तंत्र साधना के मार्ग

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                                                             #_रहस्य_

तंत्र के मुख्य दो ही मार्ग  है इन्हीं विभिन्न सम्प्रदायों का उदय हुआ है १ ,वैदिकमार्ग २, शैवमार्ग। इनमे से वैदिकमार्ग को दक्षिणमार्ग  और शैवमार्ग को भी वाममार्ग  कहते है । गोरखनाथ जी के द्वारा शाबर मंत्र, जैनमार्ग, बौद्धमार्ग, मे भी साधनाए की जाती है पर वे सब वाममार्ग से ही प्रभावित है। आज ये दोनो मार्ग आपस मे मिलकर खिचड़ी बन गये है। अपितु ये आज से नही मिले आज से हजारो वर्ष पहले प्रजापति दक्ष के यज्ञ मे हुए युद्ध के समय मिल गये थे।
अतः आज बडे बडे तंत्रमार्गी एवं विद्वान भी इनमे भेद कर पाने स्थित नें नही है विशेषकर दक्षिणमार्गी ! वे आज वाममार्ग के  देवी देवताओं को पूजा अर्चन कर रहे है इनमें भगवती (आधाशक्ति), दुर्गा, महालक्ष्मी, आदि है और गणेशजी भी वाममार्ग के ही देवता है, क्योंकि ये शिवकुल के देवता है , विष्णुकूल के नहीं।
इसी प्रकार महालक्ष्मी को विष्णुकुल ने समुद्र मथंन(सामाजिक- धार्मिक-आध्यात्मिक- मथंन जो दक्ष के युद्ध के बाद हुआ) के पश्चात विष्णु से जोड दिया(स्मरण करें पौराणिक रूपक) आज ये सभी दक्षिणमार्ग एवं वाममार्ग दोनो मे पूजे जाते है।
वैदिक देवता तीन सौ से अधिक है पर उनमे मुख्य अग्नि, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, रूद्र ,अश्विनी ही है । वैदिक रूद्र ,शिव  नही है। जैसा कुछ लोग अर्थ लगाते है । ये तेज की उग्र भावना के प्रतीक है । शिव आदि परमात्मा के। ये विष्णु के पर्याय समझे जा सकते है। तथापि सांस्कृतिक भावना के अन्तर के कारण इनके वर्णन मे भावान्तर  है रूद्र की आराधना शिव के प्रधान गुण शक्ति के रूप मे वाममार्ग मे भी की जाती है ।
राम,कृष्ण, हनुमान, आदि अवतार रूप साकार ईश्वर की मान्यता के पश्चात दक्षिणमार्ग की पूजा पद्धति से जुडे है। वैदिक ऋषिओं की दृष्टि मे किसी मनुष्य या जीवधारी का ईश्वररूप असम्भव था। महान व्यक्तित्व देव रूप तो हो सकते है, किन्तु उन्हें निराकार, सच्चिदानंद परमात्मा मानने की वे कल्पना भी नही कर सकते थे। आज इन सभी रूपों, की आराधना को दक्षिण पंथ मे विष्णु रूप मे की जाती है।
सभी वैदिक देवताओं की साधना का वर्णन छोटी सी पोस्ट मे नही हो सकता है ।जो लोग इनमे से किसी देवता की साधना करनी चाहते है उन्हें वेद पढने चाहिए।ऋग्वेद मे अनुष्ठान विधि नही है । यह अथर्ववेद मे है । और यह सुत्र स्मरण रखें कि अग्नि, रूद्र, आदि उग्र देवा की साधना आग्नेय कोण मे रक्तिम आसन व फूलों से की जाती है वायु ,वरूण, (जल)आदि देवताओं की वायव्य कोण में और विष्णु, सूर्य, ऊषा आदि देवताओं की साधना आराधना ईशान कोण मे की जाती है ।
शास्त्रीय तंत्र साधना की विधियाँ अत्यन्त जटिल है। वे यहाँ उपलब्ध नही की जा सकती है

ISRO makes breakthrough demonstration of free-space Quantum Key Distribution (QKD) over 300 m


For the first time in the country, Indian Space Research Organisation (ISRO) has successfully demonstrated free-space Quantum Communication over a distance of 300 m. A number of key technologies were developed indigenously to accomplish this major feat, which included the use of indigenously developed NAVIC receiver for time synchronization between the transmitter and receiver modules, and gimbal mechanism systems instead of bulky large-aperture telescopes for optical alignment.

The demonstration has included live videoconferencing using quantum-key-encrypted signals. This is a major milestone achievement for unconditionally secured satellite data communication using quantum technologies.

The Quantum Key Distribution (QKD) technology underpins Quantum Communication technology that ensures unconditional data security by virtue of the principles of quantum mechanics, which is not possible with the conventional encryption systems. The conventional cryptosystems used for data-encryption rely on the complexity of mathematical algorithms, whereas the security offered by quantum communication is based on the laws of Physics. Therefore, quantum cryptography is considered as ‘future-proof’, since no future advancements in the computational power can break quantum-cryptosystem.

The free-space QKD was demonstrated at Space Applications Centre (SAC), Ahmedabad, between two line-of-sight buildings within the campus. The experiment was performed at night, in order to ensure that there is no interference of the direct sunlight.

The experiment is a major breakthrough towards ISRO’s goal of demonstrating Satellite Based Quantum Communication (SBQC), where ISRO is gearing up to demonstrate the technology between two Indian ground stations. Sorce :isro.govt.in

तत्त्वासार

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वास्तव मे सृष्टि मे एक ब्रह्म की ही सत्ता है जो विभिन्न रूपों मे अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए सभी रूप उससे भिन्न नही है बल्कि भ्रम के कारण आत्मज्ञान के अभाव के कारण ये भिन्न भिन्न प्रतीत होते है । इसी प्रकार शरीर भी भ्रम वश उससे भिन्न प्रतीत होता है तथा जिस भ्रम के कारण प्रतीत होने वाले की सत्ता नही होती ,जिस भ्रम से रस्सी मे सर्प दिखाई देता है किन्तु उसमे सर्प की सत्ता नही होती ,वह रस्सी ही है ।इसी प्रकार शरीर भी भ्रम मात्र ही है ।
जिनको ऐसी शंका होती है कि यदि ज्ञान से अज्ञान का मूल सहित नाश हो जाता है, तो ज्ञानी का यह देह स्थूल कैसे रह जाता है उन मूर्खों को समझाने के लिए श्रुति ऊपरी दृष्टि ऊपरी दृष्टि से प्रारब्ध को उसका कारण बता देती है वह विद्वान को देहादि का सत्य स्व समझाने के लिए ऐसा नही कहती ; क्योंकि श्रुति का अभिप्राय तो एकमात्र परमार्थ वस्तु का वर्णन करने से ही है।
ज्ञानी और अज्ञानी को समझाने की भाषा मे भिन्नता रखनी ही पड़ती है। जिस भाषा मे ज्ञानी अथवा विद्वान को समझाया जाता है उस भाषा मे मूर्ख को नही समझाया जा सकता ।उसको भिन्न प्रतीकों, उदाहरणों के द्वारा ही समझाया जाता है। इसलिए श्रुतियों मे प्रारब्ध को शरीर का कारण बताया गया है वह अज्ञानियों के लिए है। आत्मज्ञानी को यही कहा जाता है, कि सब कुछ ब्रह्म ही है तथा शरीर, प्रारब्ध आदि भ्रममात्र है जिसका को अस्तित्व नही है।
किन्तु अज्ञानी इसे नही मान सकता क्या कि वह शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है इसलिए उसको समझाने के लिए प्रारब्ध की बात कही गई है ज्ञानी के लिए प्रारब्ध जैसी कोई वस्तु ही नही है बल्कि सभी आत्मा ही है एवं आत्मा का कोई प्रारब्ध नही होता है ।
             यदा नास्ति स्वयंकर्त्ता,कारण, न जगत बीजम,।अव्यक्तं च परं शिवम, अनामा विद् यते तदा ।।
जब कोई कर्ता नही होता , कार्य के अभाव मे जगत की उत्पत्ति करने वाला कारण भी नही होता, तब वह सदा शिव एवं नाम रहित होता है ।
यह वर्णन अव्यक्त विभु परमतेजोमय शाश्वत तत्त्व के अनन्त फैलाव से तात्पर्यित है। एक परमतेजोमय , परम सुक्ष्म, कालातीत, भौतिक गुणों से रिक्त, निर्गुण, निष्क्रिय तत्त्व, जहां तक स्थान है वहाँ तक विधमान है। स्थान का कोई अन्तः नही इसलिए इस तत्त्व के अस्तित्व को भी कोई छोर नही है। यह अनन्त है कालातीत है सदा से है सदा रहेगा यह न जन्म लेता है न उत्पन्न होता है, न मृत होता है यही वैदिक परमात्मा का ही वर्णन है।
आत्मा को वैदिक संस्कृति सार के अर्थ मे लेती रही है इस तरह परमात्मा का अर्थ परमसार । इस सृष्टि का जो परमसार है, सृष्टि जिसमे उत्पन्न होती है उस परमसार तत्त्व मे न कोई कर्ता होता है, और नही कोई कर्ता के अभाव मे क्रिया होती है । यह उसकी अव्यक्त अवस्था है इस समय न सृष्टि मे बीज उत्पन्न होता ,न उसके कारण का अस्तित्व होता है। 
 

शंकर पर आरूढ़ जगज्जननी महाकाली की छवि रहस्य

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन

      पाश्चात्य अनुसन्धान कर्ता जो इस समय योग और तंत्र पर खोज कर रहे हैं, उनका कहना है कि योग-तंत्र-विज्ञान विशाल, अनन्त गहराइयों वाला समुद्र है जिसके जल की एक बूंद ही भौतिक विज्ञान है।
      यह सत्य है कि स्थूल और सूक्ष्म वायु में होने वाली ध्वनि- तरंगें एक समय नष्ट हो जाती हैं, परंतु सूक्ष्मतम वायु (ईथर) जो अखिल ब्रह्माण्ड में सर्वत्र समान रूप से व्याप्त है, में पहुँचने वाली ध्वनि-तरंगें कभी किसी काल में नष्ट नहीं होतीं।
     आधुनिक उपकरणों द्वारा ध्वनि को विद्युत्-प्रवाह में बदल कर उसको सूक्ष्मतम अल्ट्रासॉनिक रूप दिया जाता है। इसलिए इसी वैज्ञानिक विधि से रेडियो, वायरलैस, आदि का निर्माण हुआ था। बाद में उसका और विकसित रूप टेलीविजन का निर्माण हुआ जिसमें ध्वनि- तरंगों को प्रकाश-तरंगों में बदल दिया गया और जिन्हें चित्र-दर्शन के रूप में हम देखते है। ईथर में होने वाले कम्पन, आवृत्ति, फ्रीक्वेंसी की संख्या एक सेकेण्ड में 1048576 से 34359738368 तक होती है। जब कम्पन की संख्या अपनी निश्चित सीमा के बाहर बढ़ती है तो उन कम्पनों से एक विचित्र और आश्चर्यजनक अखण्ड प्रकाश का आविर्भाव होता है। जिसे वैज्ञानिक लोग X-Rays कहते हैं। ईथर में एक सेकेण्ड में इतने अधिक कम्पनों के उत्पन्न होने के कारण उनकी गति विलक्षण होती है। हम-आप उसकी इस विलक्षण गति का अनुमान इसी से लगा सकते हैं  कि रेडियो स्टेशन या दूर दर्शन- केंद्र के प्रसारण कक्ष में हो रहे संगीत के कार्यक्रमों को हम उसी समय सुन और देख लेते हैं जिस समय वहां कार्यक्रम हो रहा होता है। एक सेकेण्ड के हजारवें हिस्से जितना समय भी नहीं लगता है। ईथर के कम्पनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जहाँ अपने समान कम्पन पाते हैं, वहीँ आकर्षित हो जाते हैं। ईथर में पहुंचे हुए शब्दों के विशाल भंडार का कोई ओर-छोर नहीं है, वह अभी भी है और भविष्य में भी रहेगा। लेकिन ईथर के समुद्र में केवल सूक्ष्मतम ध्वनि ही प्रवेश कर सकती है, अन्य प्रकार की ध्वनियां वहां पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाती हैं।
      मानव सभ्यता के ही साथ-साथ तन्त्र-मन्त्र का प्रादुर्भाव हुआ। उनकी प्राचीनता उतनी ही है, जितनी कि मानव-संस्कृति की। इस विशाल विश्वब्रह्माण्ड में ईश्वर् की अद्भुत शक्तियां क्रियाशील हैं। भिन्न-भिन्न देवता तो उसकी शक्ति के प्रतीक मात्र हैं। इन्हीं देवताओं की कृपा प्राप्त करने के लिए मन्त्र का उपयोग नाना प्रकार से होता है। जिस फल की उपलब्धि के लिए घोर-कठोर श्रम करना पड़ता है, वही फल दैवीय कृपा से थोड़े प्रयास से ही सुलभ हो जाता है। मनुष्य सदा ही सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी सरल मार्ग की खोज में लगा रहता है। उसे पता है और विश्वास है कि कुछ ऐसे सरल उपाय हैं जिनकी सहायता से दैवीय शक्तियों को अपने वश में रखकर अपना भैतिक कल्याण और पारलौकिक सुख प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे ही सरल मार्ग हैं--मन्त्रों, यंत्रों के मार्ग जिनका संपूर्ण ज्ञान तंत्र-विज्ञान में उपलब्ध् है।
      यह विषय नितान्त रहस्यपूर्ण है। तंत्र-मंत्र की शिक्षा योग्य गुरु के द्वारा उपयुक्त शिष्य को ही दी जा सकती है। इस विद्या को गुप्त रखने का मुख्य उद्देश्य यही है कि सर्वसाधारण जो इसके रहस्य से अनजान है, अनभिज्ञ है, इसका दुरुपयोग न कर सके। लाभ होने की अपेक्षा हानि होने की ही आशंका अधिक रहती है।
      बल, शक्ति और क्रिया--इन तीनों को तंत्र में अति सूक्ष्मता से लिया गया है। इन तीनों को ही एक ही मूलतत्व-रूप परब्रह्म का रूप बतलाया गया है--

'परास्य शक्तिर्विविधेव श्रूयते 
       स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च्।'

       अर्थात्--पराशक्ति विविध प्रकार की बलशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति आदि के रूप में जानी जाती है जो अपने स्वाभाविक गुण-धर्म में विद्यमान रहती है।
       शक्ति जब सुप्त स्थिति में रहे तो वह 'बल' कहलाती है और बल जब कोई कार्य करने को तत्पर होता है तो वही 'शक्ति' बन जाती है। अन्त में वह क्रिया-रूप में बदल कर शान्त हो जाती है।शक्ति की ये तीन अवस्थाएं हैं। फिर नया बल जागृत होता है लेकिन याद रखना चाहिए कि बल, शक्ति और क्रिया अपने आश्रय-स्थल से अलग होकर प्रत्यक्ष नहीं हो सकती। बल और शक्ति अर्थात् स्थिर और अस्थिर शक्ति का संघर्ष तीसरे रूप 'क्रिया'  का जनक है। ऋण की ओर धन का प्रवाह स्वाभाविक है। इसी प्रकार *पौरुष पर आक्रमण करना शक्ति का सहज रूप है, सहज भाव है। अपने इसी भाव के फलस्वरूप पौरुष को हमेशा पराजित करना शक्ति का सहज धर्म माना गया है। शंकर पर आरूढ़ महाकाली की छवि कुछ इसी रहस्य की ओर संकेत करती है।*
     जब तक यह क्रिया के रूप में शान्त होती रहती है, तब तक पौरुष जागृत रहता है और जहाँ उपशान्ति का क्रम बन्द हुआ कि शक्ति तुरन्त पौरुष को पराजित कर उसे बलहीन बना देती है।
      प्रायः देखा गया है कि अत्यन्त बलवान मनुष्य की अजेयता को पराजित करने के लिए नारी-शक्ति का आश्रय लिया जाता है। *नारी में शक्ति है और पुरुष में बल।* पहली चंचला है और दूसरा है स्थिर। नारी से साक्षात्कार होते ही पुरुष में विक्षोभ होता है। यह विक्षोभ ही उसके निर्माण और नाश का कारण बनता है। महान् पुरुषों के जीवन के उत्थान में यदि नारी का सहयोग है तो दूसरी ओर उसके पतन का भी वही मुख्य कारण है। इसीलिये नारी को 'माया' कहा गया है। युद्ध और शान्ति--दोनों में नारी का हाथ है। युद्ध के बिगुल में यदि नारी का अट्टहास मिलेगा तो काव्य के शान्त छन्द में नारी के आंसू मिलेंगे। मतलब यह है कि शक्ति अपराजिता है, अजेया है और पौरुष के प्रति उसकी हर क्षण ललकार है-- 

      गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहम्।
     मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिष्यंत्याशु देवता।।
                    ---दुर्गा सप्तशती

     अर्थात्--रणांगण में रक्त की नदियां बहाती हुई महाकाली 'मधु' दानव पर हुंकार भरती हुई ललकारती हैं और कहती हैं 'हे मूर्ख मधु ! अभी गरज ले जितना गरजना हो, फिर अवसर नहीं मिलेगा। तब तक मैं मधु-पान करती हूँ। अभी इसी रणांगण में शीघ्र ही सभी देवता तेरी मृत्यु पर अपनी विजय-गर्जना करेंगे, अपना विजयोल्लास मनाएंगे।

चेतन मन और आत्मा के बीच अचेतन मन है।

पांच ज्ञानेंद्रयों की जो शक्ति है, वह मन की ही शक्ति है। 

मन की शक्ति से ही ये इन्द्रियां कार्य करती हैं। पर यह भी जानना ज़रूरी है कि मनःशक्ति द्वारा एक समय में एक ही इन्द्रिय कार्य करती है, दूसरी नहीं। 

गहरी सुप्त अवस्था में इन्द्रयों से मन का सम्बन्ध नहीं रहता है। स्वयं मन ही सभी इन्द्रियों का कार्य करता है उस समय। 

मन का एक रूप और है जिसे हम 'अचेतन मन' कहते हैं।

चेतन मन और आत्मा के बीच अचेतन मन है। 

चेतन मन और अचेतन मन आत्मा के ही अंग हैं। 

आत्मा परमात्मा का ही एक रूप है और उस रूप में समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति विद्यमान है। आत्मा कालातीत है। सभी अवस्थाओं में वह समान है। 

अचेतन मन एक विशेष सीमा तक आत्मशक्ति को क्रियान्वित करता है। 

यही कारण है कि वैज्ञानिक अचेतन मन को अलौकिक शक्ति का भंडार कहते हैं। 

जब हम कभी ऐसी स्थिति में होते हैं तो उस समय हमारे चेतन मन से आत्मा का सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। फलस्वरूप भावी घटनाओं का संकेत और पूर्वाभास होता है।

चेतन मन का सम्बन्ध लौकिक जगत से है और अचेतन मन का सम्बन्ध पारलौकिक जगतों से है। 

योगिगण ध्यानयोग के द्वारा चेतन मन की शक्ति को क्षीण कर देते हैं जिसके फलस्वरूप अचेतन और उसके बाद आत्मा से उनका सीधा संपर्क स्थापित हो जाता है। 

योग का जो चमत्कार है उसका सम्बन्ध योगी के अचेतन मन का कौतुक होता है। आत्मा से सम्बन्ध स्थापित होने के कारण योगिगण लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करते हैं और पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।

Vaidic Vigyaan

स्वयं की खोज

समाधि में साधक  ध्यान से ही जाएगा। ध्यान है परम संकल्प। ध्यान का अर्थ समझ लो। ध्यान का अर्थ है, अकेले हो जाने की क्षमता। दूसरे पर कोई निर्भरता न रह जाए, दूसरे का खयाल भी विस्मृत हो जाए। सभी खयाल दूसरे के हैं। खयाल मात्र पर का है। जब पर का कोई विचार न रह जाए, तो स्व शेष रह जाता है। और उस स्व के शेष रह जाने में स्व भी मिट जाता है, क्योंकि स्व अकेला नहीं रह सकता, वह पर के साथ ही रह सकता है। जिस नदी का एक किनारा खो गया, उसका दूसरा भी खो जाएगा। दोनों किनारे साथ-साथ हैं। अगर सिक्के का एक पहलू खो गया, तो दूसरा पहलू अपने आप नष्ट हो जाएगा। दोनों पहलू साथ-साथ हैं। जिस दिन अंधकार खो जाएगा, उसी दिन प्रकाश भी खो जाएगा।

ऐसा मत सोचना कि जिस दिन अंधकार खो जाएगा, उस दिन प्रकाश ही प्रकाश बचेगा। इस भूल में मत पड़ना, क्योंकि वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जिस दिन मौत समाप्त हो जाएगी, उसी दिन जीवन भी समाप्त हो जाएगा। ऐसा मत सोचना कि जब मौत समाप्त हो जाएगी तो जीवन अमर हो जाएगा। इस भूल में पड़ना ही मत। मौत और जीवन एक ही घटना के दो हिस्से हैं, अन्योन्याश्रित हैं, एक-दूसरे पर निर्भर हैं। तो जब पर बिलकुल छूट जाता है, तो स्वयं की उस निजता में अंततः स्वयं का होना भी मिट जाता है, शून्य रह जाता है। ध्यान की यही अवस्था है, उसको हमने समाधि कहा है।

ध्यान साधना:______
                          ध्यान साधना करते हुए अपने योग केअस्तित्व को महसूस करने के लिए मन से लड़ना बंद कर देना चाहिए।शरीर और मन की क्रियाओं को साक्षी भाव से देखने की कोशिश करते रहें। आपके अन्दर अपने-आप एक दैवीय घटना घटने लगेगी। और किसी भी समय अचानक से आपके अन्दर उर्जा का तेज तेज प्रवाह मूलाधार से सहस्रार तक महसूस होने लगेगा।इस प्रवाह से अपने अलौकिक अनुभव से अपने भीतर तक अंनत शान्ति और स्थिरता में डूब जाने जैसी स्थिति बनेगी। ध्वनि  प्रकाश  और कम्पन इतना गहन होता जाएगा।कि उस समय लगेगा की उनका शरीर छूट जा रहा है।वह एक मृत्यु के समान अनुभव होता है। जिसमें परम आनंद का अनुभव भी किया जाता है।उसी क्षण से सतत् स्थिरता की अनुभूति होती है।आगे चलकर प्रकाश ,ध्वनि,सब बदल जाएगा पर एक स्थिरता सतत् बनी रहती है।वह कहीं आती जाती नहीं।उस समय भी थी अब भी है हमारा आत्मस्वरुप, जो कभी बदलता नहीं वहां बस एक ही एक है।उसकी हर समय अनुभूति बनी रहेगी।

नींबू अदरक युक्त गन्ने का रस

ये नींबू, अदरक युक्त गन्ने का रस है, जो यूपी के दारोला मेरठ से कई देशों को निर्यात किया जा रहा है। पर हमारे यहां लोग कोकाकोला, पेप्सी और थम्सअप जैसे हानिकारक पेय पदार्थ पीकर गर्व का अनुभव करते हैं। हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली इन विदेशी कंपनियों का बाय बाय कहकर गन्ने का रस और शिकंजी पीना चाहिए। इससे ना सिर्फ हमारा करोड़ो रुपया पेय पदार्थ के नाम पर विदेश जाने से बच जाएगा, वही दुसरी और हमारे देश के ही गरीब भाईयों को रोजगार भी मिलेगा। 

एक भारत - श्रेष्ठ भारत

नोट- इस पोस्ट का मतलब केवल यह बताना है के हमारे पास ताजा गन्ने का रस आदि आसानी से उपलब्ध है हमे उसका सेवन करना चाहिए , विदेशों मे ऐसी सुविधा नही इसलिए उन्हे बोतलबंद मंगवाना पडता है।

सप्तशती और गीता

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श्रीमद्भागवत गीता अर्थात श्री भगवान श्री कृष्ण ने गायी यद्यपि गीता एक उपदेश है फिर भी उसे गीता लयबद्ध रचना कहा गया है क्योंकि कर्म के दुस्तर सागर के ऊपर तैर रहा है वह निष्काम कर्म योग का उपदेश है जिसमें गान का सा माधुर्य है लय है वह तिरंगावलियों से ऊपर उठकर कर्मवीचियों के नर्तन को देखते रहने का दृष्टा भाव भी है। ऐसी अवस्था ज्ञान की ही होती है और आश्चर्य यह है aकि इस गीत को अतीव चंचल तथा घटना प्रधान समरांगण में गाया गया है बांट के टुकड़े को बंसी बनाकर आये रागपुरुष के लिए ज्ञान ही एकमात्र शैली है वह पूर्ण पुरुष राग में ही व्यक्त हो सकता है इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि  तटस्थभाव का सोदाहरण विवेचन कर्म संवेग में अच्छी तरह समझ में आ सकता है।
गीता वेदांत का ग्रंथ है इसका प्रमुख पात्र अर्जुन है मोह के आवेश में से उत्पन्न अवसाद अर्जुन को अक्रांत कर देता है उसके प्रश्नों में उत्सुकता नहीं है एक निराश भाव है जो कृष्ण से सीधा उत्तर मांगता है इस जय पराजय से क्या होना है यह व्यर्थ का रक्त पात्र अन्ततः किस लिए यह भविष्य में आहत और वर्तमान से पूछता है कि कृष्ण काल पुरुष है उसमें कर्मसमारंभ की परिणामी स्थितियां समाविष्ट है sवह समाविष्ट के नायक हैं वे जानते हैं इसलिए भावीपरिस्थितियों का अवलोकन कर निर्णय सुनाते हैं।
सप्तशती के समाधि सूरथ अपनी वर्तमान मनोदशा से क्षुब्ध है उनके प्रश्नों में कुतूहल है उदासीनता उनमें नहीं है उनका उपद्रष्टा मुनि है उनके मोह की मीमांसा करने के लिए मुनि उपाख्यानों को उदाहरण के रूप में सुनाता है सप्तशती का #मोह्यन्ते_मोहिताश्वैव_मोहमेष्यन्त्_चापरे ( मुक्त कर रही हूं मोहित करती रही हूं और मोहबद्ध करती रहूंगी) मोह को त्रिकाल व्यापृत करने वाली परमेश्वरी का भविष्य काल अर्जुन में हैh अर्थात अर्जुन भविष्य की चिंता से अवसन्न है और मोहिता का भूतकाल समाधि सूरथ के चरित्र में व्यक्त है प्रकृति की गुणात्मक अवस्था व्यक्ति में ही प्रवृत्त है और समष्टि में भी।
समष्टि मैं वह हर युग का नामकरण करती है जो व्यक्ति में अवस्था का निर्धारण करती है यदि वर्तमान अपने से प्रसन्न करने लगे उसकी जिज्ञासा विवेकोन्मुख हो तो एक रहस्य का अनावरण होता है प्रकृति का चरम तो नहीं पर उसकी शैली का भी परिचय प्राप्त होता है इस दृष्टि से गीता और शक्ति दोनों का बुद्ध एक है गीता का ज्ञान योग की भूमिका प्रस्तुत करती है सप्तशती भक्ति के सुरम्य उपवन से ही होकर परमेश्वरी की कृपा का प्रसाद प्राप्त कर आती है।
गीता का ज्ञानयोग व्यष्टि मे समष्टि दर्शन कराता है सप्तशती का कान्तासम्मित उपदेश समष्टि में व्यष्टि का दर्शन कराता है अर्जुन के मोहपाश को छिन्न करने के लिए भविष्यबद्ध उनको फ़लासक्ति से मुक्त रहने के लिए कृष्ण का उपदेश एक शाश्वत सत्य है कहीं लोग प्रशन्न करते हैं फलहीन कर्म करने में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती फिर फल को परार्पित करके कोई व्यक्ति कर्म करेगा तो करेगा ही कैसे?
कृष्ण का समाधान दुरूह नहीं है दुरूह तब लगता है जब व्यक्ति की बुद्धि मोहमलाच्छन्न रहती है कर्म के साथ ही उसका परिणाम किवां फल नियत हो जाता है कोई भी काम एक साथ नहीं होता क्रमशः होता है इसलिए कर्म का जितना अंश होता जाता है फल भी उतने ही अंश में बनता जाता है oमाना हमें खीर बनानी है खीर एक साथ नहीं बनती दूध लाना भी खीर बनने का एक स्तर है चुल्हा जलाना दूध औटाना आदि सारे कर्म खीर बनने के स्तर हैं इन सभी की संपूर्णता खीर का पूरा तरह बन जाना है।
कर्ता का स्तर अथवा पात्रता कर्म विधि कर्म की मात्रा इत्यादि इस प्रकार के आधार हैं जो संपूर्ण होने पर ही अपेक्षित फल प्रकट करते हैं इसलिए कर्म के साथ परिणाम ही फल  समवायीभाव से जुड़ा हुआ है उसे कर्म से भिन्न करके देखना मुग्धता नहीं तो और क्या है दूसरी बात यह है कि जब व्यक्ति फल पर केंद्रित हो जाता है तो उसमें कर्म से अधिक फल में रूचि हो जाती है परिणाम यह होता है कि कर्म का स्तर गिर जाता है।
सप्तशती में कर्म की व्याख्या नहीं है उसमें क्रियामयी प्रकृति की शैली का निर्देशन है दोनों ही ग्रंथ व्यक्ति को मोह एवं अहंकार से रहित होने का निर्देश देते हैं अर्जुन को शरणागत होने का उपदेश कृष्ण करते हैं समाधि सूरथ को असुरों का उपाख्यान मुनि कहते हैंk रक्तपात दोनों में है मोह की परिणति ऐसी ही होती है जहां बलि देने की प्रथा प्रचलित है वहां जब तक मेध्य  पशु चित्कार नहीं करता घातक खड़ंग नहीं उठाता आशय यह है कि परमा की असिपात पशु पर मोह नही होता है।
जहां मोह अपने पूर्ण बल से प्रकट हुआ ही नहीं वही उसकी असिधार चमकी नहीं सप्तशती के रक्तरंजित आख्यान मोह और दर्प के ध्वंस की ही कथा है इनके रहते पराम्बा का रूप दर्शन कैसे हो सकता है असुरो के रूप में प्रसृत मोह और अंहकार की वाहिनी को वह  अव्यवस्था उत्पन्न करने के लिए निर्बंन्ध कैसे छोड़ सकती है।
उसके दिव्य वैभव और अतुलनीय ऐश्वर्य का दर्शन मोह से मुक्त होकर ही किया जा सकता हैk चण्जऔर मुंण्ड देवी के अपरूप सौंदर्य को देखकर मोहित हो जाते हैं
 और उसे स्त्रीरत्न को अपने स्वामी के रतनागार में ले जाने के लिए आतुर हो जाते हैं इस प्रचंड मोह का विनाश करने के कारण ही वह चंण्डी और चामुंण्डा बनती है स्त्री के रूप में पाने को अकुल शुंभ निशुंभ में मूर्ख ही निवास कर रहा है और वो की अनर्गल विस्तृति उसके लिए 

आत्मा और ध्यान की साधना

जब आत्मा ध्यान की साधना के द्वारा निखर जाती है तो वह परमात्मा मय हो जाती है। तब उसमें तीन गुण आ जाते हैं। 

 प्रकृति का गुण जड़ता यानी सत्यता, यह शरीर सत्य है जो परीवर्तनशील है।  यह परमात्मा का एक गुण है। सत्य अर्थात जो परीवर्तनशील हर पल नया है।

 दूसरा गुण मन की चेतनता  यानी जागरुकता तीसरा गुण आनन्द है इसलिए इसे सत्य-चित्त-आनन्द कहते है।

 और इस सत्य चेतना यानी आत्मा के आनन्द को प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम उदेश्य है, और इसको जानने के बाद जो उपलब्ध होता है। 

इसका सार रहस्यपूर्ण अगोचर अदृश्य आनन्द जिसे मैं चोथी सत्ता कहता हूं। वैज्ञानिक भी एक चोथी सत्ता को स्वीकार करते है जिसे वह क्वार्क के नाम से जानते है। 

जिस प्रकार दुध से दही, दही से छाछ और छाछ से घी निकलता है। यह सब मथने के बाद मिलता है। बिचार मंथन करना है शरीर जो दुध की तरह से है। इसको पहले समझना होगा जो अपना पहला चरण है।    

    परमात्मा तो हम सब के प्रत्येक प्राणी के अन्दर विद्यमान है। यदी हम सब को ऐसे देखे की सब में परमात्मा है। तो हम सव का ऐश्वर्य ही बढें ।

और इसके विपरीत देखते है तो वही होती है जो उस मठाधीस और उस आश्रम का हुआ था।

 यही हम सब के साथ भी हो रहा है। अपने दृष्टिकोण को बदलते ही सृष्टि जगत बदल जाता है।  
  
  इस शरीर में कुल आठ चक्र हैं जिसे योगी जाग्रीत कर लेते है वही आठों जगह आत्मा का केन्द्र है जहां से आत्मा मुख्यतः जुड़ती है उन्हीं आठ स्थानों को चक्र के नाम से जानते है।

 पहला मूलाधार जो मानव लिंग के पास होता है जो सामान्य जन होता है उनकी आत्मा शरीर छोड़ते समय उसी से निकलती है। 

दूसरी बात जब पुरुष स्त्री के गर्भ में अपने विर्य को सिचंन करता है। वह उसी चक्र के जाग्रत होने से ही होता है। जिसका वह चक्र जाग्रत नहीं होता है वह नपुसंक होते है। उनमें बच्चा पैदा करने की क्षमता नहीं होती है।

 आत्मा के निकलने और भी कई मार्ग है जैसे दूसरा चक्र स्वाद्धिठान है जो लिंग के उपर और नाभी के निचे होता है।

 तीसरा मणीपूरा है जैसा की नाम से ही प्रतित हो रहा है यह मणी कै केन्द्र है। यह मणी हीरा-मोतीयों वाला नहीं है। 

इसी चक्र से आत्मा नाभी से जुड़ी होती है, जिससे बच्चा मां की गर्भ में जुड़ा होता है एक पतली नालि से जिसको जन्म के बाद काट दिया जाता है।

 पुनः बच्चा अपनी नाक, कान, आंख, गुदा, जनेन्द्रिय आदि इन्द्रियों का प्रयोग करता है।

 जन्म से पहले मां के साथ बच्चा उस नाल से एक होता है वह अपनी इन्द्रियों का पहली बार करता है। इसलिए ही इस चक्र को मणीपूरा कहते है।

 चौथा चक्र हृदय के पास होता है। हम यहां पर के एक सरसरी नजर से देख रहें है जबकि उसके बारें में जानते है. और उसको साध लेते है वह आनन्द को उपलब्ध होते है। 

 वह मानव औरों की तुलना अधीक स्वाभाविक जीवन्त और प्रसन्नचित्त रहता है।

 प्राण हीलिंग चिकित्सा का आधार यही चक्र है यह पद्त्ति चिन में बूहुत अधीक प्रचलित है।

 बह सब इसका दावा करते है कि किसी भी प्रकार की बिमारी का इलाज वह चक्रों के माध्यम से कर सकते है जो चक्रों को जाग्रत करके करते है।

 इसमें पूण्यता और आन्तरिक स्वच्छता की काफी आवश्यक्ता पड़ती है। और मैं कहता हूं की मनुष्य की सारी बीमारी का इलाज ध्यान के माध्यम से कर सकता हूं।

 क्योंकि यह आध्यात्मिक शक्ति है जिसका सुबिधा पूर्वक प्रयोग करके वह सब कुछ किया जा सकता है जिसकी जीवन में तृष्णा है। 

पाचंवा चक्र गर्दन के पास काक कुर्णुम पतन्ञजली इसके बारें में कहते है योग दर्रशन में बिस्तार से किया है उस पर भी विचार आगे किया जायेगा।

 छठा महत्त्वपूर्ण चक्रों में से एक है जिसे आज्ञा चक्र कहते है यह दोनों आखों के मध्य में भ्रुमध्य ललाट जो सामने मस्तक के केन्द्र में यह बहुत जल्द जाग्रत किए जा सकते है। 

जिसे शिव नेत्र के नाम से पुकारते है या कहा जाता है। सातवां चक्र कपाल खोपड़ी के आगे होता है जिसे ब्रह्मरन्ध्र भी कहते है, और अन्तिम आठवां चक्र जिसे सहस्रत्र कमल कहते है।

 यह हमारें सर के बिल्कुल मध्य में जहां पर हिन्दुओं की चोटी होती है। इसका अपना ही आनन्द और रहस्य है। आन्तरीक जगत की ओर एक संकेत है।

 इसलिए लोग आज भी इस परम्परा को श्रद्धा के साथ रखते है। इस चक्र परम्परा का प्रारम्भ यही से हुआ है। इसकी खास बात यह है की इससे जिस मनुष्य की चेतना निकलती है तो वह मोक्ष निर्वाण को उपलब्ध होता है।

 हमारी रीढ़ की हड्डी  में दो नाणीयां मुख्य होती है इनको इंगला पिगंला के नाम से जाना जाता है। उनके मध्य एक सुक्ष्म नाड़ी होती है। 

जिसे सुक्ष्मणा कहते है। इसी नाड़ी में सारें आठ चक्र होते है। इसको जाग्रत करने के लिए कुण्डली को जाग्रत करना पड़ता है। 

जब   कुण्डली ध्यान के प्रयोग से जाग्रीत हो जाती है। तब आत्मा जो अधोगती करती थी वह उर्ध्व गती करने गती है, और मृत्यु के समय जा ग्रत  होकर ध्यानस्त हो कर सहष्त्र कमल से नीकलती है।

 जिससे मोक्ष या मुक्ति निर्वाण को उपलब्ध होता है। अपनी आत्मा जो दूसरी बात कह रही है इस मंत्र में वह है। अग्निनाग्निः समिध्यते।

 अग्नि के द्वारा अग्नि भली प्रकार चमकती है अर्थात प्रेम से प्रेम बढ़ता है और शत्रुता से शत्रुता ही बढ़ती है ज्ञान से ज्ञान और अज्ञान से अज्ञान ही बढ़ता है।

   नौ द्वार अर्थात यह शरीर नौ द्वारों वाली है। जहां पर देवता रहते है उनके देख रेख में इन सारे द्वारों से जो सब कुछ आता-जाता है उसका सारा कार्य होता है, और इसे पुरी अयोद्धा के नाम से जानते कहते है। 

अर्थात यह शरीर एक सामराज्य की तरह है। जिसका मंत्री मंत्रो को जानने वाला मन है। और इसका राजा आत्मा है।

 और इन्द्रिया इसकी प्रजाए है जिसमें पांच मह तत्त्व यानी अग्नी, वायु, पृथ्वी, आकाश, जल, जिससे यह स्थुल शरीर बना है।

 पांच कर्म इन्द्रियां हाथ, पैर, गुदा, लिंग है। जो कर्म करते है आत्मा के लिए। पांच ज्ञानेन्द्रियां है आख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, इनसे आत्मा को ज्ञान प्रप्त होता है।

 सोलहवां मन और सत्रहवां बुद्धि है। शरीर माद्धयम खलु धर्रम साधनम् । यह शरीर सबसे बड़ा धर्म को अर्जीत कमाने वाला साधन रूपी भौतिक धन है।

 शरीर भी पांच प्रकार के बताए गए है। अन्रमय का तैत्रीय उपनिषद की ब्रह्मानन्द बल्लि के दुसरें अनुवाक में किया गया है और वह अन्यमय हमारा पाचंवा शरीर है।
 
तस्माद्वाएतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्रतरप्राणमयःतेनैषपूर्णः।

   अर्थात उस प्रतिपादन किये गये अन्न रस के बने हुए शरीर के अन्दर और शरीर से अलग प्राण तत्त्व है। 

इस प्राण तत्त्व से शरीर पूर्ण है। यह प्राणमय भी एक कोस है। जो अन्नमय कोस से भी सुक्ष्म रूप से शरीर में व्याप्त है।
   तस्माद्वाएमस्मात्प्राणमयादन्योंऽन्तरआत्मामनोमयःतेनैषपूर्णः।।  

   अर्थात उस प्राणमय कोश के अन्दर उससे अलग उससे सुक्ष्म आनन्दमय कोश है। यह पांच प्रकार की स्थुल से सुक्ष्म शरीर है।  
   
                                           

गुलाब की खेती करने वाले कृषक जय नारायण सिंह जी की वार्ता

  गुलाब की खेती करने का समय 15 नवम्बर  से लेकर 15 जनवरी के बीच जब टम्प्रेचर  5 या 7 डिग्री  रहता है तभी लगाया जाता हैलगानै की बिधि 
1,,खेत मे बर्मी कम्पोष्ट, या नेडफ कम्पोष्ट  या सडी गोबर की खाद प्रति एकड 25 ट्राली के हिसाब से  डालकर खेत की खूब गहरी जुताई करदे।
2,,फिर खेत मे लाइन से लाईन की दूरी व पौध से पौध की दूरी करीब 1मीटर की बनाकर खेत मे गड्ढे 1फुट गहरे खोद दे
3,, गड्ढे करीब 10 दिन तक खुदे हुये पडे रहने दे ताकि गड्ढे में  खूब  धूप लग जाये और गड्ढे की खुदी हुई मिट्टी भी खूब सूख जाये ताकि मिट्टी के बीमारी वाले बैक्टीरिया  मर जाये।।
4,,इसके  बाद पौध की ब्यवस्था  कर ले एक एकल मे 5500 गड्ढे खोदेगे और 5500 पौध की ब्यवस्था  करनी होगी।। 
5,,, जब पौध आ जाये तो लगाने के समय गड्ढे मे प्रति गड्ढा 50 ,,50 ग्राम दीमक की दवा डाल देइसके बाद प्रति  गड्ढे मे 100,,100 ग्राम डी ए पी की खाद डालदे इसके बाद पौध को गड्ढे में  रखकर  बर्मी या नूडल या सभी गोबर की खाद उसी गड्ढे की जो खुदी हुई मिट्टी  पनि है उसी मे खाद मिलाकर गड्ढे को भर दे जब पूरे खेत मे पौध लग जाये तो तुरन्त  पीछे सेखेत को पानी से खूब भर दें इसके बाद 15 दिन बाद  खेत मे पानी पुनः लगा दे यह ध्यान  दे कि खेत मे दराज न आने पाये यानी खेत सूखे न पाये यह बिषेश ध्यान देना है  इसके बाद  खेत की  निराई गुड़ाई  करना है  इसके बाद 15 मार्च से  लगभग एक एकड मे करीब 5 से 10 किलो फूल प्रति दिन निकलना  शुरू हो जायेगा और खेत मे निराई गुड़ाई और सिचाई की ब्यवस्था  समय समय पर करना है ।
6,,एक एकड खेत गुलाब लगाने मे गोबर की खाद,  डीएपी खाद  ,दीमक की दवा, तथा जुताई,  व गड्ढे की खुदाई,  व पौध की कीमत सभी कुछ की कुल लागत करीब 30 से 35 हजार रुपये आयेगी इसके एक खेत मे करीब 15 वर्ष  तक बराबर फसल देता रहेगा सिर्फ  प्रति तीसरे वर्ष गुलाब की कटिंग कराते रहना पडेगा  और कटिंग का समय भी 15 नवम्बर से 15 जनवरी  के बीच कटिंग  हर हाल मे  करवा देना है और जैसे ही फसल की कटिंग करेगे तो गड्ढे की मिट्टी बाहर करके गड्ढे मे बरमी कम्पोष्ट  या सडी गोबर की खाद फिर से भरना है और मजदूर से खेत की फावडा से गुड़ाई करवा दे जब कटे पौध मे किल्ले करीब 9 ,,9,,इंच के आ जाये तो खेत मे पानी लगा दे उसके 2माह बाद  किल्ले से फूल  आना प्रारम्भ  हो जायेगा  इसी तरह से गुलाब की फसल को करना है।। 
7,, एक एकल गुलाब के खेत प्रति वर्ष   निराई गुड़ाई व सिचाई तथा खाद का कुल खर्च  लगभग 25 से 30 हजार रूपये खर्च आयेगा और शुद्ध  लाभ प्रति एकड प्रति वर्ष करीब करीब 1 लाख 50 हजार से 1 लाख 60 हजार रुपये की बचत सब खर्च निकाल देने बाद शुद्ध मुनाफा  होगा  ।।
8,, अब जहाँ पर किसी को  कुछ संदेह हो तो मुझसे फोन पर सम्पर्क  करके जानकारी प्राप्त कर ले मेरा फोन नम्बर  9956175862 है इस नम्बर  पर हमसे सम्पर्क  करके जानकारी प्राप्त करें  मेरा नाम जय नारायण सिंह सेंगर  ग्राम पंचायत भारू विकास खण्ड बिधनू जनपद कानपुर नगर  है धन्यवाद

सृस्टि का परमतत्व

सृस्टि का परमतत्व चैतन्य है। वेदान्त उसे ईस्वर कहता है। साख्य दर्शन उसे पुरुष कहता है। तथा तंत्र शास्त्र उसे शिव कहता है। 

यह सृस्टि उसी चैतन्य तत्व की शक्ति है। जिसे वेदान्त मायाशक्ति कहता है। साँख्य इसी को प्रकृति कहता है। तथा तंत्र शास्त्र इसे भैरवी कहता है। तथा शिव को भैरव भी कहा जाता है। यह भैरबी शक्ति अपनी परावस्था में शिव से अभिन्न रहती है। एकाकार रहती है।

किन्तु अपनी अप्रवस्था में यह सृस्टि की रचना करती है। शरीरो में यही शक्ति प्राणों के रूप में सभी जीवधारियों में विद्यमान रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है प्राणों की इस शक्ति से सभी जीव धारिया प्राणी जीवन प्राप्त करते है।

प्राणों के निकल जाने पर वे म्रत्य घोषित कर दिए जाते है अतः जीवन का आधार यही प्राण शक्ति है। यह प्राण शक्ति चेतन तत्व शिव की ही शक्ति है। किंतु चेतन तत्व केवल ज्ञान स्वरूप है। वह क्रिया नही करता सभी क्रियाये उसकी शक्ति से ही होती है।

शरीर मे यही प्राण शक्ति स्वास परस्वाश के रूप में कार्य करती है। योग शास्त्रो में इसी को रेचक पूरक व कुम्भक कह जाता है। स्वाश परस्वाश की यह क्रिया इस परादेवी का ही स्पंदन है।

यह क्रिया ह्रदय से आरम्भ होकर ऊपर द्वादशान्त तक अर्थात नासिका से बाहर निकल कर बाहर अंगुल दूर तक जाती है। तो इसे प्राण कहा जाता है तथा द्वादशान्त से भीतर ह्रदय तक आने वाले स्वाश को जीव नामक अपान कहा जाता है।

यह परादेवी निरंतर इसका स्पंदन करती रहती है। यह परादेवी विसर्ग स्वभाव वाली है। यही आंतर व बाह्य भावों में सृस्टि करती है। शरीरो में अथवा सृस्टि में जो भी स्पंदन है हलचल है। वह सब इस शक्ति के कारण है।

जहा कोई स्पंदन नही है। कोई हलचल नही है।ऐसी शांत अवस्था ही चैतन्य शिव का स्थान है। जहाँ प्राण तत्व भर निकलता है। और अपान जा आरम्भ नही होता है। तो इन दोनों के बीच मे जो थोड़ा सा अवकाश रहता है। यही शिव का स्थान है। जहाँ कोई हलचल नही होती इसपर ध्यान केंद्रित करने पर यह अवकाश लंबा हो जाता है।

और इसी में उस चैतन्य स्वरूप शिव की अनुभूति होती है। इस प्रकार जब ह्रदय में अपान वायु का अंत होकर प्राण वायु का उदय होने के मध्य जो अवकाश है उसका ध्यान करने से योगी की शिव की अभिब्यक्ति हो जाती है।

प्राण का अंदर आना व बहार जाना इसका स्वाभाविक कार्य है। जो इस पराशक्ति का ही स्पंदन  है। द्वादशान्त तथा ह्रदय में ध्यान करने से सभी तरह की उपाधियां का विस्मरण हो जाता है। तथा में ही शिव हु या में ही ब्रह्म हु (  अहम ब्रह्मास्मि) इस प्रकार की अनुभूति हो जाती है। और यही शून्य स्थान है।

ओउम

आदि योग

सप्तशती के प्रयोग

{{{ॐ}}}

                                                            

अनेक बार अनेक तरह की बात का स्पष्टीकरण दिन कर देने के बाद भी कुछ भाग्यवादी ऐसे मिल जाते हैं जो भीतर से उत्तेजित कर देते है उत्तेजित इसलिए कि भाग्यवाद के सिद्धांत को पूरी तरह समझे बिना वह एक प्रतिबद्धता प्रमाणित करते हैं aकर्म नहीं कांड करते हैं वाद को समझाने वाला भाग्य को स्वीकार नहीं करेगा पर केवल भाग्य को ही सर्वस्व मानने वाला कर्म के यथार्थ को नहीं समझता यह निश्चित है।
इसमें कोई संशय नहीं कि देश श्रंखला के कर्म से मनुष्य के रूप में जो रचना है वह संपूर्ण है समर्थ है और स्वतंत्र भी है मनुष्य तक जितने देह हैं वह सब बद्ध हैं उतना ही शारीरिक स्तर पर भी और बौद्धिक स्तर पर भी जितनी बुद्धि विकसित है उतना ही देह परिमार्जित है दुख तब होता है जब हम भाग्य की पूजा करते हुए प्रकृति का अपमान करते हैं अपमान इस तरह की यह उन्नत दे देकर प्रकृति ने हमें कर्म करने की स्वतंत्रता दे दी है और हम उस स्वतंत्र का पता का उपयोग न कर के भाग्य के अधीन समझ बैठते हैं।
लोग दही का व्यापार करते हैं वह दूध के बारे में जानते हैं तो हैं पर विश्वास दही पर और उसके समर्थन एक अन्य स्थितियों एवं शैलियों पर ही करते हैं sवे मानते हैं कि अच्छे दही के लिए बढ़िया दूध रहा करता है पर उनका ध्यान दही पर ही घूम फिर कर आ टिकता है हम जानते हैं कि भाग्य के रूप में जो प्रस्तुत है वह कर्म का ही परिणाम है कर्म हमारा ही था भाग्य भी हमारा ही रहेगा।
भाग्यवादी भाग्य को अपरिहार्य मानते हैं पर केवल भाग्य की परीक्षा करने को भी अनावश्यक भी कहते हैं कि उनकी दृढ़ धारणा है कि भाग्य को बदला नहीं जा सकता कृष्ण भगवान अपना निर्णय सुनाते हैं कि शुभ अथवा अशुभ रूप से में जो कर्म हम कर चुके हैं उसका फल हमें भोगना ही होगा यह प्रकृतिक आवश्यक व्यवस्था है इससे अस्वीकार या असहमति नहीं हैk पर कर्म का बल भी एक प्रकृतिक व्यवस्था है।
हम भाग्य को बदलने की बात नहीं करते प्रत्यूत प्रतिभाग्य अथवा समांतरभाग्य की कहते हैं मनुष्य में यह सामर्थ्य है कि वह चाहे तो बेहतर भाग्य का निर्माण कर सकता है यह कर्म स्वतंत्र यह मान लेते हैं की विशेषता है कर्म पर इतना विशद गंभीर विवेचन करने वाले भारतीय वांग्मय में मनुष्य तक किसी अन्य देहधारी की को तपस्या करते नहीं बताया गया है।
इसका कारण यह नहीं है कि सारा कर्म शास्त्र एवं साधन मार्ग मनुष्य की ही गवेषणा है बल्कि इसलिए है की अन्य देही की रचना एवं रचना अनुसार बुद्धि का विकास होता है और उस स्तर पर जीव के कर्म को समझ पाता है ने कर्म को करने में स्वाधीन रहता है।
कौवा लाख प्रयत्न करके भी का एक अक्षर ही बोल पाएगा का काली नहीं कह पाएगा यह दृश्य व्यवस्था और बुद्धि के स्तर को भी सूचित करती है पुराणों में नहुष स्वर्ग जाना चाहता है उसके परोहित एवं कुलगुरु उसे मना कर देते हैं वह विवश होकर विश्वामित्र के पास जाता है 
विश्वामित्र वशिष्ठ से के से विपरीत है क्योंकि वशिष्ठ भाग्य के रूप में इसमें कर्म  स्वर्ग जाना चाहता है उसके प्रवाहित एवं कुल गुरु से मना कर देते हैं वह विवश होकर विश्वामित्र के पास जाता है विश्वामित्र वशिष्ठ से विपरीत है क्योंकि वशिष्ठ भाग्य के रूप में इस में कर्मफल को महत्व देते है।
और विश्वामित्र कर्म बल की स्थापना करते हैं नहुष की कातर प्रार्थना सुनकर विश्वामित्र उसे अपने उत्कृष्ट बल के आधार पर सहदेह स्वर्ग भेज देते हैं नहुष विश्वामित्र की शक्ति से चमत्कृत एवं आभार मान होकर वशिष्ठ की निंदा करने लगता हैo इस पर देवराज कुपित होकर कहते हैं गुरु की निंदा करने वालों के लिए स्वर्ग में कोई स्थान नहीं है इसके साथ ही नहीं इस धरती पर आने लगता है विश्वामित्र उसे देख वही अधर में रोक देते हैं।
बलिष्ठ विश्वामित्र एक नई सृष्टि रचने लगते हैं उनके इश्क उपकरण से सभी स्तब्ध रह जाते हैं इंद्र स्वयं आकर पानीपत पूर्वक उन्हें निवेदन करता है कि भगवान आपके आदेश की अवहेलना करने का साहस किसमें है मैं आपका ज्ञानू चार हूं आप चाहे सारे मनुष्य को स्वर्ग में सहदेह भेज देंh पर इससे मर्यादा लुप्त हो जाएगी संसार में के सारे व्यवहार मर्यादा से बद्ध है यह ही टूट जाएगी तो फिर सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
विश्वामित्र बोले इंद्र तेरी व्यवस्था का अतिक्रमण में कहां कर रहा हूं तेरे स्वर्ग की मर्यादा का तू पालन कर मैं सभी कुछ नया और इससे उत्तम बना रहा हूं यह मैं कर सकता हूं विश्वामित्र की हद को जानते हुए देवराज की प्रार्थना पर ब्रह्म आए और उनके कहने पर विश्वामित्र बिरत हुए।
यह एक आख्यान था इसमें कर्म वाद का रहस्य स्पष्ट रूप से उद्घाटित है भाग्य के रूप में कर्म फल की मर्यादा अपने स्थान पर और नवीन कर्म के भाग्य का निर्माण करने वाला कर्म बल अपने स्थान पर यह व्यवस्था कर्म बाद की सीमा का उल्लंघन नहीं हैs माना किसी व्यक्ति के लिए नहीं रहने का योग है ऋण को चुकाना ही पड़ेगा यह प्राकृत व्यवस्था है पर व्यक्ति धना गमन के लिए कोई प्रयोग करें और उसके परिणाम स्वरूप उसके आय के साधन जुटतेते जाए जिससे वह ऋण चुका सके।
यह कर्म वाद का सार्थक पक्ष है यह दूसरी बात है कि ऋण ग्रस्त करने वाले योग से अधिक हमारे बल प्रयोग का बल रहे मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि शुद्ध और विधि पूर्वक किया गया प्रयोग फल नहीं दे रहा है तो निश्चय से मात्रा कम है व्यक्ति को इतना विवश मान लेना कि वह भाग्य के आगे उपाय है अन्याय है  अनंत भाग्य नाम से जो कुछ मिल रहा है वह हमारा कर्म का है।
भाग्य के विधाता हम हैं तो दूसरे भारतीय का निर्माण भी हम कर सकते हैं यह विश्वास हमारे बल को उद्दीप्त करता रहे और अन्यथा यह सारा उपचार शास्त्र असत्य हो जाएगा कर्म वंश वाद का सिद्धांत अधूरा रह जाएगा न्यू शास्त्रों ने काम में प्रयोग करने से मना किया है aपर साथ ही विषमताओं से मुक्त होने के लिए विधि भी बताई है और प्रयोग भी बताए हैं वास्तविकता यह है कि व्यक्ति काम ना करत होकर कोई प्रयोग करता है और प्रयोजन पूर्ण होने पर उसे भूल जाता है यह स्वार्थ वृत्ति हुई अथ च सपण साधना वैसे ही साधना के स्तर को निम्न कर देती है।
यह व्यवहार काम में कर्म के निषेध के मूल में रहा है प्रयोजन के अधिष्ठाता देवता का विधिवत अर्चन करके सम्मान पूर्वक विसर्जन करने पर कोई दोष नहीं है ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारा प्रयोजन को प्रयोग पूर्ण होने से पहले ही सिद्ध हो गया है और हम उस प्रयोग को वहीं छोड़ दें।

क्रमश कल की पोस्ट में दुर्गा सप्तशती के काम्य प्रयोग पर वर्णन किया जाएगा

ऊर्जा डायग्राम

ब्रह्माण्ड एक ऐसे सूक्ष्म तत्त्व से निर्मित हुआ है, जो शुद्ध सूक्ष्म विरल और परम गति वान एव तेजवान है इस तत्त्व से ब्रह्माण्ड के निर्माण की एक विस्तृत प्रक्रिया है, किसी ने इस तत्त्व को आत्मा कहा है किसी ने शिव कहा है तो किसी ने ब्रह्म।

इसी तत्व से उत्पन्न ब्रह्माण्ड एक विशिष्ट ऊर्जा के डायग्राम मे क्रिया कर रहा है । इस डायग्राम से ऊर्जा तरंगें उत्पन्न हो रही है जैसा ऊर्जा डायग्राम इस ब्रह्माण्ड का है वैसा ही डायग्राम किसी प्राकृतिक इकाई का होता है, चाहे वह पृथ्वी हो सूर्य हो, चाँद हो, और मंडल हो या निहारिका हो , वैसा ही ऊर्जा डायग्राम प्रत्येक जीव, प्रत्येक वनस्पति, प्रत्येक कीटाणु, प्रत्येक परमाणु का होता है, और सब एक दुसरे से जुडे हुए होते है ठीक उसी प्रकार किसी जीव के कोशाणु एक दुसरे से जुडे होते है। 

यह ऊर्जा डायग्राम इस प्रकार है जैसे सूर्य के केन्द्र मे उसका घन पोल है वहा से जो किरणे सतह से विकरित होती है वे ऋण ऊर्जा तरंगें है किन्तु पृथ्वी ये लिए वे तरंगें यानि सूर्य की किरणे धन तरंगें है और उन्ही तरंगों के कारण पृथ्वी का नाभिक काम करता है, पृथ्वी के लिए धनघ्रुव है और उसकी सतह से जो ऊर्जा विकरित है वह पृथ्वी की ऋण तरंगें है ।

पृथ्वी की ये ऋण तरंगे हमारे लिए धन तरंगें है हमारी उत्पत्ति सूर्य की ऋण तरंगों एवं पृथ्वी की ऋण तरंगों से सभी जीव वनस्पतियों की होती है इससे हमारे ह्रदय का नाभिक बनता है और इसी से हमारा डायग्राम बनता है यह डायग्राम भी वही होता है और इसका दो (दोनो पैर)धन कोण पृथ्वी से लगा होता है और एक सुर्य की ओर होता (सिर) है, दो ऋण कोण ऊपर होता(हाथ)है एक नीचे की ओर होता(रीढ़ की हड्डी का सिरा) है।

पृथ्वी का धन कोण सूर्य की ओर होता है दो उसके विपरीत एक ऋण कोण विपरीत मे होता है दो सूर्य की ओर सूर्य की निहारिका के केन्द्र से भी यही स्थिति होती है यही क्रम ब्रह्माण्ड इस केन्द्र तक चला जाता है । हमारा ऊर्जा डायग्राम अनेक श्रृंखलाओं मे होता हुआ ब्रह्माण्ड के ऊर्जा डायग्राम से जुड़ा है।
                                
जब सुक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर अनाहत चक्र से जुडी रज्जूनूमा त्रिगुणी ऊर्जा धारा के तन्तु मूल को उसके केन्द्र से तोड दिया जाता है तब अनाहत चक्र का कमल शरीर से अलग हो जाता है । इस समय ऊर्जा ज्योति रूप कमल होता है, जो ऊर्जा ज्योति का स्वरूप बन जाता है इसमें सम्पूर्ण ऊर्जा शरीर अपने ऊर्जा जन्तुओं के साथ सिमटा होता है ।

प्रेत आत्मा भी सुक्ष्म शरीर ही होता है ।और यह भी स्वयं को कुछ हद तक सिंकोड सकता है।

परन्तु इसमे और ज्योति कमल में अन्तर होता है कि प्रेतात्मा  स्वयं के ऊर्जास्वरूप एक स्थान पर केन्द्रित नही कर सकता ।
यह एक भ्रम है कि प्रेतात्मा कोई भी स्वरूप धारण कर सकती है यह दूसरों को सम्मोहित करके ऐसा दृश्य दिखाती  है जो नही है । यह क्रिया कोई उन्नत आत्मबल से युक्त प्रेतात्मा ही कर सकती है सभी नही।

दुसरी मान्यता यह है कि प्रेतात्मा छिद्र मे प्रवेश कर जाती है यह भी एक भ्रम है प्रेतात्मा का प्रकृति पर कोई वश नही है उसका छिद्र मे प्रविष्ट होने का कोई अर्थ नही है क्यो कि स्थूल तत्त्व उसे रोक नही सकते वह पत्थरों से भी पराग बन कर निकल सकती है।

किन्तु यह कमल प्रेतात्मा के समान होते हुए भी प्रेतात्मा नही है यह केन्द्रभूत सूक्ष्म शरीर है ।

आज बस इतना ही..

Vedic vignan

वेदो_का_मनोमयी_कोश

{{{ॐ}}}

                                                        #वेदो_का_मनोमयी_कोश

मनस शरीर यानि मनोमय शरीर का विकास साधना के द्वारा किया जाता है यह इक्कीस वर्ष के बाद विकसित हो सकता है इसे विकसित होने सअतीन्द्रिय शक्ति आ जाती है जैसे सम्मोहन ,दुर संरेक्षण दसरो का मनपढ़ लेना शरीर से बहार निकल कर यात्रा करना अपने को शरीर से अलग करना वनस्पतियो  के गुण पता लगना उपयोग करना  आदि।
चरक और सुश्रुत ने इसी सिद्धि से शरीर के बारिक  से बारिक अंगो का भी वर्णन किया था। सुषुम्ना नाडी़ ,कुण्डलिनी और षट् चक्रों  को विज्ञान अभी भी नही खोज पाया।
इन विचार तरगों  का प्रभाव पदार्थ पर भी पडता है संकल्प से वस्तु  हिलाई व तोडी  जा सकती है। विज्ञान ने भी इसके कई प्रयोग किये है योग की समस्त सिद्धियाँ जो पांतजलयोग दर्शन मे दी गयी है वे इसी शरीर के विकसित होने से आ जाती है कुण्डलिनी भी इसी शरीर की घटना है।
जादु चमत्कार इसी का विकास है और इसका केन्द्र है अनाहत चक्र  जब अनाहत जाग्रत होता है तो ये सिद्धियाँ आ जाती है
इसके जाग्रत होने से काल व स्थान की दुरी मिट जाती है  वह बिना मन इन्द्रियो के सीधा मन से देख व सुन सकता है।
कल्पना, इसकी संकल्प सम्भावनाएँ है ऐसा व्यक्ति शाप दे सकता है
पुराण शरीर को इसी उपलब्ध व्यक्तियों  द्वारा लिखे गये है किन्तु उनकी भाषा प्रतीकात्मक  होने से विज्ञानिक उन्हे समझ नही पाते ऐसे व्यक्तियों  ने प्रेतात्मा को जाना मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाती है कहां कैसे रहती है कैसा अनुभव करती  है कौन इन आत्माओं को ले जाता है पुनर्जन्म  कब और कैसे होता है गर्भ मे जीवात्मा  का प्रवेश कब होता है । स्वर्ग  और नरक कहां हैआदि की जानकारी ऐसे व्यक्ति ही दे सकते है जो मनोमय  शरीर या मनस शरीर को सक्रिय कर लेते है
                                               यही वेदातं का मनोमय कोष है

काल का रहस्य

------------------: जगत के सभी पदार्थ कालशक्ति के अधीन हैं:--------------------
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

 ---------:साधना का प्रयोजन है-- कालक्षय पर विजय प्राप्त करना:---------
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        मीरा कृष्ण के असीम प्रेम में डूबी रहती थी। जो मिला, खा लिया। उसे न तन का होश, न खाने की चिन्ता। उन्हें विष दिया गया, उसे भी कृष्ण का प्रसाद समझ कर पी गयीं वह। लेकिन विष का तो असर ही नहीं हुआ। ऐसा क्यों ?--कभी इसपर लोगों ने विचार किया ? प्रेम रस के रहते फिर किसका असर होगा शरीर पर भला ! यह प्रेम ही तो वास्तविक तत्व है जो ब्रह्म रूप है--'रसो वै सः।' वही परम तत्व का सार है जिसे मीरा ने अपने में आत्मसात् कर रख था। फिर उन्हें क्या चिन्ता कि कोई उन्हें अमृत पिला रहा है या पिला रहा है कोई विष। वह तो अमृत और विष का अतिक्रमण कर बहुत आगे निकल चुकी थीं। 
      इसी प्रकार मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में आदि शंकराचार्य चारों वेदों के ज्ञाता हो गए। गृहस्थ ज्ञान के लिए परकाया प्रवेश कर वह ज्ञान भी अर्जित किया, मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी से शास्त्रार्थ  किया और उन पर विजय प्राप्त की। बत्तीस वर्ष की आयु में चारों पीठों की स्थापना की और आचार्य शंकर के नाम से जगत में विख्यात हुए।
       रत्नाकर डाकू एक सन्यासी के शब्दों से प्रभावित होकर #ऋषि #बाल्मीकि बन गया। वह बाल्मीकि रामायण लिखकर हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया। एक अनपढ़ मूढ़ ब्राह्मण ने राज-दरवार में एक विदुषी कन्या को मूक शास्त्रार्थ में हराकर उससे विवाह कर लिया। बाद में अपनी मूढ़ता का भेद खुलने पर और पत्नी से अपमानित होकर गृह-त्याग कर चला गया। वही मूढ़ बाद में #कालिदास बनकर लौटा। इसी तरह पत्नी के मार्मिक शब्दों ने तुलसीदास के जीवन को ही बदल दिया और उन्हें महाकवि तुलसीदास बना दिया। इसी प्रकार रैदास, कबीरदास, सूरदास के जीवन में भी घटनाएं घटीं और उनके जीवन बदल गए। ऐसी हज़ारों घटनाएं हैं जो किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं हैं। ऐसे बहुत से साधकों का वर्णन मिलता है जिनके जीवन पर काल का प्रभाव बहुत ही न्यून पड़ता है। जीवन के उस क्षण को और बिन्दु को कौन जानता है जहाँ से मनुष्य का जीवन बदलने वाला है। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रकृति वह अमूल्य अवसर कभी- न-कभी हर मनुष्य के सामने लाती है। यह मनुष्य ही है कि अपने अहंकार में वह उस अवसर को पहचान नहीं पाता।

                काल का रहस्य
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       विश्वब्रह्मांड काल-जगत है। इसे काल-जगत से ही समझने का प्रयास करना चाहिए। काल- जगत एक प्रकार से अपरिवर्तनशील है। यहाँ पर जो शक्ति कार्य करती है, वह निरन्तर आवर्तित होती रहती है। इस आवर्तन के दो प्रकार हैं--एक सिकुड़ना और दूसरा विस्तार। एक की गति भीतर की ओर है और दूसरे की गति है बाहर की ओर। भीतर की ओर गति ही सिकुड़ना है और बाहर की ओर गति है--विस्तार-गति। देखा जाय तो एक श्वास प्रक्रिया है और दूसरी है--प्रश्वास प्रक्रिया। जगत के सारे द्वन्द्व इनी दोनों प्रक्रियाओं के अंतर्गत हैं। श्वास लेना भी होता है और छोड़ना भी होता है। श्वास का ग्रहण और त्याग निरन्तर चलता रहता है। इसीका नाम जीवन है।
      तंत्रशास्त्र में 'षोडशी कला' का विशेष स्थान है। काल का सूक्ष्म रहस्य इस विद्या के गर्भ में छिपा है। महाशक्ति और काल-शक्ति ही सूक्ष्म रूप से जगत में कार्य करती है। अगर देखा जाये तो दोनों एक ही हैं। लेकिन कार्य निरूपण अलग-अलग है। काल-शक्ति परिणामी है  उससे ही सभी परिणाम घटित होते हैं।
       आदि काल से ही काल से रक्षा पाने के लिए सिद्ध-साधक किसी न किसी महाशक्ति के आश्रय में जाते हैं। क्योंकि काल-शक्ति आवर्तनशील है, इसीलिए जगत के सभी जड़-चेतन पदार्थ काल-शक्ति के ही अधीन रहकर निरन्तर आवर्तन करते रहते हैं। जगत में सभी वस्तुएं इसीलिए परिवर्तित होती रहती हैं क्योंकि आवर्तन शक्ति से उनका परिवर्तन करना स्वभाव बन जाता है। साधना का यही रहस्य है। हम इसी काल पर विजय प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं। साधक की शक्ति की साधना का प्रयोजन है इसी काल-क्षय पर विजय प्राप्त करना। काल का शरीर पर न्यूनतम प्रभाव पड़े ताकि वह अपनी साधना-पथ में इस अमूल्य शरीर का अधिक से अधिक उपयोग कर सके और साधना के उस परम लक्ष्य को प्राप्त कर सके जो जन्म-जन्मान्तर से चला आ रहा है। shiv ram Tiwari 

श्री गुरु चरण सरोज रज का महत्व

श्री गुरु चरण सरोज रज :---

श्रीगुरुचरणों में जब से नमन किया है, सिर बापस उठा ही नहीं है, तब से झुका हुआ ही है और सदा झुका हुआ ही रहेगा| गुरु तत्व के साथ हम एक हैं| उन में और हमारे में कहीं कोई अंतर नहीं है| हमारा साथ शाश्वत है| शरीर तो पता नहीं कितनी बार छुटा है, मिला है, और छुटता रहेगा, पर गुरु का साथ शाश्वत है|

'श्री' शब्द में 'श' का अर्थ है श्वास, 'र' अग्निबीज है, और 'ई' शक्तिबीज| श्वास रूपी अग्नि और उसकी शक्ति ही 'श्री' है| श्वास का संचलन प्राण तत्व के द्वारा होता है| प्राण तत्व ..... सुषुम्ना नाड़ी में सोम और अग्नि के रूप में संचारित होता है| श्वास उसी की प्रतिक्रिया है| जब प्राण-तत्व का डोलना बंद हो जाता है तब प्राणी की भौतिक मृत्यु हो जाती है|

सहस्त्रार में दिखाई दे रही ज्योति गुरु महाराज के चरण-कमल हैं| उस ज्योति का ध्यान श्रीगुरुचरणों का ध्यान है| उस ज्योति-पुंज का प्रकाश "श्रीगुरुचरण सरोज रज" है| सहस्त्रार में स्थिति श्रीगुरुचरणों में आश्रय है| खेचरी-मुद्रा .... श्रीगुरुचरणों का स्पर्श है| जिन्हें खेचरी सिद्ध नहीं है वे साधनाकाल में जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखें और आती-जाती श्वास के प्रति सजग रहें| तालव्य-क्रिया के नियमित अभ्यास से खेचरी सिद्ध होती है|

संध्याकाल ..... दो श्वासों के मध्य का संधिकाल "संध्या" कहलाता है जो परमात्मा की उपासना का सर्वश्रेष्ठ अबूझ मुहूर्त है| हर श्वास पर परमात्मा का स्मरण होना चाहिए क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सभी प्राणियों के माध्यम से साँसें ले रहे हैं| हर एक प्रश्वास जन्म है, और हर एक निःश्वास मृत्यु| 

हमारा मन जब मूलाधार व स्वाधिष्ठान केन्द्रों में ही रहता है तब वह धर्म की हानि है| हर श्वास में ईश्वरप्रणिधान का सहारा लेकर आज्ञाचक्र तक व उससे ऊपर उठना धर्म का अभ्युत्थान है| आज्ञाचक्र और उस से ऊपर धर्मक्षेत्र है, उसके नीचे कुरुक्षेत्र|

यह मनुष्य देह इस संसार सागर को पार करने की नौका है, गुरु कर्णधार हैं, व अनुकूल वायु .... परमात्मा का अनुग्रह है|  परमात्मा सदा हमारी चेतना में रहें| 
ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता से भी परे .... परमशिव है| वहाँ स्थित होकर जीव स्वयं शिव हो जाता है| कुण्डलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है| हमारा मन सदा श्री गुरु चरण सरोज रज में लोटपोट करता रहे| ॐ तत्सत्!!
कृपा शंकर 
२२ मार्च २०२०

ध्यान की परिभाषा

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है। 

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है। 

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान क्रिया और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है। 

बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। 

आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति। 

ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।

ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। 

ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है। 
नमन ॐ

Virat Yog Sagar

महा मृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ

ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है। चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है|

मंत्र इस प्रकार है -

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृत:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥
यह त्रयम्बक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ 
त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को
यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्* पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मका* उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)
इव = जैसे, इस तरह
बन्धनात् = तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
मृत्योः = * मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
मा = नहीं वंचित होएं
अमृतात् = अमरता, मोक्ष के आनन्द से sabhar Facebook wall 

अध्यात्म-दृष्टि और विज्ञान-दृष्टि

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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्य गुरु के श्रीचरणों में कोटि- कोटि वन्दन

       किसी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश, बस होता है उसका मात्र रूपान्तरण
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       जब भी हम अशान्त होते हैं, दुःखी होते हैं तो मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न होने लगता है। फिर हम एकान्त खोजते हैं। घने वृक्षों के बीच या नदी के तट पर चले जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि आत्मा की शान्ति यदि कहीं है तो वह है अध्यात्म में। उससे हम दूर नहीं हो सकते क्योंकि मनुष्य के सुख का मूल है--आत्मिक शान्ति जो बाह्य जगत में नहीं मिल सकती। बाह्य जगत हमें क्षणिक सुख  दे सकता है जो भौतिक जीवन के लिए ही आवश्यक है, लेकिन शान्ति नहीं दे सकता। शान्ति तो आध्यात्मिक मार्ग के अनुसरण से ही प्राप्त हो सकती है।
       अगर इसके मूल में जाएँ तो एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आएगा। वह यह कि हमारे पूर्वज ऋषि थे। उनकी साधना, तपस्या और खोज प्रकृति के सान्निध्य में हुई। उन्होंने प्रकृति में उस परम सत्ता का अनुभव किया जिसे आज का विज्ञान सोच भी नहीं सकता।
       इस सत्य को विज्ञान भी स्वीकार करता है कि हमारी अशान्ति का कारण यह भी है कि हमें जो होना चाहिए, वह हम नहीं हैं। हम ऋषि-सन्तान हैं और हमारे रक्त में उन ऋषियों के संस्कार हैं। मगर हमारी आत्मा पर आज ऐसा आवरण पड़ गया है जिसे हम हटा नहीं पा रहे हैं। बस, इधर-उधर हाथ पांव मार रहे हैं। जब भी हमारे बीच कोई महापुरुष प्रकट हो जाता है तो उसके अलौकिक ज्ञान व चमत्कार को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं। फिर हम उसका अनुसरण करने लगते हैं। क्योंकि वह हमसे अलग दिखता है। लेकिन क्या हमने कभी यह विचार किया है कि वह हमसे अलग क्यों दिखता है ? हमें यह अवश्य चिन्तन करना चाहिए कि उस दिव्य पुरुष की आत्मा पर से वह आवरण हट गया है और वह मूल को हो गया है उपलब्ध। वह हो गया है--निर्मल, निश्छल और स्थिर। वह प्रकृतिमय हो गया है। हमारे और दिव्य पुरुष के बीच बस यही अन्तर है। अपनी आत्मा के ऊपर से आवरण हटाना ही आत्म-साधना है, समाधि है। समाधि का तात्पर्य है उस परम शून्य को उपलब्ध हो जाना।
       मनुष्य के जीवन में एक विशेष अवस्था आती है जिसे 'शून्यावस्था' कहते हैं। यह अवस्था ही समाधि की अवस्था है। इसमें उसे न अपने जीवन की सुध रहती है और न रहती है सुध इस जगत की।
       मनुष्य का जीवन अनन्त- अनन्त यात्राओं के मध्य एक पड़ाव है और उसका शरीर है एक वाहन जिसके माध्यम से उसकी आत्मा इस संसार की यात्रा अनवरत रूप से हर युग में करती रहती है। आत्मा की यह यात्रा अनन्त काल से चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। हमारी आत्मा हर युग में, हर क्षण में मौजूद रही है, हर महापुरुष की साक्षी रही है और भविष्य में साक्षी रहेगी। उसने राम के काल को देखा है, कृष्ण के काल को भी देखा है, बुद्ध और महावीर के कालखण्ड में भी वह रही है। कब नहीं रही वह ?
        इसके विपरीत विज्ञान आत्मा के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता। उसे वह बस  ऊर्जा मानता है। जब तक ऊर्जा है, शरीर चैतन्य है। शरीर से ऊर्जा निकल गयी, शरीर का अस्तित्व ख़त्म। वह आत्मा को नहीं मानता। विज्ञान का कहना है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं होती। वह एक प्रकार की ऊर्जा है। विज्ञान एक सिद्धान्त है--'थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी' अर्थात् पिण्ड ऊर्जा में परिवर्तित होता रहता है और ऊर्जा पिण्ड में। यह क्रिया अनवरत चल रही है और जो भी दृष्टिगोचर होता है, वह एक दूसरे में ढल जाने की भौतिक और रसायनिक क्रिया के परिणास्वरूप है। सब कुछ अणुओं का खेल है। वह सृजन और विनाश नहीं है। 
       हमारा अध्यात्म भी तो यही कहता कि किसी भी वस्तु का न सृजन होता है और न होता है विनाश। वस्तु का सिर्फ रूपान्तरण होता है। पूरे विश्वब्रह्माण्ड में कम्पन हो रहा है। कोई चीज़ स्थिर नहीं है। सब में प्रवाह है। जो दिखाई दे रहा है ,सब अणुओं का घनीभूत रूप है। हमारा शरीर, हमारा जगत यहाँ तक कि यह ब्रह्माण्ड--सब कुछ ऊर्जामय है। अध्यात्म की ऊंचाई छूने में विज्ञान को अभी काफी समय लगेगा। तर्क करने से समाधान नहीं मिलता। ब्रह्माण्ड की बात तो दूर की है, यहाँ तक कि हमारा शरीर स्वयं में रहस्यमय है। उससे ज्यादा रहस्यमय है हमारा मस्तिष्क। 
       विज्ञान स्वप्न को नहीं मानता। उसका कहना है कि मन की दबी हुई इच्छा ही स्वप्न के माध्यम से मस्तिष्क पूरी करता है। लेकिन आज जितने भी आविष्कार हुए हैं, उनमें स्वप्न का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह बात वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। जहां तक अलौकिकता का अर्थ है, इस संसार से परे कोई वस्तु जो प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत ही आती है, वह किसी अलौकिक शक्ति के द्वारा ही संचालित मानी जाती है। वहाँ विज्ञान का नियम नहीं चलता। वह अलौकिक है, रहस्य है। जबकि विज्ञान उसे नकार देता है। वह कहता है कि इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी अलौकिक नहीं है। न ही कोई रहस्य है। सब प्रकृति के अंतर्गत है। जो बुद्धि से परे है, उसे अलौकिक कहा जाता है। ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा केवल यह है कि हमारी सोच, हमारी क्षमता अथवा हमारे ज्ञान के परे है, इसलिए अलौकिक है। जितने भी ज्ञानी, साधक हुए हैं, उन्होंने कभी भी चमत्कार नहीं दिखलाया, न ही उसकी आवश्यकता समझी। बस, घटनाएं घट गयीं, उन्हें  लोगों ने चमत्कार मान लिया, लेकिन ज्ञानी, साधकों के लिए मात्र घटना थी, चमत्कार नहीं। sabhar shivram Tiwari Facebook wall

सप्तशती_भाग_2

{{{ॐ}}}

                                                                #

दूसरे अध्याय से मध्यम चरित्र का प्रारंभ होता है और इसकी अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है मध्यम चरित्र में दूसरा तीसरा चौथा अध्याय समाविष्ट है इन तीनों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी है दूसरे अध्याय में वह लक्ष्मी बीज तीसरे में अटठाईस वर्णात्मिका और चौथे अध्याय मे वह त्रिवर्णात्मिका शक्ति लक्ष्मी के रूप में वर्णित है उत्तम चरित्र में सरस्वती है जिसका विस्तार सात अध्यायों में है kअध्याय अनुसार इसके रूप हैं विष्णूवादी तेईस देवतात्मिका शतमुखी घूम्राक्षी काली चामुंडा रक्ताक्षी वाग्भवबीज की अधिष्ठात्री महाकाली सिंहवाहिना त्रिशुलपाश धारणी और सर्वनारायणी है।
बारहंवा और तेरहंवा अध्याय उत्तर चरित्र में आता है पर बारहवें में फलश्रुति और तेहरवें में वरदान है बारहवे की अधिष्ठात्री मां बाला त्रिपुर सुंदरी है और तेहरवें की त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या है प्रत्येक अध्याय के अंत में इन्हीं नामों से महाहुति दी जाती है।
तीनों चरित्रों में एक ही शक्ति गुणात्मक वृत्ति के कारण महासरस्वती  महालक्ष्मी और मां महाकाली के रूप में त्रिधा हो जाती हैं माया की यह महास्तर लोक प्रकृति का विवेचन करते हैंo इन्हीं स्तरों पर होने वाला असंतुलन उसे उद्विग्न कर देता है यह उद्वेग ही विक्षोभ का कारण बनता है और  विक्षुब्ध प्रकृति संतुलन स्थापित करके वीरमती है।
तीनों ही चरित्रों में विक्षोभ कारण अंधकार होता है यह अंधकार अपने तक सीमित रहे तो किसी को कोई आपत्ति नहीं पर जब यह आसुरी स्वरूप ग्रहण कर लेता है तो अव्यवस्था का कारण बन जाता है यह अहंकार कभी मधु कैटभ कभी महिष कभी चंड मुंड तो कभी शुंभ निशुंभ बन जाता है।
प्रथम चरित्र में मधु कैटभ नाम दो असुर हैं यह अपने बाहुबल से सारी मर्यादाओं का उल्लंघन करके अपने को स्थापित कर देना चाहते हैं विष्णु जो संसार के रक्षक हैं hयह तमोगुण ग्रस्त हैं देवगण गहन निंद्रा की स्तुति करते हैं यह निंद्रा विष्णु माया है यह अपना प्रभाव संवत करती है विष्णु जग जाते हैं व्यवस्था का अव्यवस्था से संघर्ष होता है यही विष्णुमाया है फिर मोहित करने के लिए प्रस्तुत होती है।
और दर्पदृष्ट मधू कैटभ के मुख से कहलाती है #आवां_जहि_न_यत्रोवीं_सलिलेन_परिप्लुता अर्थात जहां धरती पर जल नहीं हो वही हमारा वध कर देना माया के प्रभाव से मति भ्रष्ट दानव का वध करने के लिए तुरंत निर्जल धरती प्रगट हो गई ।
मध्यम चरित्र की देवता लक्ष्मी है विष्णु ऋषि है और छंद है उष्णिक यहां सभी व्यवस्थित है लक्ष्मी रजोगुण की आधार भूमि है यहां चंचल्य अतिथि अत्यंत तीव्र है इसी चंचल्य को परिवर्तित करने वाला तत्व वायु है इसलिए मध्यम चरित्र का तत्व वायु है लक्ष्मी का जनक सागर माना जाता हैs क्योंकि दृश्य अवस्था में जलसा चंचल दूसरा तत्व नहीं है विशेषत उस अवस्था में जबकि वायु प्रेरित कर रहा हो।
सर्पासन पर अर्धनिमीलित नेत्र विष्णु लक्ष्मी के स्पर्श से अंतः प्रह्ष्ट हो इस विस्तार की परिधि बने हुए हैं इनकी मंद किंतु सशक्त क्रिया सभी को दोलित वह क्रियाशील बनाए हुए हैं सृजन की भूमि यही रजोगुण है सत्व इस को प्रेरित करता है तब आबद्ध रखता है जहां काम और क्रोध को रजोगुण की वृत्ति बताते हैं वहां इन दोनों भाव में परस्पर विरुद्धवृत्ति होना भी आश्चर्य है।
इन दोनो की उदभवस्थली एक है पर इनके प्रेरक और धारक बदल जाते हैं हम जानते हैं कि काम सृजनानंद का कारक है और क्रोध विनाश का पुरोगामी है काम सत्वोन्मुख है तो क्रोध तमोभिमुख है मध्यम चरित्र का प्रति नायक महिष है महिष का प्रेरक अहंकार है aवह मद और लोभ का प्रतीक बनकर व्यवस्था को ध्वंस करना चाहता है इसके लिए क्रोध से अविष्ट होकर परमेश्वरी से युद्ध करने के में प्रवृत्त होता है अंत में विनाश के तम में डूब जाता है।

परावस्था



बर्फ को शून्य करने के लिए ताप देना पड़ता है । 

वह पहले पानी होती है , उसके बाद भाप , फिर शून्य में मिल जाती है ।

ताप देने की क्रिया के कारण बर्फ में धीरे धीरे विस्तार होता है और वह शून्यता की और जाती है । 

उसके कण जो पास पास थे, धीरे धीरे दूर होते जाते हैं । अर्थात् भीतरी संरचना में शून्यता धीरे धीरे आविष्ट होती जाती है । 

कठिन से तरल, तरल से वाष्पीय, वाष्प से फिर शून्य ।
कठिन अवस्था की परावस्था तरल , उसकी परावस्था भाप और उसकी परावस्था शून्य ।

ताप देते हैं तो शून्यता का आभास होने लगता है । अर्थात् शून्यता धीरे धीरे आने लगती है बर्फ में । अभी पूरी नहीं आयी । वह विस्तार हो कर तरल पानी बनती है , और शून्यता आगयी , किन्तु अभी पूरी शून्य नहीं हुई , किन्तु यह भी नहीं कि शून्यता नहीं है । वह है , और क्रमशः ताप देने से बढ़ रही है ।

अगर ताप देना बन्द कर दें , तो वह उसी स्थिति में आ जाएगी , और धीरे धीरे पुनः बर्फ हो जाएगी । 
यहाँ तक कि भाप भी बन जाए , किन्तु उत्ताप देना बन्द कर दिया तो वह पुनः तरल हो कर धीरे धीरे बर्फ हो जाएगी ।

इसलिए तब तक ताप देना होता है जब तक पूरा भाप शून्य न हो जाए । शून्यता की मात्रा  धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते सर्वव्यापी शून्य न हो जाए । 

जब पूर्ण शून्य हो जाए तभी न बर्फ रहती है , न पानी न भाप । 

अब इस प्रतीकात्मक उदाहरण को प्रयोग कीजिये समझने के लिए की क्रिया की परावस्था क्या है , बिना क्रिया किये परावस्था में क्यों नहीं जा सकते , क्रिया की परावस्था में रह कर क्यों क्रिया होती है और क्रिया की परावस्था आ जाए तो क्यों उसे और कुछ कर के नहीं छेड़ना चाहिए ।

गुरुकृपा से यह उदाहरण मन में आया । कोई त्रुटि हो व्याकरण गत तो क्षमा 🙏 

श्रीगुरु अर्पणं अस्तु

~साभार :- सोमदत्त शर्मा

ध्यान जीवन का सबसे बड़ा आनंद


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ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है- जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से,कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उल्टी अवस्था ध्यान की है। जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं- वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है, वह ध्यान है।

इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं - मौन की, शांति की- जब सब थम जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है। धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाती है।

मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गये हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुन: पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंख में झांके और वहां आपको अद्भुत मौन दिखेगा, अद्भुत निर्दोषतादिखेगी। हर बच्चा ध्यान के लिए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना होगा। और धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषिता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा- एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुन: उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है, इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है, तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है- हमने इस पहले जाना है। लेकिन हम भूल गये हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन हम जरा खोदें तो हीरा पुन: हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते, उसे हम केवल भूल सकते हैं।

हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारी वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहें हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।
ओशो

Rajesh Saini

शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं!

शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं! भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। 
▪️ शिवलिंग भी एक प्रकार के न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें। 
▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।
▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। 
▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। 
▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।
▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। 
महाकाल उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी) देखिये -
▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी 
▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी 
▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी 
▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी 
▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी 
▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी 
▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी
▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी 
▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी 
हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था। 
उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। 
इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले। 
और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला।
आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये sabhar Facebook adi yogi wall

सब-कांसियस मन से दूरी है तनाव और फ्रस्ट्रेशन का कारण



सब-कांसियस मन से दूरी है तनाव और फ्रस्ट्रेशन का कारण - 

swami ji kbhi mastishk me vicharo ka silsila kabhi bhav me kabhi sannata kabhi nirvichar  kabhi savpn pura din yeh chaker chalta h ek kona yeh sab dekh rha h apne bas me kuchh bhi nhi yeh sab kya ho rha h swami ji 
margdrashen kre🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽🙏🏽

मष्तिष्क में कभी विचार, कभी निर्विचार, कभी भाव, कभी सन्नाटा, कभी सपने यह सब चल रहा होता है और कभी एक कोना यह सब देखता रहता है और यह भी लगता है कि हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है। यही हमारी स्थिति है। हम दिन में चेतन अवस्था में जब होते हैं तो विचार हमें घेरे रहते हैं, भाव हमे प्रभावित करते हैं। और कभी-कभी निर्विचार में भी हमारा प्रवेश होता है जब हम अपने प्रेमी के साथ होते हैं।

जाग्रत, सपने और गहरी नींद, इन तीन तलों पर ही हमारा जीवन डोलता रहता है। दिन भर हमारा चेतन मन काम करता है, हम जागे हुए काम करते हैं, विचार करते हैं। फिर हम रात को नींद में प्रवेश कर जाते हैं तो हमारा चेतन मन सो जाता है और अचेतन मन काम करने लगता है। वह हमें सपने दिखाने लगता है। और फिर आधी रात के बाद गहरी नींद में हमारा प्रवेश होता है। यानि अतिचेतन मन में हमारा प्रवेश होता है। गहरी नींद में हम अतिचेतन मन में प्रवेश कर जाते हैं। और सुबह जागने पर फिर हम चेतन मन में लौट आते हैं। 

चेतन, अचेतन और अतिचेतन, हमारा सारा जीवन इन तीनों तलों पर डोलता रहता है। जिसमें हम चेतन मन और अचेतन मन का तो बहुत उपयोग करते हैं लेकिन अतिचेतन का उपयोग नहीं कर पाते हैं। सारे तनाव सारी परेशानियां अतिचेतन से दूरी बनाने के कारण से ही हैं। जब तक हम मन के तीनों तलों का उपयोग नहीं करेंगे हम तनाव में रहेंगे।

हम चेतन मन का पूरा उपयोग करते हैं और हमारा अचेतन मन भी अपना पूरा काम करता है लेकिन हमारा अतिचेतन काम नहीं कर पाता है। क्योंकि हम गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं क्योंकि गहरी नींद में ही हमारा अतिचेतन से संपर्क होता है। और हमें उससे उर्जा मिल पाती है। हम दिनभर काम करते हैं और रात गहरी नींद में हमें अतिचेतन से  पुनः फिर उर्जा मिल जाती है। 

हम जो भोजन लेकर जो ऊर्जा, जो शक्ति अपने शरीर में डालते हैं उस ऊर्जा को हम पूरी तरह से खर्च नहीं कर पाते हैं। और वह उर्जा हमें तनाव और परेशानियां देती है। वह उर्जा हमें गहरी नींद में प्रवेश नहीं करने देती है। हमारे शरीर की अतिरिक्त उर्जा हमें गहरी नींद में प्रवेश नहीं करने देती है, गहरी नींद जहां पर हम अतिचेतन मन में प्रवेश करते हैं। जैसे पूर्णिमा की रात को हम अपने कमरे में बल्ब जला दें और खिड़की खोल देते हैं तो चंद्रमा की रोशनी कमरे के भीतर प्रवेश नहीं करेगी। जब तक  कि हम बल्ब को बंद नहीं करते हैं। ज्योंही हम बल्ब को बंद करते हैं, कमरे में अंधेरा हो जाता है और खिड़की से चंद्रमा की रोशनी कमरे में प्रवेश कर जाती है। ठीक इसी भांति हमारे शरीर की उर्जा ने प्रकृति की उर्जा को हमारे भीतर आने से रोक दिया है। जब तक हम अपनी ऊर्जा को खर्च नहीं कर पाते हैं तब तक प्रकृति की उर्जा हमारे भीतर प्रवेश नहीं करती है। और प्रकृति की उर्जा प्रवेश करती है गहरी नींद में प्रवेश करने पर, जहां अतिचेतन जागता है। 

इसके लिए हमें अपनी ऊर्जा को अतिरिक्त श्रम करके खर्च करना होगा। सुबह दौड़कर पसीना बहाकर और दिन में श्रम करके  जब हम रात नींद में प्रवेश करते हैं तो नींद में प्रवेश करते ही अचेतन मन हमें सपने दिखाने लगता है। सपने हमारे स्वास्थ्य के लिए सहायक होते हैं। हमने महसूस किया था कि जिस रात प्रेमिका सपने में आई है सुबह सारा दिन उसकी याद और मस्ती में बीता है। जो काम, जो हमारी इच्छाएं, जो हमारी कामनाएँ दिन में पूरी नहीं हो पाती है, हमारा अचेतन मन उन्हें रात को नींद से सपना दिखाकर पूरी करता है।

अचेतन में सपने देखने के बाद हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। गहरी नींद में अतिचेतन में प्रवेश करता है और हमें अतिचेतन से उर्जा मिलने लगती है और हम उर्जावान होकर बाहर निकलते हैं। 

अतिचेतन मन जागता है रात को दो बजे से पांच बजे के बीच में, जब हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। तब हमारे शरीर का तापमान कम हो जाता है और गर्मी के मौसम में भी हमें हल्की सी ठंड लगने लगती है और हमारा शरीर गहरी नींद में प्रवेश करता है। गहरी नींद में सपने नहीं होते हैं क्योंकि सपने अचेतन मन के अंदर चलते हैं जबकि हम अतिचेतन मन पर खड़े होते हैं। जहां विचार और स्वप्न दोनों नहीं होते हैं क्योंकि विचार चेतन मन में चलते हैं और सपने अचेतन मन में चलते हैं और अतिचेतन निर्विचार का केंद्र है जहां पर सिर्फ उर्जा का भंडार है। हम दिन में काम करते हैं और रात को अतिचेतन मन से फिर उर्जा ले लेते हैं। 

हम दिन में श्रम नहीं करते हैं।  काम नहीं करते हैं, सारा काम मशिनें करती है, हम अपने शरीर को थकाते नहीं हैं इसलिए हम गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं और गहरी नींद में प्रवेश नहीं कर पाते हैं तो हमें अतिचेतन से उर्जा नहीं मिल पाती है और हम थकान, तनाव और कमजोरी महसूस करते हैं। 

यही कारण है कि कभी-कभी विचार खूब आते हैं और कभी-कभी हम निर्विचार हो जाते हैं जब घर में उत्सव हो या हमारा प्रेमी हमारे पास होता है, तब हमें निर्विचार का सन्नाटा सुनाई देता है। कभी-कभी गहरी नींद आती है उस दिन हमारे भीतर का कोई कोना जागते हुए यह सब देखता रहता है और उर्जा की कमी से ऐसा लगता है जैसे यह सब अपने से ही हो रहा है और लगता है जैसे चिजें हमारे हाथ से बाहर निकल गई हों।

सब-कांसियस के तल पर प्रवेश नहीं करने पर, गहरी नींद नहीं लेने पर ज्यादा ऊर्जा नहीं मिलने के कारण कभी-कभी हम भाव में बहने लगते हैं। क्योंकि उर्जा नहीं होने के कारण हम भावों के साक्षी नहीं हो पाते हैं, भाव को देख नहीं पाते हैं और उसमें बह जाते हैं। यदि हम गहरी नींद में जाकर अतिचेतन मन को छूते हैं तो हमें अतिरिक्त उर्जा मिलती है और हम साक्षी होने लगते हैं। 

अतः यदि हम अपनी ऊर्जा को मेहनत करके, खर्च करते हैं। दिन में श्रम करते हैं और पसीना बहाते हैं तो हमारा गहरी नींद में सब-कांसियस मन के तल पर प्रवेश हो जाता है और वहां से हमें भरपूर उर्जा मिलती है। वह उर्जा हमें तनाव मुक्त करते हुए ध्यान में प्रवेश करवाती है। 

स्वामी ध्यान उत्सव

दुर्गा सप्तशती का विज्ञान

{{{ॐ}}}

                                                                  #सप्तशती

दुर्गा सप्तशती में सात सौ मंत्र और तेरह अध्याय हैं उवाच अर्ध श्लोक त्रिपाद श्लोक भी इसमें पूर्ण श्लोक की तरह ही पूर्ण संख्याकित है सप्तशती में सत्तावन उवाच जिनमें मार्कंडेय मुनि प्रथम और अंतिम अध्याय में ही आते हैं और वे पांच बार बोलते हैं।
ऋषिरूवाच २७ देव्युवाच १२ राजोवाच ४ वैश्यउवाच २ देवाऊचु ३ दुतउवाच २ ब्रम्ह्मोवाच १और भगवानुवाच १ इस प्रकार कुल ५७ उवाच  है kप्रथम नवम और द्वादश अध्याय के अलावा दस अध्यायों में प्रारंभ ऋषि वचनों से होता है प्रथम अध्याय के आरंभ करने वाले मार्कंडेय नवम के राजा सूरथ और द्वादश की देवी है।
अर्ध श्लोक ३८ त्रिपाद श्लोक ६६ त्रिपाद इस तरह से की या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमो नमः पाठ करने का यह क्रम ही मान्य होने से कृपाल त्रिपाद श्लोक माने जाते हैं पूर्ण श्लोक ५३६ से २ पुनरुक्त मंत्र हैं।
प्रथम चरित्र की देवता महाकाली हैं और उसके दृष्टा ब्रह्मा है छंद है गायत्री बीज है वाणी बीज ऐं प्रथम दृष्टि में यह संयोजन विचित्र लगता है क्योंकि इसके दृष्टा ब्रह्मा हैं oऔर बीज है वाणी बीज इस सारे संयोजन को संवारने वाला अनुशासन छंद है गायत्री ,गायत्री वाकविस्तार में एक लय है किंतु स्थूल वह मूल वातावरण की उर्वर भूमि भी है जहां एक बीज के अंकुरित एवं विकसित होने की सारी पृष्ठभूमि विद्यमान है यद्यपि बीज में अंकुरित होने की और विकास की क्षमता है फिर भी उसे प्रेरक और धारक आधार की आवश्यकता रहती है।
यह धारक क्षमता गायत्री छंद है अर्थात जिस प्रकार गणपति प्रकृति के सहज व्यवहार को संपादन करने वाली एक आधारभूत अवस्था है इसलिए उनको गौरी पुत्र कहा जाता है  शिव स्वरूप का सर्जन से मंडित करने वाली आधार एवं प्रेरक शक्ति ही गोरी है उसे विनाशक अथवास अंगारक रूप प्रदान करते समय यही शक्ति काली हो जाती है उसी प्रकार बीज को आगे की स्थितियों के लिए परिवर्तन करने वाली व्यवस्था गायत्री है और इसके स्वरूप मर्यादा एवं शैली को छंद कहा जाता है।
गायत्री हमारी धरती के वातावरण का प्रारंभिक स्तर है सारा जड़ जंगम इसी से आश्रय प्राप्त करता है इसके ऊपर सावित्री छंद है भू गर्भ में जहां बीज का निक्षेप किया जाता है वह वातावरण गायत्री है पर गायत्री का दोलन सावित्री छंद को प्रेरित करता है यह प्रेरणा ही बीज कोष को परिष्कृत करती है hपरिणाम स्वरूप उसमें सृष्टि तंतु का उद्गम होता है बीज की परम विकसित अत एव परिपक्व अवस्था अनुष्टुप छंद होती है।
यह निश्चित है कि उद्भव है तो विनाश भी है स्वर्ग और संघार पदार्थ की परिभाषा है ब्रह्मा हम विकास व विस्तार की सहज प्रक्रिया का अधिकार अधिष्ठाता मानते है उसकी सहचारणी के रूप में वाग्देवी मानी जाती है नाद ब्रह्म कहकर हम विस्तार का आधार नाथ को कहते हैं यह सारा परिवेश ज्ञान के उदय की नैसर्गिक अवस्था है यही एकमात्र कारण है कि ज्ञान ही अर्थ से इति की रूप कल्पना और अवश्यंभाविता को स्थापित करता हैं।
दूसरी बात यह भी है कि काली के अति विकराल रूप से भयभीत हुए बिना उसे पाना भाव लोक का विषय नहीं हो सकता हमारा ज्ञान सामान्य स्थिति में अनुभव की परिधि में बदला रहता है और कल्पना चाहे कितनी ही उन्नत हो अनुभव की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पाती काली का जो चित्र हम देखते हैंs अथवा उसके ध्यान में वर्णित रूप की जो परिकल्पना करते हैं वह यथार्थ से बहुत छोटी होती है शास्त्रों के उपासक ओके जो लक्षण बताए गए हैं वे उसकी धारणा शक्ति एवं पात्रता का के मानक हैं काली के उपासको कि को वस्तुत भय मुक्त होना चाहिए क्योंकि वह मोह का सखा है।
जहां मोह को आशंका हुई भय उपस्थित हो जाता है और काली से अधिक भयावह कौन हो सकता है यदि साधक मोह से मुक्त नहीं हो सकता तो उसे मोह का आधार परमेश्वरी को ही मान लेना चाहिए व्यक्ति को अपने प्राण का मोह सर्वाधिक होता है मां महाकाली मोह का वध करके प्रसन्न होती है बलि के पशु का भी वध तभी किया जाता है जब वह मोहाक्रांत होकर चित्कार करता है मां प्रकृति है होने को विकृति और प्रकृति का ही परिणामी रूप है पर प्रकृति को विकृति सह्य नहीं होती जैसे किसी सफाई पसंद व्यक्ति को गंदगी अच्छी नहीं लगती वैसे ही प्रकृति स्वरूपस्थ रहना चाहती है।
जहां विकृति अपनी सीमा लांघने लगती है वही प्रकृति की भौहें तन जाती हैं और वह स्वरूपस्थ होने का उपक्रम कर बैठती है परमेश्वरी के इसी स्वभाविक लीला विलास को किसी भी आख्यान से कह दिया जाए यथार्थ है और इसलिए केवल दानव बध्य है देवता अवध्य हैं देवता प्राकृत स्तर और दानव विकृत प्रथम चरित्र की देवता काली और उसके दृष्टा मुनि ब्रह्मा यह संगति नहीं विलक्षण का का यथार्थ है संहारकारिणी को सर्जन के उषःकाल की लालिमा से मंडित करके देखने का साहस और सौंदर्य बोध ब्रह्मा में ही संभव है।
उसके विकट अट्टहास और घोर कृष्ण रूप में चमक रही दंतपंक्तियों की शुभ्रता सदगुण को कि निर्दोष दीप्ति है उसके बीज रूप में अवस्थित रहने का शौक से है उसमें लक्ष्मी का चांचल्य प्रकट रूप से नहीं है पर निष्क्रिय शव को क्रियाशील करने का बल अवश्य है aउसके पादाघात में से परमशिव क्रियामय हो उठते हैं उससे हो रहा रज स्राव रजोगुण का व्यक्त प्रतीक है शक्ति के इस प्रचंड स्वरूप को चर्मचक्षु से देख पाना संभव कहां है उसका अभिनंदन ज्ञान चक्षु के उन्मेंष से ही होता है। sabhar saki upasak Facebook wall

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