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रविवार, 22 अगस्त 2021

श्रीकृष्ण हैं बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक

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स्कूल कॉलेजों में हमें यही सिखाया जाता है कि बायोटेक्नॉलाजी को विदेशी वैज्ञानिकों ने खोजा, लेकिन असल में बायोटेक्नोलाॅजी के असली जनक हमारे कान्हा यानि भगवान श्रीकृष्ण थे।  जार्ज मेंडल, वाट्सन और क्रिक नहीं । 

ये सिद्धांत करीब 5000 साल पहले भगवान श्रीकृष्ण ने दिए थे। गीता के कई श्लोकों में इस बात का जिक्र है, जिससे साबित होता है कि बायोटेक के जनक कष्ण थे। गीता के श्लोक बायोटेक के सिद्धांतों को खुद में समेटे हुए हैं। गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक ग्रंथ भी है।

 कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान वैज्ञानिक नजरिए पर आधारित था। इसी ज्ञान आधार पर आज कई वैज्ञानिक अवधारणाओं का जन्म हुआ है। श्रीमद् भागवत गीता के सात श्लोकों में जीवन की उत्पत्ति का पूरा सार मौजूद है।इन्ही श्लोकों के द्वारा कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में ही मानव की उत्पत्ति का विज्ञान दे दिया था।
सामवेद के तीसरे अध्याय के 10वें खंड में पहला व नौवां श्लोक इन पांच तत्व (एटीजीसीयू) की पुष्टि करता है। यानी जीव आत्मा अणु और परमाणु से बनी है। नौवें श्लोक में ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण अणु और परमाणु के रूप में किया है। 

ये हैं गीता के वे सात श्लोक

मय्यासक्तामना: पार्थ योग युजजन्मदाश्रय:।
असंशय समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।

इस श्लोक में शरीर की आंतरिक ऊर्जा के आधार के बारे में बताया गया है। जिसे वैज्ञानिक भाषा में माइटोकोंड्रिया कहते हैं, जिसका अध्ययन सेल बॉयोलॉजी में करते हैं। यही शरीर में ऊर्जा पैदा करने वाला एडीनोसिन ट्राई फॉस्फेट पैदा करता है।

ज्ञानं तेहं सविज्ञामिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ञात्वा नेह भूयोन्यज ज्ञातव्यमविशष्यते।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को बताया। पृथ्वी पर निर्जीव से जीव की उत्पत्ति के बारे में जानकारी दी और बताया कि वह कौन से कण थे, जिनसे शरीर का निर्माण हुआ।

मनुष्याणां सहस्त्रेषु कशिचद्यतति सद्धिये।
यततामिप सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वत:।।

तीसरे श्लोक में तत्व ज्ञान को विस्तार से समझाया। आत्मा और मोक्ष पर विस्तार से जानकारी दी। यह भी बताया कि तत्व ज्ञान समझना ही दुष्कर है। इसे जिसने समझ लिया, उसे कुछ और जानने की जरूरत नहीं।

भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टयां।।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रर्कृंत विद्वि में पराम।
जीवभूतां महाबाहों ययेदं धार्यते जगत्।।

चौथे और पांचवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने कई ऐसी बातें कही हैं जिससे सिद्ध होता है कि लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने गुणसूत्र के बारे में भी जानकारी दी थी।

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा।

मत्त परतरं नान्यत् किचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।। 

छठे और सातवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने उत्पत्ति का आधार आठ तत्वों को बताया। अर्जुन को बताया कि मृत्यु शरीर की होती है, शरीर के अंदर मौजूद तत्वों की नहीं, जिसे आत्मा कहते हैं। 

1940 में वैज्ञानिक एरविन चार्जफ ने कहा था कि डीएनए कभी नहीं बदलता है। चाहे किसी भी रूप में मृत्यु हो, जबकि यही बात गीता में श्रीकृष्ण ने बहुत पहले ही बता दी थी।  

डीएनए- सूत्र का सूत्र में मनियों की तरह गुथा होना (एटीजीसीयू) है। श्रीकृष्ण के अनुसार सूत्र में सूत्र के मनियों के सदृश मुझमें गुथा हुआ है। यानी जीव में विद्यमान है। यह श्लोक डीएनए को ही परिभाषित करता है। श्रीकृष्ण के इसी वाक्य को अगर हम बॉयोकेमेस्ट्री की किसी भी पुस्तक में देखें, तो वहां स्ट्रिंग्स ऑन द रॉल्स इंग्लिश में पढ़ते हैं। इसके अलावा यूएसए की बॉयोकेमेस्ट्री की किताब लेनिनजर में भी यही बताया गया है। 

श्रीकृष्ण ने डीएनए की रासायनिक प्रकृति को मणि रुप में समझाया है। मणि रूप का मतलब डीएनए जो कि केमिकल थ्रेड (धागों) से मिलकर बना है। यहां धागों का मतलब बॉडिंग से है कि किस तरह से निर्जीव पदार्थ आपस में जुड़कर जीवन का निर्माण करते हैं।

आज बस इतना ही .....

अष्टावक्र वैदिक विज्ञान संशोधन

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