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बुधवार, 24 मार्च 2021

ऊर्जा डायग्राम

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ब्रह्माण्ड एक ऐसे सूक्ष्म तत्त्व से निर्मित हुआ है, जो शुद्ध सूक्ष्म विरल और परम गति वान एव तेजवान है इस तत्त्व से ब्रह्माण्ड के निर्माण की एक विस्तृत प्रक्रिया है, किसी ने इस तत्त्व को आत्मा कहा है किसी ने शिव कहा है तो किसी ने ब्रह्म।

इसी तत्व से उत्पन्न ब्रह्माण्ड एक विशिष्ट ऊर्जा के डायग्राम मे क्रिया कर रहा है । इस डायग्राम से ऊर्जा तरंगें उत्पन्न हो रही है जैसा ऊर्जा डायग्राम इस ब्रह्माण्ड का है वैसा ही डायग्राम किसी प्राकृतिक इकाई का होता है, चाहे वह पृथ्वी हो सूर्य हो, चाँद हो, और मंडल हो या निहारिका हो , वैसा ही ऊर्जा डायग्राम प्रत्येक जीव, प्रत्येक वनस्पति, प्रत्येक कीटाणु, प्रत्येक परमाणु का होता है, और सब एक दुसरे से जुडे हुए होते है ठीक उसी प्रकार किसी जीव के कोशाणु एक दुसरे से जुडे होते है। 

यह ऊर्जा डायग्राम इस प्रकार है जैसे सूर्य के केन्द्र मे उसका घन पोल है वहा से जो किरणे सतह से विकरित होती है वे ऋण ऊर्जा तरंगें है किन्तु पृथ्वी ये लिए वे तरंगें यानि सूर्य की किरणे धन तरंगें है और उन्ही तरंगों के कारण पृथ्वी का नाभिक काम करता है, पृथ्वी के लिए धनघ्रुव है और उसकी सतह से जो ऊर्जा विकरित है वह पृथ्वी की ऋण तरंगें है ।

पृथ्वी की ये ऋण तरंगे हमारे लिए धन तरंगें है हमारी उत्पत्ति सूर्य की ऋण तरंगों एवं पृथ्वी की ऋण तरंगों से सभी जीव वनस्पतियों की होती है इससे हमारे ह्रदय का नाभिक बनता है और इसी से हमारा डायग्राम बनता है यह डायग्राम भी वही होता है और इसका दो (दोनो पैर)धन कोण पृथ्वी से लगा होता है और एक सुर्य की ओर होता (सिर) है, दो ऋण कोण ऊपर होता(हाथ)है एक नीचे की ओर होता(रीढ़ की हड्डी का सिरा) है।

पृथ्वी का धन कोण सूर्य की ओर होता है दो उसके विपरीत एक ऋण कोण विपरीत मे होता है दो सूर्य की ओर सूर्य की निहारिका के केन्द्र से भी यही स्थिति होती है यही क्रम ब्रह्माण्ड इस केन्द्र तक चला जाता है । हमारा ऊर्जा डायग्राम अनेक श्रृंखलाओं मे होता हुआ ब्रह्माण्ड के ऊर्जा डायग्राम से जुड़ा है।
                                
जब सुक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर अनाहत चक्र से जुडी रज्जूनूमा त्रिगुणी ऊर्जा धारा के तन्तु मूल को उसके केन्द्र से तोड दिया जाता है तब अनाहत चक्र का कमल शरीर से अलग हो जाता है । इस समय ऊर्जा ज्योति रूप कमल होता है, जो ऊर्जा ज्योति का स्वरूप बन जाता है इसमें सम्पूर्ण ऊर्जा शरीर अपने ऊर्जा जन्तुओं के साथ सिमटा होता है ।

प्रेत आत्मा भी सुक्ष्म शरीर ही होता है ।और यह भी स्वयं को कुछ हद तक सिंकोड सकता है।

परन्तु इसमे और ज्योति कमल में अन्तर होता है कि प्रेतात्मा  स्वयं के ऊर्जास्वरूप एक स्थान पर केन्द्रित नही कर सकता ।
यह एक भ्रम है कि प्रेतात्मा कोई भी स्वरूप धारण कर सकती है यह दूसरों को सम्मोहित करके ऐसा दृश्य दिखाती  है जो नही है । यह क्रिया कोई उन्नत आत्मबल से युक्त प्रेतात्मा ही कर सकती है सभी नही।

दुसरी मान्यता यह है कि प्रेतात्मा छिद्र मे प्रवेश कर जाती है यह भी एक भ्रम है प्रेतात्मा का प्रकृति पर कोई वश नही है उसका छिद्र मे प्रविष्ट होने का कोई अर्थ नही है क्यो कि स्थूल तत्त्व उसे रोक नही सकते वह पत्थरों से भी पराग बन कर निकल सकती है।

किन्तु यह कमल प्रेतात्मा के समान होते हुए भी प्रेतात्मा नही है यह केन्द्रभूत सूक्ष्म शरीर है ।

आज बस इतना ही..

Vedic vignan

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वेदो_का_मनोमयी_कोश

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{{{ॐ}}}

                                                        #वेदो_का_मनोमयी_कोश

मनस शरीर यानि मनोमय शरीर का विकास साधना के द्वारा किया जाता है यह इक्कीस वर्ष के बाद विकसित हो सकता है इसे विकसित होने सअतीन्द्रिय शक्ति आ जाती है जैसे सम्मोहन ,दुर संरेक्षण दसरो का मनपढ़ लेना शरीर से बहार निकल कर यात्रा करना अपने को शरीर से अलग करना वनस्पतियो  के गुण पता लगना उपयोग करना  आदि।
चरक और सुश्रुत ने इसी सिद्धि से शरीर के बारिक  से बारिक अंगो का भी वर्णन किया था। सुषुम्ना नाडी़ ,कुण्डलिनी और षट् चक्रों  को विज्ञान अभी भी नही खोज पाया।
इन विचार तरगों  का प्रभाव पदार्थ पर भी पडता है संकल्प से वस्तु  हिलाई व तोडी  जा सकती है। विज्ञान ने भी इसके कई प्रयोग किये है योग की समस्त सिद्धियाँ जो पांतजलयोग दर्शन मे दी गयी है वे इसी शरीर के विकसित होने से आ जाती है कुण्डलिनी भी इसी शरीर की घटना है।
जादु चमत्कार इसी का विकास है और इसका केन्द्र है अनाहत चक्र  जब अनाहत जाग्रत होता है तो ये सिद्धियाँ आ जाती है
इसके जाग्रत होने से काल व स्थान की दुरी मिट जाती है  वह बिना मन इन्द्रियो के सीधा मन से देख व सुन सकता है।
कल्पना, इसकी संकल्प सम्भावनाएँ है ऐसा व्यक्ति शाप दे सकता है
पुराण शरीर को इसी उपलब्ध व्यक्तियों  द्वारा लिखे गये है किन्तु उनकी भाषा प्रतीकात्मक  होने से विज्ञानिक उन्हे समझ नही पाते ऐसे व्यक्तियों  ने प्रेतात्मा को जाना मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाती है कहां कैसे रहती है कैसा अनुभव करती  है कौन इन आत्माओं को ले जाता है पुनर्जन्म  कब और कैसे होता है गर्भ मे जीवात्मा  का प्रवेश कब होता है । स्वर्ग  और नरक कहां हैआदि की जानकारी ऐसे व्यक्ति ही दे सकते है जो मनोमय  शरीर या मनस शरीर को सक्रिय कर लेते है
                                               यही वेदातं का मनोमय कोष है

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काल का रहस्य

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------------------: जगत के सभी पदार्थ कालशक्ति के अधीन हैं:--------------------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 ---------:साधना का प्रयोजन है-- कालक्षय पर विजय प्राप्त करना:---------
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        मीरा कृष्ण के असीम प्रेम में डूबी रहती थी। जो मिला, खा लिया। उसे न तन का होश, न खाने की चिन्ता। उन्हें विष दिया गया, उसे भी कृष्ण का प्रसाद समझ कर पी गयीं वह। लेकिन विष का तो असर ही नहीं हुआ। ऐसा क्यों ?--कभी इसपर लोगों ने विचार किया ? प्रेम रस के रहते फिर किसका असर होगा शरीर पर भला ! यह प्रेम ही तो वास्तविक तत्व है जो ब्रह्म रूप है--'रसो वै सः।' वही परम तत्व का सार है जिसे मीरा ने अपने में आत्मसात् कर रख था। फिर उन्हें क्या चिन्ता कि कोई उन्हें अमृत पिला रहा है या पिला रहा है कोई विष। वह तो अमृत और विष का अतिक्रमण कर बहुत आगे निकल चुकी थीं। 
      इसी प्रकार मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में आदि शंकराचार्य चारों वेदों के ज्ञाता हो गए। गृहस्थ ज्ञान के लिए परकाया प्रवेश कर वह ज्ञान भी अर्जित किया, मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी से शास्त्रार्थ  किया और उन पर विजय प्राप्त की। बत्तीस वर्ष की आयु में चारों पीठों की स्थापना की और आचार्य शंकर के नाम से जगत में विख्यात हुए।
       रत्नाकर डाकू एक सन्यासी के शब्दों से प्रभावित होकर #ऋषि #बाल्मीकि बन गया। वह बाल्मीकि रामायण लिखकर हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया। एक अनपढ़ मूढ़ ब्राह्मण ने राज-दरवार में एक विदुषी कन्या को मूक शास्त्रार्थ में हराकर उससे विवाह कर लिया। बाद में अपनी मूढ़ता का भेद खुलने पर और पत्नी से अपमानित होकर गृह-त्याग कर चला गया। वही मूढ़ बाद में #कालिदास बनकर लौटा। इसी तरह पत्नी के मार्मिक शब्दों ने तुलसीदास के जीवन को ही बदल दिया और उन्हें महाकवि तुलसीदास बना दिया। इसी प्रकार रैदास, कबीरदास, सूरदास के जीवन में भी घटनाएं घटीं और उनके जीवन बदल गए। ऐसी हज़ारों घटनाएं हैं जो किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं हैं। ऐसे बहुत से साधकों का वर्णन मिलता है जिनके जीवन पर काल का प्रभाव बहुत ही न्यून पड़ता है। जीवन के उस क्षण को और बिन्दु को कौन जानता है जहाँ से मनुष्य का जीवन बदलने वाला है। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रकृति वह अमूल्य अवसर कभी- न-कभी हर मनुष्य के सामने लाती है। यह मनुष्य ही है कि अपने अहंकार में वह उस अवसर को पहचान नहीं पाता।

                काल का रहस्य
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       विश्वब्रह्मांड काल-जगत है। इसे काल-जगत से ही समझने का प्रयास करना चाहिए। काल- जगत एक प्रकार से अपरिवर्तनशील है। यहाँ पर जो शक्ति कार्य करती है, वह निरन्तर आवर्तित होती रहती है। इस आवर्तन के दो प्रकार हैं--एक सिकुड़ना और दूसरा विस्तार। एक की गति भीतर की ओर है और दूसरे की गति है बाहर की ओर। भीतर की ओर गति ही सिकुड़ना है और बाहर की ओर गति है--विस्तार-गति। देखा जाय तो एक श्वास प्रक्रिया है और दूसरी है--प्रश्वास प्रक्रिया। जगत के सारे द्वन्द्व इनी दोनों प्रक्रियाओं के अंतर्गत हैं। श्वास लेना भी होता है और छोड़ना भी होता है। श्वास का ग्रहण और त्याग निरन्तर चलता रहता है। इसीका नाम जीवन है।
      तंत्रशास्त्र में 'षोडशी कला' का विशेष स्थान है। काल का सूक्ष्म रहस्य इस विद्या के गर्भ में छिपा है। महाशक्ति और काल-शक्ति ही सूक्ष्म रूप से जगत में कार्य करती है। अगर देखा जाये तो दोनों एक ही हैं। लेकिन कार्य निरूपण अलग-अलग है। काल-शक्ति परिणामी है  उससे ही सभी परिणाम घटित होते हैं।
       आदि काल से ही काल से रक्षा पाने के लिए सिद्ध-साधक किसी न किसी महाशक्ति के आश्रय में जाते हैं। क्योंकि काल-शक्ति आवर्तनशील है, इसीलिए जगत के सभी जड़-चेतन पदार्थ काल-शक्ति के ही अधीन रहकर निरन्तर आवर्तन करते रहते हैं। जगत में सभी वस्तुएं इसीलिए परिवर्तित होती रहती हैं क्योंकि आवर्तन शक्ति से उनका परिवर्तन करना स्वभाव बन जाता है। साधना का यही रहस्य है। हम इसी काल पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं। साधक की शक्ति की साधना का प्रयोजन है इसी काल-क्षय पर विजय प्राप्त करना। काल का शरीर पर न्यूनतम प्रभाव पड़े ताकि वह अपनी साधना-पथ में इस अमूल्य शरीर का अधिक से अधिक उपयोग कर सके और साधना के उस परम लक्ष्य को प्राप्त कर सके जो जन्म-जन्मान्तर से चला आ रहा है। shiv ram Tiwari 

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श्री गुरु चरण सरोज रज का महत्व

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श्री गुरु चरण सरोज रज :---

श्रीगुरुचरणों में जब से नमन किया है, सिर बापस उठा ही नहीं है, तब से झुका हुआ ही है और सदा झुका हुआ ही रहेगा| गुरु तत्व के साथ हम एक हैं| उन में और हमारे में कहीं कोई अंतर नहीं है| हमारा साथ शाश्वत है| शरीर तो पता नहीं कितनी बार छुटा है, मिला है, और छुटता रहेगा, पर गुरु का साथ शाश्वत है|

'श्री' शब्द में 'श' का अर्थ है श्वास, 'र' अग्निबीज है, और 'ई' शक्तिबीज| श्वास रूपी अग्नि और उसकी शक्ति ही 'श्री' है| श्वास का संचलन प्राण तत्व के द्वारा होता है| प्राण तत्व ..... सुषुम्ना नाड़ी में सोम और अग्नि के रूप में संचारित होता है| श्वास उसी की प्रतिक्रिया है| जब प्राण-तत्व का डोलना बंद हो जाता है तब प्राणी की भौतिक मृत्यु हो जाती है|

सहस्त्रार में दिखाई दे रही ज्योति गुरु महाराज के चरण-कमल हैं| उस ज्योति का ध्यान श्रीगुरुचरणों का ध्यान है| उस ज्योति-पुंज का प्रकाश "श्रीगुरुचरण सरोज रज" है| सहस्त्रार में स्थिति श्रीगुरुचरणों में आश्रय है| खेचरी-मुद्रा .... श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है| जिन्हें खेचरी सिद्ध नहीं है वे साधनाकाल में जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखें और आती-जाती श्वास के प्रति सजग रहें| तालव्य-क्रिया के नियमित अभ्यास से खेचरी सिद्ध होती है|

संध्याकाल ..... दो श्वासों के मध्य का संधिकाल "संध्या" कहलाता है जो परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है| हर श्वास पर परमात्मा का स्मरण होना चाहिए क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं| हर एक प्रश्वास जन्म है, और हर एक निःश्वास मृत्यु| 

हमारा मन जब मूलाधार व स्वाधिष्ठान केन्द्रों में ही रहता है तब वह धर्म की हानि है| हर श्वास में ईश्वरप्रणिधान का सहारा लेकर आज्ञाचक्र तक व उससे ऊपर उठना धर्म का अभ्युत्थान है| आज्ञाचक्र और उस से ऊपर धर्मक्षेत्र है, उसके नीचे कुरुक्षेत्र|

यह मनुष्य देह इस संसार सागर को पार करने की नौका है, गुरु कर्णधार हैं, व अनुकूल वायु .... परमात्मा का अनुग्रह है|  परमात्मा सदा हमारी चेतना में रहें| 
ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे .... परमशिव है| वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है| कुण्डलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है| हमारा मन सदा श्री गुरु चरण सरोज रज में लोटपोट करता रहे| ॐ तत्सत्!!
कृपा शंकर 
२२ मार्च २०२०

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मंगलवार, 23 मार्च 2021

ध्यान की परिभाषा

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ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है। 

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है। 

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान क्रिया और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है। 

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। 

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति। 

ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।

ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। 

ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है। 
नमन ॐ

Virat Yog Sagar

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महा मृत्युंजय मंत्र

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ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है|

मंत्र इस प्रकार है -

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥
यह त्रयम्बक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ 
त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को
यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्* पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मका* उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)
इव = जैसे, इस तरह
बन्धनात् = तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्योः = * मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा = नहीं वंचित होएं
अमृतात् = अमरता, मोक्ष के आनन्द से sabhar Facebook wall 

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अध्यात्म-दृष्टि और विज्ञान-दृष्टि

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरु के श्रीचरणों में कोटि- कोटि वन्दन

       किसी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश, बस होता है उसका मात्र रूपान्तरण
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       जब भी हम अशान्त होते हैं, दुःखी होते हैं तो मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न होने लगता है। फिर हम एकान्त खोजते हैं। घने वृक्षों के बीच या नदी के तट पर चले जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि आत्मा की शान्ति यदि कहीं है तो वह है अध्यात्म में। उससे हम दूर नहीं हो सकते क्योंकि मनुष्य के सुख का मूल है--आत्मिक शान्ति जो बाह्य जगत में नहीं मिल सकती। बाह्य जगत हमें क्षणिक सुख  दे सकता है जो भौतिक जीवन के लिए ही आवश्यक है, लेकिन शान्ति नहीं दे सकता। शान्ति तो आध्यात्मिक मार्ग के अनुसरण से ही प्राप्त हो सकती है।
       अगर इसके मूल में जाएँ तो एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आएगा। वह यह कि हमारे पूर्वज ऋषि थे। उनकी साधना, तपस्या और खोज प्रकृति के सान्निध्य में हुई। उन्होंने प्रकृति में उस परम सत्ता का अनुभव किया जिसे आज का विज्ञान सोच भी नहीं सकता।
       इस सत्य को विज्ञान भी स्वीकार करता है कि हमारी अशान्ति का कारण यह भी है कि हमें जो होना चाहिए, वह हम नहीं हैं। हम ऋषि-सन्तान हैं और हमारे रक्त में उन ऋषियों के संस्कार हैं। मगर हमारी आत्मा पर आज ऐसा आवरण पड़ गया है जिसे हम हटा नहीं पा रहे हैं। बस, इधर-उधर हाथ पांव मार रहे हैं। जब भी हमारे बीच कोई महापुरुष प्रकट हो जाता है तो उसके अलौकिक ज्ञान व चमत्कार को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं। फिर हम उसका अनुसरण करने लगते हैं। क्योंकि वह हमसे अलग दिखता है। लेकिन क्या हमने कभी यह विचार किया है कि वह हमसे अलग क्यों दिखता है ? हमें यह अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि उस दिव्य पुरुष की आत्मा पर से वह आवरण हट गया है और वह मूल को हो गया है उपलब्ध। वह हो गया है--निर्मल, निश्छल और स्थिर। वह प्रकृतिमय हो गया है। हमारे और दिव्य पुरुष के बीच बस यही अन्तर है। अपनी आत्मा के ऊपर से आवरण हटाना ही आत्म-साधना है, समाधि है। समाधि का तात्पर्य है उस परम शून्य को उपलब्ध हो जाना।
       मनुष्य के जीवन में एक विशेष अवस्था आती है जिसे 'शून्यावस्था' कहते हैं। यह अवस्था ही समाधि की अवस्था है। इसमें उसे न अपने जीवन की सुध रहती है और न रहती है सुध इस जगत की।
       मनुष्य का जीवन अनन्त- अनन्त यात्राओं के मध्य एक पड़ाव है और उसका शरीर है एक वाहन जिसके माध्यम से उसकी आत्मा इस संसार की यात्रा अनवरत रूप से हर युग में करती रहती है। आत्मा की यह यात्रा अनन्त काल से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। हमारी आत्मा हर युग में, हर क्षण में मौजूद रही है, हर महापुरुष की साक्षी रही है और भविष्य में साक्षी रहेगी। उसने राम के काल को देखा है, कृष्ण के काल को भी देखा है, बुद्ध और महावीर के कालखण्ड में भी वह रही है। कब नहीं रही वह ?
        इसके विपरीत विज्ञान आत्मा के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता। उसे वह बस  ऊर्जा मानता है। जब तक ऊर्जा है, शरीर चैतन्य है। शरीर से ऊर्जा निकल गयी, शरीर का अस्तित्व ख़त्म। वह आत्मा को नहीं मानता। विज्ञान का कहना है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं होती। वह एक प्रकार की ऊर्जा है। विज्ञान एक सिद्धान्त है--'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' अर्थात् पिण्ड ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है और ऊर्जा पिण्ड में। यह क्रिया अनवरत चल रही है और जो भी दृष्टिगोचर होता है, वह एक दूसरे में ढल जाने की भौतिक और रसायनिक क्रिया के परिणास्वरूप है। सब कुछ अणुओं का खेल है। वह सृजन और विनाश नहीं है। 
       हमारा अध्यात्म भी तो यही कहता कि किसी भी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश। वस्तु का सिर्फ रूपान्तरण होता है। पूरे विश्वब्रह्माण्ड में कम्पन हो रहा है। कोई चीज़ स्थिर नहीं है। सब में प्रवाह है। जो दिखाई दे रहा है ,सब अणुओं का घनीभूत रूप है। हमारा शरीर, हमारा जगत यहाँ तक कि यह ब्रह्माण्ड--सब कुछ ऊर्जामय है। अध्यात्म की ऊंचाई छूने में विज्ञान को अभी काफी समय लगेगा। तर्क करने से समाधान नहीं मिलता। ब्रह्माण्ड की बात तो दूर की है, यहाँ तक कि हमारा शरीर स्वयं में रहस्यमय है। उससे ज्यादा रहस्यमय है हमारा मस्तिष्क। 
       विज्ञान स्वप्न को नहीं मानता। उसका कहना है कि मन की दबी हुई इच्छा ही स्वप्न के माध्यम से मस्तिष्क पूरी करता है। लेकिन आज जितने भी आविष्कार हुए हैं, उनमें स्वप्न का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह बात वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। जहां तक अलौकिकता का अर्थ है, इस संसार से परे कोई वस्तु जो प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत ही आती है, वह किसी अलौकिक शक्ति के द्वारा ही संचालित मानी जाती है। वहाँ विज्ञान का नियम नहीं चलता। वह अलौकिक है, रहस्य है। जबकि विज्ञान उसे नकार देता है। वह कहता है कि इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी अलौकिक नहीं है। न ही कोई रहस्य है। सब प्रकृति के अंतर्गत है। जो बुद्धि से परे है, उसे अलौकिक कहा जाता है। ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा केवल यह है कि हमारी सोच, हमारी क्षमता अथवा हमारे ज्ञान के परे है, इसलिए अलौकिक है। जितने भी ज्ञानी, साधक हुए हैं, उन्होंने कभी भी चमत्कार नहीं दिखलाया, न ही उसकी आवश्यकता समझी। बस, घटनाएं घट गयीं, उन्हें  लोगों ने चमत्कार मान लिया, लेकिन ज्ञानी, साधकों के लिए मात्र घटना थी, चमत्कार नहीं। sabhar shivram Tiwari Facebook wall

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सोमवार, 22 मार्च 2021

सप्तशती_भाग_2

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{{{ॐ}}}

                                                                #

दूसरे अध्याय से मध्यम चरित्र का प्रारंभ होता है और इसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है मध्यम चरित्र में दूसरा तीसरा चौथा अध्याय समाविष्ट है इन तीनों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है दूसरे अध्याय में वह लक्ष्मी बीज तीसरे में अटठाईस वर्णात्मिका और चौथे अध्याय मे वह त्रिवर्णात्मिका शक्ति लक्ष्मी के रूप में वर्णित है उत्तम चरित्र में सरस्वती है जिसका विस्तार सात अध्यायों में है kअध्याय अनुसार इसके रूप हैं विष्णूवादी तेईस देवतात्मिका शतमुखी घूम्राक्षी काली चामुंडा रक्ताक्षी वाग्भवबीज की अधिष्ठात्री महाकाली सिंहवाहिना त्रिशुलपाश धारणी और सर्वनारायणी है।
बारहंवा और तेरहंवा अध्याय उत्तर चरित्र में आता है पर बारहवें में फलश्रुति और तेहरवें में वरदान है बारहवे की अधिष्ठात्री मां बाला त्रिपुर सुंदरी है और तेहरवें की त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या है प्रत्येक अध्याय के अंत में इन्हीं नामों से महाहुति दी जाती है।
तीनों चरित्रों में एक ही शक्ति गुणात्मक वृत्ति के कारण महासरस्वती  महालक्ष्मी और मां महाकाली के रूप में त्रिधा हो जाती हैं माया की यह महास्तर लोक प्रकृति का विवेचन करते हैंo इन्हीं स्तरों पर होने वाला असंतुलन उसे उद्विग्न कर देता है यह उद्वेग ही विक्षोभ का कारण बनता है और  विक्षुब्ध प्रकृति संतुलन स्थापित करके वीरमती है।
तीनों ही चरित्रों में विक्षोभ कारण अंधकार होता है यह अंधकार अपने तक सीमित रहे तो किसी को कोई आपत्ति नहीं पर जब यह आसुरी स्वरूप ग्रहण कर लेता है तो अव्यवस्था का कारण बन जाता है यह अहंकार कभी मधु कैटभ कभी महिष कभी चंड मुंड तो कभी शुंभ निशुंभ बन जाता है।
प्रथम चरित्र में मधु कैटभ नाम दो असुर हैं यह अपने बाहुबल से सारी मर्यादाओं का उल्लंघन करके अपने को स्थापित कर देना चाहते हैं विष्णु जो संसार के रक्षक हैं hयह तमोगुण ग्रस्त हैं देवगण गहन निंद्रा की स्तुति करते हैं यह निंद्रा विष्णु माया है यह अपना प्रभाव संवत करती है विष्णु जग जाते हैं व्यवस्था का अव्यवस्था से संघर्ष होता है यही विष्णुमाया है फिर मोहित करने के लिए प्रस्तुत होती है।
और दर्पदृष्ट मधू कैटभ के मुख से कहलाती है #आवां_जहि_न_यत्रोवीं_सलिलेन_परिप्लुता अर्थात जहां धरती पर जल नहीं हो वही हमारा वध कर देना माया के प्रभाव से मति भ्रष्ट दानव का वध करने के लिए तुरंत निर्जल धरती प्रगट हो गई ।
मध्यम चरित्र की देवता लक्ष्मी है विष्णु ऋषि है और छंद है उष्णिक यहां सभी व्यवस्थित है लक्ष्मी रजोगुण की आधार भूमि है यहां चंचल्य अतिथि अत्यंत तीव्र है इसी चंचल्य को परिवर्तित करने वाला तत्व वायु है इसलिए मध्यम चरित्र का तत्व वायु है लक्ष्मी का जनक सागर माना जाता हैs क्योंकि दृश्य अवस्था में जलसा चंचल दूसरा तत्व नहीं है विशेषत उस अवस्था में जबकि वायु प्रेरित कर रहा हो।
सर्पासन पर अर्धनिमीलित नेत्र विष्णु लक्ष्मी के स्पर्श से अंतः प्रह्ष्ट हो इस विस्तार की परिधि बने हुए हैं इनकी मंद किंतु सशक्त क्रिया सभी को दोलित वह क्रियाशील बनाए हुए हैं सृजन की भूमि यही रजोगुण है सत्व इस को प्रेरित करता है तब आबद्ध रखता है जहां काम और क्रोध को रजोगुण की वृत्ति बताते हैं वहां इन दोनों भाव में परस्पर विरुद्धवृत्ति होना भी आश्चर्य है।
इन दोनो की उदभवस्थली एक है पर इनके प्रेरक और धारक बदल जाते हैं हम जानते हैं कि काम सृजनानंद का कारक है और क्रोध विनाश का पुरोगामी है काम सत्वोन्मुख है तो क्रोध तमोभिमुख है मध्यम चरित्र का प्रति नायक महिष है महिष का प्रेरक अहंकार है aवह मद और लोभ का प्रतीक बनकर व्यवस्था को ध्वंस करना चाहता है इसके लिए क्रोध से अविष्ट होकर परमेश्वरी से युद्ध करने के में प्रवृत्त होता है अंत में विनाश के तम में डूब जाता है।

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परावस्था

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बर्फ को शून्य करने के लिए ताप देना पड़ता है । 

वह पहले पानी होती है , उसके बाद भाप , फिर शून्य में मिल जाती है ।

ताप देने की क्रिया के कारण बर्फ में धीरे धीरे विस्तार होता है और वह शून्यता की और जाती है । 

उसके कण जो पास पास थे, धीरे धीरे दूर होते जाते हैं । अर्थात् भीतरी संरचना में शून्यता धीरे धीरे आविष्ट होती जाती है । 

कठिन से तरल, तरल से वाष्पीय, वाष्प से फिर शून्य ।
कठिन अवस्था की परावस्था तरल , उसकी परावस्था भाप और उसकी परावस्था शून्य ।

ताप देते हैं तो शून्यता का आभास होने लगता है । अर्थात् शून्यता धीरे धीरे आने लगती है बर्फ में । अभी पूरी नहीं आयी । वह विस्तार हो कर तरल पानी बनती है , और शून्यता आगयी , किन्तु अभी पूरी शून्य नहीं हुई , किन्तु यह भी नहीं कि शून्यता नहीं है । वह है , और क्रमशः ताप देने से बढ़ रही है ।

अगर ताप देना बन्द कर दें , तो वह उसी स्थिति में आ जाएगी , और धीरे धीरे पुनः बर्फ हो जाएगी । 
यहाँ तक कि भाप भी बन जाए , किन्तु उत्ताप देना बन्द कर दिया तो वह पुनः तरल हो कर धीरे धीरे बर्फ हो जाएगी ।

इसलिए तब तक ताप देना होता है जब तक पूरा भाप शून्य न हो जाए । शून्यता की मात्रा  धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते सर्वव्यापी शून्य न हो जाए । 

जब पूर्ण शून्य हो जाए तभी न बर्फ रहती है , न पानी न भाप । 

अब इस प्रतीकात्मक उदाहरण को प्रयोग कीजिये समझने के लिए की क्रिया की परावस्था क्या है , बिना क्रिया किये परावस्था में क्यों नहीं जा सकते , क्रिया की परावस्था में रह कर क्यों क्रिया होती है और क्रिया की परावस्था आ जाए तो क्यों उसे और कुछ कर के नहीं छेड़ना चाहिए ।

गुरुकृपा से यह उदाहरण मन में आया । कोई त्रुटि हो व्याकरण गत तो क्षमा 🙏 

श्रीगुरु अर्पणं अस्तु

~साभार :- सोमदत्त शर्मा

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ध्यान जीवन का सबसे बड़ा आनंद

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ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से,कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं- वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है, वह ध्यान है।

इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं - मौन की, शांति की- जब सब थम जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है। धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है।

मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गये हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अद्भुत मौन दिखेगा, अद्भुत निर्दोषतादिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना होगा। और धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषिता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा- एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुन: उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है, इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है, तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है- हमने इस पहले जाना है। लेकिन हम भूल गये हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन हम जरा खोदें तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते, उसे हम केवल भूल सकते हैं।

हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारी वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहें हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।
ओशो

Rajesh Saini

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रविवार, 21 मार्च 2021

शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं!

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शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं! भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। 
▪️ शिवलिंग भी एक प्रकार के न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें। 
▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।
▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। 
▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। 
▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।
▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। 
महाकाल उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी) देखिये -
▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी 
▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी 
▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी 
▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी 
▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी 
▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी
▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी 
▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी 
हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था। 
उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। 
इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले। 
और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला।
आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये sabhar Facebook adi yogi wall

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