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गुरुवार, 27 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है

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साधारण काम-कृत्य में दो उत्तेजित प्राणी मिलते है जो तनाव से भरे हैं ;उत्तेजित है ,स्वयं को भार मुक्त करने में प्रयत्न शील हैं। साधारण काम-कृत्य  पागलपन लगता है। तांत्रिक काम-कृत्य एक गहरा तनावशून्य ध्यान है।


इसमें कोई शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि शक्ति प्राप्त होती है। तुम्हें इस बात का ख्याल भी नहीं होगा लेकिन यह एक जैविक जीव-ऊर्जा का एक तथ्य है कि स्त्री और पुरुष दो विपरीत शक्तियां हैं।


धन और ऋण; यिन और यैग, या जो कुछ भी तुम उन्हें नाम दो। वे दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती हैं और जब वे दोनों गहन शिथिलता में मिलते हैं तो एक दूसरे को पुन: जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं। 


वे दोनों एक दूसरे में जीवन संचार करते हैं वे दोनों और युवा हो जाते हैं वे दोनों और अधिक सजीवता अनुभव करते हैं वे दोनों नव-शक्ति से कांतिमय हो जाते हैं। और नष्ट कुछ भी नहीं होता।


दो विपरीत ध्रुवों के मिलन से नव शक्ति का संचार होने लगता है। तांत्रिक काम कृत्य उतना किया जा सकता है जितना तुम करना चाहते हो। साधारण काम कृत्य उतना नहीं किया जा सकता जितना तुम करना चाहते हो।


क्योंकि उसमें तुम्हारी ऊर्जा नष्ट हो रही है और तुम्हारे शरीर को उसे पुन: प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और जब फिर प्राप्त होगी तभी तुम उसे फिर गंवा सकते हो।


यह बात अजीब-सी लगती है सारा जीवन इसे खर्च करने और फिर प्राप्त करने में ही व्यतीत हो जाता है। यहकेवल ग्रस्तता/ आब्सेशन है। दूसरी बात जो स्मरण रखने योग्य है। तुमने इस बात पर गौर नहीं किया होगा।


कि अगर तुम पशु-पक्षियों को देखो तो तुम उन्हें काम- कृत्य का आनंद लेते कभी न पाओगे। बंदरों, कुत्तों या किसी भी पशु को देखो–तुम ऐसा कभी नहीं देखोगे कि वे काम-कृत्य करते हुए हर्षित हो रहे हैं ,आनंदित हो रहे हैं।


उनके लिए यह एक यांत्रिक कृत्य है.. कोई प्राकृतिक शक्ति उन्हें इस कर्म में धकेल रही है। उनके चेहरे देखो। वहां कोई आनंद की झलक नहीं–जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा विवश करती है।


जब ऊर्जा अतिशय हो जाती है वे बाहर फेंक देते हैं। पशु कभी इसका आनंद नहीं उठा सकते–केवल मनुष्य ही इसका आनंद ले सकता है। और जितनी गहराई से आनंद उठा सकते हो उतनी ही तुममें मानवता का जन्म होता है।


और अगर कहीं काम कृत्य ध्यान बन जाए तो तुम उच्चतम शिखर को छूने में समर्थ हो जाते हो। लेकिन याद रखो, तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है। यह शिखर का अनुभव नहीं है यह घाटी का अनुभव है।


तुम उत्तेजना में शिखर की ओर बढ़ते हो और फिर धड़ाम से नीचे गिर जाते हो और फिर हाथ आती है खिन्नता। तुम ऊंचे शिखर से गिर पड़ते हो। तंत्र-काम कृत्य में तुम ऐसा कभी अनुभव नहीं करते।


तुम नीचे नहीं गिर रहे। तुम और इसके आगे नीचे नहीं गिर सकते–तुम घाटी में ही थे। बल्कि तुम ऊपर उठ रहे हो। तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम ऊर्जा से भर गए हो ।तुम और सजीव, ओजस्वी, कांतिमय हो गए हो। 


और वह आनंद कई घंटों तक यहां तक कि कई दिनों तक बना रहेगा। यह सब इस बात पर आश्रित है कि तुम इस कृत्य में कितना गहरे जा पाए थे।और अगर तुम देर-अबेर इसमें गति कर सको तो तुम जान सकोगे।


वीर्य-स्खलन से ऊर्जा नष्ट होती है। इसकी आवश्यकता ही नहीं है–जब तक तुम्हें बच्चों की आवश्यकता नहीं है। और सारा दिन तुम एक गहन शिथिलता, एक गहन विश्रांति महसूस करोगे।


और कई दिनों तक तुम्हें एक ऐसे सुख का अनुभव होगा जैसे तुम घर पहुंच गए हो तुम्हें अहिंसा, अविरोध, अखिन्नता की मीठी प्रतीति होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बन सकता। 


अगर संभव होगा तो वह दूसरों को प्रसन्न रखने मेंसहायक होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकेगा तो कम से कम किसी को दुख न देगा। केवल तंत्र ही नये मनुष्य का निर्माण कर सकता है।


एक ऐसा मनुष्य जिसने समय -शून्यता, निरहंकारिता का जान लिया है और अब अस्तित्व के साथ गहरा अद्वैत विकसित होगा। एक दूसरा आयाम खुल गया है। अब वह घड़ी दूर नहीं जब काम-वासना तिरोहित हो जाएगी। 


जब काम वासना अनजाने ही विलीन हो जाती है तब अचानक एक दिन तुम्हें ज्ञात होता है कि काम-वासना तिरोहित हो गई है और तब ब्रह्मचर्य का जन्म होता है।


लेकिन गलत शिक्षा के कारण कठिन और दुःसाध्य लगती है। और तुम भयभीत भी हो अपने मन के संस्कारों के कारण।


                                              

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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

पांचवां शिवसूत्र-"उद्यमो भैरव:''

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1-भगवान   शिव कहते है "उद्यमो भैरव:''-उद्यम ही भैरव है।उद्यम का अर्थ है प्रगाढ़ श्रम। उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस  संसार रूपी कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो।जो चेष्टा /Effort करता है, वही भैरव है। भैरव शब्द पारिभाषिक है।’भ' का अर्थ है 'भरण';'र' का अर्थ है रवण;और  'व' का अर्थ है वमन। भरण का अर्थ है Maintenance , रवण का अर्थ है संहार, और वमन का अर्थ है फैलाना।मूल अस्तित्व का नाम भैरव है।हिंदू देवताओं में भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है।भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करनेवाला। भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा विष्णु  और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव  के  गण और पार्वती के अनुचर माने जातेहैं।भैरव  नाम में दार्शनिक गुण हैं और   स्पष्ट जागरूकता और सावधान रवैया के कारण स्पष्ट अंतर्ज्ञान है। 


2-जिस दिन भी तुमने आध्यात्मिक जीवन की चेष्टा शुरू की, तुम भैरव होने लगे;अथार्त तुम परमात्‍मा के साथ एक होने लगे। तुम्हारे भीतर मुक्त होने का पहला खयाल तुम्हारी चेष्टा की पहली किरण है ,और तुमने यात्रा शुरू कर दी।मंजिल  भी ज्यादा दूर नहीं है क्योंकि पहला कदम ही करीब-करीब आधी यात्रा है।तुम्हारे भीतर जैसे ही यह भाव सघन होना शुरू हुआ कि अब मैं मूर्च्छा से बाहर  निकलूं और चैतन्य बनूं वैसे ही तुम भैरव होने लगते हो...अथार्त ब्रह्म के साथ एक होने लगे।तुम उसी सागर के झरने हो, उसी सूरज की किरण हो,  उसी महा आकाश के एक छोटे से खंड हो..मूलत: तो तुम एक हो ही।वास्तव में ,तुम एक हो ही, लेकिन सिर्फ यह स्मरण आ जाए तो तुम्हारी यात्रा प्रारभ्म हो गयी।मंजिल पहुंचने में तो समय लगेगा;लेकिन तुमने चेष्टा शुरू कर दी ।


3-चेष्टा से तुम्हारे भीतर बीज आरोपित हो जाता  हैं कि मैं  इस कारागृह रूपी संसार  से बाहर आ जाऊं, शरीर से,जन्मों की आकांक्षा ,वासना से मुक्त हो जाऊं और अब इस संसार में फंसाव के बीज न बोऊं। तुम्हें यह स्मरण आना शुरू हो जाये और दीवालें विसर्जित होने लगें, तो तुम इस महा आकाश के साथ एक हो जाओगे।बड़ी जबरदस्त चेष्टा करना जरूरी है क्योंकि गहरी नींद  है; जब तोड़ने का  सतत प्रयास   करोगे, तो ही टूट पायेगी ,आलस्य से संभव नहीं होगा।उद्यम का अर्थ है..तुम्हारी पूरी चेष्टा संलग्र हो जाये।आज तोड़ोगे, और कल फिर बना लोगे तो फिर भटकते रहोगे।लोग शिकायत करते हैं 'हम करते हैं, लेकिन कुछ हो नहीं रहा।इसका अर्थ है कि  उनके करने में कोई प्राण नहीं हैं ...इसलिए नहीं होता।शिकायत का अर्थ है कि कहीं कुछ अन्याय हो रहा है कि दूसरों को हो रहा है, हमें नहीं हो रहा है।वास्तव में ,इस जगत में अन्याय होता ही नहीं।जो भी होता है, वह न्याय ही है। क्योंकि न्याय-अन्याय करने को यहां कोई मनुष्य नहीं बैठा है।जगत में तो तटस्थ नियम हैं, उन्हीं तटस्थ नियमों का नाम धर्म है। 


4-गुरुत्वाकर्षण  के नियम न तुम्हें गिराने को उत्सुक है, न तुम्हें सम्हालने में उत्सुक है।जब तुम सीधे चलते हो, तो वही तुम्हें संभालता है  और जब तिरछे चलते हो, तो वही तुम्हें गिराता है।न उसकी कोई गिराने कीआकांक्षा है, न सम्हालने की।वह परम नियम है... तटस्थ है और तुम्हारी तरह पक्षपात नहीं करता कि किसी को गिरा दे, किसी को उठा दे। तुम जैसे ही ठीक चलने लगते हो, वह तुम्हें संभालता है।तुम गिरना चाहते हो तो ही वह तुम्हें गिराता है।वह हर हालत में उपलब्ध है ;उसके द्वार बंद नहीं है।तुम दरवाजा खोलकर भीतर जाना चाहते हो,तो भीतर चले जाओ या दरवाजे से सिर ठोकना चाहते हो,तो सिर ठोक लो।उद्यम भैरव है और इसके लिए महान श्रम चाहिए।श्रम में तुम्हारी समग्रता लग जाये...तब तुम्हारे भैरव हो जाने में देर न लगेगी।भैरव का प्रतीकात्मक अर्थ है.... ब्रह्म जो धारण किये है, जो सम्हाले है, जिसमें हम पैदा होंगे, और जिसमें हम मिटेंगे।जो सृष्टि का Origin  है और जिसमें प्रलय भी होगा। 


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कुण्डलिनी जागरण का दुसरा उपाय

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 {{{ॐ}}}


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कुण्डलिनी जागरणका दुसरा उपाय है नियमित मंत्र जप। यह एक बहुत ही शक्तिशाली , सरल एवं निरापद मार्ग है परन्तु निस्संदेह यह एक साधना है जिसमें अपेक्षा कृत अधिक समय तथा धैर्य की आवश्यकता होती है ।

पहलेतो मंत्र और योग के किसी ऐसे योग्य गुरू से अनुकूल मंत्र लेना होता है जो साधना मार्ग  में पथ प्रदर्शन कर सके।

जब आप मंत्र का निरन्तर अभ्यास करते रहते है तो आंतरिक शक्ति में वृद्धि होती है इससे जीवन मे तटस्थ रहने के दृष्टिकोण का विकास होता है।

जिस प्रकार किसी शांत झील मे कंकड  फेंकने पर उसमे तरंगे उत्पन्न होती है उसी प्रकार  मंत्र को बार बार दोहराने से मन रूपी समुद्र मे भी तरंगें उत्पन्न होती है लाखों करोडों बार उसी मंत्र को दोहराने से मस्तिक का कोना कोना उससे झंकृत हो जाता है । इससे आपके शारीरिक , मानसिक एवं  आध्यात्मिक तीनो स्तरो का शुद्धिकरण हो जाता है।

मंत्र का उच्चारण मानसिक और मनोविज्ञानिक स्तरो पर ध्वनि मे मंद गति से किया जाना चाहिए ।। इन चारो स्थितियों मे मंत्र का अभ्यास करने से कुण्डलिनी जागरण  बिना परेशानी  के सही ढगं से होता है मंत्र को श्वास के साथ मानसिक रूप से दोहराया जा सकता है  और कीर्तन  भी जा सकता है उससे मुलाधार पर भी काफी प्रभाव पडता है जहॉ से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है।

स्वर अथवा संगीत के द्वारा कुण्डलिनी जागरण  भी लगभग मंत्रयोग की तरह  ही है जिसे नादयोग कहते है इससे ध्वनियां बीच मंत्रो की तरह कार्य करती है क्यो कि संगीत मे राग अथवा सुर  चक्र विशेष से संबधित है। जागरण का यह सबसे सौम्य ढगं है। sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

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शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

योग मुद्रा के बारे में जानकारी

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श्री कृष्ण ने अर्जुन को 13 प्रकार के योग मुद्रा के बारे में जानकारी देकर उनके मन के मैल को साफ किया था। भागवत गीता में उल्लेखित प्रमुख 13 योग है..


1-विषाद योग :- विषाद यानी दुख। युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने अपनो को सामने देखा तो वह विषाद योग से भर गए। उनके मन में निराशा और अपनो के नाश का भय हावी होने लगा। 


तब भगवान श्रीकष्ण ने अर्जुन के मन से यह भय दूर करने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वही गीता बनीं। उन्होंने सर्वप्रथम विषाद योग से अर्जुन को दूर किया और युद्ध के लिए तैयार किया था।

 

2-सांख्य योग :- सांख्य योग के जरिये भगवान श्रीकृष्ण ने पुरुष की प्रकृति और उसके अंदर मौजूद तत्वों के बारे में समझाया। उन्होनें अर्जुन को बताया कि मनुष्य को जब भी लगे कि उस पर दुख या विषाद हावी हो रहा है ।


उसे सांख्य योग यानी पुरुष प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए। मनुष्य पांच सांख्य से बना है, आग, पानी, मिट्टी, हवा। अंत में मनुष्य इसी में मिलता है।


3-कर्म योग:- भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जीवन में सबसे बड़ा योग कर्म योग है। इस योग से देवता भी नहीं बच सकते। कर्म योग से सभी बंधे हैं। सभी को कर्म करना है। इस बंधन से कोई मुक्त नहीं हो सकता है।


साथ ही यह भी समझाया की कर्म करना मनुष्य का पहला धर्म है। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि सूर्य और चंद्रमा भी अपने कर्म मार्ग पर निरंतर प्रशस्त रहते हैं। तुम्हें भी कर्मशील बनना होगा।


4-ज्ञान योग:- भगवान श्रीकृष्ण अजुर्न से कहा कि ज्ञान अमृत समान होता है। इसे जो पी लेता है उसे कभी कोई बंधन नहीं बांध सकता। 


ज्ञान से बढ़कर इस दुनिया में कोई चीज़ नहीं होती है। ज्ञान मनुष्य को कर्म बंधनों में रहकर भी भौतिक संसर्ग से विमुक्त बना देता है।


5-कर्म वैराग्य योग:- भगवान ने अर्जुन को बताया कि कर्म से कोई मुक्त नहीं, यह सच है, लेकिन कर्म को कभी कुछ पाने या फल पाने के लिए नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिए।


यह सोचे बिना कि इसका फल उसे कब मिलेगा या क्या मिलेगा। कर्म के फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। ईश्वर बुरे कर्मों का बुरा फल और अच्छे कर्मों का अच्छा फल देते हैं।


6-ध्यान योग:- ध्यान योग से मनुष्य खुद को मूल्यांकन करना सीखता है। इस योग को करना हर किसी के लिए जरूरी है। 


ध्यान योग में मन और मस्तिष्क का मिलन होता है और ऐसी स्थिति में दोनों ही शांत होते हैं और विचलित नहीं होते। ध्यान योग मनुष्य को शांत और विचारशील बनता है।


7-विज्ञान योग:- इस योग में मनष्य किसी खोज पर निकलता है। सत्य की खोज विज्ञान योग का ही अंग है। इस मार्ग पर बिना किसी संकोच के मनुष्य को चलना चाहिए। विज्ञान योग तप योग की ओर अग्रसर होता है।


8-अक्षर ब्रह्म योग:- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अक्षर ब्रह्म योग की प्राप्ति से ही ब्रह्मा, अधिदेव, अध्यात्म और आत्म संयम की प्राप्ति होती है। मनुष्य को अपने भौतिक जीवन का निर्वाह शून्य से करना चाहिए।


अक्षर ब्रह्म योग के लिए मनुष्य को अपने अंदर के हर विचार और सोच को बाहर करना होता है। नए सिरे से मन को शुद्ध कर इस योग को कराना होता है।


9-राज विद्या गुह्य योग:- इस योग में स्थिर रहकर व्यक्ति परम ब्रह्म का ज्ञानी होता है। मनुष्य को परम ज्ञान प्राप्ति के लिए राज विद्या गुह्य योग का आत्मसात करना चाहिए। इसे करने वाला हर बंधनों से मुक्त हो सकता है।


10-विभूति विस्तार योग:- मनुष्य विभूति विस्तार योग के जरिये ही ईश्वर के नजदीक पहुंचता है। इस योग के माध्यम से साधक ब्रह्म में लीन हो कर अपने ईश्वर मार्ग पर प्रशस्त  होता है।


11-विश्वरूप दर्शन योग:-इस योग को मनुष्य जब कर लेता है तब उसे ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन होता है। ये अनंत योग माना गया है। ईश्वर तक विराट रूप योग के माध्यम से अपना रूप प्राप्त किए हैं।


12-भक्ति योग:- भक्ति योग ईश्वर प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ योग है। बिना इस योग के भगवान नहीं मिल सकते। जिस मनुष्य में भक्ति नहीं होती उसे भगवान कभी नहीं मिलते।


13-क्षेत्र विभाग योग:- क्षेत्र विभाग योग ही वह जरिया है जिसे जरिये मनुष्य आत्मा, परमात्मा और ज्ञान के गूढ़ रहस्य को जान पाता है। इस योग में समा जाने वाले ही साधक योगी होते हैं।


भगवत गीता में वर्णित ये योग, मौजूदा समय में मनुष्य की जरूरत हैं। इसे अपनाने वाला ही असल मायने में अपने जीवन को पूर्ण रूप से जी पाता है।


योगी वह है जो पिण्ड के अन्दर जीव का आत्मा से मिलन (हंसो) साधना के माध्यम (स्वांस-प्रस्वांस) से करते हैं।  ज्ञानी या तत्वज्ञानी वह है जो ब्रह्माण्ड के अन्दर मानव का अवतार से मिलन तत्त्वज्ञान के माध्यम से करते हैं।


योगी अपने लक्ष्य रूप आत्मा की प्राप्ति हेतु अपने मन को इन्द्रिय रूपी गोलकों से अथार्त बहिर्मुखी से हटाकर /खींचकर अंतर्मुखी बनाते हुये स्वास-प्रस्वास में लगाकर जीव को समाधि अवस्था में आत्मा से मिलन करता है।


ये समस्त क्रियाएँ पिण्ड में होती, पिण्ड से बाहर योगी की कोई क्रिया-प्रक्रिया नहीं होती है। परन्तु तत्त्वज्ञानी अपने लक्ष्य रूप परमात्मा की प्राप्ति हेतु अपने जीवात्मा से युक्त शरीर /पिण्ड को सम्बन्ध।


ममता-आसक्ति रूपी सम्बन्धियों से मोह आदि से हटाकर पूर्णतः समर्पण /शरणागत होते हुये सत्संग एवं धर्म संस्थापनार्थ अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति को लगाते हुये अनुगामी के रूप में रहता है।


योगी का कार्यक्षेत्र मात्र एक पिण्ड के अन्तर्गत ही रहता है परन्तु ज्ञानी का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है। योगी ‘अहम्’ रूप जीव को आत्मा से मिलाकर जीवात्मा (हंसो) भाव से मात्र समाधि अवस्था तक ही रहता है।


परन्तु ज्ञानी ‘अहम्’ रूप जीव को ‘सः’ रूप आत्मा से मिलाते हुये परमात्मा से मिलाकर शरणागत भाव से शाश्वत् अद्वैत्तत्त्वबोध रूप में हो जाता है।


योगी-मात्र समाधि में ही आत्मामय (हंसो) रूप में रहता है, जैसे ही समाधि टूटती है, वह पुनः सोsहं रूप होते हुये अहंकारी रूप ‘अहम्’ तत्पश्चात् शरीर में फँस जाता है।


ठीक इसी प्रकार ज्ञानी शरणागत रूप में ही ‘मुक्त’ अमरता, परमपद, परमतत्त्वमय, पापमुक्त, बन्धन मुक्त, सच्चिदानन्दमय (आत्मतत्त्वम्) रूप में रहता है परन्तु शरणागतभाव के टूटते ही वह पुनः मिथ्याज्ञानभिमानी रूप ‘अहम्’ शरीर में फँस जाता है।


जहाँ पर दो नदियाँ मिलकर तीसरा रूप लेकर बहती हैं तो वह मिलन-स्थल ही संगम है। परन्तु जहाँ पर तीनों नदियाँ- गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हों, उसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता।  


उसमें भी जहाँ अक्षय-वट हो, वह भी भारद्वाज ऋषि जैसे उपदेशक के साथ, तो उसकी महिमा में चार चाँद ही ला देता है। परन्तु यह सारी महिमा मात्र कर्मकांडियों के लिए ही है।


योगियों-महात्माओं और ज्ञानियों के लिए नहीं, क्योंकि कर्म-कांड की मर्यादा तभी तक रहती है, जब तक कि योग-साधना नहीं की जाती और ज्ञान में तो ये कर्मकांडी और योगी-महात्मा सभी आकर विलय कर जाते हैं।


भगवद गीता अध्याय: 6 श्लोक 46 में श्री कृष्ण कहते है 


तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

 कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥


योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ  है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ  sabhar Facebook wall yog shadhana kundalni

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बुधवार, 19 जनवरी 2022

योनिवर्ग और कलाशरीरम

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1-भगवान   शिव कहते है 'योनिवर्ग और कलाशरीरम'... योनिवर्ग और कला शरीर है।योनि से अर्थ है  प्रकृति और प्रकृति  ही शरीर देती है।कला का अर्थ है ..कर्त्ता का भाव। एक ही कला है और वह  है संसार में उतरने की कला अथार्त कर्त्ता का भाव। इन दो चीजों से मिलकर तुम्हारा शरीर निर्मित होता है ...तुम्हारा कर्त्ता का भाव, तुम्हारा अहंकार, और प्रकृति से मिला हुआ शरीर। अगर तुम्हारे भीतर कर्ता का भाव है, तो प्रकृति तुम्हें योग्य शरीर देती चली जायेगी।प्रकृति तो सिर्फ योनि है ...गर्भ है। तुम्हारा अहंकार उस योनि में बीज बनता है। तुम्हारे कर्तृत्व का भाव, कि मैं यह करूं, मैं यह पाऊं, मैं यह हो जाऊं ..उसमें बीज बनता है। और जहां भी तुम्हारे कर्तृत्व का कला और प्रकृति की योनि का मिलन होता है, शरीर निर्मित हो जाता है।  तुम बार बार जन्मे हो। कभी तुम पशु थे, कभी पक्षी थे, कभी वृक्ष थे, कभी मनुष्य ..तुमने जो चाहा है, वह तुम्हें मिला है। 


2-तुमने जो आकांक्षा की है,  जो कर्तृत्व की वासना की है, वही घट गया है। तुम्हारे कर्तृत्व की वासना घटना बन जाती है और विचार वस्तुएं बन जाते हैं। इसलिए सोच विचारकर वासना करना है क्योंकि देर अबेर सभी वासनाएं पूरी हो जाती हैं।


अगर तुम बहुत बार आकाश में पक्षी को  देखते हो और सोचते हो कि कैसी स्वतंत्रता है पक्षी को ..काश हम पक्षी होते! तो देर न लगेगी, जल्दी ही तुम पक्षी हो जाओगे।तुम जो भी वासना अपने भीतर संगृहीत करते हो, वह बीज बन जाती है।प्रकृति तो केवल शरीर देती है; स्वयं को निर्माण करने वाले कलाकार तो तुम्हीं हो।कला का अर्थ है कि अपने शरीर को तुमने ही बनाया है।तुम्हारी वासना ही शरीर निर्मित करती है।अगर हम ध्यान दे तो   रात में सोते समय जो आखिरी विचार होता है , वही सुबह उठते वक्त पहला विचार होता है। और रातभर तुम सोये रहे। वह  विचार बीज की तरह भीतर पड़ा रहा। जो अंतिम था, वह सुबह प्रथम हो गया।


3-आखिरी मरते क्षण में, तुम्हारे सारे जीवन की वासना संगृहीत होकर बीज बन' जायेगी। वही बीज नया गर्भ बन जायेगा। जहां से तुम मिटे, वहीं से तुम फिर शुरू हो जाओगे।आज तुम जो भी हो, वह तुम्हारा ही कृत्य है।इसीलिए किसी दूसरे को दोष मत देना।यहां कोई दूसरा है भी नहीं, जिसको दोष दिया जा सके। यह तुम्हारे ही कर्मों का संचित फल है। तुम जो भी हों ...रूपवान या कुरूप, दुखी या सुखी, स्री या पुरुष ... यह तुम्हारे ही कृत्यों का फल है। तुम ही अपने जीवन के कलाकार हो ।इसीलिए यह मत कहना कि भाग्य ने बनाया है; क्योंकि वह धोखा है। तुम परमात्मा पर जिम्मेवारी मत डालना; क्योंकि वह तरकीब है, खुद के दायित्व से बचने की। इस कारागृह में तुम अपने ही कारण हो। जो व्यक्ति इस बात को ठीक से समझ लेता है कि अपने ही कारण मैं यहां हूं उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।इसलिए  Enlightened One कहते हैं कि सभी वासनाओं को छोड़ दो, तभी तुम मुक्त हो सकोगे। 


4-तुमने अगर स्वर्ग की वासना की तो तुम देवता हो जाओगे, लेकिन वह भी मुक्ति न होगी। क्योंकि वासनाओं से कभी भी अशरीर की स्थिति पैदा नहीं होती; सभी वासनाओं से शरीर ही  निर्मित होता है। जब तक तुम Lustless  को उपलब्ध नहीं होते;  तब तक तुम नये शरीरों में भटकते रहोगे।भिन्न -भिन्न शरीर के ढंग अलग हों,परन्तु  शरीर की मौलिक स्थिति एक ही जैसी है।शरीर के दुख समान है; चाहे पक्षी का शरीर हो,या चाहे मनुष्य का शरीर 'हो। दुखों में कोई भेद नहीं है। क्योंकि मौलिक दुख है ..आत्मा का शरीर में बंध जाना या कारागृह में प्रविष्ट हो जाना। फिर कारागृह की दीवालें Circular  हैं या कि Triangular या  Square ...उससे  कुछ फर्क नहीं पड़ता।कारागृह, कारागृह है। पक्षी का शरीर  हो या  मनुष्य का, बहुत फर्क नहीं पड़ता। तुम  बंध गये हो.. बस वही दुख है। वासना बांधती है। वासना है रज्‍जु,अथार्त रस्सी  जिससे हम बंधते है। और ध्यान रखना है कि तुम्हारे अतिरिक्त कोई और जिम्मेवार नहीं है।


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रविवार, 16 जनवरी 2022

अजूबा ही नहीं, एक तिलिस्म है मानवी शरीर

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अपनी अंगुलियों से नापने पर 96 अंगुल लम्बे इस मनुष्य−शरीर में जो कुछ है, वह एक बढ़कर एक आश्चर्यजनक एवं रहस्यमय है।


हमारी शरीर यात्रा जिस रथ पर सवार होकर चल रही है उसके प्रत्येक अंग-अवयव या कलपुर्जे कितनी विशिष्टतायें अपने अन्दर धारण किये हुए है, इस पर हमने कभी विचार ही नहीं किया। यद्यपि हम बाहर की छोटी-मोटी चीजों को देखकर चकित हो जाते हैं और उनका बढ़ा-चढ़ा मूल्याँकन करते हैं, पर अपनी ओर, अपने छोटे-छोटे कलपुर्जों की महत्ता की ओर कभी ध्यान तक नहीं देते। यदि उस ओर भी कभी दृष्टिपात किया होता तो पता चलता कि अपने छोटे से छोटे अंग अवयव कितनी जादू जैसी विशेषता और क्रियाशीलता अपने में धारण किये हुए हैं। उन्हीं के सहयोग से हम अपना सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन जी रहे हैं।


विशिष्टता हमारी काया के रोम-रोम में संव्याप्त है। आत्मिक गरिमा तथा शरीर की सूक्ष्म एवं कारण सत्ता को जिसमें पंचकोश, पाँच प्राण, कुण्डलिनी महाशक्ति, षट्चक्र, उपत्यिकाएँ आदि सम्मिलित हैं, की गरिमा पर विचार करना पीछे के लिए छोड़कर मात्र स्थूलकाय संरचना और उसकी क्षमता पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दीखता है। वनस्पति तो क्या-मनुष्येत्तर प्राणि शरीरों में भी वे विशेषताएं नहीं मिलतीं जो मनुष्य के छोटे और बड़े अवयवों में सन्निहित हैं। कलाकार ने अपनी सारी कला को इसके निर्माण में झोंक दिया है।


शरीर रचना से लेकर मनःसंस्थान और अन्तःकरण की संवेदनाओं तक सर्वत्र असाधारण ही असाधारण दृष्टिगोचर होता है। यदि हम कल्पना करें और वैज्ञानिक दृष्टि से आँखें उघाड़ कर देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य−शरीर के निर्माण में स्रष्टा ने जो बुद्धि, कौशल खर्च किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किसी भी शरीर के लिए नहीं किया। मनुष्य सृष्टि का सबसे विलक्षण उत्पादन है। ऐसा आश्चर्य और कोई दूसरा नहीं है। यह सर्व क्षमता संपन्न जीवात्मा का अभेद्य दुर्ग, यंत्र एवं वाहन है। यह जिन कोषों से बनता है, उसमें चेतन परमाणु ही नहीं होते, वरन् दृश्य जगत में दिखाई देने वाली प्रकृति का भी उसमें योगदान है।


इससे मनुष्य−शरीर की क्षमता और मूल्य और भी बढ़ जाता है। ठोस द्रव और गैस जल, आक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन सिल्वर, सोना, लोहा, फास्फोरस आदि जो कुछ भी तत्व पृथ्वी में हैं और जो कुछ पृथ्वी में नहीं हैं, अन्य ग्रह नक्षत्रों में हैं, वह सब भी स्थूल और सूक्ष्म रूप में शरीर में है। 


जिस तरह वृक्ष में कहीं तने, कहीं पत्ते, कहीं फल एक व्यापक विस्तार में होते हैं,शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में उसी प्रकार विभिन्न लोक और लोकों की शक्तियां विद्यमान देखकर ही शास्त्रकार ने कहा था-’यत्ब्रह्माण्डेतत्पिंडे’ ब्रह्माण्ड की संपूर्ण शक्तियां मनुष्य−शरीर में विद्यमान हैं।


सूर्य चन्द्रमा, बुद्ध, बृहस्पति, उत्तरायण, दक्षिणायन मार्ग, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, विद्युत, चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण आदि सब शरीर में हैं। यह समूचा विराट् जगत अपनी इसी काया के भीतर समाया हुआ है।

आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि जो विशेषताएं और सामर्थ्य प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की हैं, वह सृष्टि के किसी भी प्राणी-शरीर को उपलब्ध नहीं।


गर्भोपनिषद् के अनुसार मानवी काया में 180 संधियाँ, 107 मर्मस्थान, 109 स्नायु, और 700 शिरायें हैं। 500 मज्जायें, 306 हड्डियाँ, साढ़े चार करोड़ रोएं, 8 पल हृदय, 12 पल जिह्वा, एक प्रस्थ पित्त, एक आढ़क कफ, एक कुड़वशुक्र, दो प्रस्थ मेद हैं। इसके अतिरिक्त आहार ग्रहण करने व मल मूत्र निष्कासन के जो अच्छे से अच्छे यंत्र इस शरीर में लगे हैं, वह अन्य किसी भी शरीर में नहीं है।


स्थूलशरीर पर दृष्टि डालने से सबसे पहले त्वचा नजर आती है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक वयस्क व्यक्ति के त्वचा का भार लगभग 9 पौण्ड होता है जो कि प्रायः मस्तिष्क से तीन गुना अधिक है। यह त्वचा 18 वर्ग फुट से भी अधिक जगह घेरे रहती है। मोटे तौर से देखने पर वह ऐसी लगती है मानों शरीर पर कोई मोमी कागज चिपका जो, परन्तु बारीकी से देखने पर पता चलता है कि उसमें भी एक पूरा सुविस्तृत कारखाना चल रहा है।


शरीर पर इसका क्षेत्रफल लगभग 250 फुट होता है। सबसे पतली वह पलकों पर होती है- .5 मिलीमीटर। पैर के तलुवों में सबसे मोटी है- 6 मिलीमीटर। साधारणतया उसकी मोटाई 0.3 से लेकर 300 मिलीमीटर तक होती है। एक वर्ग इंच त्वचा में प्रायः 72 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा रहता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा होता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट से कम न बैठेगी। यह रक्तवाहनियां सर्दी में सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती रहती है ताकि शारीरिक तापमान का संतुलन ठीक बना रहे। चमड़ी की सतह पर प्रायः 3 लाख स्वेद ग्रंथियाँ और अगणित छोटे-छोटे बारीक छिद्र होते हैं। इन रोमकूपों से लगभग एक पौण्ड पसीना प्रति दिन बाहर निकलता रहता है। त्वचा के भीतर बिखरे ज्ञान तन्तुओं को यदि एक लाइन में रख दिया जाय तो वे 45 मील लम्बे होंगे।


त्वचा से ‘सीवम’ नामक एक विशेष प्रकार का तेल निकलता रहता है। यह सुरक्षा और सौंदर्य वृद्धि के दोनों ही कार्य करता है। उसकी रंजक कोशिकायें ‘मिलेनिन’ नामक रसायन उत्पन्न करती है। यही चमड़ी को गोरे, काले भूरे आदि रंगों से रंगता रहता है। त्वचा देखने में एक प्रतीत होती है, पर उसके तीन मोटे विभाग किये जा सकते हैं- ऊपरी त्वचा, भीतरी त्वचा तथा सब क्युटेनियम टिष्यू। नीचे वाली परत में रक्त वाहिनियाँ, तंत्रिकाएँ एवं वसा के कण होते हैं। इन्हीं के द्वारा चमड़ी हड्डियों से चिपकी रहती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ जब यह वसा कण सूखने लगते हैं तो त्वचा पर झुर्रियाँ लटकने लगती हैं।


भीतरी त्वचा पर में तंत्रिकाएँ, रक्तवाहनियां रोमकूप, स्वेद ग्रंथियाँ तथा तेल ग्रंथियाँ होती हैं। इन तंत्रिकाओं को एक प्रकार से संवेदना वाहक टेलीफोन के तार कह सकते हैं। वे त्वचा स्पर्श की अनुभूतियों को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं और वहाँ के निर्देश- संदेशों को अवयवों तक पहुँचाते हैं। त्वचा कभी भी झूठ नहीं बोलती। झूठ पकड़ने की मशीन-’लाय डिटेक्टर या पोली ग्राफ मशीन’ इस सिद्धान्त पर कार्य करती है कि दुराव-छिपाव से उत्पन्न हार्मोनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप त्वचा के वैद्युतीय स्पंदन एवं रग में जो परिवर्तन या तनाव उत्पन्न होता है, वह सारे रहस्यों को उजागर कर देता है।


साँप की केंचुली सबने देखी है। जिस प्रकार सांप अपनी केंचुली बदलता है, उसी प्रकार हम भी अपनी त्वचा हर-चौथे पाँचवें दिन बदल देते हैं। होता यह है कि हमारी शारीरिक कोशिकायें करोड़ों की संख्या में प्रति मिनट के हिसाब से मरती रहती हैं और नयी कोशिकायें पैदा होती रहती हैं और इस प्रकार केंचुली बदलने का क्रम चलता रहता है। यह क्रम बहुत हलका और धीमा होने से हमें दिखाई नहीं पड़ता। इस तरह जिन्दगी भर में हमें हजारों बार अपनी चमड़ी की केंचुली बदलनी पड़ती है। यही हाल आँतरिक अवयवों का भी है। किसी अवयव का कायाकल्प जल्दी-जल्दी होता है तो किसी का देर में धीमे-धीमे।

यह परिवर्तन अपनी पूर्वज कोशिकाओं के अनुरूप ही होता है, अतः अंतर न पड़ने से यह प्रतीत नहीं होता कि पुरानी के चले जाने और नयी स्थानापन्न होने जैसा कुछ परिवर्तन हुआ है।


त्वचा के भीतर प्रवेश करें तो मांसपेशियों का सुदृढ़ ढांचा खड़ा मिलता है। उन्हीं के आधार पर शरीर का हिलना डुलना, मुड़ना, चलना, फिरना संभव हो रहा है।शरीर की सुन्दरता, सुदृढ़ता और सुडौलता बहुत करके मांसपेशियों की संतुलित स्थिति पर ही निर्भर रहती है। मांसपेशियों की बनावट एवं वजन के हिसाब से ही मोटे और पतले आदमियों की पहचान होती है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में 600 से अधिक मांसपेशियां होती हैं और उनमें से प्रत्येक के अपने विशिष्ट कार्य होते हैं। इनमें से कितनी ही अविराम गति से जीवन पर्यंत तक अपने कार्य में जुटी रहती हैं, यहाँ तक कि सोते समय भी, जैसे कि हृदय का धड़कना, फेफड़ों का सिकुड़ना-फैलना, रक्त संचार, आहार का पचना आदि की क्रियायें अनवरत रूप से चलती रहती हैं।

30 माँस पेशियां ऐसी होती हैं जो खोपड़ी की हड्डियों से जुड़ी होती है और चेहरे भाव परिवर्तन में सहायता करती हैं। शैशव अवस्था में प्रथम तीन वर्ष तक मांसपेशियों का विकास हड्डियों से भी अधिक दो गुनी तीव्र गति से होता है इसके बाद विकास की गति कुछ धीमी पड़ जाती है जब शरीर में अचानक परिवर्तन उभरते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। संरचना में प्रत्येक मांसपेशी अनेकों तन्तुओं से मिलकर बनी होती है। वे बाल से भी पतले होते हैं, पर मजबूत इतने कि अपने वजन की तुलना में एक लाख अधिक भारी वजन उठा सके।


इन अवयवों में से जिस पर भी तनिक गहराई से विचार करें तो उसी में विशेषताओं का भण्डार भरा दीखता है। यहाँ तक कि बाल जैसी निर्जीव और बार-बार खर-पतवार की तरह उखाड़-काट कर फेंक दी जाने वाली वस्तु भी अपने आप में अद्भुत हैं।


प्रत्येक मनुष्य का शरीर असंख्य बालों से (लगभग साढ़े चार करोड़) ढका होता है, यद्यपि वे सिर के बालों की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं। सिर में औसतन 120000 बाल होते हैं। प्रत्येक बाल त्वचा से एक नन्हें गढ्ढे से निकला है जिसे रोमकूप कहते हैं। यहीं से बालों को पोषण होता है। बालों की वृद्धि प्रतिमास तीन चौथाई इंच होती है, इसके बाद वह घटती जाती है। जब बाल दो वर्ष के हो जाते हैं तो उनकी गति प्रायः रुक जाती है। किसी के बाल तेजी से और किसी के धीमी गति से बढ़ते हैं। प्रत्येक सामान्य बाल की जीवन-अवधि लगभग 3 वर्ष होती है, जब कि आँख की बरोनियों की प्रायः 150 दिन ही होती है। आयु पूरी करके बाल अपनी जड़ से टूट जाते हैं और उसके स्थान पर नया बाल उगता है।


शरीर के आन्तरिक अवयवों की रचना तो और भी विलक्षण होती है। उसकी सबसे बड़ी एक विशेषता तो यही है कि वे दिन-रात अनवरत रूप से क्रियाशील रहते हैं-गति करते रहते हैं। उनकी क्रियायें एक क्षण के लिए भी रुक जायँ तो जीवन संकट तक उपस्थित हो जाता है। उदाहरण के लिए रक्त परिवहन संस्थान को ही लें। हृदय की धड़कन के फलस्वरूप रक्त संचार होता है और जीवन के समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। यह रक्त प्रवाह नदी-नाले की तरह नहीं चलता वरन् पंपिंग स्टेशन जैसी विशेषता उसमें रहती है। हृदय के आकुँचन-प्रकुँचन प्रक्रिया के स्वरूप ही ऊपर-नीचे-समस्त अंग अवयवों में रक्तप्रवाह होता रहता है। सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः 90 सेकेंड में पूरी हो जाती है।


हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने उसे मात्र 6 सेकेंड में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जबकि मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर भी हृदय 5 मिनट और और अधिक जी लेता है, पर मस्तिष्क 3 मिनट में ही बुझ जाता है। हार्ट अटैक हृदयाघात की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना होता है। रक्त प्रवाह संस्थान का निर्माण करने वाली रक्तवाही नलिकाओं की कुल लम्बाई 60 हजार मील है जो कि पृथ्वी के धरातल की दूरी है। औसत दर्जे के मानवी काया में प्रायः 5 से 6 लीटर तक रक्त रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरंतर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्ति-कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घंटे में हृदय को 13 हजार लीटर रक्त का आयात-निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका-समेटा जाता है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा।


इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी 10 टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट तक ऊपर उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी।शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है। रक्त संचार की दुनिया इतनी सुव्यवस्थित और महत्वपूर्ण है कि यदि उसे ठीक तरह से समझा जा सके और उसके उपयुक्त रीति-नीति अपनायी जा सके तो सुदृढ़ और सुविकसित दीर्घ जीवन प्राप्त किया जा सकता है।


त्वचा, मांसपेशियां रक्त परिसंचरण प्रणाली ही नहीं शरीर संस्थान का एक-एक घटक अद्भुत और विलक्षण है। 5 फीट 6 इंच की इस मानवी काया में परमात्मा ने इतने अधिक आश्चर्य भर दिये हैं कि उसे देव मंदिर कहने और मानने में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।


ईश्वर की महिमा अपर्मपार 🚩🚩🚩


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शनिवार, 8 जनवरी 2022

मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा

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 {{{ॐ}}}


                                                              #विचित्र 


मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा ही ज्ञान विज्ञान की तरफ लेजाती है विज्ञान ने हमे नये सुख के साधन दिये पर फिर हम अधूरा महसूस करते है  हम गरीब या अमीर स्त्री या पुरूष हमे एक खोज रहती हम अपने को अधुरा महसूस करते है किसे केपास झोपड़ी या महल पैदल हो या महंगी गाडी पर सब  को साढे तीन फुट चौडी ओर छः फुट लम्बी आप जिन्दा है तो भी और मर गये तो भी कोई करोड़ों कमाकर भी चार रोटी खाता है और कोई भीख मांग कर भी कोई बहुत बडी जमीन का मालिक है और किसी के पास एक इंच भी नही पर रहते सब जमीन पर ही!

प्रत्येक जिनके शरीर पर रोम (शल्क भी रोम मे ही सम्मिलत है)क्यो होते ? मूलाधार चक्र मे ही प्रजनन अंग क्यो है? केन्द्र से ही सब भूतो( पदार्थों) का नियन्त्रण क्यो होता है? सभी प्राणियों मे पाव कछुए के पांवो के स्थान पर ही क्यो? मस्तिष्क सहस्रार मे ही क्यो? प्रभामण्डल क्या है? सभी पदार्थों से निकलने वाली तरंगें क्यो है? देव और दानवरूप जीव जन्तु भी सर्वत्र है, आधुनिक विज्ञान भी ब्रह्माण्ड की छाया ढूढ रहा है यह वही स्थान है जहां ब्रह्माण्ड की ऋण तरंगें निकलती है।

और वैदिक व्याख्या ये अनुसार यह ईशान कोण की ओर साठ डिग्री कोण पर नीचे झुका हुआ तो इसकी छाया इससे कई गुणा बडी है यही ऋण ब्रह्माण्ड है और इसमे भी प्राणियों एवं शक्तियों का अस्तित्व है वैदिक विद्वानों का कथन है कि ऊर्जा शरीर प्राणी भी होते है और यह भी हो सकता है कि किसी विशेष तारे के ग्रह पर  वह आक्सीजन की जगह पर अग्नि की लपटों से जीवनशक्ति प्राप्त करता हो

चेतना स्थल संयोग के समीकरण का फल नही है अपितु चेतना सर्वत्र व्याप्त है और इसके अनगिनत रूप है स्थूल शरीर तो यह अपनी प्रकृति को अनुसार निर्मित करता है पृथ्वी की परिस्थितियों मे बने शरीर मे आक्सीजन की आवश्यकता है तो यह आवश्यक नही कि किसी अन्य ग्रह की परिस्थितियों मे निर्मित शरीर मे भी उस शरीर को आक्सीजन चाहिए परिस्थितियों ये अनुसार शरीर, भोजन और आक्सीजन की मात्रा आदि का अभूतपूर्व अन्तर तो पृथ्वी पर भी प्राणियों मे दिखाई पडता है । मछली से लिए आक्सीजन से अधिक उसे पानी की आवश्यकता होती है कुत्ते को सडा गला मांस पोषण देता है। पर मनुष्य उसे खाते ही मर जाता है इसलिए किसी विशेष संयोग को जीवन का कारण मानना मुर्खतापूर्ण सिद्धांत है रशियन वैज्ञानिको ने 1500 डिग्री फेर नाईट पर अग्नि भक्षण  करने वाले जीवाणु की तलाश की है

आपके सामने मच्छर है ये वातावरण को प्रतिरोधी तत्त्वों से किस तरह एड जस्ट करते है इसका अनुभव आपको हो रहा है इसलिए कोई भी संयोग या परिस्थिति जीवनतत्त्व का कारण नही है चेतना का मूल बीज उत्पन्न नही होता अपितु चेतना का मूल वास्तव मे है शेष  सभी निर्माण वह अपनी शक्ति से परिस्थितियों को अनुसार करता है                    

ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे

१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश  फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है

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शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

श्वास

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 एक तो, श्वास की गति मनोदशा से बंधी है। जैसा मन होता, वैसी हो जाती श्वास की गति। जैसी होती अंतर स्थिति, श्वास के आंदोलन और तरंगें, वाइब्रेशंस, फ्रीक्वेंसीज बदल जाती हैं। 


श्वास की फ्रीक्वेंसी, श्वास की तरंगों का आघात खबर देता है, कि मन की दशा कैसी है। अभी तो मेडिकल साइंस उसकी फिक्र नहीं कर पाई, क्योंकि अभी मेडिकल साइंस शरीर के पार नहीं हो पाई है।


इसलिए अभी प्राण पर उसकी पहचान नहीं हो पाई लेकिन जैसे मेडिकल साइंस ब्लडप्रेशर को, खून के दबाव को नापती है। जब तक पता नहीं था, तब तक कोई खून के दबाव का सवाल नहीं था।


रक्तचाप,  रक्त का परिभ्रमण भी नई खोज है। तीन सौ साल पहले आधुनिक विज्ञान को पता नहीं था कि शरीर में खून चलता है। खून के चलने का पता तीन सौ साल पहले ही लग पाया। 


और जब खून के चलने का पता लगा, तो यह भी पता लगा धीरे-धीरे कि खून का जो प्रेशर है, वह व्यक्ति के स्वास्थ्य के गहरे अंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए ब्लड प्रेशर चिकित्सक के लिए नापने की खास चीज हो गई।


लेकिन अभी तक भी हम यह नहीं जान पाए कि जैसे ब्लडप्रेशर है, वैसा ब्रेथप्रेशर भी है। वैसे वायु का अधिक दबाव और कम दबाव, वायु की गति और तरंगों का आघात-भेद, व्यक्ति की अंतर मनोदशा को परिवर्तित करता है। वह उसकी जीवन-ऊर्जा से संबंधित है।  


उदाहरण के लिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी श्वास की गति बदल जाती है। वैसी ही नहीं रह जाती, जैसी साधारण होती है। इसका मतलब यह भी कि अगर आप श्वास की गति पर काबू पा लें।


तो आप फिर क्रोध पर काबू पा सकते हैं। अगर श्वास की गति न बदलने दें, तो क्रोध आना मुश्किल हो जाएगा।इसलिए जापान में  बच्चों को घरों में प्राणयोग का ही एक सूत्र सिखाते हैं। 


माता- पिता बच्चों को परंपरा से यह सिखाते हैं कि जब क्रोध आए, तब तुम श्वास को आहिस्ता लो, धीमे-धीमे लो। गहरी लो और धीमे लो। स्लोली एंड डीप, धीमे और गहरी। 


बच्चों को वे यह नहीं कहते कि क्रोध मत करो, जैसा कि सारी दुनिया कहती है। क्रोध न करना, हाथ की बात नहीं है। और मजा तो यह है कि जो पिता बच्चे को कह रहा है, क्रोध मत करो।


अगर बच्चा न माने तो स्वयं ही क्रोध करके बता देता है कि ''नहीं मानता! इतना कहा कि क्रोध मत कर!'' वह भूल ही जाता है कि अब हम खुद ही वही कर रहे हैं, जो हम उसको मना किए थे।


क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है।


कुछ अंतर नहीं पड़ता है! योग का पुराना सूत्र, बुद्ध के द्वारा जापान में पहुंचा। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया। कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता।


इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया। क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है। 


आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता। 


बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो जाती है। जब कामवासना मन को पकड़ती है, श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है ,रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और टूट-फूट जाती है।


प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।


प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ बाहर जगत को छूती है।


और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस। 


वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है। जो लोग भी ध्यान का कभी थोड़ा अनुभव किए हैं, उनको पता है। जो गहरा प्रयोग करते हैं।


वे कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि श्वास बंद हो गई, चलती ही नहीं! तो हम बहुत घबड़ा जाते हैं कि इससे कुछ खतरा तो न हो जाएगा। घबराने की जरा भी जरूरत नहीं है। घबराएं तब, जब श्वास बहुत जोर से चले। 


जब बिलकुल लगे कि ठहर गई, जब लगे कि श्वास का कंपन ही नहीं है, तब आप उस बैलेंस को, उस संतुलन को उपलब्ध होते हैं। तब ऊपर की श्वास ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है। 


बाहर की बाहर और भीतर की भीतर रह जाती है। और एक क्षण के लिए ठहराव आ जाता है। सब ठहर जाता है। न तो बाहर की श्वास भीतर जाती, न भीतर की श्वास बाहर आती। 


न ऊपर की श्वास ऊपर जाती, न नीचे की श्वास नीचे जाती। सब ठहर जाता है।श्वास के इस ठहराव के क्षण में परम अनुभव की किरण उत्पन्न होती है। श्वास के इस पूरे ठहर जाने में अस्तित्व पूरा संतुलित हो जाता है।


संयम को उपलब्ध हो जाता है। फिर कोई मूवमेंट नहीं, आंदोलन नहीं। फिर कोई परिवर्तन नहीं। फिर कोई हेर-फेर नहीं, बदलाहट नहीं, कोई गति नहीं। उस क्षण में आदमी परमगति में उतर जाता है या शाश्वत में डूब जाता है या इटरनल, सनातन से संपर्क साध लेता है।


श्वास का आंदोलन हमारा परिवर्तनशील जगत से संबंध है। श्वास का आंदोलनरहित हो जाना, अपरिवर्तनशील नित्य जगत से संबंधित हो जाना है। इसलिए श्वास का यह ठहर जाना बड़ी अदभुत अनुभूति है। 


कोशिश करके ठहराने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि कोशिश करके कभी नहीं ठहरा सकते। अगर आप कोशिश करके ठहराएंगे, तो भीतर की श्वास बाहर जाना चाहेगी, बाहर की श्वास भीतर जाना चाहेगी।


कोशिश करके कोई व्यक्ति श्वास को रोक नहीं सकता। हां, श्वास को आहिस्ता-आहिस्ता प्रशिक्षित किया जा सकता है, रिदमिक किया जा सकता है, तैयार किया जा सकता है लयबद्धता के लिए।


और अगर कोई प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान में गहरा उतरता चला जाए, तो एक क्षण ऐसा आ जाता है कि प्रशिक्षित श्वास और ध्यान की शांत स्थिति का कभी मेल, टयूनिंग हो जाती, तो श्वास ठहर जाती है।


और भी एक आश्चर्य की बात कि जब श्वास ठहरती है, तब तत्काल विचार ठहर जाते हैं। बिना श्वास के विचार नहीं चल सकते। इसे जरा देखें, कभी ऐसे ही एक सेकेंड को श्वास को ठहराकर। 


इधर श्वास ठहरी, भीतर विचार ठहरे, एकदम ब्रेक! श्वास बिलकुल ब्रेक का काम करती है विचार पर। लेकिन जब आप ठहराते हैं, तब ज्यादा देर नहीं ठहर सकती। श्वास भी निकलना चाहेगी और विचार भी हमला करना चाहेंगे।


क्षणभर को ही गैप आएगा। लेकिन जब श्वास, प्रशिक्षित श्वास ध्यान के संयोग से अपने आप ठहर जाती है, तो कभी-कभी घंटों ठहरी रहती है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसे बहुत मौके हैं। 


कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि वह छः-छः दिन तक ऐसे पड़े रहते कि जैसे मर गए! प्रियजन घबरा जाते, मित्र घबरा जाते, कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा! सब ठहर जाता। 


उस ठहरे हुए क्षण में, इन दैट स्टिल मोमेंट.. चेतना समय के बाहर चली जाती, कालातीत हो जाती। विचार के बाहर हुए, निर्विचार में गए, ब्रह्म के द्वार पर खड़े हैं। विचार में आए, विचार में पड़े, कि संसार के बीच आ गए हैं।


संसार और मोक्ष के बीच पतली-सी विचार की पर्त के अतिरिक्त और कोई फासला नहीं है। पदार्थ और परमात्मा के बीच पतले, झीने विचार के पर्दे के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है। लेकिन यह विचार का पर्दा कैसे जाए?


दो तरह से जा सकता है। या तो कोई सीधा विचार पर प्रयोग करे ध्यान का, साक्षी-भाव का, तो विचार चला जाता है। जिस दिन विचार शून्य होता है, उसी दिन श्वास भी शांत होकर खड़ी रह जाती है। 


या फिर कोई प्राणयोग का प्रयोग करे, श्वास का। श्वास को गति दे, व्यवस्था दे, प्रशिक्षण दे; और ऐसी जगह ले आए, जहां श्वास अपने आप ठहर जाती है–बाहर की बाहर, भीतर की भीतर, ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे।


 और बीच में गैप, अंतराल आ जाता है; खाली, वैक्यूम हो जाता है, जहां श्वास नहीं होती। वहीं से छलांग, दि जंप। उसी अंतराल में छलांग लग जाती है परमसत्ता की ओर।

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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कुण्डलिनी रहस्य

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कुण्डलिनी साधना से ऐसी कोई चमत्कारिक शक्ति नही मिलेगी कि आप खडे़ खडे़ गायब हो जायें ।आपकी उंगलियों या दृष्टि से कोई लपटें या किरण भी नहीं निकलेंगी।

हां आपकी चैतन्य शक्ति में विलक्षण परिवर्तन होगा। aजीवन शक्ति और ताकत बढ़ जायेगी।

सम्मोहन, दिव्य दृष्टि, अन्तर्ज्ञान, अन्तर्दृष्टि तीव्रतम होती चली जायेगी।

शारीरिक ऊर्जा मे वृद्धि होगी। भविष्य दर्शन होगा। भविष्यवाणीयां फलित होंगी।

कुण्डलिनी साधना जितनी सरल है उतनी ही सहजयोग में दुस्कर साधना समझा जाता है ।

वस्तुत सबसे अधिक परिश्रम मूलाधार पर करना होता है इसके फव्वारे  को तीव्र कर लेना या कथित सर्प के फण को उठा देना कठिन नही है ।

वास्तविक कठिनाई इस फण को ऊपर के स्वाधिष्ठान के नाभिक तक ले जाना है।

यह ऋणात्मक उर्जा है और इसका प्रवाह सबसे तीव्र होता है, क्योंकि यह ऊर्जा परिपथ के ऋण बिन्दू से उत्पन्न होती है ।

सर्वाधिक कठिनाई इसे नीचे की ओर क्षरित या पतित होने से रोकने मे है।

यहां के शिवलिंग से उत्पन्न होने वाली उर्जा महिषासुर है। इससे अन्धीं तीव्रता है। काम, क्रोध, कर्कशता, निर्माता, क्रूरता, मर्यादाहीन ,उच्छृंखलता इसका गुण है। sयह किसी का नियन्त्रण नही मानती है। जब तीव्र होकर दौड़ती है।

तो भैसें की तरह खतरों आदि को बारे मे अंधी हो जाती है

ज्ञान विवेक लुप्त हो जाता है ।

यह काली है जो शिव (शिव/विवेक)को पैरों तले रौंद डालती है।

तन्त्र विधा मे सबसे कठिन सिद्धि इसी शक्ति को करने मे होती है ।

इस बिन्दू को जाग्रत करना कठिन नही है । कठिनाई यह है कि जब यह उर्जा बढ़ती है, तो उपर्युक्त गुणों कि मात्रा भी बढती है।

इन गुणों मे बहकर उत्पन्न उर्जा को क्षरित करने से रोकना ही वास्तविक सिद्धि है ।

इसके लिये तंत्र मेनिर्देश है कि इस भैंसे की बलि देने या निरन्तर प्रयत्न करते रहें ।भैसें की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखें शराब पीकर भी इस उर्जा को आप प्राप्त कर सकते है। 

पर वास्तव मे सिद्धि तो वह है कि शराब पीयें ,पर नियन्त्रत रहें। काम की भावना से भी रति के समय भी यह ऊर्जा बढ़ जाती है ।

इस समय आप भैंसे की सवारी कर रहे होते है, तेज रफ्तार से दौड़ते हुए अंन्धे भैंसे को रोकने की कला नही आती तो वह पतन की खाई मे गिरा देता ही है ।

विवेक से इस भैसे  को नियन्त्रत करके इस भाव की बलि  देना ही तंत्र के भैंसे की बलि  है।

लोग धर्मस्थलों पर भैसा काट रहे है मूर्खों के सिर पर सींग नही होते । वे देखने मे आदमी जैसे लगते है।

तंत्र मे भैंसे के रक्त, सींग, पूछा के बाल गोबर  आदि कि उपयोग होता है, परन्तु यह रसायन सामग्री योग है।लेकिन इसका अर्थ भैंसे  को काटने से नही।

इसी तरह स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बढ़ने पर से अंधी चंचलता या क्रियाशीलता बढ़ाती है।

मन हमेशा चंचल ,उन्माद बना रहता है । वह भी तामसी भाव मे उतेजित ठीक बकरी के बच्चे की तरह यदि आप इस चंचलता को नियन्त्रित करके मन के बकरी को बच्चे जैसी प्रवृत्ति की बलि देते है तो सिद्धि अवश्य मिलेगी।

स्वाधिष्ठान मां दुर्गा का स्थान है कृपया इस देवी को चरणों पर मालुम पशुओं की बलि मत किजिए।

माता कभी राक्षसी नही होती वह आपकी ही नही इस सृष्टि की माता है।

वह बकरी के बच्चे कि भी माता हैh इस देवी को आंचल को रक्त से संचित कर दिया जाता है ।

मै अहिंसा, भावुकता को वशीभूत नही हूं आपको मांसाहार से भी नही रोक रहा मगर कम से कम यह दुर्गा माता को नाम पर तो रोकये।

तंत्र मे इसका अर्थ कुछ ओर ही है कुण्डलिनी साधना आजकल इसकी हर तरफ चर्चा है।इस चर्चा का  लाभ अनेक तथाकथित अवतार आदि उठा रहे है।

इनका दावे डी,वी, डी , फोन पर फोटो पर शक्ति पात करके एवं कुछ तो दावा करते है ये दो घण्टे मे कुण्डलिनी जाग्रत कर देते है ऐसे विज्ञापन टी वी आदि संचार माध्यम  मे देखने को मिलते रहते है।

कुछ से हमने भी पुछा  कि कुण्डलिनी है क्या?

तो उत्तर मे वे बताने लगे कि मूलाधार मे एक शिवलिंग है उसमे सांप लिपटा है उसका फण लिंग मुण्ड पर है।

उस फण को जाग्रत करना ही कुण्डलिनी जागरण है।

ये लोग ठग है। ये कुछ नही जानते मूलाधार मे शिवलिंग अवश्य है पर वहाँ सांप जैसा कुछ नही है ।

वहाँ पर है क्या यह एक उर्जा संरचना है यह प्रथम परमाणु की संरचना है इसके शीर्ष पर सांप नही । यह इसके शीर्ष से निकलती उर्जा धाराएँ है।

जो शेषनाग के फणों  या फव्वारों की बुदों कि भाति निकलती है फुफकारती हुई उर्जा धाराएं ।

यह संरचना इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इकाई कि है प्रत्येक उर्जा बिन्दू की है । मूलाधार मे नही रीढ मे व्याप्त 9बिन्दूओं , या शरीर को तैंतीस करोड बिन्दुओं , सभी तारों ,सूर्य, नाभिकों, सी संरचना है ।

हमारे शरीर मे जो नौ उर्जा बिन्दू मुख्य kहै रीढ़ मे उनके मध्य कुछ रिक्त स्थान है जिसे सुषुम्ना नाडी कहते है जिनमे उर्जाधाराएं एवं बिन्दू तो है पर मुख्य बिन्दु जैसे नही है  sabhar Facebook wall sakti upasak agyani

मूलाधार के शिवलिंग के शीर्ष से फव्वारों के रूप मे निकलती उर्जा को तीव्र करके उपर को बिन्दु के शिवलिंग के नीचे पुच्छल उर्जा धारा से मिलाने से शक्ति प्राप्त होती है

तब इसे उपर खींचा जाता है और उपरी शिवलिंग के नाभिक मे ले जाया जाता है इससे शाट् सर्किट होता है ( दोनो+ धन होते है) इससे दुसरे शिवलिंग का फव्वारा बढ जाता है ।

कुण्डलिनी साधना मे एक मूलाधार ये फव्वारे को उपर स्वाधिष्ठान के केन्द्र मे मिलाने से कई चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त होती है ।

परन्तु यह तो वर्षों का काम है वह भी निरन्तर लगन के साथ अभ्यास करने पर परन्तु दो घण्टे मे ईश्वर ही जानता है कि यह कैसा धोखा है।

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मन्त्र दोष

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 {{{ॐ}}}


                                                               #


ग्रहित मंत्र के अनुष्ठान करते समय साधक का कर्तव्य होता है कि मंत्र दोषों का सावधानीपूर्वक निराकरण कर ले, मंत्र के अर्थात मंत्रोंपासक के आठ दोष होते हैं पहला दोष है अभक्ति और इन रहस्यों को समझने की लेने के पश्चात मंत्रों को केवल शब्द समूह या भाषा के वाक्य मात्र मान लेने की भूल साधक नहीं कर सकता फिर भी यदि कोई व्यक्ति मंत्र को भाषा मात्र समझता हैa तो यह अभक्ति है।

किसी दूसरे के मंत्र को श्रेष्ठ और अपने मंत्र को निम्न कोटि का मानता है तो भी यह अभक्ति ही है अर्थात इन दोनों ही स्थितियों में मंत्र में मंत्र भावना और श्रद्धा नहीं रह पाती श्रद्धा नहीं होने से मंत्र की साधना फलवती नहीं होती है।

#अक्षर_भ्रान्ति-- साधना का दूसरा दोष अक्षर भ्रान्तिं साधक भ्रम वश अक्षरों में विपर्यक कर जाए अथवा अधिक जोड़ दें तो अक्षर भ्रान्ति दोष होता है उदाहरण के लिए ,भार्या रक्षतु भैरवी, किस स्थान पर भार्या भक्षतु भैरवी कश्यप अक्षर भ्रांति के दोष में ही दिन आ जाएगा।

#लुप्त-- तीसरा दोष लुप्ताक्षरता का है साधक मंत्र ग्रहण करने के समय सावधानी वर्ष या जप करते समय किसी अक्सर को भूल जाता है छोड़ देता है तो लुप्त दोष होता है।

#छिन्न-- मंत्र में प्रयुक्त संयुक्त अक्षर का एक अंश टूटता हुआ सा हो तो छिन्न दोष होता है।

#ह्नस्व-- दीर्घ वर्णन के स्थान पर ह्रस्व वर्ण का प्रयोग ह्रस्व दोष होता है जैसे मारवाड़ी लोग गधे को गधा बोलते हैं यहां ध के स्थान पर द का उपयोग होता हैs जैसे पंजाब के लोग छुट्टी शब्द को छुटि  बोलने में ह्रस्व दोष होता है भाषा में कुछ भी होता हूं मंत्र व्यवहार के कारण ध्वनि और रूप में परिवर्तन धर्मा नहीं होते इसलिए जो अक्सर जिस रूप में जिस ले में बोला जाता है उसी में बोलना चाहिए किसी दीर्घ मात्रा को ह्रस्व मात्रा के रूप में बोलना भी इसी दोष के अंतर्गत आता है।

#दीर्घ-- ह्रस्व से विपरीत स्थिति वाला दीर्घ दोष हुआ करता है छोटी मात्रा को बड़ी मात्रा के रूप में बोलने पर अथवा अल्पप्राण अक्षरों को महाप्राण की तरह बोलने पर भी दीर्घ दोष होता है।

#कथन-- मंत्र एक नितांत गुप्त रहस्य हैh मंत्र शब्द का दूसरा अर्थ गोपन ही होता है अतः मंत्र का प्रकाशन कथन दोष की श्रेणी में आता है किसी भी स्थिति में व्यक्ति को अपना मंत्र प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

#स्वप्न_कथन-- यदि कोई व्यक्ति अपनी मंत्र को संपन्न में किसी दूसरे को बताता है तो स्वप्न कथन का दोषी होता है भीम दोस्तों के विभिन्न फल सामने आते हैं oकई बार साधक को चित्त विपेक्ष हो जाता है

किसी का शरीर लक्षण होने लग जाता है किसी को अर्थ की हानि होने लगती है किसी के परिवार जनों को आधि व्याधि सताने लगती है अर्थात जो मंत्र व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता था ऋद्धि सिद्धि प्रदान करता था वही अशुभ बन जाता है kनियम पूर्वक उपासना करने पर भी यदि विपरीत लक्षण और अशुभ फल मिलता हो तो व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मंत्र का और साधना का आत्म निरीक्षण करें और उपर्युक्त दोनों में से कोई दोष दिखाई दे तो उसका प्रायश्चित  करके विधिपूर्वक पुणे अनुष्ठान करें ।sabhar Facebook wall sakti upasak

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रविवार, 26 दिसंबर 2021

भैरवनाथ के रहस्य एवं साधना...

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#भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। इन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।

 

भैरव उत्पत्ति👉 उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। मुख्‍यत: दो भैरवों की पूजा का प्रचलन है, एक काल भैरव और दूसरे बटुक भैरव।  पुराणों में भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।

 

लोक देवता👉  लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते।

 

पालिया महाराज👉  सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है।

 

भैरव मंदिर👉  भैरव का प्रसिद्ध, प्राचीन और चमत्कारिक मंदिर उज्जैन और काशी में है। काल भैरव का उज्जैन में और बटुक भैरव का लखनऊ में मंदिर है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ा खाड़ का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।

 

काल भैरव👉  काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था। यह भगवान का साहसिक युवा रूप है। उक्त रूप की आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय की प्राप्ति होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। सभी तरह के भय से मुक्ति मिलती है। काल भैरव को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है।

 

काल भैरव की आराधना के लिए मंत्र है- ।। ॐ भैरवाय नम:।।

 

बटुक भैरव👉  'बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।'


अर्थात्👉 ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। 

 

उक्त आराधना के लिए मंत्र है-  ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।।

 

भैरव तंत्र👉  योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है।

 

भैरव आराधना से शनि शांत👉  एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएं। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दांत और आंत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है।

 

भैरव चरित्र👉  भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है।

 

उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है।


श्री भैरव के आठ रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं-


1. असितांग भैरव,

2. चंड भैरव,

3. रूरू भैरव,

4. क्रोध भैरव,

5. उन्मत्त भैरव,

6. कपाल भैरव,

7. भीषण भैरव

8. संहार भैरव।


क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है।

श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं।


दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है।


शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है।


जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार, मंगलवार या बुधवार प्रारम्भ कर बटुक भैरव मूल मंत्र की एक माला (१०८ बार) का जाप प्रतिदिन रूद्राक्ष की माला से ४१ दिन तक करें, अवश्य ही शुभ फलों की प्राप्ति होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहाँ शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में १२ से ३ बजे का माना जाता है।


भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।


जन्मकुंडली में अगर आप मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण आसानी से कर सकते है। राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगानालाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है।

भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।


खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है। भारत भर में कई परिवारों में कुलदेवता के रूप में भैरव की पूजा करने का विधान हैं। वैसे तो आम आदमी, शनि, कालिका माँ और काल भैरव का नाम सुनते ही घबराने लगते हैं, लेकिन सच्चे दिल से की गई इनकी आराधना आपके जीवन के रूप-रंग को बदल सकती है। ये सभी देवता आपको घबराने के लिए नहीं बल्कि आपको सुखी जीवन देने के लिए तत्पर रहते है बशर्ते आप सही रास्ते पर चलते रहे।

भैरव अपने भक्तों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण करके उनके कर्म सिद्धि को अपने आशीर्वाद से नवाजते है। भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है।


एक बार भगवान शिव के क्रोधित होने पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई। तब ब्रह्म हत्या को लेकर हुई आकाशवाणी के तहत ही भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए थे।


मध्यप्रदेश के उज्जैन में भी कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है, जो बहुत महत्व का है। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी। इसलिए उज्जैन दर्शन के समय कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है। तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है।

 

 !! भैरव साधना !!

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मंत्र संग्रह पूर्व-पीठिका

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मेरु-पृष्ठ पर सुखासीन, वरदा देवाधिदेव शंकर से !!

पूछा देवी पार्वती ने, अखिल विश्व-गुरु परमेश्वर से !

जन-जन के कल्याण हेतु, वह सर्व-सिद्धिदा मन्त्र बताएँ !!


जिससे सभी आपदाओं से साधक की रक्षा हो, वह सुख पाए !

शिव बोले, आपद्-उद्धारक मन्त्र, स्तोत्र  मैं बतलाता,

देवि ! पाठ जप कर जिसका, है मानव सदा शान्ति-सुख पाता !!


                *!! ध्यान !!*


*सात्विकः-*

बाल-स्वरुप वटुक भैरव-स्फटिकोज्जवल-स्वरुप है जिनका,

घुँघराले केशों से सज्जित-गरिमा-युक्त रुप है जिनका,

दिव्य कलात्मक मणि-मय किंकिणि नूपुर से वे जो शोभित हैं !

भव्य-स्वरुप त्रिलोचन-धारी जिनसे पूर्ण-सृष्टि सुरभित है !

कर-कमलों में शूल-दण्ड-धारी का ध्यान-यजन करता हूँ !

रात्रि-दिवस उन ईश वटुक-भैरव का मैं वन्दन करता हूँ !!


*राजसः-*

नवल उदीयमान-सविता-सम, भैरव का शरीर शोभित है,

रक्त-अंग-रागी, त्रैलोचन हैं जो, जिनका मुख हर्षित है !

नील-वर्ण-ग्रीवा में भूषण, रक्त-माल धारण करते हैं !

शूल, कपाल, अभय, वर-मुद्रा ले साधक का भय हरते हैं !

रक्त-वस्त्र बन्धूक-पुष्प-सा जिनका, जिनसे है जग सुरभित,

ध्यान करुँ उन भैरव का, जिनके केशों पर चन्द्र सुशोभित !!


*तामसः-*

तन की कान्ति नील-पर्वत-सी, मुक्ता-माल, चन्द्र धारण कर,

पिंगल-वर्ण-नेत्रवाले वे ईश दिगम्बर, रुप भयंकर !

डमरु, खड्ग, अभय-मुद्रा, नर-मुण्ड, शुल वे धारण करते,

अंकुश, घण्टा, सर्प हस्त में लेकर साधक का भय हरते !

दिव्य-मणि-जटित किंकिणि, नूपुर आदि भूषणों से जो शोभित,

भीषण सन्त-पंक्ति-धारी भैरव हों मुझसे पूजित, अर्चित !!


!! तांत्रोक्त भैरव कवच !!

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ॐ सहस्त्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरुः !

पातु मां बटुको देवो भैरवः सर्वकर्मसु !!

पूर्वस्यामसितांगो मां दिशि रक्षतु सर्वदा !

आग्नेयां च रुरुः पातु दक्षिणे चण्ड भैरवः !!

नैॠत्यां क्रोधनः पातु उन्मत्तः पातु पश्चिमे !

वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वरः !!

भीषणो भैरवः पातु उत्तरास्यां तु सर्वदा !

संहार भैरवः पायादीशान्यां च महेश्वरः !!

ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभुः !

सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवितः !!

रामदेवो वनान्ते च वने घोरस्तथावतु !

जले तत्पुरुषः पातु स्थले ईशान एव च !!

डाकिनी पुत्रकः पातु पुत्रान् में सर्वतः प्रभुः !

हाकिनी पुत्रकः पातु दारास्तु लाकिनी सुतः !!

पातु शाकिनिका पुत्रः सैन्यं वै कालभैरवः !

मालिनी पुत्रकः पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा !!

महाकालोऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा !

वाद्यम् वाद्यप्रियः पातु भैरवो नित्यसम्पदा !!


!! भैरव वशीकरण मन्त्र !!

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“ॐनमो रुद्राय, कपिलाय, भैरवाय, त्रिलोक- नाथाय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ”

“ॐ भ्रां भ्रां भूँ भैरवाय स्वाहा। ॐ भं भं भं अमुक-मोहनाय स्वाहा ”

“ॐ नमो काला गोरा भैरुं वीर, पर-नारी सूँ देही सीर ! गुड़ परिदीयी गोरख जाणी, गुद्दी पकड़ दे भैंरु आणी, गुड़, रक्त का धरि ग्रास, कदे न छोड़े मेरा पाश ! जीवत सवै देवरो, मूआ सेवै मसाण ! पकड़ पलना ल्यावे ! काला भैंरु न लावै, तो अक्षर देवी कालिका की आण ! फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा !”


ॐ भैरवाय नम: !!*

ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवायनम:!

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ !!


ॐ ह्रीं वां बटुकाये क्षौं क्षौं आपदुद्धाराणाये कुरु कुरु बटुकाये ह्रीं बटुकाये स्वाहा !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्तोत् !!

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विनियोग -

 ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षणभैरव महामंत्रस्य श्री महाभैरव ब्रह्मा ऋषिः , त्रिष्टुप्छन्दः , त्रिमूर्तिरूपी भगवान स्वर्णाकर्षणभैरवो देवता, ह्रीं बीजं , सः शक्तिः, वं कीलकं मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः !!


      अब बाए हाथ मे जल लेकर दाहिने हाथ की उंगलियों को जल से स्पर्श करके मंत्र मे दिये हुए शरीर के स्थानो पर स्पर्श करे !!


!! ऋष्यादिन्यास !!

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श्री महाभैरव ब्रह्म ऋषये नमः शिरसि !

त्रिष्टुप छ्न्दसे नमः मुखे !

श्री त्रिमूर्तिरूपी भगवान

स्वर्णाकर्षण भैरव देवतायै नमः ह्रदिः !

ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये !

सः शक्तये नमः पादयोः !

वं कीलकाय नमः नाभौ !

मम् दारिद्रय नाशार्थे विपुल धनराशिं

स्वर्णं च प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे !

मंत्र बोलते हुए दोनो हाथ के उंगलियों को आग्या चक्र पर स्पर्श करे ! अंगुष्ठ का मंत्र बोलते समय दोनो अंगुष्ठ से आग्या चक्र पर स्पर्श करना है !!


!! करन्यास !!

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ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः !

ऐं तर्जनीभ्यां नमः !

क्लां ह्रां मध्याभ्यां नमः !

क्लीं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः !

क्लूं ह्रूं कनिष्ठिकाभ्यां नमः !

सं वं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः !

अब मंत्र बोलते हुए दाहिने हाथ से मंत्र मे कहे गये शरीर के भाग पर स्पर्श करना है !!


!! हृदयादि न्यास !!

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आपदुद्धारणाय हृदयाय नमः !

अजामल वधाय शिरसे स्वाहा !

लोकेश्वराय शिखायै वषट् !

स्वर्णाकर्षण भैरवाय कवचाय हुम् !

मम् दारिद्र्य विद्वेषणाय नेत्रत्रयाय वौषट् !

श्रीमहाभैरवाय नमः अस्त्राय फट् !

रं रं रं ज्वलत्प्रकाशाय नमः इति दिग्बन्धः !!


      अब दोनो हाथ जोड़कर ध्यान करे !!

(ध्यान मंत्र का  उच्चारण करें !!

 जिसका हिन्दी में सरलार्थ नीचे दिया गया है ! वैसा ही आप भाव करें )


ॐ पीतवर्णं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं पीतवाससम् !

अक्षयं स्वर्णमाणिक्य तड़ित-पूरितपात्रकम् !!

अभिलसन् महाशूलं चामरं तोमरोद्वहम् !

सततं चिन्तये देवं भैरवं सर्वसिद्धिदम् !!


मंदारद्रुमकल्पमूलमहिते माणिक्य सिंहासने, संविष्टोदरभिन्न चम्पकरुचा देव्या समालिंगितः !

भक्तेभ्यः कररत्नपात्रभरितं स्वर्णददानो भृशं, स्वर्णाकर्षण भैरवो विजयते स्वर्णाकृति : सर्वदा !!


हिन्दी भावार्थ :- श्रीस्वर्णाकर्षण भैरव जी मंदार (सफेद आक) के नीचे माणिक्य के सिंहासन पर बैठे हैं ! उनके वाम भाग में देवि उनसे समालिंगित हैं ! उनकी देह आभा पीली है तथा उन्होंने पीले ही वस्त्र धारण किये हैं ! उनके तीन नेत्र हैं ! चार बाहु हैं जिन्में उन्होंने स्वर्ण - माणिक्य से भरे हुए पात्र, महाशूल, चामर तथा तोमर को धारण कर रखा है ! वे अपने भक्तों को स्वर्ण देने के लिए तत्पर हैं। ऐसे सर्वसिद्धिप्रदाता श्री स्वर्णाकर्षण भैरव का मैं अपने हृदय में ध्यान व आह्वान करता हूं उनकी शरण ग्रहण करता हूं ! आप मेरे दारिद्रय का नाश कर मुझे अक्षय अचल धन समृद्धि और स्वर्ण राशि प्रदान करे और मुझ पर अपनी कृपा वृष्टि करें।

मानसोपचार पुजन के मंत्रो को मन मे बोलना है !


!! मानसोपचार पूजन !!

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लं पृथिव्यात्मने गंधतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं गंधं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

हं आकाशात्मने शब्दतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं पुष्पं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

यं वायव्यात्मने स्पर्शतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं धूपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

रं वह्न्यात्मने रूपतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं दीपं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

वं अमृतात्मने रसतन्मात्र प्रकृत्यात्मकं अमृतमहानैवेद्यं श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !

सं सर्वात्मने ताम्बूलादि सर्वोपचारान् पूजां श्रीस्वर्णाकर्षण भैरवं अनुकल्पयामि नम: !!


!! मंत्र !!

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ॐ ऐं क्लां क्लीं क्लूं ह्रां ह्रीं ह्रूं स: वं आपदुद्धारणाय अजामलवधाय लोकेश्वराय स्वर्णाकर्षण भैरवाय मम् दारिद्रय विद्वेषणाय ॐ ह्रीं महाभैरवाय नम: !!


मंत्र जाप के बाद स्तोत्र का एक पाठ अवश्य करे !!


!! श्री स्वर्णाकर्षण भैरव स्त्रोत् !!

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!! श्री मार्कण्डेय उवाच !!


भगवन् ! प्रमथाधीश ! शिव-तुल्य-पराक्रम !

पूर्वमुक्तस्त्वया मन्त्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

इदानीं श्रोतुमिच्छामि, तस्य स्तोत्रमनुत्तमं !

तत् केनोक्तं पुरा स्तोत्रं, पठनात्तस्य किं फलम् !!

तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि, ब्रूहि मे नन्दिकेश्वर !!


!! श्री नन्दिकेश्वर उवाच !!


इदं ब्रह्मन् ! महा-भाग, लोकानामुपकारक !

स्तोत्रं वटुक-नाथस्य, दुर्लभं भुवन-त्रये !!

सर्व-पाप-प्रशमनं, सर्व-सम्पत्ति-दायकम् !

दारिद्र्य-शमनं पुंसामापदा-भय-हारकम् !!

अष्टैश्वर्य-प्रदं नृणां, पराजय-विनाशनम् !

महा-कान्ति-प्रदं चैव, सोम-सौन्दर्य-दायकम् !!

महा-कीर्ति-प्रदं स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !

न वक्तव्यं निराचारे, हि पुत्राय च सर्वथा !!

शुचये गुरु-भक्ताय, शुचयेऽपि तपस्विने !

महा-भैरव-भक्ताय, सेविते निर्धनाय च !!

निज-भक्ताय वक्तव्यमन्यथा शापमाप्नुयात् !

स्तोत्रमेतत् भैरवस्य, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मनः !!

श्रृणुष्व ब्रूहितो ब्रह्मन् ! सर्व-काम-प्रदायकम् !!


!! विनियोग !!


ॐ अस्य श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-स्तोत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीस्वर्णाकर्षण-भैरव-देवता, ह्रीं बीजं, क्लीं शक्ति, सः कीलकम्, मम-सर्व-काम-सिद्धयर्थे पाठे विनियोगः !!


!! ध्यान !!


मन्दार-द्रुम-मूल-भाजि विजिते रत्नासने संस्थिते !

दिव्यं चारुण-चञ्चुकाधर-रुचा देव्या कृतालिंगनः !!

भक्तेभ्यः कर-रत्न-पात्र-भरितं स्वर्ण दधानो भृशम् !

स्वर्णाकर्षण-भैरवो भवतु मे स्वर्गापवर्ग-प्रदः !!


!! स्त्रोत् -पाठ !!

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ॐ नमस्तेऽस्तु भैरवाय, ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मने !

नमः त्रैलोक्य-वन्द्याय, वरदाय परात्मने !!

रत्न-सिंहासनस्थाय, दिव्याभरण-शोभिने !

नमस्तेऽनेक-हस्ताय, ह्यनेक-शिरसे नमः !

नमस्तेऽनेक-नेत्राय, ह्यनेक-विभवे नमः !!

नमस्तेऽनेक-कण्ठाय, ह्यनेकान्ताय ते नमः !

नमोस्त्वनेकैश्वर्याय, ह्यनेक-दिव्य-तेजसे !!

अनेकायुध-युक्ताय, ह्यनेक-सुर-सेविने !

अनेक-गुण-युक्ताय, महा-देवाय ते नमः !!

नमो दारिद्रय-कालाय, महा-सम्पत्-प्रदायिने !

श्रीभैरवी-प्रयुक्ताय, त्रिलोकेशाय ते नमः !!

दिगम्बर ! नमस्तुभ्यं, दिगीशाय नमो नमः !

नमोऽस्तु दैत्य-कालाय, पाप-कालाय ते नमः !!

सर्वज्ञाय नमस्तुभ्यं, नमस्ते दिव्य-चक्षुषे !

अजिताय नमस्तुभ्यं, जितामित्राय ते नमः !

नमस्ते रुद्र-पुत्राय, गण-नाथाय ते नमः !

नमस्ते वीर-वीराय, महा-वीराय ते नमः !!

नमोऽस्त्वनन्त-वीर्याय, महा-घोराय ते नमः !

नमस्ते घोर-घोराय, विश्व-घोराय ते नमः !!

नमः उग्राय शान्ताय, भक्तेभ्यः शान्ति-दायिने !

गुरवे सर्व-लोकानां, नमः प्रणव-रुपिणे !!

नमस्ते वाग्-भवाख्याय, दीर्घ-कामाय ते नमः !

नमस्ते काम-राजाय, योषित्कामाय ते नमः !!

दीर्घ-माया-स्वरुपाय, महा-माया-पते नमः !

सृष्टि-माया-स्वरुपाय, विसर्गाय सम्यायिने !!

रुद्र- लोकेश- पूज्याय, ह्यापदुद्धारणाय च !

नमोऽजामल- बद्धाय, सुवर्णाकर्षणाय ते !!

नमो नमो भैरवाय, महा-दारिद्रय-नाशिने !

उन्मूलन-कर्मठाय, ह्यलक्ष्म्या सर्वदा नमः !!

नमो लोक-त्रेशाय, स्वानन्द-निहिताय ते !

नमः श्रीबीज-रुपाय, सर्व-काम-प्रदायिने !!

नमो महा-भैरवाय, श्रीरुपाय नमो नमः !

धनाध्यक्ष ! नमस्तुभ्यं, शरण्याय नमो नमः !!

नमः प्रसन्न-रुपाय, ह्यादि-देवाय ते नमः !

नमस्ते मन्त्र-रुपाय, नमस्ते रत्न-रुपिणे !!

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, सुवर्णाय नमो नमः !

नमः सुवर्ण-वर्णाय, महा-पुण्याय ते नमः !!

नमः शुद्धाय बुद्धाय, नमः संसार-तारिणे !

नमो देवाय गुह्याय, प्रबलाय नमो नमः !!

नमस्ते बल-रुपाय, परेषां बल-नाशिने !

नमस्ते स्वर्ग-संस्थाय, नमो भूर्लोक-वासिने !!

नमः पाताल-वासाय, निराधाराय ते नमः !

नमो नमः स्वतन्त्राय, ह्यनन्ताय नमो नमः !!

द्वि-भुजाय नमस्तुभ्यं, भुज-त्रय-सुशोभिने !

नमोऽणिमादि-सिद्धाय, स्वर्ण-हस्ताय ते नमः !!

पूर्ण-चन्द्र-प्रतीकाश-वदनाम्भोज-शोभिने !

नमस्ते स्वर्ण-रुपाय, स्वर्णालंकार-शोभिने !!

नमः स्वर्णाकर्षणाय, स्वर्णाभाय च ते नमः !

नमस्ते स्वर्ण-कण्ठाय, स्वर्णालंकार-धारिणे !!

स्वर्ण-सिंहासनस्थाय, स्वर्ण-पादाय ते नमः !

नमः स्वर्णाभ-पाराय, स्वर्ण-काञ्ची-सुशोभिने !!

नमस्ते स्वर्ण-जंघाय, भक्त-काम-दुघात्मने !

नमस्ते स्वर्ण-भक्तानां, कल्प-वृक्ष-स्वरुपिणे !!

चिन्तामणि-स्वरुपाय, नमो ब्रह्मादि-सेविने !

कल्पद्रुमाधः-संस्थाय, बहु-स्वर्ण-प्रदायिने !!

भय-कालाय भक्तेभ्यः, सर्वाभीष्ट-प्रदायिने !

नमो हेमादि-कर्षाय, भैरवाय नमो नमः !!

स्तवेनानेन सन्तुष्टो, भव लोकेश-भैरव !

पश्य मां करुणाविष्ट, शरणागत-वत्सल !

श्रीभैरव धनाध्यक्ष, शरणं त्वां भजाम्यहम् !

प्रसीद सकलान् कामान्, प्रयच्छ मम सर्वदा !!


!! फल-श्रुति !!

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श्रीमहा-भैरवस्येदं, स्तोत्र सूक्तं सु-दुर्लभम् !

मन्त्रात्मकं महा-पुण्यं, सर्वैश्वर्य-प्रदायकम् !!

यः पठेन्नित्यमेकाग्रं, पातकैः स विमुच्यते !

लभते चामला-लक्ष्मीमष्टैश्वर्यमवाप्नुयात् !!

चिन्तामणिमवाप्नोति, धेनुं कल्पतरुं ध्रुवम् !

स्वर्ण-राशिमवाप्नोति, सिद्धिमेव स मानवः !!

संध्याय यः पठेत्स्तोत्र, दशावृत्त्या नरोत्तमैः !

स्वप्ने श्रीभैरवस्तस्य, साक्षाद् भूतो जगद्-गुरुः !

स्वर्ण-राशि ददात्येव, तत्क्षणान्नास्ति संशयः !

सर्वदा यः पठेत् स्तोत्रं, भैरवस्य महात्मनः !!

लोक-त्रयं वशी कुर्यात्, अचलां श्रियं चाप्नुयात् !

न भयं लभते क्वापि, विघ्न-भूतादि-सम्भव !!

म्रियन्ते शत्रवोऽवश्यम लक्ष्मी-नाशमाप्नुयात् !

अक्षयं लभते सौख्यं, सर्वदा मानवोत्तमः !!

अष्ट-पञ्चाशताणढ्यो, मन्त्र-राजः प्रकीर्तितः !

दारिद्र्य-दुःख-शमनं, स्वर्णाकर्षण- कारकः !!

य येन संजपेत् धीमान्, स्तोत्र वा प्रपठेत् सदा !

महा-भैरव-सायुज्यं, स्वान्त-काले भवेद् ध्रुवं !!


!! श्री भैरव चालीसा !!

!! दोहा !!

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श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ !

चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ !!

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल !

श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल !!


जय जय श्री काली के लाला !

जयति जयति काशी- कुतवाला !!


जयति बटुक भैरव जय हारी !

जयति काल भैरव बलकारी !!


जयति सर्व भैरव विख्याता !

जयति नाथ भैरव सुखदाता !!


भैरव रुप कियो शिव धारण !

भव के भार उतारण कारण !!


भैरव रव सुन है भय दूरी !

सब विधि होय कामना पूरी !!


शेष महेश आदि गुण गायो ! काशी-कोतवाल कहलायो !!


जटाजूट सिर चन्द्र विराजत !

बाला, मुकुट, बिजायठ साजत !!


कटि करधनी घुंघरु बाजत !

दर्शन करत सकल भय भाजत !!


जीवन दान दास को दीन्हो !

कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो !!


वसि रसना बनि सारद-काली !

दीन्यो वर राख्यो मम लाली !!


धन्य धन्य भैरव भय भंजन !

जय मनरंजन खल दल भंजन !!


कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा !

कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा !!


जो भैरव निर्भय गुण गावत !

अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत !!


रुप विशाल कठिन दुख मोचन !

क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन !!


अगणित भूत प्रेत संग डोलत ! 

बं बं बं शिव बं बं बोतल !!


रुद्रकाय काली के लाला !

महा कालहू के हो काला !!


बटुक नाथ हो काल गंभीरा !

श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा !!


करत तीनहू रुप प्रकाशा !

भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा !!


रत्न जड़ित कंचन सिंहासन !

व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन !!


तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं !

विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं !!


जय प्रभु संहारक सुनन्द जय !

जय उन्नत हर उमानन्द जय !!


भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय !

बैजनाथ श्री जगतनाथ जय !!


महाभीम भीषण शरीर जय !

रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय !!


अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय !

श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय !!


निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय !

गहत अनाथन नाथ हाथ जय !!


त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय !

क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय !!

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय !

कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय !!


रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर !

चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर !!


करि मद पान शम्भु गुणगावत !

चौंसठ योगिन संग नचावत !!


करत कृपा जन पर बहु ढंगा !

काशी कोतवाल अड़बंगा !!


देयं काल भैरव जब सोटा !

नसै पाप मोटा से मोटा !!


जाकर निर्मल होय शरीरा !

मिटै सकल संकट भव पीरा !!


श्री भैरव भूतों के राजा !

बाधा हरत करत शुभ काजा !!


ऐलादी के दुःख निवारयो !

सदा कृपा करि काज सम्हारयो !!


सुन्दरदास सहित अनुरागा !

श्री दुर्वासा निकट प्रयागा !!


श्री भैरव जी की जय लेख्यो !

सकल कामना पूरण देख्यो !!


!! दोहा !!


जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार !

कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार !!

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार !

उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार !!


!! आरती श्री भैरव जी की !!

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जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा !

जय काली और गौरा देवी कृत सेवा !! जय !!

तुम्हीं पाप उद्घारक दुःख सिन्धु तारक !

भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक !! जय !!

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी !

महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी !! जय !!

तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे !

चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे !! जय !!

तेल चटकि दधि मिश्रित भाषा वलि तेरी !

कृपा करिये भैरव करिए नहीं देरी !! जय !!

पांव घुंघरु बाजत अरु डमरु जमकावत !

बटुकनाथ बन बालकजन मन हरषावत !! जय !!

बटकुनाथ की आरती जो कोई नर गावे !

कहे धरणीधर नर मनवांछित फल पावे !! जय !!


!! साधना यंत्र !!

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      श्री बटुक भैरव का यंत्र लाकर उसे साधना के स्थान पर भैरव जी के चित्र के समीप रखें ! दोनों को लाल वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर यथास्थिति में रखें ! चित्र या यंत्र के सामने माला, फूल, थोड़े काले उड़द चढ़ाकर उनकी विधिवत पूजा करके लड्डू का भोग लगाएं !!


!! साधना का समय !!

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       इस साधना को किसी भी मंगलवार या मंगल विशेष भैरवाष्टमी के दिन आरम्भ करना चाहिए शाम ७ से १० बजे के बीच नित्य ४१ दिन करने से अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती है !!


!! साधना की चेतावनी !!

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 साधना के दौरान खान-पान शुद्ध रखें !!

 सहवास से दूर रहें ! वाणी की शुद्धता रखें और किसी भी कीमत पर क्रोध न करें !!

 यह साधना किसी गुरु से अच्छे से जानकर ही करें !!


!! साधना नियम व सावधानी !!

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१ :-  यदि आप भैरव साधना किसी मनोकामना के लिए कर रहे हैं तो अपनी मनोकामना का संकल्प बोलें और फिर साधना शुरू करें !!


२ :- यह साधना दक्षिण दिशा में मुख करके की जाती है !!


३ :-  रुद्राक्ष या हकीक की माला से मंत्र जप किया जाता है !!


४ :-  भैरव की साधना रात्रिकाल में ही करें !!


५ :-  भैरव पूजा में केवल तेल के दीपक का ही उपयोग करना चाहिए !!


६ :-  साधक लाल या काले वस्त्र धारण करें !!


७ :-  हर मंगलवार को लड्डू के भोग को पूजन- साधना के बाद कुत्तों को खिला दें और नया भोग रख दें।


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