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रविवार, 8 अगस्त 2021

भगवान् क्या है

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                      भाग --02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन 

-----:भगवान् का विचार क्यों ?::-----
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        यदि भगवान् पर विचार करना है तो हमें सभी पूर्व मतों से दूरी बनानी पड़ेगी। तटस्थ रहना होगा। तटस्थ ठीक उसी तरह जैसे नदी के किनारे खड़ा वृक्ष बहती हुई धारा के प्रति तटस्थ रहता है। हमें भी उसी तरह से उनके प्रति निरपेक्ष रहना है, तभी ईमानदारी से इस बिंदु पर विचार हो सकता है। हम किसी मत पर न तो आस्था रखें और न अनास्था। तभी हम भगवान् के सही स्वरूप को जान-समझ सकते हैं। 

      भगवान् के बारे में हम क्यों विचार करें ?

      यह भी एक उचित तर्क है। अगर हम अपने अस्तित्व, मति, गति को आकस्मिक मान लें तो फिर भगवान् पर विचार करना आवश्यक नहीं। लेकिन अध्यात्म और विज्ञान--दोनों का कहना है कि कोई भी कार्य बिना कारण के संभव नहीं है । फिर हमारे अस्तित्व का क्या कारण है ?
      हर वस्तु का एक कारण होता है और उन सभी कारणों का भी एक कारण होता है। हर वस्तु या हर स्थित के पीछे 'क्यों' लगा हुआ है।
इस 'क्यों' का एक लंबा सिलसिला चलता है। आखीर कहाँ है ? आखिरी 'क्यों' का उत्तर है--भगवान्।
       यदि हम अपने को जड़ पदार्थों की ही उत्पत्ति मान लें, तो प्रश्न उठता है कि जड़ पदार्थों की उत्पत्ति कहाँ से हुई ? यह पृथ्वी, यह सृष्टि, ब्रह्माण्ड के अनेक सौर मंडलों का प्रादुर्भाव कहाँ से हुआ ? विज्ञान ने इस सम्बन्ध में जो तर्क दिए हैं, उनमें उसका उत्तर नहीं है। इसी प्रकार का एक तर्क है कि सबसे पहले गैसीय धूल के कण थे जिनसे बाद में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। यदि इस बात को सही मान लिया जाय तो यह मानना पड़ेगा कि 'आदितत्व' गैसीय कण ही थे। लेकिन जब हम किसी पदार्थ का विच्छेदन करते हैं तो उसमें से उस 'आदितत्व' की उत्पत्ति नहीं होती। परमाणु के कण--प्रोटोन, इलेक्ट्रान और न्यूट्रॉन भी आदि तत्व नहीं हैं क्योंकि इन्हें तोड़ कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है ,ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।
      इसी प्रकार का एक दूसरा मत यह है कि समस्त सृष्टि अरबों वर्ष पहले पिण्ड के रूप में थी। किसी कारणवश उसमें विस्फोट हो गया जिस कारण यह सृष्टि हो गयी। इस मत पर विचार करें तो अजीब-अजीब भ्रांतियां पैदा होती हैं ,साथ ही अनेकानेक प्रश्न पैदा होते हैं--क्या वह 'पिण्ड' सनातन था ? उसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ? यदि वह सनातन था तो आगे भी सनातन क्यों नहीं रहा ? फिर वह पिण्ड आखिर था क्या ? क्या वह समान गुणों वाला पदार्थ था ? यदि हाँ तो फिर सृष्टि में आज यह विषमता, यह विभिन्नता क्यों है ? और अगर यह पिण्ड ही रूप बदल रहा है या उस समय बदल रहा था जिस समय विस्फोट हुआ तो उसका आदिस्वरूप क्या था ? हर वस्तु का कारण कहीं-न-कहीं अवश्य होता है--सिवाय किसी शाश्वत वस्तु के। 
      अगर यह मान भी लिया जाय कि पिण्ड ही टूट कर बदल गया है तो फिर समान आकार और गुणों  की रचनाएँ भी क्या आकस्मिक विस्फोट का कारण हैं ? यहाँ यह विचारणीय है कि परमाणु की संरचना और ब्रह्माण्ड की संरचना एक ही है। जिस  प्रकार विभिन्न प्रकार के परमाणुओं की अनेक संख्याओं से पदार्थ की रचना होती है, उसी प्रकार पदार्थों के समूह से ग्रह-नक्षत्र पिंडों का निर्माण होता है। सौरमंडलों, ग्रह-नक्षत्र-मंडलों, आकाश-गंगाओं का भी निर्माण इसी प्रकार हुआ है। सभी छोटे कण क्रमानुसार बड़े कणों की परिक्रमा करते हैं। क्या यह सब आकस्मिक विस्फोट का परिणाम है ? आकस्मिक विस्फोट से नियमबद्ध रचनाओं की कल्पना करना किस स्तर की अज्ञानता है-- इस पर हम-आप स्वयं विचार कर सकते हैं।

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अभौतिक सत्ता में परमात्मा की प्रेरणा से विद्यमान अनेक अदृश्य मंडलियां

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      इस भौतिक जगत से जुड़े हुए अभौतिक जगत में परमात्मा की प्रेरणा से अनेक ऐसी मंडलियां हैं जो हमारे भौतिक जगत का न केवल सञ्चालन करती हैं वल्कि उस पर पूर्ण नियंत्रण भी रखती हैं। यह भौतिक जगत अभौतिक जगत से ऐसे जुड़ा हुआ है, ऐसे घुला-मिला है जैसे दूध और पानी घुला-मिला रहता है। उस अभौतिक सत्ता को साधारण लोग न तो देख पाते हैं और न जान-समझ पाते हैं। उस अभौतिक जगत की दिव्य मंडलियों के कई प्रयोजन होते हैं। इस भौतिक जगत में जो योग्य संस्कार-संपन्न व्यक्ति हैं, उनकी खोज करना और अभौतिक सता के ज्ञान-विज्ञान व गूढ़ तथा गोपनीय विषयों का उनके माध्यम से इस भौतिक जगत में प्रकट करना उन दिव्य मंडलियों का मुख्य प्रयोजन होता है।
       प्रत्येक मनुष्य के भीतर किसी-न-किसी रूप में , किसी-न-किसी मात्रा में आध्यात्मिक शक्ति विद्यमान है। कोई नीचे के सोपान पर है और कोई है ऊपर के सोपान पर। कोई उससे भी ऊपर है। जो सोपान पर चढ़ कर ऊपर पहुँच गए हैं उन्हीं को 'महात्मा' या 'सिद्ध पुरुष' कहा जाता है।( आम तौर पर साधारण बोलचाल की भाषा में हम किसी को भी महात्मा कह देते हैं, सिद्ध पुरुष बोल देते है और महापुरुष की संज्ञा दे देते हैं। लेकिन वास्तविकता कुछ दूसरी ही है। महात्मा, सिद्ध पुरुष या महापुरुष की उपाधि उन दिव्य मंडलियों के अधिकारी लोगों के द्वारा प्रदान की जाती है।) महात्मा या सिद्ध पुरुष लोगों का अभाव इस संसार में नहीं है। अभाव है तो उन्हें जानने-समझने और पहचानने का। ऐसे महात्मा और सिद्ध पुरुष सूक्ष्म अस्तित्व में निवास करते हैं या संचरण-विचरण करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभी अदृश्य से दृश्य भी हो जाते हैं अपनी योग-शक्ति द्वारा। जिनके पास दिव्य दृष्टि है, वे ऐसे लोगों को आसानी से देख लेते हैं, पहचान लेते हैं।
      मनुष्य प्रतिदिन रात को जब सोता है और नींद में स्वप्न देखता है। उस समय उसका वासना शरीर वासना लोक में विचरण करता है। विचरण की उस अवस्था में प्रायः उसका साक्षात्कार सूक्ष्म शरीर धारी महात्माओं और सिद्ध पुरुषों से भी हो जाया करता है इसमें संदेह नहीं। 
       ये महात्मा और सिद्धगण भी किसी समय उसी स्थान पर मौजूद थे जिस स्थान पर हम सब लोग आज मौजूद हैं। निस्संदेह एक-न- एक दिन हम सब भी उन्नति करते हुए उनके स्थान पर पहुँच जायेंगे--यह निश्चित है। यही विकासवाद का सिद्धांत है। यह जान लेना आवश्यक है कि एक बार जीवात्मा मनुष्य शरीर को स्वीकार कर लेती है, वह पशु- पक्षी या वृक्ष-वनस्पति आदि की योनियों को ग्रहण नहीं कर सकती। sabhar shiv ram Tiwari Facebook wall
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शनिवार, 7 अगस्त 2021

सामान्य आबादी में निम्न रक्त विटामिन डी का स्तर

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 सामान्य आबादी में, निम्न रक्त विटामिन डी का स्तर विभिन्न बीमारियों के उच्च जोखिम से जुड़ा हुआ है, जिसमें टाइप 2 मधुमेह और गुर्दे की बीमारी शामिल है। सन एच. किम, एमडी, एमएस (स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन) और उनके सहयोगियों ने विटामिन डी और टाइप 2 मधुमेह (डी2डी) अध्ययन का एक माध्यमिक विश्लेषण किया, जो पूर्व-पूर्व वाले व्यक्तियों में गुर्दे के स्वास्थ्य पर विटामिन डी पूरकता के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए किया गया था। मधुमेह, एक ऐसी स्थिति जो टाइप 2 मधुमेह के जोखिम को बढ़ाती है, जो बदले में गुर्दे की बीमारी का प्रमुख कारण है।


अध्ययन ने 2.9 साल की औसत उपचार अवधि के लिए 2,423 वयस्कों को अधिक वजन / मोटापे और पूर्व-मधुमेह के साथ विटामिन डी 3 4000 आईयू प्रति दिन या प्लेसबो के लिए यादृच्छिक बनाया। "D2d अध्ययन अद्वितीय है क्योंकि हमने उच्च-जोखिम वाले पूर्व-मधुमेह वाले व्यक्तियों की भर्ती की, जिनमें 2-आउट-ऑफ -3 असामान्य ग्लूकोज मान थे, और हमने 2,000 से अधिक प्रतिभागियों की भर्ती की, जो अब तक के सबसे बड़े विटामिन डी मधुमेह रोकथाम परीक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं," डॉ किम ने कहा।


परीक्षण के दौरान, विटामिन डी समूह में गुर्दे की कार्यक्षमता बिगड़ने के 28 मामले और प्लेसीबो समूह में 30 मामले थे, और अनुवर्ती कार्रवाई के दौरान गुर्दा समारोह में औसत परिवर्तन दोनों समूहों में समान था। "हमारे परिणामों ने गुर्दा समारोह पर विटामिन डी की खुराक का लाभ नहीं दिखाया। अध्ययन की लगभग 43% आबादी अध्ययन के बाहर विटामिन डी ले रही थी, हालांकि, अध्ययन प्रविष्टि में प्रतिदिन 1000 आईयू तक। उन लोगों में से जो नहीं थे किसी भी विटामिन डी को स्वयं लेने पर, विटामिन डी के लिए समय के साथ मूत्र प्रोटीन की मात्रा को कम करने का सुझाव था, जिसका अर्थ है कि यह गुर्दे के स्वास्थ्य पर लाभकारी प्रभाव डाल सकता है। इसे और अधिक देखने के लिए अतिरिक्त अध्ययन की आवश्यकता है। "


डॉ. किम ने कहा कि विटामिन डी पूरकता लोकप्रिय है, और यदि अध्ययन की गई जनसंख्या विटामिन डी की कमी नहीं है, तो विटामिन डी पूरकता के नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए लाभ दिखाना मुश्किल है। "अधिकांश अध्ययन आबादी में पर्याप्त रक्त विटामिन डी स्तर और सामान्य गुर्दा समारोह था," उसने कहा। "विटामिन डी के लाभ निम्न रक्त विटामिन डी के स्तर और / या कम गुर्दा समारोह वाले लोगों में अधिक हो सकते हैं।"

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Kriya Yoga Master, Paramahamsa Hariharananda

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Kriya Yoga Master, Paramahamsa Hariharananda once said:                                               “In the New Testament we can read about Peter, who was a fisherman. He cast his net into the water to catch fish, but if the fish were intelligent they would escape. The whole world is a net in which you have been caught. Consequently, you are in bondage- the bondage of money, and material possessions, the bondage of physical pleasures, the bondage of strong likes and dislikes as well as the bondage of anger, pride, cruelty and other negative emotions. You are not free. Yet all delusions, illusions and errors come from within. By practicing Kriya Yoga, you can escape from the net and stay close to the fisherman’s feet. Only then you will remain free. If you think that you are intelligent or have a lot of pride and anger, offer them up to God. Only if you remain focused on the fontanel will you discover your real talent, along with wisdom and intelligence. You have to go beyond mind, thought, intellect and worldly awareness. 

When practicing kriya from each centre (chakra), think that you are one of the gurus. When you do this, automatically you will hear the divine sound and your thoughts will disappear. You will feel the quality of the guru. Your disturbances will be transformed into knowledge, consciousness, superconsciousness, cosmic consciousness and wisdom. This is called integral yoga. It is knowledge and it is your liberation. So always have faith. Know that God is with you. Be guided in everything by that power.                                                                                   It is unfailing............” sabhar Hugo rist Facebook wa

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आनन्दमय कोश शिव -शक्ति का संगम है

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क्या आनन्दमय कोश शिव -शक्ति का संगम है?क्या है आनन्दमय  की साधना विधि के चार चरण-PART-01
 क्या आनन्दमय कोश-शिव शक्ति का संगम है? -

09 FACTS;-

1-आत्मसत्ता का मूल स्वरूप सत्य, शिव, सुन्दर कहा गया है। परमात्मसत्ता की व्याख्या सत्-चित् आनन्द रूप में होती है। दोनों ही स्थितियाँ परम सुखद हैं, स्वभाविक है ।जीवन को सुखद, सन्तोषजनक और आनन्दमय होना चाहिए।प्रकृति कामधेनु है, उस से एक से एक अनुदान प्राप्त किये जा सकते हैं। परन्तु मकड़ी अपना जाला स्वयं बुनती और स्वेच्छा से उसमें निवास करती है। मनुष्य अपने लिए अपनी आस्थाओं के सहारे अपनी एक नई दुनियाँ बनाता है और उसमें स्वतन्त्रता-पूर्वक निवास करता है। अपनी दुनियाँ भली बनाये या बुरी, स्वर्ग रचे या नरक, यह उसकी इच्छा और क्रिया पर अवलम्बित है। दाता  ने तो कस्तूरी प्रचुर मात्रा में निकटतम स्थान नाभि में ही भर दी है। जिस क्षण चेतना का मिलन सहस्रार से होता है, अचानक तुम पार के जगत के लिए , सिद्धों के जगत के लिए उपलब्ध हो जाते हो।

2-योग में मूलाधार के प्रतीक के रूप में, काम केंद्र को चार पंखुड़ियों वाला लाल कमल माना जाता है। चार पंखुड़ियां चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। लाल रंग, ऊष्मा का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि वह सूर्य का केंद्र है। और सहस्रार सभी रंगों का प्रतिनिधित्व करता है , हजार पंखुड़ियों के कमल के रूप में क्योंकि सहस्रार में संपूर्ण अस्तित्व समाया हुआ है। सूर्य केंद्र केवल लाल होता है। सहस्रार इंद्रधनुषी होता है उसमें सभी रंग समाए होते हैं, उसमें समग्रता समाहित होती है।सामान्यत: सहस्रार, एक हजार पंखुड़ियो वाला कमल सिर में नीचे की ओर लटका हुआ होता है। लेकिन जब इससे ऊर्जा गतिमान होती है, तो ऊर्जा से यह ऊपर की ओर हो जाता है। पहले तो यह ऐसे ही है जैसे कोई कमल ऊर्जा रहित नीचे की ओर लटका हुआ हों उसका भार ही उसे नीचे की ओर लटका देता है  फिर जब वह ऊर्जा से भर जाता है, तो उसमें जीवन का संचार हो जाता है। वह ऊपर उठने लगता है, वह बियांड के, पार के, जगत के प्रति खुल जाता है।

3-जब कमल खिल जाता है, तो योगशास्त्र के अनुसार ‘तब वह दस लाख सूर्य और दस लाख चंद्र के रूप में देदीप्यमान हो उठता है।’ जब भीतर एक चंद्र और एक सूर्य परस्पर मिल जाते हैं, तो फिर वह बाहर के दस लाख सूर्य और दस लाख चंद्र के बराबर होते हैं। तब व्यक्ति उस परम आनंद की कुंजी को खोज लेता है, जहां दस लाख चंद्र.. दस लाख सूर्यों से मिलते हैं तो उस परम आनंद की तुम थोड़ी बहुत कल्पना कर सकते हो।शिव  देवी के साथ  उसी आनंद अवस्था में .. सहस्रार में प्रतिष्ठित रहते हैं ।उनका प्रेम  मूलाधार से नहीं हो सकता। वह उनके अस्तित्व के शिखर बिंदु से, ओमेगा पाइंट से आता है ।वे समय और स्थान के पार हैं। योग का, तंत्र का, सारे आध्यात्मिक प्रयासों का यही एकमात्र लक्ष्य है। शिव और शक्ति का परम मिलन, पुरुष और स्त्री ऊर्जा का मिलन,जीवन और मृत्यु के आत्यंतिक जोड़ की संभावना को निर्मित कर देता है।

4-शिवशंकर की आधी प्रतिमा पुरुष की है और आधी स्त्री की - अर्धनारीश्वर - यह अनूठी घटना है। लेकिन जो जीवन के परम रहस्य में जाना चाहते हैं , उन्हें शिव के इस रूप को समझना पड़ेगा। अर्धनारीश्वर का अर्थ यह हुआ कि आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा स्त्रैण और आधी पुरुष हो जाती है। और तब इन दोनों के बीच जो रस और लीनता पैदा होती है , उस शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता।

 परमात्मा ने मनुष्य को अपने इस सुरम्य उद्यान में दुः ख भोगने के लिए नहीं, आनन्द पाने और आनन्द बिखेरने के लिए भेजा है।  यहाँ सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है। इसी से जीवन को ‘आनन्दमय’ कहा गया है। यह कोश उसे असीम मात्रा में, सहज-सुखद रूप से उपलब्ध है।दुर्भाग्य लगभग वैसा ही है, जैसा कि कबीर की एक उलट वाँसी में व्यक्त किया गया है। वे कहते हैं- पानी बिच मीन पियासी। मोहि सुनि-सुनि आवे हाँसी ॥ कोई व्यक्ति अपने घर का ताला बन्द करके कहीं चला जाय। लौटने पर ताली गुम हो जाने से बाहर बैठा ठण्ड में सुकड़े और दुः ख भोगे। ठीक ऐसी ही स्थिति हमारी है। 

5- आनन्दमय कोश अपने भीतर भरा पड़ा है, किन्तु रहना पड़ रहा है निरानन्द स्थिति में ..कैसी विचित्र स्थिति ,कैसी विडम्बना है ? पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँच कर इसी ताली को ढूँढ़ना पड़ता है और ताले को खोलने की व्यवस्था बनानी पड़ती है।आनन्दमय कोश की साधना का स्वरूप ईश्वर और जीव की मिलन व्यवस्था है।इस समन्वय का कितना सुखद परिणाम हो सकता है, इसकी कभी कल्पना भी तो नहीं आती। श्रेष्ठ तत्वों का मिलन कितना सुखद होता है, इसकी जानकारी सभी को है। पृथ्वी को सन्तुलित सूर्य सम्पर्क मिला और यहाँ जीवन की उत्पत्ति हुई। जिन ग्रह- पिण्डों को यह सुयोग नहीं मिला, वे निर्जीव- निस्तब्ध पड़े हैं। गंगा- यमुना के मिलन में संगम बना और तीर्थराज प्रयाग का महत्व बढ़ा। लौह- पारस के स्पर्श से सोना बनने वाली बात प्रख्यात है। दो गैसें मिलकर पानी बनाती हैं। जड़ और चेतन के मिलने से गतिशील शरीर बनते हैं। नर और नारी का मिलन एक नया- गृहस्थ बनाता है। ऋण और धन विद्युत के मिलन से शक्तिधारा प्रवाहित होती है।ब्रह्म और जीव का, आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना भाव- विभोर कर देने वाला, समर्थता और सम्पन्नता से भर देने वाला- आनन्द के समुद्र में डुबो देने वाला है। इसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता, यह तो विशुद्ध रूप से अनुभूति का विषय है। 

6- श्रद्धा और भक्ति का युग्म है। श्रद्धा कहते हैं, श्रेष्ठता के प्रति असीम निष्ठा एवं आस्था को अन्तःकरण की गहराई में स्थापित करना। भक्ति कहते हैं, प्रेम संवेदना को- आत्मीयता की अनुभूति को। ईश्वर की उपासना श्रद्धा और भक्ति के आधार पर ही सम्भव होती है। पूजा उपचार तो उन सम्वेदनाओं को उभारने वाले प्रयोग अभ्यास भर हैं। ईश्वर परायणता की परख, श्रद्धा और भक्ति की कसौटी पर ही होती है। ईश्वर व्यक्ति नहीं, शक्ति है। उसे मनुष्यों की तरह मनुहार, उपहार के सहारे प्रसन्न नहीं किये जा सकता । बिजली का समुचित लाभ उठाने के लिए उसके उपयोग की मर्यादाओं को अपनाना पड़ता है। उपासना का स्वरूप है, समन्वय। भक्ति का चरम लक्ष्य है, समन्वय- एकीकरण-समर्पण। द्वैत को मिटा कर अद्वैत की स्थापना। यह नाले का नदी में समर्पण हुआ। अपनी स्वतन्त्र इच्छा आकांक्षाऐं समाप्त करके ईश्वरीय अनुशासन को अपने ऊपर स्थापित कर लेना, समर्पण यही है। ईधन अपने को अग्नि में डालकर अग्निमय हो जाता है। पानी दूध में मिलकर एक रूप बन जाता है।इसी स्थिति को ब्रह्म- निर्वाह,ईश्वर- दर्शन या भगवत प्राप्ति कहा गया हैं। यही ब्रह्मविद्या की अद्वैत साधना है।  

7- प्रेम में आकर्षण है, चुम्बकत्व है। प्रेमी की समीपता सुहाती है, उसी के लिए अधीरता रहती है। ईश्वर भक्ति का, भवगत् प्रेम का स्वरूप यही है कि बीच की दूरी को समाप्त किया जाय। दोनों के बीच गहन समस्वरता दिखाई दे। इस स्थिति में या तो ईश्वर को जीव की इच्छानुसार काम करना पड़ेगा या जीव को ईश्वर का अनुसरण करने वाला बनना पड़ेगा। स्पष्ट है कि नदी नाले में नहीं मिल सकती, उसकी गहराई, चौड़ाई इतनी नहीं है, जिसमें नदी समा सके। नाले का ही नदी में मिलना सम्भव है। जीव का अनुसरण करने वाला ईश्वर नहीं हो सकता। यह भ्रान्ति छोड़ देनी चाहिए। भक्त को ही भगवान् का अनुसरण करने वाला होना चाहिए।  श्रद्धा और भक्ति का स्वरूप यही है। इसी आधार पर ईश्वर- प्राप्ति का आनन्द लिया जा सकता है। ईश्वर प्रेम सीमाबद्ध नहीं रह सकता। हिमालय के हृदय से निकली हुई गंगा, कहीं अवरुद्ध नहीं बैठी रहती, वरन् सूखे भू- खण्डों और प्यासे प्राणियों की प्यास बुझाती हुई अपनी क्षुद्रता को समुद्र की विशालता में समर्पित करती है। 

8- आनन्दमय कोश, श्रद्धा और भक्ति का उद्गम केन्द्र है। वहाँ ईश्वर मिलन की अनुभूति होती है। मूलाधार में अवस्थित जीव- चेतना कुण्डलिनी को सहस्रार स्थित ब्रह्म चेतना में मिलाया जाता है। शक्ति शिव से मिलती है। अग्नि कुण्ड में दग्ध हुई सती को फिर नये शरीर से शिव को वरण करने का अवसर मिलता है।  ईश्वर- मिलन का लक्ष्य पूरा करने के लिए पंचकोशी साधना में, कुण्डलिनी- जागरण की  व्यवस्था बनी है। भगवान का अवतार आनन्द और उल्लास के,- श्रद्धा और भक्ति के, कुण्डलिनी जागरण के रूप में अपने ही भीतर होता है। कुण्डलिनी जागरण को आनन्दमग कोश का शक्ति पक्ष कहा गया है। ईश्वर भाव- सम्वेदना भी है और समृद्धि सामर्थ्य का भण्डार भी। श्रद्धा और भक्ति के आधार पर की गई सोऽहम साधना, खेचरी मुद्रा जैसी उपासनाऐं भाव पक्ष को समुन्नत करती हैं। कुण्डलिनी- जागरण से शक्ति पक्ष उभरता है। उससे मानवी अस्तित्व में ईश्वरीय वर्चस्व की प्रचण्डता प्रकट होती है। आनन्दमय कोश की साधना में भक्ति और शक्ति दोनों का समन्वय है। 

9-आनन्दमय कोश के अनावरण में प्रेम और तन्मयता की वृद्धि करनी पड़ती है। एकाग्रता की साधना से बिखरी हुई शक्ति एकत्रित होती हैं और उसका चमत्कारी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार ‘प्रेम’ आत्मा की दिव्य अवभूति होने के कारण आनन्द की उत्पत्ति का अमोघ साधन सिद्ध होता है। जिस हृदय में प्रेम की धारा बहेगी वह अमृत के सरोवर में स्नान करने जैसा उल्लास हर घड़ी अनुभव करेगा। प्रेम जिससे होता है, वह जड़ पदार्थ भी आनन्दायक लगता है। जिस मनुष्य से प्रेम हो जाता है, वह अनुपयुक्त और गुणहीन होने पर भी प्राणप्रिय लगता है। ईश्वर की प्राप्ति का उपाय तो प्रेम ही है। भगवान भक्ति के वश में रहते हैं।प्रेम से अधिक प्रिय भगवान को और कुछ नहीं। हम प्रेमी बन कर ही भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। संसार में आनन्द का जीवन व्यतीत करने के लिए, सर्वत्र सुख-शान्ति का वातावरण बनाये रहने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य का अन्तःकरण प्रेम भावनाओं से भरा रहे। परमात्मा की प्रतिमूर्ति प्राणी मात्र को समझने की मान्यता यदि अपने भीतर जम जाये तो फिर किसी के साथ दुर्व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकेगा। अपनी ओर से सद्भावना रहेगी और उसकी प्रतिक्रिया भी प्रेमपूर्ण ही होगी। और फिर आनन्द का स्वर्गिक वातावरण ही चारों ओर बिखरा रहने लगेगा। 

आनन्दमय कोश-की साधना विधि  के चार चरण  ;-

07 FACTS;-

 1-साधना के प्रथम चरण में जप के साथ, प्रेम- भावना के साथ एकाग्रतापूर्वक  ईश्वर का ध्यान करने से साधक का चित्त स्थिर रहने लगता है, और साधना में आत्म-विभोर कर देने वाला रस मिलने लगता है। साधना के द्वितीय चरण में “सूर्य प्रकाश के मध्य में  ईश्वर के सुन्दर मुख मण्डल मात्र का ध्यान करना चाहिए और उनके दाहिने नेत्र की पुतली में जो काला बिन्दुहोता है, उस पर मन को एकाग्र करना चाहिए। यह तिल आरम्भ में काला ही दृष्टिगोचर होगा, पीछे वह श्वेत प्रकाश के रूप में बढ़ने और बिखरने लगेगा, ऐसा अनुभव होने लगेगा कि दाहिने नेत्र की पुतली में भरा हुआ प्रकाश सुविस्तृत होकर अपने चारों ओर ज्योतिर्मय   आभा उत्पन्न कर रहा है और उस प्रकाश से स्फुल्लिंग/Sparkling छिटक-छिटक पर अपने अन्तःकरण में प्रवेश कर रहे हैं।” जप के साथ इस प्रकार की भावनाऐं करते रहने से चित्त में निरन्तर उल्लास उमड़ता रहता है और साधना बहुत ही सरल बन जाती है। प्रथम और द्वितीय चरण की यह दोनों ही साधनाऐं अभ्यास में लाने योग्य हैं। 

 2-जिसने भी इन विधियों को अपनाते हुए ध्यान भावनाओं के साथ साधना की है, उसने बहुत कुछ पाया है, पर जिसने  केवल पूजाचिन्ह  की तरह माला ही फेरा हैं, उन्हें न तो मन की चञ्चलता से छुटकारा मिला है, न एकाग्रता ही प्राप्त हुई है और न वह रस ही अनुभव हुआ है, जो आनन्दमय कोश के विकास होने पर स्वयमेव उपलब्ध होने लगता है। इसलिए उपरोक्त दोनों ही ध्यानों का अभ्यास करना अनिवार्य है। तीसरे चरण में साधकों को अन्तःत्राटक द्वारा ज्योति पुंज का ध्यान करते हुए उसमें लय होने का अभ्यास करना चाहिए।इस साधना के लिए रात्रि का वह समय नियत कीजिए जब आपके घर में शान्ति रहती हो। एकान्त स्थान ही इसके लिए उपयुक्त है। घर छोटा हो और वैसी सुविधा न मिले तो बाहर में ऐसा स्थान तलाश किया जा सकता है। पालथी मारकर सीधे बैठिये। कमर झुकी न रहे। दोनों हाथ गोदी में रख लेने चाहिए। अपने शरीर से तीन फुट आगे,कोई  तीन फुट  ऊँची वस्तु रख लीजिए और उस पर घी का दीपक जलाकर रखिए। प्रयत्न करना चाहिए कि दीपक रखने की वस्तु काले रंग से रंगी हो, ताकि दृष्टि इधर-उधर न जावे और प्रकाश अधिक स्पष्ट दृष्टिगोचर हो। 

3-लगभग 10 सैकिण्ड खुली आँख से दीपक की लौ को देखिए और फिर बीस सैकिण्ड के लिए आँखें बन्द कर लीजिए। बन्द नेत्रों से उस दीपक के प्रकाश का ध्यान कीजिए। फिर नेत्र खोलिए दस सैकिण्ड लौ को फिर देखिए और नेत्र बन्द करके बीस सैकिण्ड फिर उस लौ का ध्यान कीजिए। इस प्रकार दीपक के माध्यम से प्रकाश का ध्यान करने का अभ्यास दों- दों तीन महीने में परिपक्व हो जाता है, फिर दीपक की जरूरत नहीं रहती। ध्यान पर बैठते ही प्रकाश की सामने उपस्थिति अनुभव होने लगती है। दस और बीस सैकिण्ड की बात दस- पाँच दिन घड़ी का सहारा लेने से अभ्यास में आ जाती है। फिर घड़ी की जरूरत नहीं रहती। अन्दाज से ही सब क्रम चलने लगता है। इसमें समय न्यूनाधिक हो जाय, तो भी कुछ हर्जा नहीं है। जब नेत्र बन्द करने पर प्रकाश ठीक तरह सामने दृष्टि गोचर होने लगे, तो धारणा करनी चाहिए कि यह प्रकाश परब्रह्य परमात्मा का प्रतीक है। उसमें अपनी आत्मा को मिलाना एवं लय करना है। 

4-भावना कीजिए कि आपकी जीवात्मा आपके हृदय- स्थल में से पतंगे की तरह बाहर निकलती हैं और उस प्रकाश पर अपना आत्म समर्पण कर देती है। उसका सारा  प्रभाव जलकर नष्ट हो जाता है और आत्मा की ज्योति परमात्मा-स्वरूप उस महा प्रकाश में लय हो जाती है। दूसरा ध्यान यह भी हो सकता है “कि ध्यान में प्रकाश.. यज्ञ की ज्वलन्त अग्नि के रूप के सामने विद्यमान हैं और हमारा जीवात्मा घृत के रूप में आहुति प्रदान कर रहा है। अग्नि में पड़ने के बाद घृत का अपना स्वरूप और अस्तित्व समाप्त हो जाता है और उसकी परिणति ज्योति का स्वरूप बढ़ने के रूप में ही दिखाई देती है। हमने अपनी आत्मा उस प्रकाश में होम दिया, तो अपना आपा समाप्त हुआ और वह उस पूर्व प्रकाश में लय होकर ब्रह्म-भाव में बदल गया।” यह ध्यान पन्द्रह मिनट से बढ़ाते हुए आधा घण्टे तक पहुँचा देना चाहिए। अन्य अवकाश के समयों में भी प्रकाश, ज्योति और उसके साथ आत्म आहुति का ध्यान करते रहना चाहिए। आनन्दमय कोश के अनावरण में इस ध्यान से आशाजनक सहायता मिलेगी। 5-उपासना के तीन प्रकार हैं- १- त्रैत २- द्वैत ३- अद्वैत। त्रैत पूजा वह कहलाती है, जिसमें उपासक, उपास्य और उपकरण की तीनों आवश्यकताऐं रहती हैं। मूर्ति-पूजा या देव-पूजा जो वस्तुओं और उपकरणों के माध्यम से की जाती है, त्रैत है। धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, चन्दन, रोली, जल, शंख, घड़ियाल, आरती आदि पूजा उपकरण प्रकृति के प्रतीक हैं। उपासक जीव-इनमें से अलग हैं। ब्रह्म तो अलग था ही, उसी को प्राप्त करने के लिए जो उपासना का विधान एकत्रित किया था, यह त्रैत साधना हुई। द्वैत साधना में पूजा उपकरणों की आवश्यकता नहीं रहती। जीव-और ब्रह्म दोनों का आप द्वारा सन्निध्य- समागम होता रहता है। किसी पूजा उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। ईश्वर  की प्रतिमा का पूजन साधना की प्रारम्भिक अवस्था है। चित्र या मूर्ति का षोडशोपचार पूजा सामिग्री से पूजन करना, माला, हवन, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि कर्मकाण्ड  त्रैत साधना के अन्तर्गत आते हैं।  

6-जीव और ब्रह्म की स्थिति , प्रकृति की समाप्ति को ही द्वैत कहते हैं। अब द्वैत को हटाकर अद्वैत साधना में प्रवेश किया जाता है, परब्रह्म परमात्मा का प्रकाश रूप में ध्यान करते हुए आत्म- समर्पण करना, ‘अहम्’ को उसी में लीन कर देना, दोनों को मिटाते हुए एक की स्थिति शेष रहने देना अद्वैत उपासना है।अब चौथे चरण में विश्वात्म-दर्शन का अभ्यास हमें आनंदमय कोश के अनावरण के लिए करना चाहिए। अर्जुन को कृष्ण ने गीता सुनाते समय अपना विराट स्वरूप दिखाया था। यशोदा द्वारा माटी खाते हुए धमकाये जाने पर भी भगवान ने अपना वही रूप उन्हें दर्शाया, कौशिल्या ने राम को पालने में खिलाते हुए भी वही रूप देखा था और काकभुशुण्डिजी ने भगवान राम के मुख में प्रवेश करके भी उसी स्वरूप की झाँकी की थी। यह विश्व ब्रह्माण्ड ही परमात्मा का स्वरूप है। संसार के कण-कण में, प्रत्येक जीव में भगवान की झाँकी करना और तदनुरूप प्रत्येक के साथ सद्-व्यवहार करना विश्वात्मा की सच्ची आराधना है।  

7-अपने में सबको और सब में अपने को समाया हुआ देखने का अभ्यास करना चाहिए। प्राथमिक अवस्था में प्रतिमाओं के आधार पर भगवान की स्थापना की जाती है और चंदन, अक्षत, धूप- दीप से उसका पूजन होता है। पीछे ऊँची स्थिति में पहुँचने पर इस विराट विश्व को ही परमात्मा का साक्षात् स्वरूप मानना पड़ता है और उसके चरणों पर अपने शरीर, मन, वचन, कर्म और धन को समर्पित करना पड़ता है। भगवान पत्र-पुष्पों के बदले नहीं, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं। और वे भावनाऐं,  आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिए। उनकी सच्चाई परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। भक्ति भावना को इसी कसौटी पर परखा जाता है और यदि वह खरी होती है, तो उसके बदले में आनन्दमय परमात्मा अवश्य मिलता है। सच्चिदानन्द की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है, जिसे आत्मज्ञान की मस्ती कहते हैं। वास्तविक आनन्द यही है। अपने आप की पवित्रता और महानता का अनुभव करते हुए शान्ति, सन्तोष ,उल्लास और आनन्द में निमग्न रहने की स्थिति ही जीवनमुक्ति कहलाती है।उस अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता  है।

...SHIVOHAM....

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कैंसर के लिए दवा मिल सकती है

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 इस साल कैंसर (Cancer) जैसे बीमारी के लिए  के लिए एक कारगर दवा (Drug) मिल सकती है. पिछले तीस सालों से वैज्ञानिक KRAS नाम के प्रोटीन (Protien) को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी वृद्धि बहुत से कैंसर होने के संकेत मिलते हैं. KRAS अभी तक दवाओं से बेअसर रहा है क्योंकि वैज्ञानिकों इसमें काम करने के तरीके नहीं मिल सके हैं. इस साल इसकी दवा को इस साल मंजूरी मिल सकती है. यह कैंसर की पहली अधीकृत दवा होगी. Sabhar zeenews.com

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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

निस्केयर के उद्देश्य कार्यकर्ता का संछिप्त विवरण

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राष्ट्रीय विज्ञान संचार तथा सूचना स्रोत संस्थान (निस्केयर), भारतीय विज्ञान संचार तथा भारतीय राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रश्वेखन केन्द्र (इंसडॉक) के दिनांक 30 सितम्बर 2002 को हुए विलय के पश्चात अस्तित्व में आया। निस्कॉम तथा इंसडॉक दोनों ही वैज्ञानिनक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) के प्रमुखख संस्थान थे जो वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक सूचना (एस एंड टी) के प्रलेखन तथा प्रचार/प्रसार के लिये समर्पित थे।

राष्ट्रीय विज्ञान संचार 

देश में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की सामयिक तथा पारस्परिक ज्ञान-प्रणाली पर उपलब्ध सभी सूचना स्रोतों का मुख्य संरक्षक बनना तथा सर्वाधिक प्रयुक्त प्रौद्योगिकियों प्रयोग करके सभी स्तर के विविध संघटकों में  को प्रोत्साहन करना/बढ़ावा देना।निस्केयर सीएसआईआर प्रयोगशालाओं द्वारा ई-जर्नलों पर सुलभता प्राप्त करने के लिए कर्न्सोशियम का विकास करने के लिए नोडल संगठन का कार्य करता है। इस गतिविधि में प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा प्रकाशित वैज्ञानिक अनुसंधान पत्रिकाओं के सृजन से लेकर सुलभता सुविधा पर मॉनीटरिंग सम्मिलित है। इस योजना के अन्तर्गत सीएसआईआर के वैज्ञानिक इन अनुसंधान पत्रिकाओं पर सुलभता प्राप्त कर अपने प्रयोग के लिए सामग्री डाउनलोड कर सकते हैं। विश्वभर की अनुसंधान पत्रिकाओं पर ऐसी सुलभता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगी तथा सीएसआईआर प्रयोगशालाओं में अनुसंधान तथा विकास को सशक्त बना देश के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए उपयोगी ज्ञान उत्सर्जन को बढ़ाएगी। इसके उद्देश्य निम्नांकित 


  • सीएसआईआर पुस्तकालय संसाधनों को पूलिंग, शेयरिंग तथा इलेक्ट्रोनिकल रूप में सुलभता प्राप्त कर सशक्त बनाना।
  • सीएसआईआर प्रयोगशालाओं को विश्वभर के वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक साहित्य पर सुलभता प्रदान करना।
  • इलेक्ट्रोनिक रूप में सुलभता की संस्कृति को बढ़ाकर डिजीटल पुस्तकालयों के उत्सर्जन हेतु कार्य करना।

ऐसे सदस्य संसाधनों में मैसर्स ब्लैकवेल, मैसर्स जॉनविले, मैसर्स स्प्रिंगर, मैसर्स एआईपी, मैसर्स एएससीई तथा अन्य प्रकाशक तथा अनुसंधान पत्रिकाएं/साइंस, जेसीसीसी तथा एसीआई-फाइन्डर जैसे डेटाबेस सम्मिलित  sabhar vikipidia 

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आभामंडल कैसे पहचाने

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आभामंडल कैसे पहचाने :-
02  FACTS;-
 1-आभामंडल को सामान्यतौर पर पहचाना नही जा सकता । इसे देखने के लिए आपके अंदर एक खास तरह की क्षमता होनी चाहिए या फिर आपने उस क्षमता निर्माण किया हो वरना हम ऊर्जा के इस खेल को आसानी से नही समझ सकते, परंतु आज जब विज्ञान भी इसे स्वीकार करता है और उनके द्वारा औरा डिटेक्टर  मशीन विकसित की गई है जिससे हम अपने औरा की फोटोग्राफी करा सकते हैं।जब हम अपने औरा की फोटोग्राफी देखते हैं तो शरीर से लिपटा हुआ एक ऊर्जा का वलय देखते हैं।
इन अलग अलग रंगों का अपना महत्व तथा अर्थ भी अलग अलग होता है। जैसा रंग औरा का होता है वह उस प्रवृति का इंसान होता है। या फिर जैसी जिसकी प्रवृत्ति होती है वैसा ही उसके आभामंडल का रंग नियत होता है।जैसे :-लाल रंग का आभामंडल हो तो गुस्सैल, चिड़चिड़े स्वभाव का इंसान।काले रंग का आभामंडल तो चोर, गुनाहगार स्वभाव का व्यक्ति।इन रंगों से उस इंसान या हर चीज की प्रवृत्ति या प्रकृति के बारे में जाना जा सकता है।
2-आभामंडल को देखने की क्षमता पाना भी लगभग आसान है। बस आपके अंदर उसे पाने का जुनून होना चाहिए। जब तक आप उस क्षमता को नही पा लेते तब तक इसको पहचान पाना कठिन कार्य होता है।यह औरा विभिन्न रंगों की किरणों के साथ मनुष्य के आसपास चक्रिय आकार में घूमता है। आभामण्डल आपके आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालता है, लेकिन इसका जवाब आभामण्डल में मौजूद रंगों द्वारा मिलता है। जिससे आप ना केवल अपने बल्कि किसी और के चरित्र को भी पहचान सकते हैं।आप कैसे खुद के आभामण्डल को जान सकते 6हैं इसके लिए इसका सही ज्ञान होना आवश्यक है। यदि आप अपने आभामण्डल को पहचान पाएंगे तो आप किसी के भी आभामण्डल को विस्तारित करने के योग्य होंगे। हमारे औरा में मौजूद रंग ही उस आभामण्डल को परिभाषित करते हैं,लेकिन वहीं दूसरी ओर यदि किसी का आभामण्डल केवल एक या दो रंगों को ही दर्शाता है तो इसका तात्पर्य है कि उसका जीवन केवल कुछ ही विषयों के आसपास घूम रहा है। रंग हमारे आभामण्डल को परिभाषित करते हैं।उदाहरण के लिए... 
 1-लाल रंग;-
यदि आपको आभामण्डल का रंग लाल या गहरा प्रतीत हो है तो इसका मतलब है कि वह इंसान बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता है। ऐसे इंसान जब गुस्से में होते हैं तो वे नहीं जानते कि वे क्या बोल रहे हैं। इनके गुस्से की कोई सीमा नहीं होती और जब वे क्रोधित होते हैं तो कुछ भी सोचते-विचारते नहीं हैं।
2-पीला रंग
  जिस व्यक्ति के आभामण्डल में पीले रंग का आभास हो उनका मस्तिष्क काफी सचेत रहता है, लेकिन यदि यही पीला रंग गहरा हो जाए तो यह अच्छा संकेत नहीं है।
3-हरा रंग
  आभामण्डल में यदि हरा रंग दिखाई दे तो ऐसा इंसान काफी शांत स्वभाव का होता है। एक बाग में दिखने वाली हरियाली की तरह ही ऐसे इंसान के चेहरे पर आप संतुष्टि देख सकते हैं।
4-काला आभामण्डल;-
काले आभामण्डल यानी कि परेशानियां इनके जीवन का एक विशेष भाग बनकर बैठी हैं। माना जाता है कि काले आभामण्डल वाले लोग ही नशीले पदार्थों का सबसे ज्यादा सेवन करते हैं। 
 5-नीला रंग
  यदि किसी इंसान के आभामण्डल में नीले रंग की छाया नज़र आए तो यह सबसे अच्छा रंग माना जाता है।ऐसे व्यक्ति बेहद उत्साहित एवं कुशल स्वभाव के होते हैं। लेकिन बाकी रंगों की तरह ही यदि इस रंग पर भी काला या मटमैला रंग आ जाए, तो यह व्यक्ति को चिंता में डाल देता है। उसका उत्साह अति उत्साह बनकर उसी के जीवन को ग्रस्त करने में लग जाता है। लेकिन   यदि आपका आभामण्डल आपको बुरा प्रतीत होता है तो आप स्वयं उसका हल भी निकाल सकते हैं।
शरीर के सात मूल चक्रो चक्र के आधार पर औरा  कैसे पहचाने :-
 मूल रूप से चक्र केवल सात हैं – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। पहला चक्र है मूलाधार, जो गुदा और जननेंद्रिय के बीच होता है, स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रिय के ठीक ऊपर होता है। मणिपूरक चक्र नाभि के नीचे होता है। अनाहत चक्र हृदय के स्थन में पसलियों के मिलने वाली जगह के ठीक नीचे होता है। विशुद्धि चक्र कंठ के गड्ढे में होता है। आज्ञा चक्र  दोनों भवों के बीच होता है। जबकि सहस्रार चक्र, जिसे ब्रम्हरंद्र्र भी कहते हैं, सिर के सबसे ऊपरी जगह पर होता है, जहां नवजात बच्चे के सिर में ऊपर सबसे कोमल जगह होती है।हम चक्रों को ऊपर वाले और नीचे वाले चक्र कह सकते हैं, लेकिन ऐसी भाषा के प्रयोग से अक्सर गलतफहमी पैदा हो जाती है। यह एक इमारत की नींव और छत की तुलना करने जैसा है। छत कभी नींव से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होती। किसी भी इमारत की नींव उसका मुख्य आधार होती है, छत नहीं। इमारत की मजबूती और वह कितना टिकाऊ होगी, यह सब उसकी नींव पर निर्भर करता है न कि छत पर। लेकिन जब हम बात करते हैं तो कहते हैं कि छत ऊपर और नींव नीचे है।
1-मूलाधार चक्र ;-  
  इस चक्र का रंग लाल  है।  अगर आप की ऊर्जा मूलाधार में प्रबल है, तो आपके जीवन में भोजन और निद्रा का सबसे प्रमुख स्थान होगा। वैसे, चक्रों के एक से ज्यादा आयाम होते है। चक्रों का एक आयाम तो उनका भौतिक अस्तित्व है, लेकिन उनके आध्यात्मिक आयाम भी होते हैं। इसका मतलब है कि उनको पूरी तरह से रूपांतरित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, मूलाधार चक्र, जो भोजन और नींद के लिए तरसता है, अगर आपने सही तरीके से जागरूकता पैदा कर ली है, तो वही इन चीजों से आप को पूरी तरह से मुक्त भी कर सकता है।
2-स्वाधिष्ठान चक्र ;-
  इस चक्र का रंग ऑरेंज है। अगर आपकी ऊर्जा स्वाधिष्ठान में सक्रिय है, तो आपके जीवन में आमोद प्रमोद की प्रधानता होगी। आप भौतिक सुखों का भरपूर मजा लेने की फिराक में रहेंगे। आप जीवन में हर चीज का लुत्फ उठाएंगे।
3-मणिपूरक चक्र ;-
   इस चक्र का रंग पीला है। अगर आपकी ऊर्जा मणिपूरक में सक्रिय है, तो आप कर्मयोगी होंगे।आप दुनिया में हर तरह का काम करने को तैयार रहेंगे।
4-अनाहत चक्र ;-
  इस चक्र का रंग हरा  है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे।
5-विशुद्धि चक्र ;-
  इस चक्र का रंग नीला /sky blue है।इसी तरह से आपकी ऊर्जा अगर विशुद्धि में सक्रिय है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।
6-आज्ञा चक्र ;-
 इस चक्र का रंग बैंगनी  है। अगर आपकी ऊर्जा आज्ञा में सक्रिय है, या आप आज्ञा तक पहुंच गये हैं, तो इसका मतलब है कि बौद्धिक स्तर पर आपने सिद्धि पा ली है। बौद्धिक सिद्धि आपको शांति देती है। आपके अनुभव में यह भले ही वास्तविक न हो, लेकिन जो बौद्धिक सिद्धि आपको हासिल हुई है, वह आपमें एक स्थिरता और शांति लाती है। आपके आस पास चाहे कुछ भी हो रहा हो, या कैसी भी परिस्थितियां हों, उस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
 7-बिंदु चक्र ;-
इस चक्र का रंग  वॉयलेट/ लाली लिए हुए नीला रंग है।एक बार इंसान की ऊर्जा सहस्रार तक पहुँच  जाती है, तो वह पागलों की तरह परम आनंद में झूमता है। अगर आप बिना किसी कारण ही आनंद में झूमते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा ने उस चरम शिखर को छू लिया है।
सहस्रार/ऊपर की ओर गिरना;-
इस चक्र का रंग गोल्डन - सिल्वर रंग है।आपकी ऊर्जा को मूलाधार से आज्ञा चक्र तक ले जाने के लिए कई तरह की आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और साधनाएं हैं, लेकिन आज्ञा से सहस्रार तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। कोई भी एक खास तरीका नहीं है। आपको या तो छलांग लगानी पड़ती है या फिर आपको उस गड्ढे में गिरना पड़ता है, जो अथाह है, जिसका कोई तल नहीं होता। इसे ही ‘ऊपर की ओर गिरना‘ कहते हैं। योग में कहा जाता है कि जब तक आपमें ऊपर की ओर गिरने’ की ललक नहीं है, तब तक आप वहां पहुँच  नहीं सकते। वास्तव में , किसी भी आध्यात्मिक यात्रा को हम मूलाधार से सहस्रार की यात्रा कह सकते हैं। यह एक आयाम से दूसरे आयाम में विकास की यात्रा है, इसमें तीव्रता के सात अलग-अलग स्तर होते हैं। 
 AURA  COLOUR  &  MEANING;- 
The human aura is believed to be made of 15 different layers of colors of energy that are all interconnected. Most teachings of the human aura are often focused on the first 7 layers of the human aura.
Here ,we go a little further by exploring the first 12 layers of the aura and their colors and meanings. The first layer of the human aura is the layer closest to the body.
Layer 1--represents the etheric body and the color red.
Layer 2-- is linked to the emotional and elemental body. It is orange in color.
Layer 3-- is connected to the mental body and is yellow in color.
Layer 4-- represents the astral body and emits a green hue.
Layer 5--- is linked to the archetypal body and is blue in color.
Layer 6-- represents the angelic body and has an indigo color .
Layer 7- is connected to the ketheric /etheric body body and emits a violet hue.
Layer 8-- is linked to the monadic/ one body and has a gold color.
Layer 9-- represents the keriatric body and is silver in color.
Layer 10-- is connected to the christiac body. It represents the color blue-black.
Layer 11-- is linked to the buddhaic body and is silver-black in color.
Layer 12- represents the nirvanic body and emits a white color.
NOTE;-
Many energy healers believe that when the colors of the human aura are polluted and out of balance, they can cause negative effects on the body, leading to health problems. Here is a list of aura colors and their meaning.
 MEANINGS OF THE COLOUR;-
21 POINTS;-
1-Deep red:-- Grounded, strong will power, survival oriented.Passions run high with those who have a red aura, as they live by their desires and emotions.
2-Dark red:-- Anger
3-Clear red:-- Energetic, competitive, sexual, passionate
4-Orange:--- Vitality, vigor, creative, stamina, courageou.Creativity is key for those who have an orange aura. Their artistry brings peace to them.
5-Orange- yellow: Scientific, detail oriented, perfectionist.Creativity is key for those who have an orange aura. Their artistry brings peace to them.
6-Yellow:-- Creative, playful, identity, awareness, power, knowledge, curiosity.Those with yellow auras are high energy and exude optimism.
7-Yellow-green:--- Passionate, communicative.
8-Green:-- Nature, growth, balance, love.Green auras mark a grounded, hard-working person who is a nature lover.
9-Dark green:-- Jealousy, low self-esteem, resentment.
10-Blue:---- Cool, calm, sensitive, expression.Those with blue auras are emotionally sensitive and are self-expressive.
11-Dark blue:-- Fear of self-expression
12-Indigo:--- Intuitive, visionary, clear minded.An indigo aura denotes a wise person with an old soul.
13-Violet:---- Visionary, divine wisdom, enlightenment.Spiritual awareness and psychic sentiments are marks of a violet aura.
14-Silver:--- Abundance, nurturing/to take care of.
15-Bright pink:--- Sensitive, artistic, affection, compassion, purity
16-Dark pink:-- Immature, dishonest
17-Gold:--- Enlightenment, wisdom, intuitive thinker
18-White:--- Purity, unity, transcendent.This shows a well-balanced personality, one that is calm and open to possibilities. White is the rarest of all aura colors.
19-Black;--A black aura can show a dark energy which is often pessimistic and unkind.
20-Brown ;--A brown aura often denotes a selfish person.
21-Gray;--Gray auras can show skepticism/doubt that something is true or useful:  and uncertainty about others. They often see the glass half empty.
 AURA  COLOUR  &   ITS DECODATION;-- 
Auras can reveal information about your thoughts, feelings and dreams. The colors vary and can be light or dark shades. When reading an aura, you must take into account the shade of color in order to be precise. All living things radiate an aura from the energy they emit. These special vibrations and colors can be seen by gifted people and those trained in the healing arts, who can manipulate energy fields for effective healings.
1-RAINBOW  AURAS;--
You can have more than one color present in your enteric field, too. This is called a rainbow aura.These auras are found in healers, especially those trained to work with the body's energy fields. Rainbow auras are typically seen as shards (piece ) of colorful light, resembling a sunburst. Highly evolved spiritually, a person with a rainbow aura is believed to be attuned to the spiritual frequency of the fifth dimension (also called heaven).You can have more than one color present in your enteric/broadly  field, too.
1-1-Rainbow children are believed to be incarnate for the first time on Earth. They are also said to exhibit rainbow auras. By the very nature of the high energy frequency required to generate a rainbow aura, the colors are reportedly always bright and shiny. 
1-2-Brilliant colored stripes:--- 
A healer's rainbow aura is often seen as colorful stripes radiating around the hands and head. Often the entire body of a healer or creative individual radiates a rainbow of colors that surrounds the person.
1-3-Pale rainbow colors:-
 It's possible that an emerging healer or someone on the verge of true enlightenment might have a pale rainbow aura.
HOW TO READ YOUR AURA?-
 1-Anyone can read an aura. It’s all about trusting your intuition. Look in the mirror for a minute in front of a white background. Concentrate on a focal point in the middle of your forehead. Without moving your eyes, scan the outer perimeter of your head and shoulders. The color you see surrounding your head and shoulders is your aura.
2-Another way to find your aura is to stare at your hands for approximately one minute. The glow you see radiating from the outside lining of your hands is your aura. Please note that it may take a few tries to actually see your aura. Practice makes perfect! Once you have found and noted your aura, we can get started.
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AIIMS Hospital New Delhi | AIIMS Delhi Vlog | AIIMS New OPD Building RAK OPD | ICMR Kaha hai

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The All India Institutes of Medical Sciences (AIIMS) are a group of autonomous government public medical colleges of higher education. These institutes have been declared by an Act of Parliament as Institutes of National Importance. AIIMS New Delhi, the fore-runner institute, was established in 1956. Since then, 22 more institutes were announced. As of January 2020, fifteen institutes are operating and eight more are expected to become operational until 2025. Proposals were made for six more AIIMS. namaskaar dosto, is video me aapko AIIMS ka full view dekhne ko mila hai jo ki aaj tk aapko kisi video me dekhne ko nhi mia hoga,,,to bina der kiye video ko poora dekhe AIIMS Newdelhi New RAK OPD complex It's @aiims_newdelhi New OPD complex. Developing World class infrastructure. Hopefully things will be better soon for patients. We need to adopt more Patients friendly measures in Govt hospitals. Hats off to leadership @narendramodi @MoHFW_INDIA @drharshvardhan @richaanirudh #Namaskar sabhar urokt

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Quantum computers

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Quantum computers aren’t the next generation of supercomputers—they’re something else entirely. Before we can even begin to talk about their potential applications, we need to understand the fundamental physics that drives the theory of quantum computing. (Featuring Scott Aaronson, John Preskill, and Dorit Aharonov.) For more, read "Why Quantum Computers Are So Hard to Explain": https://www.quantamagazine.org/why-is.. sabhar.

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हमारा आंख कैसे काम करता है

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नमस्कार दोस्तों.......

स्वागत है आपका The Science News चैनल में। दोस्तों आज की इस वीडियो मे मैंने आपको हमारे आंख के बारे में बताया है कि हमारा आंख कैसे काम करता है। कम समय में मैंने आपको सही जानकारी देने की कोशिश की है इसलिए इस वीडियो को पूरा देखें।


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