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गुरुवार, 28 मार्च 2024

नई बदलाव बदलावकरते विश्व में आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स की क्या संभावना है

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नई बदलाव करते विश्व में आर्टिफीसियल इंटेलीजेन्स की क्या  संभावना है   दुनियाभर में AI यानी Artificial Intelligence को लेकर लोगों के बीच जॉब सिक्योरिटी को लेकर बहस छिड़ चुकी है. एआई के बढ़ते प्रभुत्व ने 'व्हाइट कॉलर जॉब्स' को भी इसकी जद में ला दिया है. हालांकि, इसे लेकर लोग दो मतों में बंटे हैं. एक का कहना है कि इससे नौकरियां धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगीं. वहीं, कुछ का कहना है कि AI लोगों के जीवन में कई मौके लेकर आने वाला है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या एआई भविष्य में नौकरियों की संभावनाएं पैदा करेगा या फिर नौकरियों के लिए खतरा बन जाएगा

जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है AI

सवाल उठ रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से किस तरह के काम लिए जा सकते हैं? दरअसल, एआई से हर तरह के काम लिए जा सकते हैं. चिंता इसी बात की है. अभी से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया है. बहुत से ऐसे काम हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए ही हो रहे हैं. मसलन, सेल्फ ड्राइविंग कार आ रही है. गूगल मैप तो पहले से ही हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. इसके साथ ही फेस डिटेक्शन, वॉइस रिकॉग्निशन, टेक्स्ट ऑटोकरेक्ट, ऑटोमेटेड ट्रांसलेशन, चैटबॉट, ई-पेमेंट, एपल का सिरी (Siri) फीचर और अमेजॉन की एलेक्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उदाहरण हैं. आने वाले दिनों में ये लिस्ट और बड़ी होती जाएगी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर होने वाली बहस और भी तीखी होगी.


धोखाधड़ी के लिए एआइ सबसे मजबूत हथियार बन रहा है। ऐसे गॅ एआइ प्लेटफार्मों का सही और विवेकपूर्ण इस्तेमाल हो, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में एक साझा संकल्प पारित किया है। एआइ की नई चुनौतियों, नियमन और इससे जुड़ी सतर्कता पर चर्चा कर रहे

कोई नई तकनीक आती है, ज तो अक्सर जाने-समझे बगैर विरोध शुरू हो जाता है, लेकिन उसके चमत्कारों से परिचित होते ही लोग बिना सोचे-समझे प्रयोग भी शुरू कर देते हैं। आज जब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रभाव से कोई अछूता नहीं है, तो इसके दुरुपयोग का भी सवाल उठ खड़ा हुआ है। मशीनी मेधा (एआइ) जिस तरह वित्त, विनिर्माण से लेकर कृषि, स्वास्थ्य देखभाल जैसे अनेकानेक क्षेत्रों की कार्यपद्धति बदल रही है, उससे आर्थिकी उत्थान और जनसेवाओं का स्वरूप चमत्कारिक ढंग से बदलने लगा है। दूसरी ओर, इसके खतरे भी अब सामने हैं

एआइ का सही और सुरक्षित प्रयोग 


व्यवधान पैदा करने की ताकत:

 टेक्स्ट और इमेज तैयार करने वाले एआइ माडल अवैधानिक, अवांछित सामग्री पेश कर रहे हैं, तो वहीं वायस इमिटेशन साफ्टवेयर किसी के स्पीच पैटर्न का गलत इस्तेमाल कर धोखाधड़ी, अफवाह फैलाने में मददगार हो रहे हैं। चैटबाट से परीक्षाओं में गड़बड़ी की आशंका तो हर वक्त बनी हुई है। एआइ प्लेटफार्म मानवीय और निजी अधिकारों, डाटा सुरक्षा में सेंधमारी के लिए बिल्कुल नए तरह के ईंधन हैं। कुल मिलाकर, एआइ का दांव आसान नहीं है।

कापीराइट से जुड़े मुद्दे 

किसी एआइ माडल की • ट्रेनिंग के लिए व्यापक डाटा सेट की आवश्यकता होती है। ऐसे में कापीराइट वाले किसी मैटर से एआइ माडल की ट्रेनिंग क्या उचित है? क्या मूल लेखक को कंपनी इसका मुआवजा देगी? या फिर इस तरह की सामाग्री का किस हद तक प्रयोग किया जा सकता है ? कापीराइट से जुड़े इन प्रश्नों का जवाब अनिवार्य है । कापीराइट के मामलों का समाधान अलग-अलग अदालतों के जरिये नहीं हो सकता। ऐसे में एआइ के समुचित प्रयोग को नियमबद्ध करना आवश्यक है।

 वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट आई है. जिसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर नई बहस हो रही है. 

'फ्यूचर ऑफ जॉब्स: 2023' शीर्षक वाली 

इस रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे अगले पांच सालों में एआई और टेक्नोलॉजी मिलकर लाखों वर्कर्स की नौकरियां खाने जा रहे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगले पांच सालों में लगभग 8.3 करोड़ लोग अपनी नौकरियां गंवा देंगे. सबसे ज्यादा एडमिन और एग्‍जीक्यूटिव सेक्रेटरी, कैशियर, डाटा एंट्री और टिकट क्लर्क, डाक सेवा क्लर्क, बैंककर्मी जैसे पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरियां जाएंगी.


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बुधवार, 20 मार्च 2024

कामवासना भी एक उपासना, साधना है।

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 कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम पूर्ति से दिमाग की गन्दगी निकलकर जिन्दगी सुधर जाती है। अगर इस ब्लॉग से पूरी बात या सार समझ नही आया हो, तो टिप्पणी करें। किस्सा ओर भी बढ़ सकता है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है।


प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्वरचना के लिए दो विरोधी भावों में आ गया। इसी को भारतीय विश्वास में यों कहा जाता है कि आरंभ में प्रजापति अकेला था। उसका मन नहीं लगा। उसने अपने शरीर के दो भाग। वह आधे भाग से स्त्री और आधे भाग से पुरुष बन गया। तब उसने आनंद का अनुभव किया। स्त्री और पुरुष का युग्म संतति के लिए आवश्यक है और उनका पारस्परिक आकर्षण ही कामभाव का वास्तविक स्वरूप है। प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में इस तथ्य की स्पष्ट स्वीकृति पाई जाती है, जैसा अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता। (स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:। - ऋग्वेद, ३। १६४। १६)।


इस सत्य को अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्री भी पूरी तरह स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि प्रत्येक पुरुष के मन में एक आदर्श सुंदरी स्त्री बसती है जिसे "अनिमा' कहते हैं और प्रत्येक स्त्री के मन में एक आदर्श तरुण का निवास होता है जिसे "अनिमस' कहते हैं। वस्तुत: न केवल भावात्मक जगत्‌ में किंतु प्राणात्मक और भौतिक संस्थान में भी स्त्री और पुरुष की यह अन्योन्य प्रतिमा विद्यमान रहती है, ऐसा प्रकृति की रचना का विधान है। कायिक, प्राणिक और मानसिक, तीन ही व्यक्तित्व के परस्पर संयुक्त धरातल हैं और इन तीनों में काम का आकर्षण समस्त रागों और वासनाओं के प्रबल रूप में अपना अस्तित्व रखता हे। अर्वाचीन शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या यों करते हैं कि पुरुष में स्त्रीलिंगी हार्मोन (Female sex hormones) और स्त्री में पुरुषलिंगी हार्मोंन (male sex hormones) होते हैं। भारतीय कल्पना के अनुसार यही अर्धनारीश्वर है, अर्थात प्रत्येक प्राणी में पुरुष और स्त्री के दोनों अर्ध-अर्ध भाव में सम्मिलित रूप से विद्यमान हैं और शरीर का एक भी कोष ऐसा नहीं जो इस योषा-वृषा-भाव से शून्य हो। यह कहना उपयुक्त होगा कि प्राणिजगत्‌ की मूल रचना अर्धनारीश्वर सूत्र से प्रवृत्त हुई और जितने भी प्राण के मूर्त रूप हैं सबमें उभयलिंगी देवता ओत प्रोत है। एक मूल पक्ष के दो भागों की कल्पना को ही "माता-पिता' कहते हैं। इन्हीं के नाम द्यावा-पृथिवी और अग्नि-सोम हैं। द्यौ: पिता, पृथिवी मता, यही विश्व में माता-पिता हैं। प्रत्येक प्राणी के विकास का जो आकाश या अंतराल है, उसी की सहयुक्त इकाई द्यावा पृथिवी इस प्रतीक के द्वारा प्रकट की जाती है। इसी को जायसी ने इस प्रकार कहा है :


एकहि बिरवा भए दुइ पाता,

सरग पिता औ धरती माता।

द्यावा पृथिवी, माता पिता, योषा वृषा, पुरुष का जो दुर्धर्ष पारस्परिक राग है, वही काम है। कहा जाता है, सृष्टि का मूल प्रजापति का ईक्षण अर्थात्‌ मन है। विराट् में केंद्र के उत्पत्ति को ही मन कहते हैं। इस मन का प्रधान लक्षण काम है। प्रत्येक केंद्र में मन और काम की सत्ता है, इसलिए भारतीय परिभाषा में काम को मनसिज या संकल्पयोनि कहा गया है। मन का जो प्रबुद्ध रूप है उसे ही मन्यु कहते हैं। मन्यु भाव की पूर्ति के लिए जाया भाव आवश्यक है। बिना जाया के मन्यु भाव रौद्र या भयंकर हो जाता है। इसी को भारतीय आख्यान में सत्ती में सती से वियुक्त होने पर शिव के भैरव रूप द्वारा प्रकट किया गया है। वस्तुत: जाया भाव से असंपृक्त प्राण विनाशकारी है। अतृप्त प्राण जिस केंद्र में रहता है उसका विघटन कर डालता है। प्रकृति के विधान में स्त्री पुरुष का सम्मिलन सृष्टि के लिए आवश्यक है और उस सम्मिलन के जिस फल की निष्पति होती है उसे ही कुमार कहते हैं। प्राण का बालक रूप ही नई-नई रचना के लिए आवश्यक है और उसी में अमृतत्व की श्रृंखला की बार-बार लौटनेवाली कड़ियाँ दिखाई पड़ती हैं। आनंद काम का स्वरूप है। यदि मानव के भीतर का आकाश आनंद से व्याप्त न हो तो उसका आयुष्यसूत्र अविच्छन्न हो जाए। पत्नी के रूप में पति अपने आकाश को उससे परिपूर्ण पाता है।


अर्वाचीन मनोविज्ञान का मौलिक अन्वेषण यह है कि काम सब वासनाओं की मूलभूत वासना है। यहाँ तक तो यह मान्यता समुचित है, किंतु भारतीय विचार के अनुसार काम रूप की वासना स्वयं ईश्वर का रूप है। वह कोई ऐसी विकृति नहीं है जिसे हेय माना जाए।


इस नियम के अनुसार काम प्रजनन के लिए अनिवार्य है और उसका वह छंदोमय मर्यादित रूप अत्यंत पवित्र है। काम वृत्ति की वीभत्स व्याख्या न इष्ट है, न कल्याणकारी। मानवीय शरीर में जिस श्रद्धा, मेधा, क्षुधा, निद्रा, स्मृति आदि अनेक वृत्तियों का समावेश है, उसी प्रकार काम वृत्ति भी देवी की एक कला रूप में यहाँ निवास करती है और वह चेतना का अभिन्न अंग है। sabhar विकिपीडिया 

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रविवार, 17 मार्च 2024

शक्ति की उपासना ही अघोर की अपनी क्रिया है

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     ब्रम्हांड की जो परा अपरा शक्ति है उससे जुडना ही अपने आप को जोड़ना ही योग है।सभी सूर्यांन्शियो को अपने क्षात्र धर्म के पताका तर आना चाहिए। हमारे देश में जो एक सौ आठ शक्ति पीठेंहैं।वह परा अपरा इसी विद्या के पाठशाला और उच्च विद्या के विद्यालय है।जिसे स्वयं शिव ने स्थापित किया था।जो शिव शिवा वंशजों को पूर्णत्व प्राप्त करने हेतु ही थे।तथा ग्यारह शिव लिंगो की स्थापना ब्रम्हवंशियो को वैष्णव विद्या ब्रम्ह विद्या को प्राप्त करने के केन्द्र स्थापित किए थे।पर अब विद्या शिक्षा दीक्षा का आडंबर मात्र रह गया है। धनोपार्जन हेतु लोग गुरु गद्दी तिकड़म से अपने लेते हैं।ऐसा में आचरण नहीं होता।सनातन बहुत सी विद्याओं का लोप हो गया है।अब विद्वानों द्वारा उन विद्याओं का शोध कर प्रगट करना अनिवार्य हो गया है। वैदिक मंत्रों के रहस्य को जाने शोध करें। प्रत्येक गांव तथा ब्लाक में एक पीठ स्थापित कर वहां पांच वर्ष से दस वर्ष के बच्चों को क्षात्रावास में प्राकृतिक परिवेश में रखकर उत्तम गुरुओ द्वारा संस्कारिक ्शारीरिक व्यवहारिक वआध्यात्मिक भाषाओ ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देनी चाहिए।योग का संयम नियम का प्रारम्भिक ज्ञान व अभ्यास करना चाहिए।इसी प्रकार प्रत्येक जनपद में भी एक एक पीठ की स्थापना कर। बच्चों को ज्ञान विज्ञान वऊंची विद्याओं में पूर्ण रूप पारंगत बनाना चाहिए। पच्चीस वर्ष के बाद पूर्ण ज्ञान विज्ञान तथा योग सम्पन्न युवक युवतियों का सम्बन्ध कराकर तब गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराना चाहिए। ऐसे लोग स्वयं ही नहीं पूरे समाज को व संसार को मंगल मय बना देंगे।वे स्वतह न्याय और उत्तम नीति को पालन करने वाले स्वअनुशासित लोग होंगे हर तरह की समस्या स्वतह समाप्त हो जाएगी।                                                    चरी बेइमानी अनीति तथा अन्यान्य पूर्ण कार्य ऐसे लोग करेंगे ही नहीं।वे जो भी कार्य करेंगे उसमें पूर्ण कुशल होगे।                                                                                   आज  जीवन  पद्धति अपने पूर्वजों के अनुसार न  होने के कारण बच्चे अज्ञान  में  ही  नशा  व कुरीतियों तथा  कुसंगतियो में  फंस कर अपना जीवन नष्ट कर  ले  रहे हैं ।जब तक उन्हें ज्ञान होता है तब तक अपनी  आधी उम्र खो चुके होते हैं। तमाम तरह के पुलिस केस उनके सर पर लद चुके होते हैं।और वे माफिया किंग डान आदि डिग्रियां हासिल कर चुके होते हैं।इस तरह समूचा समाज रसातल की राह पकड़ लिया है। फिर उन्हें कौन सम्हाले कौन रोके।मति जा भइया गडहिया की ओर।। बहुत बा चेहलवा न लागी कौनो जोर।।मति जा भइया गडहवा की ओर।।।शेष कल हर-हर महादेव जय सर्वेश्वरी

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शनिवार, 16 मार्च 2024

भैरव रहस्य

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 [[[नमःशिवाय]]]

                श्री गुरूवे नम


                           भैरव रहस्य


  


अनेक साधक भैरव को शिव का अवतार मानते दार्शनिक दृष्टि से यह कथन उसी प्रकार का है कि जिस प्रकार प्रणाम को विष्णु और रुद्र को शिव के रूप में समझा जाता है इस दृष्टिकोण में प्रत्येक साधक की है और प्रत्येक शक्ति का भगवती गुण की दृष्टि से इस भैरव शिव की प्रचंड शक्तियों के नायक है इन्हें उनके गुणों का नायक माना जाता है इनका रूप बड़ा भयंकर है किंतु यह स्मरण रखना चाहिए कि जीव में स्थित यह गुण भी कार्य सिद्धि एवं मनोनुकूल ता प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है ब्रह्मांड में इनकी व्यापक सकता है इनके अनेक रूप हैं जैसे काल भैरव रूद्र भैरव बटुक भैरव आदि।

इनकी साधना अर्धरात्रि में मां काली की साधना की भांति शमशान में जाकर करनी चाहिए भैरव की साधना से सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं व्यक्तिगत में प्रभाव दृष्टि में सम्मोहन ललाट में वशीकरण विद्या का वास होता है शरीर में असाधारण बल उत्पन्न होता है ।

वामाचारी साधना ओं के लिए मुख्य देवी देवता यही है पिछली पोस्टों में इनकी साधना की अत्यंत सरल विधि बताई गई है त्राटक ध्यान साधना योग की साधना तंत्र में इसका प्रयोग करने के विलक्षण सफलता प्राप्त होती है तांत्रिक बाम साधना ओं की शास्त्रीय विधि अत्यंत दुष्कर है इस कारण शास्त्री विधियों का वर्णन यहां नहीं किया गया है सामान्य साधकों को इससे कोई लाभ नही है।

काली तारा छिन्नमस्ता धूमावती त्रिपुर भैरवी त्रिपुर सुंदरी की साधना श्मशान में नग्न होकर की जाती है अनेक तांत्रिक शव साधना करते हैं पर उसका भी एक रहस्य होता है इस अवसर पर मदिरा आदि कि नैवेध चढ़ाया जाता है उसी का हव्य भी दिया जाता है।

जैसे वैज्ञानिक लोग प्रयोग करने के लिए विभिन्न प्रकार के रसायन प्रयोग करते हैं उसी प्रकार तंत्र में भी कहीं पक्षियों के पंख नख व खोपडी आदि का प्रयोग किया जाता है तांत्रिक प्रयोगों में इनका वर्णन किया गया है क्योंकि वह वह सिद्धि के भौतिक फल प्राप्त करने की क्रियाएं हैं उनके बिना काम नहीं चलता।

किंतु शक्ति सिद्धि में मूलतत्व ध्यान की एकाग्रता है यह एकाग्रता उसी भाव में हो इसलिए प्रति प्रतिमा और मंत्र का प्रयोग किया जाता है अतः इसमें सात्विक क्रिया भी सफल होती हैं।

शैवमार्ग मे मातृशक्ति के साधकों मे इसी पूजा पद्धति की महत्ता है आज आर्यवर्त में जिस धर्म का आचरण समाज में दिखाई पड़ता है वह वैदिक धर्म और शैवधर्म का मिलाजुला रूप है और आज यही पूजा पद्धति समस्त आर्यवर्त में स्थापित हो गई है किंतु वास्तविक व मां की पूजा पति सर्वथा भिन्न है इसके सिद्धांत भी बड़े विचित्र हैं यह पूजा पद्धति वैदिक रूप से संगठित समाज की नैतिक मान्यताओं के सर्वथा विपरीत है।

इसलिए यह सामाजिक नहीं है परंतु कभी यह भी सामाजिक थी क्योंकि इससे अनुयायियों के समाज का गठन उसी प्रकार का था उस समय भी यह पूजा पद्धति सार्वजनिक नहीं थी अपितु साधक-साधिकाओं के प्रयोग में थी तथापि इसकी जानकारी समाज को थी इस पूजा को एवं पूजा करने वालों को आदर की दृष्टि से देखा जाता था।

आज के वैदिक मार्ग तांत्रिक एवं वैदिक संस्कृति के विद्वान वाममार्गी इस पूजा पद्धति का बखान करने बैठते हैं तो इसे वे कहते हैं कि कबाइली लोगों का एक समुदाय प्रकृति में होते प्रजनन के कारण लिंग और योनि की पूजा करने लगा था।

किंतु कितने विस्मय की बात है कि यही महापंडित शिवलिंग की महिमा गाते हुए दृष्टिगत होते हैं जो लिंग और योनि के संभोग रथ स्थिति का ही एक प्रतीक है उस समय में स्मरण नहीं रहता कि यह काबाइलियों की अज्ञानता का प्रतीक है उनके पूजन के योग्य नहीं है इन मूर्खों ने वाममार्ग की वैज्ञानिकता को समझा ही नहीं यह केवल अंधआस्ता के शिकार हैं।

इनकी दृष्टि में वैदिक धर्म एवं रीति ही सर्व विकसित व्यवस्था है और सारा ज्ञान वही समाहित है यह मानने में इनकी हेठी होती है कि विश्व में कोई अन्य मार्ग भी वैज्ञानिक सत्य की मंजिल तक पहुंच सकता है यह सभी संप्रदाय वाद से प्रभावित लोग हैं अत:इनकी व्याख्या भी इसी से प्रभावित होती है कि यह शिव को वैदिक परंपरा में ही मानते हैं क्योंकि दूसरों के देव को यह कैसे आदर दे सकते हैं।

 शिव भैरव काल भैरव बटुक भैरव वीरभद्र गणेश काली तारा छिन्नमस्ता धूमावती त्रिपुर सुंदरी त्रिपुर भैरवी की सभी शैवमार्ग के देवता हैं अतः इनकी साधना भी वाममार्गी है

कुछ लोग यहां पर प्रसन्न करते हैं कि आप साधनाओं की विधि व मंत्र क्यों नहीं लिखते इसका यह कारण है की बगैर दीक्षित हुए या संप्रदाय की परंपरा मालूम नहीं होने पर इनके मंत्र और साधनाएं जीवन को कष्ट पूर्ण बना देती हैं sabhar kaulachar Facebook wall

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मंगलवार, 7 नवंबर 2023

राजयोग तन्त्रमं:मस्तिष्क के सूक्ष्म केन्द्रों को जागृत करके दूर की स्थिति को जान सकते हैं

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मस्तिष्क के सूक्ष्म केन्द्रों को जागृत करके दूर की स्थिति को जान सकते हैं। रेडियो टेलीविजन मोबाइल फोन की तरह देखा सुना जा सकता है। यहां तक कि अपने पूर्वजों पीरों पैगम्वरों के संवाद सुन सकते हैं। प्रकृति के अदृश्य भेदों को जान सकते हैं। अपनी आभा प्राण उर्जा को सघन व विस्तृत कर सकते हैं। तथा सूक्ष्म शरीर से समूचे ब्रम्हांड में विचरण कर सकते हैं। लौकिक पारलौकिक कार्यों का सम्पादन कर सकते हैं।

यह सूक्ष्म तथा स्थूल शरीर समूचे ब्रम्हांड का एक नमूना है।जो ब्रम्हांड में तमाम ग्रह नक्षत्र बिखरे पड़े हैं, जिनका आदि अंत का पता नहीं है,उसी ब्रम्हांड की एक छोटी सी आकृति यह हमारी मानव काया है।योग की व्यापक क्रियाओं को पूर्ण रूपेण केवल अघोरेश्वर ही जान पाते हैं। क्योंकि अघोरेश्वर सदा से अनादि काल से अघोरेश्वर ही होते हैं समय समय पर अपने योग्य सन्तानों दीक्षा देने के लिए धरा पर अवतरित होते हैं।इसीसे सनातन विद्या आज तक धरती पर है।

साधारण लोग तो तमाम भ्रान्तियों में ही फंस जाते हैं। ईश्वर द्वारा हमको प्रदान की गयी साधन स्वरूप यह काया,यह दिव्य शरीर,अजीमो अज़ीम यह रूहेपैकर,मानव विज्ञान के परे की बात है। विज्ञान इसके विषय में पूरी जानकारी नहीं पा रहा है। जितना खोजेगा उतनी ही उपलब्धियां मिलती जाएगी। विज्ञान से हम अपने शरीर की रचना व सारीरिक क्रियाएं ही जान पाते हैं। परन्तु इसकी हमता तथा शक्ति आदि सूक्ष्म गतियों के साथ साथ ईश्वर की ब्रम्हाण्डीय रचना व उससे अपना संबंध और ईश्वरीय लीला आदि नहीं जान सकते।उसे आध्यात्म द्वारा ही जाना जा सकता है। परन्तु ईश्वर के विषय में जितना ज्ञान विज्ञान योग अन्य साधनों द्वारा हम जानते जाते हैं वह उतना ही अनन्त होता जाता है। जिसके विषय अनन्त हैं तो वह कितना अनन्त होगा। कल्पना नहीं की जा सकती। जिसके मामुली विषय को जानने के लिए ज्ञान विज्ञान अभी तक गोता खा रहा है, उसके सौवें अंश तक का भेद नहीं पा सका तो उसकी पूर्ण जानकारी विज्ञान के लिए असम्भव ही है।

हां विज्ञान प्रकृति प्रदूषण कर जगत नाश अवश्य कर सकता है

हर-हर महादेव जय सर्वेश्वरी

Sabhar Maheshwar singh facbook wall

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सोमवार, 6 नवंबर 2023

AdSense Changing Publisher Revenue Share Structure

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AdSense Changing Publisher Revenue Share Structure AdSense announced it is changing publisher revenue share structure to pay per per impression. Some say this could be better 


AdSense announced it is changing publisher revenue share structure to pay per per impression. Some say this could be better

Google announced that it is changing how it pays AdSense publishers, no longer paying per click and switching to exclusively paying on a per impression model.


The announcement assures publishers that the amounts publishers receive should remain the same for most publishers.


Google explained that these changes will go into effect in early 2024.


A blog post on the AdSense blog advised publishers that they are making two changes:

Revenue-share structure will be updated

Publishers will be paid by impression

According to AdSense, publishers have pocketed 68% of the ad revenue.


Payments under the new payment structure should, according to AdSense, result in publishers receiving “about 68% of the revenue.


The announcement shared the reasons for the change:


“Previously, the Google AdSense network processed fees within a single transaction.


We are now splitting the AdSense revenue share into separate rates for the buy-side and sell-side.


For displaying ads with AdSense for content, publishers will receive 80% of the revenue after the advertiser platform takes its fee, whether that be Google’s buy-side or third-party platforms.


For example, when Google Ads purchases display ads on AdSense, Google Ads will retain on average 15% of advertiser spend.”

Sabhar https://www.searchenginejournal.com

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शनिवार, 7 अक्टूबर 2023

आज की जानकारी पीपल, पाकड़, बरगद और गूलर के बीजों के द्वारा पौधा उगाने के विधि के विषय में-

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#क्या आप लोगों ने कभी पीपल, पाकड़, बरगद और गूलर के बीजों से पौधा उगाकर पौधारोपड़ कियें है।

Bhartiya Van-upvan  भारतीय वन-उपवन ग्रुप में बहुत लोगों की मान्यता है कि पीपल, पाकड़ , बरगद के पेड़ रोपित नहीं किए जाते हैं, वो अपने आप ही उगते है क्योंकि अनेकों पक्षियों के द्वारा इन वृक्षों के फलों को खाने के कारण पेट में ही पीपल, पाकड़, बरगद और गूलर के बीज़ पोषित होते है और उन पक्षियों के बिष्ट या मल के प्रसार के कारण ही इधर उधर उगते हैं।

#और इस तरह से उगने वाले पौधों में ये मान्यता कुछ ग़लत नहीं है बिल्कुल सही है।

#लेकिन जिस तरह से इस पृथ्वी पर हम मानव गतिविधियों के द्वारा निरंतर खत्म हो रहे जीवनदायिनी जंगलों एवं वृक्षों के पर बात करें तो पीपल पाकड़ और बरगद के वृक्षों को उगने के लिए पक्षियों के बिष्ट या मल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए अब समय आ गया है कि इन वृक्षों को बीज से उगाकर अधिकतम पौधारोपण करने की।

#तो आइए जानते हैं कि पीपल पाकड़ और बरगद के बीजों से पौधे कैसे उगाएं और यह हमारा पर्सनल एक्सपीरियंस है-

#सबसे पहले तो हमें इन पीपल पाकड़ बरगद और गूलर के वृक्षों के नीचे जाकर इनके बीजों को थोड़ी अधिक मात्रा में इकट्ठा करना होगा इसके बाद चाहें तो उन सभी बीजों को रात को पानी में भिगो दीजिए।

#सुबह हम लोगों को अपने अगल बगल ऐसा स्थान ढूंढना है जहां देशी खाद एवं मिट्टी का छोटा मोटा ढेर हो और वहां हमेशा अच्छी खासी नमी बनी रहे और उस पर सारा बीज डाल दीजिए। अब हमको कुछ नहीं करना है सिर्फ मिट्टी, देशी खाद एवं बीज के ढेर पर प्रतिदिन पानी का फुवारा देते रहिए कुछ10-20 दिन के अन्दर सारा बीज उगने लगेगा।

#यह बीजों से उगाने का कार्य अगर हम बरसात में करें तो सबसे अच्छा रिस्पॉन्स मिलेगा और हमें प्रतिदिन पानी का फुवारा नहीं देना पड़ेगा।

यह कार्य आप चाहें तो अपने गमले में भी कर सकते हैं कोई भी दिक्कत नहीं आयेगी।

#इन बीजों के मिट्टी एवं देशी खाद के ढेर पर छोटे छोटे पौधे उगने के बाद उन्हें उखाड़कर पालीबैग थैला में सिफ्ट करके पालन-पोषण कीजिए और बड़ा होने पर कहीं भी पौधारोपण कीजिए।

#नोट- अगर बरसात का समय हो तो इन बीजों को हम कहीं कूड़ा-करकट, देशी खाद, एवं उपजाऊ मिट्टी के ढेर पर इकट्ठा 6-7 किलो बीज फेंक दे तो भी आसानी से उग जायेगा।

#आप सभी सम्मानित एवं प्रतिष्ठित ग्रुप के लोगों को पृथ्वी पर कम हो रहें जीवनदायिनी वृक्षों की जनसंख्या बढ़ाने के लिए इस पर कार्य जरूर करना चाहिए क्योंकि सबसे अधिक आक्सीजन देने वालों वृक्षों में से एक हैं ये सब।

#यह जानकारी इसलिए भी कि आजकल प्राइवेट नर्सरी में पीपल,पाकड़, बरगद और गूलर का रेट लगभग 60 से 70 रूपये के बीच में है जो आम जनमानस को खरीद कर लगाने के लिए बहुत ही मंहगा है। यह कार्य करके हम पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं और हमारा परम कर्तव्य भी होना चाहिए पर्यावरण संरक्षण।

फोटो का स्थान- कचहरी परिसर अकबरपुर।

फोटो का दिनांक- 30 सितंबर 2023। sabhar facebook.com 

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गुरुवार, 31 अगस्त 2023

भारतीय संस्कृति

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1. अंको का अविष्कार 307 ई. पूर्व भारत में हुआ


2. शून्य का अविष्कार भारत में आर्यभट्ट ने किया


3. अंकगणित का अविष्कार पूर्व भास्कराचार्य ने किया


4. बीज गणित का अविष्कार भारत में आर्यभट्ट ने किया


5. सर्वप्रथम ग्रहों की गणना आर्यभट्ट ने 499 ई. पूर्व में की


6. भारतीयों को त्रिकोणमिति व रेखागणित का 2,500 ई.पूर्व से ज्ञान था


7. समय और काल की गणना करने वाला विश्व का पहला कैलेण्डर र भारत में लतादेव ने 505 ई. पूर्व सूर्य सिद्धान्त नामक अपनी पुस्तक में वर्णित किया 


8. न्यूटन से भी पहले गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त भारत में भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया


9. 3,000 ई. पूर्व लोहे के प्रयोग के प्रभाव वेदों में वर्षित है अशोक स्तम्भ इसका स्पष्ट प्रमाण है


10. लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस् के अनुसार 400 ई. पूर्व सुश्रूत (भारतीय चिकित्सक) द्वारा सर्वप्रथम प्लास्टिक सर्जरी का प्रयोग किया गया


11. विश्व का पहला विश्वविद्यालय तक्षशिला के रूप में 700 ई. पूर्व भारत में स्थापित था जहाँ दुनिया भर के 10,500 विद्यार्थी 60 विषयों का अध्ययन करते थे


12. सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचने वाले प्रकाश की गति की गणना सर्वप्रथम भास्कराचार्य ने की


13. यूरोपिय गणितज्ञों से पूर्व ही छठी शताब्दी में बोद्धायन ने पाई के मान की गणना की जो की पाइथोगोरस प्रमेय के रूप में जाना जाता है हमारा ज्ञान-विज्ञान एवं इतिहास इतना गौरवशाली एवं समृद्ध है 


14. दुनिया का पहला संवत्-"विक्रम संवत्" पूरे एशिया से शकों को परास्त करते हुये अवन्ति के चक्रवर्ती सम्राट "विक्रमादित्य महान" ने प्रवर्तित किया। जो ईसा पूर्व 56 से आरम्भ हुआ। इसका उल्लेख जूलियस सीज़र के रोम के ऐतिहासिक तिथिक्रम में भी है। सम्राट गदाफेरिज के लेख में भी विक्रम संवत् का उल्लेख ज्यू ग्रन्थ अनुसार मिलता है इससे विक्रम संवत् की विश्व व्यापकता स्पष्ट होती है


15. महान वैज्ञानिक डां.जगदिशचन्द्र बसु ने ही पहला वायरलेस कम्युनिकेशन का अविष्कार किया जो बाद में विकसित होता चला और आज मोबाइल, इण्टरनेट आदि के रूप में विकसित हुआ


16. सूर्य किरण में सात रंग है यह डां. सी. व्ही. रमन ने पहली बार दुनिया को बताया 19 वीं सदी में यह दुनिया ने जाना और scattering of lights के सिध्दान्त पर उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लैकिन उससे भी गर्व और हैरानी की बात है कि "तैत्तिरीय संहिता" नामक प्राचीन ग्रन्थ को "सप्त-रश्मी" कहा गया है। यानी तैत्तिरीय संहिता के लेखक ऋषि वैज्ञानिक, सी. वी. रमन से पहले ही उनकी Theory समझ चुके थे और उस ज्ञान विज्ञान के ज्ञाता थे


17. सबसे पहला अर्थशास्त्र भारत में लिखा गया। कौटिल्य दुनिया के पहले अर्थशास्त्र नामक पुस्तक लिखने वाले आचार्य थे


18. दुनिया का पहला संविधान भारत ने ही लिखा राजा मनु इसके रचयिता थे और वेद आधार था इसका नाम मनुस्मृति था। यह राजनितीशास्त्र का पहला महान ग्रन्थ है। अंग्रेज़ी षड्यन्त्र के तहत मैक्समूलर के हाथो इसे अंग्रेज़ों ने लिखवाकर इसमें तोडमरोड़ की और तथ्यों को बदल दिया


19. नाव का अविष्कार और सोने के सिक्कों का चलन में प्रचलन आर्यावर्त की ही देन है


20. पारा (mercury) बनाने की विधियाँ वैज्ञानिक नागार्जुन एवं महर्षि चरक ने सर्वप्रथम दुनिया को दी


21. एक्यूप्रेशर चिकित्सा जो आज चीन में भी विकसित है, वह तक भारत की ही देन है


22. बोधिवर्मन की मार्शल आर्ट प्रणाली भारत की ही प्राचीन देन है स्वयं श्रीकृष्ण इसमें निष्णात और पारंगत योध्दा थे उन्होंने इसी के प्रयोग द्वारा कंस के बलाढ्य पहलवान मार गिराये...!!


जय श्रीराम 🚩🙏💐❣️

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बुधवार, 30 अगस्त 2023

अष्टांग हृदयम (Astang hrudayam) और इस पुस्तक में उन्होंने बीमारियों को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखें थे

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हार्ट अटैक..हमारे  देश  भारत  में  3000 साल  पहले  एक  बहुत  बड़े ऋषि  हुये  थे..उनका  नाम  था महाऋषि वागवट  जी उन्होंने एक   पुस्तक   लिखी थी जिसका  नाम  है अष्टांग हृदयम (Astang    hrudayam) और  इस  पुस्तक  में  उन्होंने बीमारियों  को  ठीक  करने  के लिए 7000 सूत्र  लिखें  थे 

यह  उनमें  से  ही  एक  सूत्र है वागवट  जी  लिखते  हैं  कि कभी  भी  हृदय  को  घात  हो रहा  है मतलब  दिल  की  नलियों  मे blockage  होना  शुरू  हो  रहा   है !

तो  इसका  मतलब  है  कि रक्त  (blood)  में , acidity (अम्लता )  बढ़ी  हुई  है अम्लता  आप  समझते  हैं जिसको  अँग्रेजी  में  कहते  हैं acidity 

अम्लता  दो  तरह  की  होती है एक  होती  है   पेट  की अम्लता और  एक  होती  है  रक्त (blood)  की  अम्लता आपके  पेट  में  अम्लता  जब बढ़ती  है तो आप  कहेंगे पेट  में जलन सी  हो  रही  है खट्टी  खट्टी  डकार  आ रही  हैं मुंह  से  पानी  निकल  रहा  है 

और  अगर  ये  अम्लता (acidity) और  बढ़  जाये 

तो  hyperacidity  होगी और  यही  पेट  की  अम्लता बढ़ते-बढ़ते  जब  रक्त  में  आती  है  तो  रक्त  अम्लता (blood  acidity)  होती है और  जब  blood  में  acidity बढ़ती  है  तो  ये  अम्लीय  रक्त (blood)  दिल  की  नलियों  में से  निकल  नहीं  पाती और  नलियों  में  blockage कर  देता  है तभी  heart  attack  होता है  इसके  बिना heart attack  नहीं  होता और  ये  आयुर्वेद  का  सबसे बढ़ा  सच  है  जिसको  कोई डाक्टर  आपको  बताता  नहीं 

क्योंकि  इसका  इलाज  सबसे सरल  है इलाज  क्या  है ?वागवट  जी  लिखते  हैं  कि जब  रक्त  (blood)  में  अम्लता  (acidity)  बढ़  गई है तो  आप  ऐसी  चीजों  का उपयोग  करो  जो  क्षारीय  हैं आप  जानते  हैं  दो  तरह  की चीजें  होती  हैं अम्लीय  और  क्षारीय 

acidic  and  alkaline अब  अम्ल  और  क्षार  को मिला  दो  तो  क्या  होता है ?acid  and  alkaline  को मिला  दो  तो  क्या  होता है ? neutral

होता  है  सब  जानते  हैं तो  वागवट  जी  लिखते  हैं कि  रक्त  की  अम्लता  बढ़ी हुई  है  तो  क्षारीय (alkaline) चीजें  खाओ तो  रक्त  की  अम्लता (acidity)  neutral  हो जाएगी और  रक्त  में  अम्लता neutral  हो  गई तो  heart  attack  की जिंदगी  मे  कभी  संभावना  ही नहीं ये  है  सारी  कहानी अब  आप  पूछेंगे कि  ऐसी कौन  सी  चीजें  हैं  जो  क्षारीय हैं  और  हम  खायें ? आपके  रसोई  घर  में  ऐसी बहुत  सी  चीजें  है  जो  क्षारीय हैं जिन्हें  आप  खायें  तो  कभी heart attack  न  आए और  अगर  आ  गया  है तो  दुबारा  न  आए यह हम सब जानते हैं कि सबसे  ज्यादा  क्षारीय चीज क्या हैं और सब घर मे आसानी से उपलब्ध रहती हैं, तो वह  है लौकी जिसे  दुधी  भी  कहते  हैं English  में  इसे  कहते  हैं bottle  gourd जिसे  आप  सब्जी  के  रूप  में खाते  हैं ! इससे  ज्यादा  कोई  क्षारीय चीज  ही  नहीं  है

तो  आप  रोज  लौकी  का  रस निकाल-निकाल  कर  पियो या  कच्ची  लौकी  खायो वागवट  जी  कहते  हैं  रक्त की  अम्लता  कम  करने  की सबसे  ज्यादा  ताकत  लौकी  में ही  है तो  आप  लौकी  के  रस  का सेवन  करें कितना   सेवन करें ? रोज  200  से  300  मिलीग्राम   पियो कब   पिये ? सुबह  खाली  पेट (toilet जाने के बाद ) पी  सकते  हैं या  नाश्ते  के  आधे  घंटे  के बाद  पी  सकते  हैं इस  लौकी  के  रस  को  आप और  ज्यादा  क्षारीय  बना सकते  हैं इसमें 7 से 10 पत्ते तुलसी के डाल लो तुलसी  बहुत  क्षारीय  है इसके  साथ  आप  पुदीने  के  7  से 10  पत्ते  मिला  सकते  हैं पुदीना  भी बहुत  क्षारीय  है इसके  साथ  आप  काला नमक  या  सेंधा  नमक  जरूर डाले 

ये भी बहुत क्षारीय है लेकिन  याद  रखें नमक काला या सेंधा ही डाले वो  दूसरा  आयोडीन  युक्त नमक  कभी  न  डाले ये  आओडीन  युक्त  नमक अम्लीय  है 

तो  आप  इस  लौकी  के जूस  का  सेवन  जरूर  करें 

2  से  3  महीने  की  अवधि में आपकी  सारी  heart  की blockage  को  ठीक  कर देगा 21  वें  दिन  ही  आपको  बहुत ज्यादा  असर  दिखना  शुरू  हो जाएगा 

कोई  आपरेशन  की  आपको जरूरत  नहीं  पड़ेगी 

घर  में  ही  हमारे  भारत  के आयुर्वेद  से  इसका  इलाज  हो जाएगा और  आपका  अनमोल  शरीर और  लाखों  रुपए  आपरेशन के  बच  जाएँगे आपने  पूरी  पोस्ट  पढ़ी , आपका   बहुत- बहुत धन्यवाद !


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शनिवार, 26 अगस्त 2023

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है: 


अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

गेरो रुइटर

6 घंटे पहले6 घंटे पहले

भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


https://p.dw.com/p/4VbcH

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.

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भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.

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अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.


हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जाहाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जा

हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जातस्वीर: Thomas Koehler/photothek/picture alliance

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीजियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनी

जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीतस्वीर: Jens Büttner/dpa/picture alliance

डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा की लागत कितनी है?

जर्मनी के छह रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के विश्लेषण के मुताबिक, गहरी भू-तापीय ऊर्जा के साथ ऊष्मा प्राप्त करने की लागत तीन यूरो सेंट प्रति किलोवॉट ऑवर से कम है.


अब तक जिस प्रकार की जियोथर्मल एनर्जी तकनीक का उपयोग किया जाता है, वह भूमिगत जलाशयों और पानी वाले क्षेत्रों से गर्म पानी को सतह पर पंप करती है और इस ऊष्मा का उपयोग घरों को गर्म करने के लिए करती है. लेकिन अब जर्मनी के बावेरिया राज्य के गेरेट्स्ट्राइड शहर में दुनिया का ऐसा पहला व्यावसायिक जियोथर्मल प्लांट बनाया जा रहा है जो जलाशयों से निकाले गए पानी पर निर्भर नहीं है.


फ्राउनहोफर रिसर्च इंस्टीट्यूशन फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल सिस्टम्स के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्रैके कहते हैं कि नई तकनीक की मदद से ऐसे तमाम देश भी उन स्थानों पर जियोथर्मल एनर्जी का दोहन कर सकते हैं जहां पहले ऐसा करना संभव नहीं था.


यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले, यूरोप में कई नगरपालिकाओं में अपनी जरूरतों के लिए प्राकृतिक गैस से इससे भी सस्ती ऊष्मा पैदा की जा सकती थी. इससे गहरे जियोथर्मल एनर्जी प्लांट्स के निर्माण में निवेश करने को लेकर दिलचस्पी कम हो गई. हालांकि, रूस के आक्रमण के बाद जब गैस की कीमतों में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी तो इस पर आने वाली लागत भी बढ़कर 12 सेंट प्रतिकिलोवॉट से ज्यादा हो गई. इसलिए अब नगरपालिकाएं ऊष्मा की आपूर्ति के लिए गहरी भू-तापीय ऊर्जा में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं.

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अर्थव्यवस्थाजर्मनी

जियोथर्मल एनर्जी: क्या हम स्वर्ण युग में प्रवेश कर रहे हैं?

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भूतापीय ऊर्जा यानी जियोथर्मल एनर्जी के तमाम फायदों के बावजूद जीवाश्म ईंधन की तुलना में उसका उपयोग बहुत कम होता है. जानने की कोशिश करते हैं कि ऊर्जा के इस नवीकरणीय स्रोत की लोकप्रियता कैसे बढ़ रही है:


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बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोग

बाली में गर्म पानी के कुंड में स्नान करते लोगतस्वीर: Stella/imageBROKER/picture alliance

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पृथ्वी के कोर यानी केंद्र का तापमान करीब 6,000 डिग्री सेल्सियस (11,000 डिग्री फारेनहाइट) है और इस तापमान पर पृथ्वी का केंद्र उतना ही गर्म है जितना कि सूर्य. हालांकि यह तुलना ठीक नहीं है क्योंकि पृथ्वी की सतह से 2,000 से 5,000 मीटर नीचे भी, तापमान 60 से 200 डिग्री सेल्सियस तक होता है जो झुलसा देने वाला होता है. यहां तक कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों में तो सतह का तापमान भी 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा से बचत


इस तापमान से ऊष्मा-आधारित ऊर्जा प्राप्त करने संभावना होती है. हमारे पूर्वज जियोथर्मल एनर्जी की शक्ति से अपरिचित नहीं थे. पहली शताब्दी ईस्वी में, पश्चिमी जर्मनी के शहरों में रहने वाले रोमन, जिन्हें अब आखन और वीसबाडेन के नाम से जाना जाता है, वे अपने घरों को गर्म करते थे और गर्म पानी के झरने से नहाते थे.


न्यूजीलैंड में, माओरी लोग पृथ्वी की गर्मी से निकली ऊष्मा का इस्तेमाल करते हुए अपना भोजन पकाते थे और 1904 में, मध्य इटली के एक क्षेत्र लार्डेरेलो में तो बिजली पैदा करने के लिए जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल किया गया था.


भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटभाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांट

भाप से बिजली बनाते हैं कुछ जियोथर्मल प्लांटतस्वीर: Stefan Ziese/imageBROKER/picture alliance

ज्वालामुखीय क्षेत्र जियोथर्मल एनर्जी को बिजली में बदल देते हैं

इन दिनों, 30 देशों में करीब 400 बिजली संयंत्र पृथ्वी की सतह के नीचे पैदा होने वाली भाप का इस्तेमाल करके बिजली पैदा कर रहे हैं, जिसमें कुल 16 गीगावॉट (जीडब्ल्यू) की क्षमता होती है.


बिजली पैदा करने की यह विधि संयुक्त राज्य अमेरिका, मेक्सिको, अल साल्वाडोर, आइसलैंड, तुर्की, केन्या, इंडोनेशिया, फिलीपींस और न्यूजीलैंड सहित पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के साथ ज्वालामुखीय क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन वैश्विक स्तर पर, भू-तापीय ऊर्जा का हिस्सा बिजली के कुल उत्पादन का सिर्फ 0.5 फीसद ही है.


ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मे

ज्वालामुखियों के आस पास बहुत मिलते गर्म पानी के चश्मेतस्वीर: DW

गहरी जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा हर जगह उपलब्ध है

दुनिया भर में, जियोथर्मल एनर्जी का उपयोग मुख्य रूप से स्विमिंग पूल्स, इमारतों, ग्रीनहाउसेज और शहरी हीटिंग सिस्टम्स को गर्म करने के लिए किया जाता है. इसके लिए 200 डिग्री सेल्सियस तक का पानी 5,000 मीटर गहरे बोरहोल से पंप किया जाता है. फिर गर्मी निकाली जाती है और ठंडा पानी दूसरे बोर के माध्यम से वापस पंप किया जाता है.


ऊष्मा को पकड़ने यानी कैप्चर करने का यह तरीका दुनिया भर में संभव है, सस्ता है और उन देशों में तेजी से लोकप्रिय है जहां ज्वालामुखीय गतिविधियां कम होती हैं. रीन्यूएबल्स ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, दुनिया भर में जियोथर्मल प्लांट्स की स्थापित क्षमता करीब 38 गीगावॉट है, जो बिजली पैदा करने वाले जियोथर्मल पॉवर प्लांट्स की क्षमता के दोगुने से भी ज्यादा है.


फिलहाल, चीन (14 गीगावॉट), तुर्की (3 गीगावॉट), आइसलैंड (2 गीगावॉट) और जापान (2 गीगावॉट) गहरी जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने में अग्रणी हैं और ज्यादा से ज्यादा शहर, जिलों और ग्रीनहाउस को गर्मी पहुंचा रहे हैं. जर्मनी में, म्यूनिख शहर में सस्ती जियोथर्मल हीटिंग उपलब्ध है और उसने 2035 तक इस क्षेत्र को जलवायु तटस्थ बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया है.


जर्मनी की सरकार 2045 तक राष्ट्रव्यापी जलवायु-तटस्थ ताप आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए गहरी यानी डीप जियोथर्मल एनर्जी विकसित करने पर भी विचार कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, गहरी जियोथर्मल एनर्जी 70 गीगावॉट की स्थापित क्षमता से सालाना करीब 300 टेरावॉट घंटे ऊष्मा (गर्मी) पैदा कर सकती है. यह ऊष्मा इतनी ज्यादा है कि भविष्य में सभी इमारतों की हीटिंग के लिए जितनी ऊष्मा की डिमांड है, यह उसे पूरा कर सकती है.


हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जाहाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जा

हाउसिंग सेक्टर की ऊर्जा मांग काफी हद तक पूरी कर सकती है गहरी जियोथर्मल ऊर्जातस्वीर: Thomas Koehler/photothek/picture alliance

पृथ्वी की सतह से गर्मी निकालने के लिए हीट पम्प्स का इस्तेमाल

हालांकि, जियोथर्मल एनर्जी का इस्तेमाल हीट पंप्स की मदद से पृथ्वी की सतह के निकट के स्रोतों से भी किया जा रहा है. केवल 50 से 400 मीटर गहरे बोरहोल में, पाइप्स के जरिए पानी को सतह से जमीन के अंदर तक ले जाया जाता है और फिर वापस भी लाया जाता है. इस दौरान पाइप के भीतर का पानी 10 से 20 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाता है. फिर हीट पम्प के जरिए इस ऊर्जा का उपयोग पानी के तापमान को 30 से 70 डिग्री तक पहुंचाने के लिए होता है, और फिर इसी तापमान पर पानी का इस्तेमाल इमारतों को गर्म करने में होता है.


शोधकर्ताओं का मानना है कि जर्मनी में इस छिछली जियोथर्मल एनर्जी के इस्तेमाल से करीब उतनी ही क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है जितनी डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलती है. जर्मनी में सिर्फ इन्हीं दो टेक्नोलॉजीज के जरिए इमारतों के लिए भविष्य की संपूर्ण हीटिंग मांग को पूरा किया जा सकता है.


जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीजियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनी

जियोथर्मल ऊर्जा का उत्पादन कई गुना बढ़ाना चाहता है जर्मनीतस्वीर: Jens Büttner/dpa/picture alliance

डीप जियोथर्मल एनर्जी से मिलने वाली ऊष्मा की लागत कितनी है?

जर्मनी के छह रिसर्च इंस्टीट्यूट्स के विश्लेषण के मुताबिक, गहरी भू-तापीय ऊर्जा के साथ ऊष्मा प्राप्त करने की लागत तीन यूरो सेंट प्रति किलोवॉट ऑवर से कम है.


अब तक जिस प्रकार की जियोथर्मल एनर्जी तकनीक का उपयोग किया जाता है, वह भूमिगत जलाशयों और पानी वाले क्षेत्रों से गर्म पानी को सतह पर पंप करती है और इस ऊष्मा का उपयोग घरों को गर्म करने के लिए करती है. लेकिन अब जर्मनी के बावेरिया राज्य के गेरेट्स्ट्राइड शहर में दुनिया का ऐसा पहला व्यावसायिक जियोथर्मल प्लांट बनाया जा रहा है जो जलाशयों से निकाले गए पानी पर निर्भर नहीं है.


फ्राउनहोफर रिसर्च इंस्टीट्यूशन फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल सिस्टम्स के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्रैके कहते हैं कि नई तकनीक की मदद से ऐसे तमाम देश भी उन स्थानों पर जियोथर्मल एनर्जी का दोहन कर सकते हैं जहां पहले ऐसा करना संभव नहीं था.


यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले, यूरोप में कई नगरपालिकाओं में अपनी जरूरतों के लिए प्राकृतिक गैस से इससे भी सस्ती ऊष्मा पैदा की जा सकती थी. इससे गहरे जियोथर्मल एनर्जी प्लांट्स के निर्माण में निवेश करने को लेकर दिलचस्पी कम हो गई. हालांकि, रूस के आक्रमण के बाद जब गैस की कीमतों में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगी तो इस पर आने वाली लागत भी बढ़कर 12 सेंट प्रतिकिलोवॉट से ज्यादा हो गई. इसलिए अब नगरपालिकाएं ऊष्मा की आपूर्ति के लिए गहरी भू-तापीय ऊर्जा में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं.


भारत की जियोथर्मल संभावनाएं


04:00

क्या भूतापीय ऊर्जा ऊष्मा की मांग को पूरा करने में सक्षम है?

नहीं, लेकिन दुनिया की इमारतों की हीटिंग डिमान्ड्स को डीप जियोथर्मल एनर्जी और सतह के नजदीक वाली जियोथर्मल एनर्जी की लगभग असीमित क्षमता के दोहन से जरूर पूरा किया जा सकता है.


लेकिन औद्योगिक जरूरतों के लिए कभी-कभी 200 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान की आवश्यकता होती है, जिसे तकनीक की मौजूदा स्थिति में अकेले भूतापीय ऊर्जा पूरा करने में सक्षम नहीं है. ऐसे उच्च तापमान के लिए, बिजली, बायोगैस, बायोमास और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे जलवायु-अनुकूल विकल्प कहीं बेहतर हैं.


गहरी भू-तापीय ऊर्जा कितनी जल्दी ऊष्मा की आपूर्ति शुरू कर सकती है?

पिछली शताब्दी में, खासतौर पर तेल और गैस उद्योगों ने पृथ्वी की उपसतह, ड्रिल तकनीक, कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के तरीके जैसे क्षेत्रों में काफी ज्ञान अर्जित किया है और परिष्कृत तकनीक विकसित की है. फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर एंड जियोथर्मल एनर्जी (आईईजी) के प्रमुख प्रोफेसर रॉल्फ ब्राके ने डीडब्ल्यू को बताया कि उन्हें विश्वास है कि "यदि तेल और गैस उद्योग अपना ध्यान जियोथर्मल ऊर्जा पर केंद्रित करते हैं तो जियोथर्मल ऊर्जा का तेजी से विस्तार किया जा सकता है."


लेकिन उनका यह भी कहना है कि ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में यदि ये कंपनियां तेल और गैस उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना जारी रखती हैं तो भू-तापीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और ड्रिलिंग तकनीक कम पड़ जाएंगी. ब्राके के मुताबिक, यदि मंजूरी जल्दी मिल जाती है तो भू-तापीय ऊष्मा स्रोतों को विकसित करने में दो से तीन साल लगते हैं लेकिन अन्य जगहों पर नौकरशाही की वजह से होने वाली देरी के कारण जर्मनी की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा समय लगता है. जर्मन सरकार अब इस प्रक्रिया को और तेज करना चाहती है और 2030 तक ताप ऊर्जा उत्पादन को मौजूदा 1 टेरावॉट की तुलना में दस गुना बढ़ाना चाहती है.

 डीप जियोथर्मल एनर्जी भूकंप का कारण बन सकती है?

जी हां. भूकंपीय गतिविधि वाले क्षेत्रों में, भूतापीय ऊर्जा छोटे भूकंपों को ट्रिगर कर सकती है. क्योंकि जब पानी को बहुत अधिक दबाव के साथ पृथ्वी की ऊपरी सतह में इंजेक्ट किया जाता है तो वहां तनाव पैदा होता है. कुछ मामलों में, भूकंप के झटकों के कारण इमारतों में दरारें पड़ गईं और इस तकनीक का सार्वजनिक विरोध भी हुआ.


ब्राके कहते हैं कि ऐसे क्षेत्रों में भूकंप की कोई रिपोर्ट नहीं आई जहां किसी तरह का बाहरी तनाव नहीं था. इस बीच, भू-तापीय तकनीकों में भी सुधार किया गया है. अब कम भूमिगत जल दबाव और अधिक बेहतर मॉनीटिरिंग तरीकों से भूकंपी झटकों से बचा जा सकता है.


लेकिन तेल, गैस और कोयला निष्कर्षण की तुलना में, जियोथर्मल तकनीक में बहुत कम जोखिम है. ब्राके कहते हैं, "यह हमारी पृथ्वी से ऊर्जा का अब तक का सबसे सुरक्षित स्रोत है. Sabhar dw.de

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप'

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप' 

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था। 

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिसके इस्तेमाल से उन्होंने 53 वर्षीय महिला की त्वचा को 30 वर्षीय युवती के जैसे जवां बनाने में सफलता पाई है।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। ‘ई लाइफ पत्रिका’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था।  वैज्ञानिकों ने कहा कि निष्कर्ष अभी शुरुआती चरण में हैं, लेकिन तकनीक विकसित हो चुकी है। अगर अधिक शोध किया जाता है, तो इस विधि का इस्तेमाल रीजेनेरिटिव मेडिसिन (चेहरे को जवां दिखाने वाली दवाएं) जैसी एक उन्नत दवा बनाने में किया जा सकता है।

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उपलब्धि: 53 साल की महिला का कायाकल्प, 30 जैसी बनाई त्वचा, वैज्ञानिक ने तकनीक का नाम रखा 'टाइम जंप'

एजेंसी, वाशिंगटन। Published by: देव कश्यप Updated Mon, 11 Apr 2022 06:27 AM IST

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सार

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था। 

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Rejuvenation of 53 year old woman skin made like 30 Years age Scientist named the Technique Time Jump

सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

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विस्तार

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने एक ऐसी तकनीक खोजी है, जिसके इस्तेमाल से उन्होंने 53 वर्षीय महिला की त्वचा को 30 वर्षीय युवती के जैसे जवां बनाने में सफलता पाई है।

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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तकनीक चेहरे की कोशिकाओं को बगैर नुकसान पहुंचाए उसे जवां बनाए रखती है। ‘ई लाइफ पत्रिका’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने इस तकनीक को ‘टाइम जंप’ का नाम दिया है। जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता व नोबेल पुरस्कार विजेता शिनाया यामानाका ने भी 2006 में इस तकनीक पर काम किया था।  वैज्ञानिकों ने कहा कि निष्कर्ष अभी शुरुआती चरण में हैं, लेकिन तकनीक विकसित हो चुकी है। अगर अधिक शोध किया जाता है, तो इस विधि का इस्तेमाल रीजेनेरिटिव मेडिसिन (चेहरे को जवां दिखाने वाली दवाएं) जैसी एक उन्नत दवा बनाने में किया जा सकता है।




चेहरे की कोशिकाओं को नुकसान बिना जवां बनाए रखेगी तकनीक

स्कॉटलैंड में रोसलिन इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने करीब 25 साल पहले एक डॉली नामक भेड़ का क्लोन बनाकर उस पर किया था काम। 

इसमें वैज्ञानिकों ने भेड़ से ली गई स्तन ग्रंथि कोशिका को भ्रूण में बदल दिया था। 

तकनीक का उद्देश्य मानव भ्रूण स्टेम सेल बनाना था, जिसे मांसपेशियों, तंत्रिका कोशिकाओं जैसे विशिष्ट ऊतकों में विकसित किया जा सकता था। इनका उपयोग शरीर के पुराने अंगों को बदलने के लिए किया जा सकता है।

50 दिनों की है पूरी प्रक्रिया

नोबेल विजेता वैज्ञानिक की तकनीक पर काम करते हुए जर्मन आणविक जीवविज्ञानी वुल्फ रीक, पोस्टडॉक्टरल छात्र दिलजीत गिल व संस्थान की टीम ने बताया िक स्टेम सेल रीप्रोग्रामिंग की पूरी प्रक्रिया 50 दिन की है, जो कि कई चरणों में पूरी होती है। sabhar Amar Ujala.com

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