OnePlus Nord 5G (Blue Marble, 12GB RAM, 256GB Storage

48MP+8MP+5MP+2MP quad rear camera with 1080P Video at 30/60 fps, 4k 30fps | 32MP+8MP front dual camera with 4K video capture at 30/60 fps and 1080 video capture at 30/60 fps 6.44-inch 90Hz fluid Amoled display with 2400 x 1080 pixels resolution | 408ppi Memory, Storage & SIM: 12GB RAM | 256GB internal memory | OnePlus Nord currently support dual 4G SIM Cards or a Single 5G SIM. 5G+4G support will be available via OTA update at a future date. OxygenOS based on Android 10 operating system with 2.4GHz Kryo 475 Prime + 2.2GHz Kryo 475 Gold + 6x1.8GHz Kryo 475 Silver Qualcomm Snapdragon 765G 5G mobile platform octa core processor, Adreno 620 GPU 4115mAH lithium-ion battery | In-Display fingerprint sensor 1 year manufacturer warranty for device and 6 months manufacturer warranty for in-box accessories including batteries from the date of purchase Corning Gorilla Glass 5 | 12GB GB LPDDR4X, 256GB UFS 2.1 S

योग शरीर और विज्ञान

---------------:योग और मेरुदण्ड:---------------
***********************************
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      साधना की दृष्टि से मानव शरीर में जितने महत्वपूर्ण अंग हैं, उनमें सर्वाधिक मूल्यवान, सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है--'मेरुदण्ड'। मेरुदण्ड यानी रीढ़ की हड्डी। जिन हड्डियों के छोटे-छोटे टुकड़ों से मेरुदण्ड का निर्माण होता है, उनकी संख्या 84 है जिनका अगोचर सम्बन्ध जीवात्मा के 84 लाख योनियों से बतलाया गया है। प्रत्येक अस्थि-खण्ड में एक लाख योनियों के संस्कार विद्यमान हैं। 84 अस्थि-खंडों की श्रृंखला वाले इस मेरु-दण्ड के ऊपरी सिरे पर स्थितिशील ऊर्जा (स्टेटिक एनर्जी) यानी परात्पर 'शिवतत्त्व' की स्थिति है। इसी प्रकार इसके नीचे वाले सिरे पर गतिशील ऊर्जा (डायनेमिक एनर्जी) यानी शक्तितत्त्व या पराशक्ति की स्थिति है। योग की भाषा में इन्हीं दोनों सिरों को क्रमशः 'सहस्त्रार चक्र' और 'मूलाधार चक्र' कहते हैं। इन दोनों चक्र-बिंदुओं को तंत्र में ऊर्ध्व त्रिकोण और अधो त्रिकोण के रूप में परिकल्पित किया गया है। प्रथम चक्र-बिंदु पर जहाँ परात्पर शिवतत्त्व की स्थिति है, वहां शरीर और मन का मिलन होता है, इसी प्रकार दूसरे चक्र-बिन्दु पर जहां पराशक्ति तत्व की स्थिति है, वहां शरीर और आत्मा का मिलन होता है।
      मन और आत्मा का मिलन-केंद्र को योग की भाषा में 'अनाहत चक्र' कहते हैं। सहस्त्रार, मूलाधार और अनाहत के अलावा चार और चक्र हैं। तंत्र के अनुसार ये तीनों महत्वपूर्ण चक्र महाचक्र हैं। महाचक्रों का सम्बन्ध ॐ से बतलाया गया है। ॐ का ऊपरी भाग सहस्त्रार है, मध्य भाग अनाहत है और निम्न भाग मूलाधार है। ॐ में तीन ध्वनियां हैं--अ, उ और म्। अ और उ स्वर और म् व्यंजन है। सभी ध्वनियों और वर्णाक्षरों का लय म् में ही होता है। मेरुदण्ड के ऊपर अ, मध्य में उ और नीचे म् की स्थिति है। इस प्रकार पूरा मेरुदण्ड 'ॐ' से युक्त है। इन तीनों की समवेत ध्वनि को योग-तंत्र की भाषा में 'परावाक' कहते हैं। शरीर के भीतर इन तीनों के अपने-अपने केंद्रों से वैसे तो अलग-अलग ध्वनि निकलती है, पर एक स्थान विशेष पर ये तीनों ध्वनियां आपस में मिलकर परावाक का रूप धारण कर लेती हैं।
      वह स्थान विशेष कहाँ है ?
      वह स्थान विशेष है--नाभि (मणिपूरक चक्र) यह परावाक शक्ति का ही स्थान है। पराशक्ति ही परावाक रूप में व्यक्त होकर स्वरों और बाद में वर्णाक्षरों का निर्माण करती है। मगर उस निर्माण का एक क्रम है और उसी क्रम को 'परा', 'पश्यन्ति', 'मध्यमा' और 'बैखरी' कहते हैं। यदि इन चारों को परावाक के चार रूप कहा जाय तो साधुतर होगा।
      स्वर और वर्णाक्षरों की उत्पत्ति की दिशा में परावाक के ये रूप तो हैं ही, इनके अलावा उसके दो और गरिमामय रूप हैं जिन्हें 'भाव' और 'विचार' कहते हैं। प्रथम भाव की उत्पत्ति होती है और फिर बाद में विचार की। भाव कारण है और विचार है उसका परिणाम। sabhar sivram Tiwari Facebook wall

मानव शरीर का चक्र विज्ञान

------------------:ज्ञानतन्तु:------------------
***********************************
                    भाग--02
                  **********
परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      तंत्र के मतानुसार मानव शरीर में छः चक्र हैं जो चेतना-शक्ति के केंद्र-स्थल हैं--मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूरक चक्र, अनाहद चक्र, विशुद्ध चक्र और आज्ञाचक्र। सहस्त्रदल वाला चक्र यानी 'सहस्त्रार' चक्र सातवें और 'सोम' नामक आठवें चक्र का योग में गणना करते हैं जहां अनवरत सोम की वर्षा होती रहती है, अमृत-क्षरण होता रहता है और जीवनी-शक्ति बराबर गतिमान होती रहती है। जब इस अमृत का क्षरण बन्द होने लगता है, तब जीवन-चक्र भी समाप्त होने लगता है। अमृत-क्षरण अनवरत चलता है। यह साधक की साधना पर निर्भर करता है। हज़ारों वर्ष तक जीवित रहने वाले दीर्घजीवी साधकों को इस सोमरस का पान योग द्वारा सम्भव होता है। आज भी हिमालय की कंदराओं में सिद्ध साधक इसी सोमतत्व का पान कर वर्षों से साधना  में लीन हैं।
      देखा जाय तो ज्ञानतंतुओं का समूह शरीर में स्वाभाविक क्रियाएं जैसे रक्त का प्रवाह, श्वांस-प्रश्वांस, चय-अपचय आदि क्रिया करता है। मस्तिष्क के स्मरण बल आदि के कार्य-समूह को पाश्चात्य शरीरशास्त्री ज्ञानतन्तु बल (नर्व फोर्स) कहते हैं भारतीय योग इसे 'प्राणतत्व' कहता है। इसका सामर्थ्य और इसकी तुलना का स्वरूप विद्युत-प्रवाह से मिलता-जुलता है। यदि प्राणतत्व न हो तो हृदय अपनी स्वाभाविक क्रिया नहीं कर सकता और रक्त का प्रवाह अवरुद्ध हो जाएगा। फेफड़े श्वांस-प्रश्वांस की क्रिया भी नहीं कर सकते, शरीर में सब जगह प्राणों का संचार भी नहीं हो सकता जिसके अभाव में शरीर और मस्तिष्क के अवयव अपना कार्य नहीं कर सकते। शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ति और कार्बन डाई ऑक्ससाइड का निष्कासन भी सम्भव नहीं है प्राणतत्व के अभाव में। sabhar Shivram tiwari Facebook wall

Featured Post

हमारा विज्ञानऔर हमारी धरोहर

जब हमारे देश में बड़ी बड़ी  राइस मील नहीं थी तो धान को घर पर ही कूटकर भूसे को अलग कर चावल प्राप्त किया जाता था... असलियत में वही...