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रविवार, 16 मार्च 2025

भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है

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 संस्कृत भारतीय उप महाद्वीप में यह भाषा लगभग छह हजार साल से पहले बोली जाती रही है। भाषाविज्ञान शास्त्री भी विभिन्न अध्ययनों में साफ कर चुके हैं कि भारत की अधिकतर भाषाएं संस्कृत से ही निकली हैं। वेदों की भाषा वैदिक संस्कृत से ही आधुनिक संस्कृत निकली है। संस्कृत से प्राकृत भाषा का उदय हुआ और  प्राकृत से पालि भाषा। भारत की अधिकतर भाषाओं की जननी संस्कृत ही है


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हालांकि पिछले कुछ समय से भारत में संस्कृत भाषा लेकर एक कुत्सित अभियान चलाया जा रहा है कि संस्कृत तो  पाली से निकली है। जबकि इस दावे को असत्य  साबित करने के लिए एक ही तथ्य काफी है। वह यह कि संस्कृत का व्याकरण अष्टाध्यायी के रचयिता महर्षि पाणिनी के जन्म के कई सदियों बाद तथागत बुद्ध हुए। महर्षि पाणिनी के साहित्य में बुद्ध का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। यानी  तथागत बुद्ध का कालखंड महर्षि पाणिनी के बाद का है। तथागत बुद्ध ने अपने प्रवचन पालि में दिए।उसी दौहरान पालि भाषा अस्तित्व में थी। यह भी तथ्य है कि पालि को संस्कृत से प्राचीन होने का दावा करने वाले  लोग इस बारे में अपना एक भी रिसर्च पेपर  भारतीय इतिहास कांग्रेस जैसी संस्थाओं के सामने पेश नहीं कर पाए हैं। बस सोशल मीडिया में झूठी बातों को परोस रहे हैं।

अब  संस्कृत को लेकर एक अच्छा समाचार मिला है। यज्ञदेवम के नाम से प्रसिद्ध भारत राव ने सिंधु घाटी की लिपि को पढ़ने का दावा किया है।वे क्रिप्टोग्राफर हैं । गुप्त भाषाओं के जानकार यज्ञदेवम ने इंडस घाटी यानी सिंधु घाटी लिपि को डिकोड किया है। जो कि लगभग 4000 बीसी में लिखी गई थी। यानी आज से लगभग साढ़े छह हजार साल पहले। यज्ञवेदम का अध्ययन बताता है कि संस्कृत  सिंधु घाटी की स्थानीय भाषा  है। क्रिप्टोग्राफी का अर्थ गुप्त भाषाओं को समझने का विज्ञान है।  यज्ञदेवम इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और भाषाविदों के बीच एक अनोखी शख्सियत हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने सिंधु घाटी की लिपि की गुत्थी सुलझा ली है। यज्ञदेवम की यह खोज आर्य आक्रमण सिद्धांत को भी चुनौती देती है  साभार : हिमालयी लोग यूट्यूब 

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शनिवार, 15 मार्च 2025

आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो:ऋतु सिसोदिया:

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 आंतरिक सशक्त होना है तो सत्य के साथ निष्पक्ष रहो


कुटिल दुसरो की हानि करकेखुद का भला सोचता है जबकि आद्यात्मिक्ता की राह पर चलने वाला स्वय दुख सहन करके दुसरो को सुख प्रदान करता है


जबकि एक समझदार व्यक्तिना स्वयम की ना किसी अन्य का अहित करके बल्कि समाधान की ओर अग्रसर होता है जिससे सबका लाभ हो या लाभ ना होतो हानि तो कदापि ना हो

 चालाक" का मतलब बुरी प्रवृत्ति नहीं होता। इसका अर्थ होता है समझदार, चतुर, और परिस्थिति के अनुसार सही निर्णय लेने वाला व्यक्ति। हालाँकि, कभी-कभी यह नकारात्मक रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, जब किसी व्यक्ति को अत्यधिक चालाकी या चतुराई से किसी को धोखा देने वाला समझा जाता है।


अगर चालाकी का इस्तेमाल सही दिशा में किया जाए, तो यह एक अच्छी विशेषता होती है, क्योंकि यह व्यक्ति को बुद्धिमान और परिस्थितियों को समझने वाला बनाती है।


कर्मफल से कोई नही बच पाता अतः सत्कर्म करते रहे

 साभार ऋतु सिसोदिया 

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संसार में लाखों योनियां हैं। उनमें से सबसे अधिक मूल्यवान और उत्तम योनि मनुष्य की है

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 15.3.2025

         "संसार में लाखों योनियां हैं। उनमें से सबसे अधिक मूल्यवान और उत्तम योनि मनुष्य की है।" क्योंकि मनुष्य जीवन में बहुत सारी सुख सुविधाएं हैं, जो अन्य प्राणियों को ईश्वर ने लगभग नहीं दी। जैसे कि "ईश्वर ने मनुष्यों को 'विशेष बुद्धि' दी। बोलने के लिए 'भाषा' दी। कर्म करने के लिए 'दो हाथ' दिए। कर्म करने की '24 घंटे की स्वतंत्रता' दी। और 'चार वेदों का ज्ञान' दिया।" ये पांच सुविधाएं अन्य प्राणियों को ईश्वर ने लगभग नहीं दी। "बंदर लंगूर चिंपांजी गोरिल्ला वनमानुष आदि 5/7 प्राणियों को मनुष्यों जैसे हाथ तो दिए, परंतु बाकी सुविधाएं न होने के कारण ये प्राणी हाथ होते हुए भी उनका कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाए।"

           कहने का सार यह है कि "इतनी उत्तम सुविधाएं सुख साधन स्वतंत्रता आदि जो मनुष्य को मिली हैं, यह मुफ्त में नहीं मिली। यह अनेक उत्तम कर्मों का फल है।" "अब तो सौभाग्य से आपको मनुष्य जन्म मिला है, यह पूर्व जन्म के शुभ कर्मों का फल है। और यह फल ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है, अर्थात मनुष्य योनि प्राप्त करने में जहां आपका पुरुषार्थ कारण है, वहां ईश्वर की कृपा भी एक बहुत बड़ा कारण है।"       

          यदि ईश्वर आपके कर्मों का हिसाब न रखे, और समय आने पर आपको ठीक-ठीक फल न दे, तो आप ईश्वर पर मुकदमा नहीं कर सकते, कि "हे ईश्वर! आप हमारे कर्मों का फल क्यों नहीं देते ?" "ऐसी भाषा तो उस व्यक्ति के लिए बोली जा सकती है, जिसने आपसे कुछ ऋण ले रखा हो और वह ऋण चुकाता न हो। तब आप ऐसी भाषा उस व्यक्ति के लिए बोल सकते हैं।" "परंतु ईश्वर के लिए ऐसी भाषा नहीं बोल सकते। क्योंकि ईश्वर ने आपसे कोई ऋण नहीं ले रखा। ईश्वर का स्वभाव दयालु एवं परोपकारी होने से वह अपनी उदारता एवं दयालुता के कारण आपके कर्मों का पूरा-पूरा हिसाब भी रखता है, और समय आने पर आपके कर्मों का ठीक-ठीक फल भी देता है। इसलिए उसकी कृपा (उपकार, एहसान) स्वीकार करनी चाहिए।" 

        "तो अब पिछले कर्मों और ईश्वर की कृपा से इस बार तो आपको अच्छा मनुष्य जन्म मिल गया। क्या आप आगे भी ऐसा ही उत्तम मनुष्य जन्म प्राप्त करना चाहेंगे?" "यदि हां, तो सभ्यता नम्रता परोपकार दान दया ईश्वर भक्ति यज्ञ संध्या माता-पिता की सेवा गौ आदि प्राणियों की रक्षा करना आदि उत्तम कर्मों का आचरण करें। अन्यथा अगला जन्म मनुष्य योनि में नहीं मिलेगा। और संसार में शेर भेड़िया सांप बिच्छू वृक्ष वनस्पति आदि लाखों योनियां हैं, उनमें कहीं नंबर लगेगा।"

         "यदि उन योनियों में कहीं नंबर लग गया, तो हो सकता है, कुछ लोग आपको डिस्कवरी चैनल पर भी देखें, और अपना मनोरंजन करें। इसलिए मनुष्य जीवन का मूल्य समझें, और इसका सदुपयोग करें। बुराइयों से बचें तथा उत्तम कर्मों का आचरण करें, तभी आपका भविष्य सुरक्षित होगा।"

----- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़, गुजरात।"साभार ऋतु सिसोदिया Facebook wall

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शुक्रवार, 14 मार्च 2025

ध्यानम शरणम गच्छामि :ऋतु सिसौदिया आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक

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 आत्मजागृति से समूल दुखो का नाश होता है जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करना भगवतभक्ति है,,यदि वह कुमार्गगामी है उसे सत्यपथ पर लाने का प्रयाश भी भगवतभक्ति है क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक कर्तव्यकर्म ही धर्म है ,,क्यूँकि तुम्हारा दुख ना सुविधा से ना धन से ना पद से ना प्रतिष्ठा से किसी भी विषय बस्तु से नही आत्मजागृति से ही अंधकार मिटेगा जीवन प्रकाशवान हो जाएगा


परस्पर अपेक्षा समूल दुखो का कारण है दुसरो को बदलने की बजाय स्वयम में परिवर्तन करें


वह कुटिल कपटी क्रोधी आदी है तो यह उसकी प्रकर्ति है यदि आप सत्यपथ पर है तो ईश्वर न्यायकारी है दुष्ट की दुष्टता से जो हानि आपकी हुई उसकी भरपाई किसी ना किसी रूप में अवश्य होती है

क्योंकि श्रष्टि का नियम है सन्तुलन


जिसका जैसा कर्म वैसा ही फल,,आप सत्यपथ पर निश्चित होकरपरमात्मा को समर्पित होकर चले 


माया में ना उलझकर ईशभक्ति मुक्तिको अग्रसर रहे


ध्यानम शरणम गच्छामि 

लेखक: ऋतु सिसौदिया आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक 


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रविवार, 9 मार्च 2025

पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गूढ़ साधनाओं में शीघ्र सफलता मिल जाती है: ऋतु सिसोदिया

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 भारत में भी महिला सम्मान दिवस मना लिया गया। जबकि भारत मे महिला सम्मान की धारणा सनातन है। वर्ष में छह छह महीने के अंतर से नवरात्रि पर्व मनाये जाते हैं,दीपावली का त्यौहार जिनमें स्त्री स्वरूपिणी देवी की पूजा उपासना करी जाती है। पुरूष स्वरूप ईश्वर के समान ही स्त्री स्वरूपिणी ईश्वरी की मान्यता है।ऐसा गांव शायद ही कोई होगा जिसमें देवी का स्थान न हो।ऐसी जाति भी शायद ही हो जिसकी कुलदेवी न हो। 

मां ही वास्तव में पिता से परिचित करा सकती है। महामाया (स्त्रियों) के प्रति हेय भाव रखने वाले साधक कभी सफल नहीं हो पाते हैं। बड़े बड़े तपस्वी ज्ञानी ऋषि जो महामाया के प्रति हेय भाव रखते थे, उन्हें महामाया ने  येन सफलता के क्षणों में भटका दिया था।उनकी तपस्या भंग हो गई थी।


जैसा श्री कृष्ण ने अर्जुन से गीता में कहा था --


श्री भगवान उवाच

बहुनि मे व्यतितानि जन्मनि तव चार्जुना

तन्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप


 भगवान ने कहा: हे अर्जुन, तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हुए हैं। हे परंतप, तुम उन्हें भूल गए हो, जबकि मुझे वे सब याद हैं।

मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मरण कर बैठा है। यही विस्मरण अज्ञान है। स्त्रियां भी अपने वास्तविक स्वभाव,स्वरूप का विस्मरण कर बैठीं ।यही अज्ञान समस्याओं का कारण है। अन्यथा स्त्रियों में भी वही शक्ति है जो देवी में है। प्राचीन ग्रंथों में ऋषि स्त्रियों को देवी कहकर ही संबोधित करते हैं। क्योंकि ऋषि जानते थे कि स्त्रियों के भीतर भी जगत जननी महामाया का अंश है।  

कुछ साधना विधियों से स्त्रियों को वंचित रखा गया। उसके पीछे राजनीतिक कारण रहे होंगे। क्योंकि पूर्ण जागृत ज्ञानवान शक्ति संपन्न स्त्री को परतंत्रता में रख पाना असंभव है।


जो स्त्रियां स्वयं के वास्तविक स्वभाव स्वरूप को जान लेतीं हैं, वे अबला नहीं बल्कि सबला हो जातीं हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गूढ़ साधनाओं में शीघ्र सफलता मिल जाती है । क्योंकि भाव की संघनता और उनके उपयोग के मामले में स्त्रियां पुरुषों से बहुत आगे होतीं हैं। 

#जय_महामाया 

#निसर्गम

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भगवान राम की मुख्य शाखा :कार्तिकेय पुर राजवंश

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 कार्तिकेय पर राजवंश एक महत्वपूर्ण राजवंश है इसका भारत में काफी समय तक राज्य रहा है यह एक भगवान राम की मुख्य शाखा रही है कार्तिकेयपुर राजवंश उत्तराखंड में इसका निर्माण सर्वप्रथम बसंत देव ने का किया अयोध्या के अंतिम सम्राट सुमित्रा के बाद उनके बड़े पुत्र राजा शालीवाहन देव उत्तराखंड चले गए जहां उन्होंने जोशीमठ में अपना राज्य कायम किया बाद में उनके शासन सामंत के रूप में भी कार्य किया हर्षवर्धन कल के बाद बसंत देने अपने आप सम्राट घोषित कर दिया 

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बुधवार, 5 मार्च 2025

अपने अंदर अथाह शक्ति समाहित है :ऋतु सिसौदिया

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 अपने अंदर अथाह शक्ति समाहित है

स्वयम को स्वयं से जोड़ो प्रकर्ति के संरक्षण में ध्यान लगाओ अंतर्मन की गहराई में जाओ


सभी सनातनी कथा भागवत रामायण महाभारत को सुनते हैं अन्याय अधर्म आदि बड़ने पर क्षत्रियों ने ही आगे आकर धर्म राष्ट्र रक्षा की तो उनकी ही वीरता की कथा सुनते हैं उनकी ही उपेक्षा करते हैं तो कभी धर्म राष्ट्र की रक्षा हो सकेगी कभी नहीं चिंतन अवश्य करें


सत्य को गलत साबित करना असंभव है कोई सत्य को नहीं समझे उसकी बुद्धि ,विचार और मन की समझ ,प्रमाण की कठिनता आदि का खेल समझिए

न्याय और मर्यादा की मूर्ति क्षत्रिय,चोर, ठगों, लुटेरों को कब रास आयें गे।।


सम्पूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति को समेटे मानव पहले स्वयम को जानना अति आवश्यक तदुपरांत समाज से जुड़े स्वयम के अस्तित्व को खोकर इन निकृष्ट समाज को पा लेना मूर्खता है

इसलिए आत्मज्ञान अनिवार्य आत्मबोध अनिवार्य

ऐसे शिक्षा प्रणाली का निर्माण हो झा सबका संगर्क विकाश व आद्यत्मिक ज्ञान प्राप्त हो आत्मकल्याण कर ही मनुस्य लोककल्याण कर सकता है


ॐ परमात्मने नमः

ममहरि शरणम

🚩जय मां भवानी🚩

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स्त्री की योनि: सृजन और सम्मान का प्रतीक

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 स्त्री की योनि: सृजन और सम्मान का प्रतीक



स्त्री की योनि केवल पुरुषों के सुख का माध्यम नहीं है, बल्कि यह इस संसार में नए जीवन का प्रवेश द्वार भी है। यह वह पवित्र स्थान है, जहाँ से हर नया जीवन जन्म लेता है, जहाँ से हर इंसान की यात्रा प्रारंभ होती है। योनि केवल शारीरिक संरचना नहीं, बल्कि सृजन और मातृत्व की शक्ति का प्रतीक है।

 

प्रकृति ने स्त्री को इस अद्भुत क्षमता से नवाजा है कि वह एक नए जीवन को जन्म दे सके। जब कोई शिशु जन्म लेता है, तो योनि उसके लिए इस दुनिया में आने का मार्ग बनती है। यह केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और मातृत्व के अद्भुत संगम का प्रतीक है। हर स्त्री अपने शरीर को एक नए जीवन के लिए समर्पित करती है, और यह त्याग किसी भी तरह से कम सम्मान के योग्य नहीं हो सकता।


सम्मान का महत्व


आज भी समाज में कई लोग महिलाओं के प्रति उचित सम्मान नहीं दिखाते। हम उस स्थान का सम्मान करना तो दूर, उसकी महत्ता को भी नहीं समझते, जिसने हमें इस दुनिया में आने का अवसर दिया। यह एक विडंबना है कि जिस योनि से जन्म लेकर हम इस संसार में आए, उसी का अपमान करने से नहीं चूकते।


स्त्रियों का सम्मान करना केवल एक नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि समाज की उन्नति के लिए भी आवश्यक है। जब हम महिलाओं को उचित सम्मान देंगे, तभी हम एक संतुलित और उन्नत समाज की कल्पना कर सकते हैं। महिलाओं को केवल भोग की वस्तु मानना उनके अस्तित्व और शक्ति का अपमान है।


निष्कर्ष


हर पुरुष को यह समझना चाहिए कि वह भी एक स्त्री की कोख से जन्मा है। महिलाओं का सम्मान करना, उनकी गरिमा को बनाए रखना और उनके अधिकारों की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। यह केवल नारी सम्मान की बात नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की उन्नति से जुड़ा विषय है। अगर हम सच में एक सभ्य समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें स्त्रियों को वह सम्मान देना होगा, जिसकी वे वास्तव में अधिकारी हैं।"

 हर हर महादेव साभार Facebook 

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मंगलवार, 4 मार्च 2025

लौकिक व अलौकिक जगत में तारतम्य: ऋतु सिसौदिया

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 लौकिक व अलौकिक जगत में तारतम्य बिठाने में बढ़ी असहजता हुई 

क्योंकि आत्मज्ञान व आत्मबोध ही ना था

शायद यही कारण रहा होगा सत्य की खोज को गौतम बुद्ध ने संसार का परित्याग कर वन गमन किया

और ऐसा ही उत्तर चढ़ाव हर  तीसरे चौथे व्यक्ति के जीवन मे घटित हो रहा किन्तु वह मोह का लोभ का लालच का परित्याग नही कर पा रहा 

आत्म कल्याण करना है तो आत्मसंयमी बनो त्याग दो उस सभी का जो तुम्हारी उन्नति में बाधक है

आत्मकल्याण तुम्हारी प्राथमिकता है 

जब आप स्वयं आत्मसन्तुष्ट नही मानसिक मजबूत स्थिति में नही तो तुम किसी के सहयोगी बन ही नही सकते परोपकारी बन ही नही सकते

अतः विनम्र निवेदन सन्तानो को विवाह संस्कार से बांधकर जिम्मेदारियों में जकड़कर आप सांसारिक कर्तव्य से मुक्त हो सकते है किंतु इससे अन्य जो नई समस्याए उतपन्न होती है फिर उन जिम्मेदारियों को उठाने से मोह क्यों मोड़ते है

इन समस्याओं के जन्मदाता तो आप ही है

बुद्धि व विवेक को जाग्रत कीजिये परवरिश सुशिक्षा व संस्कार के साथ कीजिये बहुत बड़ा कर्तव्य है विवाह फिर सन्तान को विशाल बृक्ष बनाना 

ना कि तुम्हारी गलतियों की सजा का भुगतान किसी की बेटी को बलि का बकरा बनकर मूल्य पत्नी होने का चुकाना पड़े तो इस्वर के न्याय से घबराना मत


समझदार को संकेत पर्याप्त है

जागरूकता ही जीवित की निशानी है

ॐ,🚩

 मम हरि शरणं साभार ऋतु सिसोदिया 

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शनिवार, 1 मार्च 2025

हरीतकी "हरड़" का आयुर्वेदिक महत्व

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 🌹 हरीतकी को आयुर्वेद में "हरड़" के नाम से भी जाना जाता है। 

इसे "सभी रोगों की दवा" कहा जाता है।


क्योंकि यह शरीर को शुद्ध करने, पाचन सुधारने, और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करती है। यह त्रिफला (हरीतकी, बिभीतकी और आंवला) का एक मुख्य घटक है।


🌺 हरीतकी के प्रकार :==


आयुर्वेद में हरीतकी को सात प्रकारों में बांटा गया है:


1. विजया – शरीर को संतुलित रखती है।


2. रोहिणी – घाव भरने और त्वचा रोगों के लिए फायदेमंद।


3. पूतना – बालों और त्वचा के लिए उपयोगी।


4. अमृता – बुखार और संक्रमण में लाभदायक।


5. अभया – नेत्र रोगों और मस्तिष्क के लिए फायदेमंद।


6. जीवनी – ऊर्जा और शक्ति बढ़ाने वाली।


7. चेतकी – पाचन तंत्र सुधारने में सहायक।


हरीतकी के फायदे :===


1. पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद


कब्ज, गैस, अपच और एसिडिटी को दूर करता है।


आँतों को साफ करता है और पेट हल्का रखता है।


भूख बढ़ाने में मदद करता है।


2. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाए


शरीर से विषाक्त पदार्थ (Toxins) बाहर निकालता है।


वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण से बचाता है।


सर्दी, जुकाम और खांसी में लाभदायक।


3. वजन घटाने में सहायक


चयापचय (Metabolism) को तेज करता है।


पेट की चर्बी कम करने में मदद करता है।


शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को धीरे-धीरे हटाता है।


4. हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभदायक


ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।


कोलेस्ट्रॉल कम करता है।


रक्त संचार को सुधारता है।


5. मधुमेह (Diabetes) में उपयोगी


रक्त शर्करा (Blood Sugar) को नियंत्रित करने में मदद करता है।


इंसुलिन के सही स्तर को बनाए रखने में सहायक।


6. मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी


याददाश्त और एकाग्रता बढ़ाने में सहायक।


तनाव, चिंता और डिप्रेशन को कम करता है।


7. त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद


त्वचा के दाग-धब्बे और मुंहासे दूर करता है।


बालों को काला, घना और मजबूत बनाता है।


डैंड्रफ को कम करता है।


🌺 हरीतकी का उपयोग कैसे करें?


1. कब्ज और पाचन के लिए


कैसे लें?


1 चम्मच हरीतकी चूर्ण को रात में गुनगुने पानी या दूध के साथ लें।


इसे शहद के साथ भी लिया जा सकता है।


2. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए


कैसे लें?


हरीतकी चूर्ण को आंवला और गिलोय के साथ मिलाकर सेवन करें।


इसे गर्म पानी में मिलाकर दिन में एक बार पिएं।


3. वजन घटाने के लिए


कैसे लें?


हरीतकी पाउडर को गुनगुने पानी और शहद के साथ सुबह खाली पेट लें।


4. त्वचा और बालों के लिए


कैसे लगाएं?


हरीतकी पाउडर को नारियल तेल या दही में मिलाकर बालों में लगाएं।


चेहरे पर लगाने के लिए गुलाब जल के साथ पेस्ट बनाकर लगाएं।


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हरीतकी का सेवन करते समय सावधानियाँ


गर्भवती महिलाओं को हरीतकी लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।


अधिक मात्रा में लेने से डायरिया या पेट दर्द हो सकता है।


लो बीपी वाले लोग इसका अधिक सेवन न करें।


बच्चों को देने से पहले वैद्य या डॉक्टर से परामर्श कर लें।


निष्कर्ष :====


हरीतकी एक शक्तिशाली आयुर्वेदिक औषधि है जो पाचन, हृदय, त्वचा, बाल, मानसिक स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए बहुत फायदेमंद है। इसे सही मात्रा में और सही तरीके से लेने से शरीर को कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।


अगर आप इसे दवा के रूप में लेना चाहते हैं, तो पहले किसी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

#highlight

@हाइलाइट साभार amitesh kumar Facebook 

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बेल का महत्व

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 आयुर्वेद में बेल महत्वपूर्ण औषधि माना गया है जो पाचन संबंधी कई बीमारियों में फायदेमंद है।  इस फल का हर हिस्सा ही सेहत के लिए के लिए गुणकारी है, बाहर से यह फल जितना ही कठोर होता है अंदर से उतना ही मुलायम और गूदेदार होता है। इसके गूदे में मौजूद बीज भी कई बीमारियों के इलाज में फायदा पहुंचाते हैं।

सेवन विधि : दो चम्मच बेल के गूदे को आधा गिलास पानी में मिलाकर बेल का जूस (bael juice) बनाएं और इस जूस का दिन में एक से दो बार सेवन करें।


किडनी के लिए फायदेमंद :

बेल का सेवन किडनी के लिए भी फायदेमंद है और यह किडनी की कार्यक्षमता को और बढ़ाती है। एक शोध के अनुसार बेल की जड़ों और पत्तियों में डायूरेटिक गुण होते हैं जो मूत्र का उत्पादन बढ़ाती हैं। यह ख़ास तौर पर वाटर रिटेंशन की समस्या से आराम दिलाने में बहुत कारगर है।


सेवन विधि : आधा चम्मच बेल की पत्तियों के चूर्ण को पानी के साथ मिलाकर सेवन करें।


लीवर के लिए फायदेमंद :

ऐसा देखा गया है कि बेल की पत्तियां लीवर को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं। लीवर से जुड़ी बीमारियां अक्सर तभी होती हैं जब शरीर में टॉक्सिन या हानिकारक विषैले पदार्थ बढ़ जाते हैं या किसी तरह का संक्रमण हो। शोध के अनुसार बेल (Bael in hindi) में एंटी-फंगल, एंटी बैक्टीरियल और एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं साथ ही इसमें बीटा-कैरोटीन भी पाया जाता है जो लीवर को किसी भी तरह के संक्रमण और चोट से बचाने में मदद करते हैं।


सेवन विधि : ताजे बेल के गूदे को निकालकर रात भर के लिए पानी में भिगोकर रखें और सुबह उसे मैश करके खाएं।


स्कर्वी :

शरीर में विटामिन सी की कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है। इस रोग के कारण मसूड़ों से खून रिसने लगता है और शरीर पर चकत्ते पड़ने लगते हैं। ऐसे में बेल (Bael) का नियमित सेवन इस समस्या को काफी हद तक ठीक कर सकती है। बेल में मौजूद विटामिन सी, शरीर में इसकी कमी को दूर करती है और साथ ही इम्युनिटी पॉवर को भी मजबूत बनाती है।


सेवन विधि : आधा से एक चम्मच बेलगिरी चूर्ण को पानी के साथ मिलाकर खाएं।


कान के दर्द से आराम :

बेल फल के फायदे सिर्फ पाचन तंत्र को ठीक करने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि यह कान दर्द में भी बहुत उपयोगी हैं। कान में दर्द और कान से तरल का स्राव होना एक आम समस्या है। आयुर्वेद में ऐसा बताया गया है कि बेल के उपयोग से कान के दर्द, कान बहने और बहरेपन जैसी समस्याओं से आराम मिलता है। हालांकि कई बार कान में दर्द की समस्या किसी और वजह से भी हो सकती है। इसलिए कान से संबंधित इलाज में आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही बेल का सेवन करें।


उपयोग विधि : बिल्वादी तेल एक आयुर्वेदिक तेल है, इसकी मुख्य सामग्री बेल होती है। यह तेल कान के दर्द से आराम दिलाने में बहुत कारगर मानी जाती है। हालांकि इसका उपयोग आप चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही करें। साभार जय प्रकाश ओझा Facebook 


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