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शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है का शेष भाग

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हम दो चीजों से बहुत भयभीत हैं–काम और मृत्यु।लेकिन ये दोनों ही बुनियादी हैं।वास्तविक अर्थों में सत्यान्वेष इन दोनों में प्रवेश करेगा। वह काम-वृत्ति को समझने के लिए इसमें प्रवृत्त होगा ।


क्योंकि काम-वृत्ति को समझना जीवन को समझना है। और वह यह भी जानना चाहेगा कि मृत्यु क्या है? क्योंकि जब तक तुम यह न जानोगे कि मृत्यु क्या है? तुम शाश्वत जीवन को नहीं जान सकते।


सत्यान्वेष के लिए काम और मृत्यु दोनों बुनियादी हैं लेकिन साधारण मनुष्यता के लिए ये दोनों वर्जनाएं हैं–उनकी चर्चा ही मत करो। और दोनों बुनियादी हैं और दोनों एक -दूसरे से जुड़ी हैं। 


उनका परस्पर संबंध इतना घनिष्ठ है कि काम में प्रवेश करते समय तुम एक प्रकार की मृत्यु में ही प्रविष्ट होते हो; क्योंकि तुम मर रहे हो। अहंकार मिट रहा है समय विलीन हो रहा है तुम मर रहे हो। काम भी एक सूक्ष्म मृत्यु है।


अगर तुम यह जान सको कि काम एक सूक्ष्म मृत्यु है तो मृत्यु एक महान काम-कृत्य, बन जाएगा। कोई सुकरात मृत्यु में प्रवेश करते समय भयभीत नहीं होता। उलटे वह मौत को जानने के लिए अत्यधिक उत्साहित है।


;रोमांचित है ,उतावला है। उसके हृदय में मौत के लिए स्वागत का एक गहरा भाव है। क्योंकि अगर तुम ने काम में घटित होने वाली छोटी मृत्यु को जान लिया है और इसके पीछे-पीछे आने वाले आनंद को जान लिया है।


तो तुम उस महान मृत्यु को जानना चाहोगे–उसके पीछे एक महा-आनंद छिपा है। लेकिन हमारे लिए तो ये दोनों ही वर्जनाएं हैं। तंत्र के लिए ये दोनों ही खोज के मूलभूत आयाम है। इसमें से गुजरना अनिवार्य है।


साथी के प्रगाढ़ आलिंगन में बद्ध तुम यह भूल सकते हो कि दूसरा है। वास्तव में तुम केवल तभी दूसरे को भुला पाते हो। केवल प्रगाढ़ आलिंगन में ही दूसरा नहीं बचता तब तम्हारी ऊर्जा सरलता से प्रवाहित हो सकती है।


नहीं तो दूसरा उसे नीचे की ओर खींचता रहता है।इसलिए योग विधियां विपरीत यौन से पलायन है। उन्हें बचना ही पड़ेगा सावधान रहना पड़ेगा, निरंतर संघर्ष और दमन करना पड़ेगा। 


लेकिन अगर तुम काम-विरोधी हो तो यह विरोध ही तुम्हारे लिए निरंतर तनाव बना रहता है और निरंतर तुम्हें नीचे की ओर खींचता रहता है। तंत्र कहता है ”किसी तनाव की जरूरत नहीं। 


दूसरे के साथ तनाव शून्य विश्राम में रहो। उस शिथिलता के क्षण में दूसरा विलीन हो जाता है और तुम्हारी ऊर्जा ऊपर की ओर बह सकती है। लेकिन वह तभी ऊर्ध्वगमन करती है जब तुम घाटी में हो। 


वह तभी नीचे की ओर बहती है जब तुम शिखर पर होते हो। तंत्र कहता है, जब तुम प्रात: भ्रमण के लिए निकलते हो तुम्हें कोई जल्दी नहीं; क्योंकि तुम्हें कहीं पहुंचना नहीं है। तुम सिर्फ जा रहे हो।


तुम कहीं से भी लौट सकते हो।यह जल्दी का न होना ही घाटी बनाता है नहीं तो शिखर निर्मित हो जाएगा। और जब ऐसा कहा जाता इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें  अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण नहीं रखना है ।


कयोंकि वे परस्पर विरोधी है। तुम उत्तेजना को नियंत्रित नहीं कर सकते। अगर तुम उस पर अकुंश लगाते हो तो  तुम दुगुनी उत्तेजना उत्पन्न कर रहे हो। बस सब ढीला छोड़ दो, इसे खेल की भांति लो।


आरंभ में ऐसा करना कठिन-सा लगेगा, पुरानी आदत है इतनी जल्दी नहीं छूटेगी। बस, शिथिल शिथिल और शिथिल होते जाओ।और ऐसा भी मत सोचो कि तुम कुछ चूक गए हो। तुमने कुछ भी नहीं खोया है।


शुरू-शुरू में कुछ कमी सी महसूस होगी क्योंकि उत्तेजना और शिखर वहां न होंगे। और इससे पहले कि घाटी आए तुम्हें ऐसा प्रतीत होगा जैसे कि कुछ कमी है तुम कुछ खो रहे हो लेकिन यह सिर्फ पुरानी आदत है। 


कुछ समय के भीतर घाटी प्रकट होने लगेगी। और जब घाटी दिखाई देने लगेगी तब तुम अपने शिखरों को भूल जाओगे। लेकिन तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। और उसके साथ जबदरस्ती मत करना।


शिथिलता रिलैक्सेशन एक समस्या है- क्योंकि जब हम कहते हैं शिथिल हो जाओ बुद्धि इसका यही अर्थ करती है कि कुछ प्रयत्न करना होगा। ऐसा हमारी भाषा के कारण प्रतीत होता है। भाषा एक समस्या है। 


कुछ चीजों को भाषा हमेशा गलत ढंग से व्यक्त करती है। अगर तुम पूछते हो, ”कैसे शिथिल हों?” कैसे पूछते

ही तुम असली बात से चूक जाते हो। तुम विधि पूछ रहे हो। विधि चेष्टा को जन्म देगी चेष्टा तनाव पैदा करेगी।


इसलिए कुछ भी मत करो। बस, सब ढीला छोड़ दो केवल शिथिल हो जाओ। एक दूसरे के साथ रहो। एक दूसरे की उपस्थिति में प्रसन्नता अनुभव करो। जब तुम काम-कृत्य को समाप्त बारे सोच रहे होते कि कैसे इसे खत्म करे। 


तब क्रीडा झूठी है; तुम वहां नहीं हो ;तुम्हारा मन कहीं भविष्य में है। यह हमेशा तुम से आगे निकल जाना चाहता है। इसे ऐसा मत करने दो। केवल क्रीडा-रत रहो,  इसे घटित होने दो। तब शिथिल होना आसान हो जाएगा।  


जब तुम उत्तेजित होने लगते हो तुम्हारी सांस तेजी से चलने लगती है।शिथिलता के लिए अच्छा है कि तुम धीमी गति से.. गहरी सांस लो या सांस सहजतापूर्वक और सरलतापूर्वक लो।


केवल यह महसूस करने के लिए कि क्या घट रहा अपने मन का उपयोग करो। जो ऊष्मा प्रवाहित हो रही है जो प्रेम प्रवाहित हो रहा है जिस ऊर्जा से मिलन हो रहा है सिर्फ इसके साथ बहना-अचेष्टित।


तब केवल तब घाटी प्रकट होती है। और एक बार घाटी दिख जाए तुम इसके पार हो गए।एक बार उस घाटी को ,शिथिल काम-संवेग को अनुभव कर लेना ,पहचान लेना ही अतिक्रमण है। वह काम नहीं ध्यान बन गया है।


'ओंम मणि पद्ये हुम् फट् ''। अगर इस पूरे मंत्र को आप दोहराएं , तो आप पाएंगे कि इसमें शरीर के शरीर के अलग -अलग हिस्से तक इसका प्रवेश है। ओंम जैसे गले ओर ऊपर ही घूम कर रह जाता है। 


मणि हृदय तक चला जाता है। पद्ये नाभि तक चला जाता है। हुम् काम -सेंटर तक चला जाता है।  अब ''ओंम मणि पद्ये हुम् फट् '' अगर इस हुम् का बहुत प्रयोग किया जाए, तो काम- सेंटर जो है।


वह बाहर की तरफ प्रवाहित होना बंद हो जाता है। इतनी बड़ी चोट लगती है हुम् की। अगर इस हुम् का बार -बार उपयोग किया जाए, तो आदमी की कामुकता विदा हो जाती है। ओर ऊर्जा उर्घ्व बहने लगती । sabhar kundalni shadhana Facebook wall

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गुरुवार, 27 जनवरी 2022

तँत्र क्यो महत्वपूर्ण है

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साधारण काम-कृत्य में दो उत्तेजित प्राणी मिलते है जो तनाव से भरे हैं ;उत्तेजित है ,स्वयं को भार मुक्त करने में प्रयत्न शील हैं। साधारण काम-कृत्य  पागलपन लगता है। तांत्रिक काम-कृत्य एक गहरा तनावशून्य ध्यान है।


इसमें कोई शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि शक्ति प्राप्त होती है। तुम्हें इस बात का ख्याल भी नहीं होगा लेकिन यह एक जैविक जीव-ऊर्जा का एक तथ्य है कि स्त्री और पुरुष दो विपरीत शक्तियां हैं।


धन और ऋण; यिन और यैग, या जो कुछ भी तुम उन्हें नाम दो। वे दोनों एक दूसरे के लिए चुनौती हैं और जब वे दोनों गहन शिथिलता में मिलते हैं तो एक दूसरे को पुन: जीवन-शक्ति प्रदान करते हैं। 


वे दोनों एक दूसरे में जीवन संचार करते हैं वे दोनों और युवा हो जाते हैं वे दोनों और अधिक सजीवता अनुभव करते हैं वे दोनों नव-शक्ति से कांतिमय हो जाते हैं। और नष्ट कुछ भी नहीं होता।


दो विपरीत ध्रुवों के मिलन से नव शक्ति का संचार होने लगता है। तांत्रिक काम कृत्य उतना किया जा सकता है जितना तुम करना चाहते हो। साधारण काम कृत्य उतना नहीं किया जा सकता जितना तुम करना चाहते हो।


क्योंकि उसमें तुम्हारी ऊर्जा नष्ट हो रही है और तुम्हारे शरीर को उसे पुन: प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। और जब फिर प्राप्त होगी तभी तुम उसे फिर गंवा सकते हो।


यह बात अजीब-सी लगती है सारा जीवन इसे खर्च करने और फिर प्राप्त करने में ही व्यतीत हो जाता है। यहकेवल ग्रस्तता/ आब्सेशन है। दूसरी बात जो स्मरण रखने योग्य है। तुमने इस बात पर गौर नहीं किया होगा।


कि अगर तुम पशु-पक्षियों को देखो तो तुम उन्हें काम- कृत्य का आनंद लेते कभी न पाओगे। बंदरों, कुत्तों या किसी भी पशु को देखो–तुम ऐसा कभी नहीं देखोगे कि वे काम-कृत्य करते हुए हर्षित हो रहे हैं ,आनंदित हो रहे हैं।


उनके लिए यह एक यांत्रिक कृत्य है.. कोई प्राकृतिक शक्ति उन्हें इस कर्म में धकेल रही है। उनके चेहरे देखो। वहां कोई आनंद की झलक नहीं–जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब ऊर्जा विवश करती है।


जब ऊर्जा अतिशय हो जाती है वे बाहर फेंक देते हैं। पशु कभी इसका आनंद नहीं उठा सकते–केवल मनुष्य ही इसका आनंद ले सकता है। और जितनी गहराई से आनंद उठा सकते हो उतनी ही तुममें मानवता का जन्म होता है।


और अगर कहीं काम कृत्य ध्यान बन जाए तो तुम उच्चतम शिखर को छूने में समर्थ हो जाते हो। लेकिन याद रखो, तंत्र, घाटी का कामोत्ताप है। यह शिखर का अनुभव नहीं है यह घाटी का अनुभव है।


तुम उत्तेजना में शिखर की ओर बढ़ते हो और फिर धड़ाम से नीचे गिर जाते हो और फिर हाथ आती है खिन्नता। तुम ऊंचे शिखर से गिर पड़ते हो। तंत्र-काम कृत्य में तुम ऐसा कभी अनुभव नहीं करते।


तुम नीचे नहीं गिर रहे। तुम और इसके आगे नीचे नहीं गिर सकते–तुम घाटी में ही थे। बल्कि तुम ऊपर उठ रहे हो। तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम ऊर्जा से भर गए हो ।तुम और सजीव, ओजस्वी, कांतिमय हो गए हो। 


और वह आनंद कई घंटों तक यहां तक कि कई दिनों तक बना रहेगा। यह सब इस बात पर आश्रित है कि तुम इस कृत्य में कितना गहरे जा पाए थे।और अगर तुम देर-अबेर इसमें गति कर सको तो तुम जान सकोगे।


वीर्य-स्खलन से ऊर्जा नष्ट होती है। इसकी आवश्यकता ही नहीं है–जब तक तुम्हें बच्चों की आवश्यकता नहीं है। और सारा दिन तुम एक गहन शिथिलता, एक गहन विश्रांति महसूस करोगे।


और कई दिनों तक तुम्हें एक ऐसे सुख का अनुभव होगा जैसे तुम घर पहुंच गए हो तुम्हें अहिंसा, अविरोध, अखिन्नता की मीठी प्रतीति होगी। ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए कभी कोई खतरा नहीं बन सकता। 


अगर संभव होगा तो वह दूसरों को प्रसन्न रखने मेंसहायक होगा। अगर वह ऐसा नहीं कर सकेगा तो कम से कम किसी को दुख न देगा। केवल तंत्र ही नये मनुष्य का निर्माण कर सकता है।


एक ऐसा मनुष्य जिसने समय -शून्यता, निरहंकारिता का जान लिया है और अब अस्तित्व के साथ गहरा अद्वैत विकसित होगा। एक दूसरा आयाम खुल गया है। अब वह घड़ी दूर नहीं जब काम-वासना तिरोहित हो जाएगी। 


जब काम वासना अनजाने ही विलीन हो जाती है तब अचानक एक दिन तुम्हें ज्ञात होता है कि काम-वासना तिरोहित हो गई है और तब ब्रह्मचर्य का जन्म होता है।


लेकिन गलत शिक्षा के कारण कठिन और दुःसाध्य लगती है। और तुम भयभीत भी हो अपने मन के संस्कारों के कारण।


                                              

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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

पांचवां शिवसूत्र-"उद्यमो भैरव:''

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1-भगवान   शिव कहते है "उद्यमो भैरव:''-उद्यम ही भैरव है।उद्यम का अर्थ है प्रगाढ़ श्रम। उद्यम उस आध्यात्मिक प्रयास को कहते हैं, जिससे तुम इस  संसार रूपी कारागृह के बाहर होने की चेष्टा करते हो।जो चेष्टा /Effort करता है, वही भैरव है। भैरव शब्द पारिभाषिक है।’भ' का अर्थ है 'भरण';'र' का अर्थ है रवण;और  'व' का अर्थ है वमन। भरण का अर्थ है Maintenance , रवण का अर्थ है संहार, और वमन का अर्थ है फैलाना।मूल अस्तित्व का नाम भैरव है।हिंदू देवताओं में भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है।भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करनेवाला। भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा विष्णु  और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव  के  गण और पार्वती के अनुचर माने जातेहैं।भैरव  नाम में दार्शनिक गुण हैं और   स्पष्ट जागरूकता और सावधान रवैया के कारण स्पष्ट अंतर्ज्ञान है। 


2-जिस दिन भी तुमने आध्यात्मिक जीवन की चेष्टा शुरू की, तुम भैरव होने लगे;अथार्त तुम परमात्‍मा के साथ एक होने लगे। तुम्हारे भीतर मुक्त होने का पहला खयाल तुम्हारी चेष्टा की पहली किरण है ,और तुमने यात्रा शुरू कर दी।मंजिल  भी ज्यादा दूर नहीं है क्योंकि पहला कदम ही करीब-करीब आधी यात्रा है।तुम्हारे भीतर जैसे ही यह भाव सघन होना शुरू हुआ कि अब मैं मूर्च्छा से बाहर  निकलूं और चैतन्य बनूं वैसे ही तुम भैरव होने लगते हो...अथार्त ब्रह्म के साथ एक होने लगे।तुम उसी सागर के झरने हो, उसी सूरज की किरण हो,  उसी महा आकाश के एक छोटे से खंड हो..मूलत: तो तुम एक हो ही।वास्तव में ,तुम एक हो ही, लेकिन सिर्फ यह स्मरण आ जाए तो तुम्हारी यात्रा प्रारभ्म हो गयी।मंजिल पहुंचने में तो समय लगेगा;लेकिन तुमने चेष्टा शुरू कर दी ।


3-चेष्टा से तुम्हारे भीतर बीज आरोपित हो जाता  हैं कि मैं  इस कारागृह रूपी संसार  से बाहर आ जाऊं, शरीर से,जन्मों की आकांक्षा ,वासना से मुक्त हो जाऊं और अब इस संसार में फंसाव के बीज न बोऊं। तुम्हें यह स्मरण आना शुरू हो जाये और दीवालें विसर्जित होने लगें, तो तुम इस महा आकाश के साथ एक हो जाओगे।बड़ी जबरदस्त चेष्टा करना जरूरी है क्योंकि गहरी नींद  है; जब तोड़ने का  सतत प्रयास   करोगे, तो ही टूट पायेगी ,आलस्य से संभव नहीं होगा।उद्यम का अर्थ है..तुम्हारी पूरी चेष्टा संलग्र हो जाये।आज तोड़ोगे, और कल फिर बना लोगे तो फिर भटकते रहोगे।लोग शिकायत करते हैं 'हम करते हैं, लेकिन कुछ हो नहीं रहा।इसका अर्थ है कि  उनके करने में कोई प्राण नहीं हैं ...इसलिए नहीं होता।शिकायत का अर्थ है कि कहीं कुछ अन्याय हो रहा है कि दूसरों को हो रहा है, हमें नहीं हो रहा है।वास्तव में ,इस जगत में अन्याय होता ही नहीं।जो भी होता है, वह न्याय ही है। क्योंकि न्याय-अन्याय करने को यहां कोई मनुष्य नहीं बैठा है।जगत में तो तटस्थ नियम हैं, उन्हीं तटस्थ नियमों का नाम धर्म है। 


4-गुरुत्वाकर्षण  के नियम न तुम्हें गिराने को उत्सुक है, न तुम्हें सम्हालने में उत्सुक है।जब तुम सीधे चलते हो, तो वही तुम्हें संभालता है  और जब तिरछे चलते हो, तो वही तुम्हें गिराता है।न उसकी कोई गिराने कीआकांक्षा है, न सम्हालने की।वह परम नियम है... तटस्थ है और तुम्हारी तरह पक्षपात नहीं करता कि किसी को गिरा दे, किसी को उठा दे। तुम जैसे ही ठीक चलने लगते हो, वह तुम्हें संभालता है।तुम गिरना चाहते हो तो ही वह तुम्हें गिराता है।वह हर हालत में उपलब्ध है ;उसके द्वार बंद नहीं है।तुम दरवाजा खोलकर भीतर जाना चाहते हो,तो भीतर चले जाओ या दरवाजे से सिर ठोकना चाहते हो,तो सिर ठोक लो।उद्यम भैरव है और इसके लिए महान श्रम चाहिए।श्रम में तुम्हारी समग्रता लग जाये...तब तुम्हारे भैरव हो जाने में देर न लगेगी।भैरव का प्रतीकात्मक अर्थ है.... ब्रह्म जो धारण किये है, जो सम्हाले है, जिसमें हम पैदा होंगे, और जिसमें हम मिटेंगे।जो सृष्टि का Origin  है और जिसमें प्रलय भी होगा। 


...SHIVOHAM..... sabhar chidananda Facebook wall

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कुण्डलिनी जागरण का दुसरा उपाय

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 {{{ॐ}}}


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कुण्डलिनी जागरणका दुसरा उपाय है नियमित मंत्र जप। यह एक बहुत ही शक्तिशाली , सरल एवं निरापद मार्ग है परन्तु निस्संदेह यह एक साधना है जिसमें अपेक्षा कृत अधिक समय तथा धैर्य की आवश्यकता होती है ।

पहलेतो मंत्र और योग के किसी ऐसे योग्य गुरू से अनुकूल मंत्र लेना होता है जो साधना मार्ग  में पथ प्रदर्शन कर सके।

जब आप मंत्र का निरन्तर अभ्यास करते रहते है तो आंतरिक शक्ति में वृद्धि होती है इससे जीवन मे तटस्थ रहने के दृष्टिकोण का विकास होता है।

जिस प्रकार किसी शांत झील मे कंकड  फेंकने पर उसमे तरंगे उत्पन्न होती है उसी प्रकार  मंत्र को बार बार दोहराने से मन रूपी समुद्र मे भी तरंगें उत्पन्न होती है लाखों करोडों बार उसी मंत्र को दोहराने से मस्तिक का कोना कोना उससे झंकृत हो जाता है । इससे आपके शारीरिक , मानसिक एवं  आध्यात्मिक तीनो स्तरो का शुद्धिकरण हो जाता है।

मंत्र का उच्चारण मानसिक और मनोविज्ञानिक स्तरो पर ध्वनि मे मंद गति से किया जाना चाहिए ।। इन चारो स्थितियों मे मंत्र का अभ्यास करने से कुण्डलिनी जागरण  बिना परेशानी  के सही ढगं से होता है मंत्र को श्वास के साथ मानसिक रूप से दोहराया जा सकता है  और कीर्तन  भी जा सकता है उससे मुलाधार पर भी काफी प्रभाव पडता है जहॉ से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है।

स्वर अथवा संगीत के द्वारा कुण्डलिनी जागरण  भी लगभग मंत्रयोग की तरह  ही है जिसे नादयोग कहते है इससे ध्वनियां बीच मंत्रो की तरह कार्य करती है क्यो कि संगीत मे राग अथवा सुर  चक्र विशेष से संबधित है। जागरण का यह सबसे सौम्य ढगं है। sabhar sakti upasak agyani Facebook wall

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शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

योग मुद्रा के बारे में जानकारी

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श्री कृष्ण ने अर्जुन को 13 प्रकार के योग मुद्रा के बारे में जानकारी देकर उनके मन के मैल को साफ किया था। भागवत गीता में उल्लेखित प्रमुख 13 योग है..


1-विषाद योग :- विषाद यानी दुख। युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने अपनो को सामने देखा तो वह विषाद योग से भर गए। उनके मन में निराशा और अपनो के नाश का भय हावी होने लगा। 


तब भगवान श्रीकष्ण ने अर्जुन के मन से यह भय दूर करने का प्रयास किया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, वही गीता बनीं। उन्होंने सर्वप्रथम विषाद योग से अर्जुन को दूर किया और युद्ध के लिए तैयार किया था।

 

2-सांख्य योग :- सांख्य योग के जरिये भगवान श्रीकृष्ण ने पुरुष की प्रकृति और उसके अंदर मौजूद तत्वों के बारे में समझाया। उन्होनें अर्जुन को बताया कि मनुष्य को जब भी लगे कि उस पर दुख या विषाद हावी हो रहा है ।


उसे सांख्य योग यानी पुरुष प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए। मनुष्य पांच सांख्य से बना है, आग, पानी, मिट्टी, हवा। अंत में मनुष्य इसी में मिलता है।


3-कर्म योग:- भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जीवन में सबसे बड़ा योग कर्म योग है। इस योग से देवता भी नहीं बच सकते। कर्म योग से सभी बंधे हैं। सभी को कर्म करना है। इस बंधन से कोई मुक्त नहीं हो सकता है।


साथ ही यह भी समझाया की कर्म करना मनुष्य का पहला धर्म है। उन्होंने अर्जुन को समझाया कि सूर्य और चंद्रमा भी अपने कर्म मार्ग पर निरंतर प्रशस्त रहते हैं। तुम्हें भी कर्मशील बनना होगा।


4-ज्ञान योग:- भगवान श्रीकृष्ण अजुर्न से कहा कि ज्ञान अमृत समान होता है। इसे जो पी लेता है उसे कभी कोई बंधन नहीं बांध सकता। 


ज्ञान से बढ़कर इस दुनिया में कोई चीज़ नहीं होती है। ज्ञान मनुष्य को कर्म बंधनों में रहकर भी भौतिक संसर्ग से विमुक्त बना देता है।


5-कर्म वैराग्य योग:- भगवान ने अर्जुन को बताया कि कर्म से कोई मुक्त नहीं, यह सच है, लेकिन कर्म को कभी कुछ पाने या फल पाने के लिए नहीं करना चाहिए। मनुष्य को अपना कर्म करना चाहिए।


यह सोचे बिना कि इसका फल उसे कब मिलेगा या क्या मिलेगा। कर्म के फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। ईश्वर बुरे कर्मों का बुरा फल और अच्छे कर्मों का अच्छा फल देते हैं।


6-ध्यान योग:- ध्यान योग से मनुष्य खुद को मूल्यांकन करना सीखता है। इस योग को करना हर किसी के लिए जरूरी है। 


ध्यान योग में मन और मस्तिष्क का मिलन होता है और ऐसी स्थिति में दोनों ही शांत होते हैं और विचलित नहीं होते। ध्यान योग मनुष्य को शांत और विचारशील बनता है।


7-विज्ञान योग:- इस योग में मनष्य किसी खोज पर निकलता है। सत्य की खोज विज्ञान योग का ही अंग है। इस मार्ग पर बिना किसी संकोच के मनुष्य को चलना चाहिए। विज्ञान योग तप योग की ओर अग्रसर होता है।


8-अक्षर ब्रह्म योग:- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि अक्षर ब्रह्म योग की प्राप्ति से ही ब्रह्मा, अधिदेव, अध्यात्म और आत्म संयम की प्राप्ति होती है। मनुष्य को अपने भौतिक जीवन का निर्वाह शून्य से करना चाहिए।


अक्षर ब्रह्म योग के लिए मनुष्य को अपने अंदर के हर विचार और सोच को बाहर करना होता है। नए सिरे से मन को शुद्ध कर इस योग को कराना होता है।


9-राज विद्या गुह्य योग:- इस योग में स्थिर रहकर व्यक्ति परम ब्रह्म का ज्ञानी होता है। मनुष्य को परम ज्ञान प्राप्ति के लिए राज विद्या गुह्य योग का आत्मसात करना चाहिए। इसे करने वाला हर बंधनों से मुक्त हो सकता है।


10-विभूति विस्तार योग:- मनुष्य विभूति विस्तार योग के जरिये ही ईश्वर के नजदीक पहुंचता है। इस योग के माध्यम से साधक ब्रह्म में लीन हो कर अपने ईश्वर मार्ग पर प्रशस्त  होता है।


11-विश्वरूप दर्शन योग:-इस योग को मनुष्य जब कर लेता है तब उसे ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन होता है। ये अनंत योग माना गया है। ईश्वर तक विराट रूप योग के माध्यम से अपना रूप प्राप्त किए हैं।


12-भक्ति योग:- भक्ति योग ईश्वर प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ योग है। बिना इस योग के भगवान नहीं मिल सकते। जिस मनुष्य में भक्ति नहीं होती उसे भगवान कभी नहीं मिलते।


13-क्षेत्र विभाग योग:- क्षेत्र विभाग योग ही वह जरिया है जिसे जरिये मनुष्य आत्मा, परमात्मा और ज्ञान के गूढ़ रहस्य को जान पाता है। इस योग में समा जाने वाले ही साधक योगी होते हैं।


भगवत गीता में वर्णित ये योग, मौजूदा समय में मनुष्य की जरूरत हैं। इसे अपनाने वाला ही असल मायने में अपने जीवन को पूर्ण रूप से जी पाता है।


योगी वह है जो पिण्ड के अन्दर जीव का आत्मा से मिलन (हंसो) साधना के माध्यम (स्वांस-प्रस्वांस) से करते हैं।  ज्ञानी या तत्वज्ञानी वह है जो ब्रह्माण्ड के अन्दर मानव का अवतार से मिलन तत्त्वज्ञान के माध्यम से करते हैं।


योगी अपने लक्ष्य रूप आत्मा की प्राप्ति हेतु अपने मन को इन्द्रिय रूपी गोलकों से अथार्त बहिर्मुखी से हटाकर /खींचकर अंतर्मुखी बनाते हुये स्वास-प्रस्वास में लगाकर जीव को समाधि अवस्था में आत्मा से मिलन करता है।


ये समस्त क्रियाएँ पिण्ड में होती, पिण्ड से बाहर योगी की कोई क्रिया-प्रक्रिया नहीं होती है। परन्तु तत्त्वज्ञानी अपने लक्ष्य रूप परमात्मा की प्राप्ति हेतु अपने जीवात्मा से युक्त शरीर /पिण्ड को सम्बन्ध।


ममता-आसक्ति रूपी सम्बन्धियों से मोह आदि से हटाकर पूर्णतः समर्पण /शरणागत होते हुये सत्संग एवं धर्म संस्थापनार्थ अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति को लगाते हुये अनुगामी के रूप में रहता है।


योगी का कार्यक्षेत्र मात्र एक पिण्ड के अन्तर्गत ही रहता है परन्तु ज्ञानी का कार्यक्षेत्र सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है। योगी ‘अहम्’ रूप जीव को आत्मा से मिलाकर जीवात्मा (हंसो) भाव से मात्र समाधि अवस्था तक ही रहता है।


परन्तु ज्ञानी ‘अहम्’ रूप जीव को ‘सः’ रूप आत्मा से मिलाते हुये परमात्मा से मिलाकर शरणागत भाव से शाश्वत् अद्वैत्तत्त्वबोध रूप में हो जाता है।


योगी-मात्र समाधि में ही आत्मामय (हंसो) रूप में रहता है, जैसे ही समाधि टूटती है, वह पुनः सोsहं रूप होते हुये अहंकारी रूप ‘अहम्’ तत्पश्चात् शरीर में फँस जाता है।


ठीक इसी प्रकार ज्ञानी शरणागत रूप में ही ‘मुक्त’ अमरता, परमपद, परमतत्त्वमय, पापमुक्त, बन्धन मुक्त, सच्चिदानन्दमय (आत्मतत्त्वम्) रूप में रहता है परन्तु शरणागतभाव के टूटते ही वह पुनः मिथ्याज्ञानभिमानी रूप ‘अहम्’ शरीर में फँस जाता है।


जहाँ पर दो नदियाँ मिलकर तीसरा रूप लेकर बहती हैं तो वह मिलन-स्थल ही संगम है। परन्तु जहाँ पर तीनों नदियाँ- गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हों, उसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता।  


उसमें भी जहाँ अक्षय-वट हो, वह भी भारद्वाज ऋषि जैसे उपदेशक के साथ, तो उसकी महिमा में चार चाँद ही ला देता है। परन्तु यह सारी महिमा मात्र कर्मकांडियों के लिए ही है।


योगियों-महात्माओं और ज्ञानियों के लिए नहीं, क्योंकि कर्म-कांड की मर्यादा तभी तक रहती है, जब तक कि योग-साधना नहीं की जाती और ज्ञान में तो ये कर्मकांडी और योगी-महात्मा सभी आकर विलय कर जाते हैं।


भगवद गीता अध्याय: 6 श्लोक 46 में श्री कृष्ण कहते है 


तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

 कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥


योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ  है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ  sabhar Facebook wall yog shadhana kundalni

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बुधवार, 19 जनवरी 2022

योनिवर्ग और कलाशरीरम

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1-भगवान   शिव कहते है 'योनिवर्ग और कलाशरीरम'... योनिवर्ग और कला शरीर है।योनि से अर्थ है  प्रकृति और प्रकृति  ही शरीर देती है।कला का अर्थ है ..कर्त्ता का भाव। एक ही कला है और वह  है संसार में उतरने की कला अथार्त कर्त्ता का भाव। इन दो चीजों से मिलकर तुम्हारा शरीर निर्मित होता है ...तुम्हारा कर्त्ता का भाव, तुम्हारा अहंकार, और प्रकृति से मिला हुआ शरीर। अगर तुम्हारे भीतर कर्ता का भाव है, तो प्रकृति तुम्हें योग्य शरीर देती चली जायेगी।प्रकृति तो सिर्फ योनि है ...गर्भ है। तुम्हारा अहंकार उस योनि में बीज बनता है। तुम्हारे कर्तृत्व का भाव, कि मैं यह करूं, मैं यह पाऊं, मैं यह हो जाऊं ..उसमें बीज बनता है। और जहां भी तुम्हारे कर्तृत्व का कला और प्रकृति की योनि का मिलन होता है, शरीर निर्मित हो जाता है।  तुम बार बार जन्मे हो। कभी तुम पशु थे, कभी पक्षी थे, कभी वृक्ष थे, कभी मनुष्य ..तुमने जो चाहा है, वह तुम्हें मिला है। 


2-तुमने जो आकांक्षा की है,  जो कर्तृत्व की वासना की है, वही घट गया है। तुम्हारे कर्तृत्व की वासना घटना बन जाती है और विचार वस्तुएं बन जाते हैं। इसलिए सोच विचारकर वासना करना है क्योंकि देर अबेर सभी वासनाएं पूरी हो जाती हैं।


अगर तुम बहुत बार आकाश में पक्षी को  देखते हो और सोचते हो कि कैसी स्वतंत्रता है पक्षी को ..काश हम पक्षी होते! तो देर न लगेगी, जल्दी ही तुम पक्षी हो जाओगे।तुम जो भी वासना अपने भीतर संगृहीत करते हो, वह बीज बन जाती है।प्रकृति तो केवल शरीर देती है; स्वयं को निर्माण करने वाले कलाकार तो तुम्हीं हो।कला का अर्थ है कि अपने शरीर को तुमने ही बनाया है।तुम्हारी वासना ही शरीर निर्मित करती है।अगर हम ध्यान दे तो   रात में सोते समय जो आखिरी विचार होता है , वही सुबह उठते वक्त पहला विचार होता है। और रातभर तुम सोये रहे। वह  विचार बीज की तरह भीतर पड़ा रहा। जो अंतिम था, वह सुबह प्रथम हो गया।


3-आखिरी मरते क्षण में, तुम्हारे सारे जीवन की वासना संगृहीत होकर बीज बन' जायेगी। वही बीज नया गर्भ बन जायेगा। जहां से तुम मिटे, वहीं से तुम फिर शुरू हो जाओगे।आज तुम जो भी हो, वह तुम्हारा ही कृत्य है।इसीलिए किसी दूसरे को दोष मत देना।यहां कोई दूसरा है भी नहीं, जिसको दोष दिया जा सके। यह तुम्हारे ही कर्मों का संचित फल है। तुम जो भी हों ...रूपवान या कुरूप, दुखी या सुखी, स्री या पुरुष ... यह तुम्हारे ही कृत्यों का फल है। तुम ही अपने जीवन के कलाकार हो ।इसीलिए यह मत कहना कि भाग्य ने बनाया है; क्योंकि वह धोखा है। तुम परमात्मा पर जिम्मेवारी मत डालना; क्योंकि वह तरकीब है, खुद के दायित्व से बचने की। इस कारागृह में तुम अपने ही कारण हो। जो व्यक्ति इस बात को ठीक से समझ लेता है कि अपने ही कारण मैं यहां हूं उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है।इसलिए  Enlightened One कहते हैं कि सभी वासनाओं को छोड़ दो, तभी तुम मुक्त हो सकोगे। 


4-तुमने अगर स्वर्ग की वासना की तो तुम देवता हो जाओगे, लेकिन वह भी मुक्ति न होगी। क्योंकि वासनाओं से कभी भी अशरीर की स्थिति पैदा नहीं होती; सभी वासनाओं से शरीर ही  निर्मित होता है। जब तक तुम Lustless  को उपलब्ध नहीं होते;  तब तक तुम नये शरीरों में भटकते रहोगे।भिन्न -भिन्न शरीर के ढंग अलग हों,परन्तु  शरीर की मौलिक स्थिति एक ही जैसी है।शरीर के दुख समान है; चाहे पक्षी का शरीर हो,या चाहे मनुष्य का शरीर 'हो। दुखों में कोई भेद नहीं है। क्योंकि मौलिक दुख है ..आत्मा का शरीर में बंध जाना या कारागृह में प्रविष्ट हो जाना। फिर कारागृह की दीवालें Circular  हैं या कि Triangular या  Square ...उससे  कुछ फर्क नहीं पड़ता।कारागृह, कारागृह है। पक्षी का शरीर  हो या  मनुष्य का, बहुत फर्क नहीं पड़ता। तुम  बंध गये हो.. बस वही दुख है। वासना बांधती है। वासना है रज्‍जु,अथार्त रस्सी  जिससे हम बंधते है। और ध्यान रखना है कि तुम्हारे अतिरिक्त कोई और जिम्मेवार नहीं है।


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रविवार, 16 जनवरी 2022

अजूबा ही नहीं, एक तिलिस्म है मानवी शरीर

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अपनी अंगुलियों से नापने पर 96 अंगुल लम्बे इस मनुष्य−शरीर में जो कुछ है, वह एक बढ़कर एक आश्चर्यजनक एवं रहस्यमय है।


हमारी शरीर यात्रा जिस रथ पर सवार होकर चल रही है उसके प्रत्येक अंग-अवयव या कलपुर्जे कितनी विशिष्टतायें अपने अन्दर धारण किये हुए है, इस पर हमने कभी विचार ही नहीं किया। यद्यपि हम बाहर की छोटी-मोटी चीजों को देखकर चकित हो जाते हैं और उनका बढ़ा-चढ़ा मूल्याँकन करते हैं, पर अपनी ओर, अपने छोटे-छोटे कलपुर्जों की महत्ता की ओर कभी ध्यान तक नहीं देते। यदि उस ओर भी कभी दृष्टिपात किया होता तो पता चलता कि अपने छोटे से छोटे अंग अवयव कितनी जादू जैसी विशेषता और क्रियाशीलता अपने में धारण किये हुए हैं। उन्हीं के सहयोग से हम अपना सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन जी रहे हैं।


विशिष्टता हमारी काया के रोम-रोम में संव्याप्त है। आत्मिक गरिमा तथा शरीर की सूक्ष्म एवं कारण सत्ता को जिसमें पंचकोश, पाँच प्राण, कुण्डलिनी महाशक्ति, षट्चक्र, उपत्यिकाएँ आदि सम्मिलित हैं, की गरिमा पर विचार करना पीछे के लिए छोड़कर मात्र स्थूलकाय संरचना और उसकी क्षमता पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दीखता है। वनस्पति तो क्या-मनुष्येत्तर प्राणि शरीरों में भी वे विशेषताएं नहीं मिलतीं जो मनुष्य के छोटे और बड़े अवयवों में सन्निहित हैं। कलाकार ने अपनी सारी कला को इसके निर्माण में झोंक दिया है।


शरीर रचना से लेकर मनःसंस्थान और अन्तःकरण की संवेदनाओं तक सर्वत्र असाधारण ही असाधारण दृष्टिगोचर होता है। यदि हम कल्पना करें और वैज्ञानिक दृष्टि से आँखें उघाड़ कर देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य−शरीर के निर्माण में स्रष्टा ने जो बुद्धि, कौशल खर्च किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किया तथा परिश्रम जुटाया, वह अन्य किसी भी शरीर के लिए नहीं किया। मनुष्य सृष्टि का सबसे विलक्षण उत्पादन है। ऐसा आश्चर्य और कोई दूसरा नहीं है। यह सर्व क्षमता संपन्न जीवात्मा का अभेद्य दुर्ग, यंत्र एवं वाहन है। यह जिन कोषों से बनता है, उसमें चेतन परमाणु ही नहीं होते, वरन् दृश्य जगत में दिखाई देने वाली प्रकृति का भी उसमें योगदान है।


इससे मनुष्य−शरीर की क्षमता और मूल्य और भी बढ़ जाता है। ठोस द्रव और गैस जल, आक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन सिल्वर, सोना, लोहा, फास्फोरस आदि जो कुछ भी तत्व पृथ्वी में हैं और जो कुछ पृथ्वी में नहीं हैं, अन्य ग्रह नक्षत्रों में हैं, वह सब भी स्थूल और सूक्ष्म रूप में शरीर में है। 


जिस तरह वृक्ष में कहीं तने, कहीं पत्ते, कहीं फल एक व्यापक विस्तार में होते हैं,शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में उसी प्रकार विभिन्न लोक और लोकों की शक्तियां विद्यमान देखकर ही शास्त्रकार ने कहा था-’यत्ब्रह्माण्डेतत्पिंडे’ ब्रह्माण्ड की संपूर्ण शक्तियां मनुष्य−शरीर में विद्यमान हैं।


सूर्य चन्द्रमा, बुद्ध, बृहस्पति, उत्तरायण, दक्षिणायन मार्ग, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु, विद्युत, चुम्बकत्व, गुरुत्वाकर्षण आदि सब शरीर में हैं। यह समूचा विराट् जगत अपनी इसी काया के भीतर समाया हुआ है।

आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि जो विशेषताएं और सामर्थ्य प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की हैं, वह सृष्टि के किसी भी प्राणी-शरीर को उपलब्ध नहीं।


गर्भोपनिषद् के अनुसार मानवी काया में 180 संधियाँ, 107 मर्मस्थान, 109 स्नायु, और 700 शिरायें हैं। 500 मज्जायें, 306 हड्डियाँ, साढ़े चार करोड़ रोएं, 8 पल हृदय, 12 पल जिह्वा, एक प्रस्थ पित्त, एक आढ़क कफ, एक कुड़वशुक्र, दो प्रस्थ मेद हैं। इसके अतिरिक्त आहार ग्रहण करने व मल मूत्र निष्कासन के जो अच्छे से अच्छे यंत्र इस शरीर में लगे हैं, वह अन्य किसी भी शरीर में नहीं है।


स्थूलशरीर पर दृष्टि डालने से सबसे पहले त्वचा नजर आती है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक वयस्क व्यक्ति के त्वचा का भार लगभग 9 पौण्ड होता है जो कि प्रायः मस्तिष्क से तीन गुना अधिक है। यह त्वचा 18 वर्ग फुट से भी अधिक जगह घेरे रहती है। मोटे तौर से देखने पर वह ऐसी लगती है मानों शरीर पर कोई मोमी कागज चिपका जो, परन्तु बारीकी से देखने पर पता चलता है कि उसमें भी एक पूरा सुविस्तृत कारखाना चल रहा है।


शरीर पर इसका क्षेत्रफल लगभग 250 फुट होता है। सबसे पतली वह पलकों पर होती है- .5 मिलीमीटर। पैर के तलुवों में सबसे मोटी है- 6 मिलीमीटर। साधारणतया उसकी मोटाई 0.3 से लेकर 300 मिलीमीटर तक होती है। एक वर्ग इंच त्वचा में प्रायः 72 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा रहता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट लम्बी तंत्रिकाओं का जाल बिछा होता है। इतनी ही जगह में रक्त नलिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट से कम न बैठेगी। यह रक्तवाहनियां सर्दी में सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती रहती है ताकि शारीरिक तापमान का संतुलन ठीक बना रहे। चमड़ी की सतह पर प्रायः 3 लाख स्वेद ग्रंथियाँ और अगणित छोटे-छोटे बारीक छिद्र होते हैं। इन रोमकूपों से लगभग एक पौण्ड पसीना प्रति दिन बाहर निकलता रहता है। त्वचा के भीतर बिखरे ज्ञान तन्तुओं को यदि एक लाइन में रख दिया जाय तो वे 45 मील लम्बे होंगे।


त्वचा से ‘सीवम’ नामक एक विशेष प्रकार का तेल निकलता रहता है। यह सुरक्षा और सौंदर्य वृद्धि के दोनों ही कार्य करता है। उसकी रंजक कोशिकायें ‘मिलेनिन’ नामक रसायन उत्पन्न करती है। यही चमड़ी को गोरे, काले भूरे आदि रंगों से रंगता रहता है। त्वचा देखने में एक प्रतीत होती है, पर उसके तीन मोटे विभाग किये जा सकते हैं- ऊपरी त्वचा, भीतरी त्वचा तथा सब क्युटेनियम टिष्यू। नीचे वाली परत में रक्त वाहिनियाँ, तंत्रिकाएँ एवं वसा के कण होते हैं। इन्हीं के द्वारा चमड़ी हड्डियों से चिपकी रहती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ जब यह वसा कण सूखने लगते हैं तो त्वचा पर झुर्रियाँ लटकने लगती हैं।


भीतरी त्वचा पर में तंत्रिकाएँ, रक्तवाहनियां रोमकूप, स्वेद ग्रंथियाँ तथा तेल ग्रंथियाँ होती हैं। इन तंत्रिकाओं को एक प्रकार से संवेदना वाहक टेलीफोन के तार कह सकते हैं। वे त्वचा स्पर्श की अनुभूतियों को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं और वहाँ के निर्देश- संदेशों को अवयवों तक पहुँचाते हैं। त्वचा कभी भी झूठ नहीं बोलती। झूठ पकड़ने की मशीन-’लाय डिटेक्टर या पोली ग्राफ मशीन’ इस सिद्धान्त पर कार्य करती है कि दुराव-छिपाव से उत्पन्न हार्मोनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप त्वचा के वैद्युतीय स्पंदन एवं रग में जो परिवर्तन या तनाव उत्पन्न होता है, वह सारे रहस्यों को उजागर कर देता है।


साँप की केंचुली सबने देखी है। जिस प्रकार सांप अपनी केंचुली बदलता है, उसी प्रकार हम भी अपनी त्वचा हर-चौथे पाँचवें दिन बदल देते हैं। होता यह है कि हमारी शारीरिक कोशिकायें करोड़ों की संख्या में प्रति मिनट के हिसाब से मरती रहती हैं और नयी कोशिकायें पैदा होती रहती हैं और इस प्रकार केंचुली बदलने का क्रम चलता रहता है। यह क्रम बहुत हलका और धीमा होने से हमें दिखाई नहीं पड़ता। इस तरह जिन्दगी भर में हमें हजारों बार अपनी चमड़ी की केंचुली बदलनी पड़ती है। यही हाल आँतरिक अवयवों का भी है। किसी अवयव का कायाकल्प जल्दी-जल्दी होता है तो किसी का देर में धीमे-धीमे।

यह परिवर्तन अपनी पूर्वज कोशिकाओं के अनुरूप ही होता है, अतः अंतर न पड़ने से यह प्रतीत नहीं होता कि पुरानी के चले जाने और नयी स्थानापन्न होने जैसा कुछ परिवर्तन हुआ है।


त्वचा के भीतर प्रवेश करें तो मांसपेशियों का सुदृढ़ ढांचा खड़ा मिलता है। उन्हीं के आधार पर शरीर का हिलना डुलना, मुड़ना, चलना, फिरना संभव हो रहा है।शरीर की सुन्दरता, सुदृढ़ता और सुडौलता बहुत करके मांसपेशियों की संतुलित स्थिति पर ही निर्भर रहती है। मांसपेशियों की बनावट एवं वजन के हिसाब से ही मोटे और पतले आदमियों की पहचान होती है। प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में 600 से अधिक मांसपेशियां होती हैं और उनमें से प्रत्येक के अपने विशिष्ट कार्य होते हैं। इनमें से कितनी ही अविराम गति से जीवन पर्यंत तक अपने कार्य में जुटी रहती हैं, यहाँ तक कि सोते समय भी, जैसे कि हृदय का धड़कना, फेफड़ों का सिकुड़ना-फैलना, रक्त संचार, आहार का पचना आदि की क्रियायें अनवरत रूप से चलती रहती हैं।

30 माँस पेशियां ऐसी होती हैं जो खोपड़ी की हड्डियों से जुड़ी होती है और चेहरे भाव परिवर्तन में सहायता करती हैं। शैशव अवस्था में प्रथम तीन वर्ष तक मांसपेशियों का विकास हड्डियों से भी अधिक दो गुनी तीव्र गति से होता है इसके बाद विकास की गति कुछ धीमी पड़ जाती है जब शरीर में अचानक परिवर्तन उभरते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। संरचना में प्रत्येक मांसपेशी अनेकों तन्तुओं से मिलकर बनी होती है। वे बाल से भी पतले होते हैं, पर मजबूत इतने कि अपने वजन की तुलना में एक लाख अधिक भारी वजन उठा सके।


इन अवयवों में से जिस पर भी तनिक गहराई से विचार करें तो उसी में विशेषताओं का भण्डार भरा दीखता है। यहाँ तक कि बाल जैसी निर्जीव और बार-बार खर-पतवार की तरह उखाड़-काट कर फेंक दी जाने वाली वस्तु भी अपने आप में अद्भुत हैं।


प्रत्येक मनुष्य का शरीर असंख्य बालों से (लगभग साढ़े चार करोड़) ढका होता है, यद्यपि वे सिर के बालों की अपेक्षा बहुत छोटे होते हैं। सिर में औसतन 120000 बाल होते हैं। प्रत्येक बाल त्वचा से एक नन्हें गढ्ढे से निकला है जिसे रोमकूप कहते हैं। यहीं से बालों को पोषण होता है। बालों की वृद्धि प्रतिमास तीन चौथाई इंच होती है, इसके बाद वह घटती जाती है। जब बाल दो वर्ष के हो जाते हैं तो उनकी गति प्रायः रुक जाती है। किसी के बाल तेजी से और किसी के धीमी गति से बढ़ते हैं। प्रत्येक सामान्य बाल की जीवन-अवधि लगभग 3 वर्ष होती है, जब कि आँख की बरोनियों की प्रायः 150 दिन ही होती है। आयु पूरी करके बाल अपनी जड़ से टूट जाते हैं और उसके स्थान पर नया बाल उगता है।


शरीर के आन्तरिक अवयवों की रचना तो और भी विलक्षण होती है। उसकी सबसे बड़ी एक विशेषता तो यही है कि वे दिन-रात अनवरत रूप से क्रियाशील रहते हैं-गति करते रहते हैं। उनकी क्रियायें एक क्षण के लिए भी रुक जायँ तो जीवन संकट तक उपस्थित हो जाता है। उदाहरण के लिए रक्त परिवहन संस्थान को ही लें। हृदय की धड़कन के फलस्वरूप रक्त संचार होता है और जीवन के समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। यह रक्त प्रवाह नदी-नाले की तरह नहीं चलता वरन् पंपिंग स्टेशन जैसी विशेषता उसमें रहती है। हृदय के आकुँचन-प्रकुँचन प्रक्रिया के स्वरूप ही ऊपर-नीचे-समस्त अंग अवयवों में रक्तप्रवाह होता रहता है। सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः 90 सेकेंड में पूरी हो जाती है।


हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने उसे मात्र 6 सेकेंड में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जबकि मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर भी हृदय 5 मिनट और और अधिक जी लेता है, पर मस्तिष्क 3 मिनट में ही बुझ जाता है। हार्ट अटैक हृदयाघात की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना होता है। रक्त प्रवाह संस्थान का निर्माण करने वाली रक्तवाही नलिकाओं की कुल लम्बाई 60 हजार मील है जो कि पृथ्वी के धरातल की दूरी है। औसत दर्जे के मानवी काया में प्रायः 5 से 6 लीटर तक रक्त रहता है। इसमें से 5 लीटर तो निरंतर गतिशील रहता है और एक लीटर आपत्ति-कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घंटे में हृदय को 13 हजार लीटर रक्त का आयात-निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका-समेटा जाता है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया है जिसे एक बारगी यदि इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा।


इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी 10 टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट तक ऊपर उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी।शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह से उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है। रक्त संचार की दुनिया इतनी सुव्यवस्थित और महत्वपूर्ण है कि यदि उसे ठीक तरह से समझा जा सके और उसके उपयुक्त रीति-नीति अपनायी जा सके तो सुदृढ़ और सुविकसित दीर्घ जीवन प्राप्त किया जा सकता है।


त्वचा, मांसपेशियां रक्त परिसंचरण प्रणाली ही नहीं शरीर संस्थान का एक-एक घटक अद्भुत और विलक्षण है। 5 फीट 6 इंच की इस मानवी काया में परमात्मा ने इतने अधिक आश्चर्य भर दिये हैं कि उसे देव मंदिर कहने और मानने में कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।


ईश्वर की महिमा अपर्मपार 🚩🚩🚩


साभार🙏🏻🙏🏻🙏🏻 virat yog Facebook wall

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शनिवार, 8 जनवरी 2022

मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा

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 {{{ॐ}}}


                                                              #विचित्र 


मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा ही ज्ञान विज्ञान की तरफ लेजाती है विज्ञान ने हमे नये सुख के साधन दिये पर फिर हम अधूरा महसूस करते है  हम गरीब या अमीर स्त्री या पुरूष हमे एक खोज रहती हम अपने को अधुरा महसूस करते है किसे केपास झोपड़ी या महल पैदल हो या महंगी गाडी पर सब  को साढे तीन फुट चौडी ओर छः फुट लम्बी आप जिन्दा है तो भी और मर गये तो भी कोई करोड़ों कमाकर भी चार रोटी खाता है और कोई भीख मांग कर भी कोई बहुत बडी जमीन का मालिक है और किसी के पास एक इंच भी नही पर रहते सब जमीन पर ही!

प्रत्येक जिनके शरीर पर रोम (शल्क भी रोम मे ही सम्मिलत है)क्यो होते ? मूलाधार चक्र मे ही प्रजनन अंग क्यो है? केन्द्र से ही सब भूतो( पदार्थों) का नियन्त्रण क्यो होता है? सभी प्राणियों मे पाव कछुए के पांवो के स्थान पर ही क्यो? मस्तिष्क सहस्रार मे ही क्यो? प्रभामण्डल क्या है? सभी पदार्थों से निकलने वाली तरंगें क्यो है? देव और दानवरूप जीव जन्तु भी सर्वत्र है, आधुनिक विज्ञान भी ब्रह्माण्ड की छाया ढूढ रहा है यह वही स्थान है जहां ब्रह्माण्ड की ऋण तरंगें निकलती है।

और वैदिक व्याख्या ये अनुसार यह ईशान कोण की ओर साठ डिग्री कोण पर नीचे झुका हुआ तो इसकी छाया इससे कई गुणा बडी है यही ऋण ब्रह्माण्ड है और इसमे भी प्राणियों एवं शक्तियों का अस्तित्व है वैदिक विद्वानों का कथन है कि ऊर्जा शरीर प्राणी भी होते है और यह भी हो सकता है कि किसी विशेष तारे के ग्रह पर  वह आक्सीजन की जगह पर अग्नि की लपटों से जीवनशक्ति प्राप्त करता हो

चेतना स्थल संयोग के समीकरण का फल नही है अपितु चेतना सर्वत्र व्याप्त है और इसके अनगिनत रूप है स्थूल शरीर तो यह अपनी प्रकृति को अनुसार निर्मित करता है पृथ्वी की परिस्थितियों मे बने शरीर मे आक्सीजन की आवश्यकता है तो यह आवश्यक नही कि किसी अन्य ग्रह की परिस्थितियों मे निर्मित शरीर मे भी उस शरीर को आक्सीजन चाहिए परिस्थितियों ये अनुसार शरीर, भोजन और आक्सीजन की मात्रा आदि का अभूतपूर्व अन्तर तो पृथ्वी पर भी प्राणियों मे दिखाई पडता है । मछली से लिए आक्सीजन से अधिक उसे पानी की आवश्यकता होती है कुत्ते को सडा गला मांस पोषण देता है। पर मनुष्य उसे खाते ही मर जाता है इसलिए किसी विशेष संयोग को जीवन का कारण मानना मुर्खतापूर्ण सिद्धांत है रशियन वैज्ञानिको ने 1500 डिग्री फेर नाईट पर अग्नि भक्षण  करने वाले जीवाणु की तलाश की है

आपके सामने मच्छर है ये वातावरण को प्रतिरोधी तत्त्वों से किस तरह एड जस्ट करते है इसका अनुभव आपको हो रहा है इसलिए कोई भी संयोग या परिस्थिति जीवनतत्त्व का कारण नही है चेतना का मूल बीज उत्पन्न नही होता अपितु चेतना का मूल वास्तव मे है शेष  सभी निर्माण वह अपनी शक्ति से परिस्थितियों को अनुसार करता है                    

ध्यान के दो प्रयोजन है प्रथमतया सभी साधक सिध्दयों की तरफ दौडते है कुछ विरले ही साधक है जो मोक्ष कामना रखते है ध्याता वैराग्युक्त क्षमाशील श्रध्दालु तथा मोहादि से रहित होना चाहिए ध्यान ध्येय ध्यानप्रयोजन को जानकर उत्साह पूर्वक अभ्यास करे ध्यान से थक जाये तो जप करे पुनः ध्यान करे इस तरह क्रमशः कर अजपा जप का अभ्यास करे

१२ प्राणायामों की एक धारणा होती है १२धारणाओ काएक ध्यान होता है एवं १२ ध्यान की समाधि कही जाती है समाधि मे साधक स्थिर भाव मेस्थिर रहता है और ध्यान स्वरूप से शुन्य हो जाता है सर्वत्र बुध्दि प्रकाश  फैलता है विज्ञानमय शरीर में प्रवेश कर बाद मे अानन्दमय कोश शरीर मे प्रवेश कर परमानन्द को प्राप्त होता है

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शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

श्वास

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 एक तो, श्वास की गति मनोदशा से बंधी है। जैसा मन होता, वैसी हो जाती श्वास की गति। जैसी होती अंतर स्थिति, श्वास के आंदोलन और तरंगें, वाइब्रेशंस, फ्रीक्वेंसीज बदल जाती हैं। 


श्वास की फ्रीक्वेंसी, श्वास की तरंगों का आघात खबर देता है, कि मन की दशा कैसी है। अभी तो मेडिकल साइंस उसकी फिक्र नहीं कर पाई, क्योंकि अभी मेडिकल साइंस शरीर के पार नहीं हो पाई है।


इसलिए अभी प्राण पर उसकी पहचान नहीं हो पाई लेकिन जैसे मेडिकल साइंस ब्लडप्रेशर को, खून के दबाव को नापती है। जब तक पता नहीं था, तब तक कोई खून के दबाव का सवाल नहीं था।


रक्तचाप,  रक्त का परिभ्रमण भी नई खोज है। तीन सौ साल पहले आधुनिक विज्ञान को पता नहीं था कि शरीर में खून चलता है। खून के चलने का पता तीन सौ साल पहले ही लग पाया। 


और जब खून के चलने का पता लगा, तो यह भी पता लगा धीरे-धीरे कि खून का जो प्रेशर है, वह व्यक्ति के स्वास्थ्य के गहरे अंगों से जुड़ा हुआ है। इसलिए ब्लड प्रेशर चिकित्सक के लिए नापने की खास चीज हो गई।


लेकिन अभी तक भी हम यह नहीं जान पाए कि जैसे ब्लडप्रेशर है, वैसा ब्रेथप्रेशर भी है। वैसे वायु का अधिक दबाव और कम दबाव, वायु की गति और तरंगों का आघात-भेद, व्यक्ति की अंतर मनोदशा को परिवर्तित करता है। वह उसकी जीवन-ऊर्जा से संबंधित है।  


उदाहरण के लिए जब आप क्रोध में होते हैं, तो आपकी श्वास की गति बदल जाती है। वैसी ही नहीं रह जाती, जैसी साधारण होती है। इसका मतलब यह भी कि अगर आप श्वास की गति पर काबू पा लें।


तो आप फिर क्रोध पर काबू पा सकते हैं। अगर श्वास की गति न बदलने दें, तो क्रोध आना मुश्किल हो जाएगा।इसलिए जापान में  बच्चों को घरों में प्राणयोग का ही एक सूत्र सिखाते हैं। 


माता- पिता बच्चों को परंपरा से यह सिखाते हैं कि जब क्रोध आए, तब तुम श्वास को आहिस्ता लो, धीमे-धीमे लो। गहरी लो और धीमे लो। स्लोली एंड डीप, धीमे और गहरी। 


बच्चों को वे यह नहीं कहते कि क्रोध मत करो, जैसा कि सारी दुनिया कहती है। क्रोध न करना, हाथ की बात नहीं है। और मजा तो यह है कि जो पिता बच्चे को कह रहा है, क्रोध मत करो।


अगर बच्चा न माने तो स्वयं ही क्रोध करके बता देता है कि ''नहीं मानता! इतना कहा कि क्रोध मत कर!'' वह भूल ही जाता है कि अब हम खुद ही वही कर रहे हैं, जो हम उसको मना किए थे।


क्रोध इतना हाथ में नहीं है, जितना लोग समझते हैं कि क्रोध मत करो। क्रोध इतना वालंटरी नहीं है, नान वालंटरी है। इतना स्वेच्छा में नहीं है, जितना लोग समझते हैं। इसलिए शिक्षा चलती रहती है।


कुछ अंतर नहीं पड़ता है! योग का पुराना सूत्र, बुद्ध के द्वारा जापान में पहुंचा। बुद्ध ने श्वास पर बहुत जोर दिया। कोई आती-जाती श्वास के राज को पूरा समझ ले, तो फिर उसको दुनिया में और कुछ करने को नहीं रह जाता।


इसलिए बुद्ध तो कहते हैं, अनापानसती योग सध गया कि सब सध गया। क्रोध आता है, तब आप देखें कि श्वास बदल जाती है। जब आप शांत होते हैं, तब श्वास बदल जाती है, रिदमिक हो जाती है। 


आप आरामकुर्सी पर भी लेटे हैं, शांत हैं, मौज में हैं, चित्त प्रसन्न है, पक्षियों जैसा हलका है, हवाओं जैसा ताजा है, आलोकित है। तब देखें, श्वास ऐसी हो जाती है, जैसे हो ही नहीं। पता ही नहीं चलता। 


बहुत हलकी हो जाती है; न के बराबर हो जाती है। जब कामवासना मन को पकड़ती है, श्वास एकदम अस्तव्यस्त हो जाती है ,रक्तचाप बढ़ जाता है, शरीर पसीना छोड़ने लगता है, श्वास तेज हो जाती है और टूट-फूट जाती है।


प्रत्येक समय भीतर की स्थिति के साथ श्वास जुड़ी है। अगर कोई श्वास में बदलाहट करे, तो भीतर की स्थिति में बदलाहट की सुविधा पैदा करता है, और भीतर की स्थिति पर नियंत्रण लाने का पहला पत्थर रखता है।


प्राणयोग का इतना ही अर्थ है कि श्वास बहुत गहरे तक प्रवेश किए हुए है, वह एक तरफ शरीर को स्पर्श करती है, दूसरी तरफ आत्मा को स्पर्श करती है। एक तरफ बाहर जगत को छूती है।


और दूसरी तरफ भीतर ब्रह्म को भी छूती है। श्वास दोनों के बीच आदान-प्रदान है–पूरे समय, सोते-जागते, उठते-बैठते। इस आदान-प्रदान में श्वास का रूपांतरण प्राणयोग है, ट्रांसफार्मेशन आफ दि ब्रीदिंग प्रोसेस। 


वह जो प्रक्रिया है हमारे श्वास की, उसको बदलना। और उसको बदलने के द्वारा भी व्यक्ति परमसत्ता को उपलब्ध हो सकता है। जो लोग भी ध्यान का कभी थोड़ा अनुभव किए हैं, उनको पता है। जो गहरा प्रयोग करते हैं।


वे कहते हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि श्वास बंद हो गई, चलती ही नहीं! तो हम बहुत घबड़ा जाते हैं कि इससे कुछ खतरा तो न हो जाएगा। घबराने की जरा भी जरूरत नहीं है। घबराएं तब, जब श्वास बहुत जोर से चले। 


जब बिलकुल लगे कि ठहर गई, जब लगे कि श्वास का कंपन ही नहीं है, तब आप उस बैलेंस को, उस संतुलन को उपलब्ध होते हैं। तब ऊपर की श्वास ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है। 


बाहर की बाहर और भीतर की भीतर रह जाती है। और एक क्षण के लिए ठहराव आ जाता है। सब ठहर जाता है। न तो बाहर की श्वास भीतर जाती, न भीतर की श्वास बाहर आती। 


न ऊपर की श्वास ऊपर जाती, न नीचे की श्वास नीचे जाती। सब ठहर जाता है।श्वास के इस ठहराव के क्षण में परम अनुभव की किरण उत्पन्न होती है। श्वास के इस पूरे ठहर जाने में अस्तित्व पूरा संतुलित हो जाता है।


संयम को उपलब्ध हो जाता है। फिर कोई मूवमेंट नहीं, आंदोलन नहीं। फिर कोई परिवर्तन नहीं। फिर कोई हेर-फेर नहीं, बदलाहट नहीं, कोई गति नहीं। उस क्षण में आदमी परमगति में उतर जाता है या शाश्वत में डूब जाता है या इटरनल, सनातन से संपर्क साध लेता है।


श्वास का आंदोलन हमारा परिवर्तनशील जगत से संबंध है। श्वास का आंदोलनरहित हो जाना, अपरिवर्तनशील नित्य जगत से संबंधित हो जाना है। इसलिए श्वास का यह ठहर जाना बड़ी अदभुत अनुभूति है। 


कोशिश करके ठहराने की जरूरत भी नहीं है। क्योंकि कोशिश करके कभी नहीं ठहरा सकते। अगर आप कोशिश करके ठहराएंगे, तो भीतर की श्वास बाहर जाना चाहेगी, बाहर की श्वास भीतर जाना चाहेगी।


कोशिश करके कोई व्यक्ति श्वास को रोक नहीं सकता। हां, श्वास को आहिस्ता-आहिस्ता प्रशिक्षित किया जा सकता है, रिदमिक किया जा सकता है, तैयार किया जा सकता है लयबद्धता के लिए।


और अगर कोई प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान में गहरा उतरता चला जाए, तो एक क्षण ऐसा आ जाता है कि प्रशिक्षित श्वास और ध्यान की शांत स्थिति का कभी मेल, टयूनिंग हो जाती, तो श्वास ठहर जाती है।


और भी एक आश्चर्य की बात कि जब श्वास ठहरती है, तब तत्काल विचार ठहर जाते हैं। बिना श्वास के विचार नहीं चल सकते। इसे जरा देखें, कभी ऐसे ही एक सेकेंड को श्वास को ठहराकर। 


इधर श्वास ठहरी, भीतर विचार ठहरे, एकदम ब्रेक! श्वास बिलकुल ब्रेक का काम करती है विचार पर। लेकिन जब आप ठहराते हैं, तब ज्यादा देर नहीं ठहर सकती। श्वास भी निकलना चाहेगी और विचार भी हमला करना चाहेंगे।


क्षणभर को ही गैप आएगा। लेकिन जब श्वास, प्रशिक्षित श्वास ध्यान के संयोग से अपने आप ठहर जाती है, तो कभी-कभी घंटों ठहरी रहती है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन में ऐसे बहुत मौके हैं। 


कभी-कभी तो ऐसा हुआ है कि वह छः-छः दिन तक ऐसे पड़े रहते कि जैसे मर गए! प्रियजन घबरा जाते, मित्र घबरा जाते, कि अब क्या होगा, क्या नहीं होगा! सब ठहर जाता। 


उस ठहरे हुए क्षण में, इन दैट स्टिल मोमेंट.. चेतना समय के बाहर चली जाती, कालातीत हो जाती। विचार के बाहर हुए, निर्विचार में गए, ब्रह्म के द्वार पर खड़े हैं। विचार में आए, विचार में पड़े, कि संसार के बीच आ गए हैं।


संसार और मोक्ष के बीच पतली-सी विचार की पर्त के अतिरिक्त और कोई फासला नहीं है। पदार्थ और परमात्मा के बीच पतले, झीने विचार के पर्दे के अतिरिक्त और कोई पर्दा नहीं है। लेकिन यह विचार का पर्दा कैसे जाए?


दो तरह से जा सकता है। या तो कोई सीधा विचार पर प्रयोग करे ध्यान का, साक्षी-भाव का, तो विचार चला जाता है। जिस दिन विचार शून्य होता है, उसी दिन श्वास भी शांत होकर खड़ी रह जाती है। 


या फिर कोई प्राणयोग का प्रयोग करे, श्वास का। श्वास को गति दे, व्यवस्था दे, प्रशिक्षण दे; और ऐसी जगह ले आए, जहां श्वास अपने आप ठहर जाती है–बाहर की बाहर, भीतर की भीतर, ऊपर की ऊपर, नीचे की नीचे।


 और बीच में गैप, अंतराल आ जाता है; खाली, वैक्यूम हो जाता है, जहां श्वास नहीं होती। वहीं से छलांग, दि जंप। उसी अंतराल में छलांग लग जाती है परमसत्ता की ओर।

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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

कुण्डलिनी रहस्य

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कुण्डलिनी साधना से ऐसी कोई चमत्कारिक शक्ति नही मिलेगी कि आप खडे़ खडे़ गायब हो जायें ।आपकी उंगलियों या दृष्टि से कोई लपटें या किरण भी नहीं निकलेंगी।

हां आपकी चैतन्य शक्ति में विलक्षण परिवर्तन होगा। aजीवन शक्ति और ताकत बढ़ जायेगी।

सम्मोहन, दिव्य दृष्टि, अन्तर्ज्ञान, अन्तर्दृष्टि तीव्रतम होती चली जायेगी।

शारीरिक ऊर्जा मे वृद्धि होगी। भविष्य दर्शन होगा। भविष्यवाणीयां फलित होंगी।

कुण्डलिनी साधना जितनी सरल है उतनी ही सहजयोग में दुस्कर साधना समझा जाता है ।

वस्तुत सबसे अधिक परिश्रम मूलाधार पर करना होता है इसके फव्वारे  को तीव्र कर लेना या कथित सर्प के फण को उठा देना कठिन नही है ।

वास्तविक कठिनाई इस फण को ऊपर के स्वाधिष्ठान के नाभिक तक ले जाना है।

यह ऋणात्मक उर्जा है और इसका प्रवाह सबसे तीव्र होता है, क्योंकि यह ऊर्जा परिपथ के ऋण बिन्दू से उत्पन्न होती है ।

सर्वाधिक कठिनाई इसे नीचे की ओर क्षरित या पतित होने से रोकने मे है।

यहां के शिवलिंग से उत्पन्न होने वाली उर्जा महिषासुर है। इससे अन्धीं तीव्रता है। काम, क्रोध, कर्कशता, निर्माता, क्रूरता, मर्यादाहीन ,उच्छृंखलता इसका गुण है। sयह किसी का नियन्त्रण नही मानती है। जब तीव्र होकर दौड़ती है।

तो भैसें की तरह खतरों आदि को बारे मे अंधी हो जाती है

ज्ञान विवेक लुप्त हो जाता है ।

यह काली है जो शिव (शिव/विवेक)को पैरों तले रौंद डालती है।

तन्त्र विधा मे सबसे कठिन सिद्धि इसी शक्ति को करने मे होती है ।

इस बिन्दू को जाग्रत करना कठिन नही है । कठिनाई यह है कि जब यह उर्जा बढ़ती है, तो उपर्युक्त गुणों कि मात्रा भी बढती है।

इन गुणों मे बहकर उत्पन्न उर्जा को क्षरित करने से रोकना ही वास्तविक सिद्धि है ।

इसके लिये तंत्र मेनिर्देश है कि इस भैंसे की बलि देने या निरन्तर प्रयत्न करते रहें ।भैसें की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखें शराब पीकर भी इस उर्जा को आप प्राप्त कर सकते है। 

पर वास्तव मे सिद्धि तो वह है कि शराब पीयें ,पर नियन्त्रत रहें। काम की भावना से भी रति के समय भी यह ऊर्जा बढ़ जाती है ।

इस समय आप भैंसे की सवारी कर रहे होते है, तेज रफ्तार से दौड़ते हुए अंन्धे भैंसे को रोकने की कला नही आती तो वह पतन की खाई मे गिरा देता ही है ।

विवेक से इस भैसे  को नियन्त्रत करके इस भाव की बलि  देना ही तंत्र के भैंसे की बलि  है।

लोग धर्मस्थलों पर भैसा काट रहे है मूर्खों के सिर पर सींग नही होते । वे देखने मे आदमी जैसे लगते है।

तंत्र मे भैंसे के रक्त, सींग, पूछा के बाल गोबर  आदि कि उपयोग होता है, परन्तु यह रसायन सामग्री योग है।लेकिन इसका अर्थ भैंसे  को काटने से नही।

इसी तरह स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बढ़ने पर से अंधी चंचलता या क्रियाशीलता बढ़ाती है।

मन हमेशा चंचल ,उन्माद बना रहता है । वह भी तामसी भाव मे उतेजित ठीक बकरी के बच्चे की तरह यदि आप इस चंचलता को नियन्त्रित करके मन के बकरी को बच्चे जैसी प्रवृत्ति की बलि देते है तो सिद्धि अवश्य मिलेगी।

स्वाधिष्ठान मां दुर्गा का स्थान है कृपया इस देवी को चरणों पर मालुम पशुओं की बलि मत किजिए।

माता कभी राक्षसी नही होती वह आपकी ही नही इस सृष्टि की माता है।

वह बकरी के बच्चे कि भी माता हैh इस देवी को आंचल को रक्त से संचित कर दिया जाता है ।

मै अहिंसा, भावुकता को वशीभूत नही हूं आपको मांसाहार से भी नही रोक रहा मगर कम से कम यह दुर्गा माता को नाम पर तो रोकये।

तंत्र मे इसका अर्थ कुछ ओर ही है कुण्डलिनी साधना आजकल इसकी हर तरफ चर्चा है।इस चर्चा का  लाभ अनेक तथाकथित अवतार आदि उठा रहे है।

इनका दावे डी,वी, डी , फोन पर फोटो पर शक्ति पात करके एवं कुछ तो दावा करते है ये दो घण्टे मे कुण्डलिनी जाग्रत कर देते है ऐसे विज्ञापन टी वी आदि संचार माध्यम  मे देखने को मिलते रहते है।

कुछ से हमने भी पुछा  कि कुण्डलिनी है क्या?

तो उत्तर मे वे बताने लगे कि मूलाधार मे एक शिवलिंग है उसमे सांप लिपटा है उसका फण लिंग मुण्ड पर है।

उस फण को जाग्रत करना ही कुण्डलिनी जागरण है।

ये लोग ठग है। ये कुछ नही जानते मूलाधार मे शिवलिंग अवश्य है पर वहाँ सांप जैसा कुछ नही है ।

वहाँ पर है क्या यह एक उर्जा संरचना है यह प्रथम परमाणु की संरचना है इसके शीर्ष पर सांप नही । यह इसके शीर्ष से निकलती उर्जा धाराएँ है।

जो शेषनाग के फणों  या फव्वारों की बुदों कि भाति निकलती है फुफकारती हुई उर्जा धाराएं ।

यह संरचना इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इकाई कि है प्रत्येक उर्जा बिन्दू की है । मूलाधार मे नही रीढ मे व्याप्त 9बिन्दूओं , या शरीर को तैंतीस करोड बिन्दुओं , सभी तारों ,सूर्य, नाभिकों, सी संरचना है ।

हमारे शरीर मे जो नौ उर्जा बिन्दू मुख्य kहै रीढ़ मे उनके मध्य कुछ रिक्त स्थान है जिसे सुषुम्ना नाडी कहते है जिनमे उर्जाधाराएं एवं बिन्दू तो है पर मुख्य बिन्दु जैसे नही है  sabhar Facebook wall sakti upasak agyani

मूलाधार के शिवलिंग के शीर्ष से फव्वारों के रूप मे निकलती उर्जा को तीव्र करके उपर को बिन्दु के शिवलिंग के नीचे पुच्छल उर्जा धारा से मिलाने से शक्ति प्राप्त होती है

तब इसे उपर खींचा जाता है और उपरी शिवलिंग के नाभिक मे ले जाया जाता है इससे शाट् सर्किट होता है ( दोनो+ धन होते है) इससे दुसरे शिवलिंग का फव्वारा बढ जाता है ।

कुण्डलिनी साधना मे एक मूलाधार ये फव्वारे को उपर स्वाधिष्ठान के केन्द्र मे मिलाने से कई चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त होती है ।

परन्तु यह तो वर्षों का काम है वह भी निरन्तर लगन के साथ अभ्यास करने पर परन्तु दो घण्टे मे ईश्वर ही जानता है कि यह कैसा धोखा है।

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मन्त्र दोष

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ग्रहित मंत्र के अनुष्ठान करते समय साधक का कर्तव्य होता है कि मंत्र दोषों का सावधानीपूर्वक निराकरण कर ले, मंत्र के अर्थात मंत्रोंपासक के आठ दोष होते हैं पहला दोष है अभक्ति और इन रहस्यों को समझने की लेने के पश्चात मंत्रों को केवल शब्द समूह या भाषा के वाक्य मात्र मान लेने की भूल साधक नहीं कर सकता फिर भी यदि कोई व्यक्ति मंत्र को भाषा मात्र समझता हैa तो यह अभक्ति है।

किसी दूसरे के मंत्र को श्रेष्ठ और अपने मंत्र को निम्न कोटि का मानता है तो भी यह अभक्ति ही है अर्थात इन दोनों ही स्थितियों में मंत्र में मंत्र भावना और श्रद्धा नहीं रह पाती श्रद्धा नहीं होने से मंत्र की साधना फलवती नहीं होती है।

#अक्षर_भ्रान्ति-- साधना का दूसरा दोष अक्षर भ्रान्तिं साधक भ्रम वश अक्षरों में विपर्यक कर जाए अथवा अधिक जोड़ दें तो अक्षर भ्रान्ति दोष होता है उदाहरण के लिए ,भार्या रक्षतु भैरवी, किस स्थान पर भार्या भक्षतु भैरवी कश्यप अक्षर भ्रांति के दोष में ही दिन आ जाएगा।

#लुप्त-- तीसरा दोष लुप्ताक्षरता का है साधक मंत्र ग्रहण करने के समय सावधानी वर्ष या जप करते समय किसी अक्सर को भूल जाता है छोड़ देता है तो लुप्त दोष होता है।

#छिन्न-- मंत्र में प्रयुक्त संयुक्त अक्षर का एक अंश टूटता हुआ सा हो तो छिन्न दोष होता है।

#ह्नस्व-- दीर्घ वर्णन के स्थान पर ह्रस्व वर्ण का प्रयोग ह्रस्व दोष होता है जैसे मारवाड़ी लोग गधे को गधा बोलते हैं यहां ध के स्थान पर द का उपयोग होता हैs जैसे पंजाब के लोग छुट्टी शब्द को छुटि  बोलने में ह्रस्व दोष होता है भाषा में कुछ भी होता हूं मंत्र व्यवहार के कारण ध्वनि और रूप में परिवर्तन धर्मा नहीं होते इसलिए जो अक्सर जिस रूप में जिस ले में बोला जाता है उसी में बोलना चाहिए किसी दीर्घ मात्रा को ह्रस्व मात्रा के रूप में बोलना भी इसी दोष के अंतर्गत आता है।

#दीर्घ-- ह्रस्व से विपरीत स्थिति वाला दीर्घ दोष हुआ करता है छोटी मात्रा को बड़ी मात्रा के रूप में बोलने पर अथवा अल्पप्राण अक्षरों को महाप्राण की तरह बोलने पर भी दीर्घ दोष होता है।

#कथन-- मंत्र एक नितांत गुप्त रहस्य हैh मंत्र शब्द का दूसरा अर्थ गोपन ही होता है अतः मंत्र का प्रकाशन कथन दोष की श्रेणी में आता है किसी भी स्थिति में व्यक्ति को अपना मंत्र प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

#स्वप्न_कथन-- यदि कोई व्यक्ति अपनी मंत्र को संपन्न में किसी दूसरे को बताता है तो स्वप्न कथन का दोषी होता है भीम दोस्तों के विभिन्न फल सामने आते हैं oकई बार साधक को चित्त विपेक्ष हो जाता है

किसी का शरीर लक्षण होने लग जाता है किसी को अर्थ की हानि होने लगती है किसी के परिवार जनों को आधि व्याधि सताने लगती है अर्थात जो मंत्र व्यक्ति के कल्याण का मार्ग खोलता था ऋद्धि सिद्धि प्रदान करता था वही अशुभ बन जाता है kनियम पूर्वक उपासना करने पर भी यदि विपरीत लक्षण और अशुभ फल मिलता हो तो व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मंत्र का और साधना का आत्म निरीक्षण करें और उपर्युक्त दोनों में से कोई दोष दिखाई दे तो उसका प्रायश्चित  करके विधिपूर्वक पुणे अनुष्ठान करें ।sabhar Facebook wall sakti upasak

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