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गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

कोलेस्ट्रोल) हार्टअटैक,अर्जुन की छाल से ऐसे करे कण्ट्रोल

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 💥 खून में कचरा (Acidity) की वजह से आता है (कोलेस्ट्रोल) हार्टअटैक,अर्जुन की छाल से ऐसे करे कण्ट्रोल.....!!


बागभट्ट जी सुबह दूध पीने को मना करते हैं लेकिन जो सुबह हम चाय पीते हैं उसमें भी दूध का यूज होता है बाग़भट्ट जी के किसी भी सूत्र और शास्त्र में चाय का उल्लेख नहीं किया गया  क्योंकि बाग़भट्ट जी 3500 वर्ष पहले हुए और चाय 250 साल पहले अंग्रेजों के द्वारा लाई गयी ।


हाँ लेकिन उन्होंने काढ़े का जीक्र किया है वो कहते है जो काढ़ा हमारे वात पित्त और कफ को कम करे ऐसा कोई भी कड़ा सुबह दूध में मिलाकर पिया जा सकता है जैसे कि अर्जुन की छाल का काढ़ा वात को सबसे ज्यादा कम करता है यह रक्त की एसिडिटी को कम करता है जो की शरीर की एसिडिटी से भी ज्यादा खतरनाक होती है और हार्ट अटैक का कारण बनती है अर्जुन की छाल सबसे तेजी से रक्त की एसिडिटी को ख़त्म करता है इसलिए अर्जुन की छाल का काढ़ा पीयें


नवम्बर दिसम्बर जनवरी और फ़रवरी में वात सबसे ज्यादा होता है ठण्ड के दिनों में वायु का प्रकोप सबसे ज्यादा होता है और इस समय में अर्जुन की छाल का काढ़ा गर्म दूध में मिलकर पीयें तो औषधि का काम करेगा. याद रहे की यह काढे की तासीर हमेशा गर्म होती है इसलिए इसे ठण्ड के समय में ही प्रयोग करें हमारे देश में कोई भी ठंडा काढ़ा नही होता यदि आप सुबह दूध पीना ही चाहते है तो अर्जुन की छाल के काढे के साथ पीयें.


इससे आपको दो फायदे होंगे भविष्य में आपको हार्ट अटैक कभी नहीं होगा और अब तक आपने जो बेकार चीजें खाई हैं ये उसे शरीर से साफ़ कर देगा क्योंकि यह छाल का काढ़ा रक्त को साफ़ करता है और शरीर में सबसे ज्यादा कचरा(कोलेस्ट्रोल) रक्त में ही होता है


सबसे बड़ी बात तो ये है कि अर्जुन की छाल 100 रूपये किलो मिलती है, जो आप पंसारी की दुकान से ले सकते है और चाय 500 रूपये किलो मिलती है और 3000 रूपये किलो कॉफ़ी मिलती है इसलिए सुबह ठण्ड में चायकॉफी की जगह अर्जुन की छाल का काढ़ा दूध के साथ पीयें


किस तरह करें सेवन  

       एक गिलास दूध और आधा चम्मच अर्जुन की छाल का पाउडर और अगर इसमें गुड़ मिलायेंगे तो बहुत अच्छा यदि गुड़ न मिले तो   खांड या फिर बुरा(राजस्थान,बिहार,यू.पी. वाला चीनी वाला नहीं). ध्यान रहे चीनी का इस्तेमाल न करे अगर मिश्री मिले तो वह गुड़ से भी अच्छा होता है अगर सोंठ है तो उसे भी मिलाया जा सकता है जिससे वह और भी उत्तम क्वालिटी का बन जायेगा क्योंकि अर्जुन छाल और सोंठ दोनों ही वात नाशक है


जाने कौन से रोगों से मिलेगा छुटकारा

    इसे पीने से हड्डियों के समस्त विकार एवं शरीर में वात के सभी रोग जैसे घुटने का दर्द, कंधे का दर्द, डाईबीटीस, हार्ट अटैक ये सब वात के रोग हैं शांत हो जाते है। साभार Facebook 

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रविवार, 30 मार्च 2025

स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व

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 ईस्वर ने स्तन क्यों दिये....?


समझिये...


बिना स्तन कोई स्त्री की कल्पना व्यर्थ है..!!


इसे फैशन या दिखावा ना बनायें... और अगर दिखाना ही है तो आपका पति है दूसरे को क्यों दिखाना...?


स्त्री के स्तनों से जुड़ा होता है स्त्री का सारा व्यक्तित्व । जब तक स्त्री माँ नही बन जाती तब तक उसकी ऊर्जा पूर्णतः स्तनों तक नही पहुँचती..!!


शरीर शास्त्री ये प्रश्न उठाते रहते है। कि पुरूष के शरीर में स्तन क्यों होते है। जब कि उनकी कोई आवश्यकता नहीं दिखाई देती है। क्योंकि पुरूष को बच्चे को दूध तो पिलाना नहीं है। फिर उनकी क्या आवश्यकता है। वे ऋणात्‍मक ध्रुव है। इसलिए तो पुरूष के मन में स्त्री के स्तनों की और इतना आकर्षण है। वे धनात्‍मक ध्रुव है।


इतने काव्य, साहित्य, चित्र,मूर्तियां सब कुछ स्त्री के स्तनों से जुड़े है। ऐसा लगता है जैस पुरूष को स्त्री के पूरे शरीर की अपेक्षा उसके स्तनों में अधिक रस है। और यह कोई नई बात नहीं है। गुफाओं में मिले प्राचीनतम चित्र भी स्तनों के ही है। स्तन उनमें महत्‍वपूर्ण है। बाकी का सारा शरीर ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे स्तनों के चारों और बनाया गया हो। स्तन आधार भूत है।


क्‍योंकि स्तन उनके धनात्मक ध्रुव है। और जहां तक योनि का प्रश्न है वह करीब-करीब संवेदन रहित है। स्तन उसके सबसे संवेदनशील अंग है। और स्त्री देह की सारी सृजन क्षमता स्तनों के आस-पास है।


यही कारण है कि हिंदू कहते है कि जबतक स्त्री मां नहीं बन जाती, वह तृप्त नहीं होती। पुरूष के लिए यह बात सत्य नहीं है। कोई नहीं कहेगा कि पुरूष जब तक पिता न बन जाए तृप्त नहीं होगा। पिता होना तो मात्र एक संयोग है। कोई पिता हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है। यह कोई बहुत आधारभूत सवाल नहीं है। एक पुरूष बिना पिता बने रह सकता है। और उसका कुछ न खोये।


लेकिन बिना मां बने स्त्री कुछ खो देती है। क्योंकि उसकी पूरी सृजनात्मकता, उसकी पूरी प्रक्रिया तभी जागती है। जब वह मां बन जाती है। जब उसके स्तन उसके अस्तित्व के केंद्र बन जाते है। तब वह पूर्ण होती है। और वह स्तनों तक नहीं पहुंच सकती यदि उसे पुकारने वाला कोई बच्चा न हो।


तो पुरूष स्त्रियों से विवाह करते है ताकि उन्हें पत्नियाँ मिल सके, और स्त्रियां पुरूषों से विवाह करती है ताकि वे मां बन सकें। इसलिए नहीं कि उन्हें पति मिल सके। उनका पूरा का पूरा मौलिक रुझान ही एक बच्चा पाने में है जो उनके स्त्रीत्‍व को पुकारें।


पश्चिम में बच्चों को सीधे स्तन से दूध न पिलाने का फैशन हो गया है। यह बहुत खतरनाक है। क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री कभी अपनी सृजनात्‍मकता के केंद्र पर नहीं पहुंच सकेगी। जब एक पुरूष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो वह उसके स्तनों को प्रेम कर सकता है। लेकिन उन्हें मां नहीं कह सकता।


केवल एक छोटा बच्चा ही उन्हें मां कह सकता है।


कृपया गलत कमेंट ना करें. 🙏🙏

साभार Facebook 

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सोमवार, 24 मार्च 2025

दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में,

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 दुनिया का पहला अंतरिक्ष होटल "2027 में, पृथ्वी की कक्षा में खुलने की संभावना है। जिसका नाम 'वॉयेजर होटल' होगा। यह होटल 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा और इस होटल में लगभग 400 लोगों के ठहरने का इंतजाम होगा। इस होटल में बार, लाउंज, सिनेमा और स्पा जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद होंगी।"




#viralpost2025シ #facthubanup #viralpost2024 #viralphotochallenge #foodblogger #quotes #facts #couple #love #post Sweta Singh Vlogs Rupesh Kumar 

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विज्ञान अर्थात विषय का ज्ञान: ऋतु सिसोदिया

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 विज्ञान अर्थात विषय का ज्ञान


10 हजार करोड़ की पावर आपके ब्रेन में है इसका सही से उपयोग किया तो आइंस्टीन बन जाओगे आतंकवादी भी बन जाओगे जादूगर भी बन जाओगे लोगो को मोरख भी बनाओगे


सोच पर प्रहार 

हमारे दिमाग का निर्माण कैसे हुआ ऊर्जा भोजन से प्राय होती है केमिकल रिलीज होते है


खोज कीजिये भाई

वैदिक scince सनातन वर्ड ही वेद से निकला मंत्र का प्रभाव साइंस के प्रक्रिया है क्योंकि ऊर्जा का ही खेल है सारा


इसलिए ही तो हम आज भी मांनासिक गुलाम है

क्योंकि ज्ञान को जान नही समझा नही सत्य को धारण कैसे करते जब जानते ही नही थे


लड़ो भिड़ा मार काट बस इसे में उलझाए रखा

बाकी सभी अन्य जाती उठान क्यों कर गयी ज्ञान कौशल को बढ़ाया


हमने अहनकार को इसलिए प्रगति अवरुद्ध हुई


एन्टीनाधारी  निहितार्थ स्वर्थी अल्प श्रम जीवी है परजीवी अधिक है तो कोई खतरा मोल ना लेते इधर उधर लुढ़कते रहते है


समय काल परिस्थितियों अनुरूप वेश बदल लेते

वह लक्षय से भृमित नही थे


प्रत्येक जीव स्वतंत्र है भाई तो क्षत्रय बन्धन में क्यों है अब मौके का लाभ उठाओ ज्ञान कौशल से भरो अपने को  साभार ऋतु सिसोदिया 

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शनिवार, 22 मार्च 2025

ब्रह्म और पंचतत्वों का आपस में सामंजस्य-संक्षिप्त विमर्श

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 ब्रह्म और पंचतत्वों का आपस में सामंजस्य-संक्षिप्त विमर्श  

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जो भेद दृष्टि रखते हैं न तो वे पूर्णतः शाक्त हैं न वैष्णव न शैव न ही गाणपत्य और न ही सौर्य।


चूंकि ब्रह्म है तो एक ही यथा "एकोहि रुद्रं द्वितीयोनाऽस्ति। 


किंतु वह अपने कार्य भेद से अनेकों रुपों में विभक्त होकर साकार रूप ग्रहण कर लेता है - एकोऽहंबहुस्याम:। 


जिस प्रकार से मनुष्य देह पंचतत्वों में विभक्त है। उसी प्रकार से वह ब्रह्म भी अपने आप को पांच तत्वों (पंच मुख्य स्वरुपों में ) पंचब्रह्म के रूप में विभक्त करता है। यथा: गणपति, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति। यहां पर शक्ति का तात्पर्य किसी विशेष शक्ति से मत जोड़ लेना। क्योंकि कुछ लोग उस शक्ति को केवल दुर्गा, काली, तारा, भुवनेश्वरी, त्रिपुर सुंदरी, महालक्ष्मी, चण्डिका आदि तक ही सीमित समझ बैठते हैं। क्योंकि शक्ति के तो असंख्य, अनगिनत और अनंत रुप हैं। ये सब तो केवल कार्यभेद के अनुसार नामांतर मात्र हैं। 


वही ब्रह्म जब ब्रह्माण्डोंं की रचना करता है तो सूर्य कहलाता है। आज का विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि सूर्य से ही पृथ्वी सहित अनेकों ग्रह नक्षत्रों व अनेकानेक ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। इसलिए सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य की ही अनुग्रह शक्ति से ही हम इस दृश्यमान और अदृश्यमान जगत का दर्शन कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। इसीलिए सूर्य को ही जगत् का चक्षु कहा गया है। मनुष्य तो छोड़ो पेड़ पौधे भी सूर्य के अभाव में अपना भोजन बनाने में सक्षम नहीं हैं। सूर्य ही जगत के पोषण कर्ता हैं। सूर्य आकाश तत्व के अधिष्ठाता हैं। आकाश में ही सब देवता अधिष्ठित हैं। अधिक विस्तार से लिखा जाए तो यह लेख वृहद रूप धारण कर लेगा। अतः  इसे संक्षेप में ही समझने का प्रयत्न करें।

 

वही ब्रह्म गणों ( देवगणों, पितृ गणों, ऋषिगणों ) आदि गणों के स्वामी  के रूप में गणेश कहलाता है। अर्थात् समस्त गणों का ईश। जब सृष्टि में कुछ भी नहीं था तब केवल जल तत्व ही विद्यमान था और जल तत्व के अधिष्ठाता गणेश जी ही हैं। इस पृथ्वी का अधिकांश हिस्सा पानी ही है। आज का विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि पृथ्वी का ७१% हिस्सा जलीय है। क्योंकि यह पृथ्वी है ही जलीय। मानव शरीर में भी जल तत्व की मात्रा ७०% से ऊपर है। यदि हमें भोजन न मिले तो हम कुछ दिन जल पर अवलंबित रह सकते हैं। किंतु यदि हमें जल न मिले तो ? हमारी क्या स्थिति होगी ? इस पर अधिक विस्तार में नहीं जाएंगे क्योंकि लेख बहुत लंबा हो जाएगा। इसलिए अब आगे बढ़ते हैं।


वही ब्रह्म जब सृष्टि का पालन करता है तो विष्णु कहलाता है। विष्णु अर्थात् जो विश्व के अणु अणु में व्याप्त हैं । तो इस सृष्टि में विष्णु तत्व से रहित भला कौन है ? विष्णु रुपी ब्रह्म वायु तत्व के अधिष्ठाता हैं। क्या वायु तत्व के अभाव में सृष्टि में जीवन की कल्पना की जा सकती है ? समस्त प्राणियों में प्राण रुप में वायु तत्व ही तो प्रवाहमान है। वायु तत्व का एक ही गुण नहीं अपितु उसके तो अनेकों गुण हैं। आपका शरीर अन्न जल के अभाव में तो कुछ घड़ी तक क्रियाशील हो सकता है किंतु प्राणवायु{आक्सीजन) वायु तत्व} के अभाव में कुछ ही समय में आपके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। तो ये है वायु तत्व की महत्ता। ये हैं विष्णु रुपी ब्रह्म की महत्ता के कुछ किंचित व संक्षिप्त उदाहरण। विस्तार भय के कारण इस पर और अधिक गहराई में नहीं जाएंगे। अतः अब आगे बढ़ते हैं शिव तत्व की ओर...


वैसे शिव तत्व की संपूर्ण रुप से व्याख्या करने का सामर्थ्य तो वेद पुराण आदि नाननाविध शास्त्रों में भी नहीं है। तो मुझ अकिंचन की भला क्या बिसात है?


वह ब्रह्म तो निर्गुण, निराकार रूप से शव रुप में निष्चेष्ट पड़ा रहता है। क्योंकि उसका न तो कोई रंग है न रुप है और न ही कोई नाम। जब उस शव रुपी ब्रह्म में शक्ति का संचार होता है, जब उसे शक्ति का सहयोग मिलता है तभी वह शव से शिव में परिणत होता है। "शिवतत्व" में शिवतत्व और शक्तितत्व दोनो का अंतर्भाव होता है। परमशिव प्रकाशविमर्शमय है। इसी प्रकाशरूप को शिवतत्व और विमर्शरूप को शक्तितत्व कहते हैं। यही विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार के रूप में प्रकट होती है। बिना शक्ति के शिव को अपने प्रकाश रूप का ज्ञान नहीं होता। जब कालकूट नामक हलाहल विष उत्पन्न हुआ तब उसी ब्रह्म ने शिव के रूप में सृष्टि के हित के लिए हलाहल का पान किया। और जब शिव मूर्छित होने लगे तो उसी ब्रह्म ने देवी तारा का रुप धारण कर उस महाभयंकर विष को शिव के गले में ही स्तंभित कर दिया। ये एक और गूढ़ रहस्य है कि उस विष को उनके उदर में क्यों जाने नहीं दिया गया। इस पर भी कभी लिखेंगे। वही ब्रह्म रुद्र के रुप में समस्त प्रकार के दुःख दर्द, विघ्न बाधा सहित संपूर्ण जगत के संहार कर्ता हैं। वही ब्रह्म सृष्टि का अंत करने हेतु कालाग्निरुद्र का रुप धारण कर लेते हैं और संपूर्ण सृष्टि का संहार कर देते हैं। वही ब्रह्म स्थाणु और स्वयंभू अर्थात् जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो कहलाते हैं। वही ब्रह्म सृष्टि के कल्याण कर्ता होने के कारण शंकर कहे जाते हैं। शं= कल्याण, कर= कर्ता। शिव पृथ्वी तत्व के अधिष्ठाता हैं। पृथ्वी तत्व को इतना कम में मत आंक लेना। चलिए अभी इसकी विशालता से परिचय कराते हैं। पृथ्वी तत्व का अर्थ है आवास स्थल अर्थात् रहने का स्थान। तो ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यंत तक जितने भी प्राणी हैं सबका आवास स्थल निर्धारित है। यथा ब्रह्मा जी ब्रह्म लोक में रहते हैं, विष्णु जी वैकुंठ लोक में, क्षीरसागर, विष्णु लोक में। शिव जी कैलास पर्वत अथवा शिव लोक में। इंद्रादि देवता गण स्वर्ग लोक में, असुरगण असुर लोक में, नाग पाताल लोक में, मनुष्य भूलोक में जिसे पृथ्वी लोक भी कहा जाता है। ये सब पृथ्वी तत्व ही हैं। प्राणियों के देह भी पृथ्वी तत्व ही है जिसमें जीवात्मा निवास करती है। तो अब पृथ्वी तत्व अर्थात् आत्मा के लिए रहने के लिए जब देह रुपी स्थान ही नहीं तो आप भोजन किसे दोगे ? जल किसे दोगे ? वायु का क्या करोगे ? अर्थात् पृथ्वी तत्व के अभाव में सब बेकार हो जाएगा। शिव तत्व तो अत्यंत विशाल है अतः इस पर यदि लिखा जाए तो एक ग्रंथ ही तैयार हो जाएगा। अतः इसे संक्षेप में इतना ही समझिए। तो अब आते हैं शक्ति तत्व पर...... 


शक्ति तत्व की संपूर्ण व्याख्या करने का सामर्थ्य तो ब्रह्मादि देवताओं में भी नहीं है। तो मुझ अकिंचन की भला क्या बिसात है। कुछ स्थानों में कहा गया है कि उनके बारे में केवल शिव ही पूर्ण से जानते हैं। किंतु वही शिव अन्य स्थानों पर नेति नेति कहकर चुप हो जाते हैं पूर्व में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि जब वह ब्रह्म निर्गुण और निराकार रहता है तो वह शव रुप में निर्बल, निष्चेष्ट और निष्क्रिय रुप से पड़ा रहता है और जब उसे शक्ति का सहयोग मिलता है तभी उसमें शक्ति का संचार होता है और वह शक्तिमान कहलाता है। तब वही ब्रह्म कार्य भेद से नानाविध रुप धारण करके साकार रूप ग्रहण करता है। तो उस निष्क्रिय ब्रह्म को जिसने क्रियाशील किया, उस शव रुपी ब्रह्म को जिसने शिव बनाया जिसने उसे शक्तिमान बनाया वह शक्ति ही तो है। सूर्य रुपी ब्रह्म को जगत की रचना के लिए ,सृष्टि का पोषण करने के लिए। गणपति रुपी ब्रह्म को गणों के स्वामित्व लिए और जल रुपी जीवन प्रदान करने के लिए। विष्णु रुपी ब्रह्म को सृष्टि के पालन के लिए , सृष्टि के अणु अणु में व्याप्त होकर ऊर्जा प्रवाहित करने के लिए, वायु तत्व के रूप में समस्त प्राणियों में प्राण के संचार के लिए। शिव रुपी ब्रह्म को सृष्टि का कल्याण करने के लिए और सृष्टि का संहार करने के लिए। जिस चीज की आवश्यकता होती है वह शक्ति (Power ) ही तो है। क्या बिना शक्ति के ये कुछ भी करने में सक्षम हैं ? नहीं ना। इसीलिए शक्ति तत्व को इन सबसे परे परा तत्व कहा गया है। अर्थात् जो सबसे परे है। शक्ति तत्व के अभाव में जीवन क्या इस संपूर्ण सृष्टि की ही कल्पना नहीं की जा सकती। क्या आप भोजन बिना शक्ति के कर सकते हैं? क्या आप उस अन्न को बिना शक्ति के पचा सकते हैं? नहीं ना आपमें शक्ति है तभी आप भोजन कर पाते हो, उसे पचा पाते हो, और उससे ऊर्जा ग्रहण कर अपने नित्य के जीवन में कुछ कार्य कर पाते हो। शक्ति है तभी आप चल पाते हो, शक्ति है तभी आप उठना , बैठना, सोना, जागना, पढ़ना-लिखना आदि कार्यों को सुचारू रूप से कर पाते हो। वाणी शक्ति के कारण ही आप कुछ बोल पाते हो, मनः शक्ति के कारण ही आप कुछ सोच पाते हो, विवेक शक्ति के कारण ही आप सही ग़लत का निर्णय ले पाते हो। तर्क शक्ति के कारण ही आप हमसे तर्क और कुतर्क कर पाते हैं। वाद विवाद और बहस कर पाते हैं। यदि आपसे वह शक्ति ही छिन ली जाए तो आप कुछ नहीं कर पाओगे। वह शक्ति ही है  वह शक्ति ही है जो कुछ कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है। वह शक्ति ही है जिसकी सहायता से आप ध्यान, , उपासना, पूजा, मंत्र साधना, योग आदि की क्रियाएं सफलतापूर्वक सुचारू रूप से कर पाते हो। वह विरोधात्मक शक्ति ही है जिसके कारण आप हमारा अथवा किसी अन्य व्यक्ति का विरोध कर पाते हैं। वह इंद्रियों की शक्ति ही है जिसके कारण आप काम, क्रोध, लोभ, मोह के वशीभूत होकर तदनुसार आचरण कर पाते हो। ‌ शक्ति के कारण ही बाकी के अन्य तत्वों का अस्तित्व है अन्यथा उनका कोई महत्व ही नहीं। क्योंकि सबके मूल में शक्ति ही विद्यमान है। शक्ति अग्नि तत्व की अधिष्ठात्री हैं। इस पर ज्यादा विस्तार मे नहीं जाएंगे।


शरीर की अग्नि यदि मंद पड़ जाए तो शरीर की क्रियाशीलता ही मंद पड़ जाती है और यदि शरीर की अग्नि बूझ जाए तो क्या होगा ? शरीर ही नष्ट हो जाएगा। एक अग्नि के जलने से शरीर नष्ट होता है। तो दूसरे अग्नि के बूझने से शरीर नष्ट होता है। यह एक अत्यंत ही गूढ़ रहस्य है। इसलिए इस पर ज्यादा चर्चा नहीं करेंगे। अग्नि तत्व के कारण ही देवताओं को हविष्य प्राप्त होता है और यज्ञ आदि धार्मिक कार्य संपन्न हो पाते हैं और शास्त्रों में कहा गया है कि यज्ञ में ही यह सृष्टि अधिष्ठित है। 

शक्ति तत्व इतना विशाल है कि इस पर लिखने में तो कई  ग्रंथ कम पड़ जाएंगे। इसलिए इस लेख को हम यहीं विराम देना चाहेंगे।


जो इसे समझ लेगा। उसे कुछ और समझने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। और उसकी भेद दृष्टि सदैव सदैव के लिए निर्मूल हो जाएगी।साभार महिपाल सिंह Raghuvanshi Facebook wall

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सोमवार, 17 मार्च 2025

आध्यात्मिक चिन्तन आपके शब्दो मे अधिक शक्ति होनी चाहिए आवाज में नही

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 आपके शब्दो मे अधिक शक्ति होनी चाहिए आवाज में नही क्योंकि फूल हल्की बारिश में ही खिलते है बाढ़ में नही

आप किसी की कितना पसंद करते हो उससे कही ज्यादा उस व्यक्ति का आपके प्रति बर्ताव मायने रखता है


पसंद आंतरिक गुणवत्ता के आधार परहोनी चाहिए नाकि बाहरी आकर्षण के आधार पर

आकर्षण समय के साथ कम हो जाएगा किन्तु गुणवत्ता में और निखार की संभावनाबनी रहती है 

जिस प्रकार मानव तन बाहरी चमक दमक देखकर हर्षित व आनंदित होते है,, सुख व दुख का अनुभव करते है क्योंकि अंर्तमन की गहराई में उतरना ही नही चाहते स्वयम को प्राप्त करना ही नही चाहते है


जिसनी स्वयम को प्राप्त कर लिया वही परमात्मा को पाप्तकर आनंद व सुख से भर जाता है 


जिस पर परमात्मा की कृपा है फिर उसे किसी अन्य की आवस्यकता नही वह आनंदित है सुखी है प्रतिपल प्रतिक्षण परमात्म की शरण मे 

उसे बाहरी कोई भी वस्तु वयक्ति प्रभावित नही कर पाता व्यह मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाता है

वह परमात्मा का दास कहलाता है जिस हेतु ईश्वर ने उसका चह्यन किया ,,वह अपने कर्तव्य कर्म को पूरी निष्ठा व भक्ति से पूर्ण कर इस जगत से अलविदा लेगा


यह पावरफुल सोल दिव्य ऊर्जा होती है जो किसी भी सांसारिक मोहमाया के चक्रव्यूह से प्रभावित नही होती


आलोचना प्रशंशा व विवेचना से कोई लेना देना नही सत्यपथानुगामी परमात्मस्वरूप है वह दिव्य आत्मा


मानव की आवाज मधुर और शब्द ज्ञान सम्मत प्रभावशाली होने चाहिए।


मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाने हेतु शुक्रिया ब्रह्मांड मुझे ज्ञान विज्ञान से भर प्रज्ञावान बनाने हेतु शुक्रिया अपने असीमित प्रेम से पुष्ट करने हेतु शुक्रिया सुंदर संतुष्ट जीवन हेतु शुक्रिया,,


ॐ परमात्मने नमः

शुभम करोति कल्याणम साभार ऋतु सिसोदिया 

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रविवार, 16 मार्च 2025

भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है

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 संस्कृत भारतीय उप महाद्वीप में यह भाषा लगभग छह हजार साल से पहले बोली जाती रही है। भाषाविज्ञान शास्त्री भी विभिन्न अध्ययनों में साफ कर चुके हैं कि भारत की अधिकतर भाषाएं संस्कृत से ही निकली हैं। वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत से ही आधुनिक संस्कृत निकली है। संस्कृत से प्राकृत भाषा का उदय हुआ और  प्राकृत से पालि भाषा। भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है


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हालांकि पिछले कुछ समय से भारत में संस्कृत भाषा लेकर एक कुत्सित अभियान चलाया जा रहा है कि संस्कृत तो  पाली से निकली है। जबकि इस दावे को असत्य  साबित करने के लिए एक ही तथ्य काफी है। वह यह कि संस्कृत का व्याकरण अष्टाध्यायी के रचयिता महर्षि पाणिनी के जन्म के कई सदियों बाद तथागत बुद्ध हुए। महर्षि पाणिनी के साहित्य में बुद्ध का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। यानी  तथागत बुद्ध का कालखंड महर्षि पाणिनी के बाद का है। तथागत बुद्ध ने अपने प्रवचन पालि में दिए।उसी दौहरान पालि भाषा अस्तित्व में थी। यह भी तथ्य है कि पालि को संस्कृत से प्राचीन होने का दावा करने वाले  लोग इस बारे में अपना एक भी रिसर्च पेपर  भारतीय इतिहास कांग्रेस जैसी संस्थाओं के सामने पेश नहीं कर पाए हैं। बस सोशल मीडिया में झूठी बातों को परोस रहे हैं।

अब  संस्कृत को लेकर एक अच्छा समाचार मिला है। यज्ञदेवम के नाम से प्रसिद्ध भारत राव ने सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने का दावा किया है।वे क्रिप्टोग्राफर हैं । गुप्त भाषाओं के जानकार यज्ञदेवम ने इंडस घाटी यानी सिंधु घाटी लिपि को डिकोड किया है। जो कि लगभग 4000 बीसी में लिखी गई थी। यानी आज से लगभग साढ़े छह हजार साल पहले। यज्ञवेदम का अध्ययन बताता है कि संस्कृत  सिंधु घाटी की स्थानीय भाषा  है। क्रिप्टोग्राफी का अर्थ गुप्त भाषाओं को समझने का विज्ञान है।  यज्ञदेवम इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और भाषाविदों के बीच एक अनोखी शख्सियत हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने सिंधु घाटी की लिपि की गुत्थी सुलझा ली है। यज्ञदेवम की यह खोज आर्य आक्रमण सिद्धांत को भी चुनौती देती है  साभार : हिमालयी लोग यूट्यूब 

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शनिवार, 15 मार्च 2025

आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो:ऋतु सिसोदिया:

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 आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो


कुटिल दुसरो की हानि करकेखुद का भला सोचता है जबकि आद्यात्मिक्ता की राह पर चलने वाला स्वय दुख सहन करके दुसरो को सुख प्रदान करता है


जबकि एक समझदार व्यक्तिना स्वयम की ना किसी अन्य का अहित करके बल्कि समाधान की ओर अग्रसर होता है जिससे सबका लाभ हो या लाभ ना होतो हानि तो कदापि ना हो

 चालाक" का मतलब बुरी प्रवृत्ति नहीं होता। इसका अर्थ होता है समझदार, चतुर, और परिस्थिति के अनुसार सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति। हालाँकि, कभी-कभी यह नकारात्मक रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, जब किसी व्यक्ति को अत्यधिक चालाकी या चतुराई से किसी को धोखा देने वाला समझा जाता है।


अगर चालाकी का इस्तेमाल सही दिशा में किया जाए, तो यह एक अच्छी विशेषता होती है, क्योंकि यह व्यक्ति को बुद्धिमान और परिस्थितियों को समझने वाला बनाती है।


कर्मफल से कोई नही बच पाता अतः सत्कर्म करते रहे

 साभार ऋतु सिसोदिया 

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संसार में लाखों योनियां हैं। उनमें से सबसे अधिक मूल्यवान और उत्तम योनि मनुष्य की है

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 15.3.2025

         "संसार में लाखों योनियां हैं। उनमें से सबसे अधिक मूल्यवान और उत्तम योनि मनुष्य की है।" क्योंकि मनुष्य जीवन में बहुत सारी सुख सुविधाएं हैं, जो अन्य प्राणियों को ईश्वर ने लगभग नहीं दी। जैसे कि "ईश्वर ने मनुष्यों को 'विशेष बुद्धि' दी। बोलने के लिए 'भाषा' दी। कर्म करने के लिए 'दो हाथ' दिए। कर्म करने की '24 घंटे की स्वतंत्रता' दी। और 'चार वेदों का ज्ञान' दिया।" ये पांच सुविधाएं अन्य प्राणियों को ईश्वर ने लगभग नहीं दी। "बंदर लंगूर चिंपांजी गोरिल्ला वनमानुष आदि 5/7 प्राणियों को मनुष्यों जैसे हाथ तो दिए, परंतु बाकी सुविधाएं न होने के कारण ये प्राणी हाथ होते हुए भी उनका कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाए।"

           कहने का सार यह है कि "इतनी उत्तम सुविधाएं सुख साधन स्वतंत्रता आदि जो मनुष्य को मिली हैं, यह मुफ्त में नहीं मिली। यह अनेक उत्तम कर्मों का फल है।" "अब तो सौभाग्य से आपको मनुष्य जन्म मिला है, यह पूर्व जन्म के शुभ कर्मों का फल है। और यह फल ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है, अर्थात मनुष्य योनि प्राप्त करने में जहां आपका पुरुषार्थ कारण है, वहां ईश्वर की कृपा भी एक बहुत बड़ा कारण है।"       

          यदि ईश्वर आपके कर्मों का हिसाब न रखे, और समय आने पर आपको ठीक-ठीक फल न दे, तो आप ईश्वर पर मुकदमा नहीं कर सकते, कि "हे ईश्वर! आप हमारे कर्मों का फल क्यों नहीं देते ?" "ऐसी भाषा तो उस व्यक्ति के लिए बोली जा सकती है, जिसने आपसे कुछ ऋण ले रखा हो और वह ऋण चुकाता न हो। तब आप ऐसी भाषा उस व्यक्ति के लिए बोल सकते हैं।" "परंतु ईश्वर के लिए ऐसी भाषा नहीं बोल सकते। क्योंकि ईश्वर ने आपसे कोई ऋण नहीं ले रखा। ईश्वर का स्वभाव दयालु एवं परोपकारी होने से वह अपनी उदारता एवं दयालुता के कारण आपके कर्मों का पूरा-पूरा हिसाब भी रखता है, और समय आने पर आपके कर्मों का ठीक-ठीक फल भी देता है। इसलिए उसकी कृपा (उपकार, एहसान) स्वीकार करनी चाहिए।" 

        "तो अब पिछले कर्मों और ईश्वर की कृपा से इस बार तो आपको अच्छा मनुष्य जन्म मिल गया। क्या आप आगे भी ऐसा ही उत्तम मनुष्य जन्म प्राप्त करना चाहेंगे?" "यदि हां, तो सभ्यता नम्रता परोपकार दान दया ईश्वर भक्ति यज्ञ संध्या माता-पिता की सेवा गौ आदि प्राणियों की रक्षा करना आदि उत्तम कर्मों का आचरण करें। अन्यथा अगला जन्म मनुष्य योनि में नहीं मिलेगा। और संसार में शेर भेड़िया सांप बिच्छू वृक्ष वनस्पति आदि लाखों योनियां हैं, उनमें कहीं नंबर लगेगा।"

         "यदि उन योनियों में कहीं नंबर लग गया, तो हो सकता है, कुछ लोग आपको डिस्कवरी चैनल पर भी देखें, और अपना मनोरंजन करें। इसलिए मनुष्य जीवन का मूल्य समझें, और इसका सदुपयोग करें। बुराइयों से बचें तथा उत्तम कर्मों का आचरण करें, तभी आपका भविष्य सुरक्षित होगा।"

----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"साभार ऋतु सिसोदिया Facebook wall

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शुक्रवार, 14 मार्च 2025

ध्यानम शरणम गच्छामि :ऋतु सिसौदिया आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक

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 आत्मजागृति से समूल दुखो का नाश होता है जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना भगवतभक्ति है,,यदि वह कुमार्गगामी है उसे सत्यपथ पर लाने का प्रयाश भी भगवतभक्ति है क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक कर्तव्यकर्म ही धर्म है ,,क्यूँकि तुम्हारा दुख ना सुविधा से ना धन से ना पद से ना प्रतिष्ठा से किसी भी विषय बस्तु से नही आत्मजागृति से ही अंधकार मिटेगा जीवन प्रकाशवान हो जाएगा


परस्पर अपेक्षा समूल दुखो का कारण है दुसरो को बदलने की बजाय स्वयम में परिवर्तन करें


वह कुटिल कपटी क्रोधी आदी है तो यह उसकी प्रकर्ति है यदि आप सत्यपथ पर है तो ईश्वर न्यायकारी है दुष्ट की दुष्टता से जो हानि आपकी हुई उसकी भरपाई किसी ना किसी रूप में अवश्य होती है

क्योंकि श्रष्टि का नियम है सन्तुलन


जिसका जैसा कर्म वैसा ही फल,,आप सत्यपथ पर निश्चित होकरपरमात्मा को समर्पित होकर चले 


माया में ना उलझकर ईशभक्ति मुक्तिको अग्रसर रहे


ध्यानम शरणम गच्छामि 

लेखक: ऋतु सिसौदिया आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक 


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रविवार, 9 मार्च 2025

पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गूढ़ साधनाओं में शीघ्र सफलता मिल जाती है: ऋतु सिसोदिया

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 भारत में भी महिला सम्मान दिवस मना लिया गया। जबकि भारत मे महिला सम्मान की धारणा सनातन है। वर्ष में छह छह महीने के अंतर से नवरात्रि पर्व मनाये जाते हैं,दीपावली का त्यौहार जिनमें स्त्री स्वरूपिणी देवी की पूजा उपासना करी जाती है। पुरूष स्वरूप ईश्वर के समान ही स्त्री स्वरूपिणी ईश्वरी की मान्यता है।ऐसा गांव शायद ही कोई होगा जिसमें देवी का स्थान न हो।ऐसी जाति भी शायद ही हो जिसकी कुलदेवी न हो। 

मां ही वास्तव में पिता से परिचित करा सकती है। महामाया (स्त्रियों) के प्रति हेय भाव रखने वाले साधक कभी सफल नहीं हो पाते हैं। बड़े बड़े तपस्वी ज्ञानी ऋषि जो महामाया के प्रति हेय भाव रखते थे, उन्हें महामाया ने  येन सफलता के क्षणों में भटका दिया था।उनकी तपस्या भंग हो गई थी।


जैसा श्री कृष्ण ने अर्जुन से गीता में कहा था --


श्री भगवान उवाच

बहुनि मे व्यतितानि जन्मनि तव चार्जुना

तन्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप


 भगवान ने कहा: हे अर्जुन, तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हुए हैं। हे परंतप, तुम उन्हें भूल गए हो, जबकि मुझे वे सब याद हैं।

मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मरण कर बैठा है। यही विस्मरण अज्ञान है। स्त्रियां भी अपने वास्तविक स्वभाव,स्वरूप का विस्मरण कर बैठीं ।यही अज्ञान समस्याओं का कारण है। अन्यथा स्त्रियों में भी वही शक्ति है जो देवी में है। प्राचीन ग्रंथों में ऋषि स्त्रियों को देवी कहकर ही संबोधित करते हैं। क्योंकि ऋषि जानते थे कि स्त्रियों के भीतर भी जगत जननी महामाया का अंश है।  

कुछ साधना विधियों से स्त्रियों को वंचित रखा गया। उसके पीछे राजनीतिक कारण रहे होंगे। क्योंकि पूर्ण जागृत ज्ञानवान शक्ति संपन्न स्त्री को परतंत्रता में रख पाना असंभव है।


जो स्त्रियां स्वयं के वास्तविक स्वभाव स्वरूप को जान लेतीं हैं, वे अबला नहीं बल्कि सबला हो जातीं हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गूढ़ साधनाओं में शीघ्र सफलता मिल जाती है । क्योंकि भाव की संघनता और उनके उपयोग के मामले में स्त्रियां पुरुषों से बहुत आगे होतीं हैं। 

#जय_महामाया 

#निसर्गम

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