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सोमवार, 20 जनवरी 2025

हमारा शरीर अपने आप में एक जटिल और अद्भुत दुनिया है

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 क्या आप जानते हैं? हमारा शरीर अपने आप में एक जटिल और अद्भुत दुनिया है


। यकीन नहीं होता? तो यह सुनिए:


•अगले 30 सेकंड में, आपका शरीर 7 करोड़ 2 लाख लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) तैयार कर चुका होगा।


•इसी दौरान, आपकी 1,74,000 स्किन कोशिकाएं झड़ जाएंगी।


•आपका खून शरीर के अंदर लगभग 7 किलोमीटर का सफर तय कर चुका होगा।


•आपके दिमाग में 25 नए विचार आ चुके होंगे।


•और आपकी आँखें 600MB डेटा को प्रोसेस कर चुकी होंगी।


सोचिए, हर सेकंड आपका शरीर कितने चमत्कार करता है। आपका शरीर सचमुच एक जीवित ब्रह्मांड है!

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#science #biology #humanity #bodybuilding #scifi #gk #knowledgeispower

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शनिवार, 18 जनवरी 2025

त्रिफला सेवन के लाभ

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 शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।


2⭐ बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।


3⭐ ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।


4⭐ वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।


5⭐ शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।


6⭐ हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।


          ओषधि के रूप में त्रिफला 

  

⭐ रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होता है।

अथवा त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होता है।

इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।


⭐ सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी ले। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंग।


⭐ शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।


⭐ एक चम्मच बारीख त्रिफला चूर्ण, गाय का घी10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते है। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।


⭐ त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते है।


⭐ त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।


⭐ चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिये।


⭐ मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले।त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।


त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।

दो माह तक सेवन करने से चश्मा भी उतर जाता है।


विधिः👉 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 500 ग्राम देसी गाय का घी व 250 ग्राम शुद्ध शहद मिलाकर शरदपूर्णिमा की रात को चाँदी के पात्र में पतले सफेद वस्त्र से ढँक कर रात भर चाँदनी में रखें। दूसरे दिन सुबह इस मिश्रण को काँच अथवा चीनी के पात्र में भर लें।


सेवन-विधि👉 बड़े व्यक्ति10 ग्राम छोटे बच्चे 5 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें दिन में केवल एक बार सात्त्विक, सुपाच्य भोजन करें। इन दिनों में भोजन में सेंधा नमक का ही उपयोग करे। सुबह शाम गाय का दूध ले सकते हैं।सुपाच्य भोजन दूध दलिया लेना उत्तम है कल्प के दिनों में खट्टे, तले हुए, मिर्च-मसालेयुक्त व पचने में भारी पदार्थों का सेवन निषिद्ध है। 40 दिन तक मामरा बादाम का उपयोग विशेष लाभदायी होगा। कल्प के दिनों में नेत्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य करें।


मात्राः 4 से 5 ग्राम तक त्रिफला चूर्ण सुबह के वक्त लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ इसका सेवन करें तथा एक घंटे बाद तक पानी के अलावा कुछ ना खाएं और इस नियम का पालन कठोरता से करें ।


सावधानीः👉 दूध व त्रिफला के सेवन के बीच में दो ढाई घंटे का अंतर हो और कमजोर व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को बुखार में त्रिफला नहीं खाना चाहिए।


घी और शहद कभी भी सामान मात्रा में नहीं लेना चाहिए यह खतरनाख जहर होता है ।


त्रिफला चूर्ण के सेवन के एक घंटे बाद तक चाय-दूध कोफ़ी आदि कुछ भी नहीं लेना चाहिये।


त्रिफला चूर्ण हमेशा ताजा खरीद कर घर पर ही सीमित मात्रा में (जो लगभग तीन चार माह में समाप्त हो जाये ) पीसकर तैयार करें व सीलन से बचा कर रखे और इसका सेवन कर पुनः नया चूर्ण बना लें। साभार मधु सिंह  फेस बुक वॉल

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शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

काम वासना और आध्यात्मिक ज्ञान

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 आज की युवा पीढ़ी वासना - कामवासना और अज्ञानता के चलते अंधकार में डूबती चली जा रही है जब तक कि लोग उस आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त नहीं करेंगे जो इस जीवन का महासत्य है ! 

     जीवन ऊर्जा की बात करें तो जिसे वीर्य कहा जाता है यह एक ऐसी चमत्कारी ऊर्जा है जो एक जीवन को प्रकट करती है ! कभी सोचे समझे हो कि आखिर इस वीर्य में इतनी शक्ति आती कहां से है जिससे वह एक जीते जागते जीव को प्रकट करता है ?? सोचो सोचो सोचने का पैसा नहीं लगता !! इसमें वह चैतन्य आखिर कहां से आता है जो बड़ा होकर संसार में अद्भुत कार्य करता है ?? 

  वीर्य एक आध्यात्मिक पदार्थ है ! अपने इस अस्तित्व को एक पल के लिए तेल का दीपक समझो ! जैसे बिना तेल के दीपक में मौजूद लौ टिमटिमाती है और उसके बाद दीपक बुझ जाता है ठीक उसी भांति वीर्य के बिना हमारा यह अस्तित्व जीवित्त लास की भांति जानो ! जिससे हमारी औरा फीकी पड़ जाती है तथा हमारा मन और शरीर शक्तिहीन बनता है , हमारे विचार व भावनाएं अशुद्ध होकर अंधकारमय बन जाते हैं ! हमारे ऋषि मुनि जानते थे कि जीवन शक्ति की रक्षा , पोषण और निर्देशन करना आध्यात्मिक जागृति और ब्रह्मांडीय चेतना इन दोनों की कुंजी थी ! 

 अब समझते हैं कि वीर्य ऊर्जा और आध्यात्म के बीच कौन सा संबंध है जो आध्यात्मिक जीवन में अतिआवश्यक है !    

 आध्यात्मिक जानते हैं कि परम ब्रह्म में लीन होने के लिए उन्हें हर वक्त अनुशासन के साथ स्वयं को नियन्त्रण रखना होगा ! ब्रम्ह में जो व्यक्ति विलीन होना चाहता है तो उन्हें ब्रम्ह ऊर्जा को सुरक्षित रखना होगा क्योंकि ब्रम्ह ऊर्ज वो चाबी है जो ब्रम्ह के पास पहुंचाती है ! एक धनुर्धर व्यक्ति जब तीर छोड़ने वाला होता है तो पूरे शरीर मन और सांस के साथ पूरे शरीर की ऊर्जा को स्थिर करना पड़ता है तभी उसका तीर सधता है और अपने निशाने पर लगता है ! यह वीर्य भी कुछ उसी भांति है यदि यह ऊर्जा बिखर जाती है और इधर-उधर की चीजों में नष्ट हो जाती है तब आपका निशाना डगमगा जाता है ! वीर्य केवल एक सेक्सुअल एनर्जी नहीं यह हमारे पूरे शरीर बुद्धि उसके हर एक कण के साथ जुड़ी होती है ! अतः जब कोई व्यक्ति गलत काम करके उसकी ऊर्जा को नष्ट करता है तो निर्बलता उसके आंख से लेकर उसके चेहरे मन और शरीर पर पड़ती है ! क्या कभी सोचे हो कि जब एक व्यक्ति वीर्य ऊर्जा को नष्ट करता है तो उसे आखिर गिल्टी फील क्यों होती है ?? क्यों अंदर से उसको बहुत बुरा लगता है ?? 

    क्योंकि यह वो ब्रह्मांडीय ऊर्जा है जिसकी ऊर्जा को आपकी आत्मा पहचानती है और इसके महत्व को भली भांति जानती है ! जब आपका मन इस ऊर्जा को नष्ट कर देता है तब आपकी आत्मा प्रतिक्रिया करती है इसी वजह से एक व्यक्ति को बहुत बुरा अनुभव होता है !! परीक्षण तो किए ही होगे जब आप अकेले में वीर्य नष्ट उपरांत के कुछ पल बाद विचारते हो ??


अब बात करते हैं उस ब्रह्मांडीय चक्र की जो वीर्य से कुंडलिनी के उच्चतम स्तर तक पहुंचती है ! वीर्य ऊर्जा कुंडली जागरण में एक बात महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है यह निष्क्रिय ऊर्जा रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित होती है ! जब वीर्य संगठित और रूपांतरित होता है तो यह कुंडली को पोषण देता है जिससे ये  रीढ़ की हड्डी के ऊपर उठती है और चेतना के उच्च केंद्रों को सक्रिय करती है ! यह यात्रा समुद्र की ओर बहने वाली नदी की भांति होती है ! नदी जो आपकी संरक्षित वीर्य की तरह है और समुद्र जो ब्रह्मांडीय चेतना है ! इस महत्वपूर्ण सार को संरक्षित करके आप अपनी व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना के साथ विलय करने में सक्षम हो जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे नदी अंत में समुद्र में विलीन हो जाती है !  कुंडलिनी योग में ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर बहती है और जब ऊर्जा नीचे से सबसे उच्चतम स्तर तक पहुंचती है तो एक - एक करके ही ऊर्जा के सारे द्वार खुलते जाते हैं ! आखरी में जब ऊर्जा उच्चतम स्तर तक पहुंचती है तब इस ब्रम्हांड के सारे नियम आपके सामने टूटते हुए प्रतीत होते हैं !

   एक बीज का विचार करें जिसमें पेड़ बनने की क्षमता होती है लेकिन तभी जब इसका पोषण किया जाता है ! वैसे ही वीर्य भी उस बीज जैसा होता है जिसमे पेड़ बनने की क्षमता होती है ! जब इसका पोषण करते हैं तो यह चेतना के सबसे उच्चतम स्तर तक पहुंचा देता है ! यह वो आध्यात्मिक ज्ञान का पेड़ बन जाता है जिसकी शाखाएं आकाश की ओर बढ़ती व जड़ें धरती की गहराई में जाती हैं जो हमारे भीतर ज्ञान, स्थिरता स्थापित करता है ! वीर्य ऊर्जा का यह ज्ञान आपको सचेत करने के लिए काफी है लेकिन ब्रह्मचर्य पालन की जानकारी के बिना यह अधूरी है और यह ज्ञान भी अधूरा है ! 

  संभव है आप में से ऐसे बहुत से लोग इस समस्या से परेशान होंगे तो प्रश्न उठता है कि कैसे इस ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए ??

१) यदि आपमें दृढ़ संकल्प है तो अपने देवी-देवता माता-पिता  या जिन्हें आप अधिक प्रेम करते हो साक्षी मानकर मंदिर में या उनके सामने ब्रह्मचर्य का संकल्प लेना ! यह संकल्प उपरांत  आप ब्रह्मचर्य का खंडन नहीं कर पाओगे क्योंकि इस तरह से संकल्प लेने के बाद आप गलत कार्य करने से घबराओगे और यही घबराना या डर आपको गलत कार्य करने से रोकेगा ! 


२) आप एक माली भांति बन जाओ जैसे एक माली अपने बाग बगीचे का पोषण करता है ! यदि वह माली पानी का सही तरीके से प्रयोग नहीं करेगा तो उसका बाग बगीचा नष्ट हो जाएगा ठीक उसी प्रकार यदि आप अपनी ऊर्जा को व्यर्थ के कार्य में या किसी संगी साथी संग मौज मस्ती करके बर्बाद करोगे तो आगे बस आपको पछताना पड़ेगा ! जैसे माली पानी का सही इस्तेमाल करके अपने बाग बगीचे को जीवंत बनाए रखता इसी भांति आप भी अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाओ जो आपको सफलता की ओर ले जाएगी एवं अध्यात्म की इस दुनिया में सबसे उच्चतम स्तर तक ले जाएगी ! 


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विज्ञान भैरव तंत्र और संभोग ओशो

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 ताओ कहता है अगर व्यक्ति संभोग में उतावला न हो, केवल गहरे विश्राम में ही शिथिल हो तो वह एक हजार वर्ष जी सकता है। अगर स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ गहरे विश्राम में हो एक दूसरे में डूबे हों कोई जल्दी न हो, कोई तनाव न हो, तो बहुत कुछ घट सकता है रासायनिक चीजें घट सकती हैं। क्योंकि उस समय दोनों के जीवन-रसों का मिलन होता है दोनों की शरीर-विद्युत, दोनों की जीवन-ऊर्जा का मिलन होता है। और केवल इस मिलन से–क्योंकि ये दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं–एक पॉजिटिव है एक नेगेटिव है। ये दो विपरीत धुरव हैं–सिर्फ गहराई में मिलन से वे एक दूसरे को और जीवतंता प्रदान करते हैं।


वे बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए लंबे समय तक जी सकते हैं। लेकिन यह तभी जाना जा सकता है जब तुम संघर्ष नहीं करते। यह बात विरोधाभासी प्रतीत होती है। जो कामवासना से लड़ रहे हैं उनका वीर्य स्खलन जल्दी हो जाएगा, क्योंकि तनाव ग्रस्त चित्त तनाव से मुक्त होने की जल्दी में होता है।


नई खोजों ने कई आश्चर्य चकित करने वाले तथ्यों को उद्धाटित किया है। मास्टर्स और जान्सन्स ने पहली बार इस पर वैज्ञानिक ढंग से काम किया है कि गहन मैथुन में क्या-क्या घटित होता है। उन्हें यह पता चला कि पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का समय से पहले ही वीर्य-स्खलन हो जाता है। पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का प्रगाढ़ मिलन से पहले ही स्खलन हो जाता है और काम-कृत्य समाप्त हो जाता है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां काम के आनंद-शिखर ऑरगॉज्म तक पहुंचती ही नहीं, वे कभी शिखर तक गहन तृसिदायक शिखर तक नहीं पहुंचतीं नब्बे प्रतिशत स्त्रियां।


इसी कारण स्त्रियां इतनी चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं और वे ऐसी ही रहेंगी। कोई ध्यान आसानी से उनकी सहायता नहीं कर सकता, कोइ दर्शन, कोई धर्म, कोई नैतिकता उसे पुरुष–जिसके साथ वह रह रही है–के साथ चैन से जीने में सहायक नहीं हो सकता। और तब उनकी खीझ उनका तनाव…क्योंकि आधुनिक विज्ञान तथा प्राचीन तंत्र दोनों ही कहते हैं कि जब तक स्त्री को गहन काम-तृप्ति नहीं मिलेगी, वह परिवार के लिए एक समस्या ही बनी रहेगी। वह हमेशा झगड़ने के लिए तैयार होगी।


इसलिए अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा झगड़े के भाव में रहती है तो सारी बातों पर फिर से विचार करो। केवल पत्नी ही नहीं, तुम भी इसका कारण हो सकते हो। और क्योंकि स्त्रियां काम संवेग, ऑरगॉज्म, तक नहीं पहुंचती, वे काम-विरोधी हो जाती हैं। वे संभोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होतीं। उनकी खुशामद करनी पड़ती है; वे काम- भोग के लिए तैयार ही नहीं होतीं। वे इसके लिए तैयार भी क्यों हो उन्हें कभी इससे कोई सुख भी तो प्राप्त नहीं होता। उलटे, उन्हें तो ऐसा लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करता है उन्हें इस्तेमाल किया गया है। उन्हें ऐसा लगता है कि वस्तु की भांति उपयोग कर उन्हें फेंक दिया गया है।


पुरुष संतुष्ट है क्योंकि उसने वीर्य बाहर फेंक दिया है। और तब वह करवट लेता है और सो जाता है और पत्नी रोती है। उसका उपयोग किया गया है और यह प्रतीति उसे किसी भी रूप में तृप्ति नहीं देती। इससे उसका पति या प्रेमी तो छुटकारा पाकर हल्का हो गया लेकिन उसके लिए यह कोई संतोषप्रद अनुभव न था।


नब्बे प्रतिशत स्त्रियों को तो यह भी नहीं पता कि ऑरगॉज्म क्या होता है? क्योंकि वे शारीरिक संवेग के ऐसी आनंददायी शिखर पर कभी पहुंचती ही नहीं जहां उनके शरीर का एक-एक तंतु सिहर उठे और एक-एक कोशिका सजीव हो जाए। वे वहां तक कभी पहुंच नहीं पातीं। और इसका कारण है समाज की काम-विरोधी चित्तवृत्ति। संघर्ष करनेवाला मन वहां उपस्थित है इसलिए स्त्री इतनी दमित और मंद हो गई है।


और पुरुष इस कृत्य को ऐसे किए चला जाता है जैसे वह कोई पाप कर रहा हो। वह स्वयं को अपराधी अनुभव करता है वह जानता है ”इसे करना नहीं चाहिए। ” और जब वह अपनी पत्नी या प्रेमिका से संभोग करता है तो वह उस समय किसी महात्मा के बारे में ही सोच रहा होता है। ”कैसे किसी महात्मा क पास जाऊं और किस तरह

काम-वासना से, इस अपराध से, इस पाप से पार हो जाऊं। ”


ओशो, तंत्र

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सोमवार, 13 जनवरी 2025

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् तंत्र रूप

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कुञ्जिका स्तोत्र पाठ विषय में भ्रांति है कि इसके पाठ के फल से दुर्गापाठ का फल मिल जाता है तो फिर सप्तशती के पाठ की क्या जरुरत है अतः सप्तशती पाठ के बाद में करें ।

परन्तु इसी स्तोत्र में लिखा है कि "इदं तु कुञ्जिका स्तोत्रं - मंत्र जागर्तिहैतवे" अतः मंत्र के जाग्रति की प्रार्थना तो मंत्र जपने से पहिले ही करनी चाहिये । जैसे के माला मंत्रो में ( ॐ मां माले महामाये........) प्रयोग में आया है ।

पुनः तंत्र ग्रंथो में लिखा है कि "भूत लिपि" के प्रयोग बिना मंत्र सिद्ध नहीं होता है । इस स्तोत्र में "अं, कं, चं, टं, तं, पं, यं, शं" शब्द आये है इनका अर्थ है, अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग, श वर्ग अर्थात समस्त मातृका का उच्चारण स्मरण है । अथ इसमें "भूत लिपि'" जाग्रति की सूक्ष्म क्रिया का समावेश है ।

मंत्र जागृति के २७ जप रहस्य हैं उनमें दोहन, आकर्षण, अमृतीकरण, दीप्तीकरण आदि हैं उनका प्रयोग इस स्तोत्र में नवार्ण मंत्र में है । उनमें आये बीजाक्षरों को देखने से मिलता है । यथा

ग्लौं (अशुद्धिनिवारण व दोहन हेतु ) ।

क्लीं जूं सः (अमृतीकरण हेतु )

आकर्षण हेतु ।

ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल- दीप्तीकरण हेतु । अतः इस का पाठ नवार्ण जप से पहिले व दुर्गापाठ से पहिले

॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् । ॥३॥

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥

अथ मन्त्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥२॥

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥

विच्चे चाऽभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥५॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥

अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराभिर्भव ।

आविर्भव हंसं लंक्षं मयि जाग्रय जाग्रय ।।

त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥

म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा कुञ्जिकायै नमो नमः ।

सां सीं सप्तशतीं सिद्धिं कुरुष्व जप-मात्रतः ॥९॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे

कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

॥ ॐ तत्सत् ॥ साभार दीपक शर्मा फेस बुक


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शनिवार, 28 दिसंबर 2024

धन्वंतरि प्रमुख डॉ रमेश पाटिल का काऊ कोलेस्टम पर gyan

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 *जूम मीटिंग*

*आदरणीय श्री रमेश पाटिल सर*

*रात्रि 8 बजे* 

*कोलेस्ट्रम ज्ञान*

*20 दिसंबर 2024*


*धनवंतरी का व्यापार कोलेस्ट्रम के कारण 23 राज्यों में फैल चुका है* 


*ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस*


 (Oxidative Stress) एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में ऑक्सीडेंट्स (Oxidants) और एंटीऑक्सीडेंट्स (Antioxidants) के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।


ऑक्सीडेंट्स वे रसायन होते हैं जो शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। एंटीऑक्सीडेंट्स वे रसायन होते हैं जो ऑक्सीडेंट्स को निष्क्रिय करने में मदद करते हैं और कोशिकाओं को नुकसान से बचाते हैं।


जब ऑक्सीडेंट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स के बीच संतुलन बिगड़ जाता है, तो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस होता है। यह स्थिति कई बीमारियों के लिए जिम्मेदार हो सकती है, जैसे कि:


- कैंसर

- मधुमेह

- हृदय रोग

- न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियाँ (जैसे कि अल्जाइमर और पार्किंसंस)


ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने के लिए, आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:


- एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें, जैसे कि फल, सब्जियाँ, नट्स और बीज।

- व्यायाम करें और शारीरिक गतिविधियों में भाग लें।

- तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान और अन्य तकनीकों का अभ्यास करें।

- धूम्रपान और शराब का सेवन कम करें या बंद करें।

- पर्याप्त नींद लें और अच्छी नींद की आदतें अपनाएं।


*कोलोस्ट्रम और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है। कोलोस्ट्रम में कई एंटीऑक्सीडेंट्स और इम्यूनोग्लोबुलिन्स होते हैं जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद कर सकते हैं।*


*कोलोस्ट्रम में पाए जाने वाले कुछ एंटीऑक्सीडेंट्स और उनके ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने वाले प्रभाव हैं:*


- *एंटीऑक्सीडेंट्स:* कोलोस्ट्रम में विटामिन सी, विटामिन ई, और बीटा-कैरोटीन जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं।


- *इम्यूनोग्लोबुलिन्स:* कोलोस्ट्रम में इम्यूनोग्लोबुलिन्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में भी योगदान करते हैं।


- *ग्रोथ फैक्टर्स:* कोलोस्ट्रम में ग्रोथ फैक्टर्स होते हैं जो कोशिकाओं की मरम्मत और विकास में मदद करते हैं और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में भी योगदान करते हैं।


इन एंटीऑक्सीडेंट्स, इम्यूनोग्लोबुलिन्स, और ग्रोथ फैक्टर्स के कारण, कोलोस्ट्रम ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद कर सकता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में भी योगदान कर सकता है।


*वायरल इन्फेक्शन और इम्युनिटी*


वायरल इन्फेक्शन और इम्युनिटी के बीच एक जटिल संबंध है। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं:


*वायरल इन्फेक्शन*


1. *वायरल प्रवेश*: वायरस शरीर में प्रवेश करते हैं और कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं।


2. *वायरल प्रतिकृति*: वायरस कोशिकाओं में प्रतिकृति करते हैं और नए वायरस बनाते हैं।


3. *प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया*: शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानती है और प्रतिक्रिया करती है।


*इम्युनिटी*


1. *प्राकृतिक इम्युनिटी*: शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस को पहचानती है और प्रतिक्रिया करती है।


2. *अधिग्रहित इम्युनिटी*: शरीर वायरस के प्रति प्रतिरक्षा विकसित करता है जो भविष्य में वायरल इन्फेक्शन से बचाव में मदद करता है।


3. *वैक्सीनेशन*: वैक्सीनेशन शरीर को वायरस के प्रति प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करता है।


*वायरल इन्फेक्शन और इम्युनिटी के बीच संबंध*


1. *प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया*: वायरल इन्फेक्शन के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शरीर को वायरस से बचाव में मदद करती है।


2. *इम्युनिटी का विकास*: वायरल इन्फेक्शन के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शरीर को वायरस के प्रति इम्युनिटी विकसित करने में मदद करती है।


3. *वैक्सीनेशन*: वैक्सीनेशन शरीर को वायरस के प्रति प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करता है और भविष्य में वायरल इन्फेक्शन से बचाव में मदद करता है।


*एंटीऑक्सीडेंट*


एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidants) वे रसायन होते हैं जो ऑक्सीडेटिव तनाव (Oxidative Stress) को कम करने में मदद करते हैं। ऑक्सीडेटिव तनाव तब होता है जब शरीर में ऑक्सीडेंट्स (Oxidants) की मात्रा अधिक होती है और एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा कम होती है।


एंटीऑक्सीडेंट्स के प्रकार:


1. _विटामिन सी_: विटामिन सी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है जो शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाता है।


2. _विटामिन ई_: विटामिन ई एक एंटीऑक्सीडेंट है जो शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाता है।


3. _बीटा-कैरोटीन_: बीटा-कैरोटीन एक एंटीऑक्सीडेंट है जो शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाता है।


4. _पॉलीफेनोल्स_: पॉलीफेनोल्स एक प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट हैं जो शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं।


*एंटीऑक्सीडेंट्स के लाभ:*


1. _ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करते हैं_: एंटीऑक्सीडेंट्स ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में मदद करते हैं।


2. _कोशिकाओं को बचाते हैं_: एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं।


3. _बीमारियों को रोकते हैं_: एंटीऑक्सीडेंट्स कई बीमारियों को रोकने में मदद करते हैं, जैसे कि कैंसर, मधुमेह, और हृदय रोग।


*बीटा सेल, ल्यूकोसाइट, साइटोकाइन, लिम्फोसाइट*


यहाँ इन शब्दों के अर्थ और उनके बीच के संबंध की जानकारी दी गई है:


*बीटा सेल (Beta Cell)*


बीटा सेल अग्न्याशय में पाए जाने वाले विशेष प्रकार के कोशिकाएं होती हैं। ये कोशिकाएं इंसुलिन नामक हार्मोन का उत्पादन करती हैं, जो शरीर में रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।


*ल्यूकोसाइट (Leukocyte)*


ल्यूकोसाइट, जिन्हें श्वेत रक्त कोशिकाएं भी कहा जाता है, शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये कोशिकाएं शरीर को संक्रमण और बीमारियों से बचाने में मदद करती हैं। ल्यूकोसाइट्स में कई प्रकार की कोशिकाएं शामिल हैं, जिनमें न्यूट्रोफिल, लिम्फोसाइट, मोनोसाइट, और ईोसिनोफिल शामिल हैं।


*साइटोकाइन (Cytokine)*


साइटोकाइन छोटे प्रोटीन होते हैं जो कोशिकाओं द्वारा उत्पादित किए जाते हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। साइटोकाइन कोशिकाओं के बीच संचार में मदद करते हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


*लिम्फोसाइट (Lymphocyte)*


लिम्फोसाइट एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लिम्फोसाइट्स दो प्रकार के होते हैं: बी कोशिकाएं और टी कोशिकाएं। बी कोशिकाएं एंटीबॉडी का उत्पादन करती हैं जो वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करने में मदद करती हैं, जबकि टी कोशिकाएं सीधे वायरस और बैक्टीरिया को नष्ट करने में मदद करती हैं।


कोलोस्ट्रम में कई पोषक तत्व और एंटीबॉडी होते हैं जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं। यहाँ कोलोस्ट्रम और ऊपर उल्लिखित शब्दों के बीच संबंध की जानकारी दी गई है:


*कोलोस्ट्रम और बीटा सेल*


कोलोस्ट्रम में इंसुलिन जैसे ग्रोथ फैक्टर्स होते हैं जो नवजात शिशु के अग्न्याशय में बीटा सेल्स के विकास में मदद करते हैं।


*कोलोस्ट्रम और ल्यूकोसाइट*


कोलोस्ट्रम में एंटीबॉडी और ल्यूकोसाइट्स होते हैं जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं।


*कोलोस्ट्रम और साइटोकाइन*


कोलोस्ट्रम में साइटोकाइन होते हैं जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।


*कोलोस्ट्रम और लिम्फोसाइट*


कोलोस्ट्रम में लिम्फोसाइट्स होते हैं जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं।


कोलोस्ट्रम में उपस्थित पोषक तत्व और एंटीबॉडी नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं और उन्हें संक्रमण और बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं।


*वायरल, बैक्टिरियल, फंगल बीमारियां और कोलेस्ट्रम*


कोलोस्ट्रम में कई एंटीबॉडी और पोषक तत्व होते हैं जो वायरल, बैक्टीरियल और फंगल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं। यहाँ कोलोस्ट्रम और इन बीमारियों के बीच संबंध की जानकारी दी गई है:


*वायरल बीमारियां*


1. *एंटीबॉडी*: कोलोस्ट्रम में वायरल एंटीबॉडी होते हैं जो वायरल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


2. *इम्यूनोग्लोबुलिन*: कोलोस्ट्रम में इम्यूनोग्लोबुलिन होते हैं जो वायरल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


3. *साइटोकाइन*: कोलोस्ट्रम में साइटोकाइन होते हैं जो वायरल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


*बैक्टीरियल बीमारियां*


1. *एंटीबॉडी*: कोलोस्ट्रम में बैक्टीरियल एंटीबॉडी होते हैं जो बैक्टीरियल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


2. *लैक्टोफेरिन*: कोलोस्ट्रम में लैक्टोफेरिन होता है जो बैक्टीरियल बीमारियों से बचाव में मदद करता है।


3. *लाइपोजोम*: कोलोस्ट्रम में लाइपोजोम होते हैं जो बैक्टीरियल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


*फंगल बीमारियां*


1. *एंटीबॉडी*: कोलोस्ट्रम में फंगल एंटीबॉडी होते हैं जो फंगल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


2. *लैक्टोफेरिन*: कोलोस्ट्रम में लैक्टोफेरिन होता है जो फंगल बीमारियों से बचाव में मदद करता है।


3. *साइटोकाइन*: कोलोस्ट्रम में साइटोकाइन होते हैं जो फंगल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


कोलोस्ट्रम में उपस्थित एंटीबॉडी, इम्यूनोग्लोबुलिन, लैक्टोफेरिन, लाइपोजोम और साइटोकाइन वायरल, बैक्टीरियल और फंगल बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।


*नेचुरल किलर सिस्टम और कोलेस्ट्रम*


नेचुरल किलर (एनके) सेल्स एक प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिका है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ये कोशिकाएं वायरस, बैक्टीरिया और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में मदद करती हैं।


कोलोस्ट्रम में नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने वाले कई घटक होते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख घटक हैं:


1. _इम्यूनोग्लोबुलिन्स_: कोलोस्ट्रम में इम्यूनोग्लोबुलिन्स होते हैं जो नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने में मदद करते हैं।


2. _साइटोकाइन्स_: कोलोस्ट्रम में साइटोकाइन्स होते हैं जो नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने में मदद करते हैं।


3. _लैक्टोफेरिन_: कोलोस्ट्रम में लैक्टोफेरिन होता है जो नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने में मदद करता है।


4. _लाइपोजोम्स_: कोलोस्ट्रम में लाइपोजोम्स होते हैं जो नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने में मदद करते हैं।


इन घटकों के कारण, कोलोस्ट्रम नेचुरल किलर सेल्स को सक्रिय करने में मदद करता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


*इम्युनिटी के प्रकार और स्रोत:*


*सक्रिय इम्युनिटी (Active Immunity)*


सक्रिय इम्युनिटी तब विकसित होती है जब शरीर स्वयं एंटीबॉडी और इम्यून सेल्स का उत्पादन करता है। यह इम्युनिटी वैक्सीनेशन, संक्रमण या प्रतिरक्षा प्रणाली के स्वाभाविक कार्य के कारण विकसित होती है।


*निष्क्रिय इम्युनिटी (Passive Immunity)*


निष्क्रिय इम्युनिटी तब विकसित होती है जब शरीर को तैयार एंटीबॉडी या इम्यून सेल्स प्राप्त होते हैं। यह इम्युनिटी मां के दूध, प्लाज्मा या इम्यूनोग्लोबुलिन के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।


*निष्क्रिय इम्युनिटी के स्रोत*


1. *इम्यूनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin)*: इम्यूनोग्लोबुलिन एक प्रकार का एंटीबॉडी है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


2. *लैक्टोफेरिन (Lactoferrin)*: लैक्टोफेरिन एक प्रकार का प्रोटीन है जो दूध में पाया जाता है और जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


3. *पीआरपी (PRP)*: पीआरपी एक प्रकार का प्लाज्मा है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


4. *मां का दूध*: मां का दूध एक प्राकृतिक स्रोत है जो शिशु को निष्क्रिय इम्युनिटी प्रदान करता है।


5. *गाय का दूध और कोलेस्ट्रम*: गाय का दूध और कोलेस्ट्रम भी निष्क्रिय इम्युनिटी के स्रोत हो सकते हैं, लेकिन इनका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।


*गो पीयूष सामग्री*


यहाँ दिए गए विटामिन, खनिज, अमीनो एसिड और कोलोस्ट्रम घटकों की जानकारी को संरचित और फॉर्मेटेड रूप में प्रस्तुत किया गया है:


*विटामिन विश्लेषण*


1. विटामिन ए - 24.0 माइक्रोग्राम/ग्राम

2. विटामिन बी1 - 18.0 माइक्रोग्राम/ग्राम

3. विटामिन बी2 - 19.3 माइक्रोग्राम/ग्राम

4. विटामिन बी5 - 2.75 माइक्रोग्राम/ग्राम

5. विटामिन बी6 - 19.0 माइक्रोग्राम/ग्राम

6. विटामिन बी12 - 0.1 माइक्रोग्राम/ग्राम

7. विटामिन सी - 0.45 माइक्रोग्राम/ग्राम

8. विटामिन ई - 0.30 माइक्रोग्राम/ग्राम

9. फोलिक एसिड - 2.75 माइक्रोग्राम/ग्राम


*खनिज विश्लेषण*


1. कैल्शियम - 966 मिलीग्राम/100 ग्राम

2. मैग्नीशियम - 152 मिलीग्राम/100 ग्राम

3. जिंक - 6 मिलीग्राम/100 ग्राम

4. सोडियम - 598 मिलीग्राम/100 ग्राम

5. पोटेशियम - 1320 मिलीग्राम/100 ग्राम


*आवश्यक अमीनो एसिड*


1. आइसोल्यूसीन - 1.46%

2. ल्यूसीन - 2.37%

3. मेथियोनीन - 4.08%

4. एलानिन - 2.50%

5. लाइसिन - 4.18%

6. टायरोसिन - 4.96%

7. थ्रेओनीन - 4.03%

8. ग्लाइसिन - 1.77%

9. फेनिलएलनिन - 2.42%

10. वैलीन - 2.16%


*गैर-आवश्यक अमीनो एसिड*


1. ग्लूटानिक एसिड - 9.13%

2. एस्पार्टिक एसिड - 5.57%

3. सेरीन - 4.77%

4. प्रोलाइन - 5.12%

5. हिस्टडीन - 1.46%


*कोलोस्ट्रम घटक*


1. प्रोटीन - 58.5%

2. कुल इम्युनोग्लोबुलिन - 25.1%

3. इम्यूनोग्लोबुलिन (प्रकार जीआई और जी2) - 23.3%

4. लैक्टोफेरिन - 0.5%

5. ट्रान्सफेरिन - 5.0 मिलीग्राम/ग्राम

6. लैक्टोपेरोक्सीडेज-थायोसाइनेट - 0.70%

7. प्रोलाइन-रिच पॉलीपेप्टाइड्स (पीआरपी) - 4.50%

8. इंसुलिन ग्रोथ फैक्टर (टाइप 1) - 1.50 माइक्रोग्राम/ग्राम

9. इंसुलिन ग्रोथ फैक्टर (टाइप 2) - 1.60 माइक्रोग्राम/ग्राम


*वृद्धि कारक*


1. व्युत्पन्न प्लेटलेट वृद्धि कारक - 4.50 एनजी/जी

2. एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर - 1.20 यूजी/जी

3. फाइब्रोब्लास्ट प्लेटलेट ग्रोथ फैक्टर - 5.60 एनजी/जी

4. ट्रांसफॉर्मिंग ग्रोथ फैक्टर z - 23.0 मेगा/100 ग्राम

5. ट्रांसफॉर्मिंग ग्रोथ फैक्टर - 0.02 मिलीग्राम/100 ग्राम

6. तंत्रिका वृद्धि कारक


कोलोस्ट्रम में कई पोषक तत्व और जैविक रूप से सक्रिय यौगिक होते हैं जो नवजात शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। यहाँ कोलोस्ट्रम में पाए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण घटकों की जानकारी दी गई है:


प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने वाले घटक


1. *इम्यूनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin)*: इम्यूनोग्लोबुलिन एक प्रकार का एंटीबॉडी है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


2. *पीआरपी (PRP)*: पीआरपी एक प्रकार का प्लाज्मा है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


3. *लैक्टोफेरिन (Lactoferrin)*: लैक्टोफेरिन एक प्रकार का प्रोटीन है जो दूध में पाया जाता है और जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


4. *ल्यूकोसाइट (Leukocyte)*: ल्यूकोसाइट एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


5. *लाइसोजाइम (Lysosome)*: लाइसोजाइम एक प्रकार का एंजाइम है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


6. *साइटोकाइन्स (Cytokines)*: साइटोकाइन्स एक प्रकार का प्रोटीन है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


7. *एएसई इनहिबिटर्स (ACE Inhibitors)*: एएसई इनहिबिटर्स एक प्रकार का एंजाइम है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करता है।


*पोषक तत्व*


1. *विटामिन*: कोलोस्ट्रम में विभिन्न प्रकार के विटामिन होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


2. *मिनरल*: कोलोस्ट्रम में विभिन्न प्रकार के मिनरल होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


3. *ग्रोथ फैक्टर्स*: कोलोस्ट्रम में ग्रोथ फैक्टर्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


*पेप्टाइड इम्यूनोथेरेपी (Peptide Immunotherapy)*


एक प्रकार की चिकित्सा है जिसमें पेप्टाइड्स का उपयोग करके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने का प्रयास किया जाता है। यह चिकित्सा विशेष रूप से एलर्जी और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज के लिए उपयोग की जाती है।


*कोलोस्ट्रम और पेप्टाइड इम्यूनोथेरेपी के बीच संबंध*:


1. _पेप्टाइड्स_: कोलोस्ट्रम में पेप्टाइड्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


2. _इम्यूनोग्लोबुलिन्स_: कोलोस्ट्रम में इम्यूनोग्लोबुलिन्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


3. _साइटोकाइन्स_: कोलोस्ट्रम में साइटोकाइन्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


4. _ग्रोथ फैक्टर्स_: कोलोस्ट्रम में ग्रोथ फैक्टर्स होते हैं जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


कोलोस्ट्रम में उपस्थित पेप्टाइड्स, इम्यूनोग्लोबुलिन्स, साइटोकाइन्स और ग्रोथ फैक्टर्स पेप्टाइड इम्यूनोथेरेपी के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


गौ पीयूष और बोवाइन कोलोस्ट्रम दोनों ही गाय के दूध से प्राप्त होने वाले उत्पाद हैं, लेकिन इनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं:


*गौ पीयूष*


1. _परिभाषा_: गौ पीयूष गाय के दूध का एक प्रकार है जो विशेष रूप से प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।


2. _संग्रहण_: गौ पीयूष को गाय के दूध के पहले दूध से संग्रहीत किया जाता है।


3. _पोषक तत्व_: गौ पीयूष में इम्यूनोग्लोबुलिन्स, साइटोकाइन्स, ग्रोथ फैक्टर्स और अन्य पोषक तत्व होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


*बोवाइन कोलोस्ट्रम*


1. _परिभाषा_: बोवाइन कोलोस्ट्रम गाय के दूध का पहला दूध है जो जन्म के बाद पहले कुछ दिनों में उत्पादित होता है।


2. _संग्रहण_: बोवाइन कोलोस्ट्रम को गाय के दूध के पहले दूध से संग्रहीत किया जाता है।


3. _पोषक तत्व_: बोवाइन कोलोस्ट्रम में इम्यूनोग्लोबुलिन्स, साइटोकाइन्स, ग्रोथ फैक्टर्स और अन्य पोषक तत्व होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।


मुख्य अंतर यह है कि गौ पीयूष एक विशेष प्रकार का दूध है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि बोवाइन कोलोस्ट्रम गाय के दूध का पहला दूध है जो जन्म के बाद पहले कुछ दिनों में उत्पादित होता है।


फ्रिज ड्राई (Freeze-Dry) तकनीक एक प्रक्रिया है जिसमें तरल पदार्थ को जमा दिया जाता है और फिर वैक्यूम में रखा जाता है ताकि तरल पदार्थ के अणु सीधे ठोस में परिवर्तित हो जाएं। यह प्रक्रिया कोलोस्ट्रम जैसे जैविक पदार्थों को संरक्षित करने के लिए उपयोग की जाती है।


*फ्रिज ड्राई तकनीक और कोलोस्ट्रम के बीच संबंध*


1. _संरक्षण_: फ्रिज ड्राई तकनीक कोलोस्ट्रम को संरक्षित करने में मदद करती है, जिससे इसके पोषक तत्व और जैविक रूप से सक्रिय यौगिक सुरक्षित रहते हैं।


2. _गुणवत्ता_: फ्रिज ड्राई तकनीक कोलोस्ट्रम की गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे इसके पोषक तत्व और जैविक रूप से सक्रिय यौगिक सुरक्षित रहते हैं।


3. _उपयोग_: फ्रिज ड्राई कोलोस्ट्रम का उपयोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने, एलर्जी और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में किया जा सकता है।


4. _सुरक्षा_: फ्रिज ड्राई तकनीक कोलोस्ट्रम को सुरक्षित बनाने में मदद करती है, जिससे इसके पोषक तत्व और जैविक रूप से सक्रिय यौगिक सुरक्षित रहते हैं।


फ्रिज ड्राई तकनीक कोलोस्ट्रम को संरक्षित करने, इसकी गुणवत्ता को बनाए रखने और इसका उपयोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद करती है।

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गुरुवार, 26 दिसंबर 2024

तंत्र और सृष्टि की उत्पति

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 #तंत्र के अनुसार महाशून्य स्थित #बिंदु में इस स्पंदन से वायु प्रकट हुआ जिसने अग्नि को जन्म दिया अग्नि ने जल को तथा जल ने धरती को प्रकट किया अग्नि ही आदित्य है। वही हमारे शरीर में स्थित प्राण है। ब्रह्मांड पिरामिड आकार के स्पंदन कर रहा है। उसके विभिन्न स्तरों पर भाँति-भाँति के विश्व विराजमान हैं। हर स्तर का अपना एक निश्चित स्पंदन और चेतना है। इस महाविशाल पिरामिड के शिखर पर दश महाविद्याये रहती हैं जो ब्रह्मांड का सृजन, व्यवस्था और अवशोषण करती हैं,

ये परम ब्रह्मांडीय माँ के व्यक्तित्व के ही दस पहलू हैं। 

वसुगुप्त ने इस दिव्य स्पंदन पर स्पंद कारिका नामक पुस्तक में लिखा है कि काल के रेखीय क्षणों में यह अनुक्रम से स्वतंत्र रहता है लेकिन काल के विभिन्न पहलुओं में इसकी कौंध आती-जाती नज़र आती है, हालाँकि वास्तव में ऐसा नहीं होता यही माया है। शक्ति की इस महान ताक़त को सिर्फ़ तांत्रिक रहस्यवादी ही महसूस कर पाते हैं। स्पंद कारिका में इसे शक्ति-चक्र कहा गया है दैविक स्रोत से उद्भूत मातृ-शक्ति का व्यापक चक्र, 


तंत्र के अनुसार सृष्टि-क्रम कुछ इस प्रकार है---- पहले परर्पिंड यानी संयोग (शिव और शक्ति का मिलन, फिर त्रिगुणात्मक आदि-पिंड और तब नीले रंग का महाप्रकाश, धूम्र रंग का महावायु,,रक्तवर्ण का महातेज, श्वेत वर्ण, का महासलिल, पीतवर्ण की महापृथ्वी, पांच महातत्वों से उत्पत्ति, महासाकार पिंड, भैरव, श्रीकंठ , सदाशिव, ईश्वर, रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा, नर-नारी, प्राकृतिक पिंड (नर-नारी संयोग) और पुरुष तथा नारी का जन्म.

इस प्रकार अग्नि, सूर्य और सोम मिलकर सृजन का त्रिभुज यानी योनि बनाते हैं. और यूं शून्य तथा अंधकार से सृजन की कहानी शुरू होती है. शिव से पृथ्वी तक ३६ तत्त्व हैं जो आत्मा से जुड़ कर सजीव और निर्जीव जगत का निर्माण करते हैं। 


प्रलय काल में पृथ्वी जल में, जल अग्नि में, अग्नि वायु में और वायु आकाश में लीन होकर पुनः बिंदु रूप में आ जाती है. यही संकोच और विस्तार प्रलय और सृजन है तथा प्राणि-मात्र में जन्म और मृत्यु है, बिंदु रूप ब्रह्म वामाशक्ति है क्योंकि वही विश्व का वमन (यानी उत्पन्न) करती है-----ब्रह्म बिंदुर महेशानि वामा शक्तिर्निगते

विश्वँ वमति यस्मात्तद्वामेयम प्रकीर्तिता ( ज्ञानार्णव तंत्र, प्रथम पटल-१४)


पराशक्ति नित्य तत्त्व है जो हमेशा वर्तमान स्थिति में रहती और विश्व का संचालन करती है. वही शक्ति आद्य यानी ब्रह्म की जन्मदात्री है. वही जगत का मूल कारण,निमित्ति और उपादान भी है-ईशावास्यमिदम् सर्वम् यत किंच जगत्याम्.जगत (यजुर्वेद ४.१) वह शक्ति स्वतंत्र है---- चिति: स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतु:.(प्रत्त्यभिज्ञा सूत्र). जगत् निर्माण के लिये चिति शक्ति स्वतंत्र है. शरीर स्थित सहस्रार पद्म में चिति शक्ति रहती है. उसे ही मणिद्वीप कहा जाता है। 


अंतरिक्ष में मौज़ूद सूर्य ही जीव-जगत में प्राण के रूप में विराजमान रहता है; आदित्यो ह वै प्राणो. इसलिये सूर्य को प्रसविता कहते हैं. सूर्य हैं प्रत्यक्ष देवता. सूर्य देता और लेता है, जो अन्न हम खाते हैं वह शरीर के अंदर जाते ही अपनी सत्ता खो बैठता है. रह जाती है अन्नाद सत्ता जो अग्नि के रूप में होती है, जिसे वाक कहते हैंं, इस अग्नि के गर्भ में सारी दुनिया समायी है. वह वामा में प्रसूत होती है, ज्येष्ठा में बढ़ती है और वैखरी में समाप्त हो जाती है, सोम को विराट दिशा में वाक प्रकाशित करता है, विराट का अर्थ होता है दश, इन दसों दिशाओं के स्थिरीकरण, नियंत्रण और प्रशासन को दश महाविद्या कहा जाता है। 


तन्त्रशब्द के अर्थ बहुत विस्तृत हैं। यह शब्द ‘तन्’ और ‘त्र’ (ष्ट्रन) इन दो धातुओं से बना है, अतः “विस्तारपूर्वक तत्त्व को अपने अधीन करना”- यह अर्थ व्याकरण की दृष्टि से स्पष्ट होता है, जबकि ‘तन्’ पद से प्रकृति और परमात्मा तथा ‘त्र’ से स्वाधीन बनाने के भाव को ध्यान में रखकर ‘तन्त्र’ का अर्थ - देवताओं के पूजा आदि उपकरणों से प्रकृति और परमेश्वर को अपने अनुकूल बनाना होता है। साथ ही परमेश्वर की उपासना के लिए जो उपयोगी साधन हैं, वे भी ‘तन्त्र’ ही कहलाते हैं। “सर्वेऽथा येन तन्यन्ते त्रायन्ते च भयाज्जनान्। इति तन्त्रस्य तन्त्रत्वं तन्त्रज्ञाः परिचक्षते।। ‘जिसके द्वारा सभी मन्त्रार्थों-अनुष्ठानों का विस्तार पूर्वक विचार ज्ञात हो तथा जिसके अनुसार कर्म करने पर लोगों की भय से रक्षा हो, वही ‘तन्त्र’ है।’


तन्त्र शास्त्र क्या है ? तन्त्र-शास्त्रों के लक्षणों के विषय में ऋषियों ने शास्त्रों में जो वर्णन किया है, उसके अनुसार निम्न विषयों का जिस शास्त्र में वर्णन किया गया हो, उसको ‘तन्त्र-शास्त्र’ कहते हैं।


१॰ सृष्टि-प्रकरण, २॰ प्रलय-प्रकरण, ३॰ तन्त्र-निर्णय, ४॰ दैवी सृष्टि का विस्तार, ५॰ तीर्थ-वर्णन, ६॰ ब्रह्मचर्यादि आश्रम-धर्म, ७॰ ब्राह्मणादि-वर्ण-धर्म, ८॰ जीव-सृष्टि का विस्तार, ९॰ यन्त्र-निर्णय, १०॰ देवताओं की उत्पत्ति, ११॰ औषधि-कल्प, १२॰ ग्रह-नक्षत्रादि-संस्थान, १३॰ पुराणाख्यान-कथन, १४॰ कोष-कथन, १५॰ व्रत-वर्णन, १६॰ शौचा-शौच-निर्णय, १७॰ नरक-वर्णन, १८॰ आकाशादि पञ्च-तत्त्वों के अधिकार के अनुसार पञ्च-सगुणोपासना, १९॰ स्थूल ध्यान आदि भेद से चार प्रकार का ब्रह्म का ध्यान, २०॰ धारणा, मन्त्र-योग, हठ-योग, लय-योग, राज-योग, परमात्मा-परमेश्वर की सब प्रकार की उपासना-विधि, २१॰ सप्त-दर्शन-शास्त्रों की सात ज्ञान-भूमियों का रहस्य, २२॰ अध्यात्म आदि तीन प्रकार के भावों का लक्ष्य, २३॰ तन्त्र और पुराणों की विविध भाषा का रहस्य, २४॰ वेद के षङंग, २५॰ चारों उप-वेद, प्रेत-तत्त्व २६॰ रसायन-शास्त्र, रसायन सिद्धि, २७॰ जप-सिद्धि, २८॰ श्रेष्ठ-तप-सिद्धि, २९॰ दैवी जगत्-सम्बन्धीय रहस्य, ३०॰ सकल-देव-पूजित शक्ति का वर्णन, ३१॰ षट्-चक्र-कथन, ३२॰ स्त्री-पुरुष-लक्षण वर्णन, ३३ राज-धर्म, दान-धर्म, युग धर्म, ३४॰ व्वहार-रीति, ३५॰ आत्मा-अनात्मा का निर्णय इत्यादि।


विभिन्न ‘तन्त्र’-प्रणेताओं के विचार-द्वारा ‘तन्त्रों’ को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं-


१॰ श्री सदा-शिवोक्त तन्त्र, २॰ पार्वती-कथित तन्त्र, ३॰ ऋषिगण-प्रणीत तन्त्र ग्रन्थ। ये १॰ आगम , २॰ निगम, और ३॰ आर्ष तन्त्र कहलाते हैं।


यह एक स्वतन्त्र शास्त्र है, जो पूजा और आचार-पद्धति का परिचय देते हुए इच्छित तत्त्वों को अपने अधीन बनाने का मार्ग दिखलाता है। इस प्रकार यह साधना-शास्त्र है। इसमें साधना के अनेक प्रकार दिखलाए गए हैं, जिनमें देवताओं के स्वरुप, गुण, कर्म आदि के चिन्तन की प्रक्रिया बतलाते हुए ‘पटल, कवच, सहस्त्रनाम तथा स्तोत्र’- इन पाँच अंगों वाली पूजा का विधान किया गया है। इन अंगों का विस्तार से परिचय इस प्रकार हैः-


(क) पटल – इसमें मुख्य रुप से जिस देवता का पटल होता है, उसका महत्त्व, इच्छित कार्य की शीघ्र सिद्धि के लिए जप, होम का सूचन तथा उसमें उपयोगी सामग्री आदि का निर्देशन होता है। साथ ही यदि मन्त्र शापित है, तो उसका शापोद्धार भी दिखलाया जाता है। 

(ख) पद्धति – इसमें साधना के लिए शास्त्रीय विधि का क्रमशः निर्देश होता है, जिसमें प्रातः स्नान से लेकर पूजा और जप समाप्ति तक के मन्त्र तथा उनके विनियोग आदि का सांगोपांग वर्णन होता है। इस प्रकार नित्य पूजा और नैमित्तिक पूजा दोनों प्रकारों का प्रयोग-विधान तथा काम्य-प्रयोगों का संक्षिप्त सूचन इसमें सरलता से प्राप्त हो जाता है। 


(ग) कचव – प्रत्येक देवता की उपासना में उनके नामों के द्वारा उनका अपने शरीर में निवास तथा रक्षा की प्रार्थना करते गुए जो न्यास किए जाते हैं, वे ही कचव रुप में वर्णित होते हैं। जब ये ‘कचव’ न्यास और पाठ द्वारा सिद्ध हो जाते हैं, तो साधक किसी भी रोगी पर इनके द्वारा झाड़ने-फूंकने की क्रिया करता है और उससे रोग शांत हो जाते हैं। कवच का पाठ जप के पश्चात् होता है। भूर्जपत्र पर कवच का लेखन, पानी का अभिमन्त्रण, तिलकधारण, वलय, ताबीज तथा अन्य धारण-वस्तुओं को अभिमन्त्रित करने का कार्य भी इन्हीं से होता है।


(घ) सहस्त्रनाम – उपास्य देव के हजार नामों का संकलन इस स्तोत्र में रहता है। ये सहस्त्रनाम ही विविध प्रकार की पूजाओं में स्वतन्त्र पाठ के रुप में तथा हवन-कर्म में प्रयुक्त होते है। ये नाम देवताओं के अति रहस्यपूर्ण गुण-कर्मों का आख्यान करने वाले, मन्त्रमय तथा सिद्ध-मंत्ररुप होते हैं। इनका स्वतन्त्र अनुष्ठान भी होता है। 


(ङ) स्तोत्र – आराध्य देव की स्तुति का संग्रह ही स्तोत्र कहलाता है। प्रधान रुप से स्तोत्रों में गुण-गान एवँ प्रार्थनाएँ रहती है; किन्तु कुछ सिद्ध स्तोत्रों में मन्त्र-प्रयोग, स्वर्ण आदि बनाने की विधि, यन्त्र बनाने का विधान, औषधि-प्रयोग आदि भी गुप्त संकेतों द्वारा बताए जाते हैं। तत्त्व, पञ्जर, उपनिषद् आदि भी इसी के भेद-प्रभेद हैं। इनकी संख्या असंख्य है। इन पाँच अंगों से पूर्ण शास्त्र ‘तन्त्र शास्त्र’ कहलाता है।

 साभार भारत धर्म फेस बुक वॉल

#भारतधर्म

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सोमवार, 2 दिसंबर 2024

सिद्धि क्या है ! ! ! सिद्धि की देवियां

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सिद्धि क्या है ! ! ! सिद्धि की देवियां➖

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💥प्रणाम मित्रों ! प्राचीन काल के सारे शोध व अविष्कार तांत्रिकों व तंत्र की देन है,तरंगों की खोज से ले कर अणु परमाणु तक कि खोज तांत्रिकों की देन है-तांत्रिकों को वैज्ञानिक माना जाता था,और आज के तांत्रिकों का हाल देखिये-लो स्टैंडर्ड।आम आदमी तंत्र के नाम से भय खाता है,इसमें लोगों की गलती नही है-तंत्र के नाम पर सिर्फ जालसाजी और भ्रम ही तो फैलाया जा रहा है।


💥तंत्र विद्या शक्ति की उपासना है। यह शक्ति मानसिक है,इसलिए इसमें मानस को उसी भाव में केंद्रित करना होता है,जिसकी सिद्धि करनी होती है।विपरीत भाव का ध्यान करने से सिद्धि प्राप्त नही होती,क्योंकि तब उद्देश्य कुछ और होता है और परिश्रम दूसरी दिशा में हो जाता है।इसी प्रकार प्राचीन काल में तांत्रिकों ने शक्ति की प्रतीकात्मक देवी को कई रूपों में व्यक्त किया गया है।उनकी मूर्तियां विभिन्न स्वरूपों में बनायी गई हैं,जो मानसिक शक्ति के विभिन्न भावों को उदीप्त करती हैं।

यहां उन देवियों एवं प्रतीकों के सम्बंध में आवश्यक विवरण जान लेना आवश्यक होगा।इसे जाने बिना कोई भी तंत्र साधक सिद्धि नही प्राप्त कर सकता।


🟥 श्री काली 🟥


काली शक्ति के उत्तेजक,ओजात्मक, वीरता,साहस एवं कठिन संकल्प की प्रतीक है।मनुष्य के अंदर का क्रोध,उत्साह,उल्लास,साहस,भयमुक्तता,तीव्रता,तेज,पराक्रम आदि गुणों में इन्ही की अभिव्यक्ति होती है।इनके कई उपरूप भी हैं।जैसे दक्षिण काली,भद्रकाली,महाकाली आदि।ध्यान लगाने से सभी प्रकार की विध्वंसक एवं पराक्रम सम्बन्धी सिद्धियां प्राप्त होती हैं।उपरूपों का प्रयोग तंत्र की अनेक सिद्धि क्रियाओं में किया जाता है।दक्षिण काली का ध्यान अघोरपंथियों के बीच अधिक प्रचलित है।भद्रकाली गृहस्थों महाकाली रौद्र सिद्धियों के इच्छकों हेतु धन की प्रतीक हैं।इनका ध्यान रात्रि के तीसरे पहर में श्मशान या एकांत कमरे में लगाना चाहिए।अमावस्या पक्ष इसके लिए उपयुक्त होता है।वर्ष में कार्तिक का महीना श्रेष्ठ समझा जाता है।इनके आसन आदि लाल रंग के होने चाहिए,क्योंकि इन्हें रक्त रंग पसंद है।


♨️मंत्र➖


ॐ क्रीं क्रां क्रीं हुं हुं हुं महाकालीके।।


◆सिद्धि का भाव-काम,हिंसा,शत्रु दमन,क्रोध,अंधा आकर्षण।


🟥 श्री बगलामुखी 🟥


दृढ़ संकल्प एवं आत्मबल की सबलता की प्रतीकात्मक देवी हैं।इनको बगुलामुखी,बल्गामुखी या पीताम्बरा कहा जाता है।इनकी सिद्धि से मनुष्य में संकल्प और आत्मबल दृढ़ होता है और उसे प्रत्येक कार्य में सफलता सिद्ध होती है।शत्रु भयभीत होकर शामिल हो जाता है।पीला रंग इनको प्रिय है।इनकी सिद्धि हेतु गम्भार की चौकी पर पूर्व मुंह की ओर मुख करके आसन लगाना चाहिए।पूजन षोड़षोपचार विधि से करना चाहिए,किंतु हमेशा मानसिक ही लगाएं।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं।

स्तंभय जिह्वा कीलय बुद्धिविनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-आनयबल,प्रभाव, का व्यक्तित्व,सफलता आदि।


🟥 श्री महालक्ष्मी 🟥


श्री महालक्ष्मी धन की प्रतीकात्मक देवी हैं।इनकी सिद्धि से मनुष्य में कर्मठता और उल्लास की स्थापना होती है।इनकी सिद्धि कृष्ण पक्ष में की जाती है।लाल रंग,पीला रंग इन्हें पसंद है।इनका ध्यान भी पूर्व की तरफ मुख कर के किया जाता है।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्मी पद्मा वत्यै नमः।

महालक्ष्मी महादेवी महेश्वरी महामूर्ति महामाया नमः।।


◆सिद्धि का भाव-धन लेने का भाव।


🟥 श्री तारा 🟥


इन्हें काली का ही प्रतिरूप समझा जाता है।इनकी साधना सूर्य-शक्ति की साधना है,तेज और पराक्रम प्रदान आराधना शव-साधना में भी की जाती है।देवी का प्रिय रंग लाल है।अमावस्या के पक्ष में इनकी साधना विशेष फल दायिनी है।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं स्त्रीं क्लीं हुं फट स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-गम्भीर रति भाव।


🟥 श्री त्रिपुर सुंदरी 🟥


ये शक्ति का मोहक स्वरूप है और इनकी साधना वशीकरण,पौरुष वाणीमाधुर्य,शरीर की कमनीयता,एवं मन के लालित्य के लिए की जाती है।भैरवी साधक सर्वप्रथम इसी देवी को सिद्ध करते हैं।इन्हें सफेद रंग प्रिय है।उत्तर की ओर मुख करके इन्हें सिद्ध किया जाता है।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौं: ह्रीं क्रीं ऐं ई ल ह्रीं।

ह स क ल ह्रीं श्री स क ल ह्रीं सौं ऐं क्लीं श्रीं ह्रीं।।


◆सिद्धि का भाव-प्रणय,रूप मन की कोमलता।


🟥 श्री त्रिपुर भैरवी 🟥


ये भी सम्मोहन की देवी है इनकी सिद्धि से समृद्धि,कार्य सिद्धि,मानसिक प्रसन्नता,विलक्षण सम्मोहन शक्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।भैरवी साधकों के लिए ये इष्ट हैं।इनका प्रिय रंग लाल है।इन्हें भी उत्तर की ओर मुख कर के सिद्ध किया जाता है।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं श्रीं त्रिपुर भैरव्ये नमः स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-मानसिक प्रबुद्धता एवं गम्भीर प्रणय का भाव।


🟥 श्री भुवनेश्वरी 🟥


ये भुवन की समृद्धि प्रदान करने वाली देवी हैं।जो सांसारिक समृद्धि, यश,वैभव,शक्ति,सुख चाहते हैं,उन्हें इस देवी का ध्यान लगाना चाहिए।देवी को लाल रंग पसंद है।इनकी साधना-आराधना कृष्ण पक्ष की एकांत रात्रि में करें।


♨️मंत्र➖


ॐ बाल रति धुति मिन्दु करी टां।

तुंग कुचां नयन त्रय युक्तामा।।


◆सिद्धि का भाव-क्रूर,क्षुब्ध,क्रोधी को वश में करने वाला।


🟥 श्री मातंगी 🟥


इन्हें सरस्वती भी कहा जाता है।ये विद्या,ज्ञान एवं ललित कलाओं की देवी हैं।इनके ध्यान से मन को शांति और आहलाद प्राप्त होता है।इनको सफेद रंग प्रिय है।इनके विभिन्न स्वरूपों के प्रतीकात्मक चित्र मिलते हैं।


♨️मन्त्र➖


ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्ये फट स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-संगीत,ललित कला,कलात्मक भाव।


🟥 श्री धूमावती 🟥


ये ज्ञान,वैराग्य एवं दरिद्रता की देवी हैं।इनकी आराधना शत्रु नाश एवं वैराग्य की प्राप्ति के लिए की जाती है।इन्हें सफेद रंग प्रिय है।वस्तुतः यह सांसारिक सौंदर्य के प्रति विरक्ति की प्रतीक हैं।इसी कारण इनकी वेशभूषा विधवाओं जैसी है।

 

♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं क्रीं श्रीं धूं धूं धूमावती ठ: ठ: फट स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-हानि पहुंचाने के लिए मस्तिष्क को नियंत्रण में लेना।


🟥 श्री छिन्नमस्ता देवी 🟥


छिन्नमस्ता देवी भौतिक सुखों,शक्ति, ओज एवं पराकरण को प्रदान करने वाली देवी हैं।ये भावुकता की देवी भी हैं।इनकी पसन्द का रंग लाल है।इनकी आराधना कृष्ण पक्ष की रात्रि में की रात्रि में की जाती है।


♨️मंत्र➖


ॐ क्लीं ह्रीं एं वज्र वैरोचनीये हुं हुं फट स्वाहा।।


◆सिद्धि का भाव-त्याग,तेज,सुख और मानसिक शांति।


🟥 श्री अम्बिका या दुर्गा 🟥


इन्हें अम्बा, जगदम्बा,दुर्गा,शेरोवाली माता आदि कई नामों से पुकारा जाता है।इनके भी कई प्रतिरूपों के चित्र प्राप्त होते हैं।ये क्रांति की देवी हैं।वीरता एवं विवेकपूर्ण क्रोध इनका गुण है।ये प्रचंड शक्तिशाली हैं।जब भी आप किसी के अत्याचार से या भौतिक विपत्तियों से कठिनाई में पड़ जाएं,तो इनकी आराधना करें।ये तुरंत शक्ति प्रदान करती हैं।इनका प्रिय रंग लाल है।इनकी पूजा नवरात्रि के समय करनी चाहिए।


♨️मंत्र➖


ॐ ह्रीं क्रीं श्रीं नमश्च चण्डिकायै।।


◆सिद्धिकाभाव-कांति,तेज,पराक्रम,आज का भाव।


संदीप कपालिनी (तंत्राचार्य)✍️

🚩श्रीश्री ज्वालादेवी शक्तिपीठ🚩


🔥नोट➖कॉपी पेस्ट करना वर्जित है,गुरु सानिध्य में ही इन साधनाओं को करना चाहिए।

 साभार संदीप कापालिक फेस बुक वॉल 

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शनिवार, 30 नवंबर 2024

नकारात्मक ऊर्जा (निगेटिव एनर्जी) एक प्रकार की ऊर्जा है

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नकारात्मक ऊर्जा (निगेटिव एनर्जी) एक प्रकार की ऊर्जा है जो हमारे आसपास के वातावरण में नकारात्मक प्रभाव डालती है। यह ऊर्जा हमारे विचारों, भावनाओं और क्रियाओं से उत्पन्न होती है और हमारे जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है।

नकारात्मक ऊर्जा के कुछ उदाहरण हैं:

1. नकारात्मक विचार और भावनाएं, जैसे कि डर, चिंता, क्रोध और ईर्ष्या।
2. नकारात्मक शब्द और व्यवहार, जैसे कि अपमान, आलोचना और हिंसा।
3. नकारात्मक ऊर्जा वाले स्थान, जैसे कि जिन स्थानों पर हिंसा या दुख की घटनाएं हुई हों।

अब, भूत प्रेत के बारे में बात करते हैं। भूत प्रेत को अक्सर नकारात्मक ऊर्जा के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह वास्तव में क्या है, इसके बारे में विभिन्न मतभेद हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि भूत प्रेत वास्तव में मृत आत्माएं हैं जो अपने जीवनकाल में किए गए कार्यों के कारण पृथ्वी पर फंस गई हैं। इन आत्माओं को अक्सर नकारात्मक ऊर्जा के रूप में देखा जाता है, क्योंकि वे अक्सर अपने जीवनकाल में किए गए कार्यों के कारण दुख और पीड़ा का अनुभव करती हैं।

दूसरी ओर, कुछ लोगों का मानना है कि भूत प्रेत वास्तव में नकारात्मक ऊर्जा के रूप में ही मौजूद हैं, और वे किसी विशिष्ट आत्मा या व्यक्ति से जुड़े नहीं हैं।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भूत प्रेत के बारे में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में विभिन्न विश्वास और मतभेद हैं।
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गंध के प्रयोग से नकारात्मक ऊर्जा को हटाने में मदद मिल सकती है। गंध का प्रयोग प्राचीन काल से ही नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए किया जाता रहा है।

गंध के प्रयोग से नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के कुछ तरीके हैं:

1. *सुगंधित धूप*: सुगंधित धूप का प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए किया जा सकता है।
2. *अरोमा थेरेपी*: अरोमा थेरेपी में विभिन्न प्रकार के तेलों का प्रयोग किया जाता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने में मदद करते हैं।
3. *सुगंधित पौधे*: सुगंधित पौधों का प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए किया जा सकता है।
4. *धूप और अगरबत्ती*: धूप और अगरबत्ती का प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को हटाने और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए किया जा सकता है।

कुछ विशेष गंध जो नकारात्मक ऊर्जा को हटाने में मदद कर सकती हैं:

- लैवेंडर
- टी ट्री ऑयल
- पेपरमिंट
- रोज़मेरी
- सैंडलवुड

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि गंध का प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के लिए एक पूरक उपाय है, और इसका प्रयोग अन्य उपायों के साथ किया जाना चाहिए।
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 रंग भी सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा को प्रभावित कर सकते हैं। रंगों का प्रयोग प्राचीन काल से ही ऊर्जा को संतुलित करने और नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के लिए किया जाता रहा है।

विभिन्न रंगों के प्रभाव:

सकारात्मक रंग:

1. _लाल_: ऊर्जा, शक्ति और साहस को बढ़ावा देता है।
2. _नारंगी_: उत्साह, खुशी और सृजनात्मकता को बढ़ावा देता है।
3. _पीला_: आशा, खुशी और सकारात्मकता को बढ़ावा देता है।
4. _हरा_: शांति, संतुलन और प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ावा देता है।
5. _नीला_: शांति, विश्वास और बुद्धिमत्ता को बढ़ावा देता है।

नकारात्मक रंग:

1. _काला_: नकारात्मकता, दुख और अवसाद को बढ़ावा देता है।
2. _भूरा_: उदासीनता, निराशा और असफलता को बढ़ावा देता है।
3. _स्लेटी_: नकारात्मकता, दुख और अवसाद को बढ़ावा देता है।

रंगों का प्रयोग ऊर्जा को संतुलित करने और नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के लिए किया जा सकता है:

1. _रंग चिकित्सा_: रंगों का प्रयोग ऊर्जा को संतुलित करने और नकारात्मक ऊर्जा को हटाने के लिए किया जा सकता है।
2. _रंग मेडिटेशन_: रंगों का प्रयोग मेडिटेशन में किया जा सकता है ताकि ऊर्जा को संतुलित किया जा सके और नकारात्मक ऊर्जा को हटाया जा सके।
3. _रंग थेरेपी_: रंगों का प्रयोग थेरेपी में किया जा सकता है ताकि ऊर्जा को संतुलित किया जा सके और नकारात्मक ऊर्जा को हटाया जा सके।

@everyone @highlight साभार फेसबुक 

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शुक्रवार, 29 नवंबर 2024

तंत्र एक विज्ञान है

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 तंत्र एक विज्ञान है । विज्ञान न राजसिक होता है न तामसिक , न सात्विक , ये मनुष्य की भेद बुद्धि है नतीजा है । रज , तम , सत ये गुण और तत्व है । इसका अर्थ ये हुआ की न अच्छा न बुरे की पारधी मे इनको नहीं रखा जा सकता है ।


विज्ञान को समझो उधरहण से :- नदी पर बांध बनाकर विधुत शक्ति का निर्माण किया ... अलग अलग माध्यमों का प्रयोग करके आप के घर तक पहुंचाया गया आप के घर के उपकरणो के हिसाब से आप के घर तक विधुत शक्ति का प्रभावहा किया गया । ये पूरा प्रयोग विज्ञान के अंतर्गत आता है इसमे राजसिक ,तामसिक , सात्विक कहाँ है ।


अब साधना के परिवेश मे समझो ...... माला रूपी टर्बाइन पर आपने मंत्र रूप पानी का प्रवाहा किया जिसे ऊर्जा उत्तपन हुई संकलप शक्ति द्वारा आप ने उसको दिशा प्रदान कर उस शक्ति का प्रयोग किया । अब ये प्रयोग आप अपने को दीप्तमान करने के लिए भी कर सकते है या भौतिक कामनाओ को पूर्ण करने के लिए .... तंत्र यही है ॥ सही तरीके से सही माध्यम से किया गया कार्य क्रिया होती है उस क्रिया के पीछे लगा सिद्धांत तंत्र होता है । बाकी आप अपने अहं को पुष्ट करने के लिए रज , सत , तम का खेल खेल सकते है  ॐ नमः शिवाय साभार फेस बुक


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सोमवार, 8 जुलाई 2024

स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित हैं आजकल

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 [[[नमःशिवाय]]]

             श्री गुरूवे नम:

                

                                                            #प्राण_ओर_आकर्षण


 स्त्री-पुरुष क्यों दूसरे स्त्री-पुरुषों के प्रति आकर्षित हैं आजकल इसका कारण है--अपान प्राण। जो एक से संतुष्ट नहीं हो सकता, वह कभी संतुष्ट नहीं होता। उसका जीवन एक मृग- तृष्णा है। इसलिए भारतीय योग में ब्रह्मचर्य आश्रम का यही उद्देश्य रहा है कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करे। इसका अर्थ यह नहीं कि पुरष नारी की ओर देखे भी नहीं। ऐसा नहीं था --प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्य को अभ्यास कराता था जिसमें अपान प्राण और कूर्म प्राण को साधा जा सके और आगे का गृहस्थ जीवन सफल रहे--यही इसका गूढ़ रहस्य था।प्राचीन काल में चार आश्रमों का बड़ा ही महत्व था। इसके पीछे गंभीर आशय था। जीवन को संतुलित कर स्वस्थ रहकर अपने कर्म को पूर्ण करना उद्देश्य रहता था। लेकिन आज के मनुष्य का जीवन ताश के पत्तों की तरह बिखरा-बिखरा रहता है। वह समेटना चाहता है लेकिन जीवन है कि समेटने में नहीं आता। यही अशांति का कारण है। जीवन में प्राण का महत्व है।समान प्राण और कृकल प्राण का महत्व अपान प्राण की ही तरह समान प्राण भी काफी महत्वपूर्ण है। 

समान प्राण नाभि के मध्य में रहता है। उसका कार्य पेट के पाचन-तंत्र को दुरुस्त करना है। गरमाहट और पित्त, चंचलता और उत्साह शरीर में तेज आदि समान प्राण की ही देन है। त्वचा में कोमलता, चमक ,भूख लगना कृकल प्राण का कार्य है। सर्दी का कम लगना समान प्राण और कृकल प्राण के संयोजन की विशेषता  है। भूख लगना ,स्फूर्ति, उत्साह ,शरीर में तेज, सर्दी कम लगना--समान प्राण और कृकल प्राण के स्पन्दन पर निर्भर करता है। जिन पुरषों में समान प्राण का स्पन्दन कम होता है,उन्हें सर्दी अधिक लगती है। स्नान करना सर्दी में बड़ा कष्टकारी रहता है उनके लिए। गर्म कपडे पहनने पर भी उन्हें सर्दी महसूस होती रहती है। जरा-सा भोजन करते ही पेट भरा-भरा सा लगने लगता है। मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह खिन्न बना रहता है। असंतुष्ट रहता है। शरीर का कोई-न-कोई अंग बीमार ही बना रहता है। पेट का भारीपन, थकान, आँखों की कमज़ोरी आदि रोग अक्सर घेरे रहते हैं।

आयुर्वेद ने सारे रोगों की जड़ पेट को माना है। यदि पेट ठीक है तो शरीर में रोगों की सम्भावना कम रहती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि समान प्राण ही हमारे स्वास्थ्य का मुख्य कारण है। तंत्र-योग में प्राण-साधना एक कठिन क्रिया है। अगर प्राण नहीं सधता तो तंत्र की सारी क्रिया व्यर्थ है।तंत्र में ' प्राणकर्षिणी विद्या' की साधना काफी दुरूह है लेकिन साधक उसे साधता है। बिना प्राण साधे ध्यान, समाधि, सूक्ष्म लोक का विचरण, देहातीत का अनुभव प्राप्त होना संभव नहीं है। जिस प्रकार पुरुष के बिना प्रकृति अपनी लीला नहीं कर सकती, उसी प्रकार पांच महा- प्राण बिना पांच लघुप्राण संतुलित नहीं हो सकते। महाप्राण और लघुप्राण शिव और शक्ति के प्रतीक हैं। जिस तरह बिना शिव-शक्ति के चराचर जगत शून्य है, ब्रह्माण्ड स्पन्दनहीन है, उसी प्रकार दसों प्राणों का स्पन्दन ही जीवन है। प्राणों का रहस्यमय सञ्चालन प्राणतोषणी क्रिया' तंत्र का काफी गूढ़ विषय है। यह क्रिया अगर सध जाय तो साधक प्राण पर नियंत्रण कर शरीर के तापमान को प्रकृति के अनुसार घटा-बढ़ा सकता है। प्राण को सहस्रार में स्थापित कर सैकड़ों वर्षो तक समाधि को उपलब्ध हो सकता है। कुण्डलिनी योग में षट्चक्र- भेदन बिना प्राणों के सन्धान के सम्भव नहीं। तंत्र ने प्राण को असीम ऊर्जा माना है।

 उदान प्राण का निवास कण्ठ प्रदेश है। इसे साधने में "श्री" और "समृद्धि" दोनों का उदय होता है। कण्ठ प्रदेश को लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। इसी कारण स्वर्ण आभूषण गले में धारण किया जाता है। कण्ठ को 'स्फुटा ग्रन्थ' भी कहा गया है। स्फुटा को जागृत करने के लिए मोती की माला, रत्न और स्वर्ण आभूषण धारण करना शुभ होता है। उदान के पूर्ण होने पर मनुष्य कभी अभाव ग्रस्त नहीं होता। साधक प्राण की विशेष क्रिया द्वारा 'स्फुटा ग्रंथि' जागृत कर लेता है। भौतिक व आध्यात्मिक सुख जब चाहे प्राप्त कर सकता है। लेकिन विरले साधक ही इसका उपयोग भौतिक सुखों के लिए करते हैं। उनका उद्देश्य वाक्-सिद्धि और मन्त्र-सिद्धि के लिए होता है।धनंजन प्राण का स्पन्दन पूरे शरीर में सूक्ष्म रूप से होता रहता है। वह सभी प्राणों का प्रमुख है क्योंकि उसका सूक्ष्म सञ्चालन सूक्ष्म केंद्रों के आलावा  शरीर के बाह्य सूक्ष्म तरंगों को भी करता है आकर्षित। इसलिए कपाल प्रदेश में इसका मुख्य निवास माना गया है जहाँ सहस्रार चक्र है, शिव-शक्ति का सामरस्य-मिलन है। इसीको तंत्र में शिवलोक कहा गया है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है--" प्राणों में मैं धनञ्जय प्राण हूँ।" 

 हमारा मस्तिष्क रहस्यमय है। विज्ञान भी अभी तक इसके रहस्यों को पूर्णरूप से उजागर नहीं कर पाया है। यह अद्भुत सुप्त शक्तियों का भण्डार है। संसार में ऐसे अनेक महान पुरुष हुए हैं जिन्होंने अपनी अद्भुत प्रतिभा से लोगों को हैरत में डाल दिया। जाने-अनजाने यह धनंजन प्राण का ही चमत्कार है। इसमें शिथिलता आने पर या स्पन्दन कम हो जाने पर मानसिक बीमारियां, चिन्ता, डिप्रेशन आदि का शिकार हो जाता है व्यक्ति। मस्तिष्क का विकास धनंजय प्राण पर ही निर्भर है।हज़ारों वर्ष पहले ऋषि-महर्षियों ने प्राण पर बेहद गम्भीर विचार किया था। साथ ही यह शोध किया था कि यदि प्राण कुपित हो जाय या मंद पड़ जाय तो उसे सन्धान कैसे किया जाय। लेकिन योग हो या तंत्र हो--बिना गुरु के निर्देशन के नहीं करना चाहिए। नहीं तो लाभ के वजाय हानि उठानी पड सकती है। इसीलिए योग को परम ज्ञान और तंत्र को गुह्य ज्ञान कहा गया है। प्राणों को साधने की क्रियाएँ दसों प्राणों का संयोजन- नियोजन करने, कुप्रवृत्तियों का निवारण करने और प्राणशक्ति पर अधिकार प्राप्त करने, साथ ही आत्मिक उन्नति के लिए प्राण-विद्या का रहस्य अवश्य जानना चाहिए--चाहे वह योगी हो या साधक हो या हो गृहस्थ। योगशास्त्र में प्राणों को साधने के लिए काफी क्रियाएँ हैं लेकिन उनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं। बन्ध, मुद्रा, प्राणायाम और ध्यान--ये मुख्य हैं योगशास्त्र में। प्राण को साधने के लिए मुख्य तीन बन्ध हैं--

1. मूलबंध, 2. जालंधर बन्ध, 3. उड्डीयान बन्ध।

1. मूलबंध-- प्राणायाम की सहायता से यह सिद्ध होता है। इससे अपान प्राण स्थिर हो जाता है। वीर्य-स्तंभन होता है। वीर्य उर्ध्वभाग की ओर अग्रसर होता है। अपान प्राण का स्पन्दन बढ़ जाता है और मूलाधार स्थित कुण्डलिनी पर भी प्रभाव पड़ता है। उसमें ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। अपान प्राण और कूर्म प्राण दोनों पर मूलबन्ध का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रक्त-संचार ठीक होता है।

2. जालंधर बन्ध-- श्वास-क्रिया पर अधिकार होता है। ज्ञान-तंतु बलवान होते हैं। इसकी क्रिया से 16 ऊर्जा क्षेत्रों पर प्रभाव पड़ता है। विशुद्ध चक्र को जागृत करने में इसकी बड़ी भूमिका होती है। हठयोग प्रदीपिका में इसका विस्तार से वर्णन आया है।

3. उड्डीयान बन्ध-- जीवनी शक्ति को बढाने के लिए परम सहायक सिद्ध होता है। नाभि स्थित समान और कृकल प्राणों में स्थिरता लाता है। सुषुम्ना नाड़ी को खोलने में सहायक है और स्वाधिष्ठान चक्र चैतन्य करता है। कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में ये तीनो काफी सहायक होते हैं। sabhar कौलाचारि sadhana Facebook wall

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