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मंगलवार, 17 अगस्त 2021

कर्म फल प्रक्रिया एवं कर्म से मुक्ति का उपाय

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मनुष्य हर दिन के जीवन में नए कर्म इकट्ठे करता रहता है तो फिर क्या वह इस कर्म से कभी मुक्त ही नहीं हो सकता? अक्सर लोगों के मन में जिज्ञासा होती है कि, कर्म व क्रियाकलापों के अंतहीन चक्र से बाहर कैसे निकला जाए? क्या कुछ ऐसे क्रियाकलाप हैं, जो मुक्ति के मार्ग पर दूसरी गतिविधियों की तुलना में ज्यादा सहायक होते हैं? 
जो व्यक्ति बिल्कुल कुछ नहीं करता, वह कार्मिक याद्दाश्त और कार्मिक चक्रों से पूरी तरह मुक्त होता है। जब तक आप अपने कार्मिक यादों से जुड़े रहते हैं, तब तक अतीत खुद को दोहराता रहता है। कर्म का मतलब क्रियाकलाप के साथ उसकी यादें भी है। 
जब तक आप अपनी यादों के शासन में रहेंगे, तब तक ये आपको कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर करती रहेंगी। अगर आप खुद को अपनी पिछली स्मृतियों से पूरी तरह से अलग कर लें, केवल तभी आप शांत व स्थिर होकर बैठ सकते हैं।
बिना कर्म के कोई याद्दाश्त नहीं होती, इसी तरह से बिना याद्दाश्त के कोई कर्म नहीं होता। जब तक आप अपनी यादों के शासन में रहेंगे, तब तक ये आपको कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर करती रहेंगी। अगर आप खुद को अपनी पिछली स्मृतियों से पूरी तरह से अलग कर लें, केवल तभी आप शांत व स्थिर होकर बैठ सकते हैं। इस बारे में आप एक प्रयोग करके देख सकते हैं, आप कोशिश कीजिए कि आप लगातार दस मिनट तक बिना कुछ भी किए स्थिर रहें। इस दौरान आपके भीतर न तो कोई विचार आना चाहिए, न कोई भावनाएं और न ही कोई गतिविधि होनी चाहिए। अगर फिलहाल आपके लिए यह करना संभव नहीं हो रहा, अगर आपके मन में हजार चीजें चल रही हैं और आप स्थिर होकर नहीं बैठ सकते तो गतिविधि आपके लिए बेहद जरूरी हो जाती है। यह चीज ज्यादातर लोगों पर लागू होती है। 
जब तक आपको कुछ करने की जरूरत है और आप गतिविधि के साथ अपनी पहचान बनाए रखते हैं, तब तक वह कार्मिक रिकॉर्डर उस गतिविधि को आपके लिए रिकॉर्ड करके रखता है और इसके परिणाम कई गुणा होंगे। 
अगर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो आपसे चिपका रह सके तो फिर अतीत में हुई कार्मिक स्मृतियां या कर्म बंधन आपसे अलग होने लगते हैं।
जब तक आप उस स्थिति में नहीं पहुँच जाते, तब तक आप काम से किसी तरह का पहचान या जुड़ाव बनाए बिना उसे एक भेंट की तरह कीजिए। अगर कुछ करने की जरूरत है, तो आप उसे कीजिए, वर्ना सहज रूप से बैठे रहिए। अगर आप बिना खुद को महत्व दिए कोई भी काम करेंगे तो फिर आपको उस कर्म के फल नहीं भोगने पड़ेंगे। आत्म-संतुष्टि व आत्म-महत्व के चलते किए गए कामों से ही कर्म इकठ्ठे होते हैं। अगर आप पूरी तरह से जीवंत व सक्रिय हैं और कोई नए कर्म इकठ्ठा नहीं कर रहे, तो आपके पुराने कर्म टूटकर गिरने शुरू हो जाते हैं। कर्म की यही प्रकृति है। पुराने कर्म आपसे केवल तभी तक चिपके रह सकते हैं, जब तक आप कार्मिक गोंद की नई परतें तैयार करते रहते हैं। अगर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो आपसे चिपका रह सके तो फिर अतीत में हुई कार्मिक स्मृतियां या कर्म बंधन आपसे अलग होने लगते हैं।
अगर आप हर काम को एक समपर्ण या भेंट की तरह करते हैं तो फिर आपके कर्म बंधन धीरे-धीरे खुलने शुरू हो जाते हैं। जब तक आप कुछ भी न करने की स्थिति तक नहीं पहुँच जाते, तब तक आप चाहे जो कुछ भी करें, उसे अपने भीतर एक समर्पण या भेंट के तौर पर करें। अर्पण की भीतरी स्थति में, आपको कृपा मिलनी शुरू हो जाएगी।
हम कर्म से तभी बनते हैं जब कर्म के प्रति हमारा कर्ता का भाव होता है, क्योंकि कर्म, कर्ता पर ही लागू होते हैं। अगर हम कर्म करते हुए भी साक्षी बने रहें और कर्म को परमात्मा द्वारा कराया जा रहा है, यह भावना अपने मन में स्थापित कर लें तो फिर हम कर्म बंधनों से नहीं बंधेंगे, पिछले जिन कर्मों से हम बंधे हुए हैं उन से भी मुक्त हो पाएंगे तथा जन्म जन्म के कर्म बंधनों से मुक्त होकर दैनिक जीवन में कर्म फलों से मिल रही परेशानियों से को पर कर मोक्ष की राह पर चल पाएंगे।

अज्ञात

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सोमवार, 16 अगस्त 2021

maha avatar baba ji

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These beautiful pictures were taken by one of the members of our group on a Kriya Yoga retreat to India in 2017.  It was taken at the Gorakhnath temple in Haridwar. It came up in my Facebook memories today and I would like to share an experience I had on this trip.                                                             I shared this story once before a couple of years ago so I decided to share it again. On this trip to the holy city of Haridwar, our group was led by Kriya Yoga Master, Yogiraj Gurunath Siddhanath. Yogiraj is a Nath Yogi. The word Siddha in his name means “Perfected Being.” The Naths are a very ancient tradition who trace their origin all the way back to Lord Shiva who is regarded as Adinath, which means, the first Nath yogi.                  Yogiraj Siddhanath’s disciples simply call him Gurunath. While in Haridwar Gurunath took us to the famous Gorakhnath temple. The temple was named after probably the most famous Nath saint called Gorakhnath (also called Gorakshanath). Before we entered the temple Gurunath explained that Mahavatar Babaji incarnated as Gorakhnath in the year 70 BC.  He also said that Mahavatar Babaji is none other than Lord Shiva himself. Therefore whenever Gurunath and other Nath yogis talk about Mahavatar Babaji they refer to him as Shiva Goraksha Babaji. So the Gorakhnath temple is a very important and holy place for the Nath yogis. If you look very closely at the first picture you will see that there is a little old man standing in the background, within the red circle. We then entered the temple and were sitting there for a while. Suddenly I heard something that sounded like a bit of a commotion going on in the back of the temple. When I looked around I could see that the people in the temple were doing the pranam to someone, but I could not see who it was.  Then I saw a very old man, hunched over, slowly shuffling to the front of the temple. I say this with all respect, but when I saw him, my first thought was that this feels and looks like a scene from the movie, “The hunchback of Notre Dame.” There was something otherworldly about the old man. He then went over and talked with Gurunath for a while and eventually slowly shuffled out of the temple again.  After he left Gurunath told us that he was a saint and that he was very, very old and that he came to bring us the special blessings of Lord Shiva. A friend of mine went on another occasion also on a pilgrimage with Gurunath to the same Gorakhnath temple in Haridwar. She told me that when they were there, before they entered the temple, Gurunath told them that Mahavatar Babaji will be there in some form or the other during the aarti. They then had a similar experience with the old Sadhu entering the temple during the aarti.  Afterwards Gurunath told them that Babaji entered this old man to give darshan to his devotees. This experience gave me goosebumps. How mysterious and strange are the ways of the Divine ! Om Kriya Babaji Namah Aum ! Sabhar Italy bhakt Facebook wall

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साधना क्या है

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साधना का मतलब होता है की आप किसी चीज पर नियंत्रण प्राप्त करो। साधना मतलब स्वयं को तैयार करना। साधना मतलब साधकर रखना। साधना मतलब ऐसी ऊर्जा पैदा करना जो आपके सारे मार्ग खोल दे। अब इस बात को विस्तृत रूप से समझते है।

साधना एक प्रक्रिया है। एक प्रकार से ये समझ सकते है कि आप किसी कार्य को करना चाहते है भगर उस कार्य के विषय मे पूर्ण रूप से जानकारी नही है तो कार्य नही होगा। उसी प्रकार से आध्यत्म और ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया भी साधना है। साधना से आप अपने अंदर वो ऊर्जा पैदा कर सकते हो जिससे आप किसी भी चीज पर नियंत्रण प्राप्त कर सकते हो। प्रकृति के पांच तत्व पर या फिर किसी व्यक्ति पर या फिर किसी कार्य पर या अदृश्य शक्तियो पर या फिर आप अपने शरीर पर भी नियंत्रण प्राप्त कर सकते है।

साधना का मतलब है आप अपने आपको असीम ऊर्जा के लिए तैयार करो। असीम ऊर्जा ऐसै ही नही मिलती। उज़के लिए स्वयं के अंदर पात्रता होनी चाहिए। वही पात्रता पैदा करने का कार्य साधना करती है। साधना का मतलब अपने आप को तपाना। स्वयं को उस काबिल बनाना की वो परमसत्ता से हमारा जुड़ाव हो जाए। नीति नियमो का पालन करके स्वयं को तैयार करना ही साधना है।

साधना का मतलब है साधकर रखना। अब इस बात को हम इस प्रकार बोल सकते है कि स्वयं को उस काबिल बनाये की आप अपने मन को साधकर रख सके। अपने विचारों को साधकर रख सके। अपने शरीर को साधकर रख सके। मतलब की अपने मन शरीर और विचारों को जो दिशा आप देना चाहे दे सकते है।

साधना का मतलब है कि ऊर्जा को पैदा करना। अब ये कैसे संभव है कि ऊर्जा पैदा हो जाये। तो जब व्यक्ति नीति नॉयमो का पालन करता है जब वो मंत्र का उच्चारण करता है। जब वो किसी स्तोत्र का पाठ करता है। जब व्यक्ति स्वयं की आत्म ऊर्जा को जगृत करता है जब वो ध्यान करता है तब ये सभी घर्षण से उज़के अंदर एक अमूल्य ऊर्जा पैदा होती है और उसी ऊर्जा को कार्यान्वित करके वो अपने जीवन के सारे कार्य कर सकता है और दूसरे लोगो के भी कार्य कर सकता है।

साधना एक दिन की या एक महीने की प्रक्रिया नही है। वो तो आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। जैसे जैसे व्यक्ति ये जप तप ध्यान की प्रक्रिया बढ़ाता है वैसी ही उसकी ऊर्जा भी बढ़ती जाती है और वही ऊर्जा उसके समग्र जीवन को बदलती है।

इस ऊर्जा का उपयोग सद्धक इष्ट देवता की कृपा के लिए कर सकता है। मोक्ष के लिए भी कर सकता है। ज्ञान के लिए भी कर सकता है। सभी प्रकार के देवीदेवता की कृपा प्राप्त करने के लिए या उन्हें साधने के लिए कर सकता है। सभी इत्तरयोनि को आपने आधीन करने के लिए कर सकता है या वो जिस कार्य मे चाहे उसमे उपयोग कर सकता है।

साधना एक समग्र प्रक्रिया है। ये हमारे समग्र जीवन को बदलने की क्षमता रखता है। किसी नॉयम का पालन करना साधना है। तप या व्रत करना भी साधना है। किसी मंत्र का जप करना भी साधना है। योग या प्राणायाम या ध्यान के माध्यम से स्वयं के अंदर ऊर्जा पैदा करना भी साधना है। मन को विचारों को और शरीर को अपने अनुकूल बनाना और जो चाहे कार्य करवाना भी साधना है। यह एक विस्तृत विषय है।

जितने भी मंत्र है या यँत्र है या क्रियाए है वो सभी तब तक सिद्ध नही होते जब आप अपने आपको तैयार नही करते जब तक आप साधन के माध्यम से स्वयं को उस काबिल नही बनाते हो। पहले स्वयं के अंदर ऊर्जा पैदा करना ही साधना का मूल उद्द्देष्य है।

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रविवार, 15 अगस्त 2021

तंत्र-अध्यात्म और काम-(प्रवचन-01)

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तंत्र और योग मौलिक रूप से भिन्न हैं। वे एक ही लक्ष्य पर पहुंचते हैं लेकिन मार्ग केवल अलग-अलग ही नहीं, बल्कि एक दूसरे के विपरीत भी हैं। इसलिए इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है। योग की प्रक्रिया तत्व-ज्ञान प्रणाली-विज्ञान भी है योग विधि भी है। योग दर्शन नहीं है। तंत्र की भांति योग
भी किया, विधि, उपाय पर आधारित है। योग में करना होने की ओर ले जाता है लेकिन विधि भिन्न है। योग में व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है; वह योद्धा का मार्ग है। तंत्र के मार्ग पर संघर्ष बिल्कुल नहीं है। इसके विपरीत उसे भोगना है लेकिन होशपूर्वक बोधपूर्वक।

योग होशपूर्वक दमन है तंत्र होशपूर्वक भोग है।

तंत्र कहता है कि तुम जो भी हो परम-तत्व उसके विपरीत नहीं है। यह विकास है तुम उस परम तक विकसित हो सकते हो। तुम्हारे और सत्य के बीच कोई विरोध नहीं है। तुम उसके अंश हो इसलिए प्रकृति के साथ संघर्ष की, तनाव की, विरोध की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हें प्रकृति का उपयोग करना है; तुम जो भी हो उसका
उपयोग करना है ताकि तुम उसके पार जा सको।


    

योग में पार जाने के लिए तुम्हें स्वयं से संघर्ष करना पड़ता है। योग में संसार और मोक्ष तुम जैसे हो और जो तुम हो सकते हो दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं। दमन करो, उसे मिटाओ जो तुम हो: ताकि तुम वह हो सको जो तुम हो सकते हो। योग में पार जाना मृत्यु है। अपने वास्तविक स्वरूप के जन्म के लिए तुम्हें मरना होगा।

तंत्र की दृष्टि में, योग एक गहरा आत्मघात है। तुम्हें अपने प्राकृतिक रूप अपने शरीर अपनी वृत्तियों अपनी इच्छाओं को- सब कुछ को मार देना होगा नष्ट कर देना होगा। तंत्र कहता है ”तुम जैसे हो, उसे वैसे ही स्वीकार करो।” तंत्र गहरी से गहरी स्वीकृति है। अपने और सत्य के बीच संसार और निर्वाण के बीच कोई अंतराल मत
बनाओ। तंत्र के लिए कोई अंतराल नहीं है मृत्यु जरूरी नहीं है। तुम्हारे पुनर्जन्म के लिए किसी मृत्यु की जरूरत नहीं है बल्कि अतिक्रमण की आवश्यकता है। इस अतिक्रमण के लिए स्वयं का उपयोग करना है।

उदाहरण के लिए- काम है सेक्स है। वह बुनियादी ऊर्जा है जिसके माध्यम से तुम पैदा हुए हो। तुम्हारे अस्तित्व के तुम्हारे शरीर के बुनियादी कोश काम के हैं। यही कारण है कि मनुष्य का मन काम के इर्द गिर्द ही घूमता रहता है। योग में इस ऊर्जा से लड़ना अनिवार्य है। वहां लड़कर ही तुम अपने भीतर एक भिन्न केंद्र को निर्मित
करते हो। जितना तुम लड़ते हो उतना ही तुम उस भिन्न केंद्र से जुड़ते जाते हो। तब काम तुम्हारा केंद्र नहीं रह जाता। काम से संघर्ष- निश्चित ही होशपूर्वक- तुम्हारे भीतर अस्तित्व का एक नया केंद्र निर्मित कर देता है। तब काम तुम्हारी ऊर्जा नहीं रह जाएगा। काम से लड़कर तुम अपनी ही ऊर्जा निर्मित कर लोगे एक अलग प्रकार की ही ऊर्जा, एक अलग प्रकार का अस्तित्व-केंद्र पैदा होगा।

तंत्र के लिए काम-ऊर्जा का उपयोग करो उससे लड़ो मत। उसे रूपांतरित करो। उसे शत्रु मत समझो उससे मित्रता बनाओ। वह तुम्हारी ही ऊर्जा है; वह पाप नहीं है वह बुरी नहीं है। प्रत्येक ऊर्जा तटस्थ है। उसका उपयोग तुम्हारे हित में किया जा सकता है और तुम्हारे विरुद्ध भी किया जा सकता है। तुम उसे अवरोधक भी बना सकते हो और सीढ़ी भी बना सकते हो। उसका उपयोग हो सकता है। सही ढंग से उपयोग करने पर मित्र बन जाती है। गलत उपयोग पर वह तुम्हारी शत्रु हो जाती है। वह दोनों ही नहीं है। ऊर्जा तटस्थ है।

साधारण आदमी जिस तरह यौन का काम का उपयोग करता है वह उसका शत्रु बन जाता है उसे नष्ट कर देता है उसकी शक्ति का क्षय करता है। योग की दृष्टि ठीक इसके विपरीत है – साधरण मन के विपरीत। साधारण चित्त अपनी ही वासनाओं से विनष्ट होता जाता है।

इसलिए योग कहता है ”वासना छोड़ो और वासना-शून्य हो जाओ।” वासना से लड़ो और अपने भीतर एक संघटन, इनटेग्रेशन पैदा करो जो वासना रहित हो। तंत्र कहता है ”वासना के प्रति जागो।” उससे संघर्ष मत करो। वासना में पूरी सजगता के साथ प्रवेश करो और जब तुम पूरी होश से वासना में प्रवेश करते हो तुम उसका अतिक्रमण कर जाते हो। तब तुम उसमें होकर भी उसमें नहीं होते। तुम उसमें से गुजरते हो लेकिन अजनबी बने रहते हो, अछूते रह जाते हो।

योग बहुत अधिक आकर्षित करता है क्योंकि योग साधारण चित्त के बिल्कुल विपरीत है। इसलिए साधारण चित्त योग की भाषा समझ सकता है। तुम यह जानते हो कि किस भांति काम तुम्हें विनष्ट कर रहा है इसने तुम्हें किस तरह नष्ट कर दिया है किस तरह तुम इसके इर्द गिर्द गुलामों की भांति, कठपुतलियों की भांति घूमते रहते हो। अपने अनुभव से तुम यह जानते हो। इसलिए जब योग कहता है ”इससे संघर्ष करो” तुम तत्काल इस भाषा को समझ जाते हो। यही आकर्षण है योग का सुगम आकर्षण है।

तंत्र इतनी सरलता से आकर्षित नहीं करता। यह मुश्किल लगता है कि कैसे इच्छा के बिना उसके द्वारा अभिभूत हुए प्रवेश किया जा सकता है? कामवासना में पूरी होश से किस प्रकार प्रवृत्त हुआ जा सकता है? साधरण चित्त भयभीत हो जाता है। यह खतरनाक लगता है ऐसा नहीं कि यह खतरनाक है। जो कुछ भी तुम काम के संबंध में जानते हो, वह तुम्हारे लिए खतरा उत्पन्न करता है। तुम अपने को जानते हो तुम जानते हो कि तुम किस प्रकार स्वयं को धोखा दे सकते हो। तुम भलीभांति जानते हो कि तुम्हारा मन चालाक है। तुम वासना में काम वासना में सभी वासनाओं में प्रवृत्त हो सकते हो और अपने को धोखा दे सकते हो कि तुम पूरी होश के साथ उसमें प्रवृत हो रहे हो। यही कारण है कि तुम्हें खतरे का अहसास होता है। खतरा तंत्र में नहीं है तुम में है तुम में है।

और योग का आकर्षण भी तुम्हारे कारण है। तुम्हारे साधारण मन तुम्हारा काम-दमित, काम का भूखा कामांध चित्त इसका कारण है। क्योंकि साधारण मन काम के संबंध में स्वस्थ नहीं है इसलिए योग के लिए आकर्षण है। एक बेहतर मनुष्यता जिसका काम के प्रति स्वस्थ नैसर्गिक सहज स्वाभाविक दृष्टिकोण होगा… हम सामान्य और प्रकृत नहीं है। हम सर्वथा असामान्य हैं अस्वस्थ और विक्षिप्त हैं। लेकिन क्योंकि सभी हम जैसे हैं इसलिए हमें इसका अहसास नहीं होता। पागलपन इतना सामान्य है कि शायद पागल न होना असामान्य प्रतीत होता है। हमारे बीच एक बुद्ध असामान्य हैं एक जीसस असामान्य है। वे इनसे अन्यथा मालूम होते है। यह सामान्यता एक रोग है। इसी सामान्य चित्त में योग का आकर्षण पैदा होता है।

यदि काम को उसकी स्वाभाविकता से ग्रहण करो यदि उसके गिर्द पक्ष या विपक्ष का कोई दर्शनशास्त्र न खड़े करो, ऐसे ही देखो जैसे अपने हाथ-पांव को देखते हो, एक स्वाभाविक चीज की तरह उसे उसकी समग्रता से स्वीकार करो, तन तंत्र आकर्षित करेगा, और तभी केवल तंत्र ही बहुत से लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

लेकिन तंत्र के दिन आ रहे हैं। देर-अबेर पहली बार जन-साधारण में तंत्र का विस्फोट होने वाला है। पहली बार जमाना परिपक्व हुआ है–काम को प्राकृतिक रूप में ग्रहण करने के लिए परिपक्व। और संभव है कि यह विस्फोट पहले पश्चिम में हो, क्योंकि फ्रायड, जुंग और रेख ने पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। उन्हें तंत्र के बारे में कुछ पता नहीं था लेकिन उन्होंने तंत्र के विकास के लिए बुनियादी भूमि तैयार कर दी है।

पाश्चात्य मनोविज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि मनुष्य की बुनियादी बीमारी कहीं न कहीं काम से संबंधित है उसका बुनियादी पागलपन काम-केंद्रित। इसलिए जब तक मनुष्य काम-अभिमुख है वह स्वाभाविक सामान्य नहीं हो सकता। काम के प्रति अपनी इस मनोवृत्ति के कारण ही मनुष्य गलत हो गया है। किसी भी भाव या विचार की जरूरत नहीं है और तभी तुम स्वाभाविक हो सकते हो। अपनी आंखों के बारे में तुम्हारा क्या विचार है? क्या वे दुष्ट हैं या दिव्य? क्या तुम अपनी आंखों के पक्ष में हो या विपक्ष में? कोई भी पक्षपात नहीं। इसीलिए तुम्हारी आंखों सामान्य हैं। कोई भी रवैया अपना लो सोचों कि आंखों बुरी हैं तब उनसे देखना मुश्किल हो जाएगा। तब देखना किसी समस्या का रूप ले लेगा जैसे अभी काम है यान है। तब तुम देखना चाहोगे। तुम देखने की इच्छा करोगे, देखने के लिए व्यग्र हो जाओगे। लेकिन जब तुम देखोगे, स्वयं को अपराधी समझोगे; जब भी देखोगे लगेगा कि कुछ गलत हो गया है। कुछ पाप हो गया है। और तब तुम दृष्टि के यंत्र को ही नष्ट कर देना चाहोगे; आंखों को ही नष्ट कर देना चाहोगे। और जितना ही नष्ट करना चाहोगे, उतना ही तुम आंख-केंद्रित हो जाओगे। तब एक विसंगति उत्पन्न होगी, तुम ज्यादा से ज्यादा देखना भी चाहोगे और ज्यादा से ज्यादा अपराधी भी अनुभव करोगे।

काम-केंद्र के साथ भी यही दुर्घटना घटी है।

तंत्र कहता है ”तुम जो भी हो उसे स्वीकार करो। यही मूलस्वर है।” समग्र स्वीकार और केवल समग्र स्वीकार के माध्यम से ही तुम विकास कर सकते हो। तब उस ऊर्जा का उपयोग करो जो तुम्हारे पास है। पर उसका उपयोग कैसे करोगे? पहले उन्हें स्वीकार करो फिर खोजो कि ये शक्तियां क्या हैं? काम क्या है? तथ्य क्या है? हम उससे परिचित नहीं हैं। हम काम के बारे में जो कुछ भी जानते हैं वह दूसरों ने हमें सिखाया है। हम काम-भोग से गुजरे भी होंगे, लेकिन दमित मन से, अपराध भाव से, जल्दी-जल्दी, जैसे कोई बोझ उतारना है हल्का होना है। काम-भोग कोई प्रिय कृत्य नहीं है। तुम प्रसन्नता अनुभव नहीं करते लेकिन तुम छोड़ भी नहीं सकते। जितना ही तुम उसे छोड़ना चाहते हो उतना ही वह आकर्षक होता जाता है। जितना ही तुम उसे नकारते हो उतना ही वह तुम्हें निमंत्रित करता मालूम होता है।

तुम काम वासना को नकार नहीं सकते, लेकिन नकारने की नष्ट करने की मनोवृत्ति उस मन को ही उस होश को ही, उस संवेदनशीलता को ही नष्ट कर देती है जो काम वासना को समझ सकती है। इसलिए तुम बिना किसी संवेदना के ही काम भोग करते रहते हो। और तब तुम उसे समझ नहीं पाते। केवल गहरी संवेदनशीलता ही किसी चीज को समझ सकती है; उसके प्रति गहरा भाव, गहरी सहानुभूति और उसमें गहरी गति ही किसी चीज को समझ सकती है। तुम काम को केवल तभी समझ सकते हो जब तुम उसके पास ऐसे जाओ जैसे कवि फूलों के पास जाता है। अगर फूलों के साथ अपराध अनुभव करो तो तुम फुलवारी से आंखों बंद किये गुजर जाओगे; तुम बड़ी जल्दबाजी में होओगे- एक विक्षिप्त जल्दबाजी। किसी कदर निकल भागने की फिक्र लगी रहेगी। फिर तुम सजग, होशपूर्ण कैसे रह सकते हो।

इसलिए तंत्र कहता है ”तुम जो भी हो उसे स्वीकार करो।” तुम अनेक बहु-आयामी ऊर्जाओं के महान रहस्य हो, उसे स्वीकार करो। और प्रत्येक ऊर्जा के साथ गहरी संवेदनशीलता, और सजगता से, प्रेम और बोध के साथ यात्रा करो। उसके साथ यात्रा करो… तब ऊर्जा प्रत्येक वासना के अतिक्रमण का वाहन बन जाती है। तब प्रत्येक
ऊर्जा सहयोगी हो जाती है। और तब संसार ही निर्वाण हो जाता है।

योग निषेध है तंत्र विधेय है। योग द्वैत की भाषा में सोचता है इसलिए यह योग शब्द है। योग का अर्थ है-दो चीजों को जोड़ना। उनका जोड़ा बनाना। लेकिन वहां चीजें दो हैं वहां द्वैत है। तंत्र कहता है ”द्वैत नहीं है। और अगर द्वैत है तो तुम उसे एक नहीं कर सकते। कितना भी प्रयत्न करो दो रहेंगे ही, कितना भी दो के दो रहेंगे ही। संघर्ष जारी रहेगा; द्वैत बना रहेगा।”

अगर संसार और परमात्मा दो हैं तो वे एक में नहीं जोड़े जा सकते। और अगर वे यथार्थ में दो नहीं है दो की तरह सिर्फ भागते हैं तो ही वे एक हो सकते हैं। अगर तुम्हारा शरीर और आत्मा दो है तो उनको जोड़ने का उपाय नहीं है। दो वे रहेंगे।

तंत्र कहता है ”द्वैत नहीं है वह मात्र आभास है।” इसलिए आभास को मजबूत बनाने की जरूरत क्या है? इस आभास को मजबूत होने में सहयोग क्यों दिया जाए? इसी क्षण इसे समाप्त करो और एक हो जाओ। और एक होने के लिए स्वीकार चाहिए संघर्ष नहीं। स्वीकार एक करता है। संसार को स्वीकारो शरीर को स्वीकारो; उस सबको
स्वीकारो जो उसमें निहित है। अपने भीतर दूसरा केंद्र मत निर्मित करो। क्योंकि तंत्र की दृष्टि में वह दूसरा केंद्र अहंकार के सिवाय कुछ नहीं है। स्मरण रहे तंत्र की दृष्टि में वह अहंकार ही है। इसलिए अहंकार को मत खड़ा करो सिर्फ बोध रखो कि तुम क्या हो।

और अगर लड़ोगे तो अहंकार वहां होगा ही। इसलिए ऐसा योगी खोजना मुश्किल है जो अहंकारी न हो। सच में मुश्किल है। योगी निरहंकारिता की बात किये जाते हैं लेकिन वे निरहंकारी नहीं हो सकते। उनकी पद्धति ही अहंकार निर्मित करती है। और संघर्ष वह पद्धति है प्रक्रिया है। अगर लड़ोगे तो निश्चित ही- अहंकार को पैदा करोगे। जितना तुम लड़ोगे उतना अहंकार बलवान होगा। और अगर लड़ाई में जीत गए तो तुम्हारा अहंकार परम हो जाएगा।

तंत्र कहता है ”संघर्ष नहीं।” और तब अहंकार की संभावना नहीं। लेकिन अगर हम तंत्र की मानें तो बहुत सी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी। क्योंकि अगर हम लड़ते नहीं तो हमारे लिए भोग ही रह जाता है। हमारे लिए ”संघर्ष नहीं’’ का मतलब होता है भोग। और तब हम भयभीत हो जाते हैं। जन्मों-जन्मों हम भोग में डूबे रहे और कहीं नहीं
पहुंचे। लेकिन हमारा जो भोग है वह तंत्र का भोग नहीं है। तंत्र कहता है ”भोगो, लेकिन होश के साथ।”

अगर तुम क्रोधित हो तो तंत्र यह नहीं कहेगा कि क्रोध मत करो। वह कहेगा कि पूरी तरह क्रोध करो लेकिन साथ ही उसके प्रति सजग भी रहो। तंत्र क्रोध के खिलाफ नहीं है। तंत्र आध्यात्मिक नींद आध्यात्मिक मूर्च्छा के खिलाफ है। होश रखो और क्रोध करो। और तंत्र का यही गुहा रहस्य है कि अगर तुम होशपूर्ण रहे तो क्रोध रूपांतरित हो जाता है क्रोध करुणा बन जाता है। इसलिए तंत्र के अनुसार क्रोध तुम्हारा शत्रु नहीं है; क्रोध बीज रूप में करुणा है। क्रोध की ऊर्जा ही करुणा बन जाती है। और अगर तुम उससे लड़ते हो तो करुणा की संभावना समाप्त हो जाती है।

इसलिए अगर तुम दमन में सफल हुए तो मृत हो जाओगे। दमन के कारण क्रोध तो नहीं रहेगा लेकिन उसी कारण करुणा भी जाती रहेगी। क्योंकि क्रोध ही करुणा बनता है। अगर तुम काम के दमन में सफल हो गए–जो कि संभव है–तो काम तो नहीं रहेगा, लेकिन उसके साथ प्रेम भी नहीं रहेगा। क्योंकि काम के मर जाने पर वह ऊर्जा ही नहीं बचती जो प्रेम में विकसित होती है। तुम काम-रहित तो हो जाओगे, पर साथ ही प्रेम-रहित भी ह ो जाओगे। और तब तो असली बात ही चूक गए क्योंकि प्रेम के बिना भगवत्ता नहीं है। और प्रेम के बिना मुक्ति नहीं है और प्रेम के बिना स्वतंत्रता नहीं है।

तंत्र का कहना है कि इन्हीं ऊर्जाओं को रूपांतरित करना है। इसी बात को दूसरे ढंग से भी कहा जा सकता है। यदि तुम संसार के विरुद्ध हो तो निर्वाण संभव नहीं है क्योंकि संसार को ही तो निर्वाण में रूपांतरित करना है। तब तुम उन्हीं बुनियादी शक्तियों के ही खिलाफ हो गए जो कि शक्तियों के स्रोत हैं।

इसलिए तंत्र की कीमिया कहती है कि लड़ो मत सभी शक्तियां जो भी तुम्हें मिली हैं उन्हें मित्र बना लो। उनका स्वागत करो। तुम इसे अहोभाग्य समझो कि तुम्हारे पास क्रोध है कि तुम्हारे पास काम-वासना है कि तुम्हारे पास लोभ है। अपने को धन्यभागी समझो क्योंकि वे अप्रकट स्रोत हैं। और उन्हें रूपांतरित किया जा सकता
है और उन्हें प्रकट किया जा सकता है। और जब काम-वासना रूपांतरित होती है तो प्रेम बन जाती है। विष खो जाता है कुरूपता खो जाती है।

बीज कुरूप है लेकिन वही जब जीवित होता है अंकुरित होता है पुष्पित होता है तब उसका सौंदर्य प्रकट होता है। बीज को मत फेंकना क्योंकि तब तुम उसके साथ फूलों को भी फेंक रहे हो। वे अभी उनमें नहीं हैं अभी प्रकट नहीं हैं कि तुम उन्हें देख सको। वे अप्रकट है लेकिन हैं। बीज का उपयोग करो ताकि तुम फूलों को प्राप्त कर
सको। इसलिए पहले स्वीकृति, एक अति संवेदनशील बोध और होश- तब भोग की अनुमति है।

एक बात और जो कि वास्तव में बहुत ही हैरानी की है लेकिन वह तंत्र की गहरी से गहरी खोजों में से एक है। और वह है: जिसे भी तुम शत्रु मान लेते हो चाहे वह लोभ हो क्रोध हो, घूणा हो, या काम हो, जो भी हो तुम्हारा मानना ही उन्हें शत्रु बना देता है। उन्हें परमात्मा का वरदान समझो और कृतज्ञ हृदय से उनके पास जाओ।

उदाहरण के लिए तंत्र ने काम-ऊर्जा को रूपांतरित करने की अनेक विधियां विकसित की हैं। काम-वासना में ऐसे प्रवेश करते जाओ जैसे कोई परमात्मा के मंदिर में प्रवेश करता है। काम कृत्य को ऐसे लो जैसे कि वह प्रार्थना है जैसे कि वह ध्यान है। उसकी पवित्रता को अनुभव करो। इसीलिए खजुराहो पुरी, कोर्णाक सभी मंदिरों में मैथुन की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर की दीवारों पर काम-क्रीडा के चित्र बे-तुके लगते हैं- खासकर ईसाइयत, इस्लाम और जैन धर्म की आंखों में। उन्हें यह बात परस्पर विरोधी मालूम होती है कि मैथुन के चित्रों का मंदिर से क्या संबंध हो सकता है? खजुराहो के मंदिर की बाहरी दीवारों पर संभोग की, मैथुन की हर संभव मुद्रा पत्थरों में अंकित है।
क्यों? मन्दिर में कम से कम उनका कोई स्थान नहीं है मनों में हो सकता हैं। ईसाइयत इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकती कि चर्च की दीवारों पर खजुराहो जैसे चित्र खुदे हों। असंभव!

आधुनिक हिंदू भी इस बात के लिए अपने को अपराधी अनुभव करते हैं। इसका कारण है कि आधुनिक हिंदू–मानस भी ईसाइयत के द्वारा निर्मित हुआ है। वे हिंदू-ईसाई है और वे बदत्तर हैं–क्योंकि ईसाई होना तो ठीक है लेकिन हिंदू-ईसाई होना बेहूदा है। वे अपराधी अनुभव करते हैं। एक हिंदू नेता पुरुषोतमदास टंडन ने तो यहां तक सलाह दी कि इन मंदिर को ध्वस्त कर देना चाहिए। वे हमारे नहीं हैं। सच ही वे हमारे नहीं मालूम पड़ते क्योंकि बहुत दिनों से, सदियों से तंत्र हमारे हृदयों से निर्वासित रहा। तंत्र हमारी मुख्य धारा नहीं रहा। योग मुख्य धारा रहा। और योग खजुराहो की बात सोच भी नहीं सकता। इसे नष्ट कर देना चाहिए।

तंत्र कहता है कि संभोग में ऐसे प्रवेश करो जैसे कोई पवित्र मंदिर में प्रवेश कर रहा हो। इसी कारण पवित्र मंदिरों की दीवारों पर उन्होंने संभोग के चित्र अंकित किए उन्होंने कहा कि काम-भोग में ऐसे उतरो जैसे तुम मंदिर में प्रवेश करते हो। इसलिए जब तुम किसी पवित्र मंदिर में प्रवेश करते हो वहां संभोग के चित्र इसलिए हैं कि
तुम्हारा मन दोनों में संबंधित हो जाए दोनों का साहचर्यगत संबंध स्थापित हो जाए ताकि तुम यह अनुभव कर सको कि संसार और परमात्मा दो विरोधी तत्व नहीं है बल्कि एक हैं वे परस्पर विरोधी नहीं। वे ध्रुवीय विपरीताएं हैं जो एक दूसरे की सहायता करती हैं। और इस ध्रुवीयता के कारण ही अस्तित्व में हैं। अगर यह ध्रुवीयता नष्ट हो
जाए तो सारा संसार ही नष्ट हो जाएगा। इसलिए इस गहरी एकतात्मकता को देखो। केवल ध्रुवीय बिंदुओं की मत देखो, उस आंतरिक धारा को देखो जो सबको एक करती है।

तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है। स्मरण रखो कि तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है; कुछ भी अपवित्र नहीं है। इसे इस भांति देखो। एक अधार्मिक आदमी के लिए सब कुछ अपवित्र है। तथाकथित धार्मिक आदमी के लिए कुछ चीजें पवित्र हैं और कुछ अपवित्र। तंत्र के लिए सब कुछ पवित्र है।

कुछ समय पहले एक ईसाई पादरी मेरे पास आया था। उसने कहा कि ईश्वर ने संसार को बनाया। इसलिए मैंने पूछा, ”पाप को किसने बनाया?” उसने कहा, ”शैतान ने।” तब मैंने पूछा, ”शैतान को किसने बनाया।” तब वह पादरी विबूचन में पड़ गया। उसने कहा ”परमात्मा ने ही शैतान को बनाया।”

शैतान पाप को पैदा करता है और परमात्मा शैतान को। तब असली पापी कौन है–परमात्मा या शैतान? लेकिन द्वैतवादी धारणा इसी प्रकार की विसंगतियों की ओर ले जाती है।

तंत्र के लिए ईश्वर और शैतान दो नहीं हैं। वास्तव में, तंत्र में कुछ ऐसा ही नहीं जिसे शैतान कहा जा सके। तंत्र में सब कछ पवित्र है सब कुछ भागवत है! और यही सही दृष्टि बिंदु है गहनतम दृष्टि-बिंदु है। अगर इस संसार में
कुछ चीज भी अपवित्र है तो प्रश्न उठता है कि वह कहां से आती है और वह कैसे संभव है।

इसलिए दो ही विकल्प हैं। पहला है नास्तिक का विकल्प जो कहता है कि सब कुछ अपवित्र है। यह भी सही है। वह भी अद्वैतवादी है। उसे संसार में कहीं भी पवित्रता दिखाई नहीं देती। और दूसरा है तंत्र का विकल्प–सब कुछ पवित्र है। वह भी अद्वैतवादी है। लेकिन इन दोनों के मध्य में जो तथाकथित धार्मिक लोग हैं वे वास्तव में धार्मिक नहीं हैं–न तो वे धार्मिक हैं और न ही अधार्मिक- क्योंकि वे सदा द्वंद्व में जीते हैं। उनका पूरा धर्मशास्त्र दोनों द्वारों को मिलाने की कोशिश कर रहा है और वे कभी मिलते नहीं।

अगर एक भी कोशिका, एक भी अणु अपवित्र है तो सारा संसार अपवित्र हो जाता है। क्योंकि वह अकेला अणु इस पवित्र संसार में कैसे रह सकता है? यह कैसे संभव है! उसे सबका सहारा मिला है। होने के लिए अस्तित्व के लिए उसे समस्त का सहारा चाहिए। और अगर अपवित्र तत्व को पवित्र तत्वों का सहारा मिला है तो दोनों में क्या अंतर हुआ? इसलिए जगत या तो समग्ररूपेण पवित्र है बेशर्त या वह अपवित्र है। मध्य की कोई स्थिति नहीं है।

तंत्र कहता है कि सब कुछ पवित्र है। यही कारण है कि हम उसे समझ नहीं पाते। वह गहनतम अद्वैतवादी दृष्टि है–अगर हम इसे दृष्टि कह सकें तो। पर यह दृष्टिकोण है नहीं क्योंकि दृष्टिकोण द्वैतवादी ही होगा। तंत्र किसी चीज के विरुद्ध नहीं, इसलिए वह दृष्टिकोण नहीं है। वह अनुभूत एकत्व है एक ऐसा एकत्व जिसे जिया गया है।

ये दो मार्ग हैं- योग और तंत्र। हमारे अपंग चित्र के कारण तंत्र प्रभावी नहीं हो सका। लेकिन जब कोई भीतर से स्वस्थ होता है जब भीतर अराजकता नहीं होती तंत्र का अपना सौंदर्य है। और तभी वह वही समझ सकता है कि तंत्र क्या है? हमारे अशांत चित्त के कारण योग का आकर्षण है। योग हमें आसानी से आकर्षित कर लेता है।

स्मरण रहे कि अंत में तुम्हारा चित्त ही किसी चीज आकर्षक या विकर्षक बनाता है। तुम ही निर्णायक कारक हो।

ये दोनों अलग-अलग मार्ग हैं। मैं यह नहीं कहता हूं कि योग के द्वारा कोई पहुंच नहीं सकता। योग के मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है लेकिन उस योग से नहीं जो आज प्रचलित है। जो योग आज प्रचलित है वह वास्तव में योग नहीं लेकिन वह तुम्हारे से रुग्ण चित्त की व्याख्या है। परम को उपलब्ध होने के लिए योग भी एक प्रामाणिक मार्ग
हो सकता है लेकिन वह तभी संभव है जब कि तुम्हारे चित्त स्वस्थ हो जब वह रुग्ण और बीमार न हो तब योग का रूप ही कुछ और होता है।

उदाहरण के लिए महावीर का मार्ग योग है; लेकिन वे काम का दमन नहीं करते। उन्होंने काम को जाना है उसे जीया है उसे भली भांति परिचित हैं वह उनके लिए व्यर्थ हो गया है इसलिए वह विदा हो गया है। बुद्ध का मार्ग योग है लेकिन वे भी संसार से गुजरे हैं; वह उससे भली भांति परिचित हैं। वह उससे लड़ नहीं रहे।

तुम जिसे जान लेते हो उससे मुक्त हो जाते हो। वह फिर सूखे पत्तों की भांति पेड़ से गिर जाता है। वह त्याग नहीं है उसमें लड़ाई नहीं है। बुद्ध के चेहरे को देखो वह लड़ने वाले का चेहरा नहीं है। वे लड़ नहीं रहे हैं। वे कितने शांत हैं शांति के प्रतीक हैं और फिर अपने योगियों को देखो; लड़ाई उनके चेहरों पर अंकित है। गहरे में वहां बड़ा

शोरगुल है क्षोभ है अशांति है मानो वे ज्वालामुखी पर बैठे हों। उनकी आंखों में झांको और तुम्हें इसका पता चलेगा कि उन्होंने अपने समस्त रोगों को किसी गहराई में दबा रखा है। वे उनके पार नहीं गए।

एक स्वस्थ संसार में, जहां प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रामाणिक जीवन जीता है जहां कोई किसी का अनुकरण नहीं करता, बस अपने ही ढंग से जीता है योग और तंत्र दोनों ही मार्ग संभव हैं। वहां व्यक्ति उस गहरी संवेदनशीलता को उपलब्ध हो सकता है जो वासनाओं का अतिक्रमण करती है वहां वह उस बिंदु पर पहुंच सकता है जहां कामनाएं व्यर्थ होकर गिर जाती हैं। योग से भी वह संभव है। लेकिन मेरे देखे उसी संसार में योग कारगर होगा जहां तंत्र भी कारगर होगा इसे स्मरण रखें।

हमें स्वस्थ और स्वाभाविक चित्त की जरूरत है। जिस संसार में स्वाभाविक मनुष्य होगा वहां योग और तंत्र दोनों ही वासनाओं के अतिक्रमण में सहयोगी होंगे। हमारे रुग्ण समाज में न तो योग और न तंत्र हमारा मार्ग दर्शन कर सकता है कयोंकि अगर हम योग को चुनते हैं तो इसलिए नहीं कि हमारी कामनाएं व्यर्थ हो गई हैं। नहीं
कामनाएं तो अब भी अर्थपूर्ण हैं। वे गिरी नहीं उन्हें बलपूर्वक हटाना है। अगर हम योग को चुनते हैं तो उसे दमन की विधि के रूप में ही चुनते हैं।

और यदि तंत्र को चुनते है तो सिर्फ चालाकी के रूप में धोखे के रूप में ताकि हम भोग में उतर सकें। इसलिए अस्वस्थ चित्त के साथ न तो योग काम दे सकता है और न ही तंत्र। वे दोनों ही हमें धोखे में ले जाएंगे। आरंभ करने के लिए तो स्वस्थ चित्त की विशेष रूप यौन के तल पर स्वस्थ चित्त की जरूरत है। तब तुम्हें तुम्हारा मार्ग चुनने में कोई कठिनाई नहीं हैं। तुम योग चुन सकते हो; तुम तंत्र चुन सकते हो।

बुनियादी तौर से दो प्रकार के लोग है: स्त्री और पुरुष–जैविक अर्थों में नहीं, मानिसक रूप में। जो मानसिक तौर से पुरुष हैं–आक्रमक हिंसक बहिर्मुखी योग उनका मार्ग है। जो बुनियादी तौर से स्त्रैण है–ग्रहणशील, निष्क्रिय और अहिंसक–तंत्र उनका मार्ग है।

इसे ठीक से ध्यान में रख ले। तंत्र के लिए मां काली तारा देवी अनेक देवियां, भैरवियां बहुत महत्वपूर्ण है योग में तुम्हें कहीं किसी देवी का नाम नहीं सुनाई देगा। तंत्र में देवियां ही देवियां हैं और योग में देव ही देव। योग बाहर जाती हुई ऊर्जा है और तंत्र भीतर जाती हुई ऊर्जा है। इसलिए आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में कह सकते हैं कि योग बहिर्मुखी है और तंत्र अंतर्मुखी। इस लिए यह व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। अगर तुम अंतर्मुखी हो तब संघर्ष लड़ाई तुम्हारे लिए नहीं है। अगर तुम बहिर्मुखी व्यक्ति हो तब संघर्ष तुम्हारा मार्ग है।

लेकिन हम उलझे हुए हैं सिर्फ उलझन हैं सब अस्तव्यस्त है सब गड़बड़ है। इसी कारण किसी से सहायता नहीं मिलती। उलटे, सब गड़बड़ हो जाता है। योग तुम्हें निक्षुब्ध करेगा तंत्र तुम्हें अशांत करेगा हर औषधि तुम्हारे लिए एक नई बीमारी पैदा करेगी क्योंकि चुनाव करनेवाला ही रोगी है विकृत है उसका चुनाव ही रुग्ण है रोग-
ग्रस्त है।

इसलिए मेरा यह मतलब नहीं कि योग के द्वारा तुम पहुंच ही नहीं सकते। मैं तंत्र पर सिर्फ इसलिए जोर देता हूं क्योंकि हम समझ पायेंगे कि तंत्र क्या है?

 osho


sabhar https://oshostsang.wordpress.com

 

 


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शनिवार, 14 अगस्त 2021

शरीर में मौजूद सप्त चक्र

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🌺 *श्री परमहंस अद्वैत स्वरुप मत * 🌺
      🧘 शरीर में मौजूद सप्त चक्र 🧘

1. #मूलाधारचक्र : 

💥*यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच 4 पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।* 

2. #स्वाधिष्ठानचक्र- 

💥*यह वह चक्र है, जो स्त्री पुरषों के जननं मूल से 4 अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी 6 पंखुरियां हैं। जिन की ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है , उनके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की परधानता होती है।*

3. #मणिपुरचक्र : 

💥*नाभि के मूल में स्थित यह शरीर के अंतर्गत तीसरा चक्र है, जो 10 कमल पंखुरियों से युक्त है। इसके सक्रिय होने से व्यक्ति पर काम करने की धुन सवार रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं*।

4. #अनाहतचक्र-

💥*हृदयस्थल में स्थित द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से  सुशोभित यह चोथा चक्र है।  इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के अंदर ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है।* 

5. #विशुद्धचक्र- 

💥*कंठ में  विशुद्ध चक्र है और जो 16 पंखुरियों वाला है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।*

6. #आज्ञाचक्र :

💥*दोनों आंखों के बीच भृकुटी  में आज्ञा चक्र है । यहां पर तीनों नाड़ियां इड़ा, पिंगला और सुषमना मिलती हैं। इस चक्र के जागृत होने पर तारे के समान ज्योति प्रकाश दिखाई देने लगता है ।यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। 

7. #सहस्रारचक्र :

💥*सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं।*
👍प्रभाव: यदि व्यक्ति पूर्ण सदगुरु की कृपा से नाम सिमरन और ध्यान योग साधना करके यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है। यही मोक्ष का द्वार है।🧘 sabhar Facebook wall satya karm atma bodh

                     🙏 🌺 🙏 🌺 🙏

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science

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Science fair projects ideas and fun homeschool experiments. Make an AA battery electric motor, Magnetic slime with water, glue and iron. Use cleaning products like bleach and vinegar for cool science tricks. Dissolve an egg shell, and make your drawings float on water!

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शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

क्या है आनन्दमय कोश/BLISS BODY की बिन्दु साधना और कला साधना

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 आनन्दमय कोश के चार प्रधान अंग ...

1- नाद, 2- बिन्दु  3- कला  4-तुरीया  

2-बिन्दु साधना;-  

 08 FACTS;-

1-आनन्दमय कोश की साधना में बिन्दु का अर्थ होगा, परमाणु/Nuclear। सूक्ष्म से सूक्ष्म जो अणु हैं, वहाँ  तक अपनी गति हो जाने पर भी ब्रह्म की समीपता तक पहुँचा जा सकता है और सामीप्य सुख का अनुभव किया जा सकता है।बिन्दु- साधना का एक अर्थ ब्रह्मचर्य भी है।अन्नमय कोश के प्रकरण में  इस बिन्दु का अर्थ ‘वीर्य’ किया गया है। किसी वस्तु को कूटकर यदि चूर्ण बना लें और चूर्ण को खुद माइक्रोस्कोप  से देखें तो छोटे- छोटे टुकड़ों का एक ढेर दिखाई पड़ेगा, यह टुकड़े कई और टुकड़ों से मिलकर बने होते हैं। इन्हें भी वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से कूटा जाय तो अन्त में जो न टूटने वाले ,न कुटने वाले टुकड़े रह जायेंगे, उन्हें परमाणु कहेंगे। इन परमाणुओं की लगभग  100 जातियाँ अब तक पहिचानी जा चुकी हैं, जिन्हें अणुतत्व/Atomic Element कहा जाता है।अणुओं के दो भाग हैं, एक सजीव दूसरे निर्जीव। दोनों ही एक पिण्ड या ग्रह के रूप में मालूम पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके भीतर भी और टुकड़े हैं। प्रत्येक अणु अपनी धुरी पर बड़े वेग से परिभ्रमण करता है। पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा के लिए प्रति सैकिण्ड 18.5  मील की चाल से चलती है, पर इन 100 परमाणुओं की गति चार हजार मील प्रति सेकेण्ड मानी जाती हैं।    

2-अणु और ब्रम्हाण्ड की समानता ... यह परमाणु भी अनेक विद्युत- कणों से मिलकर बने हैं, जिनकी दो जातियाँ हैं, 1- ऋण कण /NegativeParticle , 2- धन कण /Positive Particle। धन कणों के चारों ओर ऋण-कण प्रति सैकिण्ड एक लाख अस्सी हजार मील की गति से परिभ्रमण करते हैं। उधर धन- कण, ऋण- कण की परिक्रमा के केन्द्र होते हुए भी शान्त नहीं बैठते। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगाती हैं और सूर्य अपने सौर- मण्डल को लेकर ‘कृतिका’ नक्षत्र की परिक्रमा करता है, वैसे ही धन कण भी परमाणु की अन्तरगति का कारण होते हैं। ऋण- कण जो कि तीव्र  गति से निरन्तर परिक्रमा में संलग्न हैं अपनी शक्ति सूर्य से अथवा विश्व- व्यापी अग्नि तत्व से प्राप्त करते हैं। वैज्ञानिकों का कथन है कि यदि एक परमाणु के अन्दर का शक्ति- पुञ्ज फूट पड़े तो क्षण भर में लन्दन जैसे तीन नगरों को भस्म कर सकता है। इस परमाणु के विस्फोट की विधि मालूम करके ही ‘एटमबम’ का अविष्कार हुआ है। एक परमाणु के फोड़ देने से जो भयंकर विस्फोट होता है, उसका परिचय गत महायुद्ध से मिल चुका है। इसकी भयंकरता का पूर्ण प्रकाश होना अभी बाकी है, जिसके लिए वैज्ञानिक लगे हुए हैं।  

3-यह तो परमाणु की शक्ति की बात रही, अभी उनके अंग ऋण-कण और धन-कणों के सूक्ष्म भागों का पता चला है। वे भी अपने से अनेक गुने सूक्ष्म परमाणुओं से बने हुए हैं, जो ऋण- कणों के भीतर एक लाख, छियासी हजार, तीन सौ तीस मील प्रति सैकिण्ड की गति से परिभ्रमण करते हैं। अभी उनके भी अन्तर्गत की खोज हो रही हैं और विश्वास किया जाता है कि उन कर्षाणुओं के भीतर भी सर्गाणु हैं। परमाणुओं की अपेक्षा ऋण कण तथा धन कणों की गति तथा शक्ति अनेकों गुनी है। उसी अनुपात से इन सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम अणुओं की गति तथा शक्ति होगी। जब परमाणुओं के विस्फोट की शक्ति लन्दन जैसे तीन शहरों को जला देने की है तो सर्गाणु की शक्ति एवं गति की कल्पना करना भी हमारे लिए कठिन होगा। उसके अन्तिम सूक्ष्म केन्द्र को अप्रितम, अचिन्त्य ही कह सकते हैं।     

4-देखने में पृथ्वी चपटी मालूम पड़ती है पर वस्तुतः वह लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घूमती रहती है। चौबीस घण्टे में उसका एक चक्कर पूरा हो जाता है। पृथ्वी की दूसरी चाल भी है वह सूर्य की परिक्रमा करती है। इस चक्कर में उसे एक वर्ष लग जाता है। तीसरी चाल पृथ्वी की यह है कि सूर्य अपने ग्रह- उपग्रहों को साथ लेकर बड़े वेग से अभिजित् नक्षत्र की ओर जा रहा है। अनुमान है वह कृतिका नक्षत्र की परिक्रमा करता है। इसमें पृथ्वी भी साथ है। लट्टू जब अपनी  Axis पर घूमता है तो वह इधर-उधर उठता भी रहता है इसे मँडलाने को चाल कहते हैं, जिसका एक चक्कर करीब  26 हजार वर्ष में पूरा होता है। कृतिका नक्षत्र भी सौरमण्डल आदि अपने उपग्रहों को लेकर ध्रुव की परिक्रमा करता है। उस दशा में पृथ्वी की गति पाँचवी हो जाती है।  सूक्ष्म परमाणु के सूक्ष्मतम भाग सर्गाणु अर्थात्  फोटॉन,मेसॉन, नियान आदि तक भी मानव बुद्धि पहुँच गयी है और बड़े से बड़े महा-अणुओं के रूप में  तो पृथ्वी की पाँच गति विदित हुई। 

5-आकाश के असंख्य ग्रह-नक्षत्रों का पारस्परिक सम्बन्ध न जाने कितने बड़े महा अणु के रूप में पूरा होता होगा उस महानता की कल्पना भी बुद्धि को थका देती है। सूक्ष्म से सूक्ष्म और महत से महत केन्द्रों पर जाकर बुद्धि थक जाती है और उससे छोटे या बड़े की कल्पना नहीं हो सकती, उस केन्द्र को ‘बिन्दु’ कहते हैं। अणु को योग की भाषा में अण्ड भी कहते हैं। वीर्य का एक कण ‘अण्ड’ है। वह इतना छोटा होता है कि Microscopeसे भी मुश्किल से ही दिखाई देता है, पर जब वह विकसित होकर स्थूल रूप में आता है, तो वही बड़ा अण्डा हो जाता है। उस अण्डे के भीतर जो पक्षी रहता है, उसके अनेक अंग-प्रत्यंग विभाग होते हैं, उन विभागों में असंख्य सूक्ष्म विभाग और उनमें भी अगणित कोषांड रहते हैं। इस प्रकार शरीर भी एक अणु है, इसी को अण्ड या पिण्ड कहते हैं। अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में अगणित सौर मण्डल, आकाश- गंगा और ध्रुव-चक्र हैं।  इन ग्रहों की दूरी और विस्तार का कुछ ठिकाना नहीं। 

6-पृथ्वी बहुत बड़ा पिण्ड है, पर सूर्य तो पृथ्वी से भी तेरह लाख गुना बड़ा है। सूर्य से भी करोड़ों गुने ग्रह आकाश में मौजूद हैं। इनकी दूरी का अनुमान इससे लगाया जाता है कि प्रकाश की गति प्रति सैकिण्ड पौने दो लाख मील है और उन ग्रहों का प्रकाश पृथ्वी तक आने में  30 लाख वर्ष लगते हैं। यदि कोई ग्रह आज नष्ट हो जाय तो उसका अस्तित्व न रहने पर भी उसकी प्रकाश किरणें आगामी तीस लाख वर्ष तक यहाँ आती रहेंगी। जिस नक्षत्र का प्रकाश पृथ्वी पर आता है, उसके अतिरिक्त ऐसे ग्रह बहुत अधिक हैं जो अत्यधिक दूरी के कारण पृथ्वी पर Microscope  से भी दिखाई नहीं देते। इतने बड़े और दूरस्थ ग्रह जब अपनी परिक्रमा करते होंगे, अपने ग्रहमण्डल को साथ लेकर परिभ्रमण को निकलते होंगे, तो वे अपने कितने अधिक विस्तृत शून्य में घूम जाते होंगे, उस शून्य के विस्तार की कल्पना कर लेना मानव- मस्तिष्क के लिए बहुत कठिन है। 

7-इतना बड़ा ब्रह्माण्ड भी एक अणु या अण्ड है। इसलिए उसे ब्रह्म+अण्ड=ब्रह्माण्ड कहते हैं, पुराणों में वर्णन है कि जो ब्रह्माण्ड हमारी जानकारी में है, उसके अतिरिक्त भी ऐसे ही और अगणित ब्रह्माण्ड हैं और उन सबका समूह एक महा अण्ड है, उस ब्रह्माण्ड की तुलना में पृथ्वी उससे छोटी बैठती है, जितना कि परमाणु की तुलना में सर्गाणु छोटा होता है। इस लघु से लघु और महान से महान अण्ड में जो शक्ति व्यापक हैं, जो इन सबको गतिशील, विकसित, परिवर्तित, चैतन्य रखती है, उस सत्ता को ‘बिन्दु’ कहा गया है। यह बिन्दु ही परमात्मा है। उसी को छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा कहा जाता है। इस बिन्दु का चिन्तन करने से आनन्दमय कोश की स्थिति जीव की उस परब्रह्म की रूप की कुछ झाँकी होती हैं और उसे प्रतीत होता है कि परब्रह्म की, महा-अण्ड की तुलना में मेरा अस्तित्व, मेरा पिण्ड कितना तुच्छ है। इस तुच्छता का भान होने से अहंकार और गर्व  समाप्त हो जाते हैं। दूसरी ओर जब सर्गाणु से अपने पिण्ड की, शरीर की तुलना करते हैं, तो प्रतीत होता है कि अटूट शक्ति के अक्षय भण्डार सर्गाणु की इतनी अटूट संख्या और शक्ति जब हमारे भीतर हैं तो हमें अपने को अशक्त समझने का कोई कारण नहीं है। 

8-उस शक्ति का उपयोग जान लिया जाय, तो संसार में होने वाली कोई भी बात हमारे लिये असम्भव नहीं हो सकती।जैसे महा अण्ड की तुलना में हमारा शरीर अत्यन्त क्षुद्र है और हमारी तुलना में उसका विस्तार अनुपम है, इसी प्रकार सर्गाणुओं की दृष्टि में हमारा पिण्ड (शरीर) एक महाब्रह्माण्ड जैसा विशाल होगा।तब लगता है कि मैं मध्य बिन्दु हूँ, केन्द्र हूँ, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल मेरी व्यापकता है। लघुता-महत्ता/Miniaturization का एकान्त चिन्तन ही बिन्दु साधना कहलाता है। इस साधना के साधक को सांसारिक जीवन की वास्तविकता और तुच्छता का भली प्रकार बोध हो जाता है कि मैं अनन्त का उद्गम होने के कारण इस सृष्टि का महत्त्वपूर्ण केन्द्र हूँ।लघुता और महत्ता के चिन्तन की बिन्दु-साधना से आत्मा की आन्तरिक शक्ति का विकास होता है, जो स्व-पर कल्याण के लिए अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है।  बिन्दु- साधक की आत्म-स्थिति उज्ज्वल होती है, उसके विकार मिट जाते हैं। फलस्वरूप उसे उस अनिर्वचनीय/Indescribable आनन्द की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करना जीवन- धारण का प्रधान उद्देश्य है। 

बिन्दु चक्र मंत्र साधना;-
 04 FACTS;-

1-बिंदु का अर्थ है ...नोंक, बूँद ,अम्रत। बिन्दु चक्र सिर के शीर्ष भाग पर केशों के गुच्छे के नीचे स्थित है। बिन्दु चक्र के चित्र में  23 पंखुडिय़ों वाला कमल होता है। इसका प्रतीक चिह्न चन्द्रमा है, जो वनस्पति की वृद्धि का पोषक है। भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है : ”मैं मकरंद कोष चंद्रमा होने के कारण सभी वनस्पतियों का पोषण करता हूं”। इसके देवता भगवान शिव हैं, जिनके केशों में सदैव अर्धचन्द्र विद्यमान रहता है। मंत्र है...' शिवोहम्'(शिव हूं मैं)। यह चक्र रंगविहीन और पारदर्शी है। बिन्दु चक्र स्वास्थ्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र है, हमें स्वास्थ्य और मानसिक पुनर्लाभ प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करता है। यह चक्र नेत्र दृष्टि को लाभ पहुंचाता है, भावनाओं को शांत करता है और आंतरिक सुव्यवस्था, स्पष्टता और संतुलन को बढ़ाता है। इस चक्र की सहायता से हम भूख और प्यास पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो जाते हैं, और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाने की आदतों से दूर रहने की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। बिन्दु पर एकाग्रचित्तता से चिन्ता एवं हताशा और अत्याचार की भावना तथा हृदय दमन से भी छुटकारा मिलता है।
2-बिन्दु चक्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, स्फूर्ति और यौवन प्रदान करता है, क्योंकि यह “अमरता का मधुरस” (अमृत) उत्पन्न करता है।यह अमृतरस साधारण रूप से मणिपुर चक्र में गिरता है, जहां यह शरीर द्वारा पूरी तरह से उपयोग में लाए बिना ही जठराग्नि से जल जाता है। इसी कारण प्राचीन काल में ऋषियों ने इस मूल्यवान अमृतरस को संग्रह करने का उपाय सोचा और ज्ञात हुआ कि इस अमृतरस के प्रवाह को जिह्वा और विशुद्धि चक्र की सहायता से रोका जा सकता है। जिह्वा में सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र होते हैं, इनमें से हरेक का शरीर के अंग या क्षेत्र से संबंध होता है। उज्जाई प्राणायाम और  बिन्दु चक्र मंत्र योग विधियों से जिह्वा अमृतरस के प्रवाह को मोड़ देती है और इसे विशुद्धि चक्र में जमा कर देती है। एक होम्योपैथिक दवा की तरह सूक्ष्म ऊर्जा माध्यमों द्वारा यह संपूर्ण शरीर में पुन: वितरित कर दी जाती है, जहां इसका आरोग्यकारी प्रभाव दिखाई देने लगते हैं।
 3-त्राटक का अर्थ क्या होता है?- 

05 POINTS;-

 3-1-किसी भी प्रकार के ऑब्जेक्ट को एकटक देखना  देखना ही त्राटक की परिभाषा है लेकिन इसे पूर्ण करती है एकटक देखते हुए आपकी कल्पना शक्ति। आपकी सफलता और आपके अनुभव इसी शक्ति पर निर्भर करती है। यही कारण है कि अक्सर साधक असफल हो जाते है क्योंकि वह त्राटक की परिभाषा को पूर्ण नहीं समझ पाते है।जब हम त्राटक करते है तो विचारों को खत्म करते है लेकिन उस वक्त हमारे दिमाग में एक विचार होना अनिवार्य है। वह कुछ भी ही सकता है ...जो आप पाना चाहते हैं। जैसे सम्मोहन सीखना है तो आपको कल्पना करना चाहिए कि “मेरी आंखो में चुंबकीय शक्ति का विकास हो रहा है। मेरी आंखो में सम्मोहन शक्ति आ चुकी है।” यह कल्पना पूर्ण शक्ति से करना चाहिए जितनी अधिक गंभीरतापूर्वक यह कार्य होगा उतना ही अधिक सफलता का रास्ता साफ हो जाएगा। यहां जो अनुभवों का वर्णन  किया जा रहा  है वह सभी एक साधकों में होना अनिवार्य नहीं है। इनमे से कुछ अनुभव आपको हो सकते है ..तो विचलित होने की आवश्कता नहीं है। 
 3-2-प्रारंभ में आपकी समय सीमा कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट हो सकती है। धीरे धीरे समय बढ़ाने पर आपको कुछ ही दिनों में यह समय सीमा बढ़कर 10-15 मिनट लगातार एकटक देखना हो जाएगी। इन 10-15 दिनों में कई अनुभव होते है जैसे साधकों को बिंदु घूमता हुआ नजर आता है कुछ साधकों को बिंदु हिलता- डुलता नजर आने लगता है। वही कुछ ही दिनों में यह बिंदु एक से बढ़कर दो या तीन दिखने लगते है। ऐसी स्थिति में साधक को उसे एक देखने का प्रयास करना चाहिए।
इस बीच देखने पर कभी कभी बिंदु गायब होता है तो कभी फिर से धुंधला सामने नजर आ जाता है। कहीं एक बिंदु गायब होकर दूसरी जगह दिखने लगता है, तो आप समझ जाए कि आपकी मन की गहराइयों में संबंध स्थापित होने की स्थिति में है। ऐसा बाह्य मन अंतर मन से कनेक्ट होने की वजह से होता है और अचानक कनेक्शन टूटने की वजह से गायब होना ,सामने आना जैसे क्रियाएं होती है। इसका अर्थ है आप सही रास्ते पर जा रहे है और निरंतर अभ्यास की आवश्यकता है। 

 3-3-कुछ ही दिनों में साधकों को आस पास हल्का प्रकाश का आवरण नजर आने लगता है। इस समय साधक को इस आवरण को बढ़ाने की आश्यकता होती है। और यह आपकी कल्पना करने पर धीरे धीरे बढ़ने लगता है। बहुत बार देखा गया है कि कई साधकों को यह प्रकाश अलग अलग रंगों में दिखाई देता है। यह साधक के अंदर 7 चक्र के प्रभाव से होता है। जिस साधक के अंदर जिस चक्र की शक्ति अधिक होती है ...उस साधक को उसी चक्र का रंग दिखाई देता है।2-3 माह के बाद चक्र के अंदर सातो रंग क्रमशः दिखाई देता है उसी के साथ कुछ समय बाद बिंदु सूर्य के समान प्रकाशवान हो जाता है। इस समय साधक की एकटक देखने की समय सीमा लगभग 30-45 मिनट तक हो जाती है। लगभग 6 माह बाद साधक को बहुत अनोखे अनुभव होने लगते है यह उनके व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। किसी- किसी साधक को उनका पूर्व जन्म तो किसी साधक को भविष्य की झलकियां नजर आने लगती है। बहुत बार साधकों को बिंदु के अंदर कई दृश्य नजर आते है जो कुछ इस जन्म के तो कुछ पूर्व जन्म के हो सकते है।
 3-4-कुछ दृश्य आनंदमय तो कुछ भयभीत करने वाले भी हो सकते है। अब लगभग 8-9 माह बाद साधक का समय शून्य होने लगता है अर्थात साधक को त्राटक खो जाने का अनुभव होता है जो बहुत आनंद दायक होता है। इस स्थति में साधक कहीं भी विचरण करने जा सकता है। वह कही भी जाकर किसी को भी देख सकता है। मान लीजिए आपका कोई परिचित क्या कर रहा है आपको जानना है तो वहां आप पहुंच जाते है और आपको वह वीडियो के समान दिखाई देने लगता है। यह सब मन की आंखो से होता है।12-15 महीने में साधकों को टेलीपैथी, केनैसेस, वाक सिद्धि,विचार सम्प्रेशक, सम्मोहन शक्ति, भूत भविष्य, आदि उपलब्धियां उसके कल्पना शक्ति के आधार पर स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।साधक एक जगह बैठकर ब्रम्हांड की सैर कर सकता है। साधक जीवन के विभिन्न   रहस्यों को जान लेता है। लगातार अभ्यास करने पर साधक बहुत कुछ अनुभव करता है जिसको बताना  कठिन है। 

 3-5-त्राटक के लाभ ;-

1-यह अभ्यास आँखों को बलवान बनता है। आंखो की कमजोरी दूर होती है।आँखे त्राटक के अभ्यास के लिए अभ्यस्त होती है। 

2-मन शांत रहता है।हम ज्यादा से ज्यादा अपने आप से जुड़ते है।यह आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करती है एवं मस्तिष्क के विकास में लाभकारी होती है।

3-यह आंतरिक ज्योति को प्रज्वलित करती है।यह स्मृति एवं एकाग्रता बढ़ाती है।

4-इसके अभ्यास से अल्फा तरंगें बढ़ती हैं, जो मस्तिष्क के विश्रामावस्था में होने का संकेत हैं। इस अवस्था में मस्तिष्क के निश्चित भाग काम करना बंद कर देते हैं तथा मस्तिष्क की प्रक्रियाएं रुक जाती हैं, इस प्रकार मस्तिष्क को अत्यावश्यक विश्राम प्राप्त होता है।

 4-बिंदु त्राटक;-

बिंदु त्राटक करने के लिए आप एक ऊनी आसन,गद्दा, या कुर्सी पर बैठ जाए।अपनी spine बिल्कुल सीधी रखे। दर्द होता हो या अधिक देर बैठने में असमर्थ है तो आप किसी भी तरह का सहारा लेकर बैठ सकते है। अब यह कल्पना करें कि आप हवा में उड़ रहे है या पानी में  तेैर रहे है या किसी गहरी गुफा में जा रहे है। इसी कल्पना के साथ कोई अन्य विचार नहीं होना चाहिए। कल्पना करते हुए विचारों पर कंट्रोल करे और कल्पना की गहराइयों में डूब जाए। इसे ध्यान अवस्था का चरण कहते है। ऐसा करने से आपके अंदर विचारों पर कंट्रोल होता है। बाह्य  मन अंतर मन से कनेक्ट  होता है।जब विचारों पर कन्ट्रोल हो जाए तब आपको धीरे धीरे आंखो को खोलना है और आपके सामने जो बिंदु लगा हुआ है इसे बिना पलके झपकाए एकटक देखना है।हमेशा सोचिये – “मेरे विचार बिन्दु के पीछे जा रहे हैं”।यह तब तक करना है जब तक कि आपकी आंखो से आंसू निकलने ना लगे। प्रारंभिक दिनों में हो सकता है कुछ ही सेकंड में आंसू आ जाए तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। अभ्यास धीरे धीरे बढ़ाने पर बड़ जाएगा है। उत्साह के साथ धेर्य से अभ्यास करें हड़बड़ाहट में अधिक आंखो में जोर ना डाले। अन्यथा त्राटक के फायदे की जगह दुषपरिणाम सामने आने लगेंगे।आंखो से आंसू आने के बाद आप आंखो को बंद करके बिंदु को आंतरिक मन से देखने का प्रयास करे, इसे अंतः त्राटक कहते है। इसकी समय सीमा कम से कम आपकी उम्र के बराबर मिनटों में होना चाहिए उदाहरण के लिए आपकी क्रमशः उम्र 25,30,35 वर्ष है तो आपको अंतः त्राटक क्रमशः 25,30,35 मिनट करना चाहिए। अंतः त्राटक आप समय से अधिक भी कर सकते है।

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3-कला- साधना;- 

06 FACTS;- 

 1-कला का अर्थ है –किरण।’ सूर्य प्रकाश से प्राप्त Radiation जीवन का स्त्रोत  है। सूर्य से निकलकर अत्यन्त सूक्ष्म प्रकाश तरंगें भूतल पर आती हैं, उनका एक समूह ही इस योग्य बन पाता है कि नेत्रों से उसका अनुभव किया जा सके। सूर्य किरणों के सात रंग प्रसिद्ध हैं, परमाणुओं के अन्तर्गत जो ‘प्रमाणु’ होते हैं उनकी विद्युत तरंगें जब हमारे नेत्रों से टकराती है, तभी किसी रंग रूप का ज्ञान हमें होता है। रूप को प्रकाशवान् बनाकर प्रकट करने का काम कला द्वारा ही होता है।कलाएँ दो प्रकार की होती हैं। 1- आप्ति, 2- व्याप्ति। आप्ति किरणें वे हैं, जो प्रकृति के अणुओं से प्रस्फुटित होती हैं। व्याप्ति वे है, जो पुरुष के अन्तराल से आविर्भूत होती हैं, इन्हें ‘तेजस्’ भी कहते हैं। वस्तुएँ पञ्च तत्वों से बनी होती हैं इसलिए परमाणु से निकलने वाली किरणें अपने प्रधान तत्व की विशेषता भी साथ लिए होती हैं, वह विशेषता रंग द्वारा पहचानी जाती हैं। किसी वस्तु का प्राकृतिक रंग देखकर यह बताया जा सकता है कि इन पञ्च-तत्वों में कौन सा तत्व किस मात्रा में विद्यमान है ?     

2-व्याप्ति कला, किसी मनुष्य के ‘तेजस्’ में दिखती हैं, यह तेजस् मुख के आस- पास प्रकाश मण्डल की तरह विशेष रूप से फैला होता है, यों तो यह सारे शरीर के आस- पास प्रकाशित रहता है। इसे अँग्रजी में ‘ओरा’ और संस्कृत में तेजोवलय’ कहते हैं। देवताओं के चित्र में उनके मुख के आस-पास एक प्रकाश का गोला सा चित्रित होता है, यह उनकी कला का ही चिन्ह है। अवतारों के सम्बन्ध में उनकी शक्ति का माप उनकी कथित कलाओं से किया जाता है। परशुराम जी में तीन, रामचन्द्र जी में बारह, श्री कृष्ण में सोलह कलाएँ बताई गई हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उनमें साधारण मात्र से इतनी गुनी आत्मिक शक्ति थी।  सूक्ष्मदर्शी लोग किसी व्यक्ति या वस्तु की आन्तरिक स्थिति का पता उनके तेजोवलय और रंग, रूप, चमक और चैतन्यता को देखकर मालूम कर लेते हैं।जिसे 'कला’ विद्या की  जानकारी है, वह भूमि के अन्तर्गत छिपे हुए पदार्थो को, वस्तुओं के अन्तर्गत छिपे हुए गुण, प्रभाव एवं महत्वों को आसानी से जान लेता है।  

3-किस मनुष्य में कितनी कलाएँ हैं, उसमें क्या-क्या शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विशेषताएँ हैं तथा किन-किन गुण, दोष, योग्यताओं, सामर्थ्यों की उनमें कितनी न्यूनाधिकता है ? यह सहज ही पता चल जाता है।कला-विज्ञान का ज्ञाता अपने शरीर की सात्विक न्यूनाधिकता का पता लगाकर इसे आत्म-बल से ही सुधार सकता है और अपनी कलाओं में समुचित संशोधन- परिमार्जन एवं विकास कर सकता है। कला ही सामर्थ्य है। अपनी आत्मिक सामर्थ्य का, आत्मिक उन्नति का माप कलाओं की परीक्षा करके प्रकट हो जाता है और साधक यह निश्चित कर सकता है कि उन्नति हो रही है या नहीं ? उसे सन्तोषजनक सफलता मिल रही है या नहीं।सब ओर से चित्त हटाकर नेत्र बन्द करके भृकुटी के मध्य भाग में ध्यान एकत्रित करने से मस्तिष्क में तथा उसके आस-पास रंग-बिरंगी धज्जियाँ, चिन्दियाँ तथा तितलियाँ-सी उड़ती दिखाई पड़ती हैं। इनके रंगों का आधार तत्वों पर निर्भर होता है। पृथ्वी तत्व का रंग पीला, जल का नीला, अग्नि का लाल, वायु का हरा, आकाश का श्वेत  होता है। जिस रंग की झिलमिल होती है, उसी के आधार पर यह जाना जा सकता है कि इस समय हममें किन तत्वों की अधिकता और किनकी न्यूनता है।     

4-रंग और चक्रों सम्बन्ध ... प्रत्येक रंग में अपनी-अपनी विशेषता होती है। पीले रंग में क्षमा, गम्भीरता, उत्पादन, स्थिरता, वैभव, मजबूती, संजीदगी, भारीपन। श्वेत रंग में शान्ति, रसिकता, कोमलता, शीघ्र प्रभावित होना, तृप्ति, शीलता, सुन्दरता, बुद्धि, प्रेम। लाल रंग में गर्मी, उष्णता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष अनिष्ट, शूरता, सामर्थ्य, उत्तेजना, कठोरता, कामुकता, तेज, प्रभावशीलता, चमक, स्फूर्ति। हरे रंग में चंचलता, कल्पना, स्वप्नशीलता, जकड़ना, दर्द, अपहरण धूर्तता, गतिशीलता, विनोद, प्रगतिशीलता, प्राण, पोषण, परिवर्तन। नीले रंग में- विचारशीलता, बुद्धि सूक्ष्मता, विस्तार, सात्विकता, प्रेरणा, व्यापकता, संशोधन,  आकर्षण आदि गुण होते हैं।जड़ या चेतन किसी भी पदार्थ के रंग एवं उससे निकलने वाली सूक्ष्म प्रकाश-ज्योति से यह जाना जा सकता है, कि इस वस्तु या प्राणी का गुण स्वभाव एवं प्रभाव कैसा हो सकता है ? 

5-साधारणतः यह पाँच तत्वों की कला हैं, जिनके द्वारा यह कार्य हो सकता है ..

 1- व्यक्तियों तथा पदार्थों की आन्तरिक स्थिति को समझना, 

 2- अपने शारीरिक तथा मानसिक क्षेत्र में असन्तुलित, किसी गुण- दोष को सन्तुलित करना, 

 3- दूसरों के शारीरिक तथा मन की विकृतियों का संशोधन करके सुव्यवस्था स्थापित करना, 

 4- तत्वों के मूल आधार पर पहुँचकर तत्वों की गति-विधि तथा किया-पद्धति को जानना, 

 5-तत्वों पर अधिकार करके सांसारिक पदार्थों का निर्माण, पोषण तथा विनाश करना।  

NOTE;-यह उपरोक्त पाँच लाभ ऐसे हैं, जिनकी व्यवस्था की जाय तो वे ऋद्धि-सिद्धियों के समान आश्चर्यजनक प्रतीत होंगे। 

यह पाँच भौतिक कलाएँ हैं, जिनका उपयोग राजयोगी, हठयोगी, मन्त्रयोगी तथा तांत्रिक अपने-अपने ढंग से करते हैं और इस तान्त्रिक शक्ति का अपने-अपने ढंग से सदुपयोग-दुरुपयोग करके भले-बुरे परिणाम उपस्थित करते हैं। 

6-कला द्वारा सांसारिक भोग, वैभव भी मिल सकता है, आत्म-कल्याण भी हो सकता है और किसी को शापित, अभिचारित एवं  दुख शोक सन्तृप्त भी बनाया जा सकता है। पञ्च तत्वों की कलाएँ ऐसी ही प्रभावपूर्ण होती हैं।आत्मिक कलाएँ तीन होती हैं- सत, रज, तम। तमोगुणी कलाओं का माध्यम केन्द्र शिव है। रावण, हिरण्यकश्यपु, भस्मासुर, कुम्भकरण, मेघनाद आदि असुर इन्हीं तामसिक कलाओं के सिद्ध पुरुष थे। रजोगुणी कलाएँ विष्णु से आती हैं। इन्द्र, कुबेर, वरुण, वृहस्पति, ध्रुव, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, कर्ण आदि में इन राजसिक कलाओं की विशेषता थी।सतोगुणी सिद्धियाँ ब्रह्म से आविर्भूत होती हैं। व्यास, वशिष्ठ, अत्रि, बुद्ध, महावीर, ईसा, गाँधी, आदि ने सात्विकता के केन्द्र से ही शक्ति प्राप्त की थी।आत्मिक कलाओं की साधना  ग्रन्थि-भेद द्वारा होती है। रुद्र ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और ब्रह्म ग्रन्थि के खुलने से इन तीनों ही कलाओं का साक्षात्कार साधक को होता है। पूर्वकाल में लोगों के शरीर में आकाश तत्व अधिक था। इसलिए इन्हें उन्हीं साधनाओं से अत्यधिक आश्चर्यमयी सामर्थ्य प्राप्त हो जाती थी, पर आज के युग में जन-समुदाय के शरीर में पृथ्वी-तत्व प्रधान हैं इसलिए अणिमा, महिमा आदि तो नहीं पर सत्, रज, तम की शक्तियों की अधिकता से अब भी आश्चर्यजनक हित-साधना हो सकता है।  

पाँचकलाओं द्वारा तात्विक साधना ;-

05 FACTS;- 

1-पृथ्वी तत्व;- 

इस तत्व का स्थान मूलाधार चक्र अर्थात् गुदा से दो अंगुल अंडकोश की ओर हटकर सीवन में स्थित है। सुषुम्ना का आरम्भ इसी स्थान से होता है। प्रत्येक चक्र का आधार कमल के पुष्प जैसा है। यह ‘भूलोक’ का प्रतिनिधि है। पृथ्वी तत्व का ध्यान इसी मूलाधार चक्र में किया जाता है।पृथ्वी तत्व की आकृति चतुष्कोण, रंग पीला, गुण गन्ध है। इसलिए इसको जानने की इन्द्रिय नासिका तथा कर्मेन्द्रिय गुदा है। शरीर में पीलिया, कमलवाय आदि रोग इसी तत्व की विकृति से पैदा होते हैं। भय आदि मानसिक विकारों में इसकी प्रधानता होती है। इस तत्व के विकार मूलाधार चक्र में ध्यान स्थित करने से अपने आप शान्त हो जाते हैं।  

साधना विधि;- 

सबेरे जब एक पहर अँधेरा रहे, तब किसी शान्त स्थान और पवित्र आसन पर दोनों पैरों को पीछे की ओर मोड़कर उन पर बैठें। दोनों हाथ उल्टे करके घुटनों पर इस प्रकार रखी, जिससे उँगलियों के छोर पेट की ओर रहें। फिर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए मूलाधार चक्र में ‘ल’ बीज वाली चौकोर पीले रंग की पृथ्वी पर ध्यान करें। इस प्रकार करने से नासिका सुगन्धि से भर जाती है और शरीर उज्ज्वल कान्ति वाला हो जाता है। ध्यान करते समय ऊपर कहे पृथ्वी तत्व के समस्त गुणों को अच्छी तरह ध्यान में लाने का प्रयत्न करना चाहिए और 'लं' इस बीज मन्त्र का मन ही मन (शब्द रूप से नहीं, वरन् ध्यान रूप से) जप करते जाना चाहिए।  

2-जल तत्व;-

स्वाधिष्ठान चक्र एवं बीज मंत्र   जल तत्व- पेढू के नीचे जननेन्द्रिय के ऊपर मूल भाग में स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व का स्थान है। यह चक्र ‘भुव ’ लोक का प्रतिनिधि है, रंग नीला , आकृति अर्धचन्द्राकार और गुण रस है। कटु, अम्ल, तिक्त मधुर आदि सब रसों का स्वाद इसी तत्व के कारण आता है। इसकी ज्ञानेन्द्रिय जिह्वा और कर्मेन्द्रिय लिंग है। मोहादि विकार इसी तत्व की विकृति से होते हैं।  

साधना विधि;- 

पृथ्वी तत्व का ध्यान करने के लिए बताई हुई विधि से आसन पर बैठकर  'वं' बीज वाले अर्धचन्द्राकार चन्द्रमा की तरह कान्ति वाले जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र में स्थान करना चाहिए। इनसे भूख-पास मिटती है और सहन- शक्ति उत्पन्न होती है।     

3-अग्नि तत्व; -

मणिपूर चक्र एवं बीज मंत्र   अग्नि तत्व-नाभि स्थान में स्थिति मणिपूरक चक्र में अग्नि तत्व का निवास है। यह ‘स्व’ लोक का प्रतिनिधि है। इस तत्व की आकृति त्रिकोण, लाल गुण रूप है। ज्ञानेन्द्रिय नेत्र और कर्मेन्द्रिय पाँव हैं। क्रोधादि मानसिक विकार तथा सृजन आदि शारीरिक विकार इस तत्व की गड़बड़ी से होते हैं, इसके सिद्ध हो जाने पर मन्दाग्नि, अजीर्ण आदि पेट के विकार दूर हो जाते हैं और कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने में सहायता मिलती है।  

साधना विधि;- 

नियत समय पर बैठकर 'रं' बीज मन्त्र वाले त्रिकोण आकृति के और अग्नि के समान लाल प्रभा वाले अग्नि- तत्व का मणि पूरक चक्र में ध्यान करें। इस तत्व के सिद्ध हो जाने पर सहन करने की शक्ति बढ़ जाती है।          

4-वायु तत्व;- 

यह तत्व हृदय देश में स्थिति अनाहत चक्र में है एवं ‘महलोक’ का प्रतिनिधि है। रंग हरा, आकृति षट्कोण तथा गोल दोनों तरह की है, गुण-स्पर्श, ज्ञानेन्द्रिय-त्वचा और कर्मेन्द्रिय-हाथ हैं। वात-व्याधि, दमा आदि रोग इसी की विकृति से होते हैं।    

साधना विधि;- 

नियत विधि से स्थित होकर  'यं' बीज वाले गोलाकर, हरी आभा वाले वायु-तत्व का अनाहत चक्र में ध्यान करें। इससे शरीर और मन में हल्कापन आता है।               

5-आकाश तत्व;-  

शरीर में इसका निवास विशुद्ध चक्र में है। यह चक्र कण्ठ स्थान ‘जनलोक’ का प्रतिनिधि है। इसका रंग श्वेत , आकृति अण्डे की तरह लम्बी, गोल, गुण शब्द, ज्ञानेन्द्रिय-कान तथा कर्मेन्द्रिय वाणी है।   

साधना विधि;- 

पूर्वोक्त आसन पर ‘हं’ बीज मन्त्र का जाप करते हुए चित्र- विचित्र रंग वाले आकाश- तत्व का विशुद्ध चक्र में ध्यान करना चाहिए। इससे तीनों कालों का ज्ञान, ऐश्वर्य तथा अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।नित्य प्रति पाँच तत्वों का छः मास तक अभ्यास करते रहने से तत्व सिद्ध हो जाते हैं, फिर तत्व को पहचानना और उसे घटाना-बढ़ाना सरल हो जाता है। तत्व की सामर्थ्य तथा कलाएँ बढ़ने से साधक कलाधारी बन जाता है। उसकी कलाएँ अपना चमत्कार प्रकट करती रहती हैं। 

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 4-तुरीयावस्था;-

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गुरुवार, 12 अगस्त 2021

ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य क्यां है

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?? ब्रह्म मुहूर्त किसको कहते है और ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य क्यां है वो सभी मानव बात करते है लिखते है और ज्ञान भी देते है लेकिन उनको ब्रह्म मुहूर्त के नाम से क्युं जाना गया क्यां ईसका रहस्य है यो बात योगी पुरुष के अलावा और किसिको ज्ञान नहीं है. ये मानव शरीर एक प्रकृति और कुदरत की ऐसी देण है कि ईनकी तुलना और किसीभी चीज के साथ नहीं हो शकती मानव मस्तक अगर तो दुसरे कोई भी योनि के जीव के मस्तक मे बडे मगज के लिये एक त्रिकोणाकार शंकु आकार की ग्रंथी होती है वोही ग्रंथि ये शरीर मे सभी क्रियाए ओटोमेटिक होती है वो वोही ग्रंथि के हिसाब से होती है और तत्वो का संचालन भी ये ही ग्रंथि शरीर मे करती है. ये ग्रंथि का कुदरती नियम ऐसा है की दिन मे सूर्य की गरमी के ताप लगेगा तो वो ग्रंथि मे संकोचन आते है और रात को अंधेरे मे जब ताप नही होता तब वो ग्रंथि फूलती है जब ये ग्रंथि फूलती है तब वो ग्रंथि मे से एक प्रकार का प्रवाही स्त्राव होता है वो स्त्राव ऐसा होता है कि विचार वायुं को स्थिर कर देते हैं, ईसि के हिसाब से मानव का ध्यान गाढ लग जाता है जब गाढ ध्यान लगता है तब मानव बहुत सहेवाई से ब्रह्म का दर्शन करने मे सफणता हांसल करते है और वो ग्रंथि का फूलने का समस रात को चोथे पहोर मे 3 से 6 बजे तक का होता है, रात को 3 बजे वो ग्रंथि उनकी पराकाष्ठा पर फूल जाती है और 6 बजे तक वो धीरे धीरे मूळ स्थिति पर आ जायेगी तब ये 3 -6 बजे के टाईम पर ध्यान अच्छा गाढ लग जानेका कारण ये ग्रंथि का स्त्राव ही है ईसिलिए सिध्धो ने सुबह का 3 से 6 बजे के टाईम को ब्रह्म के साथ कोन्टेक्ट करने मे ये समय सबसे अच्छा है वो ही कारण से ये समय को ब्रह्म मुहूर्त से जाना जाता है और दुसरा यै ग्रंथि का बहुत गहरा रहस्य ये है कि मानव खोराक लेते समय मुंह मे जा लाळ खोराक मे मिक्ष होती है वो स्त्राव पिनियल ग्रंथि मे से ही होता है और तीसरा गहरा रहस्य ये है कि मानव योगक्रिया के माध्यम से जब ध्यान की क्रिया ए करते है तब समाधि के पास जब पहोचते है तब वो ग्रंथि मे से एक बुंद प्रवाही स्त्राव होता है वो 24 कलाक मे एक ही बार होगा वो बुंद पेट मे जाने से शरीर बिलकुल हलका सा फूल जैसा बन जाता है और उनको 24 कलाक तक खाने-पीने की जरुरियात रहती नही और वो ग्रंथि का चोथा रहस्य ये है कि दशमां द्वार वहां से ही खुलता है वो ही ब्रह्म के साथ कोन्टेक्ट करने का मेईन गेट है और पांचवा रहस्य ये है कि कोई भी जीव को अंधेरे मे पुर देवे तो भी उनको दिन है कि रात वो उनको मालुम हो जाता है उसका कारण ये ग्रंथि है ये शरीर का ओटोमेटिक संचालन करने मे ग्रंथि का महत्व का योगदान है. छठ्ठा रहस्य आंख के नजर की देखने की शक्ति का प्रवाह भी वो ग्रंथि मे से ही छूटता है ये सभी बातो को विज्ञान ने भी कईक अलग अलग प्रयोगो कर कर विज्ञान ने भी ये बात को मान्यता दिया है. विज्ञान उस ग्रंथि को प्रिनियल ग्रंथि के नाम से जानते है. अगर कोई सर्जन डॉक्टर ये ग्रंथि का ओपरेशन कर कर ललाट के नजदिक ला देवे तो मानव को भक्ति करने की जरुरत ही नही रहेगी मानव आपोआप त्रिकाळ ज्ञानी बन जायेगा ऐसा ओपरेशन प्राचीन समय मे तिबेट मे एक बौद्ध धर्मी लामा संत करते थे ये बात का सबुत शास्त्रो मे साबित है बाद मे ऐसा पुरुष हुवा नही ये ही ब्रह्म मुहूर्त का रहस्य है पहले के समय मे मानव मस्तक के उपर टोपी अगर तो पाघडी बांधते थे ईसिका कारण ये ही था की मस्तक बहुत गरम नही होना चाहिए ये अगर मस्तक गरम होगा तो ग्रंथि मे ज्यादा संकोच आ जानेसे शरीर बिगड जाता है......... ----गगनगीरीजी महाराज फोन -9574752091

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योग बिलकुल शुद्ध साइंस है, सीधा विज्ञान है

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हां, फर्क है। साइंस आब्जेक्टिव है, पदार्थगत है। योग सब्जेक्टिव है, आत्मगत है। विज्ञान खोजता है पदार्थ, योग खोजता है परमात्मा।

यह पुनर्स्मरण, यह पुनर्वापसी की यात्रा योग कैसे करता है, उस संबंध में भी कुछ बातें खयाल में ले लेनी चाहिए। क्योंकि कृष्ण ने कहा, उसके ही सतत अभ्यास से परमात्मा में प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है। मैं कहूंगा, पुनर्प्रतिष्ठा उपलब्ध होती है।

है क्या योग? योग करता क्या है? योग की कीमिया, केमेस्ट्री क्या है? योग का सार-सूत्र, राज, मास्टर-की क्या है? उसकी कुंजी क्या है? तो तीन चरण खयाल में लें।

एक, मनुष्य के शरीर में जितनी शक्ति का हम उपयोग करते हैं, इससे अनंत गुनी शक्ति को पैदा करने की सुविधा और व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, आपको अभी लिटा दिया जाए जमीन पर, तो आपकी छाती पर से कार नहीं निकाली जा सकती, समाप्त हो जाएंगे। लेकिन राममूर्ति की छाती पर से कार निकाली जा सकती है। यद्यपि राममूर्ति की छाती में और आपकी छाती में कोई बुनियादी भेद नहीं है। और राममूर्ति की छाती की हड्डियों में जरा-सी भी किसी तत्व की ज्यादा स्थिति नहीं है, जितनी आपकी हड्डियों में है। राममूर्ति का शरीर उन्हीं तत्वों से बना है, जिन तत्वों से आपका। राममूर्ति क्या कर रहा है फिर?

राममूर्ति, जिस शक्ति का आप कभी उपयोग नहीं करते–आप अपनी छाती का इतना ही उपयोग करते हैं, श्वास को लेने-छोड़ने का। यह एक बहुत अल्प-सा कार्य है। इसके लायक छाती निर्मित हो जाती है। राममूर्ति एक बड़ा काम इसी छाती से लेता है, कारों को छाती पर से निकालने का, हाथी को छाती पर खड़ा करने का।

और जब राममूर्ति से किसी ने पूछा कि खूबी क्या है? राज क्या है? उसने कहा, राज कुछ भी नहीं है। राज वही है जो कि कार के टायर और टयूब में होता है। साधारण सी रबर का टयूब होता है, लेकिन हवा भर जाए एक विशेष अनुपात में, तो बड़े से बड़े ट्रक को वह लिए चला जाता है। राममूर्ति ने कहा कि मैं अपने फेफड़े से वही काम ले रहा हूं, जो आप टायर और टयूब से लेते हैं। हवा को एक विशेष अनुपात में रोक लेता हूं, फिर छाती से हाथी गुजर जाए, वह मेरे ऊपर नहीं पड़ता, भरी हुई हवा के ऊपर पड़ता है। पर एक प्रक्रिया होगी फिर उस अभ्यास की, जिससे छाती हाथी को खड़ा कर लेती है।

हमारे शरीर की बहुत क्षमताएं हैं, जिनका हम हिसाब नहीं लगा सकते। वे सारी की सारी क्षमताएं अनुपयुक्त, अनयूटिलाइज्ड रह जाती हैं। क्योंकि जीवन के काम के लिए उनकी कोई जरूरत ही नहीं है। जीवन के लिए जितनी जरूरत है, उतना शरीर काम करता है।

अगर हम वैज्ञानिकों से पूछें, तो वैज्ञानिकों का खयाल है कि दस प्रतिशत से ज्यादा हम अपने शरीर का उपयोग नहीं करते। नब्बे प्रतिशत शरीर की शक्तियां अनुपयोगी रहकर ही समाप्त हो जाती हैं। जीते हैं, जन्मते हैं, मर जाते हैं। वह नब्बे प्रतिशत शरीर जो कर सकता था, पड़ा रह जाता है।

योग का पहला काम तो यह है कि उन नब्बे प्रतिशत शक्तियों में से जो सोई पड़ी हैं, उन शक्तियों को जगाना, जिनके माध्यम से अंतर्यात्रा हो सके। क्योंकि बिना शक्ति के कोई यात्रा नहीं हो सकती है। एनर्जी, ऊर्जा के बिना कोई यात्रा नहीं हो सकती है। अगर आप सोचते हैं कि हवाई जहाज किसी दिन बिना ऊर्जा के चल सकेंगे, तो आप गलत सोचते हैं। कभी नहीं चल सकेंगे।

हां, यह हो सकता है, हम सूक्ष्मतम ऊर्जा को खोजते चले जाएं। बैलगाड़ी चलती है, तो ऊर्जा से। पैदल आदमी चलता है, तो ऊर्जा से। सांस चलती है, तो ऊर्जा से। सब मूवमेंट, सब गति ऊर्जा की गति है, शक्ति की गति है।

अगर आप सोचते हों कि परमात्मा तक बिना ऊर्जा के सहारे आप पहुंच जाएंगे, तो आप गलती में हैं। परमात्मा की यात्रा भी बड़ी गहन यात्रा है। उस यात्रा में भी आपके पास शक्ति चाहिए। और जिस शक्ति का आप उपयोग करते हैं साधारणतः, वह शक्ति आपके जीवन के दैनिक काम में चुक जाती है, उसमें से कुछ बचता नहीं है। और अगर थोड़ा-बहुत बचता है–अगर थोड़ा-बहुत बचता है–तो भी आपने उसको व्यर्थ फेंक देने के उपाय और व्यवस्था कर रखी है। कुछ बचता नहीं। आदमी करीब-करीब बैंक्रप्ट, दिवालिया जीता है। जो शक्ति उसे मिलती है, दैनंदिन कार्यों में चुक जाती है। और जो शक्ति छिपी पड़ी है, उसे वह कभी जगा नहीं पाता।

तो योग का पहला तो आधार है, छिपी हुई पोटेंशियल ऊर्जा को जगाना। सब तरह के उपाय योग ने खोजे हैं कि वह कैसे जगाई जाए। इसलिए प्राणायाम खोजा। प्राणायाम आपके भीतर सोई हुई शक्तियों को हैमर करने की, चोट करने की एक विधि है। फिर योग ने आसन खोजे। आसन आपके शरीर में छिपे हुए जो ऊर्जा के स्रोत-क्षेत्र हैं, उन पर दबाव डालने की प्रक्रिया है, ताकि उनमें छिपी हुई शक्ति सक्रिय हो जाए।

आपने ट्रेन को चलते देखा है। शक्ति तो बहुत साधारण-सी उपयोग में आती है, पानी और आग की, और दोनों से बनी हुई भाप की। लेकिन भाप के धक्के से इंजन का सिलेंडर धक्का खाकर चलना शुरू हो जाता है। फिर ट्रेन चल पड़ती है। इतनी बड़ी शक्ति, इतने बड़े वजन की ट्रेन सिर्फ पानी की भाप, स्टीम चलाती है।

आपके शरीर में भी बहुत-सी शक्तियां हैं, जिन शक्तियों को दबाकर सक्रिय किया जाए, तो आपके भीतर न मालूम कितने सिलेंडर चलने शुरू हो जाते हैं, जो कि अभी बिलकुल वैसे ही पड़े हैं। इन शक्तियों के बिंदुओं को, जहां शक्ति छिपी है, योग चक्र कहता है। प्रत्येक चक्र पर छिपी हुई शक्तियां हैं। और प्रत्येक चक्र को दबाने के, गतिमान करने के, डायनेमिक करने के आसन हैं, प्राणायाम की विधियां हैं।

हम भी साधारणतः उपयोग करते हैं, हमारे खयाल में नहीं होता है। आपने कभी खयाल किया है कि रात आप सिर के नीचे तकिया रखकर क्यों सो जाते हैं? कभी खयाल नहीं किया होगा। कहते हैं कि नींद नहीं आती है, इसलिए सो जाते हैं। तकिया रखकर आप न सोएं, तो नींद क्यों नहीं आती?

जब आप तकिया नहीं रखते, तो शरीर के खून की गति सिर की तरफ ज्यादा होती है। क्योंकि सिर भी शरीर की सतह में, बल्कि शरीर से थोड़ा नीचे ढल जाता है। तो सारे शरीर का खून सिर की तरफ बहता है। और जब खून सिर की तरफ बहता है, तो सिर के जो तंतु हैं, मस्तिष्क के, वे खून की गति से सजग बने रहते हैं। फिर नींद नहीं आ सकती। खून बहता रहता है, तो मस्तिष्क के तंतु सजग रहते हैं। तो फिर नींद नहीं आ सकती। तो आप तकिया रख लेते हैं।

और जैसे-जैसे आदमी सभ्य होता जाता है; तकिए बढ़ते चले जाते हैं–एक, दो, तीन! क्यों? क्योंकि उतना सिर ऊंचा चाहिए, ताकि खून जरा भी भीतर न जाए। नहीं तो मस्तिष्क की दिनभर इतनी चलने की आदत है कि जरा-सा खून का धक्का और सिलेंडर चालू हो जाएगा; आपका मस्तिष्क काम करना शुरू कर देगा।

योगी शीर्षासन लगाकर खड़ा होता है। आप समझें कि दोनों का नियम एक ही है, तकिया रखने का और शीर्षासन का आधारभूत नियम एक ही है। उलटा काम कर रहा है वह। वह सारे शरीर के खून को सिर में भेज रहा है। योगी जब शीर्षासन लगाकर खड़ा हो रहा है, तो वह कर क्या रहा है? वह इतना ही कर रहा है कि वह सारे शरीर के खून की गति को सिर की तरफ भेज रहा है।

अभी जितना आपका मस्तिष्क काम कर रहा है, वैज्ञानिक कहते हैं कि सिर्फ एक चौथाई मस्तिष्क काम करता है, तीन चौथाई बंद पड़ा हुआ है, स्टैगनेंट, वह कभी कोई काम नहीं करता। खून की तीव्र चोट से वह जो नहीं काम करने वाला मस्तिष्क का हिस्सा है, सक्रिय किया जा सकता है। क्योंकि यह हिस्सा भी खून की चोट से ही सक्रिय होता है। खून का धक्का आपके मस्तिष्क के बंद सिलेंडर को गतिमान कर देता है।

मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय हो जाएं, जो मौन चुपचाप पड़े हैं, तो आपकी समझ और आपके विवेक में आमूल अंतर पड? जाते हैं–आमूल अंतर पड़ जाते हैं। आप नए ढंग से सोचना और नए ढंग से देखना शुरू कर देते हैं। नए ढंग से, एक नई दृष्टि, और एक नया द्वार, न्यू परसेप्शन, डोर्स आफ न्यू परसेप्शन, प्रत्यक्षीकरण के नए द्वार आपके भीतर खुलने शुरू हो जाते हैं।

मैंने उदाहरण के लिए कहा। इस तरह के शरीर में बहुत-से चक्र हैं। इन प्रत्येक चक्र में छिपी हुई अपनी विशेष ऊर्जा है, जिसका विशेष उपयोग किया जा सकता है। योगासन उन सब चक्रों में सोई हुई शक्ति को जगाने का प्रयोग है।

ओशो – गीता-दर्शन – भाग 3, (अध्याय—6)
प्रवचन—नौवां - योग का अंतर्विज्ञान

Rajesh Saini

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बुधवार, 11 अगस्त 2021

coronavirus-impact-on-textile-industry

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 The coronavirus disease (COVID-19) is affecting every sphere of life including manufacturing activities, businesses, etc., across the globe and India is also not spared from the panic situation. The textile industry predominantly employs migrant workers from different States and also a large populat.. 

 

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शिव-पार्वती का प्रेमा-ख्यान

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शिव-पार्वती का प्रेमा-ख्यान अद्भुत है।पार्वती जैसा प्रेम और शंकर जैसा पति, ये दोनों ही अलभ्य हैं।शिव विश्व के चेतना है तो पार्वती विश्व की ऊर्जा हैं।शंकर जी का गोत्र त्रिलोक है।पार्वती जी साधना के माध्यम से शिव जी के ह्रदय में करूणा और समभाव जगाती हैं।उनका तप औरों से भिन्न होते हुए किसी भी इच्छा, वरदान वयक्तिगत सुख के लिए नहीं अपितु संसार के कल्याण के लिए है।शिव स्रोत हैं शक्ति के, पर स्वयं कभी गति नहीं करते – शिव की गति को ही ‘शक्ति’ कहते हैं। जब तक शिव हैं और शक्ति हैं, मामला बिल्कुल ठीक है, क्योंकि शक्ति का पूर्ण समर्पण, शक्ति की पूर्ण भक्ति शिव मात्र के प्रति है। वहां कोई तीसरा मौजूद नहीं।शिव-शक्ति के बीच में किसी तीसरे की गुंजाइश नहीं, तो वहां पर जो कुछ है बहुत सुंदर है। शिव केंद्र में बैठे हैं, ध्यान में, अचल, और उनके चारों तरफ गति है, सुंदर नृत्य है शक्ति का। वहां किसी प्रकार का कोई भेद नहीं, कोई द्वंद नहीं, कोई टकराव नहीं, कोई विकल्प नहीं, कोई संग्राम नहीं।🙏 sabhar Facebook wall mahaavatar baba ji italy

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