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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

कामवासना का विज्ञान

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#गुरुदेवकाअभौतकसत्ताकीज्ञानविज्ञानमण्डलीसेसमपर्क6
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानधारा में पावन अवगाहन 

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमN

      महात्मा महाव्रत एक जटिल आध्यात्मिक विषय को कितनी सरलता से समझा रहे थे--यह मेरे लिए आश्चर्यजनक था। वे थोड़ा ठहरकर आगे बोले--भौतिक जगत् मिथुनजन्य है। उसकी सीमा में जितनी भी सृस्टि है, सब मैथुनी सृष्टि है। इसलिए कि मैथुनी जगत् में 'काम' प्रधान है। उसकी व्यापकता सर्वत्र है। उसका अस्तित्व कण-कण में है और एकमात्र यही कारण है कि उस पर विजय प्राप्त करना अथवा उससे परे होना अति कठिन कार्य है। कामवासना को हम जितना दबाएंगे, उतनी ही वह बढ़ेगी। भले ही हम जननेंद्रिय या कामेन्द्रिय का उपयोग न करें लेकिन हमारा जो मन है, हमारा जो चित्त है, वह सदैव कामवासना से भरा ही रहेगा। इसका एकमात्र कारण है कि हम शरीर से पूर्णतया जुड़े हुए हैं। यदि हमें कामवासना से मुक्त होना है तो दो बातों को सदैव याद रखें। पहली बात--मैं शरीर नहीं हूँ। दूसरी बात--मेरे भीतर जीवन की कामना नहीं है। इन दोनों बातों के प्रति हमारी दृष्टि स्थिर होनी चाहिए।
       कामवासना का विरोध मृत्यु से है। जन्म तो कामवासना से होता है, परन्तु मृत्यु कामवासना का अन्त है। मृत्यु कामवासना विरोधी है। भारतीय मनीषा का कहना है कि यदि वास्तव में कामवासना पर विजय प्राप्त करना है, कामवासना से विमुख होना है तो मृत्युसाधना करनी चाहिए। मृत्युसाधना सबसे बड़ी साधना है। कामवासना से परे जाने के लिए मृत्यु साधना एक परम वैज्ञानिक प्रयोग है।
       इसके लिए हमें मरघट पर, श्मशान पर अधिक से अधिक जाना चाहिए। ध्यान से देखना चाहिए कि जो कभी जीवित था, उसका अंग-अंग कैसे आग की लपटों में जल रहा है ! मरघट ही, श्मशान ही हमारा वास्तविक साधना-स्थल है। मुर्दे आएंगे, बच्चों के, जवानों के, वृद्धों के, उनमें कुछ सुन्दर होंगे, कुछ विकृत होंगे, कुछ कुरूप होंगे, कुछ स्वस्थ होंगे और कुछ होंगे अस्वस्थ भी। इस प्रकार के शव आएंगे, मुर्दे आएंगे, उनको हमें देखना चाहिए, उनकी जलती चिताएं देखनी चाहिए, उन्हें मुट्ठीभर राख में बदलते देखना चाहिए। हमें उन पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए।
       मृत्यु-साधना अध्यात्मसाधना की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साधना है। क्योंकि मृत्यु हमारे सामने पूर्णतया स्पष्ट हो जाये तो हमारी कामवासना तुरंत नष्ट हो जायेगी। इसी तथ्य को एक उदाहरण के द्वारा समझाता हूँ--महात्मा महाव्रत बोले-- एक अत्यंत सुन्दर तरुणी व्यक्ति के सामने हो और वह कामवासना से भरा हुआ हो। शारीरिक सुख को प्राप्त करने के लिए वह लालायित हो और उसी समय उसके किसी अपराध के दण्ड स्वरूप राज्य की ओर से यह सूचना मिले कि उसे आज शाम को मृत्युदण्ड दिया जायेगा। सोचिये--उस व्यक्ति की उस समय क्या स्थिति होगी ? वह सुन्दर कमनीय तरुणी उसके आँखों से खो जायेगी। वासना का प्रवाह बन्द हो जायेगा। वासना की सारी धारा तिरोहित हो जायेगी। वासना का रस तत्काल समाप्त हो जायेगा क्योंकि उसके मन में एक ही बात स्थायी रूप से बैठ जायेगी कि आज सायंकाल हमें मृत्यु के मुख में हमेशा-हमेशा के लिए समा जाना होगा।
       कहने का तात्पर्य यह है कि कामवासना से मुक्त होने के लिए सदैव मृत्यु का स्मरण करते रहना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। सच भी है--मृत्यु कब आ जाये किसे पता है ? मृत्यु किसी भी पल आ सकती है। हो सकता है जो पल हम जी रहे हैं, वही आखीरी पल हो। हमारा शरीर हमेशा-हमेशा के लिए छूट जाने वाला हो। मृत्यु की धारणा जितनी गहरी होगी, कामवासना उतनी ही कमजोर होती जाएगी और एक समय ऐसा आएगा जब हमें कामवासना से निजात मिल जायेगी। यह मुक्ति न कामवासना के दमन से उपलब्ध् होती है और न ही उपलब्ध् होती है उसके भोग से।
      व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि सभी इंद्रियों का केंद्र कामेन्द्रिय है। व्यक्ति के नेत्रों के माध्यम से कामवासना रूप-सौन्दर्य खोजती है। कानों से मधुर ध्वनि, कामोत्तेजक आवाज, संगीत सुनती है। संगीत से कामवासना ही तृप्त होती है। सुन्दर चित्र, सुन्दर वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता, पक्षियों का मनमोहक कलरव, गगन में खिला हुआ पूनम का चाँद, हरे-भरे लहलहाते खेत, हवा में लहराते हुए रंग-विरंगे फूल--ये सब क्या हैं ? कानों और नेत्रों के द्वारा जगत् के साथ एक प्रकार का सम्भोग ही तो है।  नाक के द्वारा सुमधुर  कामोत्तेजक् गन्ध, जीभ के द्वारा मधुर स्वाद, त्वचा के द्वारा कोमल कमनीय काया का स्पर्श --ये सब मैथुन का ही एक प्रकार है। इन सब कामोद्दीपक साधनों से मन में कामवासना ही तो पुष्ट होती है जिनका माध्यम बनती हैं व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियाँ और उपभोग का माध्यम बनती हैं व्यक्ति की कर्मेन्द्रियाँ। बस, इस प्रसंग के अंत में हमें केवल इतना ही कहना है कि कामवासना जीवन वासना का पर्याय है। जीवन वासना ही जीवेषणा है। इससे बड़ा पागलपन जीवन में और क्या है ? क्योंकि जीवन में इससे क्या उपलव्धि होती है? हमारे हाथ क्या लगता है ? फिर भी हम जीना चाहते हैं। जीवन को हम छोड़ने के लिए कदापि तैयार नहीं होते। हमें यह बात ज्ञात होनी चाहिए कि यदि हम स्वेच्छा से जीवन त्यागने के लिए तैयार हैं तो एक नया जीवन हमें उपलब्ध् हो जाता है। मृत्यु-- जिसका एक विश्राम-स्थल होता है और उस विश्राम के बाद हम पुनः एकबार महाजीवन की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। जो व्यक्ति जीवन को दरिद्र की भांति पकड़े रहता है, एक भिखारी की तरह जीवन की भीख मांगता है, उसके हाथ क्या लगता है सिवाय एक पश्चाताप के ? इसके अलावा और कुछ भी नहीं।

आगे के लिए इंतज़ार करें-- sabhar Shiv ram sharma Facebook 

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सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

जीन में बदलाव से दूर होगी बीमारी

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हीमोफीलिया जैसी जन्मजात बीमारी के आगे चिकित्सा जगत भी लाचार है लेकिन अब ऐसे असाध्य रोगों का इलाज मुश्किल नहीं होगा फिलाडेल्फिया स्थित चिल्ड्रन हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने जून 2011 में geen में बदलाव कर पहली बार इन बीमारियों से लड़ने की क्षमता विकसित करने का दावा किया था  हालांकि उनका शोध शुरुआती दौर में है और उन्हें उन्हें यह सफलता चूहों के इलाज में मिली थी लेकिन शोधकर्ता आने वाले समय में के लिए इसी एक बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई इस पद्धति को अनुवांशिक संपादन जिनोम एडिटिंग नाम दिया गया है शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक से आनुवंशिक त्रुटियों में सुधार किया जाएगा जिससे आने वाली पीढ़ी में जन्मजात बीमारी होती है शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का प्रयोग चूहों पर किया जो सफल भी रहा इसमें ऐसे चूहों को लिया गया जो हीमोफीलिया बी नामक अनुवांशिक बीमारी से ग्रसित थे इस जन्मजात बीमारी में खून का थक्का बनने की प्रक्रिया रुक जाती है ऐसे में एक बार चोट लगने या कटने पर खून लगातार बहता रहता है जुआ से ज्यादा खून बह जाने पर कई बार मौत भी हो जाती है वैज्ञानिकों ने हीमोफीलिया बी से ग्रसित चूहों के जीनोम को संपादित किया इस प्रक्रिया में उनके खराब इनको बदल दिया गया वैज्ञानिकों ने पाया कि जिलों में बदलाव के बाद चूहे ठीक हो गए काटने पर उनका खून भी सामान्य चूहों की तरह जम गया वह भी बिना किसी negativ प्रभाव की

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बायोनिक चश्मा की सहायता से देख रखेंगे दृष्टिहीन

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 वैज्ञानिक ऐसे बायोनिक चश्मे को विकसित करने की राह पर है जिसके बारे में उनका दावा है कि जल्द ही बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध होंगी स्मार्ट चश्मा को ब्रिटेन स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की एक टीम विकसित कर रही है यह चश्मे दृष्टिहीन लोगों के लिए देखने में मददगार होंगे इन चश्मे के फ्रेम के सिरे पर बेहद छोटे कैमरे लगे होते हैं और जेब में रखने वाला एक पॉकेट कंप्यूटर होता है यह दोनों चीजें दृष्टिहीन को आगे की चीजों और लोगों के बारे में सूचित करती हैं इस तरह के चश्मे बाजार में आने के बाद दृष्टिहीन लोग आसानी से व्यस्त इलाकों में सड़कों पर चल सकेंगे यहां तक की बस नंबर और सड़कों पर लगे संकेत चिन्ह को भी पढ़ सकेंगे इन चश्मा का सबसे अधिक लाभ वृद्ध लोगों को मिलेगा जो बढ़ती उम्र के कारण ठीक से देख नहीं पाते इससे पहले भी इस तरह के उपकरण बनाने के प्रयास हुए हैं लेकिन वे व्यावहारिक तौर पर सटीक नहीं बैठे लेकिन विकसित तकनीक के चलते बायोनिक चश्मे बनाना संभव हो पाया है जो करीब  चश्मों की ही तरह दिखेंगे

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हानि रहित सिगरेट की खोज

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ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने ऐसे सुरक्षित सिगरेट का आविष्कार कर लिया है जो सेहत को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाएगी यह एक तरह का निकोटीन इनहेलर है जो सामान्य सिगरेट पीने जैसा अनुभव देगा लेकिन इसमें तंबाकू से जुड़ा कोई भी जोखिम नहीं होगा सिगरेट जैसे आकार के इस इनहेलर में किसी प्रकार का तंबाकू नहीं होगा और जब कोई इस का  कब पूछेगा तो यह सिगरेट की तरह जलेगा भी नहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि यह किसी भी प्रकार से फेफड़ों को प्रदूषित नहीं करेगा निकोटीन का एहसास कराने वाला यह सिगरेट रूपी उपकरण आम सिगरेट की तरह ही दिखता है उसी तरह का एहसास देता है इसका आविष्कार ऑक्सफोर्ड के 28 वर्षीय ग्रेजुएट एलेक्स हरने ने किया है इस शोध पर ब्रिटेन के कई दौलत मन नहीं उसको ने पैसा लगाया है ब्रिटिश अमेरिकन टोबैको कंपनी जॉर्डन हिल कैंट लकी स्ट्राइकर और पाल माल जैसे लोकप्रिय ग्रेड ब्रांडों की निर्माता है सिगरेट का लाइसेंस लेने की दौड़ में शामिल है सिगरेट के अविष्कारक हरण अपने उत्पाद को लेकर ब्रिटेन के मेडिसिन एवं हेल्थकेयर प्रोडक्ट रेगुलर की एजेंसी से बातचीत करने वाले हैं ताकि इसे निकोटिन इनहेलर के तौर पर चिकित्सा उत्पादों में शामिल किया जा सके अमेरिकी अमेरिकी टोबैको के प्रवक्ता के अनुसार यह उत्पाद विकसित होने की आखिरी चरण में है और अगले 2 वर्षों के भीतर दुनिया के बाजारों में बिक्री के लिए उपलब्ध होगा जो लोग सिगरेट छोड़ना चाहते हैं उनके लिए सुरक्षित विकल्प होगा पिछले कई वर्षों से धूम्रपान का सुरक्षित विकल्प तैयार करने के लिए बहुत प्रयास किए जा रहे थे इस क्रम में कुछ वर्षों से इलेक्ट्रिक सिगरेट बाजार में उपलब्ध है इसका आविष्कार चीन के वैज्ञानिकों ने किया था बैटरी से चलने वाली इस सिगरेट का कश खींचे जाने पर या बात छोड़ दी है यहां तक की जलती हुई है लेकिन सिगरेट के आदि लोगों की शिकायत थी कि यह सिगरेट से पर्याप्त निकोटीन नहीं होता जिससे उनकी तलब पूरी नहीं होती इन शिविरों में तार नहीं होता जो कि सेहत के लिए सबसे ज्यादा घातक होता है वैज्ञानिक अब इस बात से सहमत हैं कि सेहत को निकोटीन बहुत कम नुकसान पहुंचाता है अमेरिका में इन सिग्रेटो को मान्यता है विशेषज्ञ मानते हैं निकोटिन इनहेलर ई सिगरेट का सुरक्षित विकल्प साबित होगा उल्लेखनीय है कि दुनिया में तंबाकू के सेवन से होने वाली बीमारियों के चलते हर साल 5000000 लोगों की मौत हो जाती है यह संख्या युद्ध सड़क दुर्घटनाओं और एड्स से मरने वालों की संख्या से कहीं ज्यादा है

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रविवार, 31 जनवरी 2021

छिपकली के पूंछ की तरह उगेंगे मनुष्य के अंग

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छिपकली भी अजीब प्राणी है उसकी पूंछ स्वम ही झड़ जाती है है और कुछ समय बाद पुनः उग जाती है वैज्ञानिको ने अब इस रहस्य को समझ लिया है वैज्ञानिको ने यह अनुवांशिक नुस्खा खोज निकला है जो छिपकली के अंग के पुनिर्माण के लिए कारक है वैज्ञानिको का कहना है की आनुवंशिक सामग्री के सही मात्रा में मिश्रण से यह संभव है छिपकली में पाए जाने वाले अंग पुनर्निर्माण के आनुवांशिक सामग्रियों के सही मात्रा का पता लगाकर उन्ही जीन को मानव कोशिका में प्रत्यारोपित कर उपास्थि मांसपेशी यहाँ तक ऋण की हड्डी की पुनर्संग्रचना भविस्य में सभव है एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी के किनारो कुसमी ने कहा छिपकली में वही जीन होते है जो मनुस्यो में होते है ये मनुस्यो की शारीरिक संगरचना से मेल खाने वाला जीव है इससे विभिन्य पारकर की बीमारियों का इलाज संभव है

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चाँद पे एलियन देखने का दावा

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अन्य ग्रहो के चेतनायुक्त प्राणियों को देखना तथा उनके सात आत्मीयता बढ़ाना सपना सा लगता है इन्ही प्राणियों को को एलियन कहा जाता है एलियन हमेसा से पृथ्वी वासियो के लिए कौतुहल का विषय बना हुआ है कई वैज्ञानिको ने एलियन से जुडी बाते दुनिया के सामने रखी है नासा ने भी एलिअन्स के विषय में एक सूचना दी है नासा ने एक वीडियो में मानव आकृति जैसा प्राणी चाँद पे चलते देखा है नासा ने इस दिशा में और भी जांच कर जानकारी देने को कहा है इस वीडियो को देखने वालो के लिए इसकी परछाई को देख पाना किसी आश्चर्य से कम नहीं है यह अनरिच्या के शोध में नयी दिशा दे सकती है

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शीशे की तरह पारदर्शी होंगे शरीर के अंग

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कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे पूरा शरीर शीशे की तरह पारदर्शी हो जाता हैयह शोध सेल नामक अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है इस तकनीक से शरीर को हानि नहीं पहुंचती और शरीर के सभी अंगों को देखा जा सकता है इससे यह जानने में मदद मिलेगी कि शरीर के विभिन्न अंग किस तरह काम करते हैं करीब एक सदी से वैज्ञानिक शरीर को पारदर्शी रूप में देखने का प्रयास कर रहे हैं थे लेकिन अधिकांश तक नीचे उतर को नुकसान पहुंचा सकती हैं कोशिकाओं में मौजूद लिपट के मोटे कण प्रकाश किरणों को वितरित कर उसको को अपारदर्शी बना सकते हैं लेकिन उन्हें विकसित करने में प्रयोग होने वाले प्रक्रिया से अंग कमजोर हो सकते हैं और उनका आकार बिगड़ सकता है कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने पूर्व के वैज्ञानिक कामों के आधार पर एक तीन स्तरीय तकनीक विकसित की है एक नरम प्लास्टिक की झिल्ली उसको को सहारा देती है खून के प्रवाह के जरिए अनुवांशिक डिटर्जेंट को उसको लगातार जला डाला जाता है यह रिपीट को खोलता है और अंगों को पारदर्शी बनाता जाता है महत्वपूर्ण जोड़ों को पहचान के लिए इस मिश्रण में पहचान करने वाले रंगों और अंगों को मिलाया जा सकता है

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विशालकाय रहस्यमय जलीय जीव

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लोच नेस मॉन्सटर पानी में रहने वाला एक विशाल जीव है जो अब तक रहस्य्मय ही बना हुआ है इससे संबंधित किद्वन्तियाँ भी प्रचलित है माना जाता है कि यह स्कॉटिश हाई लाइट्स पर रहता है हमने कई समुद्री जीव देखे हैं जिसमें से कुछ अति सुंदर तो कुछ अत्यंत भयंकर होते हैं इन्हीं भयानक जीवो में से एक लोच नेस मॉन्सटर है स्कॉटलैंड की झील लोच नेस पाया गया है वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर एली विलियम्स ने इस अजीब अजीबोगरीब जीव की तस्वीर ली है बाद में जब उन्होंने इन तस्वीरों को देखा तो अली का ध्यान इस मॉन्स्टर की ओर गया हालांकि यह पहली बार नहीं है जब पानी में रहने वाला यह जीव सबकी नजरों में आया है सबसे पहली बार यह इसी झील में 2006 में देखा गया था जिसके बाद से वह वहां आने वाले लोगों को सचेत कर दिया गया था फोटोग्राफर अली ने कहा कि शुरुआत में मुझे लगा वह कोई सांप की प्रजाति है फिर कैटफिश की तरह लगा मगर मुझे नहीं पता वह है क्या मैं यहां विशेष लोगों के ऊपर छोड़ता हूं आपको बता दें लोच नेस मॉन्सटर पानी में रहने वाला एक विशाल जीव है जिस कारण अभी तक बरकरार है कुछ लोग उसके अस्तित्व पर शक भी करते हैं मगर इससे संबंधित कई किस्से भी सामने आए हैं माना जाता है

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शनिवार, 30 जनवरी 2021

सोचते ही पहुंच जाएंगे संदेश प्राचीन भारत की बातें सत्य टेलीपैथी

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आने वाले समय में सोचते ही संदेश टेलीपैथी के द्वारा पहुंच जाएंगे यह प्रयोग पहले ही भारत में किया जा चुका है जिसने तिरुवंतपुरम में बैठा व्यक्ति का संदेश 5000 किलोमीटर दूर बैठे फ्रांस में एक व्यक्ति को बिना बताए जो संदेश उसे भेजा गया वह उन्हें डिकोट करके पढ़ लिया जिसमें शोधकर्ता ने इलेक्ट्रोन्सेफेलोग्राफी हेडसेट का प्रयोग करके दिमाग में होला और सिआओ कहने पर न्यू डांस की गतिविधियों की में उनकी इलेक्ट्रिक इक्विटी को रिकॉर्ड किया मैं बायनरी कोर्ट में बदलकर दूसरे व्यक्ति के ब्रेन तक भेज दिया जिससे मात्र महसूस कर डिकोट कर लिया इसमें इलेक्ट्रिक करंट को तमाम तरह के विचारों से जोड़ा जाता है और उसे कंप्यूटर इंटरफेस में डाल दिया जाता है कंप्यूटर इन सिग्नल का विशेषण कर क्रिया को नियंत्रित करता है कंप्यूटर इंटरफेस की जगह आउटपुट के लिए दूसरे व्यक्ति के दिमाग को आईजी से जोड़ दिया जाता है रिसीवर एंड पर बैठे व्यक्ति के पास जब मैसेज पहुंचा पहुंचा तो उसे चमक सी महसूस हुई जब उसने इसे डिकोड किया तो वही संदेश निकला जो संदेश भेजने वालों ने लिखा था इस प्रकार वेदों पुराणों में देवताओं आध्यात्मिक रूप से उन्नत महात्माओं को टेलीपैथी द्वारा संदेश भेज आने का जिक्र मिलता है वह आज इस तरह साबित हो रही है

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शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

नियंडरथल मानव की थी अपनी भाषा

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नियंडरथल होमो सेपियंस की एक विलुप्त प्रजाति है जो आधुनिक मानव से कड़ी से संबंध से संबंधित है नियंडरथल और आधुनिक मानव के डीएनए के अध्ययन से यह साफ़ होता है की 300000 से 400000 वर्ष पूर्व एक ही पूर्व से अलग हुए थे हालांकि अभी भी यह रहस्य है कि नियनथंडल कब और क्यों विलुप्त हुए थे यह जीवाश्मों के अध्ययन से यह जाहिर होता है कि नियंडरथल का मस्तिष्क का आकार लगभग आधुनिक मानव के बराबर था उन्नत प्रकार के औजार बनाते थे उनकी अपनी भाषा थी अभी तक यह ज्ञात नहीं था कि वे आधुनिक मानव की तरह बोल सकते थे या नहीं अभी तक यह सिद्धांत प्रचलित था कि भाषा का विकास आधुनिक मानव के उद्गम वह विकास के साथ ही हुआ है लेकिन अब नवीन अनुसंधान यान इशारा करते हैं कि उनकी अपनी भाषा थी और हो सकता है उनके शब्दों में हमारे प्रजाति की भाषा में भी अपना योगदान दिया हो नीदरलैंड के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर साइकोलिंगगुइस्टिक निज़मेगेन के शोधकर्ता डान यू तथा स्टीफन सी लेविंसन ने मानव जीवन का अध्ययन करके बताया कि आधुनिक भाषा और वाणी का उद्गम लगभग 500000 वर्ष पूर्व कि हमारे और नियंडरथल के उभयनिष्ठ पूर्वजो तक खोजा जा सकता है

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एचआईवी का इलाज मानव जीन से होगा

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पूरे विश्व में लगभग तीन करोड़ 40 लाख 98 हज़ार पैदा करने वाले एचआईवी के संक्रमण से पीड़ित है उनमें से एक बड़ी जनसंख्या निर्धन और विकासशील देशों में है एक व्यक्ति में क्रमिक रूप से प्रभाव होते होते प्रतिरोधी तंत्र के कारण जीवन के लिए जोखिम पैदा करने वाले संक्रमण जैसे जीवाणु जाने विसर्जन कवक तथा प्रोटोजोआ अन्य सरकार पूरी तरह से हावी हो जाते हैं और अंत में रोगी की मौत हो जाती है अभी तक कोई प्रभाव की खोज नहीं की जा सकती है उसके लिए दवा का प्रयोग किया जाता है इसका उपयोग की समस्या उत्पन्न हो सकती है अब मानव जीन से एचआईवी का संक्रमण का इलाज संभव है

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