Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Comments

You might like

Subscribe Us

सोमवार, 22 मार्च 2021

ध्यान जीवन का सबसे बड़ा आनंद

0


********************************************
ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से,कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं- वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है, वह ध्यान है।

इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं - मौन की, शांति की- जब सब थम जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है। धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है।

मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गये हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अद्भुत मौन दिखेगा, अद्भुत निर्दोषतादिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना होगा। और धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषिता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा- एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुन: उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है, इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है, तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है- हमने इस पहले जाना है। लेकिन हम भूल गये हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन हम जरा खोदें तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते, उसे हम केवल भूल सकते हैं।

हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारी वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहें हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।
ओशो

Rajesh Saini

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

vigyan ke naye samachar ke liye dekhe

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv