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बुधवार, 31 मार्च 2021

अचेतन में प्रवेश

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स्वप्न देखते हुए जागने की पहली विधि - 

एक तो यह कि तुम यह मानकर अपना कामकाज, अपना व्यवहार शुरू करो कि सारा संसार स्वप्‍नवत है। तुम जो भी करो, यह याद रखो कि यह सपना है। जब जागे हुए हो तो निरंतर याद रखो कि सब कुछ सपना है।

अगर तुम स्वप्न देखते हुए स्मरण रखना चाहते हो कि यह स्वप्न है तो तुम्हें जागते हुए ही उसका आरंभ करना होगा। अभी तो ऐसा है कि स्वप्न देखते हुए तुम नहीं याद रख सकते कि यह स्‍वप्‍न है। तुम तो सोचते हो कि यह यथार्थ ही है।

क्यों तुम सोचते हो कि यह यथार्थ है? क्योंकि दिनभर तो तुम यही समझते हो कि सब कुछ यथार्थ है। वह तुम्हारी दृष्टि बन गई है —बंधी—बंधाई दृष्टि। जागते हुए तुमने स्नान किया, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम भोजन कर रहे थे, वह यथार्थ था। जागते हुए तुम बातचीत कर रहे थे, वह भी यथार्थ था। पूरे दिन और इसी तरह पूरी जिंदगी, तुम जो भी सोचते हो, करते हो, उस पर तुम्हारी दृष्टि उसके यथार्थ होने की रहती है। यह दृष्टि फिक्स हो जाती है, यह मन की बंधी—बंधाई धारणा बन जाती है। फिर रात में जब तुम स्‍वप्‍न देखते हो तो वही दृष्टि काम करती है कि यह यथार्थ है।

इसलिए पहले तो हम विश्लेषण करें। स्‍वप्‍न और यथार्थ के बीच कुछ समानता होनी चाहिए, अन्यथा यह दृष्टि बननी कठिन होगी। मैं तुम्हें देख रहा हूं। फिर मैं आंख मूंदता हूं रूप का और स्‍वप्‍न देखने लगता हूं और स्‍वप्‍न में तुम्हें देखता हूं। इन दोनों देखने में फर्क नहीं है। जब मैं तुम्हें सचमुच देखता हूं तो क्या करता हूं? मैं तुम्हें नहीं देखता हूं तुम्हारा चित्र मेरी आंखौं मैं प्रतिबिंबित होता है। पहले तुम्हारा चित्र प्रतिबिंबित होता है और तब वह चित्र किसी रहस्यपूर्ण

प्रक्रिया के द्वारा—विज्ञान अभी उस प्रक्रिया को नहीं जान सका है—रासायनिक रूप में रूपांतरित होता है और मस्तिष्क के भीतर कहीं पहुंचा दिया जाता है। विज्ञान को अभी यह भी पता नहीं है कि यह बात ठीक किस स्थान पर घटित होती है। आंख में यह नहीं घटित होती है, आंख तो सिर्फ द्वार है। मैं तुम्हें सीधे आंख से नहीं देखता हूं आंख के माध्यम से देखता हूं।

आंख में तुम प्रतिबिंबित होते हो। तुम मात्र एक चित्र हो सकते हो, तुम यथार्थ हो सकते हो, तुम स्वप्न हो सकते हो। याद रखो, स्वप्न तीन— आयामी होता है। मैं एक चित्र को पहचान पाता हूं क्योंकि चित्र दो— आयामी होता है। स्वप्न तीन—आयामी होता है, इसलिए वह ठीक तुम्हारे जैसा दिखता है। और आंख नहीं कह सकती कि जो देखा गया है यह यथार्थ है या नहीं। निर्णय लेने का कोई उपाय नहीं है, आंख निर्णायक नहीं है।

मैं सदा भीतर हूं और तुम सदा बाहर हो, और दोनों का मिलन नहीं होता। इसलिए यह समस्या ही है कि तुम यथार्थ हो कि स्वप्न। ठीक इस क्षण भी निर्णय लेने का उपाय नहीं है कि मैं स्‍वप्‍न देख रहा हूं या तुम सचमुच यहां हो। और मुझे सुनते हुए तुम कैसे कह सकते हो कि तुम मुझे सच में सुन रहे हो या कि तुम स्‍वप्‍न देख रहे हो? कोई उपाय नहीं है। यही कारण है कि जो तुम्हारी दृष्टि दिनभर बनी रहती है, वही रात में भी, नींद में भी प्रवेश कर जाती है। तुम स्‍वप्‍न को सच मानते हो।

विपरीत का प्रयोग करो। 
सतत यह तीन सप्ताह याद रखो कि जो भी तुम करते हो वह सपना है। शुरू में यह बहुत कठिन होगा। तुम बार—बार मन के पुराने ढांचे में पड़ोगे, तुम सोचने लगोगे कि यह यथार्थ है। तुम्हें निरंतर अपने को सजग करना होगा और याद दिलाना होगा कि यह स्वप्न है। अगर तीन सप्ताह तक लगातार तुमने इस दृष्टि को कायम रखा तो पांचवें सप्ताह में किसी रात स्वप्न देखते हुए तुम अचानक यह भी जान लोगे कि यह स्‍वप्‍न है।

स्वप्न में चेतना को, होश को प्रविष्ट कराने का यह एक उपाय है। रात स्वप्‍न देखते हुए यदि याद रख सको कि यह स्वप्न है तो फिर दिन में याद रखने की जरूरत नहीं रहेगी कि यह स्वप्न है। तब तुम जान जाओगे।

आरंभ में जब इसका अभ्यास करोगे तो यह एक आरोपित धारणा ही रहेगी। तुम चेष्टापूर्वक विश्वास करना शुरू करोगे कि यह स्‍वप्‍न है। लेकिन जब स्वप्न में भी यह स्मरण रहने लगेगा कि यह स्‍वप्‍न है तो यह यथार्थ बन जाएगा। तब दिन में जब तुम उठोगे तो यह नहीं अनुभव करोगे कि तुम नींद से उठ रहे हो; तुम्हें महज यह लगेगा कि मैं एक स्‍वप्‍न से दूसरे स्वप्न में सरक रहा हूं। तब दिन के कामकाज को स्‍वप्‍न की तरह देखना यथार्थ रूप लेगा।

और अगर चौबीस घंटे ही स्वप्न हो जाएं, और तुम्हें उसका अनुभव और स्मरण होता रहे, तो तुम अपने केंद्र पर पहुंच जाओगे। तब तुम्हारी चेतना का तीर दो फल वाला तीर हो जाएगा। और तुम जब स्वप्न समझने लगोगे तो तुम स्‍वप्‍न देखने वाले को, विषयी को भी समझने लगोगे। अगर तुम स्‍वप्‍न को ही सच मानते हो तो तुम स्वप्न—द्रष्टा को नहीं अनुभव कर सकते। जब फिल्म यथार्थ हो गई तो तुम अपने को भूल जाते हो। जब फिल्म बंद होती है और तुम फिर समझने लगते हो कि यह यथार्थ नहीं थी तब तुम्हारा स्वयं का यथार्थ आविर्भूत होता है, प्रकट होता है। तुम स्वयं को अनुभव कर सकते हो—यह एक तरीका हुआ।

यह भारत का एक सबसे पुराना तरीका रहा है। यही कारण है कि हमने इस बात पर जोर दिया है कि संसार मिथ्या है। यह बात हम किसी दार्शनिक अर्थ में नहीं कहते हैं। हम यह नहीं कहते कि यह घर मिथ्या है और यह कि तुम इसकी दीवार से निकल सकते हो। उस अर्थ में नहीं। जब हम कहते हैं कि यह घर मिथ्या है, तो यह एक युक्ति है। यह घर के खिलाफ कोई दलील नहीं है।

यह शंकर का कोई दार्शनिक मत नहीं है। वे यहां सत्य के संबंध में कुछ नहीं कह रहे हैं, वे यहां जगत के बारे में भी नहीं कह रहे हैं। यह तो तुम्हारे मन को बदलने की उनकी एक युक्ति है, तुम्हारी बंधी दृष्टि को बदलने का उनका एक उपाय है; ताकि तुम संसार को सर्वथा भिन्न ढंग से देख सको।

भारतीय चिंतन के लिए यह सदा ही एक समस्या रही है। क्योंकि उसके लिए सब कुछ ध्यान की युक्ति है। यह सत्य है या नहीं, इसमें हमें रस नहीं है। हम तो मनुष्य को बदलने के लिए उसकी उपयोगिता की फिक्र करते हैं। और पश्चिमी चित्त के लिए यह चीज बिलकुल भिन्न है। जब पश्चिम के लोग कोई सिद्धांत प्रस्तावित करते हैं तो वे इस बात की चिंता करते हैं कि यह सच है अथवा नहीं, इसे तर्क से सिद्ध किया जा सकता है या नहीं। लेकिन जब हम कोई चीज प्रस्तावित करते हैं तो हम उसके सत्य की नहीं, उसकी उपयोगिता की चिंता करते हैं। हम देखते हैं कि मनुष्य के मन को बदलने की उसकी क्षमता क्या है। वह सच है या झूठ, हम इसकी चिंता ही नहीं करते। वस्तुत: तो वह दोनों नहीं है। वह एक युक्ति भर है।

मैंने बाहर फूल देखे हैं। सुबह सूरज उगता है और सब चीज सौंदर्य से भर जाती है। लेकिन तुम कभी घर से बाहर नहीं गए हो, तुमने कभी फूल नहीं देखे हैं और तुमने सुबह का सूरज नहीं देखा है। तुमने कभी खुला आकाश भी नहीं देखा है। और तुम नहीं जानते हो कि सौंदर्य क्या है। तुम सदा एक कारागृह में बंद रहे हो। और मैं तुम्हें बाहर ले चलना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि तुम भी खुले आसमान के नीचे आ जाओ और फूलों से मिलो।

यह मैं कैसे करूं? तुम फूलों को नहीं जानते हो। यदि मैं फूलों की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप पागल हो गए हैं, फूल वगैरह नहीं हैं। अगर मैं सुबह के सूरज की बात करूं तो तुम कहोगे कि आप कल्पना कर रहे हैं, स्वप्न देख रहे हैं, आप कवि हैं। अगर मैं खुले आकाश की बात करूं तो तुम हंसोगे और पूछोगे कि आकाश कहां है, यहां तो दीवार ही दीवार है। फिर मैं क्या करूं?

मुझे कोई ऐसी युक्ति निकालनी होगी जो तुम्हारी समझ में आए और जिससे तुम बाहर निकल सको। इसलिए मैं कहता हूं कि घर में आग लगी है और मैं खुद भागने लगता हूं। यह बात संक्रामक हो जाती है, और तुम भी मेरे पीछे भागते हो और बाहर निकल जाते हो। और तभी तुम जानोगे कि जो मैं कह रहा था वह न सही था और न गलत। तब तुम फूलों को जानोगे और मुझे क्षमा कर दोगे।

बुद्ध ने वही किया था, महावीर ने वही किया था, शिव ने और शंकर ने वही किया था। इसलिए बाद में हम उन्हें क्षमा कर देते हैं। क्योंकि एक बार बाहर निकलने पर हमें पता चल जाता है कि वे क्या कर रहे थे। और तब हम समझते हैं कि उनके साथ बहस करना व्यर्थ था, क्योंकि यह बात ही बहस की नहीं थी। आग कहीं नहीं थी, लेकिन हम आग की भाषा समझ सकते थे। फूल थे, लेकिन हम फूलों की भाषा नहीं समझ सकते थे। हमारे लिए वे प्रतीक अर्थहीन थे।
ओशो 
तंत्र -सूत्र, भाग -1, प्रवचन -6

Rajesh Saini

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सोमवार, 29 मार्च 2021

तन्त्र शक्ति युद्ध

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एक समय पर तन्त्र का बहुत सम्मान होता था, तन्त्र द्वारा असम्भव कार्य को भी सम्भव कर लिया जाता था। उस समय पर जो युद्ध होते थे वो तन्त्र द्वारा लड़े जाते थे। जो श्री राम रावण का युद्ध हुआ, महाभारत युद्ध हुआ ये सब तन्त्र शक्ति द्वारा ही लड़े गए थे। जो अस्त्र शस्त्र थे वो तन्त्र शक्ति से चलते थे, रावण का वाहन तन्त्र शक्ति द्वारा ही उड़ता था, मारीच तन्त्र शक्ति द्वारा ही कोई भी रूप धारण कर सकता था, नल नील ने जल को बांधकर पुल बना दिया था, कितने ही दानव थे जो तन्त्र शक्तियो में पारंगत थे। अगर हम कहे कि रावण, श्रीराम जी आदि उच्च कोटि के साधक थे तो लोगो को अच्छा नही लगेगा क्योकि तन्त्र को हीन दृष्टि से देखते है। तन्त्र साधनाओ द्वारा सबने अलग अलग प्रकार की दिव्य शक्तिया प्राप्त की हुई थी। 

ऐसे ही महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, यदि सभी चीजो को ध्यान से देखो तो ये सब समझ आएगा लेकिन हम सिर्फ सोचते है कि वो बस शक्तिशाली था लेकिन कभी ये नही सोचते कि इतना शक्तिशाली बना कैसे, ये एक साधना होती है कि किसी का श्राप फलित हो जाये। लेकिन जब बाहरी लोग आए तो यहा की शिक्षा पद्ति को देखा तो घबरा गए कि इनसे जीतना सम्भव नही है। इनको जीतने के लिए इनकी शिक्षा प्रणाली को समाप्त करना होगा। और यही हुआ भी धीरे धीरे बाहरी शिक्षा को स्थापित कर दिया गया।

आप कहेंगे कि ये तो पुरानी बातें है सत्य में क्या हुआ था ये कोई नही जानता तो हम बता दे 1962 और 1971 में चीन के साथ युद्ध हुआ था इस युद्ध मे तंत्र शक्ति का प्रयोग हुआ था। जब भारत अपनी हार की तरफ बढ़ रहा था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने मध्यप्रदेश के दतिया में स्थापित माँ बगलामुखी की तन्त्र विद्या का प्रयोग करवाया था। इसमें 51 हवन कुंडों द्वारा कार्य हुआ था और 11वे दिन की अंतिम आहुति के साथ ही चीन ने अपनी सेना पीछे हटा ली थी। ये हवन कुंड आज भी आपको दतिया में देखने को मिल जाएंगे।

 ये है तंत्र की शक्ति लेकिन ये विद्याएं बहुत खतरनाक थी इसलिए बाहरी लोगों ने इसको समाप्त करने के लिए बहुत प्रयास किये, इनको अंधविस्वास बता दिया गया। यदि सत्य में अंधविस्वास होता तो हमारे देश के तन्त्र द्वारा चैतन्य मंदिरों को तोड़ा नही जाता, गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, तन्त्र स्थानों को नष्ट नही किया जाता।

शिव अघोरनाथ
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ऊर्जाओं का रहस्य

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इस सृष्टि के संचालन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनो ऊर्जाओं का सहयोग है। सभी जीवो में दोनो प्रकार की ऊर्जा होती है। जब मनुष्य क्रोध करता है तो उसमे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है इसी कारण सही गलत देख नही पाता और जो मनुष्य शुद्ध विचार और क्रोध ना करने वाला होगा उसमे सकारात्मक ऊर्जा की अधिकता होगी उसके पास जाने से ही शांति का अनुभव होगा जैसे हमारे साधु संत होते है। 

आप एक संत से कहो कि किसी की हत्या करदे तो वो नही करेगा चाहे आप उसे कुछ भी दे दे, लेकिन वही एक क्रोधित व्यक्ति को उनकी पसंद की वस्तु दे दो वो आपका कार्य तुरंत कर देगा। जब सृष्टि में अधर्म ( नकारात्मकता) बढ़ता है तो उसे संतुलन में लाने के लिए सकारात्मक शक्ति को नकारात्मक स्वरूप धारण करना पड़ता है। क्योकि नकारात्मक ऊर्जा की प्रवर्ति संहारक,हिंसात्मक होती है। 

जब प्रभु को ऐसे स्वरूप धारण करने पड़ते है तो  सकारात्मकता को भी उसे नियंत्रित करना पड़ता है। जैसे महाकाली ने दानवों के बाद देवो को मारना आरम्भ कर दिया था तब महादेव के सकारात्मक शिव स्वरूप महाकाली के चरणों मे आकर नकारात्मक ऊर्जा को  नियंत्रित किया था। 

नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध करके पृथ्वी को नष्ट करने लग गए थे तब भगवान शिव ने शरभ अवतार लेकर नरसिंह भगवान की नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित किया था। 

जो अवतार क्रोध स्वरूप में है उनकी पूजन साधना में गलती होती है तो तुरंत दण्ड मिलता है चाहे आप उनके भक्त ही क्यो ना हो लेकिन सकारात्मक ऊर्जा के  स्वरूप में गलती होने पर क्षमादान मिल जाता है।

किसी ने महाकाली का प्रयोग कर दिया मारण के लिए तो महाकाली मारण कर देंगी चाहे सामने उसका भक्त ही क्यो न हो क्योकि उस क्रोध अवस्था मे महाकाली को  देव और दानव में भी भेद भूल गयी थी और सभी का संहार करने लगी थी।

यदि सामान्य मनुष्य की बात करे तो जब क्रोध करते है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है तब सही गलत का बोध नही होता लेकिन जैसे ही क्रोध शांत होता है तो अपनी गलती का अहसास होता है। 

मनुष्य ने धारणा बना ली है कि नकारात्मक ऊर्जा सदैव अहित करती है लेकिन ऐसा नही है नकारात्मक ऊर्जा सृष्टि के लिए कल्याणकारी है। महाकाल, महाकाली, काल भैरव आदि सभी नकारात्मक ऊर्जा के स्वरूप है और सृष्टि का कल्याण करते है। 

शिव अघोरनाथ 

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रविवार, 28 मार्च 2021

क्रोध की उर्जा का रूपांतरण

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जब कभी तुम्हें यह पता चले कि तुम्हें क्रोध आ रहा है तो इसे सतत अभ्यास बना लो कि क्रोध में प्रवेश करने के पहले तुम पांच गहरी सांसें लो। यह एक सीधा—सरल अभ्यास है। स्‍पष्टतया क्रोध से बिलकुल संबंधित नहीं है और कोई इस पर हंस भी सकता है कि इससे मदद कैसे मिलने वाली है? लेकिन इससे मदद मिलने वाली है। इसलिए जब कभी तुम्हें अनुभव हो कि क्रोध आ रहा है तो इसे व्यक्त करने के पहले पांच गहरी सांस अंदर खींचो और बाहर छोड़ो।

क्या होगा इससे? इससे बहुत सारी चीजें हो पायेंगी। क्रोध केवल तभी हो सकता है अगर तुम होश नहीं रखते। और यह श्वसन एक सचेत प्रयास है। बस, क्रोध व्यक्त करने से पहले जरा होशपूर्ण ढंग से पांच बार अंदर—बाहर सांस लेना। यह तुम्हारे मन को जागरूक बना देगा। और जागरूकता के साथ क्रोध प्रवेश नहीं कर सकता। और यह केवल तुम्हारे मन को ही जागरूक नहीं बनायेगा, यह तुम्हारे शरीर को भी जागरूक बना देगा, क्योंकि शरीर में ज्यादा ऑक्सीजन हो तो शरीर ज्यादा जागरूक होता है। जागरूकता की इस घड़ी में,अचानक तुम पाओगे कि क्रोध विलीन हो गया है।

दूसरी बात, तुम्हारा मन केवल एक—विषयी हो सकता है। मन दो बातें साथ—साथ नहीं सोच सकता; यह मन के लिए असंभव है। यह एक से दूसरी चीज में बहुत तेजी से परिवर्तित हो सकता है। दो विषय एक साथ एक ही समय मन में नहीं हो सकते। एक चीज होती है, एक वक्त में। मन का गलियारा बहुत संकरा होता है। एक वक्त में केवल एक चीज वहां हो सकती है। इसलिए यदि क्रोध वहां होता, तो क्रोध वहां होता है, लेकिन यदि तुम पांच बार सांस अंदर—बाहर लो, तो अचानक मन सांस लेने के साथ संबंधित हो जाता है। वह दूसरी दशा में मोड़ दिया गया है। अब वह अलग दिशा में बढ़ रहा होता है। और यदि तुम फिर क्रोध की ओर सरकते भी हो,तो तुम फिर से वही नहीं हो सकते क्योंकि वह घड़ी जा चुकी है।

गुरजिएफ ने कहा था, जब मेरे पिता मर रहे थे,उन्होंने मुझसे केवल एक बात याद रखने को कहा, 'जब कभी तुम्हें क्रोध आये तो चौबीस घंटे प्रतीक्षा करो, और फिर वह करो जो कुछ भी तुम चाहते हो। अगर तुम जाकर कत्‍ल भी करना चाहते हो, जाओ और कर दो कत्‍ल, लेकिन चौबीस घंटे प्रतीक्षा करना।’

चौबीस घंटे तो बहुत ज्यादा है; चौबीस सेकंड चल जायेंगे। प्रतीक्षा करना मात्र तुम्हें बदल देता है। वह ऊर्जा जो क्रोध की ओर बह रही है, नया रास्ता अपना लेती है। यह वही ऊर्जा है। यह क्रोध बन सकती है, यह करुणा बन सकती है। इसे जरा मौका दे दो।

तो पुराने शास्त्र कहते है, 'यदि कोई अच्छा विचार तुम्हारे मन में आता है, तो उसे स्थगित मत करो; उस काम को तुरंत करो। और यदि कोई बुरा विचार मन में आता है, तो उसे स्थगित कर दो; उसे तत्काल कभी मत करो।’ लेकिन हम बहुत चालाक हैं, बहुत होशियार। हम सोचते हैं, और जब भी कोई अच्छा विचार आता है, हम उसे स्थगित कर देते है।

मार्क ट्वेन ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि वह दस मिनट तक एक पादरी को सुन रहा था, किसी चर्च में। व्याख्यान तो असाधारण था और उसने अपने मन में सोचा,आज मुझे दस डॉलर दान करने ही हैं। यह पादरी अद्भुत है। इस चर्च की मदद की ही जानी चाहिए! उसने निर्णय ले लिया कि व्याख्यान के बाद उसे दस डॉलर दान करने ही हैं। दस मिनट और हुए और वह सोचने लगा कि दस डालर तो बहुत ज्यादा होंगे। पांच से काम चलेगा। दस मिनट और हुए और उसने सोचा, 'यह आदमी तो पांच के लायक भी नहीं है।’

अब वह कुछ सुन भी नहीं रहा था। अब वह उन दस डॉलर के लिए चिंतित था। उसने इस विषय में किसी से कुछ नहीं कहा था, लेकिन अब वह अपने को यकीन दिला रहा था कि यह तो बहुत ज्यादा था। जिस समय तक व्याख्यान समाप्त हुआ, उसने कहा, 'मैने कुछ न देने का फैसला किया। और जब वह आदमी मेरे सामने चंदा लेने आया, वह आदमी जो इधर से उधर जा रहा था चंदा इकट्ठा करने के लिए, मैंने कुछ डॉलर उठा लेने और चर्च से भागने तक की बात सोच ली।’

मन निरंतर परिवर्तित हो रहा है। यह गतिहीन कभी नहीं है; यह एक प्रवाह है। तो अगर कुछ बुरा वहां है, तो थोड़ी प्रतीक्षा करना। तुम मन को स्थिर नहीं कर सकते। मन एक प्रवाह है। बस, थोड़ी प्रतीक्षा करना और तुम बुरा नहीं कर पाओगे। लेकिन अगर कुछ अच्छा होता है और तुम उसे करना चाहते हो, तो फौरन उसे कर डालो क्योंकि मन परिवर्तित हो रहा है। कुछ मिनटों के बाद तुम उसे कर न पाओगे। तो अगर वह प्रेमपूर्ण और भला कार्य है, तो उसे स्थगित मत करो। और अगर यह कुछ हिंसात्मक या विध्वंसक है, तो उसे थोड़ा—सा स्थगित कर दो।

यदि क्रोध आये, तो उसे पांच सांसों तक स्थगित करना, और तुम क्रोध कर न पाओगे। यह एक अभ्यास बन जायेगा। हर बार जब क्रोध आये, पहले अंदर सांस लो और बाहर निकालो पांच बार। फिर तुम मुक्त हो वह करने के लिए,जो तुम करना चाहते हो। निरंतर इसे किये जाओ। यह आदत बन जाती है, तुम्हें इसके बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं। जिस क्षण क्रोध प्रवेश करता है, तुम्हारे अंदर का रचनातंत्र तेज, गहरी सांस लेने लगता है। तुम सांस शांत और शिथिल लेने लगो, तो कुछ वर्षों के भीतर तुम्हारे लिए नितांत असंभव हो जायेगा क्रोध करना। तुम क्रोधित हो नहीं पाओगे।

कोई अभ्यास, कोई सचेतन प्रयास तुम्हारे पुराने ढांचे को बदल सकता है। लेकिन यह कोई ऐसा कार्य नहीं है जो तुरंत किया जा सकता हो। इसमें समय लगेगा क्योंकि तुमने अपनी आदतो का ढांचा बहुत से जन्मों से बनाया है। यदि तुम एक जीवन में भी इसे बदल सको, तो यह बहुत जल्दी है।
ओशो 
पतंजलि योग सूत्र, भाग 1, प्रवचन- 7

Rajesh Saini

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अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ! “वो कहेगा जो हुक्म मेरे आका” !

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हम अपनी हर समस्या का समाधान औरों में ही क्यों ढूंढते हैं ?
हम क्यों ये चाहते हैं कि मेरी समस्या का हल कोई दूसरा बता दे ? या हम किसी ऐसे महापुरुष की खोज में ही रहते हैं जो हमें हमारी जिंदगी का सही किनारा दिखा दे। खैर, अगर दूसरों से बात करने पर आपको अपनी समस्या का समाधान मिल जाता है तो अच्छा है लेकिन यहां ज़रा सोचने वाली बात ये है कि औरों से बात करने से पहले क्या आपने अपने भीतर उपस्थित अपने अवचेतन मन से बात करने की कोशिश की ? जी हां जिस महापुरुष की खोज में हम बाहरी दुनियां में भटक रहे हैं असल में एक ऐसी महाशक्ति हमारे भीतर ही स्थित है जो सर्वशक्तिमान है, और एक निश्चित समय पर वो जागृत होती है। हमारा मन दो प्रकार का होता है। पहला चेतन व दूसरा अवचेतन। चेतन मन के द्वारा हम जाग्रत अवस्था में सोचते हैं और बाहरी दुनिया का अनुभव प्राप्त करते हैं। अवचेतन मन इन्हीं सब बातों को ग्रहण कर सुरक्षित रख लेता है और उसे पूरा करने में जुट जाता है।

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डॉ जोसेफ मर्फी की रिसर्च क्या कहती है ?
मनोवैज्ञानिक डॉ. जोसेफ मर्फी ने एक शोध से पता लगाया था कि चेतन मन जिस भी बात को स्वीकार करता है और उसके सही और सच होने पर भरोसा करता है हमारा अवचेतन मन उसे स्वीकार कर हकीकत में बदल देता है। अवचेतन मन के आदेश पर मस्तिक उसी प्रकार के हार्मोन पैदा करके उस कार्य को पूरा करता है। डॉ. मर्फी के अनुसार हम जो कुछ भी हासिल करते हैं या नहीं करते वह हमारे विचारों के परिणाम होते हैं”। अवचेतन मन केवल वर्तमान जीवन को ही नहीं प्रभावित करता, बल्कि आत्मा के साथ दूसरा शरीर धारण करते समय भी साथ रहता है। दूसरे जन्म में इसी अवचेतन मन के कारण व्यक्तित्व निर्माण व संस्कार प्राप्त होते हैं। इसीलिए यदि मनुष्य वर्तमान जीवन और अगले जीवन में आनंद चाहता है, तो उसे अपने चेतन मन व अवचेतन मन को सकारात्मक सोच व विचारों से परिपूर्ण करना होगा।

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डॉ. मर्फ़ी ने आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक शोध के साथ स्पष्ट किया ।
अवचेतन मन आपके हर काम को प्रभावित करता है। अवचेतन मन की शक्ति से हम क्या हासिल कर सकते हैं? वो इस प्रकार है। 1. सेहत सुधार सकते हैं और शारीरिक रोग ठीक कर सकते हैं। 2. प्रमोशन पा सकते हैं, तनख़्वाह बढ़वा सकते हैं, लोकप्रियता पा सकते हैं। 3. मनचाही दौलत पा सकते हैं। 4. अपने दोस्तों का दायरा बढ़ा सकते हैं और अपने परिवार, सहकर्मियों तथा मित्रों से बेहतर संबंध बना सकते हैं। 5. अपने वैवाहिक जीवन या प्रेम संबंध को सशक्त बना सकते हैं। 6. डरों और बुरी आदतों से छुटकारा पा सकते हैं। 7. ‘‘चिर युवा’’ रहने का रहस्य सीख सकते हैं।

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मनुष्य अगर विश्वास करे, तो उसके लिए हर चीज संभव है।
क्योंकि हमें खुद ही नहीं पता कि हमारे अंदर क्या-क्या समाया हुआ है। दूसरों से हम अपनी परेशानियों के बारे में बात करके हसीं या मज़ाक का पात्र ही बनते हैं। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो आपके दुख में आपका सहारा बनें और आपको सही मार्गदर्शन दें। जबकि प्रतियोगिता के इस दौर में अगर आप किसी से सहारे की कामना करते हैं या अपना दुख बांटने की कोशिश करते हैं तो वो आपके सामने तो दुखी होने का नाटक करेंगे लेकिन आपकी पीठ पीछे कितने ही लोगों के बीच आपका मज़ाक उड़ाएंगे। इसलिए ऐसे लोगों के वर्ग में न शामिल हों जो आपमे नैगेटिव उर्जा भरें। बस आप अपने अंदर इस तरह के नैगेटिव प्रश्नों को दोहराना बंद करें जैसे “अगर मैं ये काम नहीं कर पाया तो? अगर मैं पास नहीं हुआ तो? अगर मुझे नौकरी नहीं मिली तो? डर व शंकाओं को दूर कीजिए क्योंकि ऐसा डर ही हमें आगे नहीं बढ़ने देता। हम वहीं के वहीं रह जाते हैं कुएं के मेंडक की तरह एक स्थान से बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं करते।

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अगर हम चाहें तो हम जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं।
आपकी सभी इच्छाएं साकार हो सकती हैं यदि हम अपने अवचेतन मन में छिपी हुई शक्ति का प्रयोग कर लें जिससे हम अपने जीवन में प्रभावशाली प्रभुत्व के स्वामी बन सकते हैं। अवचेतन मन में समाहित शक्तिया प्रकट करने के लिए निम्नलिखित विचार स्मरण रखने योग्य है- 1- हमारा अवचेतन मन हमारी हर बात मानता है। रात को सोनें से पहले अपने अवचेतन मन से कहे,” मै सुबह पांच बजे उठना चाहता हूँ” तो यह आपको ठीक आपके कहे समयानुसार जगा देगा। 2- हमारा अवचेतन मन हमारा उपचार भी कर सकता है। यदि हम रोज़ सोने से पहले अपनी सेहत के बारे में अच्छा कहकर सोएंगे और अपने मन से कहेंगे मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा है और मैं ठीक हो रहा हूं। हमारा अवचेतन मन हमारे आदेशानुसार पालन करेगा। 3- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी।

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अपने अवचेतन मन को अपने अनुसार ढालने की कौशिश करें।
4- आप जो भी करना चाहते हैं, जिसके लिए आप दिन-रात मेहनत कर रहे हैं और अगर आपने ये तय कर लिया है वो काम करना ही है तो देखिएगा परिस्थितियां आपके अनुसार ही उत्पन्न होनें लग जाएंगी। 5- वास्तव में हमारा अवचेतन मन गीली मिट्टी की तरह होता है जिसे हम जैसा ढालनें की कोशिश करेंगे वो वैसे ही ढल जाएगा। इसी तरह से हमे अपने अवचेतन मन को सही आदेश (विचार और तस्वीरें) देने होगें, जो हमारे सभी अनुभवो को नियंत्रित करता है।

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रोज़ाना नेगेटिव वाक्यों को न दोहराएं ।
इस तरह का वाक्यों का प्रयोग कभी नही करना चाहिए,”मेरे पास इसके लिए पैसे नही है”, “मै ये काम नही कर सकता”, “मेरी तो किस्मत ही खराब है”, मेरे तो कर्म ही फूटे थे”, मेरी किस्मत में कुछ अच्छा होना लिखा ही नहीं है”, मैं कोई भी काम करुं, मेरा काम पूरा होता ही नहीं है”, इससे अच्छा तो मैं मर ही जाऊं” आदि। हम जो सोचते हैं हमारा अवचेतन मन उसी बात को सच मान लेता है इसलिए वह यह सुनिश्चित कर लेता है कि हमारे पास कभी पैसे न रहें या वह काम करने की क्षमता न रहे, जो हम करना चाहते हैं। इसके बजाय दृढ़ता से कहें, ”मैं अपने अवचेतन मन की शक्ति से सारे काम कर सकता हूं।”

8 / 8
आपका अवचेतन मन आपके आदेश का इंतज़ार कर रहा है ।
7- विश्वास ही जावन का नियम है। विश्वास हमारे मस्तिष्क का एक विचार है। उन चीजो में विश्वास न करें, जो हमे नुकसान या चोट पहुचायें। अपने अवचेतन मन की शक्तियों में विश्वास करें। यह विश्वास रखें कि वे हमारा उपचार करेगीं, प्रेरित करेगी, हमें शक्तिशाली और समृद्ध बनाएंगी। असल में हमें दृढ होने की ज़रूरत है, जरूरत है हमें आत्म-ज्ञानी और आत्मविश्वासी होने की। ज़रूरत है हमें अपने अवचेतन मन से बात करने की और उसे आदेश देने की। देखना आपके काम बनने शुरु हो जाएंगे बस अपने अवचेतन मन को आदेश दीजिए ऐसा लगेगा मानों भीतर से आवाज़ आयी हो “जो हुक्म मेरे आका”

Rajesh Saini

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तत्त्वासार

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{{{ॐ}}}

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वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
             यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता है। 
 

अशोक वशिष्ठ जी

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आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?

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हमारी पंचतत्व श्रृंखला में आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?
आकाश तत्व को कैसे शुद्ध करें?

आज पढ़ते हैं आकाश तत्व के बारे में। यह एक ऐसा तत्व है जिस पर बाकी के चारों तत्व टिके हुए हैं। क्या कुछ ऐसा है जो हम आकाश को अर्पित कर के उसे अपने लिए फायदेमंद बना सकते हैं?

आधुनिक विज्ञान यह स्वीकार करने लगा है कि आकाशीय बुद्धि या ज्ञान जैसी कोई चीज होती है। इसका मतलब है कि आकाश में एक खास तरह की बुद्धि होती है।

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, फिर दिन में एक बार और सूर्य के अस्त होने के बाद एक बार आकाश की ओर देखें और शीश झुकाएं - वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए।
यह आकाशीय बुद्धि आपके साथ कैसा व्यवहार करती है - वह आपके हित में काम करती है या आपके खिलाफ, इससे तय होगा कि आपका जीवन कैसा होगा। आप एक खुशकिस्मत प्राणी हैं या आप अपना बाकी का जीवन धक्के खाते हुए बिताएंगे, यह आपकी इस योग्यता पर निर्भर करता है कि जाने या अनजाने में आप इस व्यापक बुद्धि से कितना सहयोग ले पाते हैं।
आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं। हम सौर मंडल के एक गोल, घूमते ग्रह पर बैठे हुए हैं। यह अपनी जगह पर बना हुआ है तो सिर्फ आकाश की वजह से। आप अपनी जगह पर अपनी काबिलियत के दम पर नहीं बैठे हैं, बल्कि इसलिए बैठे हैं क्योंकि आकाश आपको उस स्थान पर थामे हुए है। आकाश ही इस पृथ्वी, इस सौर मंडल, इस आकाश गंगा और पूरे ब्रह्मांड को अपनी जगह पर थामे हुए है।

अगर आप जानते हैं कि अपने जीवन में आकाश का सहयोग कैसे लेना है, तो यह जीवन धन्य हो जाएगा। इसके लिए आप एक आसान सा काम कर सकते हैं।

 

सूर्योदय के बाद, इससे पहले कि सूर्य तीस डिग्री का कोण पार करे, एक बार आकाश की ओर देखें और आकाश के सामने नत-मस्तक हो जाएं कि आज उसने आपको थामे रखा।
सूर्य के तीस डिग्री का कोण पार करने के बाद, दिन में कभी भी ऊपर देखें और शीश नवाएं।
सूर्य के अस्त होने के बाद, एक बार फिर ऊपर देखकर शीश झुकाएं, वहां बैठे किसी देवता के लिए नहीं, बस आकाश के लिए जिसने आपको आज थामे रखा।
 

सिर्फ इतना करें और देखें कि आपके जीवन में कैसे नाटकीय ढंग से बदलाव आता है।

क्या आपने ध्यान दिया है, तेंदुलकर भी ऊपर देखते हैं? सिर्फ वही नहीं, प्राचीन काल से ही, कोई व्यक्ति जब कोई कामयाबी हासिल करता था तो कामयाबी के उन पलों में वह ऊपर की ओर देखता था क्योंकि अनजाने में ही उसमें यह बोध होता था।

आकाश को पांचवां तत्व कहना सही नहीं है क्योंकि यही सबसे अहम तत्व है। बाकी चार बस उसी के सहारे हैं, आकाश बुनियादी तत्व है। असीम आकाश की गोद में ये चार तत्व यह खेल खेलते हैं।
कुछ लोग भले ही ऊपरवाले के लिए ऊपर देखते हों, लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब आपको कोई गहरा अनुभव होता है, तो अनजाने में ही आपका शरीर कृतज्ञता के भाव में ऊपर की ओर देखता है? कहीं न कहीं एक स्वीकृति है, वहां पर एक बुद्धि है जो उसे स्वीकार करती है।
इस प्रक्रिया को सचेतन दिन में तीन बार करें। अगर आपको आकाश से मदद मिलती है, तो जीवन चमत्कारी ढंग से चलने लगेगा। आपने जिस ज्ञान या बुद्धि की संभावना की उम्मीद नहीं की होगी वह आपकी हो जाएगी।

Isha Foundation

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जन्म और मृत्यु

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 जीवितो यस्य कैवल्यम् विदेहो$पि स केवलः। 
समाधि निष्ठितामेत्य निर्विकल्पो भवानघ:।।

      अर्थात्--जिसको जीवन काल में ही कैवल्य उपलब्ध् हो गया है, वह शरीरसहित होने पर भी ब्रह्मरूप रहेगा। इसीलिये समाधिष्ठ होकर सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाना चाहिए।
      उपनिषद के इस श्लोक में कितना गूढ़ अर्थ छिपा हुआ है। वास्तव में मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान है ? लौकिक और पारलौकिक  दृष्टि से जो कुछ मनुष्य को पाने योग्य वस्तु है, उसे जीवन के रहते ही पाया जा सकता है। लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्ति भी हैं जो मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा करते हैं। उनका कहना है कि इस संसार में, इस शरीर में रहते हुए मुक्ति को, ब्रह्म को नहीं प्राप्त किया जा सकता। यह सब मृत्यु के बाद ही सम्भव है।
       जो लोग ऐसा सोचते हैं, वास्तव में वे भारी भ्रम में हैं। सच बात तो यह है कि जो जीवन के रहते नहीं पाया जा सकता, वह मृत्यु के बाद भी नहीं पाया जा सकता।
        मनुष्य का जीवन एक अवसर है--एक स्वर्णिम अवसर, शीघ्र फिर न प्राप्त होने वाला अवसर। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि इस अवसर को चाहे जैसे गँवा दें। नौकरी-व्यापार करके, धन-दौलत इकठ्ठा करके, मान-प्रतिष्ठा अर्जित करके गँवा दें, चाहे चोरी-डकैती, व्यभिचार करके गँवा दें अथवा चाहें तो पूजा-पाठ, ध्यान-धारणा तथा सत्य की खोज में बिता दें। जीवन एक 'तटस्थ' अवसर है। हमें क्या करना है, क्या पाना है, क्या बनना है ?--इन सबसे जीवन का कोई मतलब नहीं। हम कुछ भी करें, जीवन हमें रोकेगा नहीं। जो लोग यह सोचते हैं कि जीवन संसार के लिए है, भोग के लिए है तो वे अपने को धोखा देते हैं।
       मृत्यु अवसर नहीं है। मृत्यु तो है अवसर की समाप्ति। मृत्यु का मतलब है कि अब कोई अवसर नहीं बचा। अवसर समाप्त हो गया। मृत्यु से कुछ पाया नहीं जा सकता। कुछ पाने के लिए अवसर चाहिए और वह अवसर है--एकमात्र 'जीवन'।
       प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति  मर रहा होता है तो लोग उसके कान में गायत्री मन्त्र पढ़ते हैं, गीता-रामायण सुनाते हैं, राम-नारायण का नाम फूंकते हैं। यह कितनी ना-समझी की बात है। वे गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, राम नाम फूंकते हैं मगर उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता होता। मृत्यु के समय सारी इन्द्रियां जवाब दे रही होती हैं, आँखें देखना बन्द कर् देती हैं, कान सुनना बन्द कर् देते है, मुंह बोलना बन्द कर् देता है, वाणी अवरुद्ध हो जाती है, प्राण धीरे-धीरे लीन होने लगते हैं अपने मूल बीज में। उस स्थिति में मरने वाला व्यक्ति क्या गायत्री मंत्र सुन सकेगा ? राम-नाम का उच्चारण समझ जायेगा ? लेकिन लोग हैं कि सुनाए चले जाते हैं, गीता-पाठ किये चले जाते हैं।


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मुक्ति कैसे प्राप्त हो?

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----------: आणवमल ही जन्म-जन्मान्तर के सुख-दुःख, क्लेश- चिंता का कारण हैं :-----------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

             मुक्ति कैसे प्राप्त हो?
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      चौरासी लाख योनियों का भ्रमण करने के बाद कहीं जाकर मानव योनि प्राप्त होती है। अन्य योनियों में सब कुछ रहता है पर 'मन' नहीं रहता। 'मन' की उपलब्धि होती है केवल मनुष्य को। इसीलिए उसे 'मनुष्य' कहते हैं। मन से मनुष्य बना। मनुष्य मानव इसलिए कहलाता है क्योंकि वह मनु की सन्तान है। जब पहली बार जीव मानव-तन को उपलब्ध होता है ,तो उस अवस्था में उससे लिप्त पिछले चौरासी लाख योनियों के पशुत्व भरे न जाने कौन-कौन से संस्कार रहते हैं। इन्हें तंत्र कहता है--'आणव मल'--

"मिथ्याज्ञानमधर्मश्चासक्तिहेतुश्च्युतिस्तथा।
पशुत्वमूलं पंचैते तन्त्रे हेयाधिकारितः।।

अर्थात्--असत्य, अज्ञान, अधर्म, आसक्ति और पशुता--ये पांच ऐसे प्रमुख हेय और त्याज्य दुर्गुण आणव मल के रूप में  हैं जो मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर के पतन के कारण बनते रहते हैं।

      'आणव मल' बराबर जीवात्मा का पीछा करता रहता है, हर जन्म में, हर जीवन में। यही मनुष्य के सभी प्रकार के मानसिक, शारीरिक कष्ट, पीड़ा, दुःख, क्लेश, चिता आदि का एक मात्र कारण है। मनुष्य कितना भी अपना विकास करता जाय लेकिन आणव मल से मुक्त नहीं हो सकता। उसके फल का सामना बराबर करना पड़ेगा। भले ही हम योगी हों, साधक हों, संत हों, महात्मा हों, साधू हों, सन्यासी हों या हों विरक्त --आणव मल से उत्पन्न सुख-दुःख, क्लेश, चिन्ता  आदि को भोगना ही पड़ेगा हर अवस्था में। योगी, साधक, संत, भक्त इसके साक्षात् प्रमाण हैं। अनेक महापुरुषों ने भी आणव मल के परिणामस्वरुप जीवनभर कष्ट भोगा। आणव मल का अस्तित्व जब तक है, तब तक न मुक्ति है, न मोक्ष, न कैवल्य और न है निर्वाण।
       प्रश्न यह है कि आणव मल के इस अभेद्य आवरण को किस प्रकार से भेदा जाय ?
       इस सम्बन्ध में तंत्र-मन्त्र का कहना है कि आणव मल का सर्वथा के लिए नाश न ज्ञान द्वारा संभव है और न तो कार्य के ही द्वारा, यदि संभव है तो मात्र  'क्रिया' द्वारा। क्रिया के माध्यम से ही उसके अस्तित्व का नाश संभव है। मानव शरीर में चौरासी लाख योनियों का आणव मल एकत्र होकर धीरे-धीरे परपक्व होता रहता है। जब तक वह पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक उसका नाश नहीं होता। कंस, रावण, हिरण्य कश्यपु आदि इसके ज्वलंत उदहारण हैं।
    आणव मल को पूर्ण परिपक्व होना ही चाहिए। इसके लिए जीवन में निरपेक्ष और विरक्त भाव चाहिए। कर्म करते रहना चाहिए। उसका परिणाम क्या होगा ?--इस पर सोच-विचार नहीं करना चाहिए।
      आणव मल एक 'सत्तात्मक द्रव्य' है। जिस प्रकार नेत्र में मोतिया बिन्द हो जाने पर उसे उचित समय पर ही ऑपरेशन द्वारा हटाया जाता है, ठीक ऐसी ही स्थिति आणव मल की भी है। परिपक्वता दोनों में आवश्यक है। स्वयं जीवात्मा में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जिससे आणव मल का नाश हो सके। आध्यात्मिक ज्ञान, योग, तप, तपस्या, साधना इस दिशा में पूर्ण असमर्थ हैं। तलवार की धार कितनी ही तेज क्यों न हो, वह स्वयं को नहीं काट सकती।
"असिधारा सुतीक्षणा च स्वात्मानमच्छेदिका।"

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अष्टांग योग आसन और प्राणायाम

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शरीर धर्म को साधने का सबसे पहला साधन है यह सुत्र अपने आप मे अति महत्वपुर्ण है लेकिन इस परम वचन को बिना उसका मर्म समझे उन लोगो ने अपना लिया है जो केवल शरीर को महत्व देते है शरीर कोस्वस्थ और मजबुत बनाने के प्रयास मे रहते है जो कसरत करते व्यायाम करते है और करते है पहलवानी धर्म साधना के प्रथम चरण की तरह नही 
ध्यान व योग के प्रचलित रूप भी शरीर की उपेक्षा करना सिखाते है अष्टांग योग केवल आसन और प्राणायाम की कुछ क्रियाओं मे ही सिमट कर रह गया है योगासनों का उपयोग लोग स्वास्थ्य का लाभ के लिये ही करते है देह के रहस्य को जानने समझने  के लिए नही वेशरीर मन का गुलाम बनाकर प्रसन्न होते है उनके लिये  योग का अर्थ है इन्द्रियो का दमन कर शरीर को अपने वश मे करना योग का लोकप्रिय रूप त्याग पर आधारित है योग पर नही 
एकमात्र तंत्र ही एक एसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञानकी दृष्टि से देखता है
मनऔर तन के संघर्ष में तन को जीतने दे तन को मन पर हावी होने दे तन बहुत अनुभवी है उसकी प्रज्ञा लाखो वर्ष पुरानी है तन सीधे प्रकृति से जुडा है इस विश्व को चलाने वाला जो नियम है उसी को धाराएं शरीर के भीतर भी स्पन्दित होती रहती है इतना भर जान ले कि जहाँ शरीर है वहाँ जीवन है और कहीं नही और कहीं है भी तो वह भोग जीवन है                      
ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे
१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश  फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है

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शनिवार, 27 मार्च 2021

तंत्र साधना के मार्ग

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                                                             #_रहस्य_

तंत्र के मुख्य दो ही मार्ग  है इन्हीं विभिन्न सम्प्रदायों का उदय हुआ है १ ,वैदिकमार्ग २, शैवमार्ग। इनमे से वैदिकमार्ग को दक्षिणमार्ग  और शैवमार्ग को भी वाममार्ग  कहते है । गोरखनाथ जी के द्वारा शाबर मंत्र, जैनमार्ग, बौद्धमार्ग, मे भी साधनाए की जाती है पर वे सब वाममार्ग से ही प्रभावित है। आज ये दोनो मार्ग आपस मे मिलकर खिचड़ी बन गये है। अपितु ये आज से नही मिले आज से हजारो वर्ष पहले प्रजापति दक्ष के यज्ञ मे हुए युद्ध के समय मिल गये थे।
अतः आज बडे बडे तंत्रमार्गी एवं विद्वान भी इनमे भेद कर पाने स्थित नें नही है विशेषकर दक्षिणमार्गी ! वे आज वाममार्ग के  देवी देवताओं को पूजा अर्चन कर रहे है इनमें भगवती (आधाशक्ति), दुर्गा, महालक्ष्मी, आदि है और गणेशजी भी वाममार्ग के ही देवता है, क्योंकि ये शिवकुल के देवता है , विष्णुकूल के नहीं।
इसी प्रकार महालक्ष्मी को विष्णुकुल ने समुद्र मथंन(सामाजिक- धार्मिक-आध्यात्मिक- मथंन जो दक्ष के युद्ध के बाद हुआ) के पश्चात विष्णु से जोड दिया(स्मरण करें पौराणिक रूपक) आज ये सभी दक्षिणमार्ग एवं वाममार्ग दोनो मे पूजे जाते है।
वैदिक देवता तीन सौ से अधिक है पर उनमे मुख्य अग्नि, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, रूद्र ,अश्विनी ही है । वैदिक रूद्र ,शिव  नही है। जैसा कुछ लोग अर्थ लगाते है । ये तेज की उग्र भावना के प्रतीक है । शिव आदि परमात्मा के। ये विष्णु के पर्याय समझे जा सकते है। तथापि सांस्कृतिक भावना के अन्तर के कारण इनके वर्णन मे भावान्तर  है रूद्र की आराधना शिव के प्रधान गुण शक्ति के रूप मे वाममार्ग मे भी की जाती है ।
राम,कृष्ण, हनुमान, आदि अवतार रूप साकार ईश्वर की मान्यता के पश्चात दक्षिणमार्ग की पूजा पद्धति से जुडे है। वैदिक ऋषिओं की दृष्टि मे किसी मनुष्य या जीवधारी का ईश्वररूप असम्भव था। महान व्यक्तित्व देव रूप तो हो सकते है, किन्तु उन्हें निराकार, सच्चिदानंद परमात्मा मानने की वे कल्पना भी नही कर सकते थे। आज इन सभी रूपों, की आराधना को दक्षिण पंथ मे विष्णु रूप मे की जाती है।
सभी वैदिक देवताओं की साधना का वर्णन छोटी सी पोस्ट मे नही हो सकता है ।जो लोग इनमे से किसी देवता की साधना करनी चाहते है उन्हें वेद पढने चाहिए।ऋग्वेद मे अनुष्ठान विधि नही है । यह अथर्ववेद मे है । और यह सुत्र स्मरण रखें कि अग्नि, रूद्र, आदि उग्र देवा की साधना आग्नेय कोण मे रक्तिम आसन व फूलों से की जाती है वायु ,वरूण, (जल)आदि देवताओं की वायव्य कोण में और विष्णु, सूर्य, ऊषा आदि देवताओं की साधना आराधना ईशान कोण मे की जाती है ।
शास्त्रीय तंत्र साधना की विधियाँ अत्यन्त जटिल है। वे यहाँ उपलब्ध नही की जा सकती है

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