्फोट का कारण था और इसकी वजह से आज ब्रह्मांड में जो कुछ है, उनका अपना द्रव्य है. अगर यह बात साबित हो जाती है कि विश्व को इलेक्ट्रोन और फोटोन की परिभाषाएं बदलनी होंगी. स्कूलों में भौतिकी की पढ़ाई बदल जाएगी. लेकिन अगर यह साबित नहीं हो पाता है तो इस सृष्टि का निर्माण फिर से पहेली बन कर रह जाएगा.
महान कामयाबी
पीटर हिग्सपीटर हिग्सविज्ञान में पिछले 60 सालों में इतनी बड़ी कामयाबी नहीं मिली है. सर्न के अंदर दो अलग अलग प्रयोग किए जा रहे हैं. इनका नाम एटलर और सीएमस है. दोनों का लक्ष्य हिग्स कण का पता लगाना है. मौजूदा वैज्ञानिक उपकरणों से इस कण के द्रव्यमान का पता नहीं लग सकता. इसलिए कई किलोमीटर लंबी सुरंगनुमा प्रयोगशाला तैयार की गई है, जिसमें तीन साल से भी ज्यादा समय से प्रयोग चल रहा है. यहां बिग बैंग विस्फोट जैसा माहौल तैयार किया गया है, ताकि इसके रहस्यों को समझा जा सके. इसे महाप्रयोग भी कहा जा रहा है.
अद्भुत बात है कि दोनों ही खोज के प्रमुखों ने दावा किया है कि उनके प्रयोग से एक जैसे नतीजे आ रहे हैं. दोनों इसे 124-125 गीगा इलेक्ट्रोनवोल्ट का बता रहे हैं. लेकिन अभी पूरी तरह बात नहीं बनी है. प्रयोग के दौरान जो कुछ भी निकल कर आया है, वैज्ञानिक भाषा में वह दूसरे स्तर तक को ही पार करता है, जबकि किसी खोज के लिए इसे पांच स्तरों तक पहुंचना जरूरी है. वैज्ञानिक अभी और आंकड़ों की मांग कर रहे हैं. उनका यह भी कहना है कि अगर गॉड पार्टिकल होता भी है, तो यह बहुत जल्दी क्षय हो जाने वाला या दूसरा रूप ले लेने वाला पदार्थ है.
रिपोर्टः रॉयटर्स, एपी/ए जमाल
संपादनः ओ सिंह
sabhar : DW-WORLD.DE

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2050 की दुनिया

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आने वाली दुनिया कैसी होगी। सबकी अपनी कल्पनाएं और अंदाजे हैं। विज्ञान दुनिया को नए तरीके से देख रहा है। फिल्मी दुनिया की अपनी फंतासियां हैं। बात हो रही है 2050 की। आज की कल्पनाएं निश्चित तौर पर आने वाले वक्तके धरातल पर होंगी। संभव है दिमाग को कम्प्यूटर की फाइल के तौर पर सुरक्षित रखा जाए। यह भी मुमकिन है कि आदमी गायब होना सीख ले। 

यह है फ्यूचरोलॉजी
ऎसा नहीं है कि भविष्य दर्शन केवल फिल्मकारों की कल्पना तक सीमित है। वैज्ञानिक भी इसमें खासी रूचि ले रहे हैं। तथ्यों और पूर्वानुमानों के सामंजस्य को विज्ञान की कसौटी पर परख कर भविष्य की कल्पना एक नए विज्ञान की राह खोल रही है। यह विज्ञान है फ्यूचरोलॉजी यानी भविष्य विज्ञान। क्या भविष्य में चांद पर बस्ती बसेगी। क्या हमारा परिचय धरती से परे किसी दूसरी दुनिया के प्राणियों से होगा। क्या इंसान मौत पर विजय पाने में कामयाब हो जाएगा। नामुमकिन सी लगने वाली ऎसी कल्पनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन भी फ्यूचरोलॉजी के तहत किया जा रहा है। जिस तरह से मौसम-विज्ञानी भविष्य में मौसम का, अर्थशास्त्री भविष्य की विकास दर और इतिहासकार अतीत की घटनाओं का तार्किक आकलन पेश करते हैं, उसी तरह से भविष्यविद् भविष्य में होने वाले बदलाव की तस्वीर उकेरते हैं।

भविष्यविदों की साल 2050 पर खास नजर है। कारण यह है कि 2050 ऎसा वक्तहै, जिसे वर्तमान पीढ़ी के अधिकतर लोग देख सकेंगे और तब तक तकनीकी रूप से उन्नत 21वीं सदी का आधा वक्तगुजर चुका होगा। अमरीका और ब्रिटेन के कुछ विश्वविद्यालयों में फ्यूचरोलॉजी सेंटर स्थपित हो चुके हैं। 2050 की दुनिया की तस्वीर का अनुमान लगाने के प्रयास चल रहे हैं। भविष्यविद् हर संभव तरीके से भविष्य का सटीक आकलन करने में जुटे हैं। अपने अनुमानों को दुनिया के सामने रख रहे हैं।

दिमाग होगा डाउनलोड
वैज्ञानिकों की मानें तो 2050 तक इंसान मौत को चुनौती देने में कामयाब हो सकता है। शारीरिक रूप से भले ही यह संभव न हो सके। लेकिन, दिमागी रूप से ऎसा मुमकिन है। ऎसी तकनीक विकसित हो सकती है, जिसके जरिए इंसान के दिमाग को कम्प्यूटर से जोड़कर उसे हार्ड डिस्क में सेव किया जा सकना संभव होगा। इसके बाद दिमाग का डाटा कम्प्यूटर में एक फाइल के रूप में होगा और उसे कभी भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। अभी तक इंसान के संवेदी तंत्र को कम्प्यूटर से जोड़कर एनिमेशन तैयार करने के प्रयोग हो चुके हैं। ऎसे में इस सोच को कपोल कल्पना मानकर ठुकराया नहीं जा सकता। इसके अलावा 2050 में सुपर कम्प्यूटर आज के मुकाबले में एक हजार गुना ज्यादा शक्तिशाली होंगे। साथ ही इनके आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के स्तर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। 

नए लुक में टेलीविजन
चार दशक बाद वर्तमान टेलीविजन पूरी तरह से गायब हो जाएंगे। इनकी जगह लेगा इंटरेक्टिव होलोग्राम टीवी, जिस पर दर्शक मनचाहे समय पर कोई भी कार्यक्रम अपनी सुविधा से देख सकेंगे। दर्शक त्रिआयामी तस्वीरों के साथ सुगंध का मजा भी ले सकेंगे। वर्तमान प्रसारण व्यवस्था बदलेगी और कार्यक्रम के प्रसारण के बजाय दर्शक को सूचना दी जाएगी, अमुक कार्यक्रम प्रसारण के लिए उपलब्ध है। दर्शक अपनी सुविधा से चैनल डायरेक्ट्री में जाकर कार्यक्रम देख सकेंगे। फिलहाल इंटरनेट पर कार्यक्र्रम इसी तरह उपलब्ध रहते हैं और दर्शक जब चाहे उन्हें देख सकता है। कुछ खास सिनेमाघरों में फिल्म के प्रदर्शन के साथ खुशबू बिखेरने के प्रयोग हो चुके हैं। इनके अलावा आईपीटीवी भी हर घर में होंगे, जो टेलीफोन, इंटरनेट और केबल टेलीविजन जैसी सभी जरूरतों को वायरलैस तरीके से पूरा करेंगे। तो टेलीविजन को अपना सबसे प्यारा दोस्त बनाने के लिए तैयार रहिए। 

एलियंस हमारे दोस्त
फिलहाल दूसरे ग्रह पर जीवन के संकेत ढूंढने में लगे वैज्ञानिक इस कल्पना को नकार नहीं सकते कि किसी अन्य ग्रह पर धरती से विकसित सभ्यता का अस्तित्व हो सकता है। कई बार वैज्ञानिकों की ओर से उड़न तश्तरियां देखे जाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन, अभी तक प्रामाणिक रूप से किसी और ग्रह पर जीवन की पुष्टि नहीं हुई है। भविष्यवक्ताओं के मुताबिक साल 2050 तक दूसरे किसी ग्रह पर जीवन का पता लग सकता है और उस ग्रह के प्राणियों यानी एलियंस के साथ इंसान का संपर्क भी स्थापित हो सकता है। फिलहाल दुनिया में कई एजेंसियां कथित यूएफओ संकेतों के विश्लेषण में जुटी हैं। इसी तरह की सेटी नामक एक परियोजना में हजारों कम्प्यूटरों की मदद से संकेतों का विश्लेषण किया जा रहा है। 

उड़न कार है ना
आप मानकर चलिए कि 2050 तक निजी उड़न कारें बहुतायत में होंगी और आवागमन के लिए वायुमार्ग का सबसे ज्यादा प्रयोग होगा। उड़न कारों के आंशिक प्रयोग फिलहाल सफल रहे हैं। उम्मीद है कि अगले दशक तक उड़न कारों का प्रयोग शुरू हो जाएगा। ये कारें-टू-सीटर और फोर-सीटर होंगी। उन्हें उतारने के लिए किसी खास हवाई पट्टी की जरूरत नहीं होगी। सड़कों पर दुर्घटना की आशंका नगण्य हो जाएगी। क्योंकि, सभी वाहन कम्प्यूटर संचालित होंगे। उनके सेंसर दूसरे वाहन की मौजूदगी या किसी अन्य बाधा को समय रहते भांप लेंगे और वाहन को रोक देंगे। आवागमन के दौरान रफ्तार में इजाफा होगा। आज मैंगलेव टे्रन 500 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पकड़ चुकी है। उम्मीद है कि 2050 तक यह रफ्तार 1000 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। 

भूल जाएंगे पेट्रोल
हैरत मत कीजिए हो सकता है साल 2050 तक वर्तमान पेट्रोलियम ईधन का प्रयोग बंद हो जाए और इसका स्थान हाइड्रोजन चलित कार ले ले। जिसका प्रयोग सफल रहा है और इसे भविष्य के ईधन के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा कुछ अन्य रासायनिक तत्वों को भी ईधन के रूप में विकसित करने के प्रयास चल रहे हैं। असीमित ईधन के रूप में वायु एवं सौर ऊर्जा को भी परखा जा रहा है। कुछ भी हो, चार दशक बाद का समय पर्यावरण प्रेमियों के लिए जश्न का समय होगा। क्योंकि, उन्हें पेट्रोलियम गुबार के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का डर नहीं होगा। साथ ही आम जनता को भी सस्ता और स्वच्छ ईधन मुहैया हो सकेगा।

आबादी में इजाफा
सहज जीवनशैली और चिकित्सा के निरंतर विकास के कारण मृत्युदर कम होगी और जनसंख्या बढ़ेगी। औसत उम्र 65 साल से 80 तक पहुंच जाएगी। सबसे ज्यादा संकट जापान जैसे देशों के लिए होगा, जहां वर्तमान औसत उम्र दुनिया में सर्वाधिक है। तकनीकी विकास के चलते चिकित्सा सेवाएं बेहतर होंगी और आज की कई बीमारियों का नामों-निशान तक नहीं रहेगा। सभी बीमारियों की रोकथाम के लिए एक ही टीका पर्याप्त होगा। कृत्रिम खून का प्रयोग होने लगेगा और कोई भी मरीज खून की कमी के कारण जान नहीं गंवाएगा। एड्स जैसे असाध्य रोगों का इलाज संभव हो सकता है। लेकिन, नई तरह की बीमारियों के प्रकट होने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रोबोट्स का बोलबाला
माना जा रहा है कि घरों में नौकर 2050 तक गायब हो चुके होंगे। उनकी जगह लेंगे रोबोट्स। फिलहाल होंडा कंपनी का असीमो नामक रोबोट समझदारी के साथ कई काम निपटाने में माहिर है। घर साफ करने से लेकर कपड़े सुखाने तक का काम यह रोबोट कर सकता है। भविष्य में रोबोट तकनीक में काफी सुधार होगा और ये वहन करने लायक कीमत पर जनता को मुहैया होंगे। मशीनों को कुछ स्तर तक संवेदनशील बनाने के प्रयास भी चल रहे हैं। भावनात्मक दोस्तनुमा रोबोट बनाने में कामयाबी मिल चुकी है। चार दशक बाद अधिकतर दुकानें मशीनों से ही संचालित होंगी। बिल्कुल उसी तरह, जैसा आज चाय या कॉफी वेंडिंग मशीन का संचालन होता है। मानवीय श्रम लगभग गायब हो चुका होगा। वर्तमान श्रमिक रोबोट संचालन के रूप में नजर आएंगे। फिर तो इंसानी ओलंपिक के साथ ही रोबोट ओलंपिक का भी आयोजन होगा।

हाइटेक आशियाने
मकानों की ऊंचाई 2050 तक लगभग बढ़ेगी। लेकिन, भविष्य में बनने वाली इमारतें आज के मुकाबले सुरक्षित होंगी। बड़े शहरों में सौ-मंजिला इमारतें आम होंगी। ऊंची इमारतों का संचालन कम्प्यूटराइज्ड होगा। मकान में फाइबर, स्टील और लकड़ी का इस्तेमाल आज के मुकाबले में ज्यादा होगा। भूकंप संभावित क्षेत्र में निर्माण में विशेष्ाज्ञ एहतियात बरतने का काम शुरू हो चुका है। चार दशक में इमारतें सुरक्षा मानकों पर पूरी तरह खरी उतरेंगी। हरियाली और सिकुड़ेगी और उनकी जगह कंकरीट के जंगल लेंगे। आज की कुछ दुर्लभ वन्य प्रजातियां 2050 में केवल तस्वीरों तक सिमट सकती हैं। बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवासीय भूमि में बढ़ोतरी होगी।

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रविवार, 3 अप्रैल 2011

भविष्य में संकर जीवों का आस्तित्व होगा

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प्राचीन धार्मिक ग्रंथो में ऐसे जीवों का वर्णन मिलता है, जैसे नरसिंह, असलान, कामधेनु ,यानी सदियों पहले इस तरह के अस्तित्व की कल्पना रही है इसी कल्पना को साकार करने के लिए वैज्ञानिक दशको से प्रयास कर रहे है| इस दिशा में पहली सफलता २००३ में मिली थी चीन के शंघाई स्थित सेकेण्ड मेडिकल युनिवर्सिटी में सफलता पूर्वक खरगोश के अन्डो में मानव कोशिका प्रत्यारोपित कर दी थी उन्होंने इस अन्डो को स्टेम सेल पाने के लिए इस्तेमाल किया| इससे संकर जीवों के अस्तित्व का सपना साकार होते दिखा पूरी दुनिया में इस समय १० संकर जीव बनाने के प्रयास किये जा रहे है २००४ में चीनी वैज्ञानिको ने दावा किया की की उन्होंने ऐसा सूअर बनाया है जिसकी रगो में इंसान का खून बहता है | युनिवर्सिटी ऑफ़ नेवादा रेनो के वैज्ञानिकों ने दावा किया की उन्होंने ऐसी भेंड बना ली है जिसमे २० फीसदी कोशिकाए मानव की है ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने मानव और गाय से भ्रूण बनाने का दावा किया है ऐसे ही कुछ वैज्ञानिक चूहे में ऐसे लीवर का प्रत्यारोपण किया जो ९५ फीसदी मानव कोसिकाओ से बना था इसी तरह स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी के इरविन वाएयास मेन की टीम ने मानव मस्तिस्क की स्टेम कोसिकायो को चूहे के दिमाग में डाला शुरू शुरू में दिमाग में १ फीसदी मानव कोसिकायो ने कब्ज़ा जमाया २०१० में इस टीम ने दावा किया की उन्होंने चूहे की खाल की कोसिकायो को पुरी तरह न्यूरांस में बदल दिया न्यूरांस ही मस्तिस्क से संदेशो को अंगो तक पहुंचाता है | इस प्रकार अब वह दिन दूर नहीं है जब हमें संकर जीव देखने को मिलेंगे |

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रविवार, 23 जनवरी 2011

कैसे हुआ ब्रह्माण्ड का निर्माण

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photo : vigyanpragti

वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग्स का कहना है की ब्रह्माण्ड की संग्रचना के पीछे भौतिक के नियम है न कि कोई ईश्वरीय सरीखी कोई सर्व सक्ति इस पर विभिन्य वैज्ञानिकों धर्मगुरूओं या स्वयं ब्यक्ति कि भिन्य राय हो सकती है परन्तु इस सदी के महान इस वैज्ञानिक कि राय को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता यह बयान उनकी जल्दी ही प्रकाशित होने वाली पुस्तक ' द ग्रैंड डिजाईनर के आगमन से पहले आये है ब्रमांड का निर्माण बिग बैंक यानी महा विस्फोट से हुआ है इस अवधारणा के मुताबिक बिग बैंक १३.७ अरब साल पहले हुआ १९८८ में अपनी पुस्तक ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम में इन्होने ईश्वर को स्वीकार किया था ये लिखे थे कि यदि हम प्रकृति के बुनियादी नियमो को तलाश लेते है तो हमें ईश्वर के मस्तिष्क का पता चल सकता है ब्रमांड के निर्माण में जो सिधांत सबसे ज्यादा प्रचलित है वो है बिग बैंक का सिधांत इसके अनुसार १३.७ अरब साल पहले ब्रमांड एक छोटे बिंदु के रूप में था इसमे अचानक महा विस्फोट हुआ और ब्रमांड कि उत्पत्ति हुई तो द्रब्य और ऊर्जा का फैलाव हुआ द्रब्य और ऊर्जा के साथ- साथ स्पेश और टाइम का विस्तार आरम्भ हुआ महाविश्फोट के बाद शुरूआती छड़ो में ब्रमांड का तापमान बहूत ऊँचा था उस समय में गुरूत्वाकर्षण बल बिधुत चुम्बकीय बल , प्रबल बल , और कमजोर बल जिनसे ब्रमांड के सभी पिंड आपस में बधे रहते है उस समय एक थे ब्रमांड के उत्पत्ति के तीन मिनट बाद ही तापमान इतना घट गया कि प्रबल बल सक्रिय हो गया इस बल ने प्रोटानों और नयूट्रानो को बाँध कर नाभिको का निर्माण कर दिया इसके लगभग ५ लाख वर्ष बाद विधुत चुम्बकीय बल सक्रिय हुआ और इसने नाभिको और इलेक्ट्रानो को बाँध कर परमाणु का निर्माण कर दिया इसके बाद जब तारे ग्रह उपग्रह व दूसरे अकासीय पिंड आस्तित्व में आये तो गुरूत्वाकर्षणबल सक्रिय हो गया अब वैज्ञानिक प्रयोगों में इन्हें आपस में जोड़ने का प्रयास कर रहे है इस सिधांत को सिध्य करने के लिए बनाये गए लार्ज हैद्रान कोलाएजर का प्रयोग सफ़ल रहा है परमाणुओं को तोड़ने कि छमता रखने वाली इस मशीन ने दो प्रोटान परमाणु कि तरंगो को तीन गुना तेजी से आपस में टकराने में सफलता अर्जित कि है इससे आज से १३.७ अरब साल पहले का वह वातावरण तैयार हो गया जब पूरा ब्रह्माण्ड बना था अभी प्रयोग चल रहे है हो सकता है आने वाले समय में कुछ चौकाने वाले तथ्य प्राप्त हो जीवन एवम प्रकृति कि लडाई आगे आगे तक चलेगी हमें जीवन को बचा के रखना है

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शनिवार, 4 दिसंबर 2010

कैंसर रहित वातावरण देने वाले जीव की खोज

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आस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने माएक्रोब्स के एक ऐसे समूह की खोज की है जो प्रदूषित वातावरण में मौजूद कैंसर के लिए जिम्मेदार पदार्थो को खाकर नष्ट कर देते है साऊथ आस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी के मेघमल्लावरापू ने पता लगाया मिट्टी में रहने वाला यह बैक्ट्रिया बीटेक्स नमक केमिकल को खाकर नष्ट कर देता है यह केमिकल मनुष्य में कैंसर तंत्रिका सम्बंधित और दूसरे प्रकार के बीमारियों से सम्बंधित है मल्लावारापू के अनुसार यह केमिकल पुराने सर्विश स्टेसन वर्कशाप के पास पाया जाता है यह रिपोर्ट वर्ल्ड इन्वायरमेंटल टाक्सिकोलोजी और केमिस्ट्री कांग्रेस में प्रस्तुत किया गया था

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बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

जीवन का विकाश तथा मानव की विकाश यात्रा

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जीवन की उतपत्ति के विषय में विभिन्य मत हैं जैसे सृस्तीवाद ब्रमांड वाद प्रलाय्वाद स्वतःजनान्वाद परन्तु सर्वाधिक मान्य है प्रकृतवाद या जीव रसायन उद्विकास मत इसके अनुसार जीवन की उत्पत्ती निर्जीव पदार्थो से हुयी है कड़ोरों वर्षों के अनेकानेक भौतिक रासायनिक प्रक्रियाएं चलती रही हैं पहले अकार्बनिक फिर कार्बनिक पदार्थों का निर्माण हुआ इन प्रक्रियायों में ऐसे पदार्थ जैसे न्युक्लियो प्रोटिन से वाईरस जो सजीव तथा निर्जीव के बीच की कड़ी है अस्तित्व में आया इसमे स्व द्विगुणन होने से सजीव कोसीकायों की उत्पति हुयी तथा लगभग १.५ अरब वर्ष पूर्व सुकेंद्री कोसीकायों की उत्पति हुयी इसकी पुष्टी करने के लिए स्टेनली मिलर तथा हैरल्ड युरे ने प्रयोग साला में मीथेन अमोनिया हईद्रोजन के गैसीय मिश्रण को ६०००० वोल्ट पर अमीनो अम्ल सरल सर्कराएँ तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ बनाकर दिखाए इसके बाद एक कोसकीय जीव से बहुकोसकीय जीव तथा उसकेबाद मछली और सरीसृप वर्ग का विकाश हुआ इसके बाद लगभग २१ करोड़ वर्ष पुर्व प्रारम्भिक जोरासिक काल में सरीसृप से स्त्तनधारियो का विकाश हुआ इसके प्राइमेट गण में जैसे आदि कपि बानर लोतीस लीमर्स आदि का विकाश ६.५ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ मानव का विकाश बंदरों से होते हुए चिपैंजी तक आया चिपैन्जीयो से सर्वप्रथम २२ लाख वर्ष प्रथम मानव मादा आर्डी आस्तित्व में आ यी यह झुक कर नहीं परन्तु सीधे चलती थी आर्डी के जन्म के १ लाख वर्ष के बाद पुरूष मानव का जन्म हुआ इसके बीच इनके यौन संबंद चिपैजीयों के साथ चलते रहे करीब १० लाख वर्ष पहले आधुनिक मानव का विकाश हुआ इसमे होमो हैबिलास होमो इरेक्ट या जावा मानव पेकिंग मानव हीदाल्वर्ग मानव इसके बाद आधुनिक मानव होमोसेपियंस का विकाश इसमे नियेंदाल्थल मानव क्रोमैगानन तथा आदुनिक मानव होमोसपियांस का विकाश हुआ नेयेंदार्थल मानव आज के मानव के सबसे निकटतम संबंधी माने जाते है ये यूरोप व एशिया के कुछ भागो में निवास करते थे आज से लगभग ३०००० वर्ष पूर्व ये लुप्त हो गए इनकी जीनी संग्रचना में ०.5%का अंतर मानव से है यह अंतर चिपैजी से 1 % है नेयेंदाल्थल मानव में दूध पचाने का जीन नहीं पाया जाता था वे चतुर आदुनिक मानव के सामने टिक नहीं पाए करीब ३००००० वर्ष तक ये दोनों साथसाथ रहे अब आगे भी मानव की विकास यात्रा जारी है अब मानव अपनी छमता बढाने के लिए कम्पूटरचिप का प्रयोग करना चाहता है इसकी मदद से मानव अपना मस्तिस्क विकसीत करना चाहता है एक विश्व प्रसिध्य वैज्ञानिक ने ये दावा किया है की शीघ्र ही ऐसी तकनीक आजायेगी मानव मशीन में तथा मशीन मानव में समाहीत हो जायेगी कही यह जीवन यात्रा होमोसेपियंस से होमो साइबर में तो नहीं बदलने जारही क्योकी डार्विन का सिधांत है की सर्विवल ऑफ़ दी फिटेस्ट यानी उसी का आस्तित्व रहेगा जो फिट है अतः हमें ज्ञान विज्ञानं को समझाना होगा

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कैसी होगी हमारा अंतरिछ्य पर्यटन एवं कैसे रहेगे चाँद पर

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अंतरिछ्य यात्राओं निजी अंतरिछ्य यानों के जरिए कई कम्पनियाँ अंतरिछ्य अभियानों से जुड़ने की कोसिस कर रही है स्पेश एडवेंचर नामक अंतरिछ्य पर्यटन कंपनी जो की विश्व के प्रथम अंतरिछ्य पर्यटक डेनिश टीटो को अंतरास्तीय स्पेश स्टेसन की सैर कराने के लिए जानी गयी यह पर्यटकों को अंतरिछ्य एवं चाँद पर ले जाने का मन बना चुकी है तथा रिचर्ड ब्राऊन की वर्जीन गैलेक्टिक ५०० यात्रियों कोप्रतिवर्ष ले जाने का मन बना रही है लेकीन इसमे खर्चा ४०० करोड़ रूपया या १०० मीलियन डालर आयेगा जो की काफी महँगा है यदि आने वाले वर्षों में स्पेश शटल जैसे अंतरिछ्य वाहन जिन्हें पुनः इस्तमाल में लाया जा सकता है आने वाले १५ से २० वर्षों में विकसीत कर लिए जायेंगे जो की काफी सस्ता होगा जैसे जैसे अंतरिछ्य में भीड़ बड़ती जायेगी विभिन्य ग्रहों पर आवास की जरूरत पड़ेगी अमेरिकी अंतरिछ्य एजेंसी नासा ने ऐसे लोगों से प्रार्थना पत्र लेना शुरू कर दिया है जो चाँद पर तथा अंतरिछ्य स्पेश स्टेसन पर रहकर कार्य करे अभी तक रूकने का यही मात्र जगह है आने वाले दिनों में बहूत सी कम्पनियाँ अंतरिछ्य में इस तरह के आवास स्थापित करने की योजना बना रही हैं होटल व्योसाय से जुड़े राबर्ट विगेलो के स्वमित्य वाला सन डांसर नामक अंतरिछ्या कच्छा में स्थापित होने की उम्मीद है इसके अलावा नाटिलस नामक दूसरा आवास इसके बाद बन कर तैयार होगा अंतरिछ्यमें उद्योगीक इकाइयां भी स्थापित होंगी हीलियम -३ को ऊर्जा के रूप में प्रयोग में लासकते हैं नासा आजकल स्पेश अवीलेटर (सीडी) बनाने की परियोजना पर कार्य कर रहा है जीसमे १००००० किमी लम्बे केबिल का प्रयोग होगा इस यन्त्र का पृथ्वी की तरफ वाला सिरा एक तैरने वाले प्लेटफार्म से जोड़ा होगा जो समुद्र के बीच में स्थित होगा जबकी दूसरा सिरा अंतरिछ्य में चक्कर लगाने वाली बस्तु से ज्वाइंट होगा भारत के चंद्रयान -१ से पता लगा है की चाँद पर पानी है इसके लिए नासा ने भी kahaa है चाँद पर रहने के लिए तकनीक का सहारा लेते हुए बेलनाकार आवास शैवाल तथा सुक्छ्म जीवों की विकसीत होने के लिए वातावरण तैयार करना होगा

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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

भविष्य के विज्ञानं एवं टेक्नालाजी में नैनो तकनीक

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नैनो तकनीक का संबंद अत्यंत सूछ्म स्तर एक मीटर का अरबवा हिस्सा नैनो मीटर हाइड्रोजन के एक परमाणु के आकार के दश गुना होता है के स्तर पर तकनीक का निर्माण किया जाई इसके सहयोग से हम अगले पाच दसक में इसका प्रयोग करके अणुओं और परमाणुओं को जोड़कर इसी स्तर पर टेलीफोन कार हवाई जहाज मिजाइल अंतरिछ्यान कम्पूटर सभी कुछ मनचाहे पदार्थ द्वारा किसी भी आकार प्रकार में बना पाएंगे इसकी मदद से कैंसर एड्स मदुमेह और अन्य बिमारीयों पर विजय प्राप्त कर सकते है इसके द्वारा बीमारियों का प्रारम्भिक अवस्था में पता लगकरशीघ्र उपचार कर सकते हैं इसके माद्यम से क्रितीम अंग बनाये जा सकते हैं अब यह प्रश्न उठताहै की यह कैसे होगा किसी भी पदार्थ को परमाणुविक पैमाने नैनो स्केल पर नियंत्रित ढंग से जोड़ तोड़ कर अपने इच्छानुसार परावर्तित करने की विद्या का नाम है नैनो टेक्नालोजी है इसी के द्वारा नैनो असेम्बलार्स की रचना करके जो नैनो रेपलीकेटर का कार्य करें इच्छित बस्तु के परमाणुओं से बनाया जा सकता है परमाणुओं की प्रतिलिपी तैयार करके किसी भी इच्छित बस्तु को बनाया जा सकेगा क्योंकी सभी पदार्थ परमाणुओं से बने हैं यहाँ तक मानव शरीर भी लगभग चालीस साल पहले रिचर्ड्स फिन मेयन ने इस अवधारण का सुझाव दिया और १९७४ नारीयोतानी गुची ने इसका नामकरण किया १९९० में बी ऍम के अनुसन्धान करता एटोमिक फोर्ष माइक्रोस्कोपिक यन्त्र द्वारा जेनान तत्व के ३५ परमाणुओं को निकेल के क्रिस्ताल पर एक एक कर के ब्वास्थीत कर आई बी यम शब्द लिखने में सफलता पाई है नासा के वैज्ञानिकों ने १९९७ में सुपर कम्पूटर के द्वारा बेंजीन के अणुओं को कार्बन के परमाणुओं से बने किसी सामान्य अणु के आकारके अति सूछ्म नयनों टयूब के बाहरी सतह पर जौड़ कर आणविक आकार के यन्त्र निर्माण के मिथ्यभासी अनुरूपण का दावा किया है भविष्य में इसका उपयोग मैटर कम्पाइलर जैसे अति सूछ्म यन्त्र के निर्माण में हो सकता हैं इन मशीनो को कम्पूटर द्वारा प्रोग्राम करके प्राकृतिक गैस जैसे कचे माल के परमाणुओं को एक एक कर फिर से ब्यवस्थित कर किसी मशीन या उसके बड़े हिसे को निर्मित किया जासकता है इस तकनीक के shहेतु

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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

प्रयोगशाला में ब्लैक होल

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ब्लैक होल से सारे वैज्ञानिक भयभीत रहते है क्योंकी इसे ब्रमांड का सबसे बड़ा हत्यारा कहते हैं इससे प्रकाश तक बाहर नहीं निकलता और यदि कोई प्रकाश किरण आसपास से गुजरे तो उसे भी यह अपने में जप्त कर लेता है अब प्रयोगशाला में एक ब्लैक होल का निर्माण किया गया है यह सिर्फ रोचक ही नहीं बल्की उपयोगी भी साबित हो सकता है इस साल की सुरूआत में पद्र्यु युनिवेर्सिटी के अवेजेनी नारिमनोव और किल्दिसेव ने ब्लैक होल का एक सैधांतिक डिजाईन प्रकाशित किया था परिकलपना यह थी की एक ऐसा यन्त्र बनाया जाय जो ब्रह्माण्ड ब्लैक होल के गुण को दरसाय इनका विचार था की एक ऐसा यंत्र बनाना संभव है जिसमे प्रकाश लगातार अन्दर की ओर मुड़ता जाय इस विचार पर काम करते हुए अब चीन के दो वैज्ञानिक ताई जून कुई और केयेंग चेन ने सचमुच में एक ऐसा उपकरण तैयार किया है यह उपकरण ६० क्रमिक रूप से छोटे छोटे छल्लों से बना है हर छल्ला एक सर्किट बोर्ड की तरह होता है जिसके गुड धर्म प्रतेक छल्ले में बदलता रहता है जब बाहर से आने वाली विदुत चुम्बकीय तरंगे इस उपकरण पर पहुचती है तो वे इसमें फस जाती हैं केन्दरीय भाग के ओर धकेले जाती हैं तथा सोख लिया जाता हैं और तरंग इससे बाहर नहीं निकल पाती प्रकाशीय तरंगों को कैद करने वाला यह उपकरण ऊर्जा उत्पादन में उपयोगी हो सकता है यह सूर्य ऊर्जा को कैद करके विधुत ऊर्जा में बदल सकता हैं

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आकाशीय पिंडों से बचाव की योजना

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आकाशीय पिंडो से पृथ्वी को बचाने के लिए वैज्ञानिको ने एक सम्मलेन में विचार किया इस पर दो तरीके से बचाव किया जा सकता है पहेला की उलका पिंडो को विस्फोट कर के उड़ा दिया जाय परन्तु इससे जो टुकरे होंगे वो प्रथ्वी पर नुकसान पहुचासकते है दूसरा तरीका है एक विशालकाय ट्रक्टर जो बहूत बड़ा यान होगा से धका देकर उसका स्थान परिवातित करके दिसा का परिवर्तन कर दिया जाय इसके लिए नासा ने २०२० तक के उलका पिंडों को निपटने के लिए १०० अरब डालर का खर्च बताया है परन्तु इसके लिए नासा के पास धन की कमी है यह सही भी है की प्राकृतिक आपदा से कोई एक देश या संस्था नहीं निपट सकती इसके लिए समूहीक प्रयास करने होगे

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