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गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

लघु दुर्गा सप्तशती

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{{{ॐ}}}   

                                                      #लघु_दुर्गा_सप्तशती

ॐ वींवींवीं वेणुहस्ते स्तुतिविधवटुके हां तथा तानमाता,
स्वानंदेमंदरुपे अविहतनिरुते भक्तिदे मुक्तिदे त्वम् ।
हंसः सोहं विशाले वलयगतिहसे सिद्धिदे वाममार्गे,
ह्रीं ह्रीं ह्रीं सिद्धलोके कष कष विपुले वीरभद्रे नमस्ते ।। १ ।।

ॐ ह्रीं-कारं चोच्चरंती ममहरतु भयं चर्ममुंडे प्रचंडे,
खांखांखां खड्गपाणे ध्रकध्रकध्रकिते उग्ररुपे स्वरुपे ।
हुंहुंहुं-कार-नादे गगन-भुवि तथा व्यापिनी व्योमरुपे,
हंहंहं-कारनादे सुरगणनमिते राक्षसानां निहंत्रि ।। २ ।।

ऐं लोके कीर्तयंती मम हरतु भयं चंडरुपे नमस्ते,
घ्रां घ्रां घ्रां घोररुपे घघघघघटिते घर्घरे घोररावे ।
निर्मांसे काकजंघे घसित-नख-नखा-धूम्र-नेत्रे त्रिनेत्रे,
हस्ताब्जे शूलमुंडे कलकुलकुकुले श्रीमहेशी नमस्ते ।। ३ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं ऐं कुमारी कुहकुहमखिले कोकिले,
मानुरागे मुद्रासंज्ञत्रिरेखां कुरु कुरु सततं श्रीमहामारि गुह्ये ।
तेजोंगे सिद्धिनाथे मनुपवनचले नैव आज्ञा निधाने,
ऐंकारे रात्रिमध्ये शयितपशुजने तंत्रकांते नमस्ते ।। ४ ।।

ॐ व्रां व्रीं व्रुं व्रूं कवित्ये दहनपुरगते रुक्मरुपेण चक्रे,
त्रिःशक्त्या युक्तवर्णादिककरनमिते दादिवंपूर्णवर्णे ।
ह्रीं-स्थाने कामराजे ज्वल ज्वल ज्वलिते कोशितैस्तास्तुपत्रे
स्वच्छंदं कष्टनाशे सुरवरवपुषे गुह्यमुंडे नमस्ते ।। ५ ।।

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोरतुंडे घघघघघघघे घर्घरान्यांघ्रिघोषे,
ह्रीं क्रीं द्रं द्रौं च चक्र र र र र रमिते सर्वबोधप्रधाने ।
द्रीं तीर्थे द्रीं तज्येष्ठ जुगजुगजजुगे म्लेच्छदे कालमुंडे,
सर्वांगे रक्तघोरामथनकरवरे वज्रदंडे नमस्ते ।। ६ ।।

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वामभित्ते गगनगडगडे गुह्ययोन्याहिमुंडे,
वज्रांगे वज्रहस्ते सुरपतिवरदे मत्तमातंगरुढे ।
सूतेजे शुद्धदेहे ललललललिते छेदिते पाशजाले,
कुंडल्याकाररुपे वृषवृषभहरे ऐंद्रि मातर्नमस्ते ।। ७ ।।

ॐ हुंहुंहुंकारनादे कषकषवसिनी मांसि वैतालहस्ते,
सुंसिद्धर्षैः सुसिद्धिर्ढढढढढढढः सर्वभक्षी प्रचंडी ।
जूं सः सौं शांतिकर्मे मृतमृतनिगडे निःसमे सीसमुद्रे,
देवि त्वं साधकानां भवभयहरणे भद्रकाली नमस्ते ।। ८ ।।

ॐ देवि त्वं तुर्यहस्ते करधृतपरिघे त्वं वराहस्वरुपे,
त्वं चेंद्री त्वं कुबेरी त्वमसि च जननी त्वं पुराणी महेंद्री ।
ऐं ह्रीं ह्रीं कारभूते अतलतलतले भूतले स्वर्गमार्गे,
पाताले शैलभृंगे हरिहरभुवने सिद्धिचंडी नमस्ते ।। ९ ।।

हंसि त्वं शौंडदुःखं शमितभवभये सर्वविघ्नांतकार्ये,
गांगींगूंगैंषडंगे गगनगटितटे सिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ।
क्रूं क्रूं मुद्रागजांशो गसपवनगते त्र्यक्षरे वै कराले,
ॐ हीं हूं गां गणेशी गजमुखजननी त्वं गणेशी नमस्ते ।। १० ।।

इसमें दस श्लोक लघु दुर्गा सप्तशती में परमेश्वरी के वीरभद्रा व्यापिनी महेशी अन्नता गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं भद्रकाली सिद्धचंण्डी गणेशी रुपों का वर्णन और प्रणति निवेदन किया गयाa कांता  गुह्यमुंण्डा वज्रदंण्डा ऐन्द्रीं यह चार रूप अत्यंत उग्र हैं। इनका रहस्य स्वरूप ज्ञान वाममार्ग में होता है ज्ञानमार्ग में व्यापिनी की परिधि में इन रूपों का विराट दर्शन होता हैs सप्तशती में भी यह रूप पर कथा विस्तार में वे अन्तर्हित से हो गए हैं यहां कथा नहीं है वस्तुत यह स्वरूप की दुर्गति का कारण बनते हैं और परमेश्वरी के शरणागत होने पर यह दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की कृपाकटाक्ष हो जाते हैं।
जब वह निग्रहकारिणी होती हैं तो यह स्वरूप व्यक्ति को मोह ग्रस्त करके अज्ञान के तामिस्र लोकों में धकेल देते हैं मोहग्रस्त व्यक्ति त्रिपुरा को भूलकर इनमें भूल जाता है जैसे बालक क्रीडा से मुक्त होकर मां को भूल जाता है पर क्रीडनक के टूटने पर अथवा परमा की अकाण्ड करुणा से जब उसको मातृस्मरण हो जाता है hऔर वह आर्तभाव से उसे पुकारता है तो वहीं निग्रहकारिणी करूणार्द्र होकर अनुग्रहकारिणी के रूप में आती है।
उसके बंधन पास भी बनते है तो ग्रन्थि भी मोह के पेशल संबंध भी बांधते हैं तो मद के घर्षक दोषरज्जु भी व्यक्ति को लपेटती लथेडती है वह यह चाहती है oकि यह कल्मष उसे छू भी ना सके वह इतना शुभ्र हो जाए कि यह उसे कुलुषित कर ही न सके उसकी कृपा का आनंद लेने के लिए साधक के संपूर्ण में उसका श्रद्धारूप चमकने लगे लधुसप्तशती ने ज्ञान की तटस्थ वृत्ति भक्ति की अरुणिमा से रंजित होकर प्रकट हुई है
 परमा को उसके चरित्रों के माध्यम से नहीं शुद्ध मूल रूप में भजा गया है इसके गान की अवस्था में ज्ञान के निर्बंन्ध "में भाषा और भाषा का व्याकरण गौण हो गया है सप्तशती का जो फल है वहीं इसका है पर इसमें बीजों की प्रधानता है इसलिए जिस साधक में इतनी योग्यता आ गई हो उसके लिए यह भी उतनी ही फलप्रद है और जो भी इतना योग्य नहीं हुआ है उसे इसके अधिक पाठ करने पर वह योग्यता प्राप्त होती है।
इसकी फलश्रुति नहीं दी गई है नहीं कोई विस्तृत वर्णन विधि समझाने की बात है यह है कि इसमें जिन दस रूपों की स्तुति की गई है उन रूपों में जो गुण प्रभाव निहित हैंk वहीं इस पाठ के फल स्वरुप प्राप्त होता है इन सबका संघनित रूप दुर्गा है अतः इसकी अधिष्ठातृ दुर्गा चंण्डी होगी।sabhar sakti upasak Facebook wall

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Kisan Ganne se Sirka Banakar Kamayein 15-20 गुना ज्यादा लाभ | How To Mak...

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बुधवार, 31 मार्च 2021

योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण

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अब योग के दृष्टि से आयु पे नियंत्रण की मनोवैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक प्रभाव एवं स्तर को जान अथवा समझ लेना अवयशक हैं

देखो उम्र और स्वाँस का वही सम्बंध होता हैं जो किसी गाड़ी और इधन की होती हैं जैसे जैसे गाड़ी की इधन जहाँ जाकर समाप्त हो जाती हैं वहीं उसका विराम लग जाता फिर चाह कर भी वहाँ से आगे अपनी गाड़ी को नहीं लेकर जा सकता चाहे उसका गंतव्य स्थान आए या नहीं आए और एक बात ये भी हैं की इस शरीर रूपी गाड़ी को प्राणी बिना मतलब इधर उधर चलाते जा रहा हैं उसपे ब्रेक लगाने की कला ही उसे मालूम नहीं हैं जब उसका कोई कार्य नहीं हैं अथवा बिना रास्ते का खबर रहे वो निरंतर अनजान और ग़लत दिशा में भागे जा रहा हैं और जब तक गाड़ी भाग रही हैं चाहे वो किसी भी दिशा में भागे इधन तो कम तटपश्चात समाप्त होगी ही ना उसे क्या मतलब की तुम किस दिशा में जा रहे हो सही दिशा में या ग़लत दिशा में ।

दूसरा पहलू योग के दृष्टि में जीवन क्या हैं स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया का निरंतर जारी रहना ही जीवन हैं योग की मतअनुसार परंतु जिस साधक को इस स्वाँस और प्रस्वाँस की क्रिया को विराम देने की ठहराने की कला मालूम हैं उसका स्वतः आयु पे नियंत्रण स्थापित होने लगता हैं क्यूँकि वो उस इधन रूपी स्वाँस को एक सही दिशा में ही खर्च करता हैं और बिलकुल जागृत और बोध के साथ खर्च करता हैं की इतने इधन में
मुझे गंतव्य स्थान तक पहुँचना हैं और इस तथ्य से भी वो भली भाँति परिचित हैं की जितना इधन हैं वो
पर्याप्त हैं उस परम तत्व को जानने अथवा वहाँ तक की दूरी तय करने हेतु बशर्ते इस इधन को बचाने अथवा सही रास्ते की ओर जाने में लगाए तब।

अब जब प्राण की कोशों में बदलाव आती धीरे धीरे स्वाँस की आयु अथवा अविधि कम होने लगती अर्थात जो प्राणऊर्जा समस्त इंद्रियों अथवा कोशों में पहुँचनी चाहिए वो वो एक समान रूप से पहुँच नहीं पाती तत्पश्चात तन पे इसकी प्रभाव पड़नी प्रारंभ हो जाती हैं और इंद्रियाँ एवं त्वचा जर्जर होने लगती हैं अर्थात बुढ़ापा प्रारंभ होने लगती हैं इसी प्रकार आंतरिक तंत्र रूपी यंत्र जैसे गुर्दे, किडनी, फेफड़े, एवं हृदय में स्पंदित हो रही ऊर्जा रूपी वायु भी मंद पड़ने लगती हैं जिससे उसकी पोषण तत्व में भी कमी आने लगती हैं।sabhar satsang Facebook wall


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:मनुष्य इस विश्व ब्रह्माण्ड की अद्भुत कृति

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पूज्य ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      इस विश्वब्रह्माण्ड के कण-कण में नैसर्गिक शक्तियों का विपुल भण्डार भरा हुआ है। ये नैसर्गिक शक्तियां ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होकर सर्वप्रथम ग्रह-नक्षत्रों की ऊर्जाओं में परिवर्तित होती हैं और उनके द्वारा मनुष्य के विभिन्न अंगों से अपना सम्बन्ध स्थापित करती हैं। इसके पश्चात पंचतत्वों का आश्रय लेकर विभिन्न पदार्थों का निर्माण करती हैं। हमें ज्ञात होना चाहिए कि सूर्य से निःसृत उष्ण ऊर्जा ही वास्तव में वह नैसर्गिक शक्ति है। हम-आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि केवल दस एकड़ भूमि पर सूर्य की जो उष्ण ऊर्जा दिन के समय बिखरी हुई होती है, उसकी शक्ति से पूरे विश्व के कल-कारखाने और मशीनों को पूरे एक महीने तक चलाया जा सकता है। लेकिन यह सम्भव कैसे है ?
      सूर्य की उसी उष्ण ऊर्जा का दूसरा नाम 'सौर ऊर्जा' है जो ज्योतिर्विज्ञान की मूलभित्ति है। ज्योतिर्विज्ञान के अन्तर्गत छः विज्ञान हैं--नक्षत्रविज्ञान, राशिविज्ञान, क्षणविज्ञान, कालविज्ञान, चंद्रविज्ञान और सूर्यविज्ञान।
      इस नैसर्गिक ऊर्जा का एक विशिष्ट क्षेत्र है--मानव पिण्ड जिसमें नैसर्गिक ऊर्जा मानसिक शक्ति, प्राणशक्ति, विचारशक्ति, इच्छाशक्ति और कल्पनाशक्ति के रूप में कार्य करती है।
      इस पृथ्वी पर सूर्य की यह कितनी ऊर्जा निःसृत होती है--इसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। उस ऊर्जा से कैसे लाभान्वित हुआ जा सकता है--यह वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का विषय है।
      अब आकाश में काले-भूरे बादलों के बीच  कुछ क्षणों के लिए चमकने वाली बिजली को ही लीजिए। वह इतनी अधिक होती है कि उससे दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर को पूरे चौबीस घण्टे प्रकाशित किया जा सकता है। लेकिन हम उसे अपने उपयोग में नहीं ला पाते। इतनी उपयोगी विद्युतशक्ति अंतरिक्ष में ही अनुपयोगी रूप में नष्ट हो जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि इतनी मूल्यवान सूर्य की उष्ण ऊर्जा और इतनी महत्वपूर्ण आकाशीय विद्युतशक्ति का सदुपयोग मानव जीवन में नहीं हो पाता। वास्तव में यदि देखा जाये तो अब तक उसके उपयोग करने की कला से ही परिचित नहीं हो पाए हैं हम और जिस दिन परिचित हो जाएंगे, उसी दिन मनुष्य की वे अभिलाषाएं पूर्ण हो जाएंगी जो मनुष्य के लिए अब तक अज्ञात हैं।
      लेकिन मनुष्य की शक्तियों के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है। यदि आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से देखा जाये तो विश्वब्रह्माण्ड की एक अद्भुत और श्रेष्ठतम कृति है मनुष्य और अति मूल्यवान है उसका जीवन। आत्मिक शक्ति, मनःशक्ति, विचारशक्ति, इच्छाशक्ति, बौद्धिकशक्ति, रचनात्मक शक्ति और शारीरिक शक्ति--इन सात शक्तियों का विभु है मानव। एक साथ ये शक्तियां इस विश्वब्रह्माण्ड में अन्य किसी के पास नहीं हैं और यही एकमात्र कारण है कि देवगण, ऋषिगण, पितृगण, योगीगण, सिद्ध-साधकगण की आत्माएं मानव शरीर को उपलब्ध होने के लिए सदैव तत्पर और आकुल रहती हैं। सोचने की बात है इतना महत्वपूर्ण और गरिमामय मानव शरीर होते हुए भी आज का व्यक्ति विशेषकर युवावर्ग निराश, निर्धन एवम शक्तिहीन है तो इसका कारण बाहर नहीं, उसीके भीतर है। यदि मनुष्य अपनी क्षमताओं को और प्रकृति प्रदत्त अपनी शक्तियों को अपने ध्येय पर एकाग्र करे तो उसके जीवन में सभी प्रकार की सफलताओं के पुष्प खिलने में देर न लगेगी और देर न लगेगी उसके व्यक्तित्व को और महिमामंडित और गरिमामण्डित होने में।



(श्रद्धेय गुरुदेव की 'अभौतिक सत्ता में प्रवेश'नामक पुस्तक के आधार पर)

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सृष्टि और प्रलय

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                                                                  #

इस समस्त जड़ चेतनात्मक जगत का एक  मात्र निमित्त एवं उपादान कारण वह परब्रह्म ही है यही वह मूल तत्व है जिससे सृष्टि कि रचना होती है उसी से संचालित होती है तथा प्रलय काल मे उसी मे विलीन हो जाती है यह सृष्टि उसी सी अभिव्यक्ति है जो ब्रह्म से भिन्न नही है
यह जड प्रकृति सृष्टि या कारण नही है प्रलय काल मे वह सबको अपने मे विलीन  करने ये कारण ही उसे भोक्ता कहा गया है
कल्प ये आरम्भ मे सृष्टि सी रचना उसी प्रकार होती है जैसी पूर्व कल्प मे हुई थी वेद भी नित्य है प्रत्येक कल्प मे इनकी नई रचना नही होती है
हर कल्प मे उसी नाम रूप और ऐश्वर्य वाले देवता उत्पन्न होते है किन्तु उनके जीव बदल जाते है इसलिए वे नित्य है तथा जन्म मरण से मुक्त है
जगत के कारण के समाधान ये लिए वेदानुकुल स्मृतियाँ सी प्रमाण है सांख्य और योग दर्शन वेदानुकुल नही होने से प्रमाण नही है
जिस प्रकार बीज मे सम्पूर्ण वृक्ष सी सत्ता विधमान है उसी प्रकार यह जगत अप्रकट रूप से शक्ति रूप से ब्रह्म मे विधमान है प्रलय काल मे भी यह शक्ति रूप से उस परब्रह्म मे विधमान रहता है तथा रचना काल मे वही शक्ति जड चेतन ये रूप मे प्रकट होती है प्रलय काल मे जगत अव्यक्त रूप से ब्रह्म मे विधमान रहता है सत्ता या कभी नाश नही होता रूपान्तरण मात्र होता है 
सृष्टि सी रचना मे ब्रह्म से सर्वप्रथम आकाश उत्पन हुआ आकाश से वायु  वायु से तेज तेज से जल  जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई sabhar sakti upasak agyani facebook

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अचेतन में प्रवेश

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स्वप्न देखते हुए जागने की पहली विधि - 

एक तो यह कि तुम यह मानकर अपना कामकाज, अपना व्यवहार शुरू करो कि सारा संसार स्वप्‍नवत है। तुम जो भी करो, यह याद रखो कि यह सपना है। जब जागे हुए हो तो निरंतर याद रखो कि सब कुछ सपना है।

अगर तुम स्वप्न देखते हुए स्मरण रखना चाहते हो कि यह स्वप्न है तो तुम्हें जागते हुए ही उसका आरंभ करना होगा। अभी तो ऐसा है कि स्वप्न देखते हुए तुम नहीं याद रख सकते कि यह स्‍वप्‍न है। तुम तो सोचते हो कि यह यथार्थ ही है।

क्यों तुम सोचते हो कि यह यथार्थ है? क्योंकि दिनभर तो तुम यही समझते हो कि सब कुछ यथार्थ है। वह तुम्हारी दृष्टि बन गई है —बंधी—बंधाई दृष्टि। जागते हुए तुमने स्नान किया, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम भोजन कर रहे थे, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम बातचीत कर रहे थे, वह भी यथार्थ था। पूरे दिन और इसी तरह पूरी जिंदगी, तुम जो भी सोचते हो, करते हो, उस पर तुम्हारी दृष्टि उसके यथार्थ होने की रहती है। यह दृष्टि फिक्स हो जाती है, यह मन की बंधी—बंधाई धारणा बन जाती है। फिर रात में जब तुम स्‍वप्‍न देखते हो तो वही दृष्टि काम करती है कि यह यथार्थ है।

इसलिए पहले तो हम विश्लेषण करें। स्‍वप्‍न और यथार्थ के बीच कुछ समानता होनी चाहिए, अन्यथा यह दृष्टि बननी कठिन होगी। मैं तुम्हें देख रहा हूं। फिर मैं आंख मूंदता हूं रूप का और स्‍वप्‍न देखने लगता हूं और स्‍वप्‍न में तुम्हें देखता हूं। इन दोनों देखने में फर्क नहीं है। जब मैं तुम्हें सचमुच देखता हूं तो क्या करता हूं? मैं तुम्हें नहीं देखता हूं तुम्हारा चित्र मेरी आंखौं मैं प्रतिबिंबित होता है। पहले तुम्हारा चित्र प्रतिबिंबित होता है और तब वह चित्र किसी रहस्यपूर्ण

प्रक्रिया के द्वारा—विज्ञान अभी उस प्रक्रिया को नहीं जान सका है—रासायनिक रूप में रूपांतरित होता है और मस्तिष्क के भीतर कहीं पहुंचा दिया जाता है। विज्ञान को अभी यह भी पता नहीं है कि यह बात ठीक किस स्थान पर घटित होती है। आंख में यह नहीं घटित होती है, आंख तो सिर्फ द्वार है। मैं तुम्हें सीधे आंख से नहीं देखता हूं आंख के माध्यम से देखता हूं।

आंख में तुम प्रतिबिंबित होते हो। तुम मात्र एक चित्र हो सकते हो, तुम यथार्थ हो सकते हो, तुम स्वप्न हो सकते हो। याद रखो, स्वप्न तीन— आयामी होता है। मैं एक चित्र को पहचान पाता हूं क्योंकि चित्र दो— आयामी होता है। स्वप्न तीन—आयामी होता है, इसलिए वह ठीक तुम्हारे जैसा दिखता है। और आंख नहीं कह सकती कि जो देखा गया है यह यथार्थ है या नहीं। निर्णय लेने का कोई उपाय नहीं है, आंख निर्णायक नहीं है।

मैं सदा भीतर हूं और तुम सदा बाहर हो, और दोनों का मिलन नहीं होता। इसलिए यह समस्या ही है कि तुम यथार्थ हो कि स्वप्न। ठीक इस क्षण भी निर्णय लेने का उपाय नहीं है कि मैं स्‍वप्‍न देख रहा हूं या तुम सचमुच यहां हो। और मुझे सुनते हुए तुम कैसे कह सकते हो कि तुम मुझे सच में सुन रहे हो या कि तुम स्‍वप्‍न देख रहे हो? कोई उपाय नहीं है। यही कारण है कि जो तुम्हारी दृष्टि दिनभर बनी रहती है, वही रात में भी, नींद में भी प्रवेश कर जाती है। तुम स्‍वप्‍न को सच मानते हो।

विपरीत का प्रयोग करो। 
सतत यह तीन सप्ताह याद रखो कि जो भी तुम करते हो वह सपना है। शुरू में यह बहुत कठिन होगा। तुम बार—बार मन के पुराने ढांचे में पड़ोगे, तुम सोचने लगोगे कि यह यथार्थ है। तुम्हें निरंतर अपने को सजग करना होगा और याद दिलाना होगा कि यह स्वप्न है। अगर तीन सप्ताह तक लगातार तुमने इस दृष्टि को कायम रखा तो पांचवें सप्ताह में किसी रात स्वप्न देखते हुए तुम अचानक यह भी जान लोगे कि यह स्‍वप्‍न है।

स्वप्न में चेतना को, होश को प्रविष्ट कराने का यह एक उपाय है। रात स्वप्‍न देखते हुए यदि याद रख सको कि यह स्वप्न है तो फिर दिन में याद रखने की जरूरत नहीं रहेगी कि यह स्वप्न है। तब तुम जान जाओगे।

आरंभ में जब इसका अभ्यास करोगे तो यह एक आरोपित धारणा ही रहेगी। तुम चेष्टापूर्वक विश्वास करना शुरू करोगे कि यह स्‍वप्‍न है। लेकिन जब स्वप्न में भी यह स्मरण रहने लगेगा कि यह स्‍वप्‍न है तो यह यथार्थ बन जाएगा। तब दिन में जब तुम उठोगे तो यह नहीं अनुभव करोगे कि तुम नींद से उठ रहे हो; तुम्हें महज यह लगेगा कि मैं एक स्‍वप्‍न से दूसरे स्वप्न में सरक रहा हूं। तब दिन के कामकाज को स्‍वप्‍न की तरह देखना यथार्थ रूप लेगा।

और अगर चौबीस घंटे ही स्वप्न हो जाएं, और तुम्हें उसका अनुभव और स्मरण होता रहे, तो तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाओगे। तब तुम्हारी चेतना का तीर दो फल वाला तीर हो जाएगा। और तुम जब स्वप्न समझने लगोगे तो तुम स्‍वप्‍न देखने वाले को, विषयी को भी समझने लगोगे। अगर तुम स्‍वप्‍न को ही सच मानते हो तो तुम स्वप्न—द्रष्टा को नहीं अनुभव कर सकते। जब फिल्म यथार्थ हो गई तो तुम अपने को भूल जाते हो। जब फिल्म बंद होती है और तुम फिर समझने लगते हो कि यह यथार्थ नहीं थी तब तुम्हारा स्वयं का यथार्थ आविर्भूत होता है, प्रकट होता है। तुम स्वयं को अनुभव कर सकते हो—यह एक तरीका हुआ।

यह भारत का एक सबसे पुराना तरीका रहा है। यही कारण है कि हमने इस बात पर जोर दिया है कि संसार मिथ्या है। यह बात हम किसी दार्शनिक अर्थ में नहीं कहते हैं। हम यह नहीं कहते कि यह घर मिथ्या है और यह कि तुम इसकी दीवार से निकल सकते हो। उस अर्थ में नहीं। जब हम कहते हैं कि यह घर मिथ्या है, तो यह एक युक्ति है। यह घर के खिलाफ कोई दलील नहीं है।

यह शंकर का कोई दार्शनिक मत नहीं है। वे यहां सत्य के संबंध में कुछ नहीं कह रहे हैं, वे यहां जगत के बारे में भी नहीं कह रहे हैं। यह तो तुम्हारे मन को बदलने की उनकी एक युक्ति है, तुम्हारी बंधी दृष्टि को बदलने का उनका एक उपाय है; ताकि तुम संसार को सर्वथा भिन्न ढंग से देख सको।

भारतीय चिंतन के लिए यह सदा ही एक समस्या रही है। क्योंकि उसके लिए सब कुछ ध्यान की युक्ति है। यह सत्य है या नहीं, इसमें हमें रस नहीं है। हम तो मनुष्य को बदलने के लिए उसकी उपयोगिता की फिक्र करते हैं। और पश्चिमी चित्त के लिए यह चीज बिलकुल भिन्न है। जब पश्चिम के लोग कोई सिद्धांत प्रस्तावित करते हैं तो वे इस बात की चिंता करते हैं कि यह सच है अथवा नहीं, इसे तर्क से सिद्ध किया जा सकता है या नहीं। लेकिन जब हम कोई चीज प्रस्तावित करते हैं तो हम उसके सत्य की नहीं, उसकी उपयोगिता की चिंता करते हैं। हम देखते हैं कि मनुष्य के मन को बदलने की उसकी क्षमता क्या है। वह सच है या झूठ, हम इसकी चिंता ही नहीं करते। वस्तुत: तो वह दोनों नहीं है। वह एक युक्ति भर है।

मैंने बाहर फूल देखे हैं। सुबह सूरज उगता है और सब चीज सौंदर्य से भर जाती है। लेकिन तुम कभी घर से बाहर नहीं गए हो, तुमने कभी फूल नहीं देखे हैं और तुमने सुबह का सूरज नहीं देखा है। तुमने कभी खुला आकाश भी नहीं देखा है। और तुम नहीं जानते हो कि सौंदर्य क्या है। तुम सदा एक कारागृह में बंद रहे हो। और मैं तुम्हें बाहर ले चलना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि तुम भी खुले आसमान के नीचे आ जाओ और फूलों से मिलो।

यह मैं कैसे करूं? तुम फूलों को नहीं जानते हो। यदि मैं फूलों की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप पागल हो गए हैं, फूल वगैरह नहीं हैं। अगर मैं सुबह के सूरज की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप कल्पना कर रहे हैं, स्वप्न देख रहे हैं, आप कवि हैं। अगर मैं खुले आकाश की बात करूं तो तुम हंसोगे और पूछोगे कि आकाश कहां है, यहां तो दीवार ही दीवार है। फिर मैं क्या करूं?

मुझे कोई ऐसी युक्ति निकालनी होगी जो तुम्हारी समझ में आए और जिससे तुम बाहर निकल सको। इसलिए मैं कहता हूं कि घर में आग लगी है और मैं खुद भागने लगता हूं। यह बात संक्रामक हो जाती है, और तुम भी मेरे पीछे भागते हो और बाहर निकल जाते हो। और तभी तुम जानोगे कि जो मैं कह रहा था वह न सही था और न गलत। तब तुम फूलों को जानोगे और मुझे क्षमा कर दोगे।

बुद्ध ने वही किया था, महावीर ने वही किया था, शिव ने और शंकर ने वही किया था। इसलिए बाद में हम उन्हें क्षमा कर देते हैं। क्योंकि एक बार बाहर निकलने पर हमें पता चल जाता है कि वे क्या कर रहे थे। और तब हम समझते हैं कि उनके साथ बहस करना व्यर्थ था, क्योंकि यह बात ही बहस की नहीं थी। आग कहीं नहीं थी, लेकिन हम आग की भाषा समझ सकते थे। फूल थे, लेकिन हम फूलों की भाषा नहीं समझ सकते थे। हमारे लिए वे प्रतीक अर्थहीन थे।
ओशो 
तंत्र -सूत्र, भाग -1, प्रवचन -6

Rajesh Saini

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सोमवार, 29 मार्च 2021

तन्त्र शक्ति युद्ध

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एक समय पर तन्त्र का बहुत सम्मान होता था, तन्त्र द्वारा असम्भव कार्य को भी सम्भव कर लिया जाता था। उस समय पर जो युद्ध होते थे वो तन्त्र द्वारा लड़े जाते थे। जो श्री राम रावण का युद्ध हुआ, महाभारत युद्ध हुआ ये सब तन्त्र शक्ति द्वारा ही लड़े गए थे। जो अस्त्र शस्त्र थे वो तन्त्र शक्ति से चलते थे, रावण का वाहन तन्त्र शक्ति द्वारा ही उड़ता था, मारीच तन्त्र शक्ति द्वारा ही कोई भी रूप धारण कर सकता था, नल नील ने जल को बांधकर पुल बना दिया था, कितने ही दानव थे जो तन्त्र शक्तियो में पारंगत थे। अगर हम कहे कि रावण, श्रीराम जी आदि उच्च कोटि के साधक थे तो लोगो को अच्छा नही लगेगा क्योकि तन्त्र को हीन दृष्टि से देखते है। तन्त्र साधनाओ द्वारा सबने अलग अलग प्रकार की दिव्य शक्तिया प्राप्त की हुई थी। 

ऐसे ही महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, यदि सभी चीजो को ध्यान से देखो तो ये सब समझ आएगा लेकिन हम सिर्फ सोचते है कि वो बस शक्तिशाली था लेकिन कभी ये नही सोचते कि इतना शक्तिशाली बना कैसे, ये एक साधना होती है कि किसी का श्राप फलित हो जाये। लेकिन जब बाहरी लोग आए तो यहा की शिक्षा पद्ति को देखा तो घबरा गए कि इनसे जीतना सम्भव नही है। इनको जीतने के लिए इनकी शिक्षा प्रणाली को समाप्त करना होगा। और यही हुआ भी धीरे धीरे बाहरी शिक्षा को स्थापित कर दिया गया।

आप कहेंगे कि ये तो पुरानी बातें है सत्य में क्या हुआ था ये कोई नही जानता तो हम बता दे 1962 और 1971 में चीन के साथ युद्ध हुआ था इस युद्ध मे तंत्र शक्ति का प्रयोग हुआ था। जब भारत अपनी हार की तरफ बढ़ रहा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने मध्यप्रदेश के दतिया में स्थापित माँ बगलामुखी की तन्त्र विद्या का प्रयोग करवाया था। इसमें 51 हवन कुंडों द्वारा कार्य हुआ था और 11वे दिन की अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेना पीछे हटा ली थी। ये हवन कुंड आज भी आपको दतिया में देखने को मिल जाएंगे।

 ये है तंत्र की शक्ति लेकिन ये विद्याएं बहुत खतरनाक थी इसलिए बाहरी लोगों ने इसको समाप्त करने के लिए बहुत प्रयास किये, इनको अंधविस्वास बता दिया गया। यदि सत्य में अंधविस्वास होता तो हमारे देश के तन्त्र द्वारा चैतन्य मंदिरों को तोड़ा नही जाता, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, तन्त्र स्थानों को नष्ट नही किया जाता।

शिव अघोरनाथ
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ऊर्जाओं का रहस्य

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इस सृष्टि के संचालन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनो ऊर्जाओं का सहयोग है। सभी जीवो में दोनो प्रकार की ऊर्जा होती है। जब मनुष्य क्रोध करता है तो उसमे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है इसी कारण सही गलत देख नही पाता और जो मनुष्य शुद्ध विचार और क्रोध ना करने वाला होगा उसमे सकारात्मक ऊर्जा की अधिकता होगी उसके पास जाने से ही शांति का अनुभव होगा जैसे हमारे साधु संत होते है। 

आप एक संत से कहो कि किसी की हत्या करदे तो वो नही करेगा चाहे आप उसे कुछ भी दे दे, लेकिन वही एक क्रोधित व्यक्ति को उनकी पसंद की वस्तु दे दो वो आपका कार्य तुरंत कर देगा। जब सृष्टि में अधर्म ( नकारात्मकता) बढ़ता है तो उसे संतुलन में लाने के लिए सकारात्मक शक्ति को नकारात्मक स्वरूप धारण करना पड़ता है। क्योकि नकारात्मक ऊर्जा की प्रवर्ति संहारक,हिंसात्मक होती है। 

जब प्रभु को ऐसे स्वरूप धारण करने पड़ते है तो  सकारात्मकता को भी उसे नियंत्रित करना पड़ता है। जैसे महाकाली ने दानवों के बाद देवो को मारना आरम्भ कर दिया था तब महादेव के सकारात्मक शिव स्वरूप महाकाली के चरणों मे आकर नकारात्मक ऊर्जा को  नियंत्रित किया था। 

नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध करके पृथ्वी को नष्ट करने लग गए थे तब भगवान शिव ने शरभ अवतार लेकर नरसिंह भगवान की नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित किया था। 

जो अवतार क्रोध स्वरूप में है उनकी पूजन साधना में गलती होती है तो तुरंत दण्ड मिलता है चाहे आप उनके भक्त ही क्यो ना हो लेकिन सकारात्मक ऊर्जा के  स्वरूप में गलती होने पर क्षमादान मिल जाता है।

किसी ने महाकाली का प्रयोग कर दिया मारण के लिए तो महाकाली मारण कर देंगी चाहे सामने उसका भक्त ही क्यो न हो क्योकि उस क्रोध अवस्था मे महाकाली को  देव और दानव में भी भेद भूल गयी थी और सभी का संहार करने लगी थी।

यदि सामान्य मनुष्य की बात करे तो जब क्रोध करते है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है तब सही गलत का बोध नही होता लेकिन जैसे ही क्रोध शांत होता है तो अपनी गलती का अहसास होता है। 

मनुष्य ने धारणा बना ली है कि नकारात्मक ऊर्जा सदैव अहित करती है लेकिन ऐसा नही है नकारात्मक ऊर्जा सृष्टि के लिए कल्याणकारी है। महाकाल, महाकाली, काल भैरव आदि सभी नकारात्मक ऊर्जा के स्वरूप है और सृष्टि का कल्याण करते है। 

शिव अघोरनाथ 

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रविवार, 28 मार्च 2021

क्रोध की उर्जा का रूपांतरण

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जब कभी तुम्हें यह पता चले कि तुम्हें क्रोध आ रहा है तो इसे सतत अभ्यास बना लो कि क्रोध में प्रवेश करने के पहले तुम पांच गहरी सांसें लो। यह एक सीधा—सरल अभ्यास है। स्‍पष्टतया क्रोध से बिलकुल संबंधित नहीं है और कोई इस पर हंस भी सकता है कि इससे मदद कैसे मिलने वाली है? लेकिन इससे मदद मिलने वाली है। इसलिए जब कभी तुम्हें अनुभव हो कि क्रोध आ रहा है तो इसे व्यक्त करने के पहले पांच गहरी सांस अंदर खींचो और बाहर छोड़ो।

क्या होगा इससे? इससे बहुत सारी चीजें हो पायेंगी। क्रोध केवल तभी हो सकता है अगर तुम होश नहीं रखते। और यह श्वसन एक सचेत प्रयास है। बस, क्रोध व्यक्त करने से पहले जरा होशपूर्ण ढंग से पांच बार अंदर—बाहर सांस लेना। यह तुम्हारे मन को जागरूक बना देगा। और जागरूकता के साथ क्रोध प्रवेश नहीं कर सकता। और यह केवल तुम्हारे मन को ही जागरूक नहीं बनायेगा, यह तुम्हारे शरीर को भी जागरूक बना देगा, क्योंकि शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन हो तो शरीर ज्यादा जागरूक होता है। जागरूकता की इस घड़ी में,अचानक तुम पाओगे कि क्रोध विलीन हो गया है।

दूसरी बात, तुम्हारा मन केवल एक—विषयी हो सकता है। मन दो बातें साथ—साथ नहीं सोच सकता; यह मन के लिए असंभव है। यह एक से दूसरी चीज में बहुत तेजी से परिवर्तित हो सकता है। दो विषय एक साथ एक ही समय मन में नहीं हो सकते। एक चीज होती है, एक वक्त में। मन का गलियारा बहुत संकरा होता है। एक वक्त में केवल एक चीज वहां हो सकती है। इसलिए यदि क्रोध वहां होता, तो क्रोध वहां होता है, लेकिन यदि तुम पांच बार सांस अंदर—बाहर लो, तो अचानक मन सांस लेने के साथ संबंधित हो जाता है। वह दूसरी दशा में मोड़ दिया गया है। अब वह अलग दिशा में बढ़ रहा होता है। और यदि तुम फिर क्रोध की ओर सरकते भी हो,तो तुम फिर से वही नहीं हो सकते क्योंकि वह घड़ी जा चुकी है।

गुरजिएफ ने कहा था, जब मेरे पिता मर रहे थे,उन्होंने मुझसे केवल एक बात याद रखने को कहा, 'जब कभी तुम्हें क्रोध आये तो चौबीस घंटे प्रतीक्षा करो, और फिर वह करो जो कुछ भी तुम चाहते हो। अगर तुम जाकर कत्‍ल भी करना चाहते हो, जाओ और कर दो कत्‍ल, लेकिन चौबीस घंटे प्रतीक्षा करना।’

चौबीस घंटे तो बहुत ज्यादा है; चौबीस सेकंड चल जायेंगे। प्रतीक्षा करना मात्र तुम्हें बदल देता है। वह ऊर्जा जो क्रोध की ओर बह रही है, नया रास्ता अपना लेती है। यह वही ऊर्जा है। यह क्रोध बन सकती है, यह करुणा बन सकती है। इसे जरा मौका दे दो।

तो पुराने शास्त्र कहते है, 'यदि कोई अच्छा विचार तुम्हारे मन में आता है, तो उसे स्थगित मत करो; उस काम को तुरंत करो। और यदि कोई बुरा विचार मन में आता है, तो उसे स्थगित कर दो; उसे तत्काल कभी मत करो।’ लेकिन हम बहुत चालाक हैं, बहुत होशियार। हम सोचते हैं, और जब भी कोई अच्छा विचार आता है, हम उसे स्थगित कर देते है।

मार्क ट्वेन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि वह दस मिनट तक एक पादरी को सुन रहा था, किसी चर्च में। व्याख्यान तो असाधारण था और उसने अपने मन में सोचा,आज मुझे दस डॉलर दान करने ही हैं। यह पादरी अद्भुत है। इस चर्च की मदद की ही जानी चाहिए! उसने निर्णय ले लिया कि व्याख्यान के बाद उसे दस डॉलर दान करने ही हैं। दस मिनट और हुए और वह सोचने लगा कि दस डालर तो बहुत ज्यादा होंगे। पांच से काम चलेगा। दस मिनट और हुए और उसने सोचा, 'यह आदमी तो पांच के लायक भी नहीं है।’

अब वह कुछ सुन भी नहीं रहा था। अब वह उन दस डॉलर के लिए चिंतित था। उसने इस विषय में किसी से कुछ नहीं कहा था, लेकिन अब वह अपने को यकीन दिला रहा था कि यह तो बहुत ज्यादा था। जिस समय तक व्याख्यान समाप्त हुआ, उसने कहा, 'मैने कुछ न देने का फैसला किया। और जब वह आदमी मेरे सामने चंदा लेने आया, वह आदमी जो इधर से उधर जा रहा था चंदा इकट्ठा करने के लिए, मैंने कुछ डॉलर उठा लेने और चर्च से भागने तक की बात सोच ली।’

मन निरंतर परिवर्तित हो रहा है। यह गतिहीन कभी नहीं है; यह एक प्रवाह है। तो अगर कुछ बुरा वहां है, तो थोड़ी प्रतीक्षा करना। तुम मन को स्थिर नहीं कर सकते। मन एक प्रवाह है। बस, थोड़ी प्रतीक्षा करना और तुम बुरा नहीं कर पाओगे। लेकिन अगर कुछ अच्छा होता है और तुम उसे करना चाहते हो, तो फौरन उसे कर डालो क्योंकि मन परिवर्तित हो रहा है। कुछ मिनटों के बाद तुम उसे कर न पाओगे। तो अगर वह प्रेमपूर्ण और भला कार्य है, तो उसे स्थगित मत करो। और अगर यह कुछ हिंसात्मक या विध्वंसक है, तो उसे थोड़ा—सा स्थगित कर दो।

यदि क्रोध आये, तो उसे पांच सांसों तक स्थगित करना, और तुम क्रोध कर न पाओगे। यह एक अभ्यास बन जायेगा। हर बार जब क्रोध आये, पहले अंदर सांस लो और बाहर निकालो पांच बार। फिर तुम मुक्त हो वह करने के लिए,जो तुम करना चाहते हो। निरंतर इसे किये जाओ। यह आदत बन जाती है, तुम्हें इसके बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं। जिस क्षण क्रोध प्रवेश करता है, तुम्हारे अंदर का रचनातंत्र तेज, गहरी सांस लेने लगता है। तुम सांस शांत और शिथिल लेने लगो, तो कुछ वर्षों के भीतर तुम्हारे लिए नितांत असंभव हो जायेगा क्रोध करना। तुम क्रोधित हो नहीं पाओगे।

कोई अभ्यास, कोई सचेतन प्रयास तुम्हारे पुराने ढांचे को बदल सकता है। लेकिन यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो तुरंत किया जा सकता हो। इसमें समय लगेगा क्योंकि तुमने अपनी आदतो का ढांचा बहुत से जन्मों से बनाया है। यदि तुम एक जीवन में भी इसे बदल सको, तो यह बहुत जल्दी है।
ओशो 
पतंजलि योग सूत्र, भाग 1, प्रवचन- 7

Rajesh Saini

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अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ! “वो कहेगा जो हुक्म मेरे आका” !

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हम अपनी हर समस्या का समाधान औरों में ही क्यों ढूंढते हैं ?
हम क्यों ये चाहते हैं कि मेरी समस्या का हल कोई दूसरा बता दे ? या हम किसी ऐसे महापुरुष की खोज में ही रहते हैं जो हमें हमारी जिंदगी का सही किनारा दिखा दे। खैर, अगर दूसरों से बात करने पर आपको अपनी समस्या का समाधान मिल जाता है तो अच्छा है लेकिन यहां ज़रा सोचने वाली बात ये है कि औरों से बात करने से पहले क्या आपने अपने भीतर उपस्थित अपने अवचेतन मन से बात करने की कोशिश की ? जी हां जिस महापुरुष की खोज में हम बाहरी दुनियां में भटक रहे हैं असल में एक ऐसी महाशक्ति हमारे भीतर ही स्थित है जो सर्वशक्तिमान है, और एक निश्चित समय पर वो जागृत होती है। हमारा मन दो प्रकार का होता है। पहला चेतन व दूसरा अवचेतन। चेतन मन के द्वारा हम जाग्रत अवस्था में सोचते हैं और बाहरी दुनिया का अनुभव प्राप्त करते हैं। अवचेतन मन इन्हीं सब बातों को ग्रहण कर सुरक्षित रख लेता है और उसे पूरा करने में जुट जाता है।

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डॉ जोसेफ मर्फी की रिसर्च क्या कहती है ?
मनोवैज्ञानिक डॉ. जोसेफ मर्फी ने एक शोध से पता लगाया था कि चेतन मन जिस भी बात को स्वीकार करता है और उसके सही और सच होने पर भरोसा करता है हमारा अवचेतन मन उसे स्वीकार कर हकीकत में बदल देता है। अवचेतन मन के आदेश पर मस्तिक उसी प्रकार के हार्मोन पैदा करके उस कार्य को पूरा करता है। डॉ. मर्फी के अनुसार हम जो कुछ भी हासिल करते हैं या नहीं करते वह हमारे विचारों के परिणाम होते हैं”। अवचेतन मन केवल वर्तमान जीवन को ही नहीं प्रभावित करता, बल्कि आत्मा के साथ दूसरा शरीर धारण करते समय भी साथ रहता है। दूसरे जन्म में इसी अवचेतन मन के कारण व्यक्तित्व निर्माण व संस्कार प्राप्त होते हैं। इसीलिए यदि मनुष्य वर्तमान जीवन और अगले जीवन में आनंद चाहता है, तो उसे अपने चेतन मन व अवचेतन मन को सकारात्मक सोच व विचारों से परिपूर्ण करना होगा।

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डॉ. मर्फ़ी ने आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक शोध के साथ स्पष्ट किया ।
अवचेतन मन आपके हर काम को प्रभावित करता है। अवचेतन मन की शक्ति से हम क्या हासिल कर सकते हैं? वो इस प्रकार है। 1. सेहत सुधार सकते हैं और शारीरिक रोग ठीक कर सकते हैं। 2. प्रमोशन पा सकते हैं, तनख़्वाह बढ़वा सकते हैं, लोकप्रियता पा सकते हैं। 3. मनचाही दौलत पा सकते हैं। 4. अपने दोस्तों का दायरा बढ़ा सकते हैं और अपने परिवार, सहकर्मियों तथा मित्रों से बेहतर संबंध बना सकते हैं। 5. अपने वैवाहिक जीवन या प्रेम संबंध को सशक्त बना सकते हैं। 6. डरों और बुरी आदतों से छुटकारा पा सकते हैं। 7. ‘‘चिर युवा’’ रहने का रहस्य सीख सकते हैं।

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मनुष्य अगर विश्वास करे, तो उसके लिए हर चीज संभव है।
क्योंकि हमें खुद ही नहीं पता कि हमारे अंदर क्या-क्या समाया हुआ है। दूसरों से हम अपनी परेशानियों के बारे में बात करके हसीं या मज़ाक का पात्र ही बनते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो आपके दुख में आपका सहारा बनें और आपको सही मार्गदर्शन दें। जबकि प्रतियोगिता के इस दौर में अगर आप किसी से सहारे की कामना करते हैं या अपना दुख बांटने की कोशिश करते हैं तो वो आपके सामने तो दुखी होने का नाटक करेंगे लेकिन आपकी पीठ पीछे कितने ही लोगों के बीच आपका मज़ाक उड़ाएंगे। इसलिए ऐसे लोगों के वर्ग में न शामिल हों जो आपमे नैगेटिव उर्जा भरें। बस आप अपने अंदर इस तरह के नैगेटिव प्रश्नों को दोहराना बंद करें जैसे “अगर मैं ये काम नहीं कर पाया तो? अगर मैं पास नहीं हुआ तो? अगर मुझे नौकरी नहीं मिली तो? डर व शंकाओं को दूर कीजिए क्योंकि ऐसा डर ही हमें आगे नहीं बढ़ने देता। हम वहीं के वहीं रह जाते हैं कुएं के मेंडक की तरह एक स्थान से बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं करते।

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अगर हम चाहें तो हम जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं।
आपकी सभी इच्छाएं साकार हो सकती हैं यदि हम अपने अवचेतन मन में छिपी हुई शक्ति का प्रयोग कर लें जिससे हम अपने जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं। अवचेतन मन में समाहित शक्तिया प्रकट करने के लिए निम्नलिखित विचार स्मरण रखने योग्य है- 1- हमारा अवचेतन मन हमारी हर बात मानता है। रात को सोनें से पहले अपने अवचेतन मन से कहे,” मै सुबह पांच बजे उठना चाहता हूँ” तो यह आपको ठीक आपके कहे समयानुसार जगा देगा। 2- हमारा अवचेतन मन हमारा उपचार भी कर सकता है। यदि हम रोज़ सोने से पहले अपनी सेहत के बारे में अच्छा कहकर सोएंगे और अपने मन से कहेंगे मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा है और मैं ठीक हो रहा हूं। हमारा अवचेतन मन हमारे आदेशानुसार पालन करेगा। 3- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी।

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अपने अवचेतन मन को अपने अनुसार ढालने की कौशिश करें।
4- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी। 5- वास्तव में हमारा अवचेतन मन गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे हम जैसा ढालनें की कोशिश करेंगे वो वैसे ही ढल जाएगा। इसी तरह से हमे अपने अवचेतन मन को सही आदेश (विचार और तस्वीरें) देने होगें, जो हमारे सभी अनुभवो को नियंत्रित करता है।

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रोज़ाना नेगेटिव वाक्यों को न दोहराएं ।
इस तरह का वाक्यों का प्रयोग कभी नही करना चाहिए,”मेरे पास इसके लिए पैसे नही है”, “मै ये काम नही कर सकता”, “मेरी तो किस्मत ही खराब है”, मेरे तो कर्म ही फूटे थे”, मेरी किस्मत में कुछ अच्छा होना लिखा ही नहीं है”, मैं कोई भी काम करुं, मेरा काम पूरा होता ही नहीं है”, इससे अच्छा तो मैं मर ही जाऊं” आदि। हम जो सोचते हैं हमारा अवचेतन मन उसी बात को सच मान लेता है इसलिए वह यह सुनिश्चित कर लेता है कि हमारे पास कभी पैसे न रहें या वह काम करने की क्षमता न रहे, जो हम करना चाहते हैं। इसके बजाय दृढ़ता से कहें, ”मैं अपने अवचेतन मन की शक्ति से सारे काम कर सकता हूं।”

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आपका अवचेतन मन आपके आदेश का इंतज़ार कर रहा है ।
7- विश्वास ही जावन का नियम है। विश्वास हमारे मस्तिष्क का एक विचार है। उन चीजो में विश्वास न करें, जो हमे नुकसान या चोट पहुचायें। अपने अवचेतन मन की शक्तियों में विश्वास करें। यह विश्वास रखें कि वे हमारा उपचार करेगीं, प्रेरित करेगी, हमें शक्तिशाली और समृद्ध बनाएंगी। असल में हमें दृढ होने की ज़रूरत है, जरूरत है हमें आत्म-ज्ञानी और आत्मविश्वासी होने की। ज़रूरत है हमें अपने अवचेतन मन से बात करने की और उसे आदेश देने की। देखना आपके काम बनने शुरु हो जाएंगे बस अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ऐसा लगेगा मानों भीतर से आवाज़ आयी हो “जो हुक्म मेरे आका”

Rajesh Saini

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तत्त्वासार

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{{{ॐ}}}

                                                            # 

वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
             यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता है। 
 

अशोक वशिष्ठ जी

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