Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Comments

You might like

Subscribe Us

मंगलवार, 23 मार्च 2021

ध्यान की परिभाषा

0

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है। 

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है। 

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान क्रिया और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है। 

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। 

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति। 

ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।

ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। 

ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है। 
नमन ॐ

Virat Yog Sagar

Read more

महा मृत्युंजय मंत्र

0

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है|

मंत्र इस प्रकार है -

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥
यह त्रयम्बक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ 
त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को
यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्* पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मका* उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)
इव = जैसे, इस तरह
बन्धनात् = तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्योः = * मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा = नहीं वंचित होएं
अमृतात् = अमरता, मोक्ष के आनन्द से sabhar Facebook wall 

Read more

अध्यात्म-दृष्टि और विज्ञान-दृष्टि

0

--
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरु के श्रीचरणों में कोटि- कोटि वन्दन

       किसी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश, बस होता है उसका मात्र रूपान्तरण
******************************

       जब भी हम अशान्त होते हैं, दुःखी होते हैं तो मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न होने लगता है। फिर हम एकान्त खोजते हैं। घने वृक्षों के बीच या नदी के तट पर चले जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि आत्मा की शान्ति यदि कहीं है तो वह है अध्यात्म में। उससे हम दूर नहीं हो सकते क्योंकि मनुष्य के सुख का मूल है--आत्मिक शान्ति जो बाह्य जगत में नहीं मिल सकती। बाह्य जगत हमें क्षणिक सुख  दे सकता है जो भौतिक जीवन के लिए ही आवश्यक है, लेकिन शान्ति नहीं दे सकता। शान्ति तो आध्यात्मिक मार्ग के अनुसरण से ही प्राप्त हो सकती है।
       अगर इसके मूल में जाएँ तो एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आएगा। वह यह कि हमारे पूर्वज ऋषि थे। उनकी साधना, तपस्या और खोज प्रकृति के सान्निध्य में हुई। उन्होंने प्रकृति में उस परम सत्ता का अनुभव किया जिसे आज का विज्ञान सोच भी नहीं सकता।
       इस सत्य को विज्ञान भी स्वीकार करता है कि हमारी अशान्ति का कारण यह भी है कि हमें जो होना चाहिए, वह हम नहीं हैं। हम ऋषि-सन्तान हैं और हमारे रक्त में उन ऋषियों के संस्कार हैं। मगर हमारी आत्मा पर आज ऐसा आवरण पड़ गया है जिसे हम हटा नहीं पा रहे हैं। बस, इधर-उधर हाथ पांव मार रहे हैं। जब भी हमारे बीच कोई महापुरुष प्रकट हो जाता है तो उसके अलौकिक ज्ञान व चमत्कार को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं। फिर हम उसका अनुसरण करने लगते हैं। क्योंकि वह हमसे अलग दिखता है। लेकिन क्या हमने कभी यह विचार किया है कि वह हमसे अलग क्यों दिखता है ? हमें यह अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि उस दिव्य पुरुष की आत्मा पर से वह आवरण हट गया है और वह मूल को हो गया है उपलब्ध। वह हो गया है--निर्मल, निश्छल और स्थिर। वह प्रकृतिमय हो गया है। हमारे और दिव्य पुरुष के बीच बस यही अन्तर है। अपनी आत्मा के ऊपर से आवरण हटाना ही आत्म-साधना है, समाधि है। समाधि का तात्पर्य है उस परम शून्य को उपलब्ध हो जाना।
       मनुष्य के जीवन में एक विशेष अवस्था आती है जिसे 'शून्यावस्था' कहते हैं। यह अवस्था ही समाधि की अवस्था है। इसमें उसे न अपने जीवन की सुध रहती है और न रहती है सुध इस जगत की।
       मनुष्य का जीवन अनन्त- अनन्त यात्राओं के मध्य एक पड़ाव है और उसका शरीर है एक वाहन जिसके माध्यम से उसकी आत्मा इस संसार की यात्रा अनवरत रूप से हर युग में करती रहती है। आत्मा की यह यात्रा अनन्त काल से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। हमारी आत्मा हर युग में, हर क्षण में मौजूद रही है, हर महापुरुष की साक्षी रही है और भविष्य में साक्षी रहेगी। उसने राम के काल को देखा है, कृष्ण के काल को भी देखा है, बुद्ध और महावीर के कालखण्ड में भी वह रही है। कब नहीं रही वह ?
        इसके विपरीत विज्ञान आत्मा के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता। उसे वह बस  ऊर्जा मानता है। जब तक ऊर्जा है, शरीर चैतन्य है। शरीर से ऊर्जा निकल गयी, शरीर का अस्तित्व ख़त्म। वह आत्मा को नहीं मानता। विज्ञान का कहना है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं होती। वह एक प्रकार की ऊर्जा है। विज्ञान एक सिद्धान्त है--'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' अर्थात् पिण्ड ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है और ऊर्जा पिण्ड में। यह क्रिया अनवरत चल रही है और जो भी दृष्टिगोचर होता है, वह एक दूसरे में ढल जाने की भौतिक और रसायनिक क्रिया के परिणास्वरूप है। सब कुछ अणुओं का खेल है। वह सृजन और विनाश नहीं है। 
       हमारा अध्यात्म भी तो यही कहता कि किसी भी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश। वस्तु का सिर्फ रूपान्तरण होता है। पूरे विश्वब्रह्माण्ड में कम्पन हो रहा है। कोई चीज़ स्थिर नहीं है। सब में प्रवाह है। जो दिखाई दे रहा है ,सब अणुओं का घनीभूत रूप है। हमारा शरीर, हमारा जगत यहाँ तक कि यह ब्रह्माण्ड--सब कुछ ऊर्जामय है। अध्यात्म की ऊंचाई छूने में विज्ञान को अभी काफी समय लगेगा। तर्क करने से समाधान नहीं मिलता। ब्रह्माण्ड की बात तो दूर की है, यहाँ तक कि हमारा शरीर स्वयं में रहस्यमय है। उससे ज्यादा रहस्यमय है हमारा मस्तिष्क। 
       विज्ञान स्वप्न को नहीं मानता। उसका कहना है कि मन की दबी हुई इच्छा ही स्वप्न के माध्यम से मस्तिष्क पूरी करता है। लेकिन आज जितने भी आविष्कार हुए हैं, उनमें स्वप्न का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह बात वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। जहां तक अलौकिकता का अर्थ है, इस संसार से परे कोई वस्तु जो प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत ही आती है, वह किसी अलौकिक शक्ति के द्वारा ही संचालित मानी जाती है। वहाँ विज्ञान का नियम नहीं चलता। वह अलौकिक है, रहस्य है। जबकि विज्ञान उसे नकार देता है। वह कहता है कि इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी अलौकिक नहीं है। न ही कोई रहस्य है। सब प्रकृति के अंतर्गत है। जो बुद्धि से परे है, उसे अलौकिक कहा जाता है। ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा केवल यह है कि हमारी सोच, हमारी क्षमता अथवा हमारे ज्ञान के परे है, इसलिए अलौकिक है। जितने भी ज्ञानी, साधक हुए हैं, उन्होंने कभी भी चमत्कार नहीं दिखलाया, न ही उसकी आवश्यकता समझी। बस, घटनाएं घट गयीं, उन्हें  लोगों ने चमत्कार मान लिया, लेकिन ज्ञानी, साधकों के लिए मात्र घटना थी, चमत्कार नहीं। sabhar shivram Tiwari Facebook wall

Read more

सोमवार, 22 मार्च 2021

सप्तशती_भाग_2

0

{{{ॐ}}}

                                                                #

दूसरे अध्याय से मध्यम चरित्र का प्रारंभ होता है और इसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है मध्यम चरित्र में दूसरा तीसरा चौथा अध्याय समाविष्ट है इन तीनों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है दूसरे अध्याय में वह लक्ष्मी बीज तीसरे में अटठाईस वर्णात्मिका और चौथे अध्याय मे वह त्रिवर्णात्मिका शक्ति लक्ष्मी के रूप में वर्णित है उत्तम चरित्र में सरस्वती है जिसका विस्तार सात अध्यायों में है kअध्याय अनुसार इसके रूप हैं विष्णूवादी तेईस देवतात्मिका शतमुखी घूम्राक्षी काली चामुंडा रक्ताक्षी वाग्भवबीज की अधिष्ठात्री महाकाली सिंहवाहिना त्रिशुलपाश धारणी और सर्वनारायणी है।
बारहंवा और तेरहंवा अध्याय उत्तर चरित्र में आता है पर बारहवें में फलश्रुति और तेहरवें में वरदान है बारहवे की अधिष्ठात्री मां बाला त्रिपुर सुंदरी है और तेहरवें की त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या है प्रत्येक अध्याय के अंत में इन्हीं नामों से महाहुति दी जाती है।
तीनों चरित्रों में एक ही शक्ति गुणात्मक वृत्ति के कारण महासरस्वती  महालक्ष्मी और मां महाकाली के रूप में त्रिधा हो जाती हैं माया की यह महास्तर लोक प्रकृति का विवेचन करते हैंo इन्हीं स्तरों पर होने वाला असंतुलन उसे उद्विग्न कर देता है यह उद्वेग ही विक्षोभ का कारण बनता है और  विक्षुब्ध प्रकृति संतुलन स्थापित करके वीरमती है।
तीनों ही चरित्रों में विक्षोभ कारण अंधकार होता है यह अंधकार अपने तक सीमित रहे तो किसी को कोई आपत्ति नहीं पर जब यह आसुरी स्वरूप ग्रहण कर लेता है तो अव्यवस्था का कारण बन जाता है यह अहंकार कभी मधु कैटभ कभी महिष कभी चंड मुंड तो कभी शुंभ निशुंभ बन जाता है।
प्रथम चरित्र में मधु कैटभ नाम दो असुर हैं यह अपने बाहुबल से सारी मर्यादाओं का उल्लंघन करके अपने को स्थापित कर देना चाहते हैं विष्णु जो संसार के रक्षक हैं hयह तमोगुण ग्रस्त हैं देवगण गहन निंद्रा की स्तुति करते हैं यह निंद्रा विष्णु माया है यह अपना प्रभाव संवत करती है विष्णु जग जाते हैं व्यवस्था का अव्यवस्था से संघर्ष होता है यही विष्णुमाया है फिर मोहित करने के लिए प्रस्तुत होती है।
और दर्पदृष्ट मधू कैटभ के मुख से कहलाती है #आवां_जहि_न_यत्रोवीं_सलिलेन_परिप्लुता अर्थात जहां धरती पर जल नहीं हो वही हमारा वध कर देना माया के प्रभाव से मति भ्रष्ट दानव का वध करने के लिए तुरंत निर्जल धरती प्रगट हो गई ।
मध्यम चरित्र की देवता लक्ष्मी है विष्णु ऋषि है और छंद है उष्णिक यहां सभी व्यवस्थित है लक्ष्मी रजोगुण की आधार भूमि है यहां चंचल्य अतिथि अत्यंत तीव्र है इसी चंचल्य को परिवर्तित करने वाला तत्व वायु है इसलिए मध्यम चरित्र का तत्व वायु है लक्ष्मी का जनक सागर माना जाता हैs क्योंकि दृश्य अवस्था में जलसा चंचल दूसरा तत्व नहीं है विशेषत उस अवस्था में जबकि वायु प्रेरित कर रहा हो।
सर्पासन पर अर्धनिमीलित नेत्र विष्णु लक्ष्मी के स्पर्श से अंतः प्रह्ष्ट हो इस विस्तार की परिधि बने हुए हैं इनकी मंद किंतु सशक्त क्रिया सभी को दोलित वह क्रियाशील बनाए हुए हैं सृजन की भूमि यही रजोगुण है सत्व इस को प्रेरित करता है तब आबद्ध रखता है जहां काम और क्रोध को रजोगुण की वृत्ति बताते हैं वहां इन दोनों भाव में परस्पर विरुद्धवृत्ति होना भी आश्चर्य है।
इन दोनो की उदभवस्थली एक है पर इनके प्रेरक और धारक बदल जाते हैं हम जानते हैं कि काम सृजनानंद का कारक है और क्रोध विनाश का पुरोगामी है काम सत्वोन्मुख है तो क्रोध तमोभिमुख है मध्यम चरित्र का प्रति नायक महिष है महिष का प्रेरक अहंकार है aवह मद और लोभ का प्रतीक बनकर व्यवस्था को ध्वंस करना चाहता है इसके लिए क्रोध से अविष्ट होकर परमेश्वरी से युद्ध करने के में प्रवृत्त होता है अंत में विनाश के तम में डूब जाता है।

Read more

परावस्था

0



बर्फ को शून्य करने के लिए ताप देना पड़ता है । 

वह पहले पानी होती है , उसके बाद भाप , फिर शून्य में मिल जाती है ।

ताप देने की क्रिया के कारण बर्फ में धीरे धीरे विस्तार होता है और वह शून्यता की और जाती है । 

उसके कण जो पास पास थे, धीरे धीरे दूर होते जाते हैं । अर्थात् भीतरी संरचना में शून्यता धीरे धीरे आविष्ट होती जाती है । 

कठिन से तरल, तरल से वाष्पीय, वाष्प से फिर शून्य ।
कठिन अवस्था की परावस्था तरल , उसकी परावस्था भाप और उसकी परावस्था शून्य ।

ताप देते हैं तो शून्यता का आभास होने लगता है । अर्थात् शून्यता धीरे धीरे आने लगती है बर्फ में । अभी पूरी नहीं आयी । वह विस्तार हो कर तरल पानी बनती है , और शून्यता आगयी , किन्तु अभी पूरी शून्य नहीं हुई , किन्तु यह भी नहीं कि शून्यता नहीं है । वह है , और क्रमशः ताप देने से बढ़ रही है ।

अगर ताप देना बन्द कर दें , तो वह उसी स्थिति में आ जाएगी , और धीरे धीरे पुनः बर्फ हो जाएगी । 
यहाँ तक कि भाप भी बन जाए , किन्तु उत्ताप देना बन्द कर दिया तो वह पुनः तरल हो कर धीरे धीरे बर्फ हो जाएगी ।

इसलिए तब तक ताप देना होता है जब तक पूरा भाप शून्य न हो जाए । शून्यता की मात्रा  धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते सर्वव्यापी शून्य न हो जाए । 

जब पूर्ण शून्य हो जाए तभी न बर्फ रहती है , न पानी न भाप । 

अब इस प्रतीकात्मक उदाहरण को प्रयोग कीजिये समझने के लिए की क्रिया की परावस्था क्या है , बिना क्रिया किये परावस्था में क्यों नहीं जा सकते , क्रिया की परावस्था में रह कर क्यों क्रिया होती है और क्रिया की परावस्था आ जाए तो क्यों उसे और कुछ कर के नहीं छेड़ना चाहिए ।

गुरुकृपा से यह उदाहरण मन में आया । कोई त्रुटि हो व्याकरण गत तो क्षमा 🙏 

श्रीगुरु अर्पणं अस्तु

~साभार :- सोमदत्त शर्मा

Read more

ध्यान जीवन का सबसे बड़ा आनंद

0


********************************************
ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से,कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं- वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है, वह ध्यान है।

इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं - मौन की, शांति की- जब सब थम जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है। धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है।

मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गये हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अद्भुत मौन दिखेगा, अद्भुत निर्दोषतादिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना होगा। और धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषिता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा- एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुन: उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है, इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है, तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है- हमने इस पहले जाना है। लेकिन हम भूल गये हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन हम जरा खोदें तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते, उसे हम केवल भूल सकते हैं।

हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारी वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहें हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।
ओशो

Rajesh Saini

Read more

रविवार, 21 मार्च 2021

शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं!

0

शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं! भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। 
▪️ शिवलिंग भी एक प्रकार के न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें। 
▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।
▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। 
▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। 
▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।
▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। 
महाकाल उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी) देखिये -
▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी 
▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी 
▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी 
▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी 
▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी 
▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी
▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी 
▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी 
हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था। 
उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। 
इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले। 
और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला।
आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये sabhar Facebook adi yogi wall

Read more

सब-कांसियस मन से दूरी है तनाव और फ्रस्ट्रेशन का कारण

0



सब-कांसियस मन से दूरी है तनाव और फ्रस्ट्रेशन का कारण - 

swami ji kbhi mastishk me vicharo ka silsila kabhi bhav me kabhi sannata kabhi nirvichar  kabhi savpn pura din yeh chaker chalta h ek kona yeh sab dekh rha h apne bas me kuchh bhi nhi yeh sab kya ho rha h swami ji 
margdrashen kre🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽

मष्तिष्क में कभी विचार, कभी निर्विचार, कभी भाव, कभी सन्नाटा, कभी सपने यह सब चल रहा होता है और कभी एक कोना यह सब देखता रहता है और यह भी लगता है कि हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। यही हमारी स्थिति है। हम दिन में चेतन अवस्था में जब होते हैं तो विचार हमें घेरे रहते हैं, भाव हमे प्रभावित करते हैं। और कभी-कभी निर्विचार में भी हमारा प्रवेश होता है जब हम अपने प्रेमी के साथ होते हैं।

जाग्रत, सपने और गहरी नींद, इन तीन तलों पर ही हमारा जीवन डोलता रहता है। दिन भर हमारा चेतन मन काम करता है, हम जागे हुए काम करते हैं, विचार करते हैं। फिर हम रात को नींद में प्रवेश कर जाते हैं तो हमारा चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन काम करने लगता है। वह हमें सपने दिखाने लगता है। और फिर आधी रात के बाद गहरी नींद में हमारा प्रवेश होता है। यानि अतिचेतन मन में हमारा प्रवेश होता है। गहरी नींद में हम अतिचेतन मन में प्रवेश कर जाते हैं। और सुबह जागने पर फिर हम चेतन मन में लौट आते हैं। 

चेतन, अचेतन और अतिचेतन, हमारा सारा जीवन इन तीनों तलों पर डोलता रहता है। जिसमें हम चेतन मन और अचेतन मन का तो बहुत उपयोग करते हैं लेकिन अतिचेतन का उपयोग नहीं कर पाते हैं। सारे तनाव सारी परेशानियां अतिचेतन से दूरी बनाने के कारण से ही हैं। जब तक हम मन के तीनों तलों का उपयोग नहीं करेंगे हम तनाव में रहेंगे।

हम चेतन मन का पूरा उपयोग करते हैं और हमारा अचेतन मन भी अपना पूरा काम करता है लेकिन हमारा अतिचेतन काम नहीं कर पाता है। क्योंकि हम गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं क्योंकि गहरी नींद में ही हमारा अतिचेतन से संपर्क होता है। और हमें उससे उर्जा मिल पाती है। हम दिनभर काम करते हैं और रात गहरी नींद में हमें अतिचेतन से  पुनः फिर उर्जा मिल जाती है। 

हम जो भोजन लेकर जो ऊर्जा, जो शक्ति अपने शरीर में डालते हैं उस ऊर्जा को हम पूरी तरह से खर्च नहीं कर पाते हैं। और वह उर्जा हमें तनाव और परेशानियां देती है। वह उर्जा हमें गहरी नींद में प्रवेश नहीं करने देती है। हमारे शरीर की अतिरिक्त उर्जा हमें गहरी नींद में प्रवेश नहीं करने देती है, गहरी नींद जहां पर हम अतिचेतन मन में प्रवेश करते हैं। जैसे पूर्णिमा की रात को हम अपने कमरे में बल्ब जला दें और खिड़की खोल देते हैं तो चंद्रमा की रोशनी कमरे के भीतर प्रवेश नहीं करेगी। जब तक  कि हम बल्ब को बंद नहीं करते हैं। ज्योंही हम बल्ब को बंद करते हैं, कमरे में अंधेरा हो जाता है और खिड़की से चंद्रमा की रोशनी कमरे में प्रवेश कर जाती है। ठीक इसी भांति हमारे शरीर की उर्जा ने प्रकृति की उर्जा को हमारे भीतर आने से रोक दिया है। जब तक हम अपनी ऊर्जा को खर्च नहीं कर पाते हैं तब तक प्रकृति की उर्जा हमारे भीतर प्रवेश नहीं करती है। और प्रकृति की उर्जा प्रवेश करती है गहरी नींद में प्रवेश करने पर, जहां अतिचेतन जागता है। 

इसके लिए हमें अपनी ऊर्जा को अतिरिक्त श्रम करके खर्च करना होगा। सुबह दौड़कर पसीना बहाकर और दिन में श्रम करके  जब हम रात नींद में प्रवेश करते हैं तो नींद में प्रवेश करते ही अचेतन मन हमें सपने दिखाने लगता है। सपने हमारे स्वास्थ्य के लिए सहायक होते हैं। हमने महसूस किया था कि जिस रात प्रेमिका सपने में आई है सुबह सारा दिन उसकी याद और मस्ती में बीता है। जो काम, जो हमारी इच्छाएं, जो हमारी कामनाएँ दिन में पूरी नहीं हो पाती है, हमारा अचेतन मन उन्हें रात को नींद से सपना दिखाकर पूरी करता है।

अचेतन में सपने देखने के बाद हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। गहरी नींद में अतिचेतन में प्रवेश करता है और हमें अतिचेतन से उर्जा मिलने लगती है और हम उर्जावान होकर बाहर निकलते हैं। 

अतिचेतन मन जागता है रात को दो बजे से पांच बजे के बीच में, जब हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। तब हमारे शरीर का तापमान कम हो जाता है और गर्मी के मौसम में भी हमें हल्की सी ठंड लगने लगती है और हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। गहरी नींद में सपने नहीं होते हैं क्योंकि सपने अचेतन मन के अंदर चलते हैं जबकि हम अतिचेतन मन पर खड़े होते हैं। जहां विचार और स्वप्न दोनों नहीं होते हैं क्योंकि विचार चेतन मन में चलते हैं और सपने अचेतन मन में चलते हैं और अतिचेतन निर्विचार का केंद्र है जहां पर सिर्फ उर्जा का भंडार है। हम दिन में काम करते हैं और रात को अतिचेतन मन से फिर उर्जा ले लेते हैं। 

हम दिन में श्रम नहीं करते हैं।  काम नहीं करते हैं, सारा काम मशिनें करती है, हम अपने शरीर को थकाते नहीं हैं इसलिए हम गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं और गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं तो हमें अतिचेतन से उर्जा नहीं मिल पाती है और हम थकान, तनाव और कमजोरी महसूस करते हैं। 

यही कारण है कि कभी-कभी विचार खूब आते हैं और कभी-कभी हम निर्विचार हो जाते हैं जब घर में उत्सव हो या हमारा प्रेमी हमारे पास होता है, तब हमें निर्विचार का सन्नाटा सुनाई देता है। कभी-कभी गहरी नींद आती है उस दिन हमारे भीतर का कोई कोना जागते हुए यह सब देखता रहता है और उर्जा की कमी से ऐसा लगता है जैसे यह सब अपने से ही हो रहा है और लगता है जैसे चिजें हमारे हाथ से बाहर निकल गई हों।

सब-कांसियस के तल पर प्रवेश नहीं करने पर, गहरी नींद नहीं लेने पर ज्यादा ऊर्जा नहीं मिलने के कारण कभी-कभी हम भाव में बहने लगते हैं। क्योंकि उर्जा नहीं होने के कारण हम भावों के साक्षी नहीं हो पाते हैं, भाव को देख नहीं पाते हैं और उसमें बह जाते हैं। यदि हम गहरी नींद में जाकर अतिचेतन मन को छूते हैं तो हमें अतिरिक्त उर्जा मिलती है और हम साक्षी होने लगते हैं। 

अतः यदि हम अपनी ऊर्जा को मेहनत करके, खर्च करते हैं। दिन में श्रम करते हैं और पसीना बहाते हैं तो हमारा गहरी नींद में सब-कांसियस मन के तल पर प्रवेश हो जाता है और वहां से हमें भरपूर उर्जा मिलती है। वह उर्जा हमें तनाव मुक्त करते हुए ध्यान में प्रवेश करवाती है। 

स्वामी ध्यान उत्सव

Read more

दुर्गा सप्तशती का विज्ञान

0

{{{ॐ}}}

                                                                  #सप्तशती

दुर्गा सप्तशती में सात सौ मंत्र और तेरह अध्याय हैं उवाच अर्ध श्लोक त्रिपाद श्लोक भी इसमें पूर्ण श्लोक की तरह ही पूर्ण संख्याकित है सप्तशती में सत्तावन उवाच जिनमें मार्कंडेय मुनि प्रथम और अंतिम अध्याय में ही आते हैं और वे पांच बार बोलते हैं।
ऋषिरूवाच २७ देव्युवाच १२ राजोवाच ४ वैश्यउवाच २ देवाऊचु ३ दुतउवाच २ ब्रम्ह्मोवाच १और भगवानुवाच १ इस प्रकार कुल ५७ उवाच  है kप्रथम नवम और द्वादश अध्याय के अलावा दस अध्यायों में प्रारंभ ऋषि वचनों से होता है प्रथम अध्याय के आरंभ करने वाले मार्कंडेय नवम के राजा सूरथ और द्वादश की देवी है।
अर्ध श्लोक ३८ त्रिपाद श्लोक ६६ त्रिपाद इस तरह से की या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमो नमः पाठ करने का यह क्रम ही मान्य होने से कृपाल त्रिपाद श्लोक माने जाते हैं पूर्ण श्लोक ५३६ से २ पुनरुक्त मंत्र हैं।
प्रथम चरित्र की देवता महाकाली हैं और उसके दृष्टा ब्रह्मा है छंद है गायत्री बीज है वाणी बीज ऐं प्रथम दृष्टि में यह संयोजन विचित्र लगता है क्योंकि इसके दृष्टा ब्रह्मा हैं oऔर बीज है वाणी बीज इस सारे संयोजन को संवारने वाला अनुशासन छंद है गायत्री ,गायत्री वाकविस्तार में एक लय है किंतु स्थूल वह मूल वातावरण की उर्वर भूमि भी है जहां एक बीज के अंकुरित एवं विकसित होने की सारी पृष्ठभूमि विद्यमान है यद्यपि बीज में अंकुरित होने की और विकास की क्षमता है फिर भी उसे प्रेरक और धारक आधार की आवश्यकता रहती है।
यह धारक क्षमता गायत्री छंद है अर्थात जिस प्रकार गणपति प्रकृति के सहज व्यवहार को संपादन करने वाली एक आधारभूत अवस्था है इसलिए उनको गौरी पुत्र कहा जाता है  शिव स्वरूप का सर्जन से मंडित करने वाली आधार एवं प्रेरक शक्ति ही गोरी है उसे विनाशक अथवास अंगारक रूप प्रदान करते समय यही शक्ति काली हो जाती है उसी प्रकार बीज को आगे की स्थितियों के लिए परिवर्तन करने वाली व्यवस्था गायत्री है और इसके स्वरूप मर्यादा एवं शैली को छंद कहा जाता है।
गायत्री हमारी धरती के वातावरण का प्रारंभिक स्तर है सारा जड़ जंगम इसी से आश्रय प्राप्त करता है इसके ऊपर सावित्री छंद है भू गर्भ में जहां बीज का निक्षेप किया जाता है वह वातावरण गायत्री है पर गायत्री का दोलन सावित्री छंद को प्रेरित करता है यह प्रेरणा ही बीज कोष को परिष्कृत करती है hपरिणाम स्वरूप उसमें सृष्टि तंतु का उद्गम होता है बीज की परम विकसित अत एव परिपक्व अवस्था अनुष्टुप छंद होती है।
यह निश्चित है कि उद्भव है तो विनाश भी है स्वर्ग और संघार पदार्थ की परिभाषा है ब्रह्मा हम विकास व विस्तार की सहज प्रक्रिया का अधिकार अधिष्ठाता मानते है उसकी सहचारणी के रूप में वाग्देवी मानी जाती है नाद ब्रह्म कहकर हम विस्तार का आधार नाथ को कहते हैं यह सारा परिवेश ज्ञान के उदय की नैसर्गिक अवस्था है यही एकमात्र कारण है कि ज्ञान ही अर्थ से इति की रूप कल्पना और अवश्यंभाविता को स्थापित करता हैं।
दूसरी बात यह भी है कि काली के अति विकराल रूप से भयभीत हुए बिना उसे पाना भाव लोक का विषय नहीं हो सकता हमारा ज्ञान सामान्य स्थिति में अनुभव की परिधि में बदला रहता है और कल्पना चाहे कितनी ही उन्नत हो अनुभव की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाती काली का जो चित्र हम देखते हैंs अथवा उसके ध्यान में वर्णित रूप की जो परिकल्पना करते हैं वह यथार्थ से बहुत छोटी होती है शास्त्रों के उपासक ओके जो लक्षण बताए गए हैं वे उसकी धारणा शक्ति एवं पात्रता का के मानक हैं काली के उपासको कि को वस्तुत भय मुक्त होना चाहिए क्योंकि वह मोह का सखा है।
जहां मोह को आशंका हुई भय उपस्थित हो जाता है और काली से अधिक भयावह कौन हो सकता है यदि साधक मोह से मुक्त नहीं हो सकता तो उसे मोह का आधार परमेश्वरी को ही मान लेना चाहिए व्यक्ति को अपने प्राण का मोह सर्वाधिक होता है मां महाकाली मोह का वध करके प्रसन्न होती है बलि के पशु का भी वध तभी किया जाता है जब वह मोहाक्रांत होकर चित्कार करता है मां प्रकृति है होने को विकृति और प्रकृति का ही परिणामी रूप है पर प्रकृति को विकृति सह्य नहीं होती जैसे किसी सफाई पसंद व्यक्ति को गंदगी अच्छी नहीं लगती वैसे ही प्रकृति स्वरूपस्थ रहना चाहती है।
जहां विकृति अपनी सीमा लांघने लगती है वही प्रकृति की भौहें तन जाती हैं और वह स्वरूपस्थ होने का उपक्रम कर बैठती है परमेश्वरी के इसी स्वभाविक लीला विलास को किसी भी आख्यान से कह दिया जाए यथार्थ है और इसलिए केवल दानव बध्य है देवता अवध्य हैं देवता प्राकृत स्तर और दानव विकृत प्रथम चरित्र की देवता काली और उसके दृष्टा मुनि ब्रह्मा यह संगति नहीं विलक्षण का का यथार्थ है संहारकारिणी को सर्जन के उषःकाल की लालिमा से मंडित करके देखने का साहस और सौंदर्य बोध ब्रह्मा में ही संभव है।
उसके विकट अट्टहास और घोर कृष्ण रूप में चमक रही दंतपंक्तियों की शुभ्रता सदगुण को कि निर्दोष दीप्ति है उसके बीज रूप में अवस्थित रहने का शौक से है उसमें लक्ष्मी का चांचल्य प्रकट रूप से नहीं है पर निष्क्रिय शव को क्रियाशील करने का बल अवश्य है aउसके पादाघात में से परमशिव क्रियामय हो उठते हैं उससे हो रहा रज स्राव रजोगुण का व्यक्त प्रतीक है शक्ति के इस प्रचंड स्वरूप को चर्मचक्षु से देख पाना संभव कहां है उसका अभिनंदन ज्ञान चक्षु के उन्मेंष से ही होता है। sabhar saki upasak Facebook wall

Read more

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

मन का विज्ञान

1

 

ध्यानी और शराबी में सिर्फ होश और बेहोशी का ही फर्क होता है - 

Ek dhyani shrab pi le to kya hoga?

ध्यान में प्रवेश करने के बाद ध्यानी के लिए शराब पीना तो दूर की बात है, शराब पीने का विचार करना ही कठिन होगा। ध्यानी शराब पीने के विषय में सोच भी नहीं सकता है। यदि ध्यानी है। यदि सही में साधक है तो उसे शराब पीने की जरूरत ही नहीं रहेगी। क्योंकि शराब में हमारा जिस भावदशा में प्रवेश होता है, ध्यानी उस भावदशा में जी रहा होता है। यानि शराब पीने के बाद हमें थोड़ी देर के लिए जो मस्ती आती है उसी मस्ती में ध्यानी जी रहा होता है। अर्थात ध्यानी चौबिस घंटे नशे वाली मस्ती में रहता है। और होश में जी रहा होता है। इसलिए उसे शराब पीने की जरूरत ही नहीं रहेगी। 

शराब हमारे शरीर में क्या परिवर्तन करती है? 

जब हम शरीर में शराब को डालते हैं तो हमारा शरीर तनाव मुक्त होने लगता है। शिथिल होने लगता है, रिलेक्स होने लगता है। क्योंकि शराब हमारे शरीर को सुलाने का काम करती है। नींद में ले जाने का काम करती है। शराब पीने के बाद हमारी श्वास गहरी होकर नाभि तक जाने लगती है और शरीर नींद की भावदशा में आ जाता है। 
और जैसे ही शरीर नींद की भावदशा में आता है हमारा चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। यानि शराब में हमारा अचेतन मन में प्रवेश होता है। 

शराब में हमारा अचेतन मन काम करता है तभी तो शराब में वह वे सारी बातें भी बता देता है जो नहीं बतानी चाहिए थीं! शराब में हम उस स्थिति में होते हैं जिस स्थिति में सम्मोहन वाली नींद में होते हैं। शराब में हम उस स्थिति में होते हैं जिस स्थिति में हम सपने वाली नींद में होते हैं। शरीर नींद में सोया हुआ है तो हमारा अचेतन सपना बनाकर दिखाता है। और सम्मोहन और शराब में शरीर जागा हुआ होता है तो सामने से सीधे तौर पर कह देता है।

शराब में हमारा अचेतन मन के तल पर प्रवेश होता है। शराब में जो आनंद है वह अचेतन मन में प्रवेश करने का आनंद है। यानि चेतन मन के सोने और अचेतन मन के जागने का आनंद है। शराब हमारे शरीर को जागते हुए उस तल पर ले जाती है जिस तल पर हम नींद में होते हैं और सपने देख रहे होते हैं। शराब में जैसे ही हमारा शरीर नींद में प्रवेश करता है उसके साथ ही हमारा चेतन मन भी सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। अतः शराब जागते हुए अचेतन मन में प्रवेश करवाती है।

ध्यान में हमारे शरीर में क्या परिवर्तन होते हैं?

ध्यान में हम शरीर को शिथिल कर विश्राम में ले जाते हैं जिससे हमारा शरीर गहरी श्वास लेते हुए नींद वाली भावदशा में आ जाता है। और ज्यों ही शरीर गहरी श्वास लेता है शरीर से तनाव हटने लगते हैं और शरीर से तनाव के हटते ही हमारे मन से भी तनाव हटने लगते हैं, जिससे चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन जाग जाता है। और हम साक्षी हो अचेतन में प्रवेश कर जाते हैं, ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं। 

ध्यान में हमारी श्वास सतत नाभि तक चलती है, जैसी नींद में चलती है, गहरी नाभि तक जाती हुई। और गहरी श्वास से शरीर तनाव मुक्त हो विश्राम में होता है। शरीर शिथिल हो कर विश्राम में होता है तो मन भी शिथिल होकर विश्राम में जाने लगता है, सोने लगता है। और जैसे ही चेतन मन सोने लगता है अचेतन मन जागने लगता है। और ध्यानी हमेशा के लिए उस भावदशा में प्रवेश करता है जिस भावदशा में शराब पीने के बाद हमारा थोड़ी देर के लिए प्रवेश होता है। 

शरीर के शांत और शिथिल होने पर हमारा अचेतन मन के तल पर प्रवेश हो जाता है। अचेतन मन में प्रवेश करने पर हम निर्विचार हो जाते हैं और आनंद से भर उठते हैं। 

शरीर को शिथिल और शांत करने के लिए हम शरीर में शराब डालते हैं ताकि हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो और हम आनंदित हो सकें। और ध्यानी श्वास को गहरी कर नाभि तक ले जाकर शरीर को शिथिल करके अचेतन मन में प्रवेश करता है। शराब में हम हम सोए हुए होते हैं और ध्यानी ध्यान में जागा हुआ होता है। यदि शराब में हम जाग जाते हैं, होश से भर जाते हैं तो हमें फिर शराब की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि हमें पता चल जाएगा कि शराब शरीर को नींद की भावदशा में लाती है तो क्यों न हम श्वास को गहरी करके शरीर को नींद वाली भावदशा में ले जाएं और हमारा अचेतन मन में प्रवेश हो और हम ध्यान को उपलब्ध हो सकें! 

ध्यानी शराब पी ले तो क्या होगा? 

ध्यानी पहले से ही उस तल पर खड़ा हुआ है जिस तल पर हमारा शराब पीने के बाद प्रवेश होता है। अचेतन मन के तल पर। और यदि ध्यानी शराब पी लेगा तो उसका शरीर और भी शिथिल होगा। वह और भी सजग हो जाएगा। और भी होश से भर जाएगा। उसका शरीर तो बेहोशी में होगा लेकिन वह भीतर पूरी तरह से जागा हुआ होगा। वह क्या कह रहा है और किससे कह रहा है इस बात का उसे पूरा बोध होगा। नशा उतरने के बाद भी उसे पता होगा कि उसने कब किससे क्या बात कही है। जबकि हम नशे में बेहोश होते हैं। हमने किससे क्या बात कही है हमें इस बात का कोई पता नहीं होता है। अतः ध्यानी और शराबी में सिर्फ होश और बेहोशी का ही फर्क होता है। 

ध्यानी के लिए शराब बाधा है क्योंकि शराब शरीर को बेहोश करके जिस तल पर ले जाती है, उस तल पर वह जागा हुआ पहले से ही खड़ा हुआ होता है। शराब अचेतन मन के तल पर प्रवेश करवाती है जबकि ध्यानी पहले से ही अचेतन मन के तल पर खड़ा हुआ होता है। अतः ध्यानी के लिए शराब पीना ठीक वैसा ही है जैसे हमने एक जोड़ी कपड़े पहने हुए हैं और उपर से एक जोड़ी कपड़े और पहन लिये हों! 

स्वामी ध्यान उत्सव

Read more

आज के भौतिक विज्ञानऔर शिव संप्रदाय

0

{{{ॐ}}}

                                                                #शाक्त_संप्रदाय

आज के भौतिक विज्ञान की विकास परंपरा का भी यदि शैली से में इतिहास लिखा जाए तो अनेक अविष्कार को के नाम ऋषि की श्रेणी में आ जाए अंतर यह रहे कि इनके सूत्रों को ने वेद मंत्रों की तरह गाया जा सकता है ना व्यवहार का विषय बनाया जा सकता है यह उस युग की विशेषता हुई रही है कि वह ज्ञान के गूढ़ रहस्यों को सजीव रखने के लिए प्राण करने की परंपरा पर आ चुका है aइतना अवश्य ताकि इस स्थल को प्राप्त करने वाले के लिए तपस्या एक सती प्रथा का पालन करने वाला ही ऋषि कहलाता था
हमारे यहां ज्ञान विज्ञान का इतिहास वेदों से प्रारंभ हुआ या शैवकाल ज्ञान की उत्कण्ठापूर्ण  ऑकुलता की अवस्था है जिसमें मानव अपने इतस्तत व्याप्त प्राकृतिक क्रियाओं को देखकर चमत्कृत होता था संभव है कि देव शब्द इसी युग का सामना सर्वमान्य स्तर रहा हो जो व्यक्ति की क्षमताओं से अधिक अथवा लोकप्रकृति के व्यवहार को चक्षु विस्फारण के साथ देखता रहा था और उसमें विलास से विभोर  होता रहा था।
इन प्राकृतिक स्थितियों से वह भयभीत नहीं होता था सागर के दृष्टिविहीन विस्तार बादलों में चमकती हुई बिजलियां अग्नि की वन विनाशक लपटों को देखकर वह भयभीत नहीं वह प्रयुक्त आनंदित होकर उसकी स्तुति करने लगा इन व्यवहारों की उग्रता को उसने विरुद्ध प्रस्थितियों का विनाश करने वाला माना इसी तरह समाज प्रकृति के निकट रहा प्रकृति के प्रकोप से वह परिचित अवश्य था किंतु प्रार्थना से उसे अपने अनुकूल करने के लिए प्रयोग भी कर चुका था।
वेदों की ऋचाओं को अधिक मुखर करने के लिए उस युग में  वेदी को अपना परीक्षण स्थल बनाया वेद के साथ वेदी का संबंध संवत जुड़ना भी चाहिए क्योंकि उन विचारों का परीक्षण वेदी पर ही संभव था उपयोग का श्रेष्ठ अविष्कार अग्नि था सूर्य के रूप में ब्रह्मांड को ताप प्रकाश देने वाले विराट पिंड से उसके छोटे-मोटे काम संभव नहीं थे इसलिए उसने तेजस को लघुत्तम रूप में प्रकट करके वैश्वानर रूप दिया वेद में सर्वप्रथम अग्नि की ही स्तुति है #अग्निमीले_पुरोहितमं_देवानाम्_ऋत्विजं यह ऋग्वेद की प्रथम रिचा है रसायन शास्त्र की दृष्टि में रासायनिक परिवर्तन करने वाला सबसे विश्वस्त अर्जेंट अग्नि ही है अग्नि के अविष्कार से मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
वेद पौरूषय है अथवा अपौरूषय परन्तु ज्ञान अपनी शाश्वत अवस्था मे स्थिर एव अव्यय है अर्थात प्रकृति में जो कुछ घट रहा है अथवा घट सकता है उसकी एक व्यवस्था है एक शैली है इस शैली को समझना ही ज्ञान है यह शैली स्टूल भाव और अध्यात्मिक स्त्रोत पर अनंत विद हो जाती है प्रकृति की परिसीमा में होने वाला प्रत्येक कार्य व्यापार प्रकृति है फिर चाहे वह वैज्ञानिक हो साहित्यिक हो सामाजिक हो अथवा राजनैतिक हो उसमें सूक्ष्म रूप से प्रकृति सहज रूप में प्रवहित है।
इस दृष्टि से ज्ञान का यह स्वरूप वेद वेद शब्द का अर्थ विज्ञान ही होता है अपौरूषय होता है किंतु इस रहस्य को जब व्यक्ति अपने ढंग से अपनी आवश्यकता आग्रहो से प्रेरित होकर अविषकृत करता हैs तू यह रूप पौरूषय हो जाता है वेद भले ही ब्रह्मा के हाथ में रहे हो पर उनको सर्वश्रव्य बनाने वाला मनुष्य ही रहा है वेद मंत्रों के अविष्कर्ता अनेक ऋषि रहे हैं इसलिए यह ऋचायें सूक्ष्म रूप मैं अपने मूल स्तर पर अपौरूषय रही किंतु इनको अभी वक्त करने का श्रेय मनुष्य को ही दिया जा सकता है इस पूरे युग में अनेक चिंतक विज्ञान वादी रहे जो अपनी तरह से प्रकृति के रहस्य को समझाते समझते रहे उनका यह अनुसंधान चिंतन के स्तर पर अधिक प्रखर था और चिंतन को अथवा अविष्कार के सूत्रों को वे शब्द के माध्यम से प्रकट कर सकते थे इसलिए प्रत्येक ऋचा के साथ छंद अनिवार्य रूप में जुड़ता चला गया उसी अविष्कार का जो लक्ष्य था उसे देवता का नाम दे दिया गया आज के भौतिक विज्ञान की विकास परंपरा का भी यदि इस शैली में इतिहास लिखा जाए तो अनेक इस अविष्कारको के नाम ऋषि की श्रेणी में आ जाए।
घी अग्नि को तर्पण करने वाले वैदिक संप्रदाय ने जागतिक द्वंदो और चंचलता से उठकर ज्ञान को भौतिक लक्ष्यों से जोड़ दिया वेदी पर उसके परीक्षण चलते रहे सामाजिक व्यवस्था और राष्ट्रीय समृद्धि के लिए वह गहन अनुसंधान करता रहा किंतु अपने लिए वह मुक्ति को ही श्रेयस्कर मानता रहा संभव है hइसीलिए वेद को उसने ब्रह्मा के हाथ में थमा दिया और विद्या का लक्ष्य उसने विमुक्ति मान लिया इसी दृष्टि से वेद आत्मज्ञान और वेदी सामाजिक भौतिक उत्थान का आधार बन गए वेदी पर घी और वनस्पति का होम ही नहीं किया गया गोमेध अश्वमेघ जैसे प्रयोग भी किए गए।
इस युग में अकल्पित उत्कर्ष प्राप्त किया आने वाले लोगों का मार्गदर्शन भी किया किंतु सारे प्राकृत प्रतीकों को पुरुष के रूप में ही स्थापित किया सूर्य चंद्रमा इंद्र वरुण ब्रह्मा विष्णु रूद्र आदि देव पुरुष प्रकृति ही थे इस परंपरा का व्यक्ति के सोच और शैली पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर पुरुष को प्रधानता दी और स्त्री को  उपेक्षित मान लिया इसी तरह से स्त्री को पुरुष की अनुवर्तिनी आज्ञाकारिणी घोषित करके उसको घर गृहस्थ की सीमा में बांध दिया चिंतन अथवा अविष्कार के क्षेत्र में उसका प्रवेश वर्जित कर दिया गया अपने अहंकार से पीड़ित होकर उसने स्त्रियों को वेदाभ्यास से वंचित कर दिया इसी का परिणाम था कि स्मृति युग में ने बड़े गर्व से घोषणा कर दी #न_स्त्री_स्वातन्त्र्यमर्हति
यह स्वाभाविक है कि ज्ञान विज्ञान की सदस्यता के फल स्वरुप व्यक्ति में अहंकार का उदय ही हो जाता है उस युग में भी इस ज्ञान का अर्जन कर रहे वर्ग में अहंकार का बीज अंकुरित होने लगा था शासकवर्ग के बाहुबल उसे आवश्यकता थी तथा उनमें से कई एक इस क्षेत्र में भी आ रहे थे इसलिए क्षत्रिय के रूप में मान्यता देकर अपने समकक्ष बिठा लिया ।क्षत्रिय का अर्थ होता है  जो क्षति से बचाए  oइस वर्णोपाधि को क्षत्रियवर्ण ने बड़े उत्साह और अभिमान से लिया  वह समाज को हर प्रकार की क्षति से बचाने के लिए अपने आप को नैतिक रूप से उत्तरदाई समझ बैठा ।
विचारक और बाहुबली से ही समाज का काम नहीं चलता इसलिए तीसरा वर्ग जो व्यावसायिक बुद्धि का था और उसे इस पंक्ति में  बिठा लिया गया आर्थिक गणित अर्थ च व्यापार वृत्ति इस वर्ग का विषय बना राजा की अधीनता और ब्राह्मण की श्रेष्ठता को इस वर्ग ने सहज भाव से स्वीकार कर लिया इसे अपने लाभ से मतलब था राजा की आज्ञा को स्वीकारने की और ब्राह्मण के पैर धोने से इसे क्या अंतर पड़ता था इस तरह यह तीनों परस्पर पूर्वक बनकर समाज में अधिष्ठत हो गए इनसे भिन्न को उन्होंने शूद्र कह दिया
यूरोप के इतिहास में जो स्थिति देशों की थी वैसी ही इस शूद्र वर्ग की भी रही है अंतर यह रहा कि इनको सामाजिक एवं परिवारिक अंग की तरह मानते हुए अपने क्षेत्र तक सीमित रहने की मर्यादा बांधी गई होना यह चाहिए था कि कर्म का विभाजन करने के बाद उनको भी समानता का स्तर दिया जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ ब्राह्मण के घर में जन्म लेने मात्र से व्यक्ति को पूजनीय मान लेने की परंपरा ने इन वर्गों को अनपेक्षित अहंकार से भर दिया और यह कर्म की महत्वता के स्थान पर जाति को ही महत्व देने लगे।
 मनुष्य की जाति मनुष्य है प्रकृति उसे मनुष्य की संज्ञा देती है उसे अपने कर्म और व्यवहार से अपने को सिद्ध करना पड़ता है किंतु इस मूल सिद्धांत को भूलकर जाति का  प्रमाण मान लेने से कई तरह के विकार पनपने लगे परिणाम यह रहा कि शताब्दियों अथवा सहस्त्राब्दियों तक एक भी शुद्ध अपनी तरफ से कोई अविष्कार नहीं कर सका अन्यथा बुद्धि तो सभी को मिलती है इस वर्ग से भी कोई प्रतिभा संपन्न व्यक्ति होता तो उसको अवसर अवश्य मिलना चाहिए था पर यह तिगड़ा अपने भय से आहत ही रहा और तो और यदि शूद्र वेद वचनों को सुन ले तो उसको कठोरतम दंड दिया जाए इस प्रकार की व्यवस्था को सामाजिक आचरण में डाल दिया गया समाज में ही इस तरह का विभाजन करके अलंध्य खाई बना दी गई कर्म के कारण और वर्ण विभाग किया गया उस जाति तक सीमित कर दिया गया त्रेता युग में राम राज्य में शंबूक वध किस तरह की सामाजिक व्यवस्था का उद्धरण प्रस्तुत करता है यह विचारणीय हैk
यह पोस्ट श्री गोविंद शास्त्री चौंमू के विचारों से प्रभावित होकर यहां प्रस्तुत की गई है आगे की पोस्ट में  शाक्तदर्शन वह दुर्गा सप्तशती पाठ का विवरण भी इन्हीं के द्वारा लिखी गई पुस्तक से ही होगा। sabhar sakti upasak Facebook wall

Read more

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv