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रविवार, 21 नवंबर 2021

#पाराशर ऋषि द्वारा लिखित विमानन शस्त्र जिसे जानने को अमेरिका बैताब

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प्राचीन #भारतीय_विमान_शास्त्र : सनातन वैदिक विज्ञान का अप्रतिम स्वरूप :
हिंदू वैदिक ग्रंथोँ एवं प्राचीन मनीषी साहित्योँ मेँ वायुवेग से उड़ने वाले विमानोँ (हवाई जहाज़ोँ) का वर्णन है, सेकुलरोँ के लिए ये कपोल कल्पित कथाएं हो सकती हैँ, परन्तु धर्मभ्रष्ट लोगोँ की बातोँ पर ध्यान ना देते हुए हम तथ्योँ को विस्तार देते हैँ।ब्रह्मा का १ दिन, पृथ्वी पर हमारे वर्षोँ के ४,३२,००००००० दिनोँ के बराबर है। और यही १ ब्रह्म दिन चारोँ युगोँ मेँ विभाजित है यानि, सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं वर्तमान मेँ कलियुग।
सतयुग की आयु १,७२,८००० वर्ष निर्धारित है, इसी प्रकार १,००० चक्रोँ के सापेक्ष त्रेता और कलियुग की आयु भी निर्धारित की गई है।

सतयुग मेँ प्राणी एवं जीवधारी वर्तमान से बेहद लंबा एवं जटिल जीवन जीते थे, क्रमशः त्रेता एवं द्वापर से कलियुग आयु कम होती गई और सत्य का प्रसार घटने लगा,
उस समय के व्यक्तियोँ की आयु लम्बी एवं सत्य का अधिक प्रभाव होने के कारण उनमेँ आध्यात्मिक समझ एवं रहस्यमयी शक्तियां विकसित हुई, और उस समय के व्यक्तियोँ ने जिन वैज्ञानिक रचनाओँ को बनाया उनमेँ से एक थी "वैमानिकी"।

उस समय की मांग के अनुसार विभिन्न विमान विकसित किए गए, जिन्हेँ भगवान ब्रह्मा और अन्य देवताओँ के आदेश पर यक्षोँ (जिन्हेँ इंजीनियर कह सकते हैँ) ने बनाया था,
ये विमान प्राकृतिक डिज़ाइन से बनाए जाते थे, इनमेँ पक्षियोँ के परोँ जैसी संरचनाओँ का प्रयोग जाता था, इसके पश्चात् के विमान, वैदिक ज्ञान के प्रकांड संतएवं मनीषियोँ द्वारा निर्मित किए गए, तीनोँ युगोँ के अनुरूप विमानोँ केभी अलग अलग प्रकार होते थे,
प्रथम युग सतयुग मेँ विमान मंत्र शक्ति से उड़ा करते थे, द्वितीय युग त्रेता मेँ मंत्र एवं तंत्र की सम्मिलित शक्ति का प्रयोग होता था, तृतीय युग द्वापर मेँ मंत्र-तंत्र-यंत्र तीनोँ की सामूहिक ऊर्जा से विमान उड़ा करते थे, वर्तमान मेँ अर्थात् कलियुग मेँ मंत्र एवं तंत्र के ज्ञान की अथाह कमी है, अतः आज के विमान सिर्फ यंत्र (मैकेनिकल) शक्ति से उड़ा करते हैँ,
युगोँ के अनुरूप हमेँ विमानोँ के प्रकारोँ की संख्या ज्ञात है, सतयुग मेँ मंत्रिका विमानोँ के २६ प्रकार (मॉडल) थे, त्रेता मेँ तंत्रिका विमानोँ के ५६ प्रकार थे, तथा द्वापर मेँ कृतिका (सम्मिलित) विमानोँ के भी २६ प्रकार थे,
हालांकि आकार और निर्माण के संबंध मेँ इनमेँ आपस मेँ कोई अंतर नहीँ हैँ।

महान भारतीय आचार्य महर्षि भारद्वाज ने एक ग्रंथ रचा, जिसका नाम है, "विमानिका" या "विमानिका शास्त्र"

१८७५ ईसवीँ में दक्षिण भारत के एक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की एक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से ४०० वर्ष पूर्व का बताया जाता है, इस ग्रंथ का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के ९७ अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा २० ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियां अब लुप्त हो चुकी हैं। कई कृतियोँ को तो विधर्मियोँ ने नालंदा विश्वविद्यालय मेँ जला दिया,
इस महान ग्रंथ मेँ विभिन्न प्रकार के विमान, हवाई जहाज एवं उड़न-खटोले बनाने की विधियाँ दी गई हैँ, तथा विमान और उसके कलपुर्जे तथा ईंधन के प्रयोग तथा निर्माण की विधियोँ का भी सचित्र वर्णन किया गया है, उन्होँने अपने विमानोँ मेँ ईंधन या नोदक अथवा प्रणोदन (प्रोपेलेँट) के रूप मेँ पारे (मर्करी Hg) का प्रयोग किया।

बहुत कम लोग जानते हैँ कि कलियुग का पहला विमान राइट ब्रदर्स ने नहीँ बनाया था, पहला विमान १८९५ ई. में मुम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स के अध्यापक शिवकर बापूजी तलपड़े, जो एक महान वैदिक विद्वान थे, ने अपनी पत्नी (जो स्वयं भी संस्कृत की विदुषा थीं) की सहायता से बनाया एवं उड़ाया था। उन्होँने एक मरुत्सखा प्रकार के विमान का निर्माण किया। इसकी उड़ान का प्रदर्शन तलपड़े ने मुंबई चौपाटी पर तत्कालीन बड़ौदा नरेश सर शिवाजी राव गायकवाड़ और बम्बई के प्रमुख नागरिक लालजी नारायण के सामने किया था। विमान १५०० फुट की ऊंचाई तक उड़ा और फिर अपने आप नीचे उतर आया। बताया जाता है कि इस विमान में एक ऐसा यंत्र लगा था, जिससे एक निश्चित ऊंचाई के बाद उसका ऊपर उठना बन्द हो जाता था। इस विमान को उन्होंने महादेव गोविन्द रानडे को भी दिखाया था।

दुर्भाग्यवश इसी बीच तलपड़े की विदुषी जीवनसंगिनी का देहावसान हो गया। फलत: वे इस दिशा में और आगे न बढ़ सके। १७ सितंबर, १९१८ ईँसवी को उनका देहावसान हो गया।
राइट ब्रदर्स के काफी पहले वायुयान निर्माण कर उसे उड़ाकर दिखा देने वाले तलपड़े महोदय को आधुनिक विश्व का प्रथम विमान निर्माता होने की मान्यता देश के स्वाधीन (?) हो जाने के इतने वर्षों बाद भी नहीं दिलाई जा सकी, यह निश्चय ही अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। और इससे भी कहीं अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पाठ्य-पुस्तकों में शिवकर बापूजी तलपड़े के बजाय राइटब्रदर्स (राइट बन्धुओं) को ही अब भी प्रथम विमान निर्माता होने का श्रेय दिया जा रहा है, जो नितान्त असत्य है।
"समरांगन:-सूत्र धारा" नामक भारतीय ग्रंथ मेँ भी विमान निर्माण संबंधी जानकारी है। इस ग्रंथ मेँ युद्ध के समय वैमानिक मशीनोँ के प्रयोग का वर्णन है, इस ग्रंथ मेँ संस्कृत के २३० श्लोक हैँ, स्थान की कमी के कारण हम यहाँ इस ग्रंथ के पूरे श्लोक नहीँ लिख रहे हैँ, अन्यथा लेख लंबा हो जाएगा।
परन्तु हम इस ग्रंथ के १९० वेँ श्लोक का अनुवाद अवश्य कर रहे हैँ :-
"[२:२० . १९०] परिपत्रोँ से पूर्ण विमान के दाहिने पंख से अंदर जाते हुए केंद्र पर ध्वनि की गति से पारे को ईँधन के सापेक्ष पहुँचाने पर एक छोटी पर अधिक दबाव वाली आंतरिक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो आपके यंत्र को आकाश मेँ शनैः शनैः ले जाएगी, जिससे यंत्र के अंदर बैठा व्यक्ति अविस्मरणीय तरीके से नभ की यात्रा करेगा, चार कठोर धातु से बने पारे के पात्रोँ का संयोजन उचित स्थिति मेँ किया जाना चाहिए, एवं उन्हेँ नियंत्रित तरीके से ऊष्मा देनी चाहिए, ऐसा करने से आपका विमान आकाश मेँ चमकीले मोती के समान उड़ता नज़र आएगा।।"
इस ग्रंथ के एक गद्य का अनुवाद इस प्रकार है -

"सर्वप्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था। तत्पश्चात अन्य विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

(१) रुकमा – रुकमा नुकीले आकार के और स्वर्ण रंग के विमान थे।

(२) सुन्दरः –सुन्दर: त्रिकोण के आकार के तथा रजत (चाँदी) युक्त विमान थे।

(३) त्रिपुरः – त्रिपुरः तीन तल वाले शंक्वाकार विमान थे।

(४) शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था। तथा ये अंतर्राक्षीय विमान थे।

दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का प्रशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुर्ज़े, उपकरण, चालकों एवं यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये। ग्रंथ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबू अथवा सेब या अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।

साथ ही, ७ प्रकार के इंजनों का वर्णन किया गया है, तथा उनका किस विशिष्ट उद्देश्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊंचाई पर उसका प्रयोग सफल और उत्तम होगा ये भी वर्णित है।

ग्रंथ का सारांश यह है कि इसमेँ प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्ध है। विमान आधुनिक हेलीकॉप्टरों की तरह सीधे ऊंची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे-पीछे तथा तिरछा चलने में भी सक्षम बताये गये हैं

इसके अतिरिक्त हमारे दूसरे ग्रंथोँ - रामायण, महाभारत, चारोँ वेद, युक्तिकरालपातु (१२ वीं सदी ईस्वी) मायाम्तम्, शतपत् ब्राह्मण, मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, भागवतपुराण, हरिवाम्सा, उत्तमचरित्र ,हर्षचरित्र, तमिल पाठ जीविकाचिँतामणि, मेँ तथा और भी कई वैदिक ग्रंथोँ मेँ भी विमानोँ के बारे मेँ विस्तार से बताया गया है।

महर्षि भारद्वाज के शब्दों में - "पक्षियों की भान्ति उडने के कारण वायुयान को विमान कहते हैं, (वेगसाम्याद विमानोण्डजानामिति ।।)
विमानों के प्रकार:-

(१) शकत्युदगम विमान -"विद्युत से चलने वाला विमान"

(२) धूम्र विमान - "धुँआ, वाष्प आदि से चलने वाला विमान"

(३) अशुवाह विमान - "सूर्य किरणों से चलने वाला विमान",

(४) शिखोदभग विमान - "पारे से चलने वाला विमान",

(५) तारामुख विमान -"चुम्बकीय शक्ति से चलने वाला विमान",

(६) मरूत्सख विमान - "गैस इत्यादि से चलने वाला विमान"

(७) भूतवाहक विमान - "जल,अग्नि तथा वायु से चलने वाला विमान"

वो विमान जो मानवनिर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडनतशतरियों’ के अनुरूप है। विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया।

प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्होंने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उनमें से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान-विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

प्रथम ग्रंथ :

(१) ऋगवेद- इस आदिग्रन्थ में कम से कम २०० बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हेँ अश्विनों (वैज्ञानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणतया तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण,रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई संदेह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी।

यातायात के लिये ऋग्वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-

(१) जलयान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद ६.५८.३)

(२) कारायान – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद ९.१४.१)

(३) त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋगवेद ३.१४.१)

(४) त्रिचक्र रथ – यह रथ के समान तिपहिया विमान आकाश में उड़ सकता था। (ऋगवेद ४.३६.१)

(५) वायुरथ – रथ के जैसा ये यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋगवेद ५.४१.६)

(६) विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋगवेद ३.१४.१).

द्वितीय ग्रंथ :

(२) यजुर्वेद - यजुर्वेद में भी एक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिसका निर्माण जुड़वा अश्विन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्होँने राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।

तृतीय ग्रंथ :

(३) यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रंथ भी महर्षि भारद्वाज रचित है। इसके ४० भाग हैं जिनमें से एक भाग मेँ ‘विमानिका प्रकरण’ के आठ अध्याय, लगभग १०० विषय और ५०० सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारद्वाज ने विमानों को तीन श्रैँणियों में विभाजित किया हैः-

(१) अन्तर्देशीय – जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।

(२) अन्तर्राष्ट्रीय – जो एक देश से दूसरे देश को जाते हैँ।

(३) अन्तर्राक्षीय – जो एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते हैँ।

इनमें सें अति-उल्लेखनीय सैनिक विमान थे जिनकी विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं।

उदाहरणार्थ - सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-

पूर्णत्या अटूट,

अग्नि से पूर्णतयाः सुरक्षित

आवश्यक्तता पड़ने पर पलक झपकने मात्र के समय मेँ ही एक दम से स्थिर हो जाने में सक्षम,

शत्रु से अदृश्य हो जाने की क्षमता (स्टील्थ क्षमता),

शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्षम। 

शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृश्योँ को विमान मेँ ही रिकार्ड कर लेने की क्षमता, 

 शत्रु के विमानोँ की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना, 

शत्रु के विमान चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता, 

निजी रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता, 

आवश्यकता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता, 

चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता, 

स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता, 

 हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बड़ा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णतयाः नियन्त्रित कर सकने की सक्षमता।

विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ विमानोँ और अन्य हवाई जहाज़ोँ का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारद्वाज कोई आधुनिक ‘फिक्शन राइटर’ तो थे नहीं। परन्तु ऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित करता है, कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञानिक माडल का विचार कैसे किया।

उन्होंने अंतरिक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती-बाड़ी का ज्ञान भी हासिल नहीं कर पाये थे।

चतुर्थ ग्रंथ :

(४) कथा सरित सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों (इंजीनियरोँ) का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वाले विमानों को बना सकते थे। यह रथ विमान मन की गति से चलते थे।

पंचम ग्रंथ :

(५) अर्थशास्त्र - चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सेविकाओं (पायलट) का भी उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उड़ाती थी। चाणक्य ने उनके लिये विशिष्ट शब्द "आकाश युद्धिनाः" का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलट)

आकाश-रथ, का उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी किया गया है जो उसके काल (२३७-२५६ ईसा पूर्व) में लगाये गये थे। 

भारद्वाज मुनि ने विमानिका शास्त्र मेँ लिखा हैं, -"विमान के रहस्यों को जानने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है।"

शास्त्रों में विमान चलाने के बत्तीस रहस्य बताए गए हैं। उनका भलीभाँति ज्ञान रखने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है। क्योँकि वहीँ सफल पायलट हो सकता है।

विमान बनाना, उसे जमीन से आकाश में ले जाना, खड़ा करना, आगे बढ़ाना टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना और विमान के वेग को कम अथवा अधिक करना उसे जाने बिना यान चलाना असम्भव है।

अब हम कुछ विमान रहस्योँ की चर्चा करेँगे।

(१) कृतक रहस्य - बत्तीस रहस्यों में यह तीसरा रहस्य है, जिसके अनुसार हम विश्वकर्मा , छायापुरुष, मनु तथा मयदानव आदि के विमान शास्त्रोँ के आधार पर आवश्यक धातुओं द्वारा इच्छित विमान बना सकते , इसमें हम कह सकते हैं कि यह हार्डवेयर यानी कल-पुर्जोँ का वर्णन है।

(२) गूढ़ रहस्य - यह पाँचवा रहस्य है जिसमें विमान को छिपाने (स्टील्थ मोड) की विधि दी गयी है। इसके अनुसार वायु तत्व प्रकरण में कही गयी रीति के अनुसार वातस्तम्भ की जो आठवीं परिधि रेखा है उस मार्ग की यासा , वियासा तथा प्रयासा इत्यादि वायु शक्तियों के द्वारा सूर्य किरण हरने वाली जो अन्धकार शक्ति है, उसका आकर्षण करके विमान के साथ उसका सम्बन्ध बनाने पर विमान छिप जाता है।

(३) अपरोक्ष रहस्य - यह नौँवा रहस्य है। इसके अनुसार शक्ति तंत्र में कही गयी रोहिणी विद्युत के फैलाने से विमान के सामने आने वाली वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

(४) संकोचा - यह दसवाँ रहस्य है। इसके अनुसार आसमान में उड़ने समय आवश्यकता पड़ने पर विमान को छोटा करना।

(५) विस्तृता - यह ग्यारहवाँ रहस्य है। इसके अनुसार आवश्यकता पड़ने पर विमान को बड़ा या छोटा करना होता है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि वर्तमान काल में यह तकनीक १९७० के बाद विकसित हुई है।

(६) सर्पागमन रहस्य - यह बाइसवाँ रहस्य है जिसके अनुसार विमान को सर्प के समान टेढ़ी - मेढ़ी गति से उड़ाना संभव है। इसमें कहा गया है दण्ड, वक्र आदि सात प्रकार के वायु और सूर्य किरणों की शक्तियों का आकर्षण करके यान के मुख में जो तिरछें फेंकने वाला केन्द्र है, उसके मुख में उन्हें नियुक्त करके बाद में उसे खींचकर शक्ति पैदा करने वाले नाल में प्रवेश कराना चाहिए। इसके बाद बटन दबाने से विमान की गति साँप के समान टेढ़ी - मेढ़ी हो जाती है।

(७) परशब्द ग्राहक रहस्य - यह पच्चीसवाँ रहस्य है। इसमें कहा गया है कि शब्द ग्राहक यंत्र विमान पर लगाने से उसके द्वारा दूसरे विमान पर लोगों की बात-चीत सुनी जा सकती है।

(८) रूपाकर्षण रहस्य - इसके द्वारा दूसरे विमानों के अंदर का दृश्य देखा जा सकता है।

(९) दिक्प्रदर्शन रहस्य - दिशा सम्पत्ति नामक यंत्र द्वारा दूसरे विमान की दिशा का पता चलता है।

(९) स्तब्धक रहस्य - एक विशेष प्रकार का अपस्मार नामक गैस स्तम्भन यंत्र द्वारा दूसरे विमान पर छोड़ने से अंदर के सब लोग मूर्छित हो जाते हैं।

(१०) कर्षण रहस्य - यह बत्तीसवाँ रहस्य है, इसके अनुसार आपके विमान का नाश करने आने वाले शत्रु के विमान पर अपने विमान के मुख में रहने वाली वैश्र्‌वानर नाम की नली में ज्वालिनी को जलाकर सत्तासी लिंक (डिग्री जैसा कोई नाप है) प्रमाण हो, तब तक गर्म कर फिर दोनों चक्कल की कीलि (बटन) चलाकर शत्रु विमानों पर गोलाकार दिशा से उस शक्ति की फैलाने से शत्रु का विमान नष्ट हो जाता है।

"विमान-शास्त्री महर्षि शौनक" आकाश मार्ग का पाँच प्रकार का विभाजन करते हैं तथा "महर्षि धुण्डीनाथ" विभिन्न मार्गों की ऊँचाई पर विभिन्न आवर्त्त या तूफानोँ का उल्लेख करते हैं और उस ऊँचाई पर सैकड़ों यात्रा पथों का संकेत देते हैं। इसमें पृथ्वी से १०० किलोमीटर ऊपर तक विभिन्न ऊँचाईयों पर निर्धारित पथ तथा वहाँ कार्यरत शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

आकाश मार्ग तथा उनके आवर्तों का वर्णन निम्नानुसार है -

(१) १० किलोमीटर - रेखा पथ - शक्त्यावृत्त तूफान या चक्रवात आने पर

(२) ५० किलोमीटर - वातावृत्त - तेज हवा चलने पर

(३) ६० किलोमीटर - कक्ष पथ - किरणावृत्त सौर तूफान आने पर

(४) ८० किलोमीटर - शक्तिपथ - सत्यावृत्त बर्फ गिरने पर

एक महत्वपूर्ण बात विमान के पायलटोँ को विमान मेँ तथा पृथ्वी पर किस तरह भोजन करना चाहिए इसका भी वर्णन है-

उस समय के विमान आज से कुछ भिन्न थे। आज के विमान की उतरने की जगह (लैँडिग) निश्चित है, पर उस समय विमान कहीं भी उतर सकते थे।

अतः युद्ध के दौरान जंगल में उतरना पड़ा तो जीवन निर्वाह कैसे करना चाहिए, इसीलिए १०० वनस्पतियों का वर्णन दिया गया है, जिनके सहारे दो-तीन माह जीवन चलाया जा सकता है। जब तक दूसरे विमान आपको खोज नहीँ लेते।

विमानिका शास्त्र में कहा गया है कि पायलट को विमान कभी खाली पेट नहीं उड़ाना चाहिए। १९९० में अमेरिकी वायुसेना ने १० वर्ष के निरीक्षण के बाद ऐसा ही निष्कर्ष निकाला है।

अब जरा विमानोँ मेँ लगे यंत्रोँ और उपकरणोँ के बारे मेँ तथ्य प्रस्तुत कियेँ जाएं -

"विमानिका-शास्त्र" में ३१ प्रकार के यंत्र तथा उनके विमान में निश्चित स्थान का वर्णन मिलता है। इन यंत्रों का कार्य क्या है इसका भी वर्णन किया गया है। कुछ यंत्रों की जानकारी निम्नानुसार है -

(१) विश्व क्रिया दर्पण - इस यंत्र के द्वारा विमान के आसपास चलने वाली गतिविधियों का दर्शन पायलट को विमान के अंदर होता था, इसे बनाने में अभ्रक तथा पारा आदि का प्रयोग होता था।

(२) परिवेष क्रिया यंत्र - ये यंत्र विमान की गति को नियंत्रित करता था।

(३) शब्दाकर्षण मंत्र - इस यंत्र के द्वारा २६ किमी. क्षेत्र की आवाज सुनी जा सकती थी तथा पक्षियों की आवाज आदि सुनने से विमान को "पक्षी-टकराने" जैसी दुर्घटना से बचाया जा सकता था।

(४) गर्भ-गृह यंत्र - इस यंत्र के द्वारा जमीन के अन्दर विस्फोटक खोजा जाता था।

(५) शक्त्याकर्षण यंत्र - इस यंत्र का कार्य था, विषैली किरणों को आकर्षित कर उन्हें ऊष्णता में परिवर्तित करना और ऊष्णता के वातावरण में छोड़ना।

(६) दिशा-दर्शी यंत्र - ये दिशा दिखाने वाला यंत्र था (कम्पास)।

(७) वक्र प्रसारण यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु विमान अचानक सामने आ गया, तो उसी समय पीछे मुड़ना संभव होता था।

(८) अपस्मार यंत्र - युद्ध के समय इस यंत्र से विषैली गैस छोड़ी जाती थी।

(९) तमोगर्भ यंत्र - इस यंत्र के द्वारा शत्रु युद्ध के समय विमान को छिपाना संभव था। तथा इसके निर्माण में तमोगर्भ लौह प्रमुख घटक रहता था।

"विमानिका-शास्त्र" मेँ विमान को संचालित करने हेतु विभिन्न ऊर्जा स्रोतोँ का वर्णन किया गया है, महर्षि भारद्वाज इसके लिए तीन प्रकार के ऊर्जा स्रोतों उल्लेख करते हैं।

(१) विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियोँ का तेल - ये ईँधन की भाँति काम करता था।

(२) पारे की भाप - प्राचीन शास्त्रों में इसका शक्ति के रूप में उपयोग किए जाने का वर्णन है। इसके द्वारा अमेरिका में विमान उड़ाने का प्रयोग हुआ, पर वह जब ऊपर गया, तब उसमेँ विस्फोट हो गया। पर यह सिद्ध हो गया कि पारे की भाप का ऊर्जा की तरह प्रयोग हो सकता है, इस दिशा मेँ अभी और कार्य करने बाकी हैँ।

(३) सौर ऊर्जा - सूर्य की ऊर्जा द्वारा भी विमान संचालित होता था। सौर ऊर्जा ग्रहण कर विमान उड़ाना जैसे समुद्र में पाल खोलने पर नाव हवा के सहारे तैरता है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में विमान वातावरण से सूर्य शक्ति ग्रहण कर चलता रहेगा। सेटेलाइट इसी प्रक्रिया द्वारा चलते हैँ।

"विमानिका-शास्त्र" मेँ महर्षि भारद्वाज विमान बनाने के लिए आवश्यक धातुओँ का वर्णन किया है, पर प्रश्न उठता है कि क्या "विमानिका-शास्त्र" ग्रंथ का कोई ऐसा भाग है जिसे प्रारंभिक तौर पर प्रयोग द्वारा सिद्ध किया जा सके?

यदि कोई ऐसा भाग है, तो क्या इस दिशा में कुछ प्रयोग हुए हैं?

क्या उनमें कुछ सफलता मिली है

सौभाग्य से इन प्रश्नों के उत्तर हाँ में दिए जा सकते हैं।

हैदराबाद के डॉ. श्रीराम प्रभु ने "विमानिक-शास्त्र" ग्रंथ के यंत्राधिकरण को देखा , तो उसमें वर्णित ३१ यंत्रों में कुछ यंत्रों की उन्होंने पहचान की तथा इन यंत्रों को बनाने वाली मिश्र धातुओं का निर्माण सम्भव है या नहीं , इस हेतु प्रयोंग करने का विचार उनके मन में आया । प्रयोग हेतु डॉ. प्रभु तथा उनके साथियों ने हैदराबाद स्थित बी. एम. बिरला साइंस सेन्टर के सहयोग से प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्णित धातुएं, दर्पण आदि का निर्माण प्रयोगशाला में करने का प्रकल्प किया और उसके परिणाम आशाष्पद हैं। साभार divine Shiva temple Facebook wall

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तंत्र का रहस्य

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                                                          #

तंत्र का रहस्य विविध प्रकार के त्रास अर्थात वैसे रक्षा करते हुए जो त्राण अर्थात रक्षा करे वही तंत्र है अतः तंत्र किसी प्रकार का अहित कारी है ही नहीं और तंत्र शास्त्र की उत्पत्ति भी मनुष्य को विभिन्न प्रकार के भयो रोगभय शत्रुभय राजभय उत्पातभय से सुरक्षित रखने हेतु विशेष साधना पद्धति से हुआ है।
जो विभिन्न अलौकिक सुख वह रक्षाकार होने के साथ ही प्रालौकिक मुक्ति का ईश्वरीय साक्षात्कार का उत्तम साधन है aलेकिन कुछ व्यक्तियों ने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु तंत्र का दुरुपयोग करके दूसरों को हानि पहुंचाने वाले अभिचार कर्मों को भी जन्म दिया है।
जो पाप मूलक वह निंदनीय है किसी भी तंत्रवित्ता को जब तक जीवन पर संकट ना हो तंत्र के दुरुपयोग करने का निषेध है केवल जीवन पर संकट उपस्थित होने और रक्षा का कोई साधन ने बचने पर ही अभिचार कृत्य की आज्ञा है।
इसी कारण आज तंत्र में तांत्रिक भय का एक पर्याय कारण बन चुका है जबकि वास्तव में वह साधना और रक्षा का पर्याय है तंत्र तथा तांत्रिक के नाम पर लोग जटा में दाढ़ी बढ़ाए ऐसे कुत्सित रूप की कल्पना कर लेते हैं जो शमशान में जाकर शव का भक्षण कर रहा हूं अनर्गल हवन कर रहा हूं मुंण्डधारी आदि वेशभूषा में हूं जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है यह एक ही शुद्ध सात्विक उपासना है और एक सामान्य सांसारिक व्यक्ति उपासना को कर सकता है।
यही कारण है कि अनादिकाल से ही तंत्र शास्त्र की मान्यता है तांत्रिक उपासना में विधि-विधान का पूर्ण ज्ञान आवश्यक है विधि रहित वह त्रुटिपूर्ण उपासना लाभ करने के स्थान पर अशुभकारी भी हो सकती है आते हैं तंत्र शास्त्र की दीक्षा लेने के साथ ही सर्वप्रथम किस के संपूर्ण विधि विधान का ज्ञान होना आवश्यक है आज तक ऐसा कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं जिसमें क्रमश  सभी विधि-विधान का संकलन हो और विधि पूर्वक साधना न होने साधना कभी सफल नहीं हो सकती है और असफलता के कारण तंत्र विद्या पर अविश्वास होना स्वाभाविक है।
इसी प्रयोजन से समस्त विधि-विधान का ज्ञान आवश्यक है जो अत्यंत जटिल वह समय साध्य है किसी भी प्रयोग को सिद्ध करने से पहले साधक को इन सभी क्रियाओं एवं विधियों का पालन करना होगा तभी सिद्धि संभव है साधना कोई भी हो कठिन होती है sअर्थात साधना तलवार की धार पर चलने के समान है सभी के लिए संभव नहीं है लाखों व्यक्तियों में से एक दो व्यक्ति ऐसी चेष्टा करते हैं और प्रयत्नशील ऐसे लाखों लोगों में से कोई एक सिद्धि प्राप्त कर पाता है।
साधना में ज्यादातर लोग कमीज पजामा पहन कर बैठते हैं पर आपको ज्ञात होना चाहिए कि साधना में अनसिला एक वस्त्र पहना जाता है इसी प्रकार साधना नियमाकुल ना होने के कारण सफल नहीं होती है।
तंत्र साधना में मन तथा इंद्रियों पर संयम अनिवार्य है जिसका मन तथा इंद्रियों पर संयम न हो वे साधना के योग्य नहीं है अतः तंत्र साधना के नियमित योग साधना भी आवश्यक है।
आतम संयम इंद्रिय संयम एवं मनोनिग्रह का स्वरूप यह है कि व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी काम के वशीभूत में हो सके यदि साधक पुरुष है तो सभी नारी मात्र को मां के रूप में और साधक स्त्री है तो पुरुष मात्र को पुत्र के रूप में देखें साधक का संयम ऐसा हो कि रूप गर्विता नवयौवना युवती के समक्ष भी जिस व्यक्ति ने कामवासना जागृत ना हो उसमें भी मातृभाव की दृष्टि हो इसी प्रकार महिला साधक के हृदय में भी पुरुष मात्र के प्रति पुत्रवत वात्सल्य हो ऐसे साधक ही तंत्र विद्या के अधिकारी हैं।
एक उल्लेखनीय बात यह है कि 11 मंत्र को सिद्ध करने में ही काफी समय लगता है ऐसी स्थिति में व्यक्ति जीवन पर्यंत कुछ ही मंत्र सिद्ध कर सकता है यदि लोकहित की कामना से अनेक मंत्र सिद्ध करना चाहे तो उसके निमित्त ग्रहण काल में मंत्र सिद्ध करने की सरल विधि है हां उसे प्रयोग में ला सकते हैं।
सफलता की दृष्टि से यह भी आवश्यक है की तांत्रिक प्रयोग हेतु जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है वह भी प्रामाणिक हो या तो व्यक्ति स्वयं उनका ज्ञाता हो और स्वयं संग्रह करें अन्यथा बाजार से क्रय करने पर भी वास्तव में वह वस्तु शुद्ध है या नहीं इसका ध्यान भी रखना चाहिए अन्यथा प्रयोग असफल वह व्यर्थ होगा तांत्रिक को चाहिए कि द्वेषवश भयवश लोभवश कभी भी मंत्र का दुरुपयोग ना करें और इसका व्यावसायिक उपयोग भी कदापि न करें अन्यथा सिद्धि समाप्त होने के साथ साथी अपना भी लोक परलोक नष्ट होगा केवल लोकहित की कामना से जनमानस के कष्टों का निराकरण हेतु ही इस विद्या का सदुपयोग करें इसका दुरुपयोग कभी न करें।
कुछ स्वार्थी साधकों द्वारा लोभवश द्वेषवश या स्वार्थवश तंत्र का दुरुपयोग मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण आदि षटकर्म एवं अभिचार कर्म करते हैं अतः जनसाधारण को भी सावधान रहना चाहिए व्यक्ति इन अभिचारों से कैसे बच सकता है कोई भी मंत्र तभी सफल होता है hजबकि पहले पुरश्चरण करके विधि पूर्वक उसे सिद्ध कर लिया जाए बिना मंत्र सिद्ध किए हुए वह प्रभावी नहीं हो सकता अतः बिना सिद्ध किए हुए किसी मंत्र का प्रयोग करने की चेष्टा न करें व्यर्थ ही होगा एक और बात उल्लेखनीय है राजनेताओं उच्चाधिकारियों प्रतिष्ठित जनों के संपर्क में अनेक ऐसे स्वार्थी व्यक्ति आते रहते हैं जो अपने को परायोगी सिद्ध त्रिकालदर्शी तांत्रिक आदि नाम देकर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ वर्ष संपर्क करते हैं भविष्य की जिज्ञासा पदोन्नति एवं धन की लिप्सा आदि मानव की दुर्बलता स्वाभाविक है और बड़े-बड़े शिक्षित व्यक्ति भी इनके शुद्र चमत्कारों के प्रभावित होकर इनके चक्र में फंस जाते हैं। और कालांतर में यही अनिष्ट का कारण बनते हैं अतः किसी को भी गुरु बनाने से पहले पूर्ण परिचय ज्ञात करने की उसकी शिक्षा आचरण ज्ञान आदि का भी अवलोकन कर ले बहुधा लोग अनेक व्यक्तियों से परामर्श लेते रहते हैं यह एक भ्रांति है कि विभिन्न लोगों से परामर्श करने से सही मार्गदर्शन होगा ऐसा करने से और भी भ्रांति ही बढ़ेगी और यह उचित भी नहीं है सोच विचार कर किसी एक को गुरु बनाएं उसी पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें कुछ साधक प्राय लोगों को अपने शूद्र चमत्कारों से वशीभूत कर लेते हैं उन से लाभ उठाते हैं और कालांतर में अपने हित साधन या स्वार्थवश उसीका अनिष्ट करने में भी नहीं चूकते हैं‌।
जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी कार्य संपादन हेतु किसी अपराधिक व्यक्ति का आश्रय लेता है तो उसका वह कार्य भी कर देता है किंतु बाद में वही व्यक्ति एवं उसका भी उत्पीड़न करने से नहीं चूकता है।
उदाहरण स्वरूप शत्रु के मारण प्रयोग हेतु शत्रु के बाल पैर की धूल वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है जो सीधे या सुलभता से मिल नहीं सकते ऐसे में वह व्यक्ति अपने शत्रु के पास किसी माध्यम से किसी ऐसे व्यक्ति को भेजता है जो आप को प्रभावित कर सके और आप उस पर विश्वास कर सकें कालांतर में उसके प्रति आपका पूर्ण विश्वास हो जाने पर वह व्यक्ति आपके शत्रु के पास से सामग्री प्राप्त कर पहुंचा सकता है आपका विश्वस्त बनाए यही व्यक्ति आपके प्रति अभी चार अनिष्ट कारी प्रयोग कर सकता है। oमैंने भी ऐसे कई लोगों को देखा है जो बहुत ज्ञानी सज्जन लेकिन वह भी अनेकों से परामर्श लेने की अपनी प्रकृति के कारण तांत्रिकों से पीड़ित रहे है और उनके द्वारा तांत्रिकों को निश्चित लाभ पहुंचा है कुछ तांत्रिक लोग ऐसे तंत्र प्रयोग करके अपने जीवन को इतना कलंकित पापी और अपवित्र कर लेते हैं कि उनकी मृत्यु के समय की घटनाओं का स्मरण करके ही मन थरथराने लगता है। कोई चमत्कार दिखाना भभूत आदि उत्पन्न करना हाथ उठाकर हवा में कोई वस्तु प्रकट करना आपका चिंतित कार्य छाप देना बीती भी घटनाएं बता देना आदि भूत प्रेत अथवा जादू अथवा रासायनिक क्रियायें हैं यह उत्कृष्ट साधना नहीं है जबकि तांत्रिक उपासना का लक्ष्य पुरुषार्थ धर्म अर्थ काम तथा मोक्ष साधना है विशिष्ट तांत्रिक साधना से ही अष्टधा सिद्धियों की उपलब्धि होती है।
अर्थात अपनी शरीर या किसी वस्तु को अति सूक्ष्म कण वह अणुरूप में घटित करना गुरुतर बना देना बड़ा बना देना हल्का बना देना दूर की वस्तु प्राप्त करना उत्पन्न इच्छाओं की पूर्ति होना समस्त इंद्रियों व प्राणी मात्र पर नियंत्रण एवं ईश्वर के समान किसी कार्य को पूर्ण करने की शक्ति आते हैं उच्चतर साधना से उसे प्राप्त हिंदी से व्यक्ति में हो सकती हैं kऐसा सिद्ध व्यक्ति जो वरदान भी आशीर्वाद देता है वह निश्चित रूप से पूर्ण होता है भले ही असंभव क्यों न हो परंतु ऐसे सिद्ध का मिलना हिमालय की एकांत गुफाओं में ही संभव है। sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

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सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

ऊर्जा

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जिस प्रकार एक पुष्प सर्वप्रथम कली के रूप में प्रकट होता हैं कली जानते हो ना कली से तात्पर्य हैं की वो अब तक खिला नही अर्थात उसकी पंखुडियाँ पूर्ण रूपेन से अब तक खुल नही पाया परंतु अगर लम्बे समय तक यही स्थिति बनी रहे अर्थात वो कली कली ही रह जाए पुष्प के समान खिल ना पाए तो उसकी सुगंध तो मंद मंद होते नष्ट होगी ही स्वयं उसकी अस्तित्व भी ज़र ज़र होकर छिन्न भिन्न हो जाएगी और अल्ल समय में ही वो कली के रूप में ही नष्ट हो जाएगा 

अर्थात उसके अंदर भी जीवन हैं परंतु वो जीवन उस प्राण रुकी अनंत विराट जीवन रुकी स्पंदन को मुक्त होने हेतु उसने रास्ता नही दिया अर्थात जब तक खिले नही तब तक वो प्राण अपने निम्न रूप में ही निवास करने लगती हैं अर्थात यहाँ प्रक्रिया बिलकुल उल्टी हो गयीं जीवन देने वाली प्राण ही जीवन का भक्षण करने लगी और धीरे धीरे वो कली जर्जर होने लगा मुरझाने लगा उसकी सुगंध की चरम अवस्था आने से पूर्व वो नष्ट होने लगी 

शायद मेरी बातें आप लोग को समझ में अच्छे से नही आ पाए परंतु इस विषय को बताना उतना ही जटिल हैं जैसे समुंदर की  गहराई को नापना परंतु फिर भी साधक तो इसे समझ ही सकते हैं हाँ जिन्हें साधना से कोई तात्पर्य नहीं उनके लिए ये जटिल ही नही असम्भव प्रयास होगी फिर भी मैं कोशिश करता हूँ ।

जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा की अगर पुष्प कली से फूल नही बन पाया तो अल्प में समय में वही प्राण जिसने उसे जन्म दिया वही उसकी भक्षण कर जाएगी अर्थात उस विराट मुक्त असीमित प्राण रूपी सत्ता को बांधने क़ैद करने अथवा सीमित करने की कार्य की गयी जो की अप्राकृतिक हैं इसलिए यहाँ उसने भी अपने अप्राकृतिक स्वरूप को धारण कर जीवन से मृत्यु सुगंध से दुर्गंध, का रूप लेकर उसे तमस रूप से रूपांतरित करने लगा अर्थात अप्राकृतिक रूप से और अल्ल समय में उसे सूखा दिया जर्जर कर दिया और उसे अपने में विलीन कर लिया परंतु अगर वो खिल जाता तो वही जीवन अपने प्राकृत शौम्य, शांत , ममता मयी रूप को ना छोड़ती उसमें सुगंध भर देती उसकी सुंदरता और जीवन दोनो अंत तक आकर्षित और ताजग़ी की मूरत बन जाती हैं ना ?

अब यहाँ कुछ ऐसी ही समीकरण मनुष्य के मन, मस्तिष्क, इंद्रिया, चित्त और प्राण के साथ बनती हैं तुमने प्राण के सबसे निम्न क़ोष में स्थित होकर इसे भौतिकता तक ही सीमित कर दिया हैं इसके सबसे उच्य रूप को समझने की कोशिश ही नही किया इस प्राण रूपी तत्व को तुमने पृथ्वी तत्व से इस क़दर जोड़ लिया की ये अनंत, विराट, असीमित से सीमित हो गयी और अंत निम्न क़ोष प्राण वायु के रूप में और पृथ्वी तत्व अर्थात मूलआधार चक्र में अनंत विषय वस्तु, तत्व का माया रूपी आवरण ओढ़कर  सुप्त और जागृति के मध्य के अवस्था में आलस लेकर विश्राम करने लगी और अप्राकृतिक तमस रूप को धारण कर नित्य तुझे जर्जर करते जा रही, उसकी ताप धीरे धीरे समस्त इंद्रिया , चित्त, को वायु रूपी काल के साथ मिल कर बुढ़ापे और मृत्यु की ओर लेकर जा रही हैं क्यूँकि इसकी ये ताप इसकी अप्राकृतिक स्वरूप से प्रकट हो रही हैं इसलिए ये काल सूचक हैं परंतु जब तप, ध्यान, साधन के द्वारा इसे प्राकृत रूप में रूपांतरित कर दिया जाता तो यही ताप पवित्र अग्नि स्वरूप बन कर हर उस तत्व, विषय, गुण को  लीलती हुई अपने क़ोष, रूप को रूपांतरित करते हुए निम्न से उच्य अवस्था को धारण करते जाती हैं अधो से ऊध्रव में गति कर इस तंत्र रूपी भौतिक आवरण को छोड़ तालु के रास्ते अनंत विराट मस्तिष्क में प्रवेश कर चेतना को उच्य अवस्था प्रदान कर डालती।
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वर्ष 2025 तक पेट्रोल में 25 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य

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हरदोई। जनपद के एक दिवसीय भ्रमण के दौरान सचिव, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण सुधांशु पाण्डेय ने हरियावां चीनी मिल का निरीक्षण किया। उन्होने मिल में लगी डिस्टिलरी को देखा। इस दौरान उन्होने एथेनॉल के उत्पादन पर जोर दिया। उन्होने कहा कि वर्ष 2025 तक पेट्रोल में 25 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य है इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और चीनी मिलों के सशक्त होने से किसानों के जीवन में भी खुशहाली आयेगी। उन्होने कहा कि चीनी मिल में बनने वाले उक्त उत्पादों से भी किसानो की जिन्दगी में बेहतरी हो रही है। निरीक्षण के अतिरिक्त श्री पाण्डेय ने तीन गॉवों का भी दौरा किया। जहॉ उन्होने स्वच्छ ग्राम पुरस्कार वितरण व शत प्रतिशत कोविड टीकाकरण ग्राम पुरस्कार वितरण समारोह में भाग लिया तथा उन्होने इन क्षेत्रों में विशेष प्रयास करने वाले लोगो को सम्मानित किया। उन्होने कहा कि आज के युवा का बदला हुआ रूप देखकर उन्हे बहुत खुशी होती है। आज की नई पीढ़ी खुद को नई तकनीक व नई सम्भावनाओं के साथ जोड़ रही है। वे स्वयं के अलावा समाज के लिए भी कुछ करने की चाह रखते है। उन्होने आगे कहा कि इन्सान सकारात्मक सोच के साथ कुछ भी करने की क्षमता रखता है। इस दौरान उनके साथ जिलाधिकारी अविनाश कुमार व चीनी मिल के अधिकारी भी मौजूद रहे।

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बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

क्या है तंत्र-विद्या?

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07 FACTS;-


1-तंत्र-विद्या, जिसे अंग्रेजी में 'ऑकल्ट' कहते हैं, के लिए अकसर लोगों के मन में शंका और भय जैसी भावनाएं होती है।  


तंत्र में बहुत सारी संभावनाएं होती हैं। उन्हीं में से एक है 'ऑकल्ट' यानी गुह्य-विद्या जिसमें तंत्र का भौतिक तरीके से इस्तेमाल किया जाता है।तंत्र का मतलब होता है कि आप कामों को अंजाम देने के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं।


इस तरह के गुह्य-विद्या के अभ्यासों को आमतौर पर तंत्र के लेफ्ट हैंड या वाम मार्ग के रूप में जाना जाता है। इसका एक आध्यात्मिक पहलू भी है, जिसे राइट हैंड या दक्षिण मार्गी तंत्र के रूप में जाना जाता है।जिसे वाम-मार्गी तंत्र कहा जाता है, वह एक स्थूल या अपरिपक्व टेक्नोलॉजी है जिसमें अनेक कर्मकांड होते हैं। जबकि जो दक्षिण-पंथी तंत्र है, उसकी टेक्नोलॉजी अत्यंत सूक्ष्म है। इन दोनों की प्रकृति बिलकुल अलग है।तंत्र विद्या ईश्‍वरीय शक्ति और मनुष्‍य की आत्‍मा के बीच संपर्क जोड़ने का साधन है, जिसकी सही परिभाषा जल्‍दी नहीं मिलती। 


 2-तंत्र, का संधि- विच्छेद करें तो दो शब्द मिलते हैं - तं- अर्थात फैलाव और त्र अर्थात बिना रुकावट के। ऐसा फैलाव या नेटवर्क जिसमें कोई रुकावट या विच्छेद न हो। जो एकाकी हो, जो अनंत में फैला हुआ हो ..सतत हो । इसलिए तंत्र अनंत के साथ जुड़ने का एक साधन है। कभी किसी दूसरी संस्कृति ने इश्वर तक पहुँचने के लिए इतनी गहन विचारणीय शब्द का प्रयोग शायद ही किया होगा। तंत्र द्वैत को नहीं मानता है। तंत्र में मूलभूत सिद्धांत है की ऐसा कुछ भी नहीं है, जो की दिव्य न हो। तंत्र अहंकार को पूरी तरह समाप्त करने की बात करता है, जिससे द्वैत का भाव पूर्णतया विलुप्त हो जाता है। तंत्र पूर्ण रूपांतरण की बात करता है। ऐसा रूपांतरण जिससे जीव और ईश्वर एक हो जाएँ। ऐसा करने के लिए तंत्र के विशेष सिद्दांत तथा पद्धतियां हैं, जो की जानने और समझने में जटिल मालूम होती हैं।तंत्र का जुडाव प्रायः मंत्र, योग तथा साधना के साथ देखने को मिलता है। तंत्र, गोपनीय है, इसलिए गोपनीयता बनाये रखने के लिए प्रायः तंत्र ग्रंथों में प्रतीकात्मकता का प्रयोग किया गया है। कुछ पश्च्यात देशों में तंत्र को शारीरिक आनंद के साथ जोड़ा जा रहा है, जो की सही नहीं है। यदपि तंत्र में काम शक्ति का रूपांतरण, दिव्य अवस्था प्राप्ति की लिए किया जाता है अपितु बिना योग्य गुरु के भयंकर भूल होने की पूर्ण संभावना रहती है।ऐसा माना जाता है सर्वप्रथम भगवन शिव ने देवी पारवती को विभिन अवसरों पर तंत्र का ज्ञान दिया है।


 3-योग में तंत्र का विशेष महत्व है। योग तथा तंत्र दोनों, अध्यात्मिक चक्रों की शक्ति को विकसित करने की विभिन्न पद्धतियों के बारे में बताते हैं। हठयोग और ध्यान उनमें से एक है। विज्ञानं भैरव तंत्र जो की 112 ध्यान की वैज्ञानिक पद्धति है भगवान शिव ने देवी पारवती को बताई है। जिसमें सामान्‍य जीवन की विभिन अवस्थाओं में ध्यान करने की विशेष पद्धति वर्णित है।


 तंत्र  मंत्र की सभी तांत्रिक कियाएं जिनमें - सम्मोहन, वशीकरण, उचाटन मुख्य हैं, मंत्र महार्णव तथा मंत्र महोदधि नामक ग्रंथों में वर्णित हैं। तंत्र अहंकार को समाप्त कर द्वैत के भाव को समाप्त करता है, जिससे मनुष्य, सरल हो जाता है और चेतना के स्तर पर विकसित होता है। सरल होने पर इश्वर के संबंध सहजता से बन जाता है। तंत्र का उपयोग इश प्राप्ति की लिए सद्भावना के साथ करना चाहिए।तांत्रिक विद्या के अनुसार भांति-भांति की कीलों से तंत्र क्रियाओं द्वारा किसी स्थान को कीलने से वहां पर सुरक्षा कवच को स्थापित करना। 


4-बताया जाता है कीलन सुरक्षा की दृष्टि से तो किया ही जाता है परंतु  इसके विपरीत ईर्ष्या -द्वेष, अनहित की भावना, शत्रुवत व्यवहार आदि के चलते भी स्थान का कीलन कर दिया जाता है। कहने का मतलब है कि कीलन सेअर्थ है सुरक्षा कवच। बांधने की क्रिया अर्थात किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान को सुरक्षा कवच में बाधने को कीलन या स्तम्भन कहतेहैं।  


तो वहीं बंधेहुए को मुक्त करवाने की क्रिया को उत्कीलन कहा जाता है। तंत्र विद्या में कीलन सकारात्मक और नकारात्मक दो प्रकार से प्रयोग में लिए जाते हैं।  उदाहरण के लिए किसी के काम से अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो कीलन की विशेष प्रक्रिया द्वारा उसके काम को रोक दिया जाता है या दूसरे शब्दों में कहे तो कील दिया जाता है या स्तम्भित कर दिया जाता है।  पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा के कारण चलानमय है। जिस प्रकार सभी के फिंगर प्रिंट अलग अलग होते है उसी प्रकार सभी के अंदर उर्जाये भी अलग अलग होती है।तन्त्र में ऊर्जाओं का ज्ञान होना महत्वपूर्ण है। 


 5-तन्त्र क्रियाओं द्वारा ऊर्जा को जोड़ा जाता है। यदि ऊर्जा नही जुड़ती तो तन्त्र क्रिया कार्य ही नही करती।  


जो हमारे पहने हुए वस्त्र, बाल आदि होते है उनमें हमारी ऊर्जा रहती है इसलिए तन्त्र क्रियाओं में इन वस्तुयों का प्रयोग किया जाता है। इनसे ऊर्जा जोड़ने में सरलता होती है। यदि वस्त्र या बाल आदि ना मिले तो व्यक्ति का पूर्ण नाम पता द्वारा भी ऊर्जा जोड़ने का प्रयास होता है। फिर साधक अपनी सिद्ध शक्ति उस स्थान पर भेजता है यदि सबकुछ सही हुआ तो ऊर्जा जुड़ जाती है और कार्य पूर्ण हो जाता है। तन्त्र क्रियाओं की भी अवधि होती है उसके बाद प्रभावहीन होने लगती है। क्रिया को अधिक समय तक चलाने के लिए समय समय पर ऊर्जा की तीव्रता बढ़ाई जाती है या व्यक्ति से सबंधित वस्तु को स्मशान आदि में गाड़ देते है जिससे ऊर्जा बनी रहती है।


 6-दक्षिण-पंथी तंत्र ज्यादा आंतरिक और ऊर्जा पर आधरित होता है, यह सिर्फ आपसे जुड़ा है। इससे कोई विधि-विधान या बाहरी क्रियाकलाप नहीं जुड़ा होता। यह भी एक तरह से तंत्र है लेकिन 'योग' में ये सब एक साथ शामिल हैं।जब हम योग कहते हैं, तो किसी भी संभावना को नहीं छोड़ते - इसके अंदर सब कुछ है। बस इतना है कि कुछ विक्षिप्त दिमाग वाले लोगों ने एक खास तरह का तंत्र अपनाया है, जो पूरी तरह से वामपंथी तंत्र है, जिसमें शरीर का विशेष रूप से इस्तेमाल होता है। उन्होंने बस इस हिस्से को ले कर उसे बढ़ा-चढ़ा दिया और उसमें तरह-तरह की अजीबोगरीब काम  क्रियाएं जोड़ कर किताबें लिख डालीं और कहा, 'यही तंत्र है'। नहीं, यह तंत्र नहीं है।तंत्र का मतलब होता है कि आप कामों को अंजाम देने के लिए अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं।इसलिए सवाल यह है कि आपका तंत्र कितना सूक्ष्म और विकसित है? अगर आप अपनी ऊर्जा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको या तो दस हजार कर्मकांड करने पड़ेंगे या आप बैठे-बैठे भी यह कर सकते हैं।सबसे बड़ा अंतर यही है। सवाल सिर्फ पिछड़ी या एडवांस टेक्नोलॉजी का है, लेकिन तंत्र वह विज्ञान है, जिसके बिना कोई आध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं हो सकती।


 7-अगर आप अपने दिमाग को इतना धारदार बना लें कि वह हर चीज को आरपार देख-समझ सके, तो यह भी एक प्रकार का तंत्र है। अगर आप अपनी सारी ऊर्जा को अपने दिल पर केंद्रित कर दें ताकि आपमें इतना प्यार उमड़ सके कि आप हर किसी को उसमें सराबोर कर दें, तो वह भी तंत्र है। अगर आप अपने भौतिक शरीर को जबरदस्त रूप से शक्तिशाली बना लें कि उससे आप कमाल के करतब कर सकें, तो यह भी तंत्र है। या अगर आप अपनी ऊर्जा को इस काबिल बना लें कि शरीर, मन या भावना का उपयोग किए बिना ये खुद काम कर सके, तो यह भी तंत्र है।तो तंत्र कोई अटपटी या बेवकूफी की बात नहीं है। यह एक खास तरह की काबिलियत है। उसके बिना कोई संभावना नहीं हो सकती।तंत्र एक प्रक्रिया है जिससे हम अपनी आत्मा और मन को बंधन मुक्त करते हैं।  इस प्रक्रिया से शरीर और मन शुद्ध होता है, और ईश्वर का अनुभव करने में सहायता हो होती है। तंत्र की प्रक्रिया से हम भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। ऐसी मान्यताएं हैं कि एक व्यक्ति तंत्र की सही प्रक्रिया से मष्तिष्क का पूरा इस्तेमाल कर पाता है और अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन जाता है। 

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गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

ॐ का रहस्य क्या है?

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🕉*⚜♥ॐ का रहस्य क्या है? ♥⚜*🕉


*मन पर नियन्त्रण करके शब्दों का उच्चारण करने की क्रिया को मन्त्र कहते है। मन्त्र विज्ञान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मन व तन पर पड़ता है। मन्त्र का जाप एक मानसिक क्रिया है। कहा जाता है कि जैसा रहेगा मन वैसा रहेगा तन। यानि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य है तो हमारा शरीर भी स्वस्थ्य रहेगा।*


*मन को स्वस्थ्य रखने के लिए मन्त्र का जाप करना आवश्यक है। ओम् तीन अक्षरों से बना है। अ, उ और म से निर्मित यह शब्द सर्व शक्तिमान है। जीवन जीने की शक्ति और संसार की चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस देने वाले ओम् के उच्चारण करने मात्र से विभिन्न प्रकार की समस्याओं व व्याधियों का नाश होता है।*


*सृष्टि के आरंभ में एक ध्वनि गूंजी ओम और पूरे ब्रह्माण्ड में इसकी गूंज फैल गयी। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि इसी शब्द से भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा प्रकट हुए। इसलिए ओम को सभी मंत्रों का बीज मंत्र और ध्वनियों एवं शब्दों की जननी कहा जाता है।*


*इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि, ओम शब्द के नियमित उच्चारण मात्र से शरीर में मौजूद आत्मा जागृत हो जाती है और रोग एवं तनाव से मुक्ति मिलती है।*


*इसलिए धर्म गुरू ओम का जप करने की सलाह देते हैं। जबकि वास्तुविदों का मानना है कि ओम के प्रयोग से घर में मौजूद वास्तु दोषों को भी दूर किया जा सकता है।*


*ओम मंत्र को ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ओम में त्रिदेवों का वास होता है इसलिए सभी मंत्रों से पहले इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है जैसे*


*ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमः शिवाय।*


*आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि नियमित ओम मंत्र का जप किया जाए तो व्यक्ति का तन मन शुद्घ रहता है और मानसिक शांति मिलती है। ओम मंत्र के जप से मनुष्य ईश्वर के करीब पहुंचता है और मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाता है।*


*वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ३म् ईश्वर का मुख्य नाम है. योग दर्शन में यह स्पष्ट है. यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है. जैसे “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है. “उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म, सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है।*


*“म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और* *पालन करने वाला है. ये तो बहुत थोड़े से उदाहरण हैं जो ओ३म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं. वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ३म् शब्द में ही आ सकते हैं, और किसी में नहीं.*


*१. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है।*


*२. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं!*


*३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।*


*४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है।*


*५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है।*


*६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।*


*७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।*


*८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी।*


*९ कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है.*


*इत्यादि!*


*ॐ के उच्चारण का रहस्य?*


*ॐ है एक मात्र मंत्र, यही है आत्मा का संगीत*


*ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है।*


*ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है।*


*तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।*


*साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।*


*त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक :*


*ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है-*

*अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है।*


*बीमारी दूर भगाएँ :*

*तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं।*


*सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है।*


*उच्चारण की विधि :*


*प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।*


*इसके लाभ :*


*इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।*


*शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव :*


*प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक'पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरहआल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।*


*कम से कम 108 बार ओम् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव रहित हो जाता है। कुछ ही दिनों पश्चात शरीर में एक नई उर्जा का संचरण होने लगता है। । ओम् का उच्चारण करने से प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियन्त्रण स्थापित होता है। जिसके कारण हमें प्राकृतिक उर्जा मिलती रहती है। ओम् का उच्चारण करने से परिस्थितियों का पूर्वानुमान होने लगता है।*


*ओम् का उच्चारण करने से आपके व्यवहार में शालीनता आयेगी जिससे आपके शत्रु भी मित्र बन जाते है। ओम् का उच्चारण करने से आपके मन में निराशा के भाव उत्पन्न नहीं होते है।*


*आत्म हत्या जैसे विचार भी मन में नहीं आते है। जो बच्चे पढ़ाई में मन नहीं लगाते है या फिर उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है। उन्हें यदि नियमित ओम् का उच्चारण कराया जाये तो उनकी स्मरण शक्ति भी अच्छी हो जायेगी और पढ़ाई में मन भी लगने लगता है ।


        *⚜♥🌿हर हर महादेव🌿♥⚜*

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सोमवार, 27 सितंबर 2021

चेतना उच्च शिखर

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चेतना जब भी उच्च शिखर पर विराजती है तब व्यक्ति ज्योतिर्शिखर के प्रकाश से सम्पूर्णं दिशाओं में  प्रकाश से भर  जाता  है  ।  तब  उन क्षणों  में  वह  🌼 🌼 सम - गुण  🌼🌼 में   तो  जीता  है  बस समबन्ध , बन्धित नहीं होता ।
 🏵  सम-बन्ध  🏵 तो उसे शिखर  से  नीचे  उतर हृदय तल पर आकर समग्र जीवन जीने के लिए अभिनित  करने पड़ते है । जिससे जीवन शुष्क नहीं रस पूर्ण जीया जा सके । तभी जीवन सार्थक जीया जा सकता है । उच्च-शिखर पर जो आनन्द है वह निचले पड़ाव पर लौट आने में कहां ? 
हालाकि निचले पड़ाव पर कभी अनन्द  , कभी विषाद में झूलती  जिन्दगी , सृजन में सहयोगी होती है ।
वहीं उच्च-शिखर पर  व्यक्ति प्रेमपूर्ण  ,  स्वीकार  पूर्ण  तो होता है । कर्ता नहीं ! और जब वह करता होता है तो ! 
भरोसे योग्य नहीं रह जाता है ।
यही परम सत्य है I स्वयं के लिए उच्च शिखर !  
संसार के लिए  सभी तलों का योगदान होता है ! 
होश , जागरण  दोनो  में चाहिये ।  
इनके बिना न स्वयं में , न संसार में आनन्दपूर्ण , सुखमय जीवन जिया जा सकता है !

संसार में तौले जाते हैं कर्म, परमात्मा में तौला जाता है भाव। संसार हिसाब रखता है, क्या तुमने किया; परमात्मा हिसाब रखता है, क्या तुम हो। तो यह भी हो सकता है, तुम मोक्ष में उन लोगों को पाओ, जिनको तुमने पूजा पाठ-में कभी नहीं देखा हो। और तुम नर्क में उन लोगों को पाओ जो सदा  पूजा पाठ का दिखावा ही करते रहे मंदिर में ही जिंदगी गुजारे। संसार तो कृत्य देख सकता है। क्योंकि उतनी गहरी आंख नहीं है, जो भाव को देख ले।

एक संन्यासी हिमालय की यात्रा पर था। और उसने देखा कि एक पहाड़ी लड़की अपने कंधे पर एक बड़े मोटे बच्चे को लेकर पहाड़ चढ़ रही है। लड़की की उम्र मुश्किल से नौ साल होगी। और बच्चा बड़ा तगड़ा है। कम से कम चार साल का होगा। और भारी वजन। और संन्यासी भी थक गया है। गर्मी है, धूप तेज है, पसीना-पसीना हो रहा है। वह भी अपने कंधे पर अपना थोड़ा बहुत जो भी बिस्तर सामान है, वह बांधे हुए है। लड़की के करीब पहुंच कर उसने उस लड़की को कहा, ‘बेटी, वजन बहुत है, थक गई होगी।’ और पसीना-पसीना बह रहा है उस लड़की को। उस लड़की ने ऊपर देखा और कहा, ‘स्वामी जी, वजन आप लिए हैं। यह मेरा छोटा भाई है।’

तराजू पर कोई फर्क पड़ेगा, बिस्तर में और छोटे भाई में? तराजू बराबर वजन बता देगा। अगर तुम बाहर ही बाहर देखते हो तो तुम्हारी स्थिति तराजू से ज्यादा नहीं है। उस संन्यासी ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि उस लड़की ने मुझे चौंका दिया। जब उसने कहा कि स्वामी जी, वजन आप लिए हैं; यह मेरा छोटा भाई है। छोटे भाई में कैसा वजन। वजन तो होता ही है, लेकिन भाव वजन को काट देता है।

तुम्हारा उठना-बैठना, तुम्हारा चलना-फिरना, तुम्हारा भोजन, तुम्हारा सोना, यह सब ऊपर के कृत्य हैं। और हर कृत्य से तुम्हारी आत्मा बाहर झांकती है। तुम देखना; कृत्य का बहुत हिसाब मत रखना, भाव का हिसाब रखना। और अगर भाव का हिसाब साफ होने लगा तो तुम पाओगे, कृत्य बदलने लगे। उनमें से नकल खो जायेगी और प्रामाणिकता आ जायेगी। और तुम पाओगे कि तुम्हारे भीतर के प्रकाश ने तुम्हारे बाहर के कृत्यों को आच्छादित कर दिया। और तब तुम पाओगे कि उनका गुणधर्म और हो गया। उनका मूल्य ही और हो गया। सदगुरु कोई बहुत बड़े-बड़े कृत्य नहीं करता।

झेन फकीर रिंझाई से किसी ने पूछा कि आप क्या करते हैं? तो उसने कहा, ‘जब मुझे भूख लगती है मैं भोजन कर लेता हूं। और जब नींद आती है तब सो जाता हूं। और कुछ विशेष नहीं।’ तो उस आदमी ने कहा, ‘यह तो हम सभी करते हैं।’ रिंझाई हंसने लगा और उसने कहा, ‘काश, इतना सभी करते तो मोक्ष दूर कहां!’

तुम नहीं करते; तुम्हें खयाल है। क्योंकि जब तुम भोजन करते हो, तब तुम हजार काम और भी कर रहे हो। मन कहीं और है, प्राण कहीं और हैं; भोजन तो तुम किसी तरह कर रहे हो। वह तुम्हारी प्रार्थना नहीं है। जब तुम सो रहे हो, तब तुम सिर्फ सोते हो? तुम कितनी यात्रायें करते हो। कितने सपने हैं!

रिंझाई कह रहा है कि जब मैं सोता हूं, तब सिर्फ सोता हूं। जब भोजन करता हूं, तब सिर्फ भोजना करता हूं। मेरे होने और मेरे कृत्य में एकता है। मैं इकाई हूं, अद्वैत हूं। जो भी हो रहा है, वह मेरी समग्रता से, मेरी पूर्णता से हो रहा है। जब भूख लगी है, तो मैं भोजन कर रहा हूं। वह मेरी पूर्णता वहां संलग्न है। मेरे पीछे कुछ भी नहीं बचा है जो अलग खड़ा होगा। और जब मैं सो रहा हूं, तो मैं पूरा सो रहा हूं। फिर मेरे पीछे कोई नहीं बचा है, जो सपने देख रहा हो। मेरा पूरा जीवन, मेरी पूरी आत्मा, एक-एक कृत्य में अपनी समग्रता से प्रविष्ट है।

यही तो जीवन-मुक्त का लक्षण है। तब वह किसी भी क्षण मर जाये, तो पश्चात्ताप नहीं है। क्योंकि सब पूरा है। सदा पूरा है। वह ठीक से रात सो लिया था, सुबह उसने ठीक से भोजन कर लिया था; करने को कुछ बचा नहीं था। हर कृत्य पूरा होता जाता है अगर तुम पूरे उसमें हो। अगर तुम पूरे उसमें नहीं हो, तो तुम्हारा कोई कृत्य पूरा नहीं है। सब अधूरा है। तुम्हारी जिंदगी अधूरे-कृत्यों का जोड़ है। और वे अधूरे-कृत्य तुम्हारा पीछा करते हैं।

💥दीया तले अंधेरा💥

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तंत्र और जप साधन

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{{{ॐ}}}

                                                                #

मंत्र साधन के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए अथवा  सर्व प्रकार की सिद्धि के लिए विद्वान महर्षियों ने जप को एक बहुत ही उत्तम साधन माना है उन्होने ने तीन प्रकार के जपो का वर्णन किया है:----१,मानस जप । २वाचिक जप ।३ उपांशु जप ।
१:- मानसजप--जिस जप में मंत्र की अक्षर- पंक्ति के एक वर्ण से दुसरे वर्ण, एक पद से दुसरे पद तथा शब्द और अर्थ का मन द्वारा बार बार मात्र चिंतन होता है उसे मानस जप  कहते है । यह सिद्धि और साधना की उच्चकोटि का जप कहलाता है ।
२:-- वाचिकजप  जप करने वाला जब उंचे नीचे स्वर से  स्पष्ट तथा अस्पष्ट पद व अक्षरों के साथ मंत्र बोलकर पाठ किया जाता है तो उसे वाचिकजप कहते है ।
३:--,उपांशुजप जिसे केवल जिह्वां हिलती है अथवा इतने मद्धिम स्वर  मे जप होता है जिसे कोई सुन न सके उसे उपांशुजप कहा जाता है इसे मद्धम प्रकार का जप माना गया है।
 कुछ महर्षियों ने दो प्रकार के जपो का और भी वर्णन किया है:----१:- सगर्भजप और अगर्भजप सगर्भजप तो प्राणायाम के साथ किया जाता है और जप के प्रारंभ और अंत में प्राणायाम  किया जाए तो उसे अगर्भजप कहते है इसमे प्राणायाम और जप एक दुसरे के पुर्वक होते है ।
विशेष मंत्रों का प्रयोग मंत्र साधना मे तो किया ही जाता है तंत्र और यंत्रो मे भी उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है ।

मंत्र विशारदों का मत है कि वाचिकजप एक गुना फल प्रदान करता है उपांशुजप सौ गुना फल प्रदान करता है और मानसजप हजार गुना फल प्रदान करता है तथा सगर्भजप को मानसजप से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है
नये साधको को मानस अथवा उपांशुजप पर ही अधिक प्रयास करना चाहिए
शास्त्रो मे मुख्यत १३ प्रकार के जपो का वर्णन किया है जो निम्न प्रकार के है
रेचकजप:--नाक के नथुनों से श्वास को बहार निकालते हुए जो जप किया जाता है उसे रेचकजप कहा जाता है ।

पूरकजप:---नाक से श्वास को भीतर लेते हुए जो जप किया जाए उसे पूरकजप कहा जाता है ।

कुभंकजप:--श्वास को भीतर स्थिर करके जो जप किया जाता है वो कुभंकजप माना जाता है
सात्त्विकजप:-- ,शान्तिकर्म के लिए जो जप किया जाता है उसे सात्त्विकजप कहते है
राजसिकजप:- वशीकरण आदि के लिए किए जीने वाले जव को राजसिक जप करते है ।
तामसिकजप:-- उच्चाटन और मारण आदि क्रियाओं के लिए किया जाने वाला जप तामसिकजप कहा जाता है ।
तत्त्वजप, स्थिरकृतिजप, ध्येयक्यजप, स्मृतिजप, ध्यानजप, हक्काजप, व नादजप का वर्णन भी है

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रविवार, 26 सितंबर 2021

उम्र और यौवन का वैदिक विज्ञान

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प्रश्वास की उचित विधि मनुष्य को न केवल स्वस्थ, सुंदर और
दीर्घजीवी बनाती है बल्कि ईश्वरानुभूति तक करा सकती है।
सदा युवा बने रहने और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए
सांसों पर संयम जरूरी है। श्वास की गति का संबंध मन से जुड़ा है।

मनुष्य के दोनों नासिका छिद्रों से एक साथ श्वास-प्रश्वास
कभी नहीं चलती है। कभी वह बाएं तो कभी दाएं नासिका
छिद्र से सांस लेता और छोड़ता है। बाएं नासिका छिद्र में इडा
यानी चंद्र नाडी और दाएं नासिका छिद्र में पिंगला यानी
सूर्य नाड़ी स्थित है। इनके अलावा एक सुषुम्ना नाड़ी भी
होती है जिससे सांस प्राणायाम और ध्यान विधियों से ही
प्रवाहित होती है।

शिवस्वरोदय ज्ञान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि प्रत्येक एक घंटे
के बाद यह श्वास नासिका छिद्रों में परिवर्तित होता रहता
है। 

कबहु डडा स्वर चलत है कभी पिंगला माही।
सुष्मण इनके बीच बहत है गुर बिन जाने नाही।।

योगियों का कहना है कि चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास
प्रवाहित होने पर वह मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है।
चंद्र नाड़ी से ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब सूर्य
नाड़ी से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होता है तो शरीर को
उष्मा प्राप्त होती है यानी गर्मी पैदा होती है। सूर्य नाड़ी से
धनात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है।

प्राय: मनुष्य उतनी गहरी सांस नहीं लेता और छोड़ता है जितनी एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए जरूरी होती है। प्राणायाम मनुष्य को वह तरीका बताता है जिससे मनुष्य ज्यादा गहरी और लंबी सांस ले और छोड़ सकता है। अनुलोम-विलोम प्राणायाम की विधि से दोनों नासिका छिद्रों से बारी-बारी से वायु को भरा और छोड़ी जाता है। अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आ जाता है जब चंद्र और सूर्य नाड़ी से समान रूप से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होने लगता है। उस अल्पकाल में सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है।

प्राणायाम का मतलब है- प्राणों का विस्तार। दीर्घ श्वास-
प्रश्वास से प्राणों का विस्तार होता है। एक स्वस्थ मनुष्य को
एक मिनट में 15 बार सांस लेनी चाहिए। इस तरह एक घंटे में उसके श्वासों की संख्या 900 और 24 घंटे में 21600 होनी चाहिए। स्वर विज्ञान के अनुसार चंद्र और सूर्य नाड़ी से श्वास-प्रश्वास के जरिए कई तरह के रोगों को ठीक किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास को
प्रवाहित किया जाए तो रक्तचाप, हाई ब्लड प्रेशर सामान्य
हो जाता है।

आज बस इतना ही ....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

ध्वनि का विज्ञान

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"एकः शब्द: सम्यग्ज्ञात: संप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुग भवति"।

अर्थात-
'एक ही शब्द के पूर्ण ज्ञान और सम्यक प्रयोग से लौकिक और पारलौकिक दोनों फलों की प्राप्ति सम्भव है'।यही वैदिक ज्ञान का रहस्य है। 

जैसा कि हमें ज्ञात होना चाहिए कि कोई भी ध्वनि सदा विशुद्ध नहीं रहती। यौगिक क्रिया और श्वास-प्रश्वास से ही उसमें शुद्धता लायी जा सकती है। इस शुद्धिकरण के बाद ज्ञान की उपलब्धि स्वतः होने लगती है। उसमें विशेष ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। शब्द के माध्यम से साधक या योगी के हाथ एक नैसर्गिक शक्ति लग जाती है और वह नैसर्गिक गुणों से परिपूर्ण हो शक्तिशाली बन जाता है। 

ऋषियों ने स्पष्टरूप से कहा है कि वेद ब्राह्मण में अंतर्भूत आध्यात्मिक शक्ति के सार हैं। वेद में गायत्री मन्त्र का अपना विशेष महत्व है। वैदिक ब्राह्मण को संस्कार, उपनयन या शुद्धिकरण के समय सर्वप्रथम गायत्री मंत्र ही गुरु द्वारा प्रदान किया जाता है।

वैदिक साहित्य में 'भू: का अर्थ निम्नतम मेखला (भूमि) तथा 'स्व:' का उच्चतम यानी निराकार लोक और इन दोनों के मध्य स्थित 'भुव:' अर्थात अंतरिक्ष। यद्यपि भू:, भुव: तथा स्व: विभिन्न लोकों के रूप में जाना गया है (पृथ्वी लोक, भुवर्लोक यानी प्रेतलोक और स्वर्गलोक) लेकिन वास्तव में यदि देखा जाय तो ये तीनों 'भूमण्डल' के अंतर्गत ही माने जाते हैं। 

तीनों लोक एक दूसरे से दूध-पानी की तरह से मिले हुए हैं। निम्न लोक यानी पृथ्वी का सार स्वयं प्रकाश रूप में प्रकट होता है जिसे 'अग्नि' कहा जाता है। आध्यात्मिक उत्थान की सारी विधि जिसे वैदिक वाणी में 'क्रतु' यानी यज्ञ कहा गया है, इसी पवित्र और गुप्त अग्नि के जलने के साथ आरम्भ हुई। जिसे अग्नि उत्पन्न करती है, जिसे तंत्र और योग कुण्डलिनी में उद्दीपन उत्पन्न करना कहा गया है। जब अग्नि पृथ्वी पर विस्तृत हो जाती है, तब वह संस्कृत (शुद्ध ध्वनि) होने लगती है। तत्पश्चात वह प्रकाश का सत्य धारण करती है और अंतरिक्ष का सार बन जाती है। इसे कहते हैं पूर्णरूप से परिमार्जित हो जाने पर वह 'दिव्य दीप्ति' का रूप धारण कर लेती है जिसे 'रवि' कहते हैं। तब ये तीनों तरह के प्रकाश जो उपर्युक्त लोकों के सार हैं, एकोभूत होकर दिव्य प्रकाश हो जाते हैं जिसे 'वेद' कहते हैं। इसलिए संस्कृत को 'देववाणी' और 'वेद' को 'देवग्रंथ' कहा गया है। वैदिक धर्म में उपनयन के बाद ही ब्राह्मण वेदविद्या अध्ययन के लिए योग्य माना जाता था।

सोलह संस्कारों में उपनयन का महत्व बहुत अधिक है। देखा जाए तो उपनयन आध्यात्मिक पुनर्जन्म है। पहले जन्म में अस्तित्व की शुद्धता बाह्य रूप से होती है। दूसरे जन्म का मतलब है कि गहरे आंतरिक स्तर पर जन्म लेना यानी उपनयन संस्कार से मनुष्य का दूसरा जन्म माना जाता है। उपनयन संस्कार में जो गायत्री मंत्र है, उसमें सविता (सूर्य ) की प्रार्थना की गई है जो सृष्टि का मूल उद्गम है और जो प्रकाश और जीवन का स्रोत है। दिव्यता ईश्वर की प्रकृति का सबसे प्रमुख आविर्भाव है। जो दैवीय प्रकाश को देदीप्यमान महिमा के रूप में ध्यान करते हैं और जो हमारी आत्मिक दिव्यता को पूर्ण करे। 

एक और विचारणीय प्रश्न है ?

हमारे ऋषियों ने कैसे वेदों की रक्षा की और उनका मूल स्वरूप आज भी हज़ारों वर्षों से वही अपने मूल रूप में विद्यमान है। हिन्दू धर्म के लिए वेद इतना महत्वशाली होने के कारण आर्ष ऋषियों ने इसकी पूर्ण रक्षा हेतु ऐसे सूत्र का निर्माण किया जो अपने आप में कम महत्व नहीं रखता। इतने दीर्घ काल से वेद का एक भी अक्षर विकृत नहीं हुआ। आज भी हमारे वेद- पाठियों के मुख वेदों का सस्वर उच्चारण उसी प्रकार से शुद्ध रूप से सुना जा सकता है, जैसा यह प्राचीन वैदिक युग में था। इसके आठ सूत्रों की व्यवस्था की गई थी। इन सूत्रों के कारण वेद का पद क्रमोच्चरण तथा विलोक उच्चारण में अनेक बार आता है जिसके रूप ज्ञान में किसी भी प्रकार की त्रुटि की संभावना नहीं है।

आज बस इतना ही .....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन sabhar Facebook wall sat sangh

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विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो पर किया अनिल अनुसंधान )

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■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि  = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय  = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं ।*
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