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गुरुवार, 12 अगस्त 2021

ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य क्यां है

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?? ब्रह्म मुहूर्त किसको कहते है और ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य क्यां है वो सभी मानव बात करते है लिखते है और ज्ञान भी देते है लेकिन उनको ब्रह्म मुहूर्त के नाम से क्युं जाना गया क्यां ईसका रहस्य है यो बात योगी पुरुष के अलावा और किसिको ज्ञान नहीं है. ये मानव शरीर एक प्रकृति और कुदरत की ऐसी देण है कि ईनकी तुलना और किसीभी चीज के साथ नहीं हो शकती मानव मस्तक अगर तो दुसरे कोई भी योनि के जीव के मस्तक मे बडे मगज के लिये एक त्रिकोणाकार शंकु आकार की ग्रंथी होती है वोही ग्रंथि ये शरीर मे सभी क्रियाए ओटोमेटिक होती है वो वोही ग्रंथि के हिसाब से होती है और तत्वो का संचालन भी ये ही ग्रंथि शरीर मे करती है. ये ग्रंथि का कुदरती नियम ऐसा है की दिन मे सूर्य की गरमी के ताप लगेगा तो वो ग्रंथि मे संकोचन आते है और रात को अंधेरे मे जब ताप नही होता तब वो ग्रंथि फूलती है जब ये ग्रंथि फूलती है तब वो ग्रंथि मे से एक प्रकार का प्रवाही स्त्राव होता है वो स्त्राव ऐसा होता है कि विचार वायुं को स्थिर कर देते हैं, ईसि के हिसाब से मानव का ध्यान गाढ लग जाता है जब गाढ ध्यान लगता है तब मानव बहुत सहेवाई से ब्रह्म का दर्शन करने मे सफणता हांसल करते है और वो ग्रंथि का फूलने का समस रात को चोथे पहोर मे 3 से 6 बजे तक का होता है, रात को 3 बजे वो ग्रंथि उनकी पराकाष्ठा पर फूल जाती है और 6 बजे तक वो धीरे धीरे मूळ स्थिति पर आ जायेगी तब ये 3 -6 बजे के टाईम पर ध्यान अच्छा गाढ लग जानेका कारण ये ग्रंथि का स्त्राव ही है ईसिलिए सिध्धो ने सुबह का 3 से 6 बजे के टाईम को ब्रह्म के साथ कोन्टेक्ट करने मे ये समय सबसे अच्छा है वो ही कारण से ये समय को ब्रह्म मुहूर्त से जाना जाता है और दुसरा यै ग्रंथि का बहुत गहरा रहस्य ये है कि मानव खोराक लेते समय मुंह मे जा लाळ खोराक मे मिक्ष होती है वो स्त्राव पिनियल ग्रंथि मे से ही होता है और तीसरा गहरा रहस्य ये है कि मानव योगक्रिया के माध्यम से जब ध्यान की क्रिया ए करते है तब समाधि के पास जब पहोचते है तब वो ग्रंथि मे से एक बुंद प्रवाही स्त्राव होता है वो 24 कलाक मे एक ही बार होगा वो बुंद पेट मे जाने से शरीर बिलकुल हलका सा फूल जैसा बन जाता है और उनको 24 कलाक तक खाने-पीने की जरुरियात रहती नही और वो ग्रंथि का चोथा रहस्य ये है कि दशमां द्वार वहां से ही खुलता है वो ही ब्रह्म के साथ कोन्टेक्ट करने का मेईन गेट है और पांचवा रहस्य ये है कि कोई भी जीव को अंधेरे मे पुर देवे तो भी उनको दिन है कि रात वो उनको मालुम हो जाता है उसका कारण ये ग्रंथि है ये शरीर का ओटोमेटिक संचालन करने मे ग्रंथि का महत्व का योगदान है. छठ्ठा रहस्य आंख के नजर की देखने की शक्ति का प्रवाह भी वो ग्रंथि मे से ही छूटता है ये सभी बातो को विज्ञान ने भी कईक अलग अलग प्रयोगो कर कर विज्ञान ने भी ये बात को मान्यता दिया है. विज्ञान उस ग्रंथि को प्रिनियल ग्रंथि के नाम से जानते है. अगर कोई सर्जन डॉक्टर ये ग्रंथि का ओपरेशन कर कर ललाट के नजदिक ला देवे तो मानव को भक्ति करने की जरुरत ही नही रहेगी मानव आपोआप त्रिकाळ ज्ञानी बन जायेगा ऐसा ओपरेशन प्राचीन समय मे तिबेट मे एक बौद्ध धर्मी लामा संत करते थे ये बात का सबुत शास्त्रो मे साबित है बाद मे ऐसा पुरुष हुवा नही ये ही ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य है पहले के समय मे मानव मस्तक के उपर टोपी अगर तो पाघडी बांधते थे ईसिका कारण ये ही था की मस्तक बहुत गरम नही होना चाहिए ये अगर मस्तक गरम होगा तो ग्रंथि मे ज्यादा संकोच आ जानेसे शरीर बिगड जाता है......... ----गगनगीरीजी महाराज फोन -9574752091

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योग बिलकुल शुद्ध साइंस है, सीधा विज्ञान है

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हां, फर्क है। साइंस आब्जेक्टिव है, पदार्थगत है। योग सब्जेक्टिव है, आत्मगत है। विज्ञान खोजता है पदार्थ, योग खोजता है परमात्मा।

यह पुनर्स्मरण, यह पुनर्वापसी की यात्रा योग कैसे करता है, उस संबंध में भी कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। क्योंकि कृष्ण ने कहा, उसके ही सतत अभ्यास से परमात्मा में प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है। मैं कहूंगा, पुनर्प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है।

है क्या योग? योग करता क्या है? योग की कीमिया, केमेस्ट्री क्या है? योग का सार-सूत्र, राज, मास्टर-की क्या है? उसकी कुंजी क्या है? तो तीन चरण खयाल में लें।

एक, मनुष्य के शरीर में जितनी शक्ति का हम उपयोग करते हैं, इससे अनंत गुनी शक्ति को पैदा करने की सुविधा और व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, आपको अभी लिटा दिया जाए जमीन पर, तो आपकी छाती पर से कार नहीं निकाली जा सकती, समाप्त हो जाएंगे। लेकिन राममूर्ति की छाती पर से कार निकाली जा सकती है। यद्यपि राममूर्ति की छाती में और आपकी छाती में कोई बुनियादी भेद नहीं है। और राममूर्ति की छाती की हड्डियों में जरा-सी भी किसी तत्व की ज्यादा स्थिति नहीं है, जितनी आपकी हड्डियों में है। राममूर्ति का शरीर उन्हीं तत्वों से बना है, जिन तत्वों से आपका। राममूर्ति क्या कर रहा है फिर?

राममूर्ति, जिस शक्ति का आप कभी उपयोग नहीं करते–आप अपनी छाती का इतना ही उपयोग करते हैं, श्वास को लेने-छोड़ने का। यह एक बहुत अल्प-सा कार्य है। इसके लायक छाती निर्मित हो जाती है। राममूर्ति एक बड़ा काम इसी छाती से लेता है, कारों को छाती पर से निकालने का, हाथी को छाती पर खड़ा करने का।

और जब राममूर्ति से किसी ने पूछा कि खूबी क्या है? राज क्या है? उसने कहा, राज कुछ भी नहीं है। राज वही है जो कि कार के टायर और टयूब में होता है। साधारण सी रबर का टयूब होता है, लेकिन हवा भर जाए एक विशेष अनुपात में, तो बड़े से बड़े ट्रक को वह लिए चला जाता है। राममूर्ति ने कहा कि मैं अपने फेफड़े से वही काम ले रहा हूं, जो आप टायर और टयूब से लेते हैं। हवा को एक विशेष अनुपात में रोक लेता हूं, फिर छाती से हाथी गुजर जाए, वह मेरे ऊपर नहीं पड़ता, भरी हुई हवा के ऊपर पड़ता है। पर एक प्रक्रिया होगी फिर उस अभ्यास की, जिससे छाती हाथी को खड़ा कर लेती है।

हमारे शरीर की बहुत क्षमताएं हैं, जिनका हम हिसाब नहीं लगा सकते। वे सारी की सारी क्षमताएं अनुपयुक्त, अनयूटिलाइज्ड रह जाती हैं। क्योंकि जीवन के काम के लिए उनकी कोई जरूरत ही नहीं है। जीवन के लिए जितनी जरूरत है, उतना शरीर काम करता है।

अगर हम वैज्ञानिकों से पूछें, तो वैज्ञानिकों का खयाल है कि दस प्रतिशत से ज्यादा हम अपने शरीर का उपयोग नहीं करते। नब्बे प्रतिशत शरीर की शक्तियां अनुपयोगी रहकर ही समाप्त हो जाती हैं। जीते हैं, जन्मते हैं, मर जाते हैं। वह नब्बे प्रतिशत शरीर जो कर सकता था, पड़ा रह जाता है।

योग का पहला काम तो यह है कि उन नब्बे प्रतिशत शक्तियों में से जो सोई पड़ी हैं, उन शक्तियों को जगाना, जिनके माध्यम से अंतर्यात्रा हो सके। क्योंकि बिना शक्ति के कोई यात्रा नहीं हो सकती है। एनर्जी, ऊर्जा के बिना कोई यात्रा नहीं हो सकती है। अगर आप सोचते हैं कि हवाई जहाज किसी दिन बिना ऊर्जा के चल सकेंगे, तो आप गलत सोचते हैं। कभी नहीं चल सकेंगे।

हां, यह हो सकता है, हम सूक्ष्मतम ऊर्जा को खोजते चले जाएं। बैलगाड़ी चलती है, तो ऊर्जा से। पैदल आदमी चलता है, तो ऊर्जा से। सांस चलती है, तो ऊर्जा से। सब मूवमेंट, सब गति ऊर्जा की गति है, शक्ति की गति है।

अगर आप सोचते हों कि परमात्मा तक बिना ऊर्जा के सहारे आप पहुंच जाएंगे, तो आप गलती में हैं। परमात्मा की यात्रा भी बड़ी गहन यात्रा है। उस यात्रा में भी आपके पास शक्ति चाहिए। और जिस शक्ति का आप उपयोग करते हैं साधारणतः, वह शक्ति आपके जीवन के दैनिक काम में चुक जाती है, उसमें से कुछ बचता नहीं है। और अगर थोड़ा-बहुत बचता है–अगर थोड़ा-बहुत बचता है–तो भी आपने उसको व्यर्थ फेंक देने के उपाय और व्यवस्था कर रखी है। कुछ बचता नहीं। आदमी करीब-करीब बैंक्रप्ट, दिवालिया जीता है। जो शक्ति उसे मिलती है, दैनंदिन कार्यों में चुक जाती है। और जो शक्ति छिपी पड़ी है, उसे वह कभी जगा नहीं पाता।

तो योग का पहला तो आधार है, छिपी हुई पोटेंशियल ऊर्जा को जगाना। सब तरह के उपाय योग ने खोजे हैं कि वह कैसे जगाई जाए। इसलिए प्राणायाम खोजा। प्राणायाम आपके भीतर सोई हुई शक्तियों को हैमर करने की, चोट करने की एक विधि है। फिर योग ने आसन खोजे। आसन आपके शरीर में छिपे हुए जो ऊर्जा के स्रोत-क्षेत्र हैं, उन पर दबाव डालने की प्रक्रिया है, ताकि उनमें छिपी हुई शक्ति सक्रिय हो जाए।

आपने ट्रेन को चलते देखा है। शक्ति तो बहुत साधारण-सी उपयोग में आती है, पानी और आग की, और दोनों से बनी हुई भाप की। लेकिन भाप के धक्के से इंजन का सिलेंडर धक्का खाकर चलना शुरू हो जाता है। फिर ट्रेन चल पड़ती है। इतनी बड़ी शक्ति, इतने बड़े वजन की ट्रेन सिर्फ पानी की भाप, स्टीम चलाती है।

आपके शरीर में भी बहुत-सी शक्तियां हैं, जिन शक्तियों को दबाकर सक्रिय किया जाए, तो आपके भीतर न मालूम कितने सिलेंडर चलने शुरू हो जाते हैं, जो कि अभी बिलकुल वैसे ही पड़े हैं। इन शक्तियों के बिंदुओं को, जहां शक्ति छिपी है, योग चक्र कहता है। प्रत्येक चक्र पर छिपी हुई शक्तियां हैं। और प्रत्येक चक्र को दबाने के, गतिमान करने के, डायनेमिक करने के आसन हैं, प्राणायाम की विधियां हैं।

हम भी साधारणतः उपयोग करते हैं, हमारे खयाल में नहीं होता है। आपने कभी खयाल किया है कि रात आप सिर के नीचे तकिया रखकर क्यों सो जाते हैं? कभी खयाल नहीं किया होगा। कहते हैं कि नींद नहीं आती है, इसलिए सो जाते हैं। तकिया रखकर आप न सोएं, तो नींद क्यों नहीं आती?

जब आप तकिया नहीं रखते, तो शरीर के खून की गति सिर की तरफ ज्यादा होती है। क्योंकि सिर भी शरीर की सतह में, बल्कि शरीर से थोड़ा नीचे ढल जाता है। तो सारे शरीर का खून सिर की तरफ बहता है। और जब खून सिर की तरफ बहता है, तो सिर के जो तंतु हैं, मस्तिष्क के, वे खून की गति से सजग बने रहते हैं। फिर नींद नहीं आ सकती। खून बहता रहता है, तो मस्तिष्क के तंतु सजग रहते हैं। तो फिर नींद नहीं आ सकती। तो आप तकिया रख लेते हैं।

और जैसे-जैसे आदमी सभ्य होता जाता है; तकिए बढ़ते चले जाते हैं–एक, दो, तीन! क्यों? क्योंकि उतना सिर ऊंचा चाहिए, ताकि खून जरा भी भीतर न जाए। नहीं तो मस्तिष्क की दिनभर इतनी चलने की आदत है कि जरा-सा खून का धक्का और सिलेंडर चालू हो जाएगा; आपका मस्तिष्क काम करना शुरू कर देगा।

योगी शीर्षासन लगाकर खड़ा होता है। आप समझें कि दोनों का नियम एक ही है, तकिया रखने का और शीर्षासन का आधारभूत नियम एक ही है। उलटा काम कर रहा है वह। वह सारे शरीर के खून को सिर में भेज रहा है। योगी जब शीर्षासन लगाकर खड़ा हो रहा है, तो वह कर क्या रहा है? वह इतना ही कर रहा है कि वह सारे शरीर के खून की गति को सिर की तरफ भेज रहा है।

अभी जितना आपका मस्तिष्क काम कर रहा है, वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ एक चौथाई मस्तिष्क काम करता है, तीन चौथाई बंद पड़ा हुआ है, स्टैगनेंट, वह कभी कोई काम नहीं करता। खून की तीव्र चोट से वह जो नहीं काम करने वाला मस्तिष्क का हिस्सा है, सक्रिय किया जा सकता है। क्योंकि यह हिस्सा भी खून की चोट से ही सक्रिय होता है। खून का धक्का आपके मस्तिष्क के बंद सिलेंडर को गतिमान कर देता है।

मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय हो जाएं, जो मौन चुपचाप पड़े हैं, तो आपकी समझ और आपके विवेक में आमूल अंतर पड? जाते हैं–आमूल अंतर पड़ जाते हैं। आप नए ढंग से सोचना और नए ढंग से देखना शुरू कर देते हैं। नए ढंग से, एक नई दृष्टि, और एक नया द्वार, न्यू परसेप्शन, डोर्स आफ न्यू परसेप्शन, प्रत्यक्षीकरण के नए द्वार आपके भीतर खुलने शुरू हो जाते हैं।

मैंने उदाहरण के लिए कहा। इस तरह के शरीर में बहुत-से चक्र हैं। इन प्रत्येक चक्र में छिपी हुई अपनी विशेष ऊर्जा है, जिसका विशेष उपयोग किया जा सकता है। योगासन उन सब चक्रों में सोई हुई शक्ति को जगाने का प्रयोग है।

ओशो – गीता-दर्शन – भाग 3, (अध्याय—6)
प्रवचन—नौवां - योग का अंतर्विज्ञान

Rajesh Saini

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बुधवार, 11 अगस्त 2021

coronavirus-impact-on-textile-industry

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 The coronavirus disease (COVID-19) is affecting every sphere of life including manufacturing activities, businesses, etc., across the globe and India is also not spared from the panic situation. The textile industry predominantly employs migrant workers from different States and also a large populat.. 

 

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https://indiantextilejournal.com/best-stories/coronavirus-impact-on-textile-industry

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शिव-पार्वती का प्रेमा-ख्यान

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शिव-पार्वती का प्रेमा-ख्यान अद्भुत है।पार्वती जैसा प्रेम और शंकर जैसा पति, ये दोनों ही अलभ्य हैं।शिव विश्व के चेतना है तो पार्वती विश्व की ऊर्जा हैं।शंकर जी का गोत्र त्रिलोक है।पार्वती जी साधना के माध्यम से शिव जी के ह्रदय में करूणा और समभाव जगाती हैं।उनका तप औरों से भिन्न होते हुए किसी भी इच्छा, वरदान वयक्तिगत सुख के लिए नहीं अपितु संसार के कल्याण के लिए है।शिव स्रोत हैं शक्ति के, पर स्वयं कभी गति नहीं करते – शिव की गति को ही ‘शक्ति’ कहते हैं। जब तक शिव हैं और शक्ति हैं, मामला बिल्कुल ठीक है, क्योंकि शक्ति का पूर्ण समर्पण, शक्ति की पूर्ण भक्ति शिव मात्र के प्रति है। वहां कोई तीसरा मौजूद नहीं।शिव-शक्ति के बीच में किसी तीसरे की गुंजाइश नहीं, तो वहां पर जो कुछ है बहुत सुंदर है। शिव केंद्र में बैठे हैं, ध्यान में, अचल, और उनके चारों तरफ गति है, सुंदर नृत्य है शक्ति का। वहां किसी प्रकार का कोई भेद नहीं, कोई द्वंद नहीं, कोई टकराव नहीं, कोई विकल्प नहीं, कोई संग्राम नहीं।🙏 sabhar Facebook wall mahaavatar baba ji italy

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वैश्वानर जगत की ओर

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                     भाग--02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

     भारतीय संस्कृति और साधना में वैश्वानर जगत को सर्वश्रेष्ठ और उच्चतम ज्ञान-विज्ञान का विपुल भंडार बतलाया गया है। इस सत्य को वैज्ञानिकों और परामनोविज्ञान के कई आचार्यों ने भी अब स्वीकार कर लिया है। इसका कारण अति महत्वपूर्ण है। मनोविज्ञान मन की प्रथम दो अवस्थाओं का विज्ञान है और परामनोविज्ञान है--शेष दो अवस्थाओं का। आधुनिक भौतिक विज्ञान की दृष्टि में जगत मानव से निरपेक्ष है और मानव जगत से। वैज्ञानिक जीवन और जगत में अर्थ खोजता है लेकिन इस दिशा में उसके लिए सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि वह अपने आपको एक ऐसे क्षेत्र में पाता है जहाँ उसके परिचित सब वैज्ञानिक साधनों और प्रयोगों की सीमा समाप्त हो जाती है। उसे अपनी विवशता का आभास होने लगता है। इसकी वास्तविकता इसी से समझी जा सकती है कि पदार्थ की मूल इकाई इलेक्ट्रॉन के विश्लेषण में वैज्ञानिक गण असमर्थ हैं। वे उसकी केवल कल्पना ही कर सकते हैं। वैज्ञानिकों को जब पदार्थ की मूल इकाई इलेक्ट्रॉन की गतिविधियों में कोई कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता नहीं मिली तो उन्हें यह मानने को विवश होना पड़ा कि भौतिक सत्ता के आगे कोई अभौतिक सत्ता भी है। उसमें प्रवेश कर उच्चतम वैज्ञानिक सत्यों का साक्षात्कार हो सकता है जो भौतिक चेतना के स्तर पर संभव नहीं है और अभौतिक सत्ता बाह्य जगत में नहीं बल्कि स्वयं मानव मन में है।
      पश्चिमी वैज्ञानिक इस समय भारतीय योगशास्त्र को पहले की अपेक्षा ज्यादा महत्व दे रहे हैं।(अभी 21 जून, 2015 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने में विश्व के 177 देशों ने भाग लेकर अपनी योग के प्रति रूचि प्रकट कर दी--जो इस बात का प्रमाण है की भारतीय योग कितना महत्व रखता है)। हालाँकि यह अलग बात है कि अष्टांगयोग में इन बाहरी प्राणायाम और  आसनों का कोई ज्यादा महत्व नहीं है।। महत्व है तो उस सूक्ष्म और अंतरंग प्राणायाम और उन आसनों का जो हमें अभौतिक सत्ता की और ले जाने में काम आते हैं। इन आसनों से हमारी दैहिक ऊर्जा कम से कम विसर्जित होती है। वैज्ञानिक जानते हैं कि बिना योग की सहायता लिए सूक्ष्म वैश्वानर जगत में प्रवेश असंभव है।
      वैश्वानर लोक से विश्व ब्रह्माण्ड के समस्त लोक लोकान्तरों और ग्रह नक्षत्र मंडलों  तथा उन पर निवास करने वाले प्राणियों का ब्रह्माण्ड ऊर्जा अर्थात् cosmic rays द्वारा अदृश्य सम्बन्ध है। ह इसे प्रकृति- प्रदत्त सम्बन्ध ही कहेंगे। विश्व बह्माण्ड में दो ही स्वीकृत मूल तत्व हैं--जड़तत्व और चेतनतत्व। पहला स्थूल और दृश्य है। दूसरा सूक्ष्म और इसीलिए अदृश्य है। एक की अधिकता और दूसरे की न्यूनता से स्थूल सृष्टि  तथा दूसरे की अधिकता और पहले की न्यूनता से सूक्ष्म सृष्टि होती है। इन्हीं दोनों तत्वों को तंत्र में 'शिवतत्व' और 'शक्तितत्व' की संज्ञा दी गयी है। sabhar shiv rama Tiwari 

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सोमवार, 9 अगस्त 2021

Luminous Vento Deluxe

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ब्लेड साइज़: 150 mm; हाई एयर डिलीवरी आउटपुट: 250 CMH; स्पीड: 1350 RPM डक्ट आयाम: 7.5 इंच x 2.95 इंच x 7.5 इंच वारंटी: प्रोडक्ट पर 2 साल की वारंटी. किसी भी प्रोडक्ट से संबंधित प्रश्न के लिए, कृपया हमसे 18001033039 पर संपर्क करें डिज़ाइन: स्टाइलिश डिज़ाइन जो किचन जैसी जगहों से मेल खाता है और आपके घर को ठंडा रखता है ब्लेड: एयरोडायनामिक रूप से डिज़ाइन किए गए ब्लेड रोटेशन की तेज गति सुनिश्चित करते हैं बिजली की खपत: 30 वॉट; ऑपरेटिंग वोल्टेज: 220V - 240V, ब्लेड की संख्या: 5 ऑपरेशन: स्मूद नॉइज़लेस ऑपरेशन, AC केबिन और कॉन्फ्रेंस रूम में उपयोग करने के लिए सबसे अच्छा बॉक्स में शामिल: Luminous Vento Deluxe 150mm, वारंटी कार्ड और एक इंस्टॉलेशन गाइड मि

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मूलाधार चक्र की साधना करने के तीन प्रमुख फायदे

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मूलाधार शरीर का सबसे बुनियादी चक्र है। मूलाधार साधना पीनियल ग्लैंड से जुड़ी है, और इस साधना से तीन बुनियादी गुण सामने आ सकते हैं। जानते हैं इन गुणों के बारे में।

 
मूलाधार का मतलब है मूल आधार, यानी यह हमारे भौतिक ढांचे का आधार है। अगर यह आधार स्थिर नहीं हुआ, तो इंसान न तो अपना स्वास्थ ठीक रख पाएगा, न ही अपनी कुशलता और संतुलन ठीक रख पाएगा। इंसान के विकास के लिए ये खूबियां बहुत जरुरी हैं। जिस व्यक्ति की टांगे कांपती हों, उसे आप सीढिय़ां नहीं चढ़वा सकते। अगर आपके पैर जरा भी कमजोर होंगे तो आप चलना ही नहीं चाहेंगे, आप सिर्फ आराम करना चाहेंगे।

मूलाधार साधना से जुड़ा है कायाकल्प का मार्ग

योग का एक पूरा सिद्धांत मूलाधार से विकसित हुआ, जो इस शरीर के अलग-अलग इस्तेमाल से लेकर इंसान के अपनी परम संभावना तक पहुंचने से जुड़ा है। मूलाधार से एक पहलू सामने आया, जिसे हम कायाकल्प के नाम से जानते हैं। काया का मतलब है शरीर, और कल्प का मतलब है इसे स्थापित करना, इसमें स्थायित्व लाना। इसका एक अर्थ है शरीर को लम्बे समय तक बनाए रखना। कल्प समय की एक इकाई भी है, जो काफी लंबी होती है - आप इसे सदी के रूप में समझ सकते हैं। तो आप इस शरीर को सदियों तक टिकाए रखना चाहते हैं। ऐसे कई लोग हुए हैं, जो कई सौ साल जिंदा रहे, क्योंकि उन्होंने कायाकल्प का अभ्यास किया था। इस प्रक्रिया में आप अपने शरीर के बुनियादी तत्व मिट्टी को अपने वश में कर लेते हैं।

ऐसे कई लोग हुए हैं, जो कई सौ साल जिंदा रहे, क्योंकि उन्होंने कायाकल्प का अभ्यास किया था।

भूतशुद्धि में एक आयाम मिट्टी भी है, जिसके जरिए इस तत्व को, बल्कि जीवन-रस को अपने सिस्टम में लाने की काबिलियत पैदा की जाती है। आप पारे को ठोस रूप में बदलते हैं। इसमें द्रव(लिक्विड) को एक ठोस के रूप में स्थापित किया जाता है। चूंकि पारे को धरती का रस माना गया है, ऐसे में अगर आप एक ऐसे द्रव(लिक्विड) को जो प्राकृतिक तौर पर ठोस अवस्था में नहीं रहता, उसे ठोस में बदलने में कामयाब हो जाते हैं, तो यही कायाकल्प है।

खुद को एक चट्टान की तरह बना सकते हैं

मानव शरीर के कई पहलू समय के साथ खराब होने लगते हैं, पर आप उन्हें इस तरह से स्थिर कर देते हैं कि ये बदलाव पूरी तरह रुक नहीं जाता, पर इस हद तक धीमा हो जाता है कि ऐसा लगता है कि आपकी उम्र ढल ही नहीं रही। फिर आप एक ऐसी काया बन जाते हैं, जो युगों तक टिकी रहती है। अपने यहां ऐसे बहुत से लोग हुए हैं, लेकिन इसके लिए, शरीर को पत्थर की तरह बनाने के लिए बहुत अधिक काम करने की जरुरत होती है।

  अगर किसी खास तरीके से ऐसा हो जाए तो पीनियल ग्लैंड से एक स्राव(डिस्चार्ज) होता है, जिसे योग में अमृत कहा गया है। 

मान लीजिए आप किसी पत्थर को गौर से देखते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि वह कैसे बना है, वह कौन सी चीज है जिसकी वजह से वह इतने समय तक टिका रहता है, और फिर आप अपने शरीर को उसी की तरह बनाने की कोशिश करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो आप खुद एक चट्टान की तरह बन जाते हैं।

पीनियल ग्लैंड से निकलने वाले अमृत के अलग-अलग गुण

यह क्षमता कई अलग-अलग तरीकों से आती है। कायाकल्प का एक खास आयाम है। मानव शरीर में एक पीनियल ग्लैंड होता है। योग साधना में इसे नीचे की ओर लाने की कोशिश की जाती है, जिसे दक्षिण की ओर बढ़ना कहते हैं। इसका एक प्रतीक शिव का दक्षिण की ओर बढ़ना भी है, क्योंकि उनकी तीसरी आंख दक्षिण की ओर बढ़ी थी। जो माथे में ऊपर की ओर थी, वह दोनों आंखों के बीच नीचे की ओर आ गई। जैसे ही ये नीचे आई, उन्हें ऐसी-ऐसी चीजें दिखाई दीं, जिसे कभी किसी ने नहीं देखा था। अगर किसी खास तरीके से ऐसा हो जाए तो पीनियल ग्लैंड से एक स्राव(डिस्चार्ज) होता है, जिसे योग में अमृत कहा गया है। इस अमृत को या तो आप अपने सिस्टम में लेकर उसे मजबूत करके अपने शरीर की उम्र बढ़ा सकते हैं, या फिर इस अमृत से सिस्टम में परमानंद पैदा कर सकते हैं। किसी नशीले पदार्थ की तरह यह आपमें जबर्दस्त विस्फोट भी भर सकता है। आप चाहें तो इस अमृत का इस्तेमाल अपने बोध को बढ़ाने के लिए भी कर सकते हैं।

तीन बुनियादी तरीकों से हो सकता है अमृत का इस्तेमाल

अमृत के इस्तेमाल के ये तीन बुनियादी तरीके हैं। या तो आप इस अमृत के इस्तेमाल से अपने शरीर को पत्थर की तरह मजबूत बना लें, जिससे आप खुद को लंबे समय तक जीवित रख सकेंगे। तब ज्यादातर लोग आपको परामानव समझते हैं। या फिर इस अमृत के द्वारा अपने भीतर एक ऐसा परमानंद या मादकता की अवस्था ला सकते हैं, जहां आपको इस बात की परवाह ही नहीं रहती कि आप कितने दिन जिएंगे। या फिर आप खुद को हवा की एक पतली परत की तरह बना लें, जहां आपका बोध बहुत अधिक बढ़ जाए क्योंकि आपके सिस्टम में कोई प्रतिरोध ही नहीं बचता। कायाकल्प में आमतौर पर इस अमृत का इस्तेमाल शरीर को मजबूत बनाने और सिस्टम की उम्र बढ़ाने के लिए किया जाता है। हालांकि इस ग्रंथि से होने वाला स्राव आपके सिस्टम में तभी सही तरह से काम कर पाएगा, जब यह आपके बोध को बढ़ाएगा, क्योंकि अगर आपका बोध नहीं बढ़ेगा, तब तक आपके जीवन का किसी भी मायने में विस्तार नहीं होगा। आपका जीवन किसी और की नजर में खास होगा। अगर आप एक पत्थर की तरह हो जाते हैं तो जीवन का अनुभव नहीं बदलेगा, हां दूसरे लोगों को लगेगा कि आप शानदार हैं। हम आपसे एक मूर्ति बना सकते हैं, क्योंकि तब आप पत्थर हो जाते हैं। आपको पत्थर की तरह होने की जरूरत नहीं है।

Isha Foundation

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रविवार, 8 अगस्त 2021

भगवान् क्या है

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                      भाग --02
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन 

-----:भगवान् का विचार क्यों ?::-----
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        यदि भगवान् पर विचार करना है तो हमें सभी पूर्व मतों से दूरी बनानी पड़ेगी। तटस्थ रहना होगा। तटस्थ ठीक उसी तरह जैसे नदी के किनारे खड़ा वृक्ष बहती हुई धारा के प्रति तटस्थ रहता है। हमें भी उसी तरह से उनके प्रति निरपेक्ष रहना है, तभी ईमानदारी से इस बिंदु पर विचार हो सकता है। हम किसी मत पर न तो आस्था रखें और न अनास्था। तभी हम भगवान् के सही स्वरूप को जान-समझ सकते हैं। 

      भगवान् के बारे में हम क्यों विचार करें ?

      यह भी एक उचित तर्क है। अगर हम अपने अस्तित्व, मति, गति को आकस्मिक मान लें तो फिर भगवान् पर विचार करना आवश्यक नहीं। लेकिन अध्यात्म और विज्ञान--दोनों का कहना है कि कोई भी कार्य बिना कारण के संभव नहीं है । फिर हमारे अस्तित्व का क्या कारण है ?
      हर वस्तु का एक कारण होता है और उन सभी कारणों का भी एक कारण होता है। हर वस्तु या हर स्थित के पीछे 'क्यों' लगा हुआ है।
इस 'क्यों' का एक लंबा सिलसिला चलता है। आखीर कहाँ है ? आखिरी 'क्यों' का उत्तर है--भगवान्।
       यदि हम अपने को जड़ पदार्थों की ही उत्पत्ति मान लें, तो प्रश्न उठता है कि जड़ पदार्थों की उत्पत्ति कहाँ से हुई ? यह पृथ्वी, यह सृष्टि, ब्रह्माण्ड के अनेक सौर मंडलों का प्रादुर्भाव कहाँ से हुआ ? विज्ञान ने इस सम्बन्ध में जो तर्क दिए हैं, उनमें उसका उत्तर नहीं है। इसी प्रकार का एक तर्क है कि सबसे पहले गैसीय धूल के कण थे जिनसे बाद में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। यदि इस बात को सही मान लिया जाय तो यह मानना पड़ेगा कि 'आदितत्व' गैसीय कण ही थे। लेकिन जब हम किसी पदार्थ का विच्छेदन करते हैं तो उसमें से उस 'आदितत्व' की उत्पत्ति नहीं होती। परमाणु के कण--प्रोटोन, इलेक्ट्रान और न्यूट्रॉन भी आदि तत्व नहीं हैं क्योंकि इन्हें तोड़ कर शक्ति प्राप्त की जा सकती है ,ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है।
      इसी प्रकार का एक दूसरा मत यह है कि समस्त सृष्टि अरबों वर्ष पहले पिण्ड के रूप में थी। किसी कारणवश उसमें विस्फोट हो गया जिस कारण यह सृष्टि हो गयी। इस मत पर विचार करें तो अजीब-अजीब भ्रांतियां पैदा होती हैं ,साथ ही अनेकानेक प्रश्न पैदा होते हैं--क्या वह 'पिण्ड' सनातन था ? उसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ? यदि वह सनातन था तो आगे भी सनातन क्यों नहीं रहा ? फिर वह पिण्ड आखिर था क्या ? क्या वह समान गुणों वाला पदार्थ था ? यदि हाँ तो फिर सृष्टि में आज यह विषमता, यह विभिन्नता क्यों है ? और अगर यह पिण्ड ही रूप बदल रहा है या उस समय बदल रहा था जिस समय विस्फोट हुआ तो उसका आदिस्वरूप क्या था ? हर वस्तु का कारण कहीं-न-कहीं अवश्य होता है--सिवाय किसी शाश्वत वस्तु के। 
      अगर यह मान भी लिया जाय कि पिण्ड ही टूट कर बदल गया है तो फिर समान आकार और गुणों  की रचनाएँ भी क्या आकस्मिक विस्फोट का कारण हैं ? यहाँ यह विचारणीय है कि परमाणु की संरचना और ब्रह्माण्ड की संरचना एक ही है। जिस  प्रकार विभिन्न प्रकार के परमाणुओं की अनेक संख्याओं से पदार्थ की रचना होती है, उसी प्रकार पदार्थों के समूह से ग्रह-नक्षत्र पिंडों का निर्माण होता है। सौरमंडलों, ग्रह-नक्षत्र-मंडलों, आकाश-गंगाओं का भी निर्माण इसी प्रकार हुआ है। सभी छोटे कण क्रमानुसार बड़े कणों की परिक्रमा करते हैं। क्या यह सब आकस्मिक विस्फोट का परिणाम है ? आकस्मिक विस्फोट से नियमबद्ध रचनाओं की कल्पना करना किस स्तर की अज्ञानता है-- इस पर हम-आप स्वयं विचार कर सकते हैं।

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अभौतिक सत्ता में परमात्मा की प्रेरणा से विद्यमान अनेक अदृश्य मंडलियां

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

      इस भौतिक जगत से जुड़े हुए अभौतिक जगत में परमात्मा की प्रेरणा से अनेक ऐसी मंडलियां हैं जो हमारे भौतिक जगत का न केवल सञ्चालन करती हैं वल्कि उस पर पूर्ण नियंत्रण भी रखती हैं। यह भौतिक जगत अभौतिक जगत से ऐसे जुड़ा हुआ है, ऐसे घुला-मिला है जैसे दूध और पानी घुला-मिला रहता है। उस अभौतिक सत्ता को साधारण लोग न तो देख पाते हैं और न जान-समझ पाते हैं। उस अभौतिक जगत की दिव्य मंडलियों के कई प्रयोजन होते हैं। इस भौतिक जगत में जो योग्य संस्कार-संपन्न व्यक्ति हैं, उनकी खोज करना और अभौतिक सता के ज्ञान-विज्ञान व गूढ़ तथा गोपनीय विषयों का उनके माध्यम से इस भौतिक जगत में प्रकट करना उन दिव्य मंडलियों का मुख्य प्रयोजन होता है।
       प्रत्येक मनुष्य के भीतर किसी-न-किसी रूप में , किसी-न-किसी मात्रा में आध्यात्मिक शक्ति विद्यमान है। कोई नीचे के सोपान पर है और कोई है ऊपर के सोपान पर। कोई उससे भी ऊपर है। जो सोपान पर चढ़ कर ऊपर पहुँच गए हैं उन्हीं को 'महात्मा' या 'सिद्ध पुरुष' कहा जाता है।( आम तौर पर साधारण बोलचाल की भाषा में हम किसी को भी महात्मा कह देते हैं, सिद्ध पुरुष बोल देते है और महापुरुष की संज्ञा दे देते हैं। लेकिन वास्तविकता कुछ दूसरी ही है। महात्मा, सिद्ध पुरुष या महापुरुष की उपाधि उन दिव्य मंडलियों के अधिकारी लोगों के द्वारा प्रदान की जाती है।) महात्मा या सिद्ध पुरुष लोगों का अभाव इस संसार में नहीं है। अभाव है तो उन्हें जानने-समझने और पहचानने का। ऐसे महात्मा और सिद्ध पुरुष सूक्ष्म अस्तित्व में निवास करते हैं या संचरण-विचरण करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर कभी-कभी अदृश्य से दृश्य भी हो जाते हैं अपनी योग-शक्ति द्वारा। जिनके पास दिव्य दृष्टि है, वे ऐसे लोगों को आसानी से देख लेते हैं, पहचान लेते हैं।
      मनुष्य प्रतिदिन रात को जब सोता है और नींद में स्वप्न देखता है। उस समय उसका वासना शरीर वासना लोक में विचरण करता है। विचरण की उस अवस्था में प्रायः उसका साक्षात्कार सूक्ष्म शरीर धारी महात्माओं और सिद्ध पुरुषों से भी हो जाया करता है इसमें संदेह नहीं। 
       ये महात्मा और सिद्धगण भी किसी समय उसी स्थान पर मौजूद थे जिस स्थान पर हम सब लोग आज मौजूद हैं। निस्संदेह एक-न- एक दिन हम सब भी उन्नति करते हुए उनके स्थान पर पहुँच जायेंगे--यह निश्चित है। यही विकासवाद का सिद्धांत है। यह जान लेना आवश्यक है कि एक बार जीवात्मा मनुष्य शरीर को स्वीकार कर लेती है, वह पशु- पक्षी या वृक्ष-वनस्पति आदि की योनियों को ग्रहण नहीं कर सकती। sabhar shiv ram Tiwari Facebook wall
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शनिवार, 7 अगस्त 2021

सामान्य आबादी में निम्न रक्त विटामिन डी का स्तर

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 सामान्य आबादी में, निम्न रक्त विटामिन डी का स्तर विभिन्न बीमारियों के उच्च जोखिम से जुड़ा हुआ है, जिसमें टाइप 2 मधुमेह और गुर्दे की बीमारी शामिल है। सन एच. किम, एमडी, एमएस (स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन) और उनके सहयोगियों ने विटामिन डी और टाइप 2 मधुमेह (डी2डी) अध्ययन का एक माध्यमिक विश्लेषण किया, जो पूर्व-पूर्व वाले व्यक्तियों में गुर्दे के स्वास्थ्य पर विटामिन डी पूरकता के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए किया गया था। मधुमेह, एक ऐसी स्थिति जो टाइप 2 मधुमेह के जोखिम को बढ़ाती है, जो बदले में गुर्दे की बीमारी का प्रमुख कारण है।


अध्ययन ने 2.9 साल की औसत उपचार अवधि के लिए 2,423 वयस्कों को अधिक वजन / मोटापे और पूर्व-मधुमेह के साथ विटामिन डी 3 4000 आईयू प्रति दिन या प्लेसबो के लिए यादृच्छिक बनाया। "D2d अध्ययन अद्वितीय है क्योंकि हमने उच्च-जोखिम वाले पूर्व-मधुमेह वाले व्यक्तियों की भर्ती की, जिनमें 2-आउट-ऑफ -3 असामान्य ग्लूकोज मान थे, और हमने 2,000 से अधिक प्रतिभागियों की भर्ती की, जो अब तक के सबसे बड़े विटामिन डी मधुमेह रोकथाम परीक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं," डॉ किम ने कहा।


परीक्षण के दौरान, विटामिन डी समूह में गुर्दे की कार्यक्षमता बिगड़ने के 28 मामले और प्लेसीबो समूह में 30 मामले थे, और अनुवर्ती कार्रवाई के दौरान गुर्दा समारोह में औसत परिवर्तन दोनों समूहों में समान था। "हमारे परिणामों ने गुर्दा समारोह पर विटामिन डी की खुराक का लाभ नहीं दिखाया। अध्ययन की लगभग 43% आबादी अध्ययन के बाहर विटामिन डी ले रही थी, हालांकि, अध्ययन प्रविष्टि में प्रतिदिन 1000 आईयू तक। उन लोगों में से जो नहीं थे किसी भी विटामिन डी को स्वयं लेने पर, विटामिन डी के लिए समय के साथ मूत्र प्रोटीन की मात्रा को कम करने का सुझाव था, जिसका अर्थ है कि यह गुर्दे के स्वास्थ्य पर लाभकारी प्रभाव डाल सकता है। इसे और अधिक देखने के लिए अतिरिक्त अध्ययन की आवश्यकता है। "


डॉ. किम ने कहा कि विटामिन डी पूरकता लोकप्रिय है, और यदि अध्ययन की गई जनसंख्या विटामिन डी की कमी नहीं है, तो विटामिन डी पूरकता के नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए लाभ दिखाना मुश्किल है। "अधिकांश अध्ययन आबादी में पर्याप्त रक्त विटामिन डी स्तर और सामान्य गुर्दा समारोह था," उसने कहा। "विटामिन डी के लाभ निम्न रक्त विटामिन डी के स्तर और / या कम गुर्दा समारोह वाले लोगों में अधिक हो सकते हैं।"

Sorce scince daily 

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Kriya Yoga Master, Paramahamsa Hariharananda

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Kriya Yoga Master, Paramahamsa Hariharananda once said:                                               “In the New Testament we can read about Peter, who was a fisherman. He cast his net into the water to catch fish, but if the fish were intelligent they would escape. The whole world is a net in which you have been caught. Consequently, you are in bondage- the bondage of money, and material possessions, the bondage of physical pleasures, the bondage of strong likes and dislikes as well as the bondage of anger, pride, cruelty and other negative emotions. You are not free. Yet all delusions, illusions and errors come from within. By practicing Kriya Yoga, you can escape from the net and stay close to the fisherman’s feet. Only then you will remain free. If you think that you are intelligent or have a lot of pride and anger, offer them up to God. Only if you remain focused on the fontanel will you discover your real talent, along with wisdom and intelligence. You have to go beyond mind, thought, intellect and worldly awareness. 

When practicing kriya from each centre (chakra), think that you are one of the gurus. When you do this, automatically you will hear the divine sound and your thoughts will disappear. You will feel the quality of the guru. Your disturbances will be transformed into knowledge, consciousness, superconsciousness, cosmic consciousness and wisdom. This is called integral yoga. It is knowledge and it is your liberation. So always have faith. Know that God is with you. Be guided in everything by that power.                                                                                   It is unfailing............” sabhar Hugo rist Facebook wa

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