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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

सप्तशती और गीता

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{{{ॐ}}}

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श्रीमद्भागवत गीता अर्थात श्री भगवान श्री कृष्ण ने गायी यद्यपि गीता एक उपदेश है फिर भी उसे गीता लयबद्ध रचना कहा गया है क्योंकि कर्म के दुस्तर सागर के ऊपर तैर रहा है वह निष्काम कर्म योग का उपदेश है जिसमें गान का सा माधुर्य है लय है वह तिरंगावलियों से ऊपर उठकर कर्मवीचियों के नर्तन को देखते रहने का दृष्टा भाव भी है। ऐसी अवस्था ज्ञान की ही होती है और आश्चर्य यह है aकि इस गीत को अतीव चंचल तथा घटना प्रधान समरांगण में गाया गया है बांट के टुकड़े को बंसी बनाकर आये रागपुरुष के लिए ज्ञान ही एकमात्र शैली है वह पूर्ण पुरुष राग में ही व्यक्त हो सकता है इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि  तटस्थभाव का सोदाहरण विवेचन कर्म संवेग में अच्छी तरह समझ में आ सकता है।
गीता वेदांत का ग्रंथ है इसका प्रमुख पात्र अर्जुन है मोह के आवेश में से उत्पन्न अवसाद अर्जुन को अक्रांत कर देता है उसके प्रश्नों में उत्सुकता नहीं है एक निराश भाव है जो कृष्ण से सीधा उत्तर मांगता है इस जय पराजय से क्या होना है यह व्यर्थ का रक्त पात्र अन्ततः किस लिए यह भविष्य में आहत और वर्तमान से पूछता है कि कृष्ण काल पुरुष है उसमें कर्मसमारंभ की परिणामी स्थितियां समाविष्ट है sवह समाविष्ट के नायक हैं वे जानते हैं इसलिए भावीपरिस्थितियों का अवलोकन कर निर्णय सुनाते हैं।
सप्तशती के समाधि सूरथ अपनी वर्तमान मनोदशा से क्षुब्ध है उनके प्रश्नों में कुतूहल है उदासीनता उनमें नहीं है उनका उपद्रष्टा मुनि है उनके मोह की मीमांसा करने के लिए मुनि उपाख्यानों को उदाहरण के रूप में सुनाता है सप्तशती का #मोह्यन्ते_मोहिताश्वैव_मोहमेष्यन्त्_चापरे ( मुक्त कर रही हूं मोहित करती रही हूं और मोहबद्ध करती रहूंगी) मोह को त्रिकाल व्यापृत करने वाली परमेश्वरी का भविष्य काल अर्जुन में हैh अर्थात अर्जुन भविष्य की चिंता से अवसन्न है और मोहिता का भूतकाल समाधि सूरथ के चरित्र में व्यक्त है प्रकृति की गुणात्मक अवस्था व्यक्ति में ही प्रवृत्त है और समष्टि में भी।
समष्टि मैं वह हर युग का नामकरण करती है जो व्यक्ति में अवस्था का निर्धारण करती है यदि वर्तमान अपने से प्रसन्न करने लगे उसकी जिज्ञासा विवेकोन्मुख हो तो एक रहस्य का अनावरण होता है प्रकृति का चरम तो नहीं पर उसकी शैली का भी परिचय प्राप्त होता है इस दृष्टि से गीता और शक्ति दोनों का बुद्ध एक है गीता का ज्ञान योग की भूमिका प्रस्तुत करती है सप्तशती भक्ति के सुरम्य उपवन से ही होकर परमेश्वरी की कृपा का प्रसाद प्राप्त कर आती है।
गीता का ज्ञानयोग व्यष्टि मे समष्टि दर्शन कराता है सप्तशती का कान्तासम्मित उपदेश समष्टि में व्यष्टि का दर्शन कराता है अर्जुन के मोहपाश को छिन्न करने के लिए भविष्यबद्ध उनको फ़लासक्ति से मुक्त रहने के लिए कृष्ण का उपदेश एक शाश्वत सत्य है कहीं लोग प्रशन्न करते हैं फलहीन कर्म करने में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती फिर फल को परार्पित करके कोई व्यक्ति कर्म करेगा तो करेगा ही कैसे?
कृष्ण का समाधान दुरूह नहीं है दुरूह तब लगता है जब व्यक्ति की बुद्धि मोहमलाच्छन्न रहती है कर्म के साथ ही उसका परिणाम किवां फल नियत हो जाता है कोई भी काम एक साथ नहीं होता क्रमशः होता है इसलिए कर्म का जितना अंश होता जाता है फल भी उतने ही अंश में बनता जाता है oमाना हमें खीर बनानी है खीर एक साथ नहीं बनती दूध लाना भी खीर बनने का एक स्तर है चुल्हा जलाना दूध औटाना आदि सारे कर्म खीर बनने के स्तर हैं इन सभी की संपूर्णता खीर का पूरा तरह बन जाना है।
कर्ता का स्तर अथवा पात्रता कर्म विधि कर्म की मात्रा इत्यादि इस प्रकार के आधार हैं जो संपूर्ण होने पर ही अपेक्षित फल प्रकट करते हैं इसलिए कर्म के साथ परिणाम ही फल  समवायीभाव से जुड़ा हुआ है उसे कर्म से भिन्न करके देखना मुग्धता नहीं तो और क्या है दूसरी बात यह है कि जब व्यक्ति फल पर केंद्रित हो जाता है तो उसमें कर्म से अधिक फल में रूचि हो जाती है परिणाम यह होता है कि कर्म का स्तर गिर जाता है।
सप्तशती में कर्म की व्याख्या नहीं है उसमें क्रियामयी प्रकृति की शैली का निर्देशन है दोनों ही ग्रंथ व्यक्ति को मोह एवं अहंकार से रहित होने का निर्देश देते हैं अर्जुन को शरणागत होने का उपदेश कृष्ण करते हैं समाधि सूरथ को असुरों का उपाख्यान मुनि कहते हैंk रक्तपात दोनों में है मोह की परिणति ऐसी ही होती है जहां बलि देने की प्रथा प्रचलित है वहां जब तक मेध्य  पशु चित्कार नहीं करता घातक खड़ंग नहीं उठाता आशय यह है कि परमा की असिपात पशु पर मोह नही होता है।
जहां मोह अपने पूर्ण बल से प्रकट हुआ ही नहीं वही उसकी असिधार चमकी नहीं सप्तशती के रक्तरंजित आख्यान मोह और दर्प के ध्वंस की ही कथा है इनके रहते पराम्बा का रूप दर्शन कैसे हो सकता है असुरो के रूप में प्रसृत मोह और अंहकार की वाहिनी को वह  अव्यवस्था उत्पन्न करने के लिए निर्बंन्ध कैसे छोड़ सकती है।
उसके दिव्य वैभव और अतुलनीय ऐश्वर्य का दर्शन मोह से मुक्त होकर ही किया जा सकता हैk चण्जऔर मुंण्ड देवी के अपरूप सौंदर्य को देखकर मोहित हो जाते हैं
 और उसे स्त्रीरत्न को अपने स्वामी के रतनागार में ले जाने के लिए आतुर हो जाते हैं इस प्रचंड मोह का विनाश करने के कारण ही वह चंण्डी और चामुंण्डा बनती है स्त्री के रूप में पाने को अकुल शुंभ निशुंभ में मूर्ख ही निवास कर रहा है और वो की अनर्गल विस्तृति उसके लिए 

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आत्मा और ध्यान की साधना

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जब आत्मा ध्यान की साधना के द्वारा निखर जाती है तो वह परमात्मा मय हो जाती है। तब उसमें तीन गुण आ जाते हैं। 

 प्रकृति का गुण जड़ता यानी सत्यता, यह शरीर सत्य है जो परीवर्तनशील है।  यह परमात्मा का एक गुण है। सत्य अर्थात जो परीवर्तनशील हर पल नया है।

 दूसरा गुण मन की चेतनता  यानी जागरुकता तीसरा गुण आनन्द है इसलिए इसे सत्य-चित्त-आनन्द कहते है।

 और इस सत्य चेतना यानी आत्मा के आनन्द को प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम उदेश्य है, और इसको जानने के बाद जो उपलब्ध होता है। 

इसका सार रहस्यपूर्ण अगोचर अदृश्य आनन्द जिसे मैं चोथी सत्ता कहता हूं। वैज्ञानिक भी एक चोथी सत्ता को स्वीकार करते है जिसे वह क्वार्क के नाम से जानते है। 

जिस प्रकार दुध से दही, दही से छाछ और छाछ से घी निकलता है। यह सब मथने के बाद मिलता है। बिचार मंथन करना है शरीर जो दुध की तरह से है। इसको पहले समझना होगा जो अपना पहला चरण है।    

    परमात्मा तो हम सब के प्रत्येक प्राणी के अन्दर विद्यमान है। यदी हम सब को ऐसे देखे की सब में परमात्मा है। तो हम सव का ऐश्वर्य ही बढें ।

और इसके विपरीत देखते है तो वही होती है जो उस मठाधीस और उस आश्रम का हुआ था।

 यही हम सब के साथ भी हो रहा है। अपने दृष्टिकोण को बदलते ही सृष्टि जगत बदल जाता है।  
  
  इस शरीर में कुल आठ चक्र हैं जिसे योगी जाग्रीत कर लेते है वही आठों जगह आत्मा का केन्द्र है जहां से आत्मा मुख्यतः जुड़ती है उन्हीं आठ स्थानों को चक्र के नाम से जानते है।

 पहला मूलाधार जो मानव लिंग के पास होता है जो सामान्य जन होता है उनकी आत्मा शरीर छोड़ते समय उसी से निकलती है। 

दूसरी बात जब पुरुष स्त्री के गर्भ में अपने विर्य को सिचंन करता है। वह उसी चक्र के जाग्रत होने से ही होता है। जिसका वह चक्र जाग्रत नहीं होता है वह नपुसंक होते है। उनमें बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं होती है।

 आत्मा के निकलने और भी कई मार्ग है जैसे दूसरा चक्र स्वाद्धिठान है जो लिंग के उपर और नाभी के निचे होता है।

 तीसरा मणीपूरा है जैसा की नाम से ही प्रतित हो रहा है यह मणी कै केन्द्र है। यह मणी हीरा-मोतीयों वाला नहीं है। 

इसी चक्र से आत्मा नाभी से जुड़ी होती है, जिससे बच्चा मां की गर्भ में जुड़ा होता है एक पतली नालि से जिसको जन्म के बाद काट दिया जाता है।

 पुनः बच्चा अपनी नाक, कान, आंख, गुदा, जनेन्द्रिय आदि इन्द्रियों का प्रयोग करता है।

 जन्म से पहले मां के साथ बच्चा उस नाल से एक होता है वह अपनी इन्द्रियों का पहली बार करता है। इसलिए ही इस चक्र को मणीपूरा कहते है।

 चौथा चक्र हृदय के पास होता है। हम यहां पर के एक सरसरी नजर से देख रहें है जबकि उसके बारें में जानते है. और उसको साध लेते है वह आनन्द को उपलब्ध होते है। 

 वह मानव औरों की तुलना अधीक स्वाभाविक जीवन्त और प्रसन्नचित्त रहता है।

 प्राण हीलिंग चिकित्सा का आधार यही चक्र है यह पद्त्ति चिन में बूहुत अधीक प्रचलित है।

 बह सब इसका दावा करते है कि किसी भी प्रकार की बिमारी का इलाज वह चक्रों के माध्यम से कर सकते है जो चक्रों को जाग्रत करके करते है।

 इसमें पूण्यता और आन्तरिक स्वच्छता की काफी आवश्यक्ता पड़ती है। और मैं कहता हूं की मनुष्य की सारी बीमारी का इलाज ध्यान के माध्यम से कर सकता हूं।

 क्योंकि यह आध्यात्मिक शक्ति है जिसका सुबिधा पूर्वक प्रयोग करके वह सब कुछ किया जा सकता है जिसकी जीवन में तृष्णा है। 

पाचंवा चक्र गर्दन के पास काक कुर्णुम पतन्ञजली इसके बारें में कहते है योग दर्रशन में बिस्तार से किया है उस पर भी विचार आगे किया जायेगा।

 छठा महत्त्वपूर्ण चक्रों में से एक है जिसे आज्ञा चक्र कहते है यह दोनों आखों के मध्य में भ्रुमध्य ललाट जो सामने मस्तक के केन्द्र में यह बहुत जल्द जाग्रत किए जा सकते है। 

जिसे शिव नेत्र के नाम से पुकारते है या कहा जाता है। सातवां चक्र कपाल खोपड़ी के आगे होता है जिसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते है, और अन्तिम आठवां चक्र जिसे सहस्रत्र कमल कहते है।

 यह हमारें सर के बिल्कुल मध्य में जहां पर हिन्दुओं की चोटी होती है। इसका अपना ही आनन्द और रहस्य है। आन्तरीक जगत की ओर एक संकेत है।

 इसलिए लोग आज भी इस परम्परा को श्रद्धा के साथ रखते है। इस चक्र परम्परा का प्रारम्भ यही से हुआ है। इसकी खास बात यह है की इससे जिस मनुष्य की चेतना निकलती है तो वह मोक्ष निर्वाण को उपलब्ध होता है।

 हमारी रीढ़ की हड्डी  में दो नाणीयां मुख्य होती है इनको इंगला पिगंला के नाम से जाना जाता है। उनके मध्य एक सुक्ष्म नाड़ी होती है। 

जिसे सुक्ष्मणा कहते है। इसी नाड़ी में सारें आठ चक्र होते है। इसको जाग्रत करने के लिए कुण्डली को जाग्रत करना पड़ता है। 

जब   कुण्डली ध्यान के प्रयोग से जाग्रीत हो जाती है। तब आत्मा जो अधोगती करती थी वह उर्ध्व गती करने गती है, और मृत्यु के समय जा ग्रत  होकर ध्यानस्त हो कर सहष्त्र कमल से नीकलती है।

 जिससे मोक्ष या मुक्ति निर्वाण को उपलब्ध होता है। अपनी आत्मा जो दूसरी बात कह रही है इस मंत्र में वह है। अग्निनाग्निः समिध्यते।

 अग्नि के द्वारा अग्नि भली प्रकार चमकती है अर्थात प्रेम से प्रेम बढ़ता है और शत्रुता से शत्रुता ही बढ़ती है ज्ञान से ज्ञान और अज्ञान से अज्ञान ही बढ़ता है।

   नौ द्वार अर्थात यह शरीर नौ द्वारों वाली है। जहां पर देवता रहते है उनके देख रेख में इन सारे द्वारों से जो सब कुछ आता-जाता है उसका सारा कार्य होता है, और इसे पुरी अयोद्धा के नाम से जानते कहते है। 

अर्थात यह शरीर एक सामराज्य की तरह है। जिसका मंत्री मंत्रो को जानने वाला मन है। और इसका राजा आत्मा है।

 और इन्द्रिया इसकी प्रजाए है जिसमें पांच मह तत्त्व यानी अग्नी, वायु, पृथ्वी, आकाश, जल, जिससे यह स्थुल शरीर बना है।

 पांच कर्म इन्द्रियां हाथ, पैर, गुदा, लिंग है। जो कर्म करते है आत्मा के लिए। पांच ज्ञानेन्द्रियां है आख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, इनसे आत्मा को ज्ञान प्रप्त होता है।

 सोलहवां मन और सत्रहवां बुद्धि है। शरीर माद्धयम खलु धर्रम साधनम् । यह शरीर सबसे बड़ा धर्म को अर्जीत कमाने वाला साधन रूपी भौतिक धन है।

 शरीर भी पांच प्रकार के बताए गए है। अन्रमय का तैत्रीय उपनिषद की ब्रह्मानन्द बल्लि के दुसरें अनुवाक में किया गया है और वह अन्यमय हमारा पाचंवा शरीर है।
 
तस्माद्वाएतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्रतरप्राणमयःतेनैषपूर्णः।

   अर्थात उस प्रतिपादन किये गये अन्न रस के बने हुए शरीर के अन्दर और शरीर से अलग प्राण तत्त्व है। 

इस प्राण तत्त्व से शरीर पूर्ण है। यह प्राणमय भी एक कोस है। जो अन्नमय कोस से भी सुक्ष्म रूप से शरीर में व्याप्त है।
   तस्माद्वाएमस्मात्प्राणमयादन्योंऽन्तरआत्मामनोमयःतेनैषपूर्णः।।  

   अर्थात उस प्राणमय कोश के अन्दर उससे अलग उससे सुक्ष्म आनन्दमय कोश है। यह पांच प्रकार की स्थुल से सुक्ष्म शरीर है।  
   
                                           

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गुरुवार, 25 मार्च 2021

गुलाब की खेती करने वाले कृषक जय नारायण सिंह जी की वार्ता

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  गुलाब की खेती करने का समय 15 नवम्बर  से लेकर 15 जनवरी के बीच जब टम्प्रेचर  5 या 7 डिग्री  रहता है तभी लगाया जाता हैलगानै की बिधि 
1,,खेत मे बर्मी कम्पोष्ट, या नेडफ कम्पोष्ट  या सडी गोबर की खाद प्रति एकड 25 ट्राली के हिसाब से  डालकर खेत की खूब गहरी जुताई करदे।
2,,फिर खेत मे लाइन से लाईन की दूरी व पौध से पौध की दूरी करीब 1मीटर की बनाकर खेत मे गड्ढे 1फुट गहरे खोद दे
3,, गड्ढे करीब 10 दिन तक खुदे हुये पडे रहने दे ताकि गड्ढे में  खूब  धूप लग जाये और गड्ढे की खुदी हुई मिट्टी भी खूब सूख जाये ताकि मिट्टी के बीमारी वाले बैक्टीरिया  मर जाये।।
4,,इसके  बाद पौध की ब्यवस्था  कर ले एक एकल मे 5500 गड्ढे खोदेगे और 5500 पौध की ब्यवस्था  करनी होगी।। 
5,,, जब पौध आ जाये तो लगाने के समय गड्ढे मे प्रति गड्ढा 50 ,,50 ग्राम दीमक की दवा डाल देइसके बाद प्रति  गड्ढे मे 100,,100 ग्राम डी ए पी की खाद डालदे इसके बाद पौध को गड्ढे में  रखकर  बर्मी या नूडल या सभी गोबर की खाद उसी गड्ढे की जो खुदी हुई मिट्टी  पनि है उसी मे खाद मिलाकर गड्ढे को भर दे जब पूरे खेत मे पौध लग जाये तो तुरन्त  पीछे सेखेत को पानी से खूब भर दें इसके बाद 15 दिन बाद  खेत मे पानी पुनः लगा दे यह ध्यान  दे कि खेत मे दराज न आने पाये यानी खेत सूखे न पाये यह बिषेश ध्यान देना है  इसके बाद  खेत की  निराई गुड़ाई  करना है  इसके बाद 15 मार्च से  लगभग एक एकड मे करीब 5 से 10 किलो फूल प्रति दिन निकलना  शुरू हो जायेगा और खेत मे निराई गुड़ाई और सिचाई की ब्यवस्था  समय समय पर करना है ।
6,,एक एकड खेत गुलाब लगाने मे गोबर की खाद,  डीएपी खाद  ,दीमक की दवा, तथा जुताई,  व गड्ढे की खुदाई,  व पौध की कीमत सभी कुछ की कुल लागत करीब 30 से 35 हजार रुपये आयेगी इसके एक खेत मे करीब 15 वर्ष  तक बराबर फसल देता रहेगा सिर्फ  प्रति तीसरे वर्ष गुलाब की कटिंग कराते रहना पडेगा  और कटिंग का समय भी 15 नवम्बर से 15 जनवरी  के बीच कटिंग  हर हाल मे  करवा देना है और जैसे ही फसल की कटिंग करेगे तो गड्ढे की मिट्टी बाहर करके गड्ढे मे बरमी कम्पोष्ट  या सडी गोबर की खाद फिर से भरना है और मजदूर से खेत की फावडा से गुड़ाई करवा दे जब कटे पौध मे किल्ले करीब 9 ,,9,,इंच के आ जाये तो खेत मे पानी लगा दे उसके 2माह बाद  किल्ले से फूल  आना प्रारम्भ  हो जायेगा  इसी तरह से गुलाब की फसल को करना है।। 
7,, एक एकल गुलाब के खेत प्रति वर्ष   निराई गुड़ाई व सिचाई तथा खाद का कुल खर्च  लगभग 25 से 30 हजार रूपये खर्च आयेगा और शुद्ध  लाभ प्रति एकड प्रति वर्ष करीब करीब 1 लाख 50 हजार से 1 लाख 60 हजार रुपये की बचत सब खर्च निकाल देने बाद शुद्ध मुनाफा  होगा  ।।
8,, अब जहाँ पर किसी को  कुछ संदेह हो तो मुझसे फोन पर सम्पर्क  करके जानकारी प्राप्त कर ले मेरा फोन नम्बर  9956175862 है इस नम्बर  पर हमसे सम्पर्क  करके जानकारी प्राप्त करें  मेरा नाम जय नारायण सिंह सेंगर  ग्राम पंचायत भारू विकास खण्ड बिधनू जनपद कानपुर नगर  है धन्यवाद

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सृस्टि का परमतत्व

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सृस्टि का परमतत्व चैतन्य है। वेदान्त उसे ईस्वर कहता है। साख्य दर्शन उसे पुरुष कहता है। तथा तंत्र शास्त्र उसे शिव कहता है। 

यह सृस्टि उसी चैतन्य तत्व की शक्ति है। जिसे वेदान्त मायाशक्ति कहता है। साँख्य इसी को प्रकृति कहता है। तथा तंत्र शास्त्र इसे भैरवी कहता है। तथा शिव को भैरव भी कहा जाता है। यह भैरबी शक्ति अपनी परावस्था में शिव से अभिन्न रहती है। एकाकार रहती है।

किन्तु अपनी अप्रवस्था में यह सृस्टि की रचना करती है। शरीरो में यही शक्ति प्राणों के रूप में सभी जीवधारियों में विद्यमान रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है प्राणों की इस शक्ति से सभी जीव धारिया प्राणी जीवन प्राप्त करते है।

प्राणों के निकल जाने पर वे म्रत्य घोषित कर दिए जाते है अतः जीवन का आधार यही प्राण शक्ति है। यह प्राण शक्ति चेतन तत्व शिव की ही शक्ति है। किंतु चेतन तत्व केवल ज्ञान स्वरूप है। वह क्रिया नही करता सभी क्रियाये उसकी शक्ति से ही होती है।

शरीर मे यही प्राण शक्ति स्वास परस्वाश के रूप में कार्य करती है। योग शास्त्रो में इसी को रेचक पूरक व कुम्भक कह जाता है। स्वाश परस्वाश की यह क्रिया इस परादेवी का ही स्पंदन है।

यह क्रिया ह्रदय से आरम्भ होकर ऊपर द्वादशान्त तक अर्थात नासिका से बाहर निकल कर बाहर अंगुल दूर तक जाती है। तो इसे प्राण कहा जाता है तथा द्वादशान्त से भीतर ह्रदय तक आने वाले स्वाश को जीव नामक अपान कहा जाता है।

यह परादेवी निरंतर इसका स्पंदन करती रहती है। यह परादेवी विसर्ग स्वभाव वाली है। यही आंतर व बाह्य भावों में सृस्टि करती है। शरीरो में अथवा सृस्टि में जो भी स्पंदन है हलचल है। वह सब इस शक्ति के कारण है।

जहा कोई स्पंदन नही है। कोई हलचल नही है।ऐसी शांत अवस्था ही चैतन्य शिव का स्थान है। जहाँ प्राण तत्व भर निकलता है। और अपान जा आरम्भ नही होता है। तो इन दोनों के बीच मे जो थोड़ा सा अवकाश रहता है। यही शिव का स्थान है। जहाँ कोई हलचल नही होती इसपर ध्यान केंद्रित करने पर यह अवकाश लंबा हो जाता है।

और इसी में उस चैतन्य स्वरूप शिव की अनुभूति होती है। इस प्रकार जब ह्रदय में अपान वायु का अंत होकर प्राण वायु का उदय होने के मध्य जो अवकाश है उसका ध्यान करने से योगी की शिव की अभिब्यक्ति हो जाती है।

प्राण का अंदर आना व बहार जाना इसका स्वाभाविक कार्य है। जो इस पराशक्ति का ही स्पंदन  है। द्वादशान्त तथा ह्रदय में ध्यान करने से सभी तरह की उपाधियां का विस्मरण हो जाता है। तथा में ही शिव हु या में ही ब्रह्म हु (  अहम ब्रह्मास्मि) इस प्रकार की अनुभूति हो जाती है। और यही शून्य स्थान है।

ओउम

आदि योग

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सप्तशती के प्रयोग

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{{{ॐ}}}

                                                            

अनेक बार अनेक तरह की बात का स्पष्टीकरण दिन कर देने के बाद भी कुछ भाग्यवादी ऐसे मिल जाते हैं जो भीतर से उत्तेजित कर देते है उत्तेजित इसलिए कि भाग्यवाद के सिद्धांत को पूरी तरह समझे बिना वह एक प्रतिबद्धता प्रमाणित करते हैं aकर्म नहीं कांड करते हैं वाद को समझाने वाला भाग्य को स्वीकार नहीं करेगा पर केवल भाग्य को ही सर्वस्व मानने वाला कर्म के यथार्थ को नहीं समझता यह निश्चित है।
इसमें कोई संशय नहीं कि देश श्रंखला के कर्म से मनुष्य के रूप में जो रचना है वह संपूर्ण है समर्थ है और स्वतंत्र भी है मनुष्य तक जितने देह हैं वह सब बद्ध हैं उतना ही शारीरिक स्तर पर भी और बौद्धिक स्तर पर भी जितनी बुद्धि विकसित है उतना ही देह परिमार्जित है दुख तब होता है जब हम भाग्य की पूजा करते हुए प्रकृति का अपमान करते हैं अपमान इस तरह की यह उन्नत दे देकर प्रकृति ने हमें कर्म करने की स्वतंत्रता दे दी है और हम उस स्वतंत्र का पता का उपयोग न कर के भाग्य के अधीन समझ बैठते हैं।
लोग दही का व्यापार करते हैं वह दूध के बारे में जानते हैं तो हैं पर विश्वास दही पर और उसके समर्थन एक अन्य स्थितियों एवं शैलियों पर ही करते हैं sवे मानते हैं कि अच्छे दही के लिए बढ़िया दूध रहा करता है पर उनका ध्यान दही पर ही घूम फिर कर आ टिकता है हम जानते हैं कि भाग्य के रूप में जो प्रस्तुत है वह कर्म का ही परिणाम है कर्म हमारा ही था भाग्य भी हमारा ही रहेगा।
भाग्यवादी भाग्य को अपरिहार्य मानते हैं पर केवल भाग्य की परीक्षा करने को भी अनावश्यक भी कहते हैं कि उनकी दृढ़ धारणा है कि भाग्य को बदला नहीं जा सकता कृष्ण भगवान अपना निर्णय सुनाते हैं कि शुभ अथवा अशुभ रूप से में जो कर्म हम कर चुके हैं उसका फल हमें भोगना ही होगा यह प्रकृतिक आवश्यक व्यवस्था है इससे अस्वीकार या असहमति नहीं हैk पर कर्म का बल भी एक प्रकृतिक व्यवस्था है।
हम भाग्य को बदलने की बात नहीं करते प्रत्यूत प्रतिभाग्य अथवा समांतरभाग्य की कहते हैं मनुष्य में यह सामर्थ्य है कि वह चाहे तो बेहतर भाग्य का निर्माण कर सकता है यह कर्म स्वतंत्र यह मान लेते हैं की विशेषता है कर्म पर इतना विशद गंभीर विवेचन करने वाले भारतीय वांग्मय में मनुष्य तक किसी अन्य देहधारी की को तपस्या करते नहीं बताया गया है।
इसका कारण यह नहीं है कि सारा कर्म शास्त्र एवं साधन मार्ग मनुष्य की ही गवेषणा है बल्कि इसलिए है की अन्य देही की रचना एवं रचना अनुसार बुद्धि का विकास होता है और उस स्तर पर जीव के कर्म को समझ पाता है ने कर्म को करने में स्वाधीन रहता है।
कौवा लाख प्रयत्न करके भी का एक अक्षर ही बोल पाएगा का काली नहीं कह पाएगा यह दृश्य व्यवस्था और बुद्धि के स्तर को भी सूचित करती है पुराणों में नहुष स्वर्ग जाना चाहता है उसके परोहित एवं कुलगुरु उसे मना कर देते हैं वह विवश होकर विश्वामित्र के पास जाता है 
विश्वामित्र वशिष्ठ से के से विपरीत है क्योंकि वशिष्ठ भाग्य के रूप में इसमें कर्म  स्वर्ग जाना चाहता है उसके प्रवाहित एवं कुल गुरु से मना कर देते हैं वह विवश होकर विश्वामित्र के पास जाता है विश्वामित्र वशिष्ठ से विपरीत है क्योंकि वशिष्ठ भाग्य के रूप में इस में कर्मफल को महत्व देते है।
और विश्वामित्र कर्म बल की स्थापना करते हैं नहुष की कातर प्रार्थना सुनकर विश्वामित्र उसे अपने उत्कृष्ट बल के आधार पर सहदेह स्वर्ग भेज देते हैं नहुष विश्वामित्र की शक्ति से चमत्कृत एवं आभार मान होकर वशिष्ठ की निंदा करने लगता हैo इस पर देवराज कुपित होकर कहते हैं गुरु की निंदा करने वालों के लिए स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है इसके साथ ही नहीं इस धरती पर आने लगता है विश्वामित्र उसे देख वही अधर में रोक देते हैं।
बलिष्ठ विश्वामित्र एक नई सृष्टि रचने लगते हैं उनके इश्क उपकरण से सभी स्तब्ध रह जाते हैं इंद्र स्वयं आकर पानीपत पूर्वक उन्हें निवेदन करता है कि भगवान आपके आदेश की अवहेलना करने का साहस किसमें है मैं आपका ज्ञानू चार हूं आप चाहे सारे मनुष्य को स्वर्ग में सहदेह भेज देंh पर इससे मर्यादा लुप्त हो जाएगी संसार में के सारे व्यवहार मर्यादा से बद्ध है यह ही टूट जाएगी तो फिर सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
विश्वामित्र बोले इंद्र तेरी व्यवस्था का अतिक्रमण में कहां कर रहा हूं तेरे स्वर्ग की मर्यादा का तू पालन कर मैं सभी कुछ नया और इससे उत्तम बना रहा हूं यह मैं कर सकता हूं विश्वामित्र की हद को जानते हुए देवराज की प्रार्थना पर ब्रह्म आए और उनके कहने पर विश्वामित्र बिरत हुए।
यह एक आख्यान था इसमें कर्म वाद का रहस्य स्पष्ट रूप से उद्घाटित है भाग्य के रूप में कर्म फल की मर्यादा अपने स्थान पर और नवीन कर्म के भाग्य का निर्माण करने वाला कर्म बल अपने स्थान पर यह व्यवस्था कर्म बाद की सीमा का उल्लंघन नहीं हैs माना किसी व्यक्ति के लिए नहीं रहने का योग है ऋण को चुकाना ही पड़ेगा यह प्राकृत व्यवस्था है पर व्यक्ति धना गमन के लिए कोई प्रयोग करें और उसके परिणाम स्वरूप उसके आय के साधन जुटतेते जाए जिससे वह ऋण चुका सके।
यह कर्म वाद का सार्थक पक्ष है यह दूसरी बात है कि ऋण ग्रस्त करने वाले योग से अधिक हमारे बल प्रयोग का बल रहे मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि शुद्ध और विधि पूर्वक किया गया प्रयोग फल नहीं दे रहा है तो निश्चय से मात्रा कम है व्यक्ति को इतना विवश मान लेना कि वह भाग्य के आगे उपाय है अन्याय है  अनंत भाग्य नाम से जो कुछ मिल रहा है वह हमारा कर्म का है।
भाग्य के विधाता हम हैं तो दूसरे भारतीय का निर्माण भी हम कर सकते हैं यह विश्वास हमारे बल को उद्दीप्त करता रहे और अन्यथा यह सारा उपचार शास्त्र असत्य हो जाएगा कर्म वंश वाद का सिद्धांत अधूरा रह जाएगा न्यू शास्त्रों ने काम में प्रयोग करने से मना किया है aपर साथ ही विषमताओं से मुक्त होने के लिए विधि भी बताई है और प्रयोग भी बताए हैं वास्तविकता यह है कि व्यक्ति काम ना करत होकर कोई प्रयोग करता है और प्रयोजन पूर्ण होने पर उसे भूल जाता है यह स्वार्थ वृत्ति हुई अथ च सपण साधना वैसे ही साधना के स्तर को निम्न कर देती है।
यह व्यवहार काम में कर्म के निषेध के मूल में रहा है प्रयोजन के अधिष्ठाता देवता का विधिवत अर्चन करके सम्मान पूर्वक विसर्जन करने पर कोई दोष नहीं है ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारा प्रयोजन को प्रयोग पूर्ण होने से पहले ही सिद्ध हो गया है और हम उस प्रयोग को वहीं छोड़ दें।

क्रमश कल की पोस्ट में दुर्गा सप्तशती के काम्य प्रयोग पर वर्णन किया जाएगा

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बुधवार, 24 मार्च 2021

ऊर्जा डायग्राम

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ब्रह्माण्ड एक ऐसे सूक्ष्म तत्त्व से निर्मित हुआ है, जो शुद्ध सूक्ष्म विरल और परम गति वान एव तेजवान है इस तत्त्व से ब्रह्माण्ड के निर्माण की एक विस्तृत प्रक्रिया है, किसी ने इस तत्त्व को आत्मा कहा है किसी ने शिव कहा है तो किसी ने ब्रह्म।

इसी तत्व से उत्पन्न ब्रह्माण्ड एक विशिष्ट ऊर्जा के डायग्राम मे क्रिया कर रहा है । इस डायग्राम से ऊर्जा तरंगें उत्पन्न हो रही है जैसा ऊर्जा डायग्राम इस ब्रह्माण्ड का है वैसा ही डायग्राम किसी प्राकृतिक इकाई का होता है, चाहे वह पृथ्वी हो सूर्य हो, चाँद हो, और मंडल हो या निहारिका हो , वैसा ही ऊर्जा डायग्राम प्रत्येक जीव, प्रत्येक वनस्पति, प्रत्येक कीटाणु, प्रत्येक परमाणु का होता है, और सब एक दुसरे से जुडे हुए होते है ठीक उसी प्रकार किसी जीव के कोशाणु एक दुसरे से जुडे होते है। 

यह ऊर्जा डायग्राम इस प्रकार है जैसे सूर्य के केन्द्र मे उसका घन पोल है वहा से जो किरणे सतह से विकरित होती है वे ऋण ऊर्जा तरंगें है किन्तु पृथ्वी ये लिए वे तरंगें यानि सूर्य की किरणे धन तरंगें है और उन्ही तरंगों के कारण पृथ्वी का नाभिक काम करता है, पृथ्वी के लिए धनघ्रुव है और उसकी सतह से जो ऊर्जा विकरित है वह पृथ्वी की ऋण तरंगें है ।

पृथ्वी की ये ऋण तरंगे हमारे लिए धन तरंगें है हमारी उत्पत्ति सूर्य की ऋण तरंगों एवं पृथ्वी की ऋण तरंगों से सभी जीव वनस्पतियों की होती है इससे हमारे ह्रदय का नाभिक बनता है और इसी से हमारा डायग्राम बनता है यह डायग्राम भी वही होता है और इसका दो (दोनो पैर)धन कोण पृथ्वी से लगा होता है और एक सुर्य की ओर होता (सिर) है, दो ऋण कोण ऊपर होता(हाथ)है एक नीचे की ओर होता(रीढ़ की हड्डी का सिरा) है।

पृथ्वी का धन कोण सूर्य की ओर होता है दो उसके विपरीत एक ऋण कोण विपरीत मे होता है दो सूर्य की ओर सूर्य की निहारिका के केन्द्र से भी यही स्थिति होती है यही क्रम ब्रह्माण्ड इस केन्द्र तक चला जाता है । हमारा ऊर्जा डायग्राम अनेक श्रृंखलाओं मे होता हुआ ब्रह्माण्ड के ऊर्जा डायग्राम से जुड़ा है।
                                
जब सुक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर अनाहत चक्र से जुडी रज्जूनूमा त्रिगुणी ऊर्जा धारा के तन्तु मूल को उसके केन्द्र से तोड दिया जाता है तब अनाहत चक्र का कमल शरीर से अलग हो जाता है । इस समय ऊर्जा ज्योति रूप कमल होता है, जो ऊर्जा ज्योति का स्वरूप बन जाता है इसमें सम्पूर्ण ऊर्जा शरीर अपने ऊर्जा जन्तुओं के साथ सिमटा होता है ।

प्रेत आत्मा भी सुक्ष्म शरीर ही होता है ।और यह भी स्वयं को कुछ हद तक सिंकोड सकता है।

परन्तु इसमे और ज्योति कमल में अन्तर होता है कि प्रेतात्मा  स्वयं के ऊर्जास्वरूप एक स्थान पर केन्द्रित नही कर सकता ।
यह एक भ्रम है कि प्रेतात्मा कोई भी स्वरूप धारण कर सकती है यह दूसरों को सम्मोहित करके ऐसा दृश्य दिखाती  है जो नही है । यह क्रिया कोई उन्नत आत्मबल से युक्त प्रेतात्मा ही कर सकती है सभी नही।

दुसरी मान्यता यह है कि प्रेतात्मा छिद्र मे प्रवेश कर जाती है यह भी एक भ्रम है प्रेतात्मा का प्रकृति पर कोई वश नही है उसका छिद्र मे प्रविष्ट होने का कोई अर्थ नही है क्यो कि स्थूल तत्त्व उसे रोक नही सकते वह पत्थरों से भी पराग बन कर निकल सकती है।

किन्तु यह कमल प्रेतात्मा के समान होते हुए भी प्रेतात्मा नही है यह केन्द्रभूत सूक्ष्म शरीर है ।

आज बस इतना ही..

Vedic vignan

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वेदो_का_मनोमयी_कोश

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{{{ॐ}}}

                                                        #वेदो_का_मनोमयी_कोश

मनस शरीर यानि मनोमय शरीर का विकास साधना के द्वारा किया जाता है यह इक्कीस वर्ष के बाद विकसित हो सकता है इसे विकसित होने सअतीन्द्रिय शक्ति आ जाती है जैसे सम्मोहन ,दुर संरेक्षण दसरो का मनपढ़ लेना शरीर से बहार निकल कर यात्रा करना अपने को शरीर से अलग करना वनस्पतियो  के गुण पता लगना उपयोग करना  आदि।
चरक और सुश्रुत ने इसी सिद्धि से शरीर के बारिक  से बारिक अंगो का भी वर्णन किया था। सुषुम्ना नाडी़ ,कुण्डलिनी और षट् चक्रों  को विज्ञान अभी भी नही खोज पाया।
इन विचार तरगों  का प्रभाव पदार्थ पर भी पडता है संकल्प से वस्तु  हिलाई व तोडी  जा सकती है। विज्ञान ने भी इसके कई प्रयोग किये है योग की समस्त सिद्धियाँ जो पांतजलयोग दर्शन मे दी गयी है वे इसी शरीर के विकसित होने से आ जाती है कुण्डलिनी भी इसी शरीर की घटना है।
जादु चमत्कार इसी का विकास है और इसका केन्द्र है अनाहत चक्र  जब अनाहत जाग्रत होता है तो ये सिद्धियाँ आ जाती है
इसके जाग्रत होने से काल व स्थान की दुरी मिट जाती है  वह बिना मन इन्द्रियो के सीधा मन से देख व सुन सकता है।
कल्पना, इसकी संकल्प सम्भावनाएँ है ऐसा व्यक्ति शाप दे सकता है
पुराण शरीर को इसी उपलब्ध व्यक्तियों  द्वारा लिखे गये है किन्तु उनकी भाषा प्रतीकात्मक  होने से विज्ञानिक उन्हे समझ नही पाते ऐसे व्यक्तियों  ने प्रेतात्मा को जाना मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाती है कहां कैसे रहती है कैसा अनुभव करती  है कौन इन आत्माओं को ले जाता है पुनर्जन्म  कब और कैसे होता है गर्भ मे जीवात्मा  का प्रवेश कब होता है । स्वर्ग  और नरक कहां हैआदि की जानकारी ऐसे व्यक्ति ही दे सकते है जो मनोमय  शरीर या मनस शरीर को सक्रिय कर लेते है
                                               यही वेदातं का मनोमय कोष है

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काल का रहस्य

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------------------: जगत के सभी पदार्थ कालशक्ति के अधीन हैं:--------------------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 ---------:साधना का प्रयोजन है-- कालक्षय पर विजय प्राप्त करना:---------
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        मीरा कृष्ण के असीम प्रेम में डूबी रहती थी। जो मिला, खा लिया। उसे न तन का होश, न खाने की चिन्ता। उन्हें विष दिया गया, उसे भी कृष्ण का प्रसाद समझ कर पी गयीं वह। लेकिन विष का तो असर ही नहीं हुआ। ऐसा क्यों ?--कभी इसपर लोगों ने विचार किया ? प्रेम रस के रहते फिर किसका असर होगा शरीर पर भला ! यह प्रेम ही तो वास्तविक तत्व है जो ब्रह्म रूप है--'रसो वै सः।' वही परम तत्व का सार है जिसे मीरा ने अपने में आत्मसात् कर रख था। फिर उन्हें क्या चिन्ता कि कोई उन्हें अमृत पिला रहा है या पिला रहा है कोई विष। वह तो अमृत और विष का अतिक्रमण कर बहुत आगे निकल चुकी थीं। 
      इसी प्रकार मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में आदि शंकराचार्य चारों वेदों के ज्ञाता हो गए। गृहस्थ ज्ञान के लिए परकाया प्रवेश कर वह ज्ञान भी अर्जित किया, मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी से शास्त्रार्थ  किया और उन पर विजय प्राप्त की। बत्तीस वर्ष की आयु में चारों पीठों की स्थापना की और आचार्य शंकर के नाम से जगत में विख्यात हुए।
       रत्नाकर डाकू एक सन्यासी के शब्दों से प्रभावित होकर #ऋषि #बाल्मीकि बन गया। वह बाल्मीकि रामायण लिखकर हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया। एक अनपढ़ मूढ़ ब्राह्मण ने राज-दरवार में एक विदुषी कन्या को मूक शास्त्रार्थ में हराकर उससे विवाह कर लिया। बाद में अपनी मूढ़ता का भेद खुलने पर और पत्नी से अपमानित होकर गृह-त्याग कर चला गया। वही मूढ़ बाद में #कालिदास बनकर लौटा। इसी तरह पत्नी के मार्मिक शब्दों ने तुलसीदास के जीवन को ही बदल दिया और उन्हें महाकवि तुलसीदास बना दिया। इसी प्रकार रैदास, कबीरदास, सूरदास के जीवन में भी घटनाएं घटीं और उनके जीवन बदल गए। ऐसी हज़ारों घटनाएं हैं जो किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं हैं। ऐसे बहुत से साधकों का वर्णन मिलता है जिनके जीवन पर काल का प्रभाव बहुत ही न्यून पड़ता है। जीवन के उस क्षण को और बिन्दु को कौन जानता है जहाँ से मनुष्य का जीवन बदलने वाला है। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रकृति वह अमूल्य अवसर कभी- न-कभी हर मनुष्य के सामने लाती है। यह मनुष्य ही है कि अपने अहंकार में वह उस अवसर को पहचान नहीं पाता।

                काल का रहस्य
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       विश्वब्रह्मांड काल-जगत है। इसे काल-जगत से ही समझने का प्रयास करना चाहिए। काल- जगत एक प्रकार से अपरिवर्तनशील है। यहाँ पर जो शक्ति कार्य करती है, वह निरन्तर आवर्तित होती रहती है। इस आवर्तन के दो प्रकार हैं--एक सिकुड़ना और दूसरा विस्तार। एक की गति भीतर की ओर है और दूसरे की गति है बाहर की ओर। भीतर की ओर गति ही सिकुड़ना है और बाहर की ओर गति है--विस्तार-गति। देखा जाय तो एक श्वास प्रक्रिया है और दूसरी है--प्रश्वास प्रक्रिया। जगत के सारे द्वन्द्व इनी दोनों प्रक्रियाओं के अंतर्गत हैं। श्वास लेना भी होता है और छोड़ना भी होता है। श्वास का ग्रहण और त्याग निरन्तर चलता रहता है। इसीका नाम जीवन है।
      तंत्रशास्त्र में 'षोडशी कला' का विशेष स्थान है। काल का सूक्ष्म रहस्य इस विद्या के गर्भ में छिपा है। महाशक्ति और काल-शक्ति ही सूक्ष्म रूप से जगत में कार्य करती है। अगर देखा जाये तो दोनों एक ही हैं। लेकिन कार्य निरूपण अलग-अलग है। काल-शक्ति परिणामी है  उससे ही सभी परिणाम घटित होते हैं।
       आदि काल से ही काल से रक्षा पाने के लिए सिद्ध-साधक किसी न किसी महाशक्ति के आश्रय में जाते हैं। क्योंकि काल-शक्ति आवर्तनशील है, इसीलिए जगत के सभी जड़-चेतन पदार्थ काल-शक्ति के ही अधीन रहकर निरन्तर आवर्तन करते रहते हैं। जगत में सभी वस्तुएं इसीलिए परिवर्तित होती रहती हैं क्योंकि आवर्तन शक्ति से उनका परिवर्तन करना स्वभाव बन जाता है। साधना का यही रहस्य है। हम इसी काल पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं। साधक की शक्ति की साधना का प्रयोजन है इसी काल-क्षय पर विजय प्राप्त करना। काल का शरीर पर न्यूनतम प्रभाव पड़े ताकि वह अपनी साधना-पथ में इस अमूल्य शरीर का अधिक से अधिक उपयोग कर सके और साधना के उस परम लक्ष्य को प्राप्त कर सके जो जन्म-जन्मान्तर से चला आ रहा है। shiv ram Tiwari 

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श्री गुरु चरण सरोज रज का महत्व

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श्री गुरु चरण सरोज रज :---

श्रीगुरुचरणों में जब से नमन किया है, सिर बापस उठा ही नहीं है, तब से झुका हुआ ही है और सदा झुका हुआ ही रहेगा| गुरु तत्व के साथ हम एक हैं| उन में और हमारे में कहीं कोई अंतर नहीं है| हमारा साथ शाश्वत है| शरीर तो पता नहीं कितनी बार छुटा है, मिला है, और छुटता रहेगा, पर गुरु का साथ शाश्वत है|

'श्री' शब्द में 'श' का अर्थ है श्वास, 'र' अग्निबीज है, और 'ई' शक्तिबीज| श्वास रूपी अग्नि और उसकी शक्ति ही 'श्री' है| श्वास का संचलन प्राण तत्व के द्वारा होता है| प्राण तत्व ..... सुषुम्ना नाड़ी में सोम और अग्नि के रूप में संचारित होता है| श्वास उसी की प्रतिक्रिया है| जब प्राण-तत्व का डोलना बंद हो जाता है तब प्राणी की भौतिक मृत्यु हो जाती है|

सहस्त्रार में दिखाई दे रही ज्योति गुरु महाराज के चरण-कमल हैं| उस ज्योति का ध्यान श्रीगुरुचरणों का ध्यान है| उस ज्योति-पुंज का प्रकाश "श्रीगुरुचरण सरोज रज" है| सहस्त्रार में स्थिति श्रीगुरुचरणों में आश्रय है| खेचरी-मुद्रा .... श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है| जिन्हें खेचरी सिद्ध नहीं है वे साधनाकाल में जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखें और आती-जाती श्वास के प्रति सजग रहें| तालव्य-क्रिया के नियमित अभ्यास से खेचरी सिद्ध होती है|

संध्याकाल ..... दो श्वासों के मध्य का संधिकाल "संध्या" कहलाता है जो परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है| हर श्वास पर परमात्मा का स्मरण होना चाहिए क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं| हर एक प्रश्वास जन्म है, और हर एक निःश्वास मृत्यु| 

हमारा मन जब मूलाधार व स्वाधिष्ठान केन्द्रों में ही रहता है तब वह धर्म की हानि है| हर श्वास में ईश्वरप्रणिधान का सहारा लेकर आज्ञाचक्र तक व उससे ऊपर उठना धर्म का अभ्युत्थान है| आज्ञाचक्र और उस से ऊपर धर्मक्षेत्र है, उसके नीचे कुरुक्षेत्र|

यह मनुष्य देह इस संसार सागर को पार करने की नौका है, गुरु कर्णधार हैं, व अनुकूल वायु .... परमात्मा का अनुग्रह है|  परमात्मा सदा हमारी चेतना में रहें| 
ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे .... परमशिव है| वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है| कुण्डलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है| हमारा मन सदा श्री गुरु चरण सरोज रज में लोटपोट करता रहे| ॐ तत्सत्!!
कृपा शंकर 
२२ मार्च २०२०

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मंगलवार, 23 मार्च 2021

ध्यान की परिभाषा

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ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है। 

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है। 

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान क्रिया और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है। 

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। 

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति। 

ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।

ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। 

ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है। 
नमन ॐ

Virat Yog Sagar

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महा मृत्युंजय मंत्र

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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है|

मंत्र इस प्रकार है -

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥
यह त्रयम्बक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ 
त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को
यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्* पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मका* उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)
इव = जैसे, इस तरह
बन्धनात् = तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्योः = * मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा = नहीं वंचित होएं
अमृतात् = अमरता, मोक्ष के आनन्द से sabhar Facebook wall 

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