Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Comments

You might like

Subscribe Us

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

वर्ष 2025 तक पेट्रोल में 25 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य

0




हरदोई। जनपद के एक दिवसीय भ्रमण के दौरान सचिव, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण सुधांशु पाण्डेय ने हरियावां चीनी मिल का निरीक्षण किया। उन्होने मिल में लगी डिस्टिलरी को देखा। इस दौरान उन्होने एथेनॉल के उत्पादन पर जोर दिया। उन्होने कहा कि वर्ष 2025 तक पेट्रोल में 25 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य है इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और चीनी मिलों के सशक्त होने से किसानों के जीवन में भी खुशहाली आयेगी। उन्होने कहा कि चीनी मिल में बनने वाले उक्त उत्पादों से भी किसानो की जिन्दगी में बेहतरी हो रही है। निरीक्षण के अतिरिक्त श्री पाण्डेय ने तीन गॉवों का भी दौरा किया। जहॉ उन्होने स्वच्छ ग्राम पुरस्कार वितरण व शत प्रतिशत कोविड टीकाकरण ग्राम पुरस्कार वितरण समारोह में भाग लिया तथा उन्होने इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास करने वाले लोगो को सम्मानित किया। उन्होने कहा कि आज के युवा का बदला हुआ रूप देखकर उन्हे बहुत खुशी होती है। आज की नई पीढ़ी खुद को नई तकनीक व नई सम्भावनाओं के साथ जोड़ रही है। वे स्वयं के अलावा समाज के लिए भी कुछ करने की चाह रखते है। उन्होने आगे कहा कि इन्सान सकारात्मक सोच के साथ कुछ भी करने की क्षमता रखता है। इस दौरान उनके साथ जिलाधिकारी अविनाश कुमार व चीनी मिल के अधिकारी भी मौजूद रहे।

Read more

बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

क्या है तंत्र-विद्या?

0

 


07 FACTS;-


1-तंत्र-विद्या, जिसे अंग्रेजी में 'ऑकल्ट' कहते हैं, के लिए अकसर लोगों के मन में शंका और भय जैसी भावनाएं होती है।  


तंत्र में बहुत सारी संभावनाएं होती हैं। उन्हीं में से एक है 'ऑकल्ट' यानी गुह्य-विद्या जिसमें तंत्र का भौतिक तरीके से इस्तेमाल किया जाता है।तंत्र का मतलब होता है कि आप कामों को अंजाम देने के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं।


इस तरह के गुह्य-विद्या के अभ्यासों को आमतौर पर तंत्र के लेफ्ट हैंड या वाम मार्ग के रूप में जाना जाता है। इसका एक आध्यात्मिक पहलू भी है, जिसे राइट हैंड या दक्षिण मार्गी तंत्र के रूप में जाना जाता है।जिसे वाम-मार्गी तंत्र कहा जाता है, वह एक स्थूल या अपरिपक्व टेक्नोलॉजी है जिसमें अनेक कर्मकांड होते हैं। जबकि जो दक्षिण-पंथी तंत्र है, उसकी टेक्नोलॉजी अत्यंत सूक्ष्म है। इन दोनों की प्रकृति बिलकुल अलग है।तंत्र विद्या ईश्‍वरीय शक्ति और मनुष्‍य की आत्‍मा के बीच संपर्क जोड़ने का साधन है, जिसकी सही परिभाषा जल्‍दी नहीं मिलती। 


 2-तंत्र, का संधि- विच्छेद करें तो दो शब्द मिलते हैं - तं- अर्थात फैलाव और त्र अर्थात बिना रुकावट के। ऐसा फैलाव या नेटवर्क जिसमें कोई रुकावट या विच्छेद न हो। जो एकाकी हो, जो अनंत में फैला हुआ हो ..सतत हो । इसलिए तंत्र अनंत के साथ जुड़ने का एक साधन है। कभी किसी दूसरी संस्कृति ने इश्वर तक पहुँचने के लिए इतनी गहन विचारणीय शब्द का प्रयोग शायद ही किया होगा। तंत्र द्वैत को नहीं मानता है। तंत्र में मूलभूत सिद्धांत है की ऐसा कुछ भी नहीं है, जो की दिव्य न हो। तंत्र अहंकार को पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, जिससे द्वैत का भाव पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। तंत्र पूर्ण रूपांतरण की बात करता है। ऐसा रूपांतरण जिससे जीव और ईश्वर एक हो जाएँ। ऐसा करने के लिए तंत्र के विशेष सिद्दांत तथा पद्धतियां हैं, जो की जानने और समझने में जटिल मालूम होती हैं।तंत्र का जुडाव प्रायः मंत्र, योग तथा साधना के साथ देखने को मिलता है। तंत्र, गोपनीय है, इसलिए गोपनीयता बनाये रखने के लिए प्रायः तंत्र ग्रंथों में प्रतीकात्मकता का प्रयोग किया गया है। कुछ पश्च्यात देशों में तंत्र को शारीरिक आनंद के साथ जोड़ा जा रहा है, जो की सही नहीं है। यदपि तंत्र में काम शक्ति का रूपांतरण, दिव्य अवस्था प्राप्ति की लिए किया जाता है अपितु बिना योग्य गुरु के भयंकर भूल होने की पूर्ण संभावना रहती है।ऐसा माना जाता है सर्वप्रथम भगवन शिव ने देवी पारवती को विभिन अवसरों पर तंत्र का ज्ञान दिया है।


 3-योग में तंत्र का विशेष महत्व है। योग तथा तंत्र दोनों, अध्यात्मिक चक्रों की शक्ति को विकसित करने की विभिन्न पद्धतियों के बारे में बताते हैं। हठयोग और ध्यान उनमें से एक है। विज्ञानं भैरव तंत्र जो की 112 ध्यान की वैज्ञानिक पद्धति है भगवान शिव ने देवी पारवती को बताई है। जिसमें सामान्‍य जीवन की विभिन अवस्थाओं में ध्यान करने की विशेष पद्धति वर्णित है।


 तंत्र  मंत्र की सभी तांत्रिक कियाएं जिनमें - सम्मोहन, वशीकरण, उचाटन मुख्य हैं, मंत्र महार्णव तथा मंत्र महोदधि नामक ग्रंथों में वर्णित हैं। तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है। सरल होने पर इश्वर के संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग इश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।तांत्रिक विद्या के अनुसार भांति-भांति की कीलों से तंत्र क्रियाओं द्वारा किसी स्थान को कीलने से वहां पर सुरक्षा कवच को स्थापित करना। 


4-बताया जाता है कीलन सुरक्षा की दृष्टि से तो किया ही जाता है परंतु  इसके विपरीत ईर्ष्या -द्वेष, अनहित की भावना, शत्रुवत व्यवहार आदि के चलते भी स्थान का कीलन कर दिया जाता है। कहने का मतलब है कि कीलन सेअर्थ है सुरक्षा कवच। बांधने की क्रिया अर्थात किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को सुरक्षा कवच में बाधने को कीलन या स्तम्भन कहतेहैं।  


तो वहीं बंधेहुए को मुक्त करवाने की क्रिया को उत्कीलन कहा जाता है। तंत्र विद्या में कीलन सकारात्मक और नकारात्मक दो प्रकार से प्रयोग में लिए जाते हैं।  उदाहरण के लिए किसी के काम से अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो कीलन की विशेष प्रक्रिया द्वारा उसके काम को रोक दिया जाता है या दूसरे शब्दों में कहे तो कील दिया जाता है या स्तम्भित कर दिया जाता है।  पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा के कारण चलानमय है। जिस प्रकार सभी के फिंगर प्रिंट अलग अलग होते है उसी प्रकार सभी के अंदर उर्जाये भी अलग अलग होती है।तन्त्र में ऊर्जाओं का ज्ञान होना महत्वपूर्ण है। 


 5-तन्त्र क्रियाओं द्वारा ऊर्जा को जोड़ा जाता है। यदि ऊर्जा नही जुड़ती तो तन्त्र क्रिया कार्य ही नही करती।  


जो हमारे पहने हुए वस्त्र, बाल आदि होते है उनमें हमारी ऊर्जा रहती है इसलिए तन्त्र क्रियाओं में इन वस्तुयों का प्रयोग किया जाता है। इनसे ऊर्जा जोड़ने में सरलता होती है। यदि वस्त्र या बाल आदि ना मिले तो व्यक्ति का पूर्ण नाम पता द्वारा भी ऊर्जा जोड़ने का प्रयास होता है। फिर साधक अपनी सिद्ध शक्ति उस स्थान पर भेजता है यदि सबकुछ सही हुआ तो ऊर्जा जुड़ जाती है और कार्य पूर्ण हो जाता है। तन्त्र क्रियाओं की भी अवधि होती है उसके बाद प्रभावहीन होने लगती है। क्रिया को अधिक समय तक चलाने के लिए समय समय पर ऊर्जा की तीव्रता बढ़ाई जाती है या व्यक्ति से सबंधित वस्तु को स्मशान आदि में गाड़ देते है जिससे ऊर्जा बनी रहती है।


 6-दक्षिण-पंथी तंत्र ज्यादा आंतरिक और ऊर्जा पर आधरित होता है, यह सिर्फ आपसे जुड़ा है। इससे कोई विधि-विधान या बाहरी क्रियाकलाप नहीं जुड़ा होता। यह भी एक तरह से तंत्र है लेकिन 'योग' में ये सब एक साथ शामिल हैं।जब हम योग कहते हैं, तो किसी भी संभावना को नहीं छोड़ते - इसके अंदर सब कुछ है। बस इतना है कि कुछ विक्षिप्त दिमाग वाले लोगों ने एक खास तरह का तंत्र अपनाया है, जो पूरी तरह से वामपंथी तंत्र है, जिसमें शरीर का विशेष रूप से इस्तेमाल होता है। उन्होंने बस इस हिस्से को ले कर उसे बढ़ा-चढ़ा दिया और उसमें तरह-तरह की अजीबोगरीब काम  क्रियाएं जोड़ कर किताबें लिख डालीं और कहा, 'यही तंत्र है'। नहीं, यह तंत्र नहीं है।तंत्र का मतलब होता है कि आप कामों को अंजाम देने के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं।इसलिए सवाल यह है कि आपका तंत्र कितना सूक्ष्म और विकसित है? अगर आप अपनी ऊर्जा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको या तो दस हजार कर्मकांड करने पड़ेंगे या आप बैठे-बैठे भी यह कर सकते हैं।सबसे बड़ा अंतर यही है। सवाल सिर्फ पिछड़ी या एडवांस टेक्नोलॉजी का है, लेकिन तंत्र वह विज्ञान है, जिसके बिना कोई आध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं हो सकती।


 7-अगर आप अपने दिमाग को इतना धारदार बना लें कि वह हर चीज को आरपार देख-समझ सके, तो यह भी एक प्रकार का तंत्र है। अगर आप अपनी सारी ऊर्जा को अपने दिल पर केंद्रित कर दें ताकि आपमें इतना प्यार उमड़ सके कि आप हर किसी को उसमें सराबोर कर दें, तो वह भी तंत्र है। अगर आप अपने भौतिक शरीर को जबरदस्त रूप से शक्तिशाली बना लें कि उससे आप कमाल के करतब कर सकें, तो यह भी तंत्र है। या अगर आप अपनी ऊर्जा को इस काबिल बना लें कि शरीर, मन या भावना का उपयोग किए बिना ये खुद काम कर सके, तो यह भी तंत्र है।तो तंत्र कोई अटपटी या बेवकूफी की बात नहीं है। यह एक खास तरह की काबिलियत है। उसके बिना कोई संभावना नहीं हो सकती।तंत्र एक प्रक्रिया है जिससे हम अपनी आत्मा और मन को बंधन मुक्त करते हैं।  इस प्रक्रिया से शरीर और मन शुद्ध होता है, और ईश्वर का अनुभव करने में सहायता हो होती है। तंत्र की प्रक्रिया से हम भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। ऐसी मान्यताएं हैं कि एक व्यक्ति तंत्र की सही प्रक्रिया से मष्तिष्क का पूरा इस्तेमाल कर पाता है और अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन जाता है। 

Sahar Chida nanda Facebook wall

... SHIVOHAM...#vigyantvindia

Read more

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

ॐ का रहस्य क्या है?

0

 🕉⚜🕉⚜🕉⚜🕉⚜🕉


🕉*⚜♥ॐ का रहस्य क्या है? ♥⚜*🕉


*मन पर नियन्त्रण करके शब्दों का उच्चारण करने की क्रिया को मन्त्र कहते है। मन्त्र विज्ञान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मन व तन पर पड़ता है। मन्त्र का जाप एक मानसिक क्रिया है। कहा जाता है कि जैसा रहेगा मन वैसा रहेगा तन। यानि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य है तो हमारा शरीर भी स्वस्थ्य रहेगा।*


*मन को स्वस्थ्य रखने के लिए मन्त्र का जाप करना आवश्यक है। ओम् तीन अक्षरों से बना है। अ, उ और म से निर्मित यह शब्द सर्व शक्तिमान है। जीवन जीने की शक्ति और संसार की चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस देने वाले ओम् के उच्चारण करने मात्र से विभिन्न प्रकार की समस्याओं व व्याधियों का नाश होता है।*


*सृष्टि के आरंभ में एक ध्वनि गूंजी ओम और पूरे ब्रह्माण्ड में इसकी गूंज फैल गयी। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि इसी शब्द से भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा प्रकट हुए। इसलिए ओम को सभी मंत्रों का बीज मंत्र और ध्वनियों एवं शब्दों की जननी कहा जाता है।*


*इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि, ओम शब्द के नियमित उच्चारण मात्र से शरीर में मौजूद आत्मा जागृत हो जाती है और रोग एवं तनाव से मुक्ति मिलती है।*


*इसलिए धर्म गुरू ओम का जप करने की सलाह देते हैं। जबकि वास्तुविदों का मानना है कि ओम के प्रयोग से घर में मौजूद वास्तु दोषों को भी दूर किया जा सकता है।*


*ओम मंत्र को ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ओम में त्रिदेवों का वास होता है इसलिए सभी मंत्रों से पहले इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है जैसे*


*ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमः शिवाय।*


*आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि नियमित ओम मंत्र का जप किया जाए तो व्यक्ति का तन मन शुद्घ रहता है और मानसिक शांति मिलती है। ओम मंत्र के जप से मनुष्य ईश्वर के करीब पहुंचता है और मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाता है।*


*वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ३म् ईश्वर का मुख्य नाम है. योग दर्शन में यह स्पष्ट है. यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है. जैसे “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है. “उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म, सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है।*


*“म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और* *पालन करने वाला है. ये तो बहुत थोड़े से उदाहरण हैं जो ओ३म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं. वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ३म् शब्द में ही आ सकते हैं, और किसी में नहीं.*


*१. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है।*


*२. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं!*


*३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।*


*४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है।*


*५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है।*


*६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।*


*७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।*


*८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।*


*९ कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है.*


*इत्यादि!*


*ॐ के उच्चारण का रहस्य?*


*ॐ है एक मात्र मंत्र, यही है आत्मा का संगीत*


*ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।*


*ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।*


*तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।*


*साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।*


*त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :*


*ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है-*

*अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।*


*बीमारी दूर भगाएँ :*

*तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।*


*सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।*


*उच्चारण की विधि :*


*प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।*


*इसके लाभ :*


*इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।*


*शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :*


*प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक'पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरहआल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।*


*कम से कम 108 बार ओम् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव रहित हो जाता है। कुछ ही दिनों पश्चात शरीर में एक नई उर्जा का संचरण होने लगता है। । ओम् का उच्चारण करने से प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियन्त्रण स्थापित होता है। जिसके कारण हमें प्राकृतिक उर्जा मिलती रहती है। ओम् का उच्चारण करने से परिस्थितियों का पूर्वानुमान होने लगता है।*


*ओम् का उच्चारण करने से आपके व्यवहार में शालीनता आयेगी जिससे आपके शत्रु भी मित्र बन जाते है। ओम् का उच्चारण करने से आपके मन में निराशा के भाव उत्पन्न नहीं होते है।*


*आत्म हत्या जैसे विचार भी मन में नहीं आते है। जो बच्चे पढ़ाई में मन नहीं लगाते है या फिर उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है। उन्हें यदि नियमित ओम् का उच्चारण कराया जाये तो उनकी स्मरण शक्ति भी अच्छी हो जायेगी और पढ़ाई में मन भी लगने लगता है ।


        *⚜♥🌿हर हर महादेव🌿♥⚜*

       🌿⚜♥⚜♥💥♥⚜♥⚜🌿 sabhar soniya Singh Facebook wall

Read more

सोमवार, 27 सितंबर 2021

चेतना उच्च शिखर

0

चेतना जब भी उच्च शिखर पर विराजती है तब व्यक्ति ज्योतिर्शिखर के प्रकाश से सम्पूर्णं दिशाओं में  प्रकाश से भर  जाता  है  ।  तब  उन क्षणों  में  वह  🌼 🌼 सम - गुण  🌼🌼 में   तो  जीता  है  बस समबन्ध , बन्धित नहीं होता ।
 🏵  सम-बन्ध  🏵 तो उसे शिखर  से  नीचे  उतर हृदय तल पर आकर समग्र जीवन जीने के लिए अभिनित  करने पड़ते है । जिससे जीवन शुष्क नहीं रस पूर्ण जीया जा सके । तभी जीवन सार्थक जीया जा सकता है । उच्च-शिखर पर जो आनन्द है वह निचले पड़ाव पर लौट आने में कहां ? 
हालाकि निचले पड़ाव पर कभी अनन्द  , कभी विषाद में झूलती  जिन्दगी , सृजन में सहयोगी होती है ।
वहीं उच्च-शिखर पर  व्यक्ति प्रेमपूर्ण  ,  स्वीकार  पूर्ण  तो होता है । कर्ता नहीं ! और जब वह करता होता है तो ! 
भरोसे योग्य नहीं रह जाता है ।
यही परम सत्य है I स्वयं के लिए उच्च शिखर !  
संसार के लिए  सभी तलों का योगदान होता है ! 
होश , जागरण  दोनो  में चाहिये ।  
इनके बिना न स्वयं में , न संसार में आनन्दपूर्ण , सुखमय जीवन जिया जा सकता है !

संसार में तौले जाते हैं कर्म, परमात्मा में तौला जाता है भाव। संसार हिसाब रखता है, क्या तुमने किया; परमात्मा हिसाब रखता है, क्या तुम हो। तो यह भी हो सकता है, तुम मोक्ष में उन लोगों को पाओ, जिनको तुमने पूजा पाठ-में कभी नहीं देखा हो। और तुम नर्क में उन लोगों को पाओ जो सदा  पूजा पाठ का दिखावा ही करते रहे मंदिर में ही जिंदगी गुजारे। संसार तो कृत्य देख सकता है। क्योंकि उतनी गहरी आंख नहीं है, जो भाव को देख ले।

एक संन्यासी हिमालय की यात्रा पर था। और उसने देखा कि एक पहाड़ी लड़की अपने कंधे पर एक बड़े मोटे बच्चे को लेकर पहाड़ चढ़ रही है। लड़की की उम्र मुश्किल से नौ साल होगी। और बच्चा बड़ा तगड़ा है। कम से कम चार साल का होगा। और भारी वजन। और संन्यासी भी थक गया है। गर्मी है, धूप तेज है, पसीना-पसीना हो रहा है। वह भी अपने कंधे पर अपना थोड़ा बहुत जो भी बिस्तर सामान है, वह बांधे हुए है। लड़की के करीब पहुंच कर उसने उस लड़की को कहा, ‘बेटी, वजन बहुत है, थक गई होगी।’ और पसीना-पसीना बह रहा है उस लड़की को। उस लड़की ने ऊपर देखा और कहा, ‘स्वामी जी, वजन आप लिए हैं। यह मेरा छोटा भाई है।’

तराजू पर कोई फर्क पड़ेगा, बिस्तर में और छोटे भाई में? तराजू बराबर वजन बता देगा। अगर तुम बाहर ही बाहर देखते हो तो तुम्हारी स्थिति तराजू से ज्यादा नहीं है। उस संन्यासी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उस लड़की ने मुझे चौंका दिया। जब उसने कहा कि स्वामी जी, वजन आप लिए हैं; यह मेरा छोटा भाई है। छोटे भाई में कैसा वजन। वजन तो होता ही है, लेकिन भाव वजन को काट देता है।

तुम्हारा उठना-बैठना, तुम्हारा चलना-फिरना, तुम्हारा भोजन, तुम्हारा सोना, यह सब ऊपर के कृत्य हैं। और हर कृत्य से तुम्हारी आत्मा बाहर झांकती है। तुम देखना; कृत्य का बहुत हिसाब मत रखना, भाव का हिसाब रखना। और अगर भाव का हिसाब साफ होने लगा तो तुम पाओगे, कृत्य बदलने लगे। उनमें से नकल खो जायेगी और प्रामाणिकता आ जायेगी। और तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर के प्रकाश ने तुम्हारे बाहर के कृत्यों को आच्छादित कर दिया। और तब तुम पाओगे कि उनका गुणधर्म और हो गया। उनका मूल्य ही और हो गया। सदगुरु कोई बहुत बड़े-बड़े कृत्य नहीं करता।

झेन फकीर रिंझाई से किसी ने पूछा कि आप क्या करते हैं? तो उसने कहा, ‘जब मुझे भूख लगती है मैं भोजन कर लेता हूं। और जब नींद आती है तब सो जाता हूं। और कुछ विशेष नहीं।’ तो उस आदमी ने कहा, ‘यह तो हम सभी करते हैं।’ रिंझाई हंसने लगा और उसने कहा, ‘काश, इतना सभी करते तो मोक्ष दूर कहां!’

तुम नहीं करते; तुम्हें खयाल है। क्योंकि जब तुम भोजन करते हो, तब तुम हजार काम और भी कर रहे हो। मन कहीं और है, प्राण कहीं और हैं; भोजन तो तुम किसी तरह कर रहे हो। वह तुम्हारी प्रार्थना नहीं है। जब तुम सो रहे हो, तब तुम सिर्फ सोते हो? तुम कितनी यात्रायें करते हो। कितने सपने हैं!

रिंझाई कह रहा है कि जब मैं सोता हूं, तब सिर्फ सोता हूं। जब भोजन करता हूं, तब सिर्फ भोजना करता हूं। मेरे होने और मेरे कृत्य में एकता है। मैं इकाई हूं, अद्वैत हूं। जो भी हो रहा है, वह मेरी समग्रता से, मेरी पूर्णता से हो रहा है। जब भूख लगी है, तो मैं भोजन कर रहा हूं। वह मेरी पूर्णता वहां संलग्न है। मेरे पीछे कुछ भी नहीं बचा है जो अलग खड़ा होगा। और जब मैं सो रहा हूं, तो मैं पूरा सो रहा हूं। फिर मेरे पीछे कोई नहीं बचा है, जो सपने देख रहा हो। मेरा पूरा जीवन, मेरी पूरी आत्मा, एक-एक कृत्य में अपनी समग्रता से प्रविष्ट है।

यही तो जीवन-मुक्त का लक्षण है। तब वह किसी भी क्षण मर जाये, तो पश्चात्ताप नहीं है। क्योंकि सब पूरा है। सदा पूरा है। वह ठीक से रात सो लिया था, सुबह उसने ठीक से भोजन कर लिया था; करने को कुछ बचा नहीं था। हर कृत्य पूरा होता जाता है अगर तुम पूरे उसमें हो। अगर तुम पूरे उसमें नहीं हो, तो तुम्हारा कोई कृत्य पूरा नहीं है। सब अधूरा है। तुम्हारी जिंदगी अधूरे-कृत्यों का जोड़ है। और वे अधूरे-कृत्य तुम्हारा पीछा करते हैं।

💥दीया तले अंधेरा💥

Shri Guru ji sabhar satsangh Facebook wall

Read more

तंत्र और जप साधन

0

{{{ॐ}}}

                                                                #

मंत्र साधन के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए अथवा  सर्व प्रकार की सिद्धि के लिए विद्वान महर्षियों ने जप को एक बहुत ही उत्तम साधन माना है उन्होने ने तीन प्रकार के जपो का वर्णन किया है:----१,मानस जप । २वाचिक जप ।३ उपांशु जप ।
१:- मानसजप--जिस जप में मंत्र की अक्षर- पंक्ति के एक वर्ण से दुसरे वर्ण, एक पद से दुसरे पद तथा शब्द और अर्थ का मन द्वारा बार बार मात्र चिंतन होता है उसे मानस जप  कहते है । यह सिद्धि और साधना की उच्चकोटि का जप कहलाता है ।
२:-- वाचिकजप  जप करने वाला जब उंचे नीचे स्वर से  स्पष्ट तथा अस्पष्ट पद व अक्षरों के साथ मंत्र बोलकर पाठ किया जाता है तो उसे वाचिकजप कहते है ।
३:--,उपांशुजप जिसे केवल जिह्वां हिलती है अथवा इतने मद्धिम स्वर  मे जप होता है जिसे कोई सुन न सके उसे उपांशुजप कहा जाता है इसे मद्धम प्रकार का जप माना गया है।
 कुछ महर्षियों ने दो प्रकार के जपो का और भी वर्णन किया है:----१:- सगर्भजप और अगर्भजप सगर्भजप तो प्राणायाम के साथ किया जाता है और जप के प्रारंभ और अंत में प्राणायाम  किया जाए तो उसे अगर्भजप कहते है इसमे प्राणायाम और जप एक दुसरे के पुर्वक होते है ।
विशेष मंत्रों का प्रयोग मंत्र साधना मे तो किया ही जाता है तंत्र और यंत्रो मे भी उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है ।

मंत्र विशारदों का मत है कि वाचिकजप एक गुना फल प्रदान करता है उपांशुजप सौ गुना फल प्रदान करता है और मानसजप हजार गुना फल प्रदान करता है तथा सगर्भजप को मानसजप से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है
नये साधको को मानस अथवा उपांशुजप पर ही अधिक प्रयास करना चाहिए
शास्त्रो मे मुख्यत १३ प्रकार के जपो का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार के है
रेचकजप:--नाक के नथुनों से श्वास को बहार निकालते हुए जो जप किया जाता है उसे रेचकजप कहा जाता है ।

पूरकजप:---नाक से श्वास को भीतर लेते हुए जो जप किया जाए उसे पूरकजप कहा जाता है ।

कुभंकजप:--श्वास को भीतर स्थिर करके जो जप किया जाता है वो कुभंकजप माना जाता है
सात्त्विकजप:-- ,शान्तिकर्म के लिए जो जप किया जाता है उसे सात्त्विकजप कहते है
राजसिकजप:- वशीकरण आदि के लिए किए जीने वाले जव को राजसिक जप करते है ।
तामसिकजप:-- उच्चाटन और मारण आदि क्रियाओं के लिए किया जाने वाला जप तामसिकजप कहा जाता है ।
तत्त्वजप, स्थिरकृतिजप, ध्येयक्यजप, स्मृतिजप, ध्यानजप, हक्काजप, व नादजप का वर्णन भी है

Read more

रविवार, 26 सितंबर 2021

उम्र और यौवन का वैदिक विज्ञान

0



**************************************

प्रश्वास की उचित विधि मनुष्य को न केवल स्वस्थ, सुंदर और
दीर्घजीवी बनाती है बल्कि ईश्वरानुभूति तक करा सकती है।
सदा युवा बने रहने और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए
सांसों पर संयम जरूरी है। श्वास की गति का संबंध मन से जुड़ा है।

मनुष्य के दोनों नासिका छिद्रों से एक साथ श्वास-प्रश्वास
कभी नहीं चलती है। कभी वह बाएं तो कभी दाएं नासिका
छिद्र से सांस लेता और छोड़ता है। बाएं नासिका छिद्र में इडा
यानी चंद्र नाडी और दाएं नासिका छिद्र में पिंगला यानी
सूर्य नाड़ी स्थित है। इनके अलावा एक सुषुम्ना नाड़ी भी
होती है जिससे सांस प्राणायाम और ध्यान विधियों से ही
प्रवाहित होती है।

शिवस्वरोदय ज्ञान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रत्येक एक घंटे
के बाद यह श्वास नासिका छिद्रों में परिवर्तित होता रहता
है। 

कबहु डडा स्वर चलत है कभी पिंगला माही।
सुष्मण इनके बीच बहत है गुर बिन जाने नाही।।

योगियों का कहना है कि चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास
प्रवाहित होने पर वह मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है।
चंद्र नाड़ी से ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब सूर्य
नाड़ी से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होता है तो शरीर को
उष्मा प्राप्त होती है यानी गर्मी पैदा होती है। सूर्य नाड़ी से
धनात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है।

प्राय: मनुष्य उतनी गहरी सांस नहीं लेता और छोड़ता है जितनी एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए जरूरी होती है। प्राणायाम मनुष्य को वह तरीका बताता है जिससे मनुष्य ज्यादा गहरी और लंबी सांस ले और छोड़ सकता है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि से दोनों नासिका छिद्रों से बारी-बारी से वायु को भरा और छोड़ी जाता है। अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आ जाता है जब चंद्र और सूर्य नाड़ी से समान रूप से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होने लगता है। उस अल्पकाल में सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है।

प्राणायाम का मतलब है- प्राणों का विस्तार। दीर्घ श्वास-
प्रश्वास से प्राणों का विस्तार होता है। एक स्वस्थ मनुष्य को
एक मिनट में 15 बार सांस लेनी चाहिए। इस तरह एक घंटे में उसके श्वासों की संख्या 900 और 24 घंटे में 21600 होनी चाहिए। स्वर विज्ञान के अनुसार चंद्र और सूर्य नाड़ी से श्वास-प्रश्वास के जरिए कई तरह के रोगों को ठीक किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास को
प्रवाहित किया जाए तो रक्तचाप, हाई ब्लड प्रेशर सामान्य
हो जाता है।

आज बस इतना ही ....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

Read more

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

ध्वनि का विज्ञान

0



**************************************

"एकः शब्द: सम्यग्ज्ञात: संप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुग भवति"।

अर्थात-
'एक ही शब्द के पूर्ण ज्ञान और सम्यक प्रयोग से लौकिक और पारलौकिक दोनों फलों की प्राप्ति सम्भव है'।यही वैदिक ज्ञान का रहस्य है। 

जैसा कि हमें ज्ञात होना चाहिए कि कोई भी ध्वनि सदा विशुद्ध नहीं रहती। यौगिक क्रिया और श्वास-प्रश्वास से ही उसमें शुद्धता लायी जा सकती है। इस शुद्धिकरण के बाद ज्ञान की उपलब्धि स्वतः होने लगती है। उसमें विशेष ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। शब्द के माध्यम से साधक या योगी के हाथ एक नैसर्गिक शक्ति लग जाती है और वह नैसर्गिक गुणों से परिपूर्ण हो शक्तिशाली बन जाता है। 

ऋषियों ने स्पष्टरूप से कहा है कि वेद ब्राह्मण में अंतर्भूत आध्यात्मिक शक्ति के सार हैं। वेद में गायत्री मन्त्र का अपना विशेष महत्व है। वैदिक ब्राह्मण को संस्कार, उपनयन या शुद्धिकरण के समय सर्वप्रथम गायत्री मंत्र ही गुरु द्वारा प्रदान किया जाता है।

वैदिक साहित्य में 'भू: का अर्थ निम्नतम मेखला (भूमि) तथा 'स्व:' का उच्चतम यानी निराकार लोक और इन दोनों के मध्य स्थित 'भुव:' अर्थात अंतरिक्ष। यद्यपि भू:, भुव: तथा स्व: विभिन्न लोकों के रूप में जाना गया है (पृथ्वी लोक, भुवर्लोक यानी प्रेतलोक और स्वर्गलोक) लेकिन वास्तव में यदि देखा जाय तो ये तीनों 'भूमण्डल' के अंतर्गत ही माने जाते हैं। 

तीनों लोक एक दूसरे से दूध-पानी की तरह से मिले हुए हैं। निम्न लोक यानी पृथ्वी का सार स्वयं प्रकाश रूप में प्रकट होता है जिसे 'अग्नि' कहा जाता है। आध्यात्मिक उत्थान की सारी विधि जिसे वैदिक वाणी में 'क्रतु' यानी यज्ञ कहा गया है, इसी पवित्र और गुप्त अग्नि के जलने के साथ आरम्भ हुई। जिसे अग्नि उत्पन्न करती है, जिसे तंत्र और योग कुण्डलिनी में उद्दीपन उत्पन्न करना कहा गया है। जब अग्नि पृथ्वी पर विस्तृत हो जाती है, तब वह संस्कृत (शुद्ध ध्वनि) होने लगती है। तत्पश्चात वह प्रकाश का सत्य धारण करती है और अंतरिक्ष का सार बन जाती है। इसे कहते हैं पूर्णरूप से परिमार्जित हो जाने पर वह 'दिव्य दीप्ति' का रूप धारण कर लेती है जिसे 'रवि' कहते हैं। तब ये तीनों तरह के प्रकाश जो उपर्युक्त लोकों के सार हैं, एकोभूत होकर दिव्य प्रकाश हो जाते हैं जिसे 'वेद' कहते हैं। इसलिए संस्कृत को 'देववाणी' और 'वेद' को 'देवग्रंथ' कहा गया है। वैदिक धर्म में उपनयन के बाद ही ब्राह्मण वेदविद्या अध्ययन के लिए योग्य माना जाता था।

सोलह संस्कारों में उपनयन का महत्व बहुत अधिक है। देखा जाए तो उपनयन आध्यात्मिक पुनर्जन्म है। पहले जन्म में अस्तित्व की शुद्धता बाह्य रूप से होती है। दूसरे जन्म का मतलब है कि गहरे आंतरिक स्तर पर जन्म लेना यानी उपनयन संस्कार से मनुष्य का दूसरा जन्म माना जाता है। उपनयन संस्कार में जो गायत्री मंत्र है, उसमें सविता (सूर्य ) की प्रार्थना की गई है जो सृष्टि का मूल उद्गम है और जो प्रकाश और जीवन का स्रोत है। दिव्यता ईश्वर की प्रकृति का सबसे प्रमुख आविर्भाव है। जो दैवीय प्रकाश को देदीप्यमान महिमा के रूप में ध्यान करते हैं और जो हमारी आत्मिक दिव्यता को पूर्ण करे। 

एक और विचारणीय प्रश्न है ?

हमारे ऋषियों ने कैसे वेदों की रक्षा की और उनका मूल स्वरूप आज भी हज़ारों वर्षों से वही अपने मूल रूप में विद्यमान है। हिन्दू धर्म के लिए वेद इतना महत्वशाली होने के कारण आर्ष ऋषियों ने इसकी पूर्ण रक्षा हेतु ऐसे सूत्र का निर्माण किया जो अपने आप में कम महत्व नहीं रखता। इतने दीर्घ काल से वेद का एक भी अक्षर विकृत नहीं हुआ। आज भी हमारे वेद- पाठियों के मुख वेदों का सस्वर उच्चारण उसी प्रकार से शुद्ध रूप से सुना जा सकता है, जैसा यह प्राचीन वैदिक युग में था। इसके आठ सूत्रों की व्यवस्था की गई थी। इन सूत्रों के कारण वेद का पद क्रमोच्चरण तथा विलोक उच्चारण में अनेक बार आता है जिसके रूप ज्ञान में किसी भी प्रकार की त्रुटि की संभावना नहीं है।

आज बस इतना ही .....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन sabhar Facebook wall sat sangh

Read more

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो पर किया अनिल अनुसंधान )

0



■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि  = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय  = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं ।*
*यह आपको पसंद आया हो तो अपने बन्धुओं को भी शेयर जरूर कर अनुग्रहित अवश्य करें यह संस्कार का कुछ हिस्सा हैं 🌷 💐*

Read more

बुधवार, 22 सितंबर 2021

ध्यान के प्रकार

0


********************************************
आपने आसन और प्राणायाम के प्रकार जाने हैं, लेकिन ध्यान के प्रकार बहुत कम लोग ही जानते हैं। निश्चित ही ध्यान को प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा के अनुसार ढाला गया है।

मूलत: ध्यान को चार भागों में बांटा जा सकता है– 1.देखना, 2.सुनना, 3.श्वास लेना और 4.आंखें बंदकर मौन होकर सोच पर ध्‍यान देना। देखने को दृष्टा या साक्षी ध्यान, सुनने को श्रवण ध्यान, श्वास लेने को प्राणायाम ध्यान और आंखें बंदकर सोच पर ध्यान देने को भृकुटी ध्यान कह सकते हैं। उक्त चार तरह के ध्यान के हजारों उप प्रकार हो सकते हैं।

उक्त चारों तरह का ध्यान आप लेटकर, बैठकर, खड़े रहकर और चलते-चलते भी कर सकते हैं। उक्त तरीकों को में ही ढलकर योग और हिन्दू धर्म में ध्यान के हजारों प्रकार बताएं गए हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा अनुसार हैं। भगवान शंकर ने मां पार्वती को ध्यान के 112 प्रकार बताए थे जो ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ में संग्रहित हैं।

देखना : ऐसे लाखों लोग हैं जो देखकर ही सिद्धि तथा मोक्ष के मार्ग चले गए। इसे दृष्टा भाव या साक्षी भाव में ठहरना कहते हैं। आप देखते जरूर हैं, लेकिन वर्तमान में नहीं देख पाते हैं। आपके ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पना आपको वर्तमान से काटकर रखते हैं। बोधपूर्वक अर्थात होशपूर्वक वर्तमान को देखना और समझना (सोचना नहीं) ही साक्षी या दृष्टा ध्यान है।

सुनना : सुनकर श्रवण बनने वाले बहुत है। कहते हैं कि सुनकर ही सुन्नत नसीब हुई। सुनना बहुत कठीन है। सुने ध्यान पूर्वक पास और दूर से आने वाली आवाजें। आंख और कान बंदकर सुने भीतर से उत्पन्न होने वाली आवाजें। जब यह सुनना गहरा होता जाता है तब धीरे-धीरे सुनाई देने लगता है- नाद। अर्थात ॐ का स्वर।

श्वास पर ध्यान : बंद आंखों से भीतर और बाहर गहरी सांस लें, बलपूर्वक दबाब डाले बिना यथासंभव गहरी सांस लें, आती-जाती सांस के प्रति होशपूर्ण और सजग रहे। बस यही प्राणायाम ध्यान की सरलतम और प्राथमिक विधि है।

भृकुटी ध्यान : आंखें बंद करके दोनों भोओं के बीच स्थित भृकुटी पर ध्यान लगाकर पूर्णत: बाहर और भीतर से मौन रहकर भीतरी शांति का अनुभव करना। होशपूर्वक अंधकार को देखते रहना ही भृकुटी ध्यान है। कुछ दिनों बाद इसी अंधकार में से ज्योति का प्रकटन होता है। पहले काली, फिर पीली और बाद में सफेद होती हुई नीली।

अब हम ध्यान के पारंपरिक प्रकार की बात करते हैं। यह ध्यान तीन प्रकार का होता है- 1.स्थूल ध्यान, 2.ज्योतिर्ध्यान और 3.सूक्ष्म ध्यान।

1.स्थूल ध्यान- स्थूल चीजों के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते हैं- जैसे सिद्धासन में बैठकर आंख बंदकर किसी देवता, मूर्ति, प्रकृति या शरीर के भीतर स्थित हृदय चक्र पर ध्यान देना ही स्थूल ध्यान है। इस ध्यान में कल्पना का महत्व है।

2.ज्योतिर्ध्यान– मूलाधार और लिंगमूल के मध्य स्थान में कुंडलिनी सर्पाकार में स्थित है। इस स्थान पर ज्योतिरूप ब्रह्म का ध्यान करना ही ज्योतिर्ध्यान है।

3.सूक्ष्म ध्यान– साधक सांभवी मुद्रा का अनुष्ठान करते हुए कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

ध्यान के चमत्कारिक अनुभव
ध्यान के अनुभव निराले हैं। जब मन मरता है तो वह खुद को बचाने के लिए पूरे प्रयास करता है। जब विचार बंद होने लगते हैं तो मस्तिष्क ढेर सारे विचारों को प्रस्तुत करने लगता है। जो लोग ध्यान के साथ सतत ईमानदारी से रहते हैं वह मन और मस्तिष्क के बहकावे में नहीं आते हैं, लेकिन जो बहकावे में आ जाते हैं वह कभी ध्यानी नहीं बन सकते।

प्रत्येक ध्यानी को ध्यान के अलग-अलग अनुभव होते हैं। यह उसकी शारीरिक रचना और मानसिक बनावट पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में क‍िस तरह के अनुभव होंगे। लेकिन ध्यान के एक निश्चित स्तर पर जाने के बाद सभी के अनुभव लगभग समान होने लगते हैं।

शुरुआती अनुभव : शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।

यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृष्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।

कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है। नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है। पीला रंग जीवात्मा का प्रकाश है। इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण भी माना जाता है।

इसका लाभ : कुछ दिनों बाद इसका पहला लाभ यह मिलता है कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क से तनाव और चिंता हट जाती है और वह शांति का अनुभव करता है। इसके साथ ही मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे वह असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेता है। ऐसा व्यक्ति भूत और भविष्य की कल्पनाओं में नहीं जिता।

दूसरा लाभ यह कि लगातार भृकुटी पर ध्यान लगाते रहने से कुछ माह बाद व्यक्ति को भूत, भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि उसकी छटी इंद्री जाग्रत होने लगी है और अब उसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। यदि आगे प्रगति करना है तो ऐसे व्यक्ति को लोगो से अपने संपर्क समाप्त करने की हिदायत दी जाती है, लेकिन जो व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है उसे योगभ्रष्ट कहा जाता है।

कैसे करें ध्यान की तैयारी
यदि आपने ध्यान करने का पक्का मन बना ही लिया है और इसे नियमित करने का संकल्प ले ही लिया है तो फिर आप अब ध्यान की तैयारी करें। इससे कहले हम ‘ध्यान की शुरुआत’ और ‘कैसे करें ध्यना’ पर लिख चुके हैं। नीचे इस संबंध में लिंक देखें। यहां प्रस्तुत है ध्यान की तैयारी के संबंध में सामान्य जानकारी।

बेहतर स्थान : ध्यान की तैयारी से पूर्व आपको ध्यान करने के स्‍थान का चयन करना चाहिए। ऐसा स्थान जहां शांति हो और बाहर का शोरगुल सुनाई न देता हो। साथ ही वह खुला हुआ और हरा-भरा हो। आप ऐसा माहौल अपने एक रूम में भी बना सकते हो।
जरूरी यह है कि आप शोरगुल और दम घोंटू वातावरण से बचे और शांति तथा सकून देने वाले वातारवण में रहे जहां मन भटकता न हो। यदि यह सब नहीं हैं तो ध्यान किसी ऐसे बंद कमरे में भी कर सकते हैं जहां उमस और मच्छर नहीं हो बल्कि ठंडक हो और वातावरण साफ हो। आप मच्छरदारी और एक्झास फेन का स्तेमाल भी कर सकते हैं।

वातावण हो सुगंधित : सुगंधित वातावरण को ध्यान की तैयारी में शामिल किया जाना चाहिए। इसके लिए सुगंध या इत्र का इस्तेमाल कर सकते हैं या थोड़े से गुड़ में घी तथा कपूर मिलाकर कंडे पर जला दें कुछ देर में ही वातावरण ध्यान लायक बन जाएगा।
ध्यान की बैठक : ध्यान के लिए नर्म और मुलायम आसान होना चाहिए जिस पर बैठकर आराम और सूकुन का अनुभव हो। बहुत देर तक बैठे रहने के बाद भी थकान या अकड़न महसूस न हो। इसके लिए भूमि पर नर्म आसन बिछाकर दीवार के सहारे पीठ टिकाकर भी बैठ सकते हैं अथवा पीछे से सहारा देने वाली आराम कुर्सी पर बैठकर भी ध्यान कर सकते हैं।
आसन में बैठने का तरीका ध्यान में काफी महत्व रखता रखता है। ध्यान की क्रिया में हमेशा सीधा तनकर बैठना चाहिए। दोनों पैर एक दूसरे पर क्रास की तरह होना चाहिए या आप सिद्धासन में भी बैठ सकते हैं।

4.समय : ध्यान के लिए एक निश्चित समय बना लेना चाहिए इससे कुछ दिनों के अभ्यास से यह दैनिक क्रिया में शामिल हो जाता है फलत ध्यान लगाना आसान हो जाता है।

सावधानी : ध्यान में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस क्रिया में किसी प्रकार का तनाव नहीं हो और आपकी आंखें बंद, स्थिर और शांत हों तथा ध्यान भृकुटी पर रखें। खास बात की आप ध्यान में सोएं नहीं बल्कि साक्षी भाव में रहें।

अज्ञात

Read more

शिवलिंग कोई साधारण (मूर्ती) नहीं है पूरा विज्ञान है

0



शिवलिंग में विराजते हैं तीनों देव:---
सबसे निचला हिस्सा जो नीचे टिका होता है वह ब्रह्म है, दूसरा बीच का हिस्सा वह भगवान विष्णु का प्रतिरूप और तीसरा शीर्ष सबसे ऊपर जिसकी पूजा की जाती है वह देवा दी देव महादेव का प्रतीक है, शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है तथा अन्य मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग का निचला नाली नुमा भाग माता पार्वती को समर्पित तथा प्रतीक के रूप में पूजनीय है....अर्थात शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है। अन्य मान्यता के अनुसार, शिवलिंग का निचला हिस्सा स्त्री और ऊपरी हिस्सा पुरुष का प्रतीक होता है। अर्थता इसमें शिव और शक्ति, एक साथ में वास करते हैं।

▪️ #शिवलिंग_का_अर्थ: 
शास्त्रों के अनुसार 'लिंगम' शब्द 'लिया' और 'गम्य' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ 'शुरुआत' व 'अंत' होता है। तमाम हिंदू धर्म के ग्रंथों में इस बात का वर्णन किया गया है कि शिव जी से ही ब्रह्मांड का प्राकट्य हुआ है और एक दिन सब उन्हीं में ही मिल जाएगा।

▪️ #शिवलिंग_में_विराजते_त्रिदेव: 
हम में लगभग लोग यही जानते हैं कि शिवलिंग में शिव जी का वास है। परंतु क्या आप जानते हैं इसमें तीनों देवताओं का वास है। कहा जाता है शिवलिंग को तीन भागों में बांटा जा सकता है। सबसे निचला हिस्सा जो नीचे टिका होता है, दूसरा बीच का हिस्सा और तीसरा शीर्ष सबसे ऊपर जिसकी पूजा की जाती है।

निचला हिस्सा ब्रह्मा जी ( सृष्टि के रचयिता ), मध्य भाग विष्णु ( सृष्टि के पालनहार ) और ऊपरी भाग भगवान शिव ( सृष्टि के विनाशक ) हैं। अर्थात शिवलिंग के जरिए ही त्रिदेव की आराधना हो जाती है। तो वहीं अन्य मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग का निचला हिस्सा स्त्री और ऊपरी हिस्सा पुरुष का प्रतीक होता है। अर्थता इसमें शिव-शक्ति, एक साथ वास करते हैं।

▪️ #शिवलिंग_की_अंडाकार_संरचना
कहा जाता है शिवलिंग के अंडाकार के पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक, दोनों कारण है। अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो शिव ब्रह्मांड के निर्माण की जड़ हैं। अर्थात शिव ही वो बीज हैं, जिससे पूरा संसार उपजा है। इसलिए कहा जाता है यही कारण है कि शिवलिंग का आकार अंडे जैसा है। वहीं अगर वैज्ञानिक दृष्टि से बात करें तो 'बिग बैंग थ्योरी' कहती है कि ब्रह्मांड का निमार्ण अंडे जैसे छोटे कण से हुआ है। शिवलिंग के आकार को इसी अंडे के साथ जोड़कर देखा जाता है।

🚩🚩🔱🔱🔱 ॐ नम:शिवाय: 🔱🔱🔱🚩🚩

दिनांक - १८.०९.२०२१
---#राज_सिंह---

Read more

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

क्या हैआदि शंकराचार्य कृत दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्( Dakshinamurti Stotram) का महत्व

0

?
1-दक्षिणामूर्ति स्तोत्र ;-

02 FACTS;-

दक्षिणा मूर्ति स्तोत्र मुख्य रूप से गुरु की वंदना है। श्रीदक्षिणा मूर्ति परमात्मस्वरूप शंकर जी हैं जो ऋषि मुनियों को उपदेश देने के लिए कैलाश पर्वत पर दक्षिणाभिमुख होकर विराजमान हैं। वहीं से चलती हुई वेदांत ज्ञान की परम्परा आज तक चली आ रही  हैं।व्यास, शुक्र, गौड़पाद, शंकर, सुरेश्वर आदि परम पूजनीय गुरुगण उसी परम्परा की कड़ी हैं। उनकी वंदना में यह स्त्रोत समर्पित है।भगवान् शिव को गुरु स्वरुप में दक्षिणामूर्ति  कहा गया है, दक्षिणामूर्ति ( Dakshinamurti ) अर्थात दक्षिण की ओर मुख किये हुए शिव इस रूप में योग, संगीत और तर्क का ज्ञान प्रदान करते हैं और शास्त्रों की व्याख्या करते हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी साधक को गुरु की प्राप्ति न हो, तो वह भगवान् दक्षिणामूर्ति को अपना गुरु मान सकता है, कुछ समय बाद उसके योग्य होने पर उसे आत्मज्ञानी गुरु की प्राप्ति होती है। 

2-गुरुवार (बृहस्पतिवार) का दिन किसी भी प्रकार के शैक्षिक आरम्भ के लिए शुभ होता है, इस दिन सर्वप्रथम भगवान् दक्षिणामूर्ति की वंदना करना चाहिए।दक्षिणामूर्ति हिंदू भगवान शिव का एक अंश है जो सभी प्रकार के ज्ञान के गुरु हैं। परमगुरु के प्रति समर्पित भगवान परमाशिव का यह अंश परम जागरूकता, समझ और ज्ञान के रूप में उनका व्यक्तित्व है।यह रूप शिव को योग, संगीत और ज्ञान के शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है, और शास्त्रों पर प्रतिपादक देता है। उनकी पूजा इस रूप में की जाती है। ज्ञान के देवता, पूर्ण और पुरस्कृत ध्यान।आदि शंकराचार्य ने बहुत सारे महान स्तोत्र (प्रार्थना) लिखे हैं, लेकिन यहां एक अनोखी प्रार्थना है, जो न केवल एक प्रार्थना है, बल्कि उन सभी दर्शन का सारांश है जो उन्होंने सिखाया है। अपने समय के दौरान भी, इस स्तोत्र को समझना मुश्किल था और उनके एक शिष्य के लिए यह आवश्यक हो गया, सुरेश्वराचार्यो ने इस स्तोत्र को मानसोलासा नामक एक टीका लिखी।

आदि शंकराचार्य का दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्;-

ध्यानम्;- 

मौन व्याख्या प्रकटित परब्रह्म तत्त्वं युवानं। वर्षिष्ठांते वसद् ऋषिगणैः आवृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।। 

आचार्येन्द्रं कर कलित चिन्मुद्रमानंद रुपम । स्वात्मारामं मुदित वदनं दक्षिणामूर्ति मीडे ।1। 

जिनकी मौन व्याख्या उनके शिष्यों के हृदय में परम ब्रह्म के ज्ञान को जागृत कर रही है, जो युवा हैं तथापि (फिर भी) ब्रह्म में लीन वृद्ध ऋषियों से घिरे हुए हैं [अर्थात वृद्ध ऋषि जिनके शिष्य हैं], जिन ब्रह्म ज्ञान के सर्वोच्च आचार्य के हाथ चिन्मुद्रा (ऊपर फोटो में देखें) में हैं, जिनकी स्थिर और आनंदमय है, जो स्वयं में आनन्दमय हैं यह उनके मुख से प्रतीत होता है; उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।। 

वटविटपि समीपे भूमिभागे निषण्णं। सकल मुनि जनानां ज्ञान दाता रमारात्।। 

त्रिभुवन-गुरुमीशं दक्षिणामूर्ति देवं। जनन मरण दुः खच्छेद दक्षं नमामि ।2। 

 जो वटवृक्ष (बरगद) के नीचे भूमि पर बैठे हैं, जिन ज्ञानदाता के समीप सभी मुनि जन बैठे हैं, जो दक्षिणामूर्ति तीनों लोकों के गुरु हैं, उन जन्म-मरण के दुः ख से भरे चक्र को नष्ट करने वाले देव को नमन करता हूँ ।। 

चित्रं वट तरोर्मूले वृद्धाः शिष्या गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं; शिष्या स्तुच्छिन्न संशयाः ।3। 

वास्तव में यह विचित्र है कि वट वृक्ष की जड़ पर वृद्ध शिष्य (ऋषिगण) अपने युवा गुरु (शिव) के समक्ष बैठे हुए हैं, और गुरु का मौन व्याख्यान उन शिष्यों के संशय (doubts) को दूर कर रहा है।

।। निधये सर्व विद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् । गुरवे सर्व लोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ।4। 

जो सभी विद्याओं के निधान (भण्डार) हैं, संसार के सभी रोगों के उपचारक [औषधि] हैं, उन सभी लोकों के गुरु श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्ध ज्ञानैक मूर्तये। निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ।5। 

ॐ, जो प्रणव (ॐ) और शुद्ध अद्वैत (Non-Dual) ज्ञान के मूर्त-रूप हैं, उन्हें नमस्कार है, निर्मल और शान्ति समाहित (जो शान्ति से परिपूर्ण हो ऐसे) श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। चिद्घनाय महेशाय; वटमूल निवासिने । सच्चिदानन्द रूपाय दक्षिणामूर्तये नमः ।6। 

सघन चेतना के रूप को, महा-ईश्वर (महादेव) को, वटवृक्ष (बरगद) के मूल पर निवास करने वाले, सत-चित-आनंद (Existence, Consciousness, Bliss) के मूर्त रूप को, श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

।। ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्ति भेद विभागिने । व्योम वद् व्याप्त देहाय; दक्षिणामूर्तये नमः ।7। 

ईश्वर, गुरु, और आत्मन्- इन तीनों विभिन्न रूपों में जो आकाश (आध्यात्मिक आकाश या चिदाकाश) की तरह जो व्याप्त हैं, उन दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।

 स्तोत्रम्;-

 1- विश्वं दर्पण दृश्यमान नगरी ..तुल्यं निजान्तर्गतं। पश्यन्नात्मनि मायया बहिरि वोद्भूतं यथा निद्रया ।। 

यः साक्षात्कुरुते प्रबोध समये स्वात्मान मेवाद्वयं। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।1। 

स्वयं के अंतर्मन में देखने पर सम्पूर्ण विश्व एक दर्पण (mirror) में बसे नगर के समान है, अपने आत्मन के भीतर से देखने पर (नींदनीं के स्वप्न की तरह, माया से बना) यह बाहरी संसार आत्मन की आध्यात्मिक जागृति के समय, स्वयं अद्वैत आत्मन के भीतर साक्षात दिखाई देता है, अपने गहन मौन से इस ज्ञान को जागृत करने वाले उन गुरु रूप श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है।। 

NOTE;-

उपर्युक्त श्लोक हमें बताता है कि जो दुनिया हमारे बाहर है वह हमारी आत्मा के समान है लेकिन हम उन्हें अज्ञानता के घूंघट के कारण अलग-अलग संस्थाओं के रूप में देखते हैं। जैसे ही हम जागते हैं, हम महसूस करते हैं कि सपना झूठा है और यहां तक कि दर्पण में हमारी छवि को देखते हुए, हम जानते हैं कि हम हमें दर्पण में नहीं बल्कि हमारी छवि देख रहे हैं। जब हम गुरु से ज्ञान प्राप्त करते हैं तो हम अज्ञान के घूंघट के बिना जाग्रत अवस्था में होते हैं। 

2-बीज अस्याऽन्तरि वाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्ग निर्विकल्पं पुनः । माया कल्पित देशकाल कलना वैचित्र्य चित्रीकृतम् ।। 

मायावीव विजृम्भ यत्यपि महा ..योगी व यः स्वेच्छया। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये ..नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।2। 

यह जगत जो बीज के अन्दर स्थित अंकुर की भांति है, यह माया के द्वारा रचित आकाश (space) और समय से मिलकर बार-बार अनेकों रूपों में जन्म लेता है। वे महायोगी जो एक मायावी की भांति अपनी इच्छा मात्र से इस जगत की गतियों को नियंत्रित करते हैं, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ

 3-यस्यैव स्फुरणं सदात्मकम सत्कल्पार्थकं भासते। साक्षा त्तत्त्वमसीति वेद वचसा.. यो बोध यत्याश्रितान् ।। 

यत्साक्षात्करणा अंद्भवेन्न पुनरावृत्ति र्भवाम्भोनिधौ। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।3। 

जिनका स्पंदन (फड़क, गति) ही सत-चित-आनंद की प्रकृति को दर्शाता है, जिनका वास्तविक रूप एक आभासी (अवास्तविक) रचना लगता है, जो अपने आश्रितों को साक्षात ही तत्-त्वम-असि का वेद वचन सुनाते हैं। जिनका साक्षात ज्ञान प्राप्त कर व्यक्ति फिर कभी जन्म और मृत्यु के समुद्र में नही फंसता, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।।  

4-नानाच्छिद्र घटोदर-स्थित महादीप-प्रभा भास्वरं। ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण-द्वारा वहिः स्पन्दते ।। 

जानामीति तमेव भान्तमनु भात्ये तत्समस्तं जगत्। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।4।  

जिस प्रकार कई छिद्रों वाले बर्तन में रखे एक चमकते दीपक की रोशनी उस बर्तन के बाहर से चमकती दिखती है, इसी प्रकार मात्र उसका [आत्मन का, स्वयं का ] ज्ञान हो जाने से मनुष्य की आँखें भी बाहर से चमकती दिखाई देती हैं।  "मैं जानता हूँ" इस रूप में जिस अकेले की प्रभा से समस्त जगत प्रभावान होता है, मैं अपने गुरु के रूप में उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।

5-देहं प्राण अमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः । स्त्री बालान्ध जडोप मास्त्वह मिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।। माया शक्ति विलास कल्पित महा.. व्यामोह संहारिणे। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।5। 

जो लोग देह (शरीर), प्राण, इन्द्रियों, यों प्राचल (गतिमान) बुद्धि या परम शून्य को ही, "मैं" का अर्थ, मानते हैं वे एक भोली लड़की की भांति और अंधे होकर भी अपनी बातों को जोरों से बोलते रहते हैं। माया, शक्ति और विलास से पैदा हुए इस महान व्योम (भ्रान्ति) को नष्ट करने वाले अपने गुरु के रूप में, मैं श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।। 

6-राहुग्रस्त दिवाकरेन्दु सदृशो.. माया समाच्छादनात्। सन्मात्रः करणोप संहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।। 

प्राग स्वाप्समिति प्रबोध समये.. यः प्रत्यभिज्ञायते। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये.. नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।6।

जैसे सूर्य और चंद्रमा को राहु द्वारा ग्रहण किया जाता है, वैसे ही माया के द्वारा ढके हुए, इन्द्रियों के हट जाने पर अजन्मा सोया हुआ पुरुष प्रकट हो जाता है। ज्ञान देते समय जो यह पहचान करा देते हैं कि पूर्व में सोये हुए यह तुम ही थे, उन श्री दक्षिणामूर्ति को गुरु रूप में नमस्कार है।। 

7-बाल्या दिष्वपि जाग्रदा दिषुतथा सर्वास्व वस्था स्वपि। व्यावृत्ता स्वनु वर्तमानं  महमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।। 

स्वात्मानं प्रकटी करोति भजतां यो मुद्रया भद्रया। तस्मै श्रीगुरुमूर्तये ..नमइदं.. श्रीदक्षिणामूर्तये ।7। 

बाल्य अवस्था और अन्य अवस्थाओं में, जागते हुए या निद्रा आदि जीवन की सभी अवस्थाओं में जो आत्मन (आत्मा) शरीर के भीतर दीप्त रहती है, वह सभी नियमों से मुक्त लेकिन हर समय उपस्थित रहती है। जो अपने भक्तों को चिन्मुद्रा के माध्यम से इस आत्मन का ज्ञान कराते हैं, उन श्री दक्षिणामूर्ति को गुरु रूप में नमस्कार है।। 

8-विश्वं पश्यति कार्य कारण तया ..स्वस्वामि सम्बन्धतः । शिष्या अचार्यतया तथैव.. पितृ पुत्रा अध्यात्मना भेदतः ।। 

स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो.. माया परि भ्रामितः । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये.. नमइदं ..श्रीदक्षिणामूर्तये ।8।

 विश्व में जो अलग-अलग सम्बन्ध जैसे कि- कार्य-कारण, स्व-स्वामी, शिष्य-आचार्य, और पिता-पुत्र आदि दिखाई देते हैं, स्वप्न में और जागृति में ये सभी समबंध पुरुष ( आत्मतत्व ) को भ्रमित करने के लिए माया द्वारा बनाए गये हैं। मैं अपने गुरुरुपी श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।।  

9-भूरम्भांस्यन लोऽनिलोऽम्बर महर्नाथो हिमांशु पुमान् । इत्या भाति चरा चरात्मक मिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्।। 

नान्यत् किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्मा द्विभोः । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नमइदं.. श्रीदक्षिणामूर्तये ।9। 

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,सूर्य, चन्द्र और जीव- ये आठ उस [आत्मन] के रूप हैं, जो चर-अचर रूपों में विद्यमान हैं, इस [आत्मन] के अतिरिक्त संसार में कुछ भी नही हैं, यही सर्वव्यापक है, अंतर्मन में लीन योगी इसे ही विश्व का सार मानते हैं, मैं अपने गुरुरुपी श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार करता हूँ।। 

10-  सर्वात्मत्व मिति स्फुटी कृतमिदं.. यस्माद मुष्मिन् स्तवे। तेनास्य श्रवणा त्तदर्थ मनना ध्यानाच्च संकीर्तनात् ।। सर्वात्मत्व महाविभूति सहितं ..स्यादीश्वरत्वं स्वतः । सिद्ध्ये त्तत्पुनर अष्टधा ..परिणतं .. ऐश्वर्य मव्याहतम् ।10। 

इस स्तुति में स्वयं [आत्मन] की सर्वव्यापकता स्पष्ट रूप से प्रकट हुई है, जिसके बारे में सुनने से, उसके अर्थ पर विचार करने से, ध्यान और भजन करने से अष्टांगिक ऐश्वर्यों के साथ विश्व के परम सार के ज्ञान की प्राप्ति होती है, बिना बाधा और कठिन प्रयास किये आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होती है। 

...SHIVOHAM....sabhar chidanana Facebook wall

Read more

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv