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शनिवार, 25 जनवरी 2025

दो सिर धड़ एक वाली बहने

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 मिनेसोटा में पाँचवीं कक्षा की शिक्षिका एबी और ब्रिटनी हेन्सल, जुड़वाँ बहनें एक अनोखी कार्य व्यवस्था साझा करती हैं। अलग-अलग डिग्री और योग्यता रखने के बावजूद, उन्हें अपनी साझा नौकरी के लिए केवल एक वेतन मिलता है। जुड़वाँ बहनें, जिनके दिमाग और व्यक्तित्व अलग-अलग हैं, लेकिन शरीर एक है, कक्षा की ज़िम्मेदारियाँ साझा करती हैं और एक साथ सहजता से काम करती हैं। उनके नियोक्ता एक वेतन प्रदान करते हैं क्योंकि वे एक शारीरिक स्थिति में हैं। चुनौतियों के बावजूद, एबी और ब्रिटनी ने अपने पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन दोनों में टीमवर्क के प्रति अपनी लचीलापन और समर्पण का प्रदर्शन करते हुए सफल करियर बनाया है


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शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

गर्म पानी पीने के फायदे

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 पानी इंसान के शरीर की सबसे बड़ी जरुरत है। पानी से हमारा शरीर पूरे दिन तरोताजा रहता है। अगर पानी को गर्म करके पीते हैं, तो यह और भी ज्यादा फायदेमंद है। रोजाना सुबह खाली पेट गर्म पानी पीने से शरीर के कई रोग यूं ही मिट जाते हैं।


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☘️ मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र में सुधार (Improves Metabolism and Digsation)


सुबह-सुबह गर्म पानी पीने से शरीर में रक्त प्रवाह बेहतर होता है, जिससे मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र में सुधार होता है।


☘️ शरीर को करता है डिटॉक्स ( Detox to Body)


आप इसे बॉडी में फिल्टरेशन भी कह सकते हैं। गर्म पानी शरीर का तापमान बढ़ाता है, जिससे पसीने के जरिए शरीर से गंद बाहर आता है और फिर शरीर की अंदरूनी सफाई से स्किन ग्लो करती है।


☘️ ब्लड सर्कुलेशन में सुधार (Improves Blood Circulation)


गर्म पानी पीने से शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह तेज होता है, जिससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है।इससे हार्ट संबंधी बीमारियों का खतरा कम होने लगता है। 


☘️शरीर रहता है हाइड्रेट (Hydrates Body)

 शरीर में पानी की कमी भी महसूस नहीं होती है। साथ ही बॉडी टेंपरेचर कंट्रोल में रहता है, जिससे दिनभर थकान और आलस्य महसूस नहीं होता है.


☘️ वजन कम करने में मददगार (Reduce Weight)

गर्म पानी मेटाबॉलिज्म में सुधार करता है, जिससे कैलोरी बर्न होती है। 


☘️ चेहरे पर आता है निखार (Glwoing Skin)

अगर आप गर्म पानी रोजाना पिएंगे, तो इससे आपके चेहरे पर नूर सा निखार आने लगेगा।


☘️गर्म पानी से बॉडी से विषाक्त बाहर जाता है और फिर इससे पेट साफ होता है। पेट साफ होने से शरीर में कोई रोग नहीं पैदा होता है।


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साभार अंकिता सिंह 

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धर्म के रहस्य क्या है :ऋतु सिसोदिया

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आप संगीत में रुचि रखते हैं, संगीत साधना(रियाज)करना चाहते हैं।

आप चित्रकार हैं, सुंदर चित्र बनाना चाहते हैं।

आप किसी समस्या के समाधान के लिए गहन चिंतन मनन करना चाहते हैं। और आपके आसपास कोई नकारात्मक सोच वाला ,चिढ़चिढ़े स्वभाव का व्यक्ति हो ,वह कुढ़ते हुये बड़बड़ा रहा हो तो आप ठीक से अपना काम नहीं कर सकते।

जो आपसे चिढ़ते हैं वे आपके कार्य में बाधा डालने का हरसंभव प्रयास करते हैं।

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लोग विशिष्ट कार्यो़ के लिए विशेष स्थान का चयन करते हैं।ताकि अवांछित लोग उनके कार्य में बाधक न बन सकें।

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अति महत्वपूर्ण कार्यों के संबंध में योजनाओं को यथासंभव गोपनीय रूप से पूरा करने का प्रयास करते हैं।

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ऋषि मुनि गहन वनों में गुफाओं में साधना के लिए  स्थान इसीलिए चुनते थे।ताकि वहाँ अवांछित नकारात्मक सोचवाले लोगों से दूर रहा जा सके।

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भाव बहुत शक्तिशाली होते हैं।सारा खेल भाव ऊर्जा का ही है।अतः अपने लक्ष्य के अनुकूल भाव वालों के सानिध्य में रहना,तथा अपने लक्ष्य के प्रतिकूल भाव वाले नकारात्मक सोच वालों से दूर रहना होता है।


जब भाव बहुत सघन हो जायें तो साकार हो जाते हैं।अतः अपनी भावदशा के प्रति सचेत रहना होता है।सदैव सकारात्मक भाव दशा में रहना होता है।

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हमारी भावदशा हमारे आसपास विशेष आभामंडल को निर्मित करती है।जो हमारे संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती है। 

जैसी मनसा वैसी दशा का सूत्र पुरखे पहले ही बता गए हैं।

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अनुकूल समान भाव विचार वालों के संपर्क में हमारा आभामंडल पुष्ट होता है।इसीलिए हम ऐसी स्थिति में सुख का अनुभव करते हैं।

विपरीत प्रतिकूल भाव विचार वालों के बीच हमारा  आभामंडल खंडित होता है।अतः हम इस स्थिति में दुख का अनुभव करते हैं।

जबतक हम पूर्णतः स्वयं की भावदशा पर मजबूत नियंत्रण करने में सक्षम नहीं ह़ो तबतक लोगों से मिलने जुलने पर विशेष सतर्कता आवश्यक होती है।

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साभार ऋतु सिंह सिसोदिया फेस बुक वॉल

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बुधवार, 22 जनवरी 2025

बिना दवाइयों के उपयोग से पाचन तंत्र कैसे मजबूत करे

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पाचन तंत्र का सही से काम करना हमारे पूरे शरीर के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप बिना दवाइयों का सहारा लिए, सिर्फ कुछ आसान, प्राकृतिक उपायों से अपने पाचन तंत्र को मजबूत कर सकते हैं? जी हां, यह पूरी तरह से संभव है! इस उत्तर में हम आपको वो सभी तरीके बताएंगे जिनसे आप बिना किसी दवाई के पाचन तंत्र को स्वस्थ और मजबूत बना सकते हैं।


1. संतुलित आहार का सेवन करें:

हमारा आहार हमारे पाचन तंत्र पर सीधा प्रभाव डालता है। अगर आप तैलीय, मसालेदार और भारी खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करते हैं, तो पाचन तंत्र पर दबाव बनता है। इसके बजाय, ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, और दालों का सेवन करें। इन खाद्य पदार्थों में फाइबर की भरपूर मात्रा होती है, जो पाचन को आसान बनाता है और कब्ज जैसी समस्याओं से बचाता है। 


2. पानी पीने की आदत डालें:

हमारे शरीर का 70% हिस्सा पानी है और पाचन प्रक्रिया के लिए पानी की जरूरत होती है। पानी शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने, पाचन क्रिया को बेहतर बनाने और पेट की सूजन को कम करने में मदद करता है। दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी पीने की आदत डालें। 


3. नियमित रूप से हल्का व्यायाम करें:

व्यायाम न केवल शरीर के अन्य अंगों को फिट रखता है, बल्कि यह पाचन तंत्र को भी बेहतर बनाता है। योग, ताई ची, और हल्का वॉकिंग जैसे व्यायाम पेट की मांसपेशियों को मजबूती देते हैं, जिससे खाना पचाने में मदद मिलती है। इससे रक्त संचार भी बेहतर होता है, जो पाचन तंत्र के लिए लाभकारी है। 


4. छोटी-छोटी, नियमित मात्रा में भोजन करें:

आपका भोजन पेट पर भारी न पड़े, इसके लिए दिन में तीन बड़े खाने के बजाय, 5-6 छोटे भोजन करने की आदत डालें। इससे पाचन तंत्र पर दबाव कम पड़ेगा और खाना अच्छे से पचेगा। इसके अलावा, खाने के बीच में लंबा समय न छोड़ें। 

5. तनाव को कम करें:

तनाव का पाचन तंत्र पर गहरा असर पड़ता है। तनाव के कारण हमारी पाचन क्रिया धीमी हो सकती है, और इससे पेट में गैस, जलन, और अन्य समस्याएं हो सकती हैं। इसलिए मानसिक शांति के लिए ध्यान (Meditation), गहरी साँस लेने की प्रक्रिया, और पर्याप्त नींद को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। 


6. आंतों की सफाई करें (Detox):

आंतों की सफाई पाचन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आप प्राकृतिक तरीके से आंतों को डिटॉक्स कर सकते हैं। इसके लिए, नींबू पानी, अदरक, हल्दी, या शहद के साथ गर्म पानी का सेवन करें। यह आपके पाचन तंत्र को साफ करने और उसमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को बाहर निकालने में मदद करेगा। 


7. भोजन के बाद थोड़ी देर आराम करें:

खाने के बाद तुरंत बिस्तर पर न जाएं। खाने के बाद 20-30 मिनट तक हल्का टहलील (हल्का चलना) करने से पाचन क्रिया तेज होती है। ऐसा करने से पेट में भारीपन महसूस नहीं होता और खाना अच्छे से पचता है। 


8. प्रॉबायोटिक्स का सेवन करें:

प्रॉबायोटिक्स (जैसे दही, छाछ, या कुछ अन्य फर्मेंटेड फूड्स) पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद होते हैं। ये आपके पेट में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाते हैं, जो पाचन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। नियमित रूप से इनका सेवन करने से पेट की समस्याएं दूर होती हैं। 


9. प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का उपयोग करें:

अदरक, इलायची, धनिया, मेथी जैसे मसाले पाचन तंत्र को मजबूत करने में मदद करते हैं। इनका सेवन चाय के रूप में या भोजन में भी किया जा सकता है। यह पेट की गैस, अपच और सूजन को कम करता है और पाचन को गति देता है। 


10. अच्छा नींद लें:

नींद का पाचन तंत्र से सीधा संबंध है। अगर आप पर्याप्त नींद नहीं लेते, तो पाचन क्रिया में गड़बड़ी हो सकती है। इसलिए हर रात 7-8 घंटे की गहरी नींद लें, ताकि शरीर को अच्छे से आराम मिले और पाचन तंत्र ठीक से काम करे। 


इन सभी उपायों को अपनी दिनचर्या में अपनाकर आप बिना दवाइयों के पाचन तंत्र को मजबूत कर सकते हैं। यह सिर्फ शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। हमेशा याद रखें, छोटे-छोटे बदलाव बड़े परिणाम लाते हैं, और अगर आप इन उपायों को नियमित रूप से अपनाएंगे तो पाचन तंत्र मजबूत होने के साथ-साथ आपका स्वास्थ्य भी बेहतर होगा।

Dadima ke Gharelu Nuskhe - घरेलू नुस्खे साभार फेस बुक हेल्थ

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शिव शक्ति के अमिट दिव्य प्रेम ऊर्जा

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 स्त्री पुरुष के मद्य ब्लेम गेम की कला भारत मे कब से ज्यादा विकसित हुई...🤔

जब दोनों गैर जिम्मेदार हुए ,,बेहोश मन इंद्रियों के गुलाम हुए


इससे सर्वाधिक हानि बृक्ष की शाखाओं की हुई  बोया किसी और का काटेगा कोई और... ये हुआ आपका कार्मिक अकाउंट,,दुष्कर्म, विवाह सामाजिक व्यवस्था थी इसका उल्लंघन करने पर क्षणिक दंड भुगतान है किंतु श्रष्टि का तो सन्तुलन का नियम है


 शिव शक्ति के अमिट दिव्य प्रेम ऊर्जा को समझने हेतु चिंतन की आवस्यकता है,,विशुद्ध सात्विक मन की आवस्यकता है,, शिव व सती के पुनर्मिलन की कहानी रोचक लगती है किंतु सती के कठोर तप व साधना दृढ़ संकल्प की स्कक्ति परीक्षण श्रष्टि में मानव रूप में देनी पड़ी 

दिव्य आत्माओं का पदार्पण दुर्लभ है जटिलताओं से होकर गुजरना पड़ता है

माता पार्वती सफल हुई अंततः शिव पार्वती के विवाह की समस्त रस्मो से ही विवाह भारतीय 16 संस्कार में एक उत्तम व श्रेस्ठ संस्कार है जिसे ग्रहस्थ आश्रम नाम दिया हमारे ऋषि महाऋषियों ने


आज कल आश्रम का ही ज्ञान नहि विसंगतियां उतपन्न हो गयी विवाह संस्कार को खेल समझ लिया पशुवत आचरण मनोरंजन किया और छोड़ दिया


हालात तब बुरे बनते है जब दोनों गैर जिम्मेदार हो क्योंकी अंधे में काना चल जाता है

साभार ऋतु सिंह सिसोदिया 

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मंगलवार, 21 जनवरी 2025

भ्रंगराज के लाभ

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आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का मत है कि भृंगराज बालों और लीवर से जुड़ी समस्याओं के लिए लाभदायक है, क्योंकि इसमें केश्य गुण पाया जाता है।भृंगराज के अदभुत प्रयोग है। 

भृंगराज केशों के लिए यह महत्वपूर्ण तो है ही लेकिन इसके अन्य औषधीय गुण शायद और ज्यादा महत्वपूर्ण लगते हैं क्या आप जानते है कि भृंगराज(False daisy)आपका कायाकल्प करने में भी सक्षम है यदि सही तरीके से प्रयोग किया जाये तो यहाँ तक कि कैंसर से आप इसके सहारे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते हैं

यदि आपको बाल काले रखने हैं तो भृंगराज की ताजी पत्तियों का रस रोजाना सिर पर मल कर सोयें-

यदि पेट बहुत खराब हो तो भृंगराज की पत्तियों का रस या चूर्ण दस ग्राम लीजिये उसे एक कटोरी दही में मिला कर खा जाइए ।दिन मे 3 times 2 days लेना है।

 पीलिया एक जानलेवा रोग है लेकिन रोगी को पूरे भृंगराज के पौधे का चूर्ण मिश्री के साथ खिला दीजिये 100 ग्राम चूर्ण पेट में पहुंचाते ही पीलिया ख़त्म  या फिर भृंगराज के पौधे को ही क्रश करके 10 ग्राम रस निकालिए और उसमें एक ग्राम काली मिर्च का पावडर मिलाकर मरीज को पिला दीजिये दिन में 3 बार 3 दिनों तक इस मिश्रण में थोड़ा मिश्री का चूर्ण भी मिला ले। 

भृंगराज सफ़ेद दाग का भी इलाज करता है मगर काली पत्तियो और काली शाखाओं वाला भृंगराज चाहिए इसे आग पर सेंक कर रोज खाना होगा एक दिन में एक पौधा लगभग चार माह तक लगातार खाए। 

आँखों की रोशनी तेज रखनी है तो भृंगराज की पत्तियों का 3 ग्राम पाउडर एक चम्मच शहद में मिला कर रोज सुबह खाली पेट खाएं।

अगर कोई तुतलाता हो तो इसके पौधे के रस में देशी घी मिला कर पका कर दस ग्राम रोज पिलाना चाहिए बस एक माह तक लगातार दे ।

त्रिफला के चूर्ण को भृंगराज के रस की 3 बार भावना देकर सुखा कर रोज आधा चम्मच पानी के साथ निगलने से बाल कभी सफ़ेद होते ही नही है पर इसे किसी जानकार वैद्य से ही तैयार कराइये। 

इसके रस में यकृत की सारी बीमारियाँ ठीक कर देने का गुण मौजूद है लेकिन जिस दिन इसका ताजा रस दस ग्राम पीजिये उस दिन सिर्फ दूध पीकर रहिये भोजन नहीं करना है यदि यह काम एक माह तक लगातार कर लिया जाय तो कायाकल्प भी सम्भव है यह एक कठिन तपस्या है। 

बच्चा पैदा होने के बाद महिलाओं को योनिशूल बहुत परेशान करता है उस दशा में भृंगराज के पौधे की जड़ और बेल के पौधे की जड़ का पाउडर बराबर मात्रा में लीजिये और शहद के साथ खिलाइये 5 ग्राम पाउडर काफी होगा दिन में एक बार खाली पेट लेना है सिर्फ केवल 7 दिनों तक ही काफी है। 

इसका तेल बालों के लिये बहुत उपयोगी माना जाता है बालों को घने, काले और सुंदर बनाने के लिए भृंगराज का उपयोग कई तरह से किया जाता है भृंगराज के पत्तों का रस निकालकर बराबर का नारियल तेल लें और धीमी आंच पर रखें जब केवल तेल रह जाए तो बन जाता है "भृंगराज केश तेल"-अगर धीमी आंच पर रखने से पहले आंवले का रस मिला लिया जाए तो और भी अच्छा तेल बनेगा-बालों में रूसी हो या फिर बाल झड़ते हों तो इसके पत्तों का रस 15-20 ग्राम लें। 

 एसिडिटी होने पर भृंगराज के पौधे को सुखाकर चूर्ण बना लिया जाए और हर्रा के फलों के चूर्ण के साथ समान मात्रा में लेकर गुड के साथ सेवन कर लिया जाए तो एसिडिटी की समस्या से निजात मिल सकती है। 

 माईग्रेन या आधा सीसी दर्द होने पर भृंगराज की पत्तियों को बकरी के दूध में उबाला जाए व इस दूध की कुछ बूँदें नाक में डाली जाए तो आराम मिलता है। 

 भृंगराज एवं आंवले लें के ताजे पत्तों को पीस कर बालों की जड़ों में लगायें साथ ही नीम-शिकाकाई आंवला-कालातिल-रीठा इन सब को साथ मिलाकर एक पेस्ट बना लें यह आपके लिए एक हर्बल शैम्पू का काम करेगा जो बालों को कंडिशनिंग के साथ ही जड़ों को मजबूत बनाता है।

  भ्रंगराज की पत्तियों का रस निकालकर उसमे रुई भिगोकर सरसों के तेल में काजल बनाकर आँखों में लगाने से आँखो से पानी नहीं निकलता और आँखों में खुजली भी नहीं होती हैं 


आप सभी को अगर इसके बारे में कोई जानकारी हो तो अवश्य साझा करे🙏


Anamika Shukla  facebook wall

अनु🥰

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सोमवार, 20 जनवरी 2025

हमारा शरीर अपने आप में एक जटिल और अद्भुत दुनिया है

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 क्या आप जानते हैं? हमारा शरीर अपने आप में एक जटिल और अद्भुत दुनिया है


। यकीन नहीं होता? तो यह सुनिए:


•अगले 30 सेकंड में, आपका शरीर 7 करोड़ 2 लाख लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) तैयार कर चुका होगा।


•इसी दौरान, आपकी 1,74,000 स्किन कोशिकाएं झड़ जाएंगी।


•आपका खून शरीर के अंदर लगभग 7 किलोमीटर का सफर तय कर चुका होगा।


•आपके दिमाग में 25 नए विचार आ चुके होंगे।


•और आपकी आँखें 600MB डेटा को प्रोसेस कर चुकी होंगी।


सोचिए, हर सेकंड आपका शरीर कितने चमत्कार करता है। आपका शरीर सचमुच एक जीवित ब्रह्मांड है!

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#science #biology #humanity #bodybuilding #scifi #gk #knowledgeispower

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शनिवार, 18 जनवरी 2025

त्रिफला सेवन के लाभ

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 शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।


2⭐ बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।


3⭐ ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।


4⭐ वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।


5⭐ शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।


6⭐ हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।


          ओषधि के रूप में त्रिफला 

  

⭐ रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होता है।

अथवा त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होता है।

इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।


⭐ सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी ले। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंग।


⭐ शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।


⭐ एक चम्मच बारीख त्रिफला चूर्ण, गाय का घी10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते है। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।


⭐ त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते है।


⭐ त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।


⭐ चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिये।


⭐ मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले।त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।


त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।

दो माह तक सेवन करने से चश्मा भी उतर जाता है।


विधिः👉 500 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 500 ग्राम देसी गाय का घी व 250 ग्राम शुद्ध शहद मिलाकर शरदपूर्णिमा की रात को चाँदी के पात्र में पतले सफेद वस्त्र से ढँक कर रात भर चाँदनी में रखें। दूसरे दिन सुबह इस मिश्रण को काँच अथवा चीनी के पात्र में भर लें।


सेवन-विधि👉 बड़े व्यक्ति10 ग्राम छोटे बच्चे 5 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें दिन में केवल एक बार सात्त्विक, सुपाच्य भोजन करें। इन दिनों में भोजन में सेंधा नमक का ही उपयोग करे। सुबह शाम गाय का दूध ले सकते हैं।सुपाच्य भोजन दूध दलिया लेना उत्तम है कल्प के दिनों में खट्टे, तले हुए, मिर्च-मसालेयुक्त व पचने में भारी पदार्थों का सेवन निषिद्ध है। 40 दिन तक मामरा बादाम का उपयोग विशेष लाभदायी होगा। कल्प के दिनों में नेत्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य करें।


मात्राः 4 से 5 ग्राम तक त्रिफला चूर्ण सुबह के वक्त लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ इसका सेवन करें तथा एक घंटे बाद तक पानी के अलावा कुछ ना खाएं और इस नियम का पालन कठोरता से करें ।


सावधानीः👉 दूध व त्रिफला के सेवन के बीच में दो ढाई घंटे का अंतर हो और कमजोर व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री को बुखार में त्रिफला नहीं खाना चाहिए।


घी और शहद कभी भी सामान मात्रा में नहीं लेना चाहिए यह खतरनाख जहर होता है ।


त्रिफला चूर्ण के सेवन के एक घंटे बाद तक चाय-दूध कोफ़ी आदि कुछ भी नहीं लेना चाहिये।


त्रिफला चूर्ण हमेशा ताजा खरीद कर घर पर ही सीमित मात्रा में (जो लगभग तीन चार माह में समाप्त हो जाये ) पीसकर तैयार करें व सीलन से बचा कर रखे और इसका सेवन कर पुनः नया चूर्ण बना लें। साभार मधु सिंह  फेस बुक वॉल

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शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

काम वासना और आध्यात्मिक ज्ञान

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 आज की युवा पीढ़ी वासना - कामवासना और अज्ञानता के चलते अंधकार में डूबती चली जा रही है जब तक कि लोग उस आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त नहीं करेंगे जो इस जीवन का महासत्य है ! 

     जीवन ऊर्जा की बात करें तो जिसे वीर्य कहा जाता है यह एक ऐसी चमत्कारी ऊर्जा है जो एक जीवन को प्रकट करती है ! कभी सोचे समझे हो कि आखिर इस वीर्य में इतनी शक्ति आती कहां से है जिससे वह एक जीते जागते जीव को प्रकट करता है ?? सोचो सोचो सोचने का पैसा नहीं लगता !! इसमें वह चैतन्य आखिर कहां से आता है जो बड़ा होकर संसार में अद्भुत कार्य करता है ?? 

  वीर्य एक आध्यात्मिक पदार्थ है ! अपने इस अस्तित्व को एक पल के लिए तेल का दीपक समझो ! जैसे बिना तेल के दीपक में मौजूद लौ टिमटिमाती है और उसके बाद दीपक बुझ जाता है ठीक उसी भांति वीर्य के बिना हमारा यह अस्तित्व जीवित्त लास की भांति जानो ! जिससे हमारी औरा फीकी पड़ जाती है तथा हमारा मन और शरीर शक्तिहीन बनता है , हमारे विचार व भावनाएं अशुद्ध होकर अंधकारमय बन जाते हैं ! हमारे ऋषि मुनि जानते थे कि जीवन शक्ति की रक्षा , पोषण और निर्देशन करना आध्यात्मिक जागृति और ब्रह्मांडीय चेतना इन दोनों की कुंजी थी ! 

 अब समझते हैं कि वीर्य ऊर्जा और आध्यात्म के बीच कौन सा संबंध है जो आध्यात्मिक जीवन में अतिआवश्यक है !    

 आध्यात्मिक जानते हैं कि परम ब्रह्म में लीन होने के लिए उन्हें हर वक्त अनुशासन के साथ स्वयं को नियन्त्रण रखना होगा ! ब्रम्ह में जो व्यक्ति विलीन होना चाहता है तो उन्हें ब्रम्ह ऊर्जा को सुरक्षित रखना होगा क्योंकि ब्रम्ह ऊर्ज वो चाबी है जो ब्रम्ह के पास पहुंचाती है ! एक धनुर्धर व्यक्ति जब तीर छोड़ने वाला होता है तो पूरे शरीर मन और सांस के साथ पूरे शरीर की ऊर्जा को स्थिर करना पड़ता है तभी उसका तीर सधता है और अपने निशाने पर लगता है ! यह वीर्य भी कुछ उसी भांति है यदि यह ऊर्जा बिखर जाती है और इधर-उधर की चीजों में नष्ट हो जाती है तब आपका निशाना डगमगा जाता है ! वीर्य केवल एक सेक्सुअल एनर्जी नहीं यह हमारे पूरे शरीर बुद्धि उसके हर एक कण के साथ जुड़ी होती है ! अतः जब कोई व्यक्ति गलत काम करके उसकी ऊर्जा को नष्ट करता है तो निर्बलता उसके आंख से लेकर उसके चेहरे मन और शरीर पर पड़ती है ! क्या कभी सोचे हो कि जब एक व्यक्ति वीर्य ऊर्जा को नष्ट करता है तो उसे आखिर गिल्टी फील क्यों होती है ?? क्यों अंदर से उसको बहुत बुरा लगता है ?? 

    क्योंकि यह वो ब्रह्मांडीय ऊर्जा है जिसकी ऊर्जा को आपकी आत्मा पहचानती है और इसके महत्व को भली भांति जानती है ! जब आपका मन इस ऊर्जा को नष्ट कर देता है तब आपकी आत्मा प्रतिक्रिया करती है इसी वजह से एक व्यक्ति को बहुत बुरा अनुभव होता है !! परीक्षण तो किए ही होगे जब आप अकेले में वीर्य नष्ट उपरांत के कुछ पल बाद विचारते हो ??


अब बात करते हैं उस ब्रह्मांडीय चक्र की जो वीर्य से कुंडलिनी के उच्चतम स्तर तक पहुंचती है ! वीर्य ऊर्जा कुंडली जागरण में एक बात महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है यह निष्क्रिय ऊर्जा रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित होती है ! जब वीर्य संगठित और रूपांतरित होता है तो यह कुंडली को पोषण देता है जिससे ये  रीढ़ की हड्डी के ऊपर उठती है और चेतना के उच्च केंद्रों को सक्रिय करती है ! यह यात्रा समुद्र की ओर बहने वाली नदी की भांति होती है ! नदी जो आपकी संरक्षित वीर्य की तरह है और समुद्र जो ब्रह्मांडीय चेतना है ! इस महत्वपूर्ण सार को संरक्षित करके आप अपनी व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना के साथ विलय करने में सक्षम हो जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे नदी अंत में समुद्र में विलीन हो जाती है !  कुंडलिनी योग में ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर बहती है और जब ऊर्जा नीचे से सबसे उच्चतम स्तर तक पहुंचती है तो एक - एक करके ही ऊर्जा के सारे द्वार खुलते जाते हैं ! आखरी में जब ऊर्जा उच्चतम स्तर तक पहुंचती है तब इस ब्रम्हांड के सारे नियम आपके सामने टूटते हुए प्रतीत होते हैं !

   एक बीज का विचार करें जिसमें पेड़ बनने की क्षमता होती है लेकिन तभी जब इसका पोषण किया जाता है ! वैसे ही वीर्य भी उस बीज जैसा होता है जिसमे पेड़ बनने की क्षमता होती है ! जब इसका पोषण करते हैं तो यह चेतना के सबसे उच्चतम स्तर तक पहुंचा देता है ! यह वो आध्यात्मिक ज्ञान का पेड़ बन जाता है जिसकी शाखाएं आकाश की ओर बढ़ती व जड़ें धरती की गहराई में जाती हैं जो हमारे भीतर ज्ञान, स्थिरता स्थापित करता है ! वीर्य ऊर्जा का यह ज्ञान आपको सचेत करने के लिए काफी है लेकिन ब्रह्मचर्य पालन की जानकारी के बिना यह अधूरी है और यह ज्ञान भी अधूरा है ! 

  संभव है आप में से ऐसे बहुत से लोग इस समस्या से परेशान होंगे तो प्रश्न उठता है कि कैसे इस ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए ??

१) यदि आपमें दृढ़ संकल्प है तो अपने देवी-देवता माता-पिता  या जिन्हें आप अधिक प्रेम करते हो साक्षी मानकर मंदिर में या उनके सामने ब्रह्मचर्य का संकल्प लेना ! यह संकल्प उपरांत  आप ब्रह्मचर्य का खंडन नहीं कर पाओगे क्योंकि इस तरह से संकल्प लेने के बाद आप गलत कार्य करने से घबराओगे और यही घबराना या डर आपको गलत कार्य करने से रोकेगा ! 


२) आप एक माली भांति बन जाओ जैसे एक माली अपने बाग बगीचे का पोषण करता है ! यदि वह माली पानी का सही तरीके से प्रयोग नहीं करेगा तो उसका बाग बगीचा नष्ट हो जाएगा ठीक उसी प्रकार यदि आप अपनी ऊर्जा को व्यर्थ के कार्य में या किसी संगी साथी संग मौज मस्ती करके बर्बाद करोगे तो आगे बस आपको पछताना पड़ेगा ! जैसे माली पानी का सही इस्तेमाल करके अपने बाग बगीचे को जीवंत बनाए रखता इसी भांति आप भी अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाओ जो आपको सफलता की ओर ले जाएगी एवं अध्यात्म की इस दुनिया में सबसे उच्चतम स्तर तक ले जाएगी ! 


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विज्ञान भैरव तंत्र और संभोग ओशो

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 ताओ कहता है अगर व्यक्ति संभोग में उतावला न हो, केवल गहरे विश्राम में ही शिथिल हो तो वह एक हजार वर्ष जी सकता है। अगर स्त्री और पुरुष एक दूसरे के साथ गहरे विश्राम में हो एक दूसरे में डूबे हों कोई जल्दी न हो, कोई तनाव न हो, तो बहुत कुछ घट सकता है रासायनिक चीजें घट सकती हैं। क्योंकि उस समय दोनों के जीवन-रसों का मिलन होता है दोनों की शरीर-विद्युत, दोनों की जीवन-ऊर्जा का मिलन होता है। और केवल इस मिलन से–क्योंकि ये दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं–एक पॉजिटिव है एक नेगेटिव है। ये दो विपरीत धुरव हैं–सिर्फ गहराई में मिलन से वे एक दूसरे को और जीवतंता प्रदान करते हैं।


वे बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए लंबे समय तक जी सकते हैं। लेकिन यह तभी जाना जा सकता है जब तुम संघर्ष नहीं करते। यह बात विरोधाभासी प्रतीत होती है। जो कामवासना से लड़ रहे हैं उनका वीर्य स्खलन जल्दी हो जाएगा, क्योंकि तनाव ग्रस्त चित्त तनाव से मुक्त होने की जल्दी में होता है।


नई खोजों ने कई आश्चर्य चकित करने वाले तथ्यों को उद्धाटित किया है। मास्टर्स और जान्सन्स ने पहली बार इस पर वैज्ञानिक ढंग से काम किया है कि गहन मैथुन में क्या-क्या घटित होता है। उन्हें यह पता चला कि पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का समय से पहले ही वीर्य-स्खलन हो जाता है। पचहत्तर प्रतिशत पुरुषों का प्रगाढ़ मिलन से पहले ही स्खलन हो जाता है और काम-कृत्य समाप्त हो जाता है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां काम के आनंद-शिखर ऑरगॉज्म तक पहुंचती ही नहीं, वे कभी शिखर तक गहन तृसिदायक शिखर तक नहीं पहुंचतीं नब्बे प्रतिशत स्त्रियां।


इसी कारण स्त्रियां इतनी चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं और वे ऐसी ही रहेंगी। कोई ध्यान आसानी से उनकी सहायता नहीं कर सकता, कोइ दर्शन, कोई धर्म, कोई नैतिकता उसे पुरुष–जिसके साथ वह रह रही है–के साथ चैन से जीने में सहायक नहीं हो सकता। और तब उनकी खीझ उनका तनाव…क्योंकि आधुनिक विज्ञान तथा प्राचीन तंत्र दोनों ही कहते हैं कि जब तक स्त्री को गहन काम-तृप्ति नहीं मिलेगी, वह परिवार के लिए एक समस्या ही बनी रहेगी। वह हमेशा झगड़ने के लिए तैयार होगी।


इसलिए अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा झगड़े के भाव में रहती है तो सारी बातों पर फिर से विचार करो। केवल पत्नी ही नहीं, तुम भी इसका कारण हो सकते हो। और क्योंकि स्त्रियां काम संवेग, ऑरगॉज्म, तक नहीं पहुंचती, वे काम-विरोधी हो जाती हैं। वे संभोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होतीं। उनकी खुशामद करनी पड़ती है; वे काम- भोग के लिए तैयार ही नहीं होतीं। वे इसके लिए तैयार भी क्यों हो उन्हें कभी इससे कोई सुख भी तो प्राप्त नहीं होता। उलटे, उन्हें तो ऐसा लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करता है उन्हें इस्तेमाल किया गया है। उन्हें ऐसा लगता है कि वस्तु की भांति उपयोग कर उन्हें फेंक दिया गया है।


पुरुष संतुष्ट है क्योंकि उसने वीर्य बाहर फेंक दिया है। और तब वह करवट लेता है और सो जाता है और पत्नी रोती है। उसका उपयोग किया गया है और यह प्रतीति उसे किसी भी रूप में तृप्ति नहीं देती। इससे उसका पति या प्रेमी तो छुटकारा पाकर हल्का हो गया लेकिन उसके लिए यह कोई संतोषप्रद अनुभव न था।


नब्बे प्रतिशत स्त्रियों को तो यह भी नहीं पता कि ऑरगॉज्म क्या होता है? क्योंकि वे शारीरिक संवेग के ऐसी आनंददायी शिखर पर कभी पहुंचती ही नहीं जहां उनके शरीर का एक-एक तंतु सिहर उठे और एक-एक कोशिका सजीव हो जाए। वे वहां तक कभी पहुंच नहीं पातीं। और इसका कारण है समाज की काम-विरोधी चित्तवृत्ति। संघर्ष करनेवाला मन वहां उपस्थित है इसलिए स्त्री इतनी दमित और मंद हो गई है।


और पुरुष इस कृत्य को ऐसे किए चला जाता है जैसे वह कोई पाप कर रहा हो। वह स्वयं को अपराधी अनुभव करता है वह जानता है ”इसे करना नहीं चाहिए। ” और जब वह अपनी पत्नी या प्रेमिका से संभोग करता है तो वह उस समय किसी महात्मा के बारे में ही सोच रहा होता है। ”कैसे किसी महात्मा क पास जाऊं और किस तरह

काम-वासना से, इस अपराध से, इस पाप से पार हो जाऊं। ”


ओशो, तंत्र

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सोमवार, 13 जनवरी 2025

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् तंत्र रूप

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कुञ्जिका स्तोत्र पाठ विषय में भ्रांति है कि इसके पाठ के फल से दुर्गापाठ का फल मिल जाता है तो फिर सप्तशती के पाठ की क्या जरुरत है अतः सप्तशती पाठ के बाद में करें ।

परन्तु इसी स्तोत्र में लिखा है कि "इदं तु कुञ्जिका स्तोत्रं - मंत्र जागर्तिहैतवे" अतः मंत्र के जाग्रति की प्रार्थना तो मंत्र जपने से पहिले ही करनी चाहिये । जैसे के माला मंत्रो में ( ॐ मां माले महामाये........) प्रयोग में आया है ।

पुनः तंत्र ग्रंथो में लिखा है कि "भूत लिपि" के प्रयोग बिना मंत्र सिद्ध नहीं होता है । इस स्तोत्र में "अं, कं, चं, टं, तं, पं, यं, शं" शब्द आये है इनका अर्थ है, अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग, श वर्ग अर्थात समस्त मातृका का उच्चारण स्मरण है । अथ इसमें "भूत लिपि'" जाग्रति की सूक्ष्म क्रिया का समावेश है ।

मंत्र जागृति के २७ जप रहस्य हैं उनमें दोहन, आकर्षण, अमृतीकरण, दीप्तीकरण आदि हैं उनका प्रयोग इस स्तोत्र में नवार्ण मंत्र में है । उनमें आये बीजाक्षरों को देखने से मिलता है । यथा

ग्लौं (अशुद्धिनिवारण व दोहन हेतु ) ।

क्लीं जूं सः (अमृतीकरण हेतु )

आकर्षण हेतु ।

ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल- दीप्तीकरण हेतु । अतः इस का पाठ नवार्ण जप से पहिले व दुर्गापाठ से पहिले

॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।

येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।

न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥२॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् । ॥३॥

अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।

मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।

पाठमात्रेण संसिद्धयेत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥४॥

अथ मन्त्रः

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥२॥

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥

विच्चे चाऽभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥५॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥

अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराभिर्भव ।

आविर्भव हंसं लंक्षं मयि जाग्रय जाग्रय ।।

त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥

म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा कुञ्जिकायै नमो नमः ।

सां सीं सप्तशतीं सिद्धिं कुरुष्व जप-मात्रतः ॥९॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।

न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे

कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

॥ ॐ तत्सत् ॥ साभार दीपक शर्मा फेस बुक


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